रॉकेट प्रणोदन (Rocket Propulsion)

रॉकेट प्रणोदन विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो रॉकेट को गति प्रदान करने तथा उसे अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने की प्रक्रिया से संबंधित है। इसमें ईंधन के दहन से उत्पन्न गैसों के निष्कासन द्वारा थ्रस्ट (बल) उत्पन्न किया जाता है, जिससे रॉकेट पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को पार करने में सक्षम होता है। इस विषय के अंतर्गत हम रॉकेट प्रणोदन के विभिन्न प्रकारों, उनकी कार्यप्रणाली तथा अंतरिक्ष अभियानों में उनके उपयोग का अध्ययन करेंगे।

  • कार्यकारी सिद्धांत: रॉकेट इंजन की कार्यप्रणाली न्यूटन के गति के तृतीय नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम) पर आधारित है। इस नियम के अनुसार, प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
  • प्रक्रिया:
    • रॉकेट के नोजल (Nozzle) से अत्यधिक वेग के साथ निकलने वाली गैसों का द्रव्यमान एक ‘क्रिया’ (Action) उत्पन्न करता है।
    • यही गैसें रॉकेट पर विपरीत दिशा में एक धक्का लगाती हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में प्रणोद (Thrust) कहा जाता है।
    • इसी प्रणोद के कारण रॉकेट ऊपर की ओर तीव्र गति से उड़ान भरता है।

इसरो के प्रक्षेपण यान

प्रक्षेपण यान

विवरण / विनिर्देश

ध्वनि रॉकेट

  • आयातित एम-100 (रूस) और सेंटॉर (Centaure) (फ्रांस)
  • रोहिणी (स्वदेशी)
    • पेलोड – 100 किलोग्राम 470 किमी तक।

SLV (उपग्रह प्रक्षेपण यान )

  • SLV-3: भारत का प्रथम प्रायोगिक उपग्रह प्रक्षेपण यान।
  • यह पूरी तरह से ठोस ईंधन पर आधारित चार चरणों वाला यान था।
  • पेलोड – निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 40 किलोग्राम।

ASLV (संवर्धित SLV) 1992

  • पांच चरणों वाला, पूर्णतः ठोस ईंधन आधारित यान।
  • पेलोड: 150 किलोग्राम वर्ग के उपग्रहों को 400 किमी की वृत्ताकार कक्षाओं में स्थापित करने हेतु।

PSLV (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान)
1994

  • भारत का तीसरी पीढ़ी का प्रक्षेपण यान।
  • तरल चरणों से सुसज्जित होने वाला पहला भारतीय प्रक्षेपण यान।
  • 4 चरण
    • पहला और तीसरा चरण: ठोस रॉकेट मोटर (Solid)।
    • दूसरा और चौथा चरण: तरल प्रणोदन प्रणाली (विकास इंजन – Vikas Engine)।
  • पेलोड
    • ध्रुवीय कक्षा: 1750 किलोग्राम।
    • सब-GTO (उप-भू-तुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा): 1425 किलोग्राम।
  • इसे ‘इसरो का वर्कहॉर्स’ (Workhorse of ISRO) कहा जाता है।
  • LEO में सुदूर संवेदन उपग्रह प्रक्षेपण हेतु उपयोग।
  • महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ
    • चंद्रयान-1: 2008 में सफल प्रक्षेपण।
    • मंगलयान (MOM): 2013 में (भारत का पहला अंतरग्रहीय मिशन)।
    • विश्व रिकॉर्ड: 2017 में एक साथ 104 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण।
  • POEM (PSLV कक्षीय प्रायोगिक मॉड्यूल)
    • यह PSLV के चौथे चरण (PS4) के दौरान अंतरिक्ष में प्रयोग करने की अनुमति देता है।

