अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी RAS प्रारंभिक परीक्षा : कक्षा, उपग्रह, इसरो एवं अंतरिक्ष मिशन विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो उपग्रहों, रॉकेटों और उन्नत वैज्ञानिक प्रणालियों के माध्यम से अंतरिक्ष के अन्वेषण और उपयोग से संबंधित है। यह संचार, मौसम पूर्वानुमान, नेविगेशन तथा राष्ट्रीय सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस विषय के अंतर्गत हम निम्नलिखित टॉपिक्स का अध्ययन करेंगे:
- कक्षा (Orbit)
- रॉकेट प्रणोदन (Rocket Propulsion)
- उपग्रह (Satellites)
- अंतरिक्ष वेधशालाएँ (Observatories)
- अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र: अंतरिक्ष स्टेशन, अंतरिक्ष मलबा, नीतियाँ एवं इसरो संस्थान
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अंतरिक्ष से संबंधित कुछ अवधारणा
बिग बैंग सिद्धांत (महाविस्फोट सिद्धांत)
- महाविस्फोट सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड की शुरुआत लगभग 13.8 बिलियन (1380 करोड़) वर्ष पहले हुई थी। प्रारंभ में, संपूर्ण ब्रह्मांड एक अत्यंत गर्म, सघन और सूक्ष्म बिंदु के रूप में था, जिसे एकाकी परमाणु (Singularity) कहा जाता है। यह एक ऐसा बिंदु था जिसका घनत्व और तापमान अनंत थे।
- इसके पश्चात, ब्रह्मांड का तेजी से विस्तार हुआ, जिसे कॉस्मिक इन्फ्लेशन (Cosmological Inflation) या ‘ब्रह्मांडीय स्फीति’ कहा जाता है। इस विस्तार के परिणामस्वरूप पदार्थ, ऊर्जा, आकाशगंगाओं, तारों और ग्रहों का निर्माण हुआ।
- वर्तमान स्थिति: ब्रह्मांड का विस्तार आज भी निरंतर जारी है।
- सिद्धांत के समर्थन में प्रमाण (Evidence): बिग बैंग सिद्धांत को कई वैज्ञानिक प्रमाणों द्वारा पुष्ट किया गया है:
- कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड (CMB) विकिरण: यह ब्रह्मांड में सर्वत्र मौजूद सूक्ष्म तरंग विकिरण है, जिसे महाविस्फोट से बची हुई ‘अवशिष्ट गर्मी’ (Afterglow) माना जाता है।
- हबल का नियम (Hubble’s Law): यह ब्रह्मांड के विस्तार का प्रत्यक्ष अवलोकन संबंधी प्रमाण है। यह बताता है कि आकाशगंगाएँ हमसे दूर जा रही हैं और उनकी गति उनकी दूरी के समानुपाती है।
- हल्के तत्वों की प्रचुरता: ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम जैसे हल्के तत्वों की विशाल मात्रा इस सिद्धांत की पुष्टि करती है, क्योंकि इनकी उत्पत्ति प्रारंभिक ब्रह्मांड के उच्च तापमान में नाभिकीय संलयन द्वारा हुई थी।

डार्क एनर्जी और डार्क मैटर
- ब्रह्मांड का लगभग 95% हिस्सा डार्क मैटर और डार्क एनर्जी से बना है।
- केवल शेष 5% हिस्सा ही फर्मिओनिक (सामान्य) पदार्थ से बना है, जिसमें पृथ्वी, ग्रह, तारे और अन्य दृश्य वस्तुएं शामिल हैं।
| घटक | प्रतिशत |
| डार्क एनर्जी (Dark Energy) | 68% |
| डार्क मैटर (Dark Matter) | 27% |
| सामान्य पदार्थ | 5% |
| कुल | 100% |
डार्क मैटर (Dark Matter – कृष्ण पदार्थ’)
- डार्क मैटर अदृश्य होता है, यह सामान्य पदार्थ के साथ अंतःक्रिया नहीं करता है।
- यह न तो प्रकाश उत्सर्जित करता है और न ही ऊर्जा, इसलिए इसे सीधे तौर पर संसूचित (Detect) नहीं किया जा सकता।
- इसके अस्तित्व का अनुमान आकाशगंगाओं और आकाशगंगा समूहों पर पड़ने वाले इसके गुरुत्वाकर्षण प्रभावों से लगाया जाता है।
