राजस्थान के विभिन्न शासकों की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ (18वीं शताब्दी तक)

महाराणा कुंभा न केवल बहादुर (हिंदू सुरतान), और युद्ध में निपुण (राजगुरु, हालगुरु, चापगुरु) थे, बल्कि विद्वानों और शिल्पियों के संरक्षक (अभिनवभर्ताचार्य) भी थे।

Maharana Kumbha of Mewar

 राजनीतिक उपलब्धियाँ:

  • उसे हिंदू सुरतान कहा जाता था क्योंकि वह सभी राजपूताना शासकों में सर्वोच्च था।
  • उन्हें छापगुरु (गुरिल्ला युद्ध में विशेषज्ञ) और हालगुरु (पहाड़ी किलों का स्वामी) कहा जाता था।
  • आवल-बावल की संधि (1453) उसकी कूटनीतिक कुशलता को दर्शाती है।
  • दिल्ली के सुल्तान और गुजरात के सुल्तान ने उसे हिंदू सुरतान की उपाधि दी।
  • कवि श्यामलदास के अनुसार उन्होंने मेवाड़ के 84 किलों में से 32 किलों का निर्माण करवाया, अर्थात् सिरोही किला (पश्चिमी सीमा की सुरक्षा), मचान किला (मेर से सुरक्षा)।

सांस्कृतिक उपलब्धियाँ:

  • राणा कुम्भा को ‘राजस्थान वास्तुकला का जनक’ कहा जाता है।
  • कुंभ काल की वास्तुकला में मंदिरों की वास्तुकला का बहुत महत्व है, जैसे कुंभस्वामी और श्रृंगारचौरी मंदिर (चित्तौड़), मीरा मंदिर (एकलिंगजी), रणकपुर मंदिर।
  • एकलिंगमहात्म्य से ज्ञात होता है कि वह वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य में बहुत निपुण थे।
  • संगीतराज, संगीतमीमांसा और सूदप्रबंध उनके द्वारा लिखित संगीत पुस्तकें थीं।
  • उनकी अभिनव भरताचार्य (संगीत कला में निपुण) उपाधि से यह सिद्ध होता है कि वे स्वयं एक महान संगीतकार थे।
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