GSLV Mk-II (भू-तुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान)
1991 

  • 3 चरण
    • प्रथम चरण: ठोस (Solid)।
    • द्वितीय चरण: तरल (Liquid) – विकास इंजन
    • तृतीय चरण: क्रायोजेनिक अपर स्टेज (CUS) – इसमें CE-7.5 इंजन का उपयोग होता है।
  • उद्देश्य: संचार उपग्रहों को भू-स्थैतिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में प्रक्षेपित करना।
  • पेलोड
    • LEO (निम्न पृथ्वी कक्षा): 6,000 किलोग्राम।
    • GTO (भू-स्थैतिक स्थानांतरण कक्षा): 2,250 किलोग्राम।

GSLV Mk-III (LVM3)

  • भारत का चौथी पीढ़ी का प्रक्षेपण यान।
  • फैट बॉय 
  • संरचना (3 चरण)
    • दो ठोस स्ट्रैप-ऑन मोटर्स (S200): इसमें HTPB (हाइड्रॉक्सिल-टर्मिनेटेड पॉलीब्यूटाडीन) ईंधन का उपयोग होता है।
    • एक तरल कोर चरण (L110): इसमें UDMH और नाइट्रोजन टेट्रोक्साइड का उपयोग होता है।
    • उच्च प्रणोद क्रायोजेनिक अपर स्टेज (C25): यह स्वदेशी CE-20 इंजन द्वारा संचालित है (तरल ऑक्सीजन और तरल हाइड्रोजन)।
  • पेलोड क्षमता
    • जीटीओ – 4000 किलोग्राम
    • LEO – 8000-10000 किग्रा
  • इसे भारत के गगनयान मिशन के लिए प्रक्षेपण यान (HLVM3) के रूप में चुना गया है।

RLV-TD (पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान – प्रौद्योगिकी प्रदर्शक) 2016

  • यह पूर्णतः पुन: प्रयोज्य (Fully Reusable) प्रक्षेपण यान के लिए एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शक है।
  • नया नाम: पुष्पक (Pushpak हाल ही में RLV LEX-02 मिशन के तहत)।
  • महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियाँ – स्वायत्त नेविगेशन, पुनः प्रवेश मिशन प्रबंधन।

लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV)

  • प्रकार: तीन-चरणीय प्रक्षेपण यान।
  • पेलोड क्षमता: मिनी, माइक्रो और नैनो सैटेलाइट्स (10 से 500 किलोग्राम तक) → 500 किमी तक की LEO कक्षा में प्रक्षेपण।
  • लागत: SSLV की लागत PSLV की तुलना में 1/10वां
  • इसे प्रक्षेपण के लिए केवल 72 घंटे की आवश्यकता होगी, जबकि PSLV के लिए 45 दिन लगते हैं।
  • विशेषताएँ: एकाधिक उपग्रहों को समायोजित करने की क्षमता, मांग पर प्रक्षेपण (लॉन्च ऑन डिमांड) की व्यवहार्यता, न्यूनतम प्रक्षेपण अवसंरचना आवश्यकताएँ।
  • PSLV और GSLV के विपरीत, SSLV को लंबवत और क्षैतिज दोनों तरह से असेंबल किया जा सकता है।
  • उपनाम: बेबी रॉकेट
  • कुलसेकरपट्टिनम स्पेसपोर्ट: कुलसेकरपट्टिनम, थूथुकुडी जिला, तमिलनाडु में SSLV के लिए भारत का नया स्पेसपोर्ट।

नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) 

  • भारत का आगामी हेवी-लिफ्ट, पुनः उपयोग योग्य, मॉड्यूलर प्रक्षेपण यान।
  • उद्देश्य: LVM3 को प्रतिस्थापित या पूरक करना।
  • मुख्य विशेषताएँ:
    • पेलोड क्षमता: निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 30 टन तक – LVM3 की तुलना में 3 गुना अधिक क्षमता।
    • लागत दक्षता: LVM3 की लागत का 1.5 गुना → लेकिन पुनः उपयोगिता के कारण दीर्घकालिक लागत कम।
    • प्रणोदन प्रणाली: अर्ध-क्रायोजेनिक बूस्टर (परिष्कृत केरोसिन ईंधन के रूप में + तरल ऑक्सीजन ऑक्सीकारक के रूप में)।
    • हरित तकनीक: मॉड्यूलर और पर्यावरण-अनुकूल प्रणोदन प्रणाली।
  • प्रमुख अनुप्रयोग:
    • मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन (जैसे: गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन)
    • चंद्र और अंतरग्रहीय मिशन
    • संचार और पृथ्वी अवलोकन (EO) के लिए बड़े उपग्रह समूह
    • 2040 तक चंद्रमा पर भारतीय मानव मिशन को सक्षम बनाना।