डार्क एनर्जी (Dark Energy – ‘अदृश्य ऊर्जा’ या ‘कृष्ण ऊर्जा’)
- डार्क एनर्जी के अस्तित्व का सिद्धांत लगभग 25 वर्ष पहले दिया गया था, जब शोधकर्ताओं ने पाया कि ब्रह्मांड का विस्तार गुरुत्वाकर्षण के कारण धीमा होने के बजाय त्वरित (Accelerating) हो रहा है।
- इस त्वरित विस्तार के पीछे डार्क एनर्जी नामक एक रहस्यमयी ऊर्जा का हाथ माना जाता है।
- डार्क एनर्जी एक प्रतिकर्षी बल (Repulsive force) या ‘प्रति-गुरुत्वाकर्षण’ (Anti-gravity) की तरह कार्य करती है।
- जहाँ गुरुत्वाकर्षण वस्तुओं को आकर्षित करता है, वहीं डार्क एनर्जी वस्तुओं को एक-दूसरे से दूर धकेलती है (उनके बीच के स्थान को बढ़ाती है)।
- इसका प्रभाव विस्तारवादी (Expansionary) होता है।
- ब्रह्मांड का निरंतर बढ़ता विस्तार यह दर्शाता है कि डार्क एनर्जी, डार्क मैटर की तुलना में कहीं अधिक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
अंतरिक्ष के पीछे का विज्ञान
मानव आदिकाल से ही अंतरिक्ष और उसके रहस्यों के प्रति आकर्षित रहा है। सर आइजैक न्यूटन ने गति के नियमों का प्रतिपादन किया, जिन्होंने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का आधार तैयार किया। बाद में, अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत (Theory of Relativity) ने इन अध्ययनों को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया।
न्यूटन के गति के नियम (Newton’s Laws of Motion)
- न्यूटन का प्रथम नियम (जड़त्व का नियम – Law of Inertia): प्रत्येक वस्तु अपनी विरामावस्था या सरल रेखा में एकसमान गति की अवस्था में तब तक बनी रहती है, जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल आरोपित न किया जाए।
- न्यूटन का द्वितीय नियम (त्वरण का नियम – Law of Acceleration): किसी वस्तु के संवेग परिवर्तन की दर (Rate of change of momentum) उस पर लगाए गए बल के समानुपाती होती है और यह परिवर्तन उसी दिशा में होता है जिसमें बल लगाया गया है।
गणितीय रूप में: F = m × a.
- न्यूटन का तृतीय नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम): प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। यह नियम प्रणोदन (Propulsion) जैसे रॉकेट का उड़ना, बंदूक का पीछे हटना (Recoil) आदि की व्याख्या करता है।
- रॉकेट इंजन की कार्यप्रणाली न्यूटन के गति के तीसरे नियम पर ही आधारित होती है।
केप्लर के नियम (Kepler’s Laws)
ग्रहों की गति को समझने के लिए केप्लर के नियम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
- केप्लर का प्रथम नियम (कक्षाओं का नियम): सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं और सूर्य इस दीर्घवृत्त के एक फोकस (Focus) पर स्थित होता है।
- केप्लर का द्वितीय नियम (क्षेत्रीय वेग का नियम): सूर्य और ग्रह को मिलाने वाली रेखा समान समय अंतराल में समान क्षेत्रफल (Area) तय करती है।
- सरल शब्दों में, जब ग्रह सूर्य के निकट होता है तो उसकी गति बढ़ जाती है और जब वह सूर्य से दूर होता है तो उसकी गति कम हो जाती है।
- केप्लर का तृतीय नियम (आवर्तकाल का नियम): किसी ग्रह के परिक्रमण काल (Orbital Period) का वर्ग उसकी कक्षा के अर्ध-दीर्घ अक्ष (Semi-major axis) के घन के समानुपाती होता है।
गणितीय रूप में: T2 ∝ r3.


