इन्द्रा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा (2013) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “विवाह के समान स्वरूप वाले” लिव-इन-रिलेशनशिप, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2(f) के तहत घरेलू नातेदारी के समकक्ष माने जाएंगे। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस व्याख्या की पुष्टि करते हुए कहा कि वास्तविक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को विवाहित महिलाओं के समान कानूनी संरक्षण प्राप्त हो।

मुख्य उपलब्ध अधिकार:

  1. घरेलू हिंसा से संरक्षण का अधिकार (इंद्रा सरमा मामला)
  2. भरण-पोषण का अधिकार (पालिमोनी)
  3. साझा गृहस्थी का अधिकार (ललिता टोप्पो मामला)
  4. संपत्ति के उत्तराधिकार का अधिकार (विद्याधरी एवं अन्य मामला)
  5. बच्चों की वैधता का अधिकार (कट्टूकांडी मामला)
  6. वीजा विस्तार का अधिकार (स्वेतलाना कज़ानकिना मामला)।

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 10 के अंतर्गत ‘सेवा प्रदाता’ (Service Provider) वे पंजीकृत गैर-सरकारी संगठन (NGOs), सोसायटी अथवा कंपनियाँ हैं, जो घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को सहायता एवं संरक्षण प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य पीड़िता को त्वरित राहत, सुरक्षा तथा आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराना है।

सेवा प्रदाताओं की प्रमुख भूमिकाएँ

  1. घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) दर्ज करना – धारा 10 के अनुसार सेवा प्रदाता पीड़िता की शिकायत के आधार पर Domestic Incident Report (DIR) तैयार कर संबंधित मजिस्ट्रेट एवं संरक्षण अधिकारी को भेजते हैं।
  2. चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराना – पीड़िता के चिकित्सीय परीक्षण एवं उपचार की व्यवस्था करना सेवा प्रदाताओं का महत्वपूर्ण दायित्व है।
  3. आश्रय गृह उपलब्ध कराना – हिंसा से प्रभावित महिला को सुरक्षित आश्रय (Shelter Home) उपलब्ध कराने की व्यवस्था करना।
  4. कानूनी एवं मनोवैज्ञानिक सहायता –सेवा प्रदाता पीड़िता को कानूनी सलाह, परामर्श (Counselling) तथा मानसिक सहयोग प्रदान करते हैं।
  5. त्वरित न्याय में सहयोग – ये संस्थाएँ मजिस्ट्रेट, पुलिस तथा संरक्षण अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित कर अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन में सहायता करती हैं।
  6. सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों पर संरक्षण – अधिनियम सेवा प्रदाताओं को सद्भावना में किए गए कार्यों हेतु कानूनी सुरक्षा (Immunity) प्रदान करता है।

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA, 2005) के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को व्यापक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं ताकि पीड़िता को त्वरित और प्रभावी राहत दी जा सके। अधिनियम की धारा 12 के तहत आवेदन प्राप्त होने पर मजिस्ट्रेट निम्नलिखित आदेश पारित कर सकता है:

1. संरक्षण आदेश (Protection Order) – धारा 18
  • घरेलू हिंसा को रोकने के लिए जारी किया जाता है।
  • इसमें आरोपी को पीड़िता पर शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या यौनिक हिंसा न करने का निर्देश दिया जाता है।
  • आरोपी को पीड़िता के कार्यस्थल या निवास स्थान के पास आने से भी रोका जा सकता है।
2. निवास आदेश (Residence Order) – धारा 19
  • पीड़िता को घरेलू हिंसा वाले घर में रहने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
  • आरोपी को पीड़िता को घर से बेदखल करने या संपत्ति से वंचित करने से रोका जाता है।
  • यदि आवश्यक हो तो अलग निवास और रखरखाव की व्यवस्था भी की जा सकती है।
3. मौद्रिक राहत (Monetary Relief) – धारा 20
  • पीड़िता को आर्थिक सहायता प्रदान करने का आदेश।
  • इसमें चिकित्सा व्यय, हानि, क्षति, रखरखाव (Maintenance) और बच्चे की देखभाल का खर्च शामिल होता है।
  • यह राहत अस्थायी या स्थायी दोनों रूप में दी जा सकती है।
4. बच्चे की कस्टडी आदेश (Custody Order) – धारा 21
  • बच्चे की अस्थायी या स्थायी कस्टडी पीड़िता को देने का आदेश।
  • बच्चे की भलाई को ध्यान में रखकर visitation rights (मिलने का अधिकार) भी तय किया जा सकता है।
5. मुआवजा आदेश (Compensation Order) – धारा 22
  • घरेलू हिंसा के कारण पीड़िता को हुई मानसिक या शारीरिक क्षति के लिए मुआवजा (Compensation) देने का आदेश।
6. अंतरिम एवं एकपक्षीय आदेश (Interim / Ex-parte Orders) – धारा 23
  • आवेदन पर सुनवाई के दौरान तत्काल राहत के लिए अंतरिम आदेश पारित किए जा सकते हैं।
  • यदि मामला अत्यंत जरूरी हो तो बिना आरोपी को सुनवाई दिए (ex-parte) भी आदेश पारित किया जा सकता है।

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

error: Content is protected !!
Scroll to Top
Telegram WhatsApp Chat