लूनर मॉड्यूल लॉन्च व्हीकल (LMLV) (2035 तक तैयार होने की संभावना)

  • यह इसरो का अगली पीढ़ी का सबसे शक्तिशाली भारी-भरकम प्रक्षेपण यान है (NGLV का ही एक उन्नत संस्करण)।
  • पेलोड क्षमता:
    • चंद्रमा: लगभग 27 टन
    • LEO (200–2000 किमी): लगभग 80 टन
  • प्रणोदन: उन्नत क्रायोजेनिक और सेमी-क्रायोजेनिक इंजनों का उपयोग
  • चरण: तीन-चरणीय रॉकेट
    • प्रथम और द्वितीय चरण: इनमें तरल प्रणोदक का उपयोग होगा।
    • तृतीय चरण: इसमें क्रायोजेनिक प्रणोदक का उपयोग होगा।

PSLV के महत्वपूर्ण मिशन

मिशन कोड

मिशन का नाम / विवरण

मुख्य बिंदु

PSLV-C11

चंद्रयान-1 (अक्टूबर 2008)

  • भारत का प्रथम चंद्र मिशन; चंद्रमा पर जल के अणुओं की खोज की।

PSLV-C25

मंगलयान (MOM) (नवंबर 2013)

  • भारत का प्रथम अंतर-ग्रहीय मिशन; प्रथम प्रयास में मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश।

PSLV-C30

एस्ट्रोसैट (AstroSat)

  • भारत की पहली बहु-तरंग दैर्ध्य (Multi-wavelength) अंतरिक्ष वेधशाला।

PSLV-C37

विश्व रिकॉर्ड (फरवरी 2017)

  • एक ही मिशन में 104 उपग्रहों (कार्टोसैट-2D सहित) को प्रक्षेपित कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।

PSLV-C45

EMISAT + 28 उपग्रह (2019)

  • एक ही प्रक्षेपण में तीन अलग-अलग कक्षाओं में उपग्रह स्थापित करने वाला पहला मिशन।

PSLV-C48

PSLV 50वीं उड़ान (दिसंबर 2019)

  • PSLV की 50वीं ऐतिहासिक उड़ान; RISAT-2BR1 और NSIL के लिए 9 ग्राहकों के उपग्रह लॉन्च किए।

PSLV-C51

प्रथम वाणिज्यिक प्रक्षेपण (2021)

  • NSIL द्वारा संचालित पहला पूर्णतः वाणिज्यिक मिशन; ब्राजील के ‘अमेजोनिया-1’ सहित 18 अन्य उपग्रह लॉन्च किए।

PSLV-C54

EOS-06 (नवंबर 2022)

  • मुख्य पेलोड EOS-06 (समुद्र विज्ञान); कक्षाओं को समायोजित करने के लिए ‘ऑर्बिट चेंज थ्रस्टर्स’ (OCTs) का उपयोग किया।

PSLV-C55

TeLEOS-2 और Lumelite-4 (अप्रैल 2023)

  • इसमें POEM (PSLV कक्षीय प्रायोगिक मॉड्यूल) का उपयोग इन-ऑर्बिट प्रयोगों के लिए किया गया।

PSLV-C57

आदित्य-L1 (सितंबर 2023)

  • भारत की पहली सौर वेधशाला; यह 6 जनवरी 2024 को लैग्रेंज बिंदु L1 पर पहुँची।

PSLV-C58

XPoSat (जनवरी 2024)

  • ब्रह्मांडीय एक्स-रे स्रोतों के अध्ययन के लिए भारत का पहला समर्पित एक्स-रे पोलारिमीटर उपग्रह

PSLV-C59

Proba-3 (दिसंबर 2024)