आइंस्टीन का सापेक्षता का सामान्य सिद्धांत (General Theory of Relativity)
- इसका प्रतिपादन अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा वर्ष 1915 में किया गया था।
- सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत के अनुसार, गुरुत्वाकर्षण कोई ‘बल’ नहीं है (जैसा कि न्यूटन ने कहा था), बल्कि यह द्रव्यमान और ऊर्जा के कारण दिक्-काल (Space-time) में उत्पन्न होने वाली वक्रता (Curvature) है। ग्रह, तारे और प्रकाश जैसे पिंड वक्र पथों का अनुसरण इसलिए करते हैं क्योंकि भारी पिंडों के चारों ओर स्वयं ‘दिक्-काल’ मुड़ा हुआ होता है।
- मुख्य सिद्धांत
- स्पेस-टाइम फैब्रिक: ब्रह्मांड अंतरिक्ष और समय का एक चतुर्विमीय सांतत्यक (Continuum) है।
- वक्रता के रूप में गुरुत्वाकर्षण: तारे और ग्रह जैसे विशाल पिंड दिक्-काल को झुका देते हैं, और यही वक्रता अन्य पिंडों की गति को निर्देशित करती है।
- तुल्यता का सिद्धांत: गुरुत्वाकर्षण और त्वरण के प्रभाव अविभेद्य होते हैं (जैसे कि एक रॉकेट के अंदर होना और पृथ्वी पर खड़े होने के अनुभव में अंतर नहीं किया जा सकता)।
- मुख्य भविष्यवाणियाँ और पुष्टि
- गुरुत्वीय लेंसिंग (Gravitational Lensing): प्रकाश जब विशाल पिंडों के पास से गुजरता है, तो वह मुड़ जाता है।
- समय विस्तारण (Time Dilation): तीव्र गुरुत्वाकर्षण क्षेत्रों में घड़ियाँ धीमी चलती हैं (इसका परीक्षण परमाणु घड़ियों के साथ किया गया है)।
- गुरुत्वीय तरंगें (Gravitational Waves): ये दिक्-काल में उत्पन्न होने वाली विक्षोभ या लहरें (Ripples) हैं।
गुरुत्वीय लेंसिंग (Gravitational Lensing)
- गुरुत्वीय लेंसिंग एक ऐसी परिघटना है जिसमें किसी दूरस्थ खगोलीय पिंड से आने वाला प्रकाश, प्रेक्षक और उस प्रकाश स्रोत के बीच स्थित किसी विशाल पिंड (जैसे आकाशगंगा, तारा या कृष्ण विवर/ब्लैक होल) के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के कारण मुड़ जाता है। (इसकी पुष्टि वर्ष 1919 के सूर्य ग्रहण के दौरान की गई थी)।
- इसकी भविष्यवाणी आइंस्टीन के ‘सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत’ द्वारा की गई थी – द्रव्यमान दिक्-काल (Space-time) को वक्रित कर देता है, और प्रकाश इसी वक्रता का अनुसरण करता है।
- प्राकृतिक लेंस: यह एक ‘प्राकृतिक ब्रह्मांडीय लेंस’ की तरह कार्य करता है, जो दूर स्थित आकाशगंगाओं को आवर्धित (Magnify) या विरूपित (Distort) करके दिखाता है।
- यह दुर्लभ घटना तभी घटित होती है जब तारा, ब्लैक होल (या कोई अन्य विशाल पिंड) और पृथ्वी पर स्थित प्रेक्षक एक सीधी रेखा में संरेखित होते हैं।

गुरुत्वीय लेंसिंग के प्रकार (Types)
- प्रबल लेंसिंग (Strong Lensing): इसमें प्रकाश इतना अधिक मुड़ता है कि एक ही पिंड के कई प्रतिबिंब, चाप या ‘आइंस्टीन रिंग’ (Einstein Rings) दिखाई देते हैं।
- दुर्बल लेंसिंग (Weak Lensing): इसमें आकाशगंगाओं के आकार में सूक्ष्म विरूपण होता है। इसका उपयोग डार्क मैटर (कृष्ण पदार्थ) के अध्ययन में किया जाता है।
- माइ्रोलेंसिंग (Microlensing): जब किसी तारे या ग्रह के कारण प्रकाश की चमक में परिवर्तन होता है। इसका उपयोग एक्सोप्लैनेट्स (बाह्यग्रहों) की खोज के लिए किया जाता है।
महत्व
- यह डार्क मैटर, बाह्य ग्रहों और अत्यंत दूर स्थित आकाशगंगाओं का पता लगाने में सहायक है।
- यह उन खगोलीय पिंडों के अध्ययन की अनुमति देता है जो सीधे देखने के लिए बहुत धुंधले या बहुत दूर हैं।
