पदस्थापन

भिन्नात्मक पदस्थापन वह प्रक्रिया है जिसमें परिवीक्षा अवधि के दौरान किसी कर्मचारी को उसके मूल रूप से दिए गए कार्य के लिए अनुपयुक्त पाए जाने पर उसे अधिक उपयुक्त पद पर नियुक्त किया जाता है। यदि कर्मचारी प्रारम्भिक कार्य के लिए उपयुक्त नहीं पाया जाता, तो कार्मिक विभाग उसका पुनः मूल्यांकन करता है। इसका मुख्य उद्देश्य कर्मचारी की योग्यता, अभिरुचि तथा पूर्व अनुभव के अनुरूप किसी अन्य उपयुक्त कार्य का निर्धारण करना होता है।

वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता बढ़ने के कारण

  • भर्ती एवं चयन की बढ़ती लागत: नए कर्मचारियों की भर्ती और चयन में अधिक समय तथा धन खर्च होता है। भिन्नात्मक पदस्थापन के माध्यम से संगठन नए कर्मचारियों की नियुक्ति के बजाय वर्तमान कर्मचारियों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।
  • कर्मचारियों की बदलती मनोवृत्तियाँ: आज के कर्मचारियों की रुचियाँ, अपेक्षाएँ और व्यावसायिक लक्ष्य अलग-अलग होते हैं। भिन्नात्मक पदस्थापन उन्हें उनकी रुचि और क्षमता के अनुरूप कार्य प्रदान करने में सहायता करता है।
  • शिक्षा के स्तर में वृद्धि: आज के कर्मचारियों के पास उच्च शैक्षिक योग्यताएँ और विशेष कौशल होते हैं। भिन्नात्मक पदस्थापन से संगठन इन योग्यताओं और कौशलों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।
  • कर्मचारियों की बढ़ती आकांक्षाएँ: कर्मचारी अधिक कार्य-संतुष्टि, उन्नति के अवसर और बेहतर कार्य परिस्थितियाँ चाहते हैं। उन्हें उपयुक्त पदों पर नियुक्त करने से उनकी अपेक्षाएँ पूरी होती हैं और कार्य-निष्पादन में सुधार आता है।

इन कारणों से संगठनों के लिए कर्मचारियों की सेवाएँ समाप्त करने की अपेक्षा उन्हें अधिक उपयुक्त पदों पर पुनः नियुक्त करना अधिक व्यावहारिक और किफायती बन गया है।

पदस्थापन (Placement) वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत चयनित कर्मचारी को उसकी योग्यता, कौशल, अभिक्षमता, अनुभव तथा अभिरुचि के अनुरूप उपयुक्त कार्य पर नियुक्त किया जाता है। इसका मूल सिद्धान्त है— “उचित व्यक्ति को उचित कार्य पर उचित समय पर नियुक्त करना।” उचित पदस्थापन कर्मचारी तथा संगठन दोनों के लिए लाभकारी होता है।

कर्मचारी संतुष्टि में योगदानसंगठनात्मक दक्षता में योगदान
कार्य-संतुष्टि में वृद्धि: योग्यता एवं रुचि के अनुरूप कार्य मिलने से कर्मचारी अपने कार्य में संतोष एवं उपलब्धि का अनुभव करते हैं।उत्पादकता में वृद्धि: क्षमता एवं कौशल के अनुरूप कार्य मिलने से कर्मचारी अधिक दक्षता एवं गुणवत्ता के साथ कार्य करते हैं।
अभिप्रेरणा एवं मनोबल में वृद्धि: उपयुक्त पदस्थापन कर्मचारियों का आत्मविश्वास, मनोबल तथा संगठन के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ाता है।मानव संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग: कर्मचारियों के ज्ञान, अनुभव एवं कौशल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित होता है।
कैरियर विकास एवं कौशल उन्नयन: उपयुक्त कार्य कर्मचारियों को नई क्षमताएँ विकसित करने तथा व्यावसायिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है।प्रशिक्षण एवं प्रतिस्थापन लागत में कमी: सही पदस्थापन से अतिरिक्त प्रशिक्षण, त्रुटि-सुधार तथा पुनः भर्ती की आवश्यकता कम होती है।
तनाव एवं कर्मचारी परिवर्तन में कमी: उचित पदस्थापन से कार्य-असंतोष, भूमिका-संघर्ष, अनुपस्थिति तथा कर्मचारी परिवर्तन (Labour Turnover) में कमी आती है।संगठनात्मक प्रदर्शन में सुधार: संतुष्ट एवं सक्षम कर्मचारी बेहतर समन्वय, टीम भावना तथा कार्यकुशलता के माध्यम से संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान देते हैं।

प्रशिक्षण (Training) एक सुनियोजित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कर्मचारियों के ज्ञान, कौशल, योग्यता एवं कार्य-दक्षता में वृद्धि की जाती है ताकि वे अपने वर्तमान कार्यों का अधिक प्रभावी एवं कुशलतापूर्वक निर्वहन कर सकें। संगठन कार्य की प्रकृति, कर्मचारियों की आवश्यकताओं तथा प्रशिक्षण के उद्देश्यों के अनुसार विभिन्न प्रशिक्षण विधियों का उपयोग करते हैं। सामान्यतः इन्हें कार्यस्थल प्रशिक्षण (On-the-Job Training) तथा कार्यस्थल से बाहर प्रशिक्षण (Off-the-Job Training) में वर्गीकृत किया जाता है।

कार्यस्थल प्रशिक्षण (On-the-Job Training)कार्यस्थल से बाहर प्रशिक्षण (Off-the-Job Training)
कोचिंग (Coaching): इसमें वरिष्ठ अधिकारी या अनुभवी कर्मचारी कार्य करते समय कर्मचारी को व्यक्तिगत मार्गदर्शन, सुझाव तथा प्रतिपुष्टि प्रदान करता है। इससे कार्य-कुशलता एवं आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।व्याख्यान विधि (Lecture Method): विशेषज्ञ या प्रशिक्षक कक्षा के माध्यम से कर्मचारियों को सिद्धान्त, नीतियाँ एवं प्रक्रियाओं की जानकारी प्रदान करते हैं। यह बड़ी संख्या में कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के लिए उपयुक्त है।
कार्य-परिवर्तन (Job Rotation): कर्मचारियों को निश्चित अवधि के बाद विभिन्न विभागों या कार्यों में स्थानांतरित किया जाता है, जिससे वे विविध कार्यों का अनुभव प्राप्त करते हैं तथा बहुआयामी कौशल विकसित करते हैं।केस अध्ययन विधि (Case Study Method): कर्मचारियों को वास्तविक या काल्पनिक व्यावसायिक समस्याओं का अध्ययन कर उनके समाधान प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता है। इससे विश्लेषणात्मक क्षमता एवं निर्णय-निर्माण कौशल का विकास होता है।
शिक्षुता प्रशिक्षण (Apprenticeship Training): इसमें कर्मचारी एक निश्चित अवधि तक कुशल विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करता है। यह तकनीकी एवं औद्योगिक व्यवसायों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।भूमिका निर्वहन (Role Playing): प्रतिभागियों को विभिन्न कार्य परिस्थितियों में अलग-अलग भूमिकाएँ निभाने के लिए कहा जाता है। इससे संचार, नेतृत्व, वार्तालाप तथा समस्या-समाधान कौशल विकसित होते हैं।
इंटर्नशिप प्रशिक्षण (Internship Training): विद्यार्थियों या नव-स्नातकों को सीमित अवधि के लिए संगठन में व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया जाता है, जिससे सैद्धान्तिक ज्ञान एवं व्यवहारिक अनुभव के बीच समन्वय स्थापित होता है।वेस्टिब्यूल प्रशिक्षण (Vestibule Training): कर्मचारियों को वास्तविक कार्यस्थल जैसे कृत्रिम वातावरण में प्रशिक्षण दिया जाता है। इससे वास्तविक कार्य प्रारम्भ करने से पहले त्रुटियों एवं दुर्घटनाओं की संभावना कम हो जाती है।
प्रदर्शन विधि (Demonstration Method): प्रशिक्षक किसी कार्य को करके दिखाता है तथा उसके बाद कर्मचारी उसी कार्य का अभ्यास करता है। यह तकनीकी एवं उत्पादन संबंधी कार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी है।अनुकरण विधि (Simulation Method): कर्मचारियों को कृत्रिम किन्तु वास्तविक परिस्थितियों से मिलते-जुलते वातावरण में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका उपयोग विशेष रूप से पायलट, रक्षा सेवाओं तथा मशीन संचालकों के प्रशिक्षण में किया जाता है।
सम्मेलन एवं संगोष्ठी (Conference and Seminar Method): कर्मचारियों के बीच विचार-विमर्श, अनुभवों के आदान-प्रदान तथा विशेषज्ञों के मार्गदर्शन के माध्यम से ज्ञान, नेतृत्व एवं संचार कौशल का विकास किया जाता है।

error: Content is protected !!
Scroll to Top
Telegram WhatsApp Chat