  • ESA का मिशन; सूर्य के कोरोना के अध्ययन के लिए दो उपग्रहों का ‘फॉर्मेशन फ्लाइंग’ प्रयोग।

PSLV-C60

SpaDeX (दिसंबर 2024)

  • अंतरिक्ष में स्वायत्त मिलन (Rendezvous), डॉकिंग और अन-डॉकिंग के लिए ‘ट्विन सैटेलाइट’ तकनीक प्रदर्शक।

PSLV-C61

EOS-09

  • मिशन विफल रहा।

PSLV-C62

EOS-N1/अन्वेषा (जनवरी 2026)

  • यह अगली पीढ़ी का पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (Earth Observation Satellite) था।
  • मुख्य पेलोड: यह DRDO के लिए विकसित एक हाइपरस्पेक्ट्रल (Hyperspectral) उपग्रह था, जिसका मुख्य उद्देश्य सीमा निगरानी और छद्म आवरण वाले लक्ष्यों का पता लगाना था।
  • परिणाम: इस मिशन में 18 सह-यात्री उपग्रह भी शामिल थे, किंतु यह मिशन विफल रहा।

PSLV-C63

TDS-01 (2026 – आगामी)

  • यह एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शक उपग्रह मिशन है।
  • प्रदर्शित की जाने वाली तकनीकें: उच्च प्रणोद विद्युत प्रणोदन, स्वदेशी TWT एम्पलीफायर, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD)

PSLV N1

EOS-10 (आगामी – मार्च 2026)

  • PSLV-N1: यह HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) और L&T (लार्सन एंड टुब्रो) के उद्योग संघ (Consortium) द्वारा निर्मित पहला PSLV रॉकेट है।
  • मुख्य पेलोड (EOS-10): यह एक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है जिसे समुद्र विज्ञान और मौसम संबंधी अध्ययनों के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह उपग्रह EOS-06 के साथ मिलकर (Tandem) कार्य करेगा।
  • सह-यात्री उपग्रह
    • IMJS: भारत-मॉरीशस संयुक्त उपग्रह (Indo-Mauritius Joint Satellite)।
    • Leap-2: भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग (NGE) द्वारा विकसित उपग्रह।

GSLV के महत्वपूर्ण मिशन

GSLV Mk II (स्वदेशी क्रायोजेनिक चरण युक्त)

मिशन कोड

विवरण और महत्व

GSLV-D5 (2014)

  • GSAT-14: स्वदेशी क्रायोजेनिक चरण के साथ पहली सफल उड़ान।

GSLV-F09 (2017)

  • SAARC उपग्रह (GSAT-9): सार्क देशों के लिए भारत का “उपहार उपग्रह”; अंतरिक्ष कूटनीति में मील का पत्थर।

GSLV-F12 (2023)

  • NVS-01: NVS श्रृंखला का पहला उपग्रह, जिसमें स्वदेशी परमाणु घड़ी (Atomic Clock) लगी है।

GSLV-F14 (2024)

  • INSAT-3DS: आपदा प्रबंधन के लिए उन्नत मौसम संबंधी उपग्रह। (इसे पहले ‘नॉटी बॉय’ कहा जाता था, अब ‘अनुशासित लड़का’)।

GSLV-F15 (2025)

  • NVS-02: NavIC नेविगेशन समूह को मजबूत किया। यह श्रीहरिकोटा से इसरो का 100वाँ प्रक्षेपण मिशन था। (GSLV की 17वीं उड़ान)

GSLV-F16 (2025)

  • NISAR: ISRO-NASA का संयुक्त मिशन; वैश्विक पर्यावरण निगरानी के लिए दुनिया का सबसे उन्नत दोहरी-आवृत्ति (Dual-frequency) रडार इमेजिंग उपग्रह।

GSLV-F17 (2026)

  • EOS-05 (आगामी): रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए पृथ्वी अवलोकन उपग्रह।

GSLV Mk III (LVM3 – ‘फैट बॉय’)

मिशन कोड

विवरण और महत्व

LVM3-X (2014)