गुरुत्वीय तरंगें (Gravitational Waves)
- गुरुत्वीय तरंगें दिक्-काल (Space-time) में उत्पन्न होने वाली लहरें या विक्षोभ (Ripples) हैं। जिस प्रकार पानी में पत्थर फेंकने पर लहरें उत्पन्न होती हैं, ठीक उसी प्रकार जब विशाल ब्रह्मांडीय पिंड (जैसे ब्लैक होल या न्यूट्रॉन तारे) त्वरित होते हैं या आपस में टकराते हैं, तो ये तरंगें उत्पन्न होती हैं।
- ये तरंगें प्रकाश की गति से गमन करती हैं।
- अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1916 में अपने ‘सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत’ के माध्यम से इनके अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी।
- प्रथम संसूचन: वर्ष 2015 में लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO) के वैज्ञानिकों ने पहली बार प्रत्यक्ष रूप से इन तरंगों का पता लगाया।
लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO)
- इसमें 4 किलोमीटर लंबी दो निर्वात नलिकाएं होती हैं, जो एक-दूसरे के लंबवत स्थित होती हैं।
- इन निर्वात नलिकाओं के सिरों पर अत्यधिक परावर्तक दर्पण (Mirrors) लगे होते हैं।
LIGO का महत्व
- प्रत्यक्ष मापन: यह गुरुत्वीय तरंगों के गुणों का अध्ययन करने के लिए उनका प्रत्यक्ष मापन प्रदान करता है।
- ब्रह्मांडीय घटनाओं का अवलोकन: यह वैज्ञानिकों को ब्लैक होल और न्यूट्रॉन तारों के विलय जैसी घटनाओं का अध्ययन करने में सक्षम बनाता है।
- मौलिक भौतिकी की समझ: यह प्रारंभिक ब्रह्मांड के बारे में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है और मौलिक भौतिकी की हमारी समझ को उन्नत करता है।
लीगो इंडिया परियोजना (IndIGO)
- भारत सरकार ने देश में एक गुरुत्वीय-तरंग संसूचक परियोजना को मंजूरी दी है, जिसकी अनुमानित लागत 2,600 करोड़ रुपये है। इसके 2030 तक बनकर तैयार होने की संभावना है।
- स्थान: हिंगोली जिला, महाराष्ट्र।
- यह दुनिया में अपनी तरह की तीसरी वेधशाला होगी।
- यह अमेरिका के लुइसियाना और वाशिंगटन में स्थित ‘ट्विन लीगो’ के सटीक विनिर्देशों पर आधारित होगी।
- जापान के काग्रा (KAGRA) में चौथे संसूचक पर कार्य चल रहा है।
- वित्तपोषण: यह परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा वित्तपोषित है।
- सहयोग: यह भारतीय अनुसंधान संस्थानों के एक संघ और अमेरिका की लीगो लेबोरेटरी के बीच एक सहयोगात्मक परियोजना है।
लेजर इंटरफेरोमीटर स्पेस एंटीना (LISA)
- LISA एक अंतरिक्ष-आधारित गुरुत्वीय तरंग वेधशाला है, जो LISA पाथफाइंडर की सफलता पर आधारित है।
- यह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के नेतृत्व में एक मिशन है, जिसमें NASA और वैज्ञानिकों का एक अंतरराष्ट्रीय संघ सहयोग कर रहा है।
- eLISA: ‘इवॉल्व्ड लेजर इंटरफेरोमीटर स्पेस एंटीना’ (eLISA) भी एक मिशन है जिसका उद्देश्य पहली बार अंतरिक्ष से गुरुत्वीय ब्रह्मांड की खोज करना है।
- इसमें एक “मदर” (मुख्य) और दो “डॉटर” (सहायक) अंतरिक्ष यान शामिल हैं।
- ये तीन अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में एक समबाहु त्रिभुज के आकार में एक साथ उड़ान भरते हैं।
जियोटेल (Geotail – भू-पुच्छ)
- जियोटेल अंतरिक्ष में स्थित वह क्षेत्र है, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों की निरंतर धारा, जिसे सौर पवन कहा जाता है, के बीच होने वाली अंतःक्रिया से बनता है।
- पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र एक अवरोध के रूप में कार्य करता है, जो सौर पवन के प्लाज्मा को विक्षेपित (Deflecting) कर देता है।
