मौर्य साम्राज्य

मौर्य साम्राज्य प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप का पहला व्यापक रूप से एकीकृत राजनीतिक राज्य माना जाता है। मौर्य शासकों ने प्रशासन, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देकर एक सुदृढ़ और संगठित शासन प्रणाली स्थापित की।

  • मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ भारतीय इतिहास ठोस आधार पर अवतरित हुआ।
  • इसके विषय में हमें साहित्यिक, विदेशी, और पुरातात्त्विक स्रोतों से जानकारी मिलती है

स्त्रोत 

  • कौटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, सोमदेव की कथा सरितसागर, क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी, दीपवंश, महावंश टीका, भद्रबाहु के कल्पसूत्र, स्ट्रेबो, प्लूटार्क, जस्टिन आदि यूनानी यात्री, फाह्यान, ट्रेनसांग, इत्सिंग आदि चीनी यात्री, रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख एवं अशोक के अभिलेख जो हमें पुरातात्विक खुदाई के दौरान मिले हैं, आदि मुख्य स्रोत हैं।
मौर्य साम्राज्य

मौर्यों की उत्पत्ति

  • ब्राह्मण परम्परा के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की माता शूद्र जाति की मुरा नामक स्त्री थी। 
  • बौद्ध परम्परा के अनुसार मौर्य ‘क्षत्रिय कुल’ से संबंधित थे।
  • महापरिनिब्बानसुत्त के अनुसार मौर्य पिपलीवन के शासक तथा क्षत्रिय वंश से संबंधित थे।

चन्द्रगुप्त मौर्य (322–298 ई.पू.)

“भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट, मुक्तिदाता एवं राष्ट्रीय एकता का संस्थापक”

मौर्य साम्राज्य के संस्थापक।

यूनानी ग्रंथों में नाम –

  • सेण्ड्रोकोट्स / एण्ड्रोकोट्स (स्ट्रेबो, मेगस्थनीज, एरियन, जस्टिन)
  • एण्ड्रोकोट्स – एपियन, प्लूटार्क
  • सेण्ड्रोकोप्टस – फिलार्कस
  • विलियम जोन्स ने सेण्ड्रोकोट्स = चन्द्रगुप्त मौर्य और पालिब्रोथा = पाटलीपुत्र सिद्ध किया।
  • गुरु – चाणक्य (कौटिल्य)
  • अंतिम नंद राजा धनानंद को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना।
  • इसका वर्णन विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में मिलता है।

राजनीतिक उपलब्धियाँ

 (1) यूनानियों को पराजित करना
  • पंजाब व पश्चिमोत्तर से यूनानियों को खदेड़ा।
  • सिंध में फिलिप द्वितीय, पंजाब में यूडेमस सिकंदर के क्षत्रप थे।
  • प्लूटार्क: “चन्द्रगुप्त ने 6 लाख सेना लेकर सम्पूर्ण भारत पर अधिकार किया।”
  • जस्टिन: सेना को “डाकुओं की सेना” कहा, पर “भारतीयों ने दासता का जुआ उतारा।”
(2) मगध विजय
  • महाबोधिवंश: प्रथम आक्रमण मगध पर।
  • महावंश टीका वंशत्थपकासिनी: पंजाब व मगध विजय का वर्णन।
  • मिलिन्दपन्हो: युद्ध में धनानंद के अमात्य शकटार ने सहायता की।
  • धनानंद का सेनापति – भद्दशाल।
(3) सेल्यूकस निकेटर से युद्ध (305 ई.पू.)
  • यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया।
  • संधि के अनुसार –
    • सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त से किया।
    • चार प्रान्त दहेज में मिले
      • एरिया (हेरात)
      • अराकोसिया (कंधार)
      • जेड्रोसिया (बलूचिस्तान/मकरान)
      • पेरोपनिसडाई (काबुल)
    • बदले में 500 हाथी दिये।
  • विवरण – एप्पियानस, स्ट्रेबो, प्लूटार्क, मुद्राराक्षस में।
  • सेल्यूकस ने अपना राजदूत मेगस्थनीज को पाटलीपुत्र भेजा।

 (4) साम्राज्य विस्तार

  • विन्सेंट स्मिथ: “चन्द्रगुप्त ने हिन्दुकुश तक भारत की वैज्ञानिक सीमा निर्धारित की।”
  • प्रारम्भिक विजय में पर्वतक शासक से सहयोग।
  • मुद्राराक्षस: साम्राज्य “चतुःसमुद्र पर्यन्त” बताया गया।
  • अहानानूर (तमिल संगम ग्रंथ): दक्षिण में राजा मोहर पर आक्रमण, सहयोगी – कौशर व वाडुगर जातियाँ।
  • दक्षिण सीमा – मैसूर तक
  • महास्थान अभिलेख: बंगाल विजय व काकिणी मुद्रा का उल्लेख।
  • सौराष्ट्र: गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य द्वारा सुदर्शन झील निर्माण।
  • जूनागढ़ अभिलेख (रुद्रदामन): “चन्द्रगुप्त” शब्द का सबसे पुराना अभिलेखीय प्रमाण।
  • दरबार में मंत्री – जटिलक