  • CARE मिशन: पहला प्रायोगिक मिशन जिसने क्रू मॉड्यूल वायुमंडलीय पुन: प्रवेश (CARE) का परीक्षण किया, जो गगनयान का पूर्वगामी था।

GSLV Mk III-M1 (2019)

  • चंद्रयान-2: चंद्रमा पर रोवर उतारने का भारत का पहला प्रयास (लैंडर विफल रहा, लेकिन ऑर्बिटर सफल है)।

LVM3-M2/M3 (2022-23)

  • वनवेब उपग्रह: वनवेब समूह के 72 उपग्रहों का व्यावसायिक प्रक्षेपण; हैवी-लिफ्ट उपग्रहों के वाणिज्यिक बाजार में इसरो का प्रवेश।

LVM3-M4 (2023)

  • चंद्रयान-3: ऐतिहासिक सफलता: भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला और सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना।

LVM3-M5 (नवंबर 2025)

  • CMS-03: भारतीय धरती से GTO में प्रक्षेपित किया जाने वाला सबसे भारी संचार उपग्रह (~4,400 किग्रा)। यह भारतीय नौसेना को समर्पित है। 
  • यह हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षित वास्तविक समय संचार प्रदान करता है।

LVM3-M6 (दिसंबर 2025)

  • BlueBird Block-2: अमेरिकी फर्म (AST स्पेसमोबाइल) के लिए व्यावसायिक मिशन; भारतीय धरती से अब तक का सबसे भारी उपग्रह (6,100 किग्रा) प्रक्षेपित किया गया।

इसरो के भविष्य के मिशन

  • गगनयान (HLVM3 G1/ OM1): भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन, जो मार्च 2026 के लिए लक्षित है। इसमें ‘ह्यूमन-रेटेड’ LVM3 का उपयोग किया जाएगा। इससे पहले मानवरूपी रोबोट ‘व्योममित्र’ (Vyommitra) को ले जाने वाली मानव रहित परीक्षण उड़ानें भेजी जाएंगी।
  • शुक्रयान-1: 2026-2028 के लिए प्रस्तावित, यह भारत का शुक्र ग्रह के लिए भारत का पहला मिशन होगा। शुक्र ग्रह के वायुमंडल का विशेष रूप से अध्ययन करने के लिए इस मिशन को LVM3 रॉकेट द्वारा लॉन्च करने की योजना है।

SSLV के महत्वपूर्ण मिशन

  • SSLV-D1/EOS-02 मिशन
  • SSLV-D2/EOS-07 मिशन: इसमें मुख्य उपग्रह EOS-07, अमेरिका का Janus-1 और AzaadiSAT-2 शामिल थे। इस मिशन ने प्रणालीगत सुधारों को सत्यापित किया और उपग्रहों को उनकी सटीक कक्षीय प्रविष्टि में सफलतापूर्वक स्थापित किया।
  • SSLV-D3/EOS-08 मिशन
    • तीसरी विकासात्मक उड़ान: 16 अगस्त 2024 को सफलतापूर्वक लॉन्च।
    • उपग्रह: EOS-08 को सटीक रूप से कक्षा में स्थापित किया।
    • पेलोड का प्रकार: SSLV-D3/EOS-08 मिशन एक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह को लेकर गया था।
    • इस सफल उड़ान के साथ ही SSLV विकास परियोजना पूर्ण हो गई है। अब यह भारतीय उद्योगों और NSIL (न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड) द्वारा भविष्य के परिचालन मिशनों के लिए पूरी तरह तैयार है।

लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV)

देशलघु रॉकेट कार्यक्रम
जापानSS-520, एप्सिलॉन (Epsilon)
अमेरिकारॉकेट लैब (Electron)
भारतइसरो का SSLV (लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान) – SSLV-D2 का पहला सफल प्रक्षेपण फरवरी 2023 में श्रीहरिकोटा से हुआ।
चीनCASIC Kuaizhou श्रृंखला

रॉकेट प्रौद्योगिकी – प्रणोदन प्रणाली (Propulsion System)