- इस अंतःक्रिया के कारण पृथ्वी के चारों ओर एक चुंबकीय आवरण बन जाता है। यह आवरण सूर्य की ओर वाले हिस्से पर संपीडित होता है, जबकि दूसरी ओर (सूर्य की विपरीत दिशा में) एक लंबी पूंछ के रूप में विस्तारित हो जाता है।
- इसी विस्तारित संरचना को ‘जियोटेल’ (Geotail) कहा जाता है, जो चंद्रमा की कक्षा से भी आगे तक फैली होती है।

भू-चुंबकीय तूफान (Geomagnetic Storms)
- पृथ्वी के चुंबकीय मंडल (Magnetosphere) में होने वाले वे विक्षोभ (Disturbances), जो अत्यधिक ऊर्जावान सौर कणों के कारण उत्पन्न होते हैं, भू-चुंबकीय तूफान कहलाते हैं।
- र्गीकरण: इन तूफानों की तीव्रता के आधार पर इन्हें G1 (लघु) से लेकर G5 (चरम/अत्यंत तीव्र) श्रेणियों में विभाजित किया गया है।
- ये तूफान आमतौर पर सौर विस्फोटों से जुड़े होते हैं:
- कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs):
- ये प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों के विशाल विस्फोट होते हैं।
- इनकी उत्पत्ति सौर कलंक (Sunspot) क्षेत्रों से होती है।
- इन्हें पृथ्वी तक पहुँचने में 1 से 3 दिन का समय लगता है।
- सौर ज्वालाएँ (Solar Flares):
- यह विद्युत चुंबकीय विकिरण का अचानक होने वाला उत्सर्जन है।
- सबसे तीव्र ज्वालाएँ प्रकाश की गति से यात्रा करती हैं और मात्र 8 मिनट में पृथ्वी तक पहुँच सकती हैं।
- इनकी अवधि कुछ मिनटों से लेकर कई घंटों तक हो सकती है।
- कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs):
तीव्र भू-चुंबकीय तूफानों के संभावित प्रभाव
- जीपीएस और नेविगेशन विफलता: उपग्रह संकेतों में व्यवधान के कारण दिशा-सूचक प्रणालियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
- पावर ग्रिड अस्थिरता: विद्युत ग्रिडों में अत्यधिक वोल्टेज उत्पन्न होने से ग्रिड का ठप होना या ट्रांसफार्मर का जलना संभव है।
- संचार में व्यवधान: उच्च-आवृत्ति वाले रेडियो संचार और उपग्रह संचार में बाधा उत्पन्न होती है।
कक्षा (Orbit)
कक्षा वह वक्र पथ (Curved path) है, जिस पर कोई वस्तु (जैसे ग्रह, चंद्रमा, उपग्रह या अंतरिक्ष यान) गुरुत्वाकर्षण बल के कारण किसी अन्य पिंड के चारों ओर चक्कर लगाती है। उदाहरण के लिए, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक कक्षा का अनुसरण करती है, और चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है।
किसी वस्तु की कक्षा दो बलों के संतुलन का परिणाम होती है:
- गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force): यह वह बल है जो वस्तु को केंद्रीय पिंड (जैसे सूर्य या पृथ्वी) की ओर खींचता है। वृत्तीय गति में यह अभिकेंद्र बल (Centripetal Force) के रूप में कार्य करता है।
- जड़त्व (Inertia): यह वस्तु की वह प्रवृत्ति है जिसके कारण वह एक सीधी रेखा में स्थिर गति से चलने का प्रयास करती है। परिक्रमा कर रहे निर्देश तंत्र में इसे अपकेंद्र बल (Centrifugal Force) के रूप में महसूस किया जाता है, जो एक आभासी बल है।
कक्षा के प्रकार (Types of Orbit)

ऊंचाई के आधार पर कक्षाओं के प्रकार (Types of Orbit based on Altitude)
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कक्षा का नाम |
ऊंचाई (किमी) |
कक्षीय अवधि |
अनुप्रयोग (Applications) |
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निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) |