 (5) अकाल प्रबंधन

  • शासन के अंतिम वर्षों में 12 वर्ष तक अकाल (जैन ग्रंथों से प्रमाण)।
  • महास्थान व सौहगरा अभिलेख में अनाज भंडारण और राशन प्रणाली का उल्लेख।

 (6) अंतिम समय व मृत्यु

  • अंतिम समय में जैन मुनि भद्रबाहु से दीक्षा ली।
  • श्रवणबेलगोला (मैसूर) में सल्लेखना (उपवास) द्वारा देह त्याग – 298 ई.पू.
  • हेमचन्द्र के परिशिष्टपर्व में जैन धर्म ग्रहण का उल्लेख।
  • भद्रबाहु गुफाचन्द्रगिरि पर्वत (श्रवणबेलगोला) उनसे संबद्ध।

बिन्दुसार (298 ई.पू. – 274 ई.पू.)

चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र व मौर्य साम्राज्य का द्वितीय सम्राट।

नाम व उपाधियाँ

स्रोतनाम / उपाधि
वायु पुराणमद्रास
अन्य पुराणबारीसार
जैन ग्रन्थसिंहसेन
यूनानी लेखकअमित्रोकेडस (Pliny), अलिट्रोकेडस (Strabo)
पतंजलि (महाभाष्य)अमृतघाट
चीनी ग्रंथ (फा-ह्येन चुलीन)बिन्दुपाल
फ्लीट का मतअमित्रघात = “शत्रुओं का वध करने वाला”

विदेशी संबंध

  1. मिस्र (Egypt)
    • शासक: टालमी द्वितीय फिलाडेल्फस
    • राजदूत भेजा: डायोनिसिस (Dionysius)
    • उद्देश्य: भारत से ज्ञान-विज्ञान हेतु सम्बन्ध; सिकन्दरिया में ग्रंथालय स्थापित किया जहाँ भारतीय ग्रंथों का अनुवाद सुरक्षित रखा गया।
  2. सीरिया (Syria)
    • शासक: एण्टियोकस प्रथम (Antiochus I)
    • राजदूत भेजा: डाइमेकस (Deimachus)
    • डाइमेकस – मेगस्थनीज के बाद भारत आया दूसरा यूनानी राजदूत।
    • बिन्दुसार ने एण्टियोकस को पत्र लिख तीन वस्तुओं की माँग की –
      1. मदिरा 
      2. सूखी अंजीर 
      3. दार्शनिक 
    • उत्तर:  सीरियाई शासक ने कहा – “दार्शनिक का विक्रय यूनानी कानून में वर्जित है।”

तक्षशिला विद्रोह

  • स्रोत: दिव्यावदान
  • दो विद्रोह हुए –
    • पहला – जनता द्वारा
    • दूसरा – दरबारी षड्यंत्र के कारण
  • पहले विद्रोह के दमन हेतु – अशोक (तब उज्जैन/अवन्ती का गवर्नर) भेजा गया।
  • दूसरे विद्रोह के दमन हेतु – सुसीम (तक्षशिला का गवर्नर) भेजा गया।

साम्राज्य विस्तार

  • तारानाथ: बिन्दुसार ने 16 प्रदेशों पर विजय प्राप्त की और साम्राज्य को “एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक” फैलाया।
  • पिता द्वारा स्थापित साम्राज्य को अक्षुण्ण रखा।

धर्म व प्रशासन

  • महावंश: ब्राह्मण धर्म का अनुयायी, 60,000 ब्राह्मणों के प्रति उदार।
  • अन्य मत: आजीवक धर्म का अनुयायी।
  • प्रधानमंत्री:
    • प्रारंभ में – चाणक्य
    • बाद में – राधागुप्त
  • दिव्यावदान:
    • बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली विशाल मंत्रिपरिषद, जिसका प्रधान खल्लाटक था।
    • पिंगल वत्स नामक आजीवक ने अशोक के राजा बनने की भविष्यवाणी की।

 अशोक (273 ई.पू.–232 ई.पू.)

  • बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था। जैन ग्रंथों के अनुसार अशोक ने बिन्दुसार की इच्छा के विरुद्ध मगध के शासन पर अधिकार किया था, पुराणों में अशोक को ‘अशोकवर्धन’ तथा दीपवंश में ‘करमोली’ कहा गया है।
  • अभिलेखों में अशोक को ‘देवानामप्रिय’, ‘देवनाप्रियदर्शी’ एवं राजा के सम्बोधन से सम्बोधित किया गया है। 
  • सर्वप्रथम मस्की एवं गूर्जरा अभिलेख में ‘अशोक’ नाम मिलता है। अशोक को भाब्रु अभिलेख में “प्रियदर्शी” तथा मास्की अभिलेख में “बुद्धशाक्य” कहा गया है।
  • बिन्दुसार की मृत्यु की उपरान्त अशोक विशाल मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। करीब चार वर्ष के सत्ता संघर्ष के बाद अशोक का विधिवत् राज्याभिषेक करीब 269 ई पू में हुआ, वैसे तो अशोक 273 ईपू में ही मगध के राजसिंहासन पर बैठ चