9 May Ras Mains Answer Writing

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Subject – General Science

Topic – Physics in everyday life, Gravitation, The human eye and Defects, Heat

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Q1 Explain the reason behind the pictures of floating astronauts in space stations.(2M)

Answer:

The phenomenon of microgravity, also known as weightlessness, is responsible for the floating pictures of astronauts in space stations.

  • In a satellite orbiting the Earth, every component experiences an acceleration towards the centre of the Earth, equivalent to the Earth’s gravitational acceleration at that position.
  • As a result, everything inside the satellite is in a state of free fall, but instead of falling towards Earth, they are falling around it.
  • Because all objects inside the satellite are falling at the same rate, they appear to float in a state of weightlessness.
  • Without gravity defining the vertical direction, all directions appear the same to them, eliminating the distinction between horizontal and vertical directions.

Q2 Differentiate between Myopia and Hypermetropia ?(5M)

Answer:

Q3 Answer the following parts of the question-(10M) 
What is accommodation? Write the range of the near and far points of the eye.
What is the heating effect of electric current? Write two practical applications of it.
Explain the mechanism of lightning thunderstorms.
Why do people usually prefer to apply a layer of foam insulation on the ceiling?

Ans1.

Accommodation,near and far points:

The eye lens can modify its curvature to some extent with the assistance of the ciliary muscles. This alteration in curvature enables the eye lens to adjust its focal length. The ability of the eye lens to adjust its focal length is called accommodation.

  1. The near point, where objects can be seen most distinctly without strain, is about 25 cm for a young adult with normal vision. 
  2. The far point, the farthest distance at which objects can be seen clearly, is considered to be infinity for a normal eye.

Thus, a normal eye can see objects clearly between 25 cm and infinity.

Ans2.

Heating effect of electric current

The heating effect of electric current, also known as Joule heating, occurs when electrical energy is converted into heat energy due to the resistance in a circuit. This phenomenon is particularly prominent in circuits composed solely of resistive elements, where the energy from the source is entirely dissipated as heat.

Practical applications of the heating effect of electric current include:

  • Electric Heating Devices: Household appliances like irons, toasters, ovens, kettles, and heaters use Joule heating, converting electric energy to heat for tasks like cooking and heating.
  • Electric Bulbs: While the majority of the energy consumed by the filament is converted into heat, a portion is radiated as visible light, fulfilling the bulb’s purpose of illumination.
  • Fuses in Electric Circuits: When excessive current flows through a circuit, the fuse wire heats up due to Joule heating, melts, and breaks the circuit, preventing damage.

Ans3.

lightning thunderstorms

  • Thunderstorms are complex atmospheric phenomena characterized by the rapid upward movement of warm, moist air and the formation of cumulonimbus clouds. Strong updrafts within the cloud carry water droplets to higher altitudes, where they freeze and form ice crystals.
  • Within clouds, ice particles undergo growth, collision, fracture, and separation, leading to the acquisition of positive charges by smaller particles and negative charges by larger ones. These charged particles become separated by updrafts and gravity, establishing a dipole structure with the upper portion of the cloud positively charged and the middle negatively charged. During thunderstorm development, the ground becomes positively charged
  • cosmic and radioactive radiations ionize air, making it weakly electrically conductive. The separation of charges within the cloud and between the cloud and ground generates tremendous electrical potential, reaching millions of volts. Eventually, the electrical resistance in the air breaks down, initiating lightning flashes with currents of thousands of amperes and electric fields of about 10^5 V/m.

Ans4.

Foam insulation on the ceiling

 Concrete roofs tend to become excessively hot during summer days due to the material’s significant thermal conductivity. To counteract this, people often choose to apply a layer of earth or foam insulation on the ceiling. This insulation effectively prohibits heat transfer from the roof into the interior of the house, helping to maintain cooler indoor temperatures.

Q.4 निम्नलिखित विषय पर लगभग 250 शब्दों में निबंध लिखिए-
राजस्थान में जल संरक्षण

Answer:

“नहीं नदी नाला अटै, नहीं अरवर सरराय एक आसरो बादली, मरू सूखी मत जाय।”

प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि ने ‘राजस्थान’ में जल की आवश्यकता तथा महल को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। “जलस्य जीवनम्’ की धारणा के अनुकरण में ‘नीला सोना’ (जल) को सहेजने तथा भविष्य के लिए संरक्षित करने की परम्परा हमारे यहाँ बहुआयामी उपयोग करते हुए ‘जल है तो कल है का पाठ पढाया हैं।

राजस्थान देश में सर्वाधिक भू-आकार को धारण करता है, उसी अनुपात में जल की उपलब्धता बहुत ही कम है। राज्य का आधा भाग ‘थार का सागर’ जो अरावली पर्वतमाला के वृष्टि छाया क्षेत्रों में स्थित होने के कारण वर्षा नहीं प्राप्त करता है। वहीं दूसरी ओर यहाँ नदियों भी कम है और वर्षा ऋतु में ही प्रभावित होती है। वनों की कमी, भू-जल स्तर का निम्न स्तर आदि सम्मिलित कारक है, जो राजस्थान में जल की कम मात्रा हेतु उत्तरदायी है।

राजस्थान में प्राचीन समय से ही राजा-महाराजाओं, सामंतों तथा शासकों ने जल संरक्षण हेतु अनेक तालाबों, कुँओं, बावड़ियों, झालरा, टोबा, खडीन का निर्माण करवाया। रहीमदास जी ने पानी की महता को इस प्रकार व्यक्त किया है:-

“रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून
पानी गये ना ऊबरे, मोती मानस चून।”

हमारे यहाँ वर्षा जल ही मुख्य जल स्त्रोत है, अतः इसका संरक्षण करने हेतु राजस्थान में अनेक झीलों का निर्माण किया गया-राजसमंद, जयसमंद, फतेहसागर, आनासागर, स्वरूप सागर, सांभर, नवलखा, गरदड़ा, बालसमंद, कांकनेय आदि झीलें आज भी जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

ध्यातव्य है कि बाँध बनाकर नदी जल को रोककर उसका उपयोग भी जल संरक्षण का प्रभावी उपाय है इसी क्रम में माही बजाज सागर, सूकड़ी बाँध जसवंतसागर बाँध, रामगढ़ बाँध, बीसलपुर बाँध का निर्माण किया गया जो पेयजल मय सिंचाई सुविधा प्रदान करते हैं, यह प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का ही अग्रगामी रूप है।

राजस्थानी संस्कृति में जल को सहेजना मधुक्खियों के शहद बनाने की प्रक्रिया से सीखा गया है। इस संबंध में प्रचलित “राजस्थानी सींठना इस प्रकार:-

“मौमख्याँ फूला स्यूं रस को कण कण चुग ‘र शहद रो ढेर लगा सकै है, तो के म्हाँ माणस बादले रा बरसते रस ने नी सहेज सका हां।”

विचारणीय पक्ष यह है कि प्राचीन समृद्ध संरक्षण परम्परा को आज भी उतना ही महत्त्व दिया जा रहा है, या नहीं? क्या जल का संरक्षण आज भी हमारी जीवनशैली का हिस्सा है?

इन प्रश्नों पर गौर करें तो, आज की उपभोक्तावादी संस्कृति की होड में, विकास की अंधी दौड़ में, वैश्विक तापन तथा जलवायु परिवर्तन की भीषण समस्या ने इन पारंपरिक पद्धतियों को खण्डित किया हैं। औद्योगिक, नगरीकरण, बढ़ती आबादी, कृषि पर बढ़ता भार, वनों की अधाधुंध कटाई आदि ने जल संरक्षण की आवश्यकता को और अधिक बढ़ा दिया हैं। पश्चिमी राजस्थान में जल को घी से भी ज्यादा मूल्यवान बताकर इसके संरक्षण के प्रयास जारी हैं:-

“घी ढुल्याँ म्हारो कई नी जासी
पानी ढुल्याँ म्हारो जियो जल जाय।”

राजस्थान में वर्तमान में जल को संरक्षित करने की दिशा में व्यक्तिगत, सामूहिक तथा संस्थागत स्तर पर प्रयास जारी हैं। चाहे राजस्थान के ‘वाटर मैन’ ‘राजेन्द्र सिंह’ हो जिन्होंने पूर्वी राजस्थान में जल क्रांति से कायाकल्प किया हो या पश्चिमी राजस्थान में ‘इंदिरा गाँधी नहर’ को लाने का भागीरथी प्रयास जिसने मरूधरा हो हराभरा कर लोगों को जीवनदान दिया हो।

सरकारी प्रयासों के तहत ‘मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान’ हो जिसने पारंपरिक जल स्त्रोतों का पुनरुद्धार कर जल की आपूर्ति सुनिश्चित की है, या ‘जल नीति’ जो जल की प्राथमिकता के साथ जल सरंक्षण को बढ़ावा दे रही है निजी प्रयासों के तहत ‘तरूण भारत संघ एनजीओ हो या ‘जलधारा संस्थान’ सभी जल संरक्षण की दिशा में प्रयासरत है।

सार यह है, कि जल ही वह अमूल्य थाती है, जो हम अपनी अगली पीढ़ी के अस्तित्व के लिए संरक्षित कर प्रकृति का अमूल्य उपहार, जिसे प्रकृति ने हमें दिया है, हम संजीदगी से उसका उपयोग करते हुए इसे समावेशी और सतत् रूप से आगे बढ़ा सकें अथवा मनुष्य का अस्तित्व तो संकट में पड़ेगा ही साथ ही सृष्टि का भी विनाश निश्चित ही है इस दिशा में सकारात्मक, सुनियोजित, समावेशी, सुदीर्घ रणनीति बनाकर जल संसाधनों का सदुपयोग करके ही भावी जीवन की सफलता का आधार तैयार कर सकते है।

अंत में:-

“उद्भव सृष्टि का जल से, जल ही प्रलय घन है पानी बिन सब सून जगत में, यह अनुपम धन है। त्राहि-त्राहि करता फिरता, कितना मूरख मन है।”

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