160 – 2,000 किमी |
90 से 120 मिनट |
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मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO) |
2,000 – 35,786 किमी |
2 से 12 घंटे |
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उच्च पृथ्वी कक्षा (HEO) |
> 35,786 किमी या 22,236 मील |
> 24 घंटे (कक्षा की ऊंचाई और आकार के आधार पर) |
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विशेष स्थितियाँ (Special Cases)
भू-तुल्यकालिक कक्षा (Geo-Synchronous Orbit – GSO)
- यह एक उच्च पृथ्वी कक्षा है जहाँ उपग्रह पृथ्वी पर एक निश्चित बिंदु के ऊपर स्थिर प्रतीत होता है।
- परिक्रमण काल: यह पृथ्वी के घूर्णन काल (23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड) के बराबर होता है, जिससे उपग्रह प्रति दिन एक चक्कर पूरा करता है।
- ऊंचाई: पृथ्वी से लगभग 35,786 किमी ऊपर।
- झुकाव: यह कक्षा झुकी हुई हो सकती है (यह आवश्यक नहीं है कि यह भूमध्य रेखा के ऊपर ही हो)।
- अनुप्रयोग: मौसम की निगरानी, संचार और नौवहन। उदाहरण: भारत की INSAT और GSAT श्रृंखला के उपग्रह।
भू-स्थैतिक कक्षा (Geostationary Orbit – GEO)
- यह भू-तुल्यकालिक कक्षा की एक विशेष स्थिति है। इसमें उपग्रह सीधे पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ऊपर (0° झुकाव) परिक्रमा करता है और पृथ्वी की सतह पर एक विशिष्ट बिंदु के सापेक्ष स्थिर दिखाई देता है।
- प्रमुख अनुप्रयोग
- संचार: टीवी, रेडियो और इंटरनेट का प्रसारण, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ स्थलीय नेटवर्क उपलब्ध नहीं हैं।
- मौसम विज्ञान: वास्तविक समय में मौसम की निगरानी। उदाहरण: INSAT (भारत), GOES (अमेरिका), Himawari (जापान) और Meteosat (यूरोप)।
- नौवहन: यह वैश्विक नेविगेशन उपग्रह प्रणालियों (GNSS) की सटीकता को बढ़ाता है।
- वैज्ञानिक अनुसंधान: पृथ्वी अवलोकन और गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए डेटा रिले का समर्थन करना।
विशेष नोट: सभी भू-स्थैतिक कक्षाएँ भू-तुल्यकालिक होती हैं, लेकिन सभी भू-तुल्यकालिक कक्षाएँ भू-स्थैतिक नहीं होतीं।


ध्रुवीय कक्षा (Polar Orbit)
- यह एक निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) है जो पृथ्वी के ध्रुवों के ऊपर या उनके पास से गुजरती है और एक निश्चित समय अवधि में पृथ्वी की संपूर्ण सतह को कवर करती है।
- ऊंचाई (Altitude): 200 – 1,000 किमी।
- अनुप्रयोग: पृथ्वी अवलोकन, सुदूर संवेदन (जैसे इसरो की कार्टोसैट श्रृंखला), और दूरसंचार (जैसे इरिडियम उपग्रह समूह वैश्विक संचार के लिए ध्रुवीय कक्षाओं का उपयोग करता है)।
सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा (Sun-Synchronous Orbit – SSO)
- यह एक विशेष प्रकार की ध्रुवीय कक्षा है जिसमें उपग्रह पृथ्वी के एक ही बिंदु से हर दिन एक ही स्थानीय समय (Local Time) पर गुजरता है।
- ऊंचाई (Altitude): 600 – 800 किमी।
- अनुप्रयोग: जलवायु परिवर्तन का अध्ययन, मौसम पूर्वानुमान और संसाधन प्रबंधन। उदाहरण: इसरो की कार्टोसैट श्रृंखला, ओशनसैट श्रृंखला, और सरल (SARAL) उपग्रह।

स्थानांतरण कक्षा (Transfer Orbits)
- ये विशेष मध्यवर्ती (Intermediate) कक्षाएँ हैं जिनका उपयोग न्यूनतम ऊर्जा का उपयोग करके उपग्रह या अंतरिक्ष यान को एक कक्षा से दूसरी कक्षा में ले जाने के लिए किया जाता है। यह अंतर्निर्मित मोटरों का उपयोग करके उत्केन्द्रता (Eccentricity) को समायोजित करने और वांछित कक्षा प्राप्त करने के लिए ईंधन बचाता है। उदाहरण: GTO