इसमें इंजन, टैंक और प्रणोदक (Propellants) शामिल होते हैं। यह रॉकेट के कुल आयतन (Volume) का लगभग 80% हिस्सा घेरता है। प्रणोदन को मुख्य रूप से प्रणोदकों (ईंधन और ऑक्सीकारक) की भौतिक अवस्था के आधार पर वर्गीकृत किया गया है:

प्रणोदन के प्रकार

प्रकारप्रणोदक की अवस्थाविशेषताएंउदाहरण
ठोस (Solid)पूर्व-मिश्रित ईंधन और ऑक्सीकारक (HTPB)उच्च प्रणोद (Thrust), सरल संरचना, लेकिन एक बार प्रज्वलित होने के बाद इसे बंद नहीं किया जा सकता।PSLV का प्रथम चरण (S139)
तरल (Liquid)पृथक ईंधन और ऑक्सीकारक (UDMH + नाइट्रोजन टेट्रोक्साइड)इसे नियंत्रित (Throttleable) किया जा सकता है और पुनः शुरू (Restart) किया जा सकता है; इसकी प्लंबिंग जटिल होती है।विकास इंजन (Vikas Engine)
क्रायोजेनिक (Cryogenic)द्रवीकृत गैसें (-183°C LOX, -253°C LH2)सर्वाधिक कुशल (उच्च विशिष्ट आवेग), अत्यधिक जटिल तकनीक।CE-20(LVM3 में प्रयुक्त)
सेमी-क्रायोजेनिक (Semi-Cryogenic)परिष्कृत केरोसिन (RP-1) और तरल ऑक्सीजन (LOX)तरल ईंधन से अधिक शक्तिशाली और पूर्ण क्रायोजेनिक की तुलना में रखरखाव में आसान।SCE-200(आगामी इंजन)

मीथेन-प्रणोदित रॉकेट (LOX Methane Rockets)

  • ईंधन: तरल मीथेन + ऑक्सीकारक: तरल ऑक्सीजन (LOX) → इसे ‘मेथालॉक्स’ (Methalox) कहा जाता है।
  • महत्त्व: यह ‘पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान’ के लिए उभरती हुई प्रमुख प्रणोदन तकनीक है।
  • प्रमुख उदाहरण:
    • झूचुए-2 (Zhuque-2): चीन की लैंडस्पेस कंपनी द्वारा विकसित। जुलाई 2023 में कक्षा तक पहुँचने वाला दुनिया का पहला मीथेन-प्रोपेल्ड रॉकेट।
    • स्पेसएक्स स्टारशिप: गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए मीथेन आधारित पुनः उपयोग योग्य रॉकेट।
    • रिलेटिविटी स्पेस टेरान 1 (Terran 1): एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (3D-प्रिंटेड) तकनीक से निर्मित मीथेन रॉकेट। (पहला 3D-मुद्रित रॉकेट)।
  • इसरो (ISRO) का प्रयास: इसरो दो मीथेन-संचालित इंजनों को विकसित कर रहा है।
    • इनमें से एक परियोजना वर्तमान क्रायोजेनिक इंजन (जो तरल हाइड्रोजन का उपयोग करता है) को LOX-मीथेन इंजन में परिवर्तित करने की है।
    • इनका विकास तिरुवनंतपुरम स्थित इसरो के तरल प्रणोदन प्रणाली केंद्र (LPSC) में किया जा रहा है।

आयन रॉकेट (Ion Rockets)

  • आयन रॉकेट गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए अत्यधिक कुशल माने जाते हैं।
  • वेग: ये 20-80 किमी/सेकंड का वेग प्राप्त कर सकते हैं (जबकि रासायनिक रॉकेट केवल 2-3 किमी/सेकंड तक सीमित होते हैं)।
  • ये एक विद्युत प्रणोदन प्रणाली का उपयोग करते हैं, जो आयनों को उच्च वेग पर त्वरित कर बाहर निकालते हैं, जिससे निरंतर प्रणोद (Thrust) प्राप्त होता है।
  • प्रमुख मिशन: इनका छोटे पैमाने पर उपयोग नासा के डॉन (Dawn) और डीप स्पेस, ईएसए के लीसा पाथफाइंडर (LISA Pathfinder) और जापान के हायाबुसा (Hayabusa) मिशनों में किया गया है।