- भू-स्थैतिक स्थानांतरण कक्षा (Geostationary Transfer Orbit – GTO):
- यह उपग्रहों को LEO या MEO से भू-स्थैतिक कक्षा (GEO) में ले जाने के लिए उपयोग की जाने वाली एक सामान्य स्थानांतरण कक्षा है।
- उदाहरण: एरियन 5 या फाल्कन 9 द्वारा लॉन्च किए गए संचार उपग्रह, और इसरो का GSAT-31।
- होहमान स्थानांतरण कक्षा (Hohmann Transfer Orbit):
- यह दो वृत्ताकार कक्षाओं के बीच अंतरिक्ष यान को स्थानांतरित करने के लिए उपयोग की जाने वाली एक अत्यधिक कुशल दीर्घवृत्ताकार (Elliptical)कक्षा है।
- इसका उपयोग आमतौर पर अंतर-ग्रह यात्रा (Interplanetary travel) या न्यूनतम ईंधन खपत के साथ विभिन्न कक्षीय ऊंचाइयों तक पहुँचने के लिए किया जाता है।

लैग्रेंज बिंदु कक्षाएं (Lagrange Point Orbits)
- लैग्रेंज बिंदु (जिन्हें मुक्ति बिंदु या लिबरेशन पॉइंट्स भी कहा जाता है) अंतरिक्ष में वे विशिष्ट क्षेत्र हैं जहाँ दो खगोलीय पिंडों (जैसे सूर्य और पृथ्वी) के गुरुत्वाकर्षण बल एक स्थिर संतुलन की स्थिति उत्पन्न करते हैं। यहाँ दो बड़े पिंडों का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव आवश्यक अभिकेंद्र बल (Centripetal Force) के बराबर होता है।
- यह किसी वस्तु को उनके सापेक्ष एक निश्चित स्थिति में बने रहने की अनुमति देता है।
- कुल: 5 पॉइंट्स → L1, L2, L3 (अस्थिर); L4, L5 (स्थिर)।
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लैग्रेंज बिंदु |
व्याख्या |
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L1 बिंदु |
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L2 बिंदु |
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L3 बिंदु |
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L4 & L5 बिंदु |
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हेलो कक्षा (Halo Orbit)
- हेलो कक्षा एक विशेष प्रकार की कक्षा है जो लैग्रेंज बिंदुओं के चारों ओर, विशेष रूप से L1, L2 और L3 जैसे अस्थिर बिंदुओं के पास होती है।
- इसमें अंतरिक्ष यान लैग्रेंज बिंदु पर स्थिर रहने के बजाय, उसके चारों ओर एक त्रिविमीय (3D), लूप जैसे पथ में गति करता है।
- अनुप्रयोग: अंतरिक्ष अवलोकन (जैसे: जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप, आदित्य L-1)।
सूर्य-केंद्री कक्षा (Heliocentric Orbits)
- वे उपग्रह जो पृथ्वी के बजाय सूर्य की परिक्रमा करते हैं, उन्हें सूर्य-केंद्री कक्षा में माना जाता है।
- उदाहरण: पार्कर सोलर प्रोब।

कक्षाओं से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण शब्द
- कक्षीय क्षय (Orbital Decay): निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में स्थित उपग्रहों को वायुमंडलीय कर्षण (Atmospheric Drag) या घर्षण का सामना करना पड़ता है। इसके कारण वे धीरे-धीरे अपनी ऊंचाई खोने लगते हैं और अंततः पृथ्वी के वायुमंडल में पुन: प्रवेश (Reentry) करते समय जलकर नष्ट हो जाते हैं।
- कर्मन रेखा (Kármán Line)
- यह एक काल्पनिक रेखा है जो बाहरी अंतरिक्ष की शुरुआत को चिह्नित करती है। सामान्यतः इसे समुद्र तल से 100 किलोमीटर (62 मील) की ऊंचाई पर परिभाषित किया गया है।
- यह पृथ्वी के वायुमंडल और बाहरी अंतरिक्ष (Outer Space) के बीच की सीमा मानी जाती है।
- इसका नाम हंगेरियन-अमेरिकी एयरोस्पेस इंजीनियर थियोडोर वॉन कर्मन के नाम पर रखा गया है।