इसरो के प्रक्षेपण केंद्र (Launch Stations)

  1. सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SHAR)
    1. स्थान: श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश।
    2. विशेषता: SHAR में PSLV और GSLV उड़ानों (भारी उपग्रहों) के लिए दो प्रक्षेपण पैड उपलब्ध हैं।
      1. इसरो का तीसरा प्रक्षेपण पैड (Third Launch Pad – TLP)
  • इसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा में बनाया जाएगा। (अनुमानित समय: 4 वर्ष – 2029 तक)। 
  • उद्देश्य:
    • प्रक्षेपण आवृत्ति में वृद्धि, गगनयान मिशन और भविष्य के भारी रॉकेटों (जैसे NGLV) का समर्थन करना।
    • श्रीहरिकोटा में स्थित द्वितीय प्रक्षेपण पैड (SLP) के लिए एक स्टैंडबाय (Standby) प्रक्षेपण पैड के रूप में कार्य करना।
  1. कुलसेकरपट्टिनम स्पेसपोर्ट (Kulasekarapattinam Spaceport)
    1. स्थान: थूथुकुडी जिला, तमिलनाडु।
    2. उद्देश्य: यह SSLV (लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान) के लिए भारत का नया स्पेसपोर्ट है।
    3. प्रक्षेपण: यहाँ से नैनो और माइक्रो-सैटेलाइट जैसे लघु पेलोड प्रक्षेपित किए जाएंगे।
    4. लाभ: कुलसेकरपट्टिनम से सीधे दक्षिण दिशा में प्रक्षेपण करने का लाभ मिलता है, जिससे ‘डॉगलेग मैन्युवर’ (Dogleg Manoeuvre) की आवश्यकता नहीं होती। इससे रॉकेट के ईंधन की बचत होती है और पेलोड क्षमता में सुधार होता है।
रॉकेट प्रणोदन

रॉकेट प्रौद्योगिकी में निजी क्षेत्र का योगदान

अग्निबाण सबऑर्बिटल टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर (Agnibaan SOrTeD)

  • प्रक्षेपण: IIT मद्रास स्थित स्टार्टअप ‘अग्निकुल कॉस्मॉस’ (Agnikul Cosmos) द्वारा।
  • प्रक्षेपण स्थल: इसे भारत के पहले निजी प्रक्षेपण पैड ‘धनुष’ (अग्निकुल द्वारा निर्मित) से लॉन्च किया गया।
  • इंजन: यह ‘अग्निलेट’ (Agnilet) इंजन द्वारा संचालित है, जो दुनिया का पहला एकल-खंड (Single-piece) 3D-मुद्रित इंजन है।
  • प्रकार: सेमी-क्रायोजेनिक इंजन (तरल ऑक्सीजन + ATF – एविएशन टर्बाइन फ्यूल)। यह भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी तरह का पहला इंजन है।
  • मिशन प्रकार: सब-ऑर्बिटल टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर (SOrTeD) → जिसका उद्देश्य भविष्य के कक्षीय रॉकेट ‘अग्निबाण’ के लिए उड़ान डेटा एकत्र करना है।
  • पेलोड क्षमता: 30-300 किलोग्राम; इसमें मोबाइल लॉन्च (Mobile Launch) की सुविधा है।
  • दृष्टिकोण:कहीं से भी, कभी भी, किफायती रूप से प्रक्षेपण”, अनुकूलन योग्य छोटे उपग्रह प्रक्षेपणों को सक्षम करना।

विक्रम-S (Vikram-S)

  • यह भारत का पहला निजी तौर पर निर्मित रॉकेट है, जिसे 18 नवंबर 2022 को ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ द्वारा श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया था।
  • मिशन का नाम: इस रॉकेट लॉन्च के पहले मिशन को ‘प्रारंभ’ (Prarambh) नाम दिया गया था।
  • कलम 1200 (KALAM 1200): यह एक ठोस मोटर है, जो विक्रम-1 प्रक्षेपण यान के प्रथम चरण के रूप में कार्य करती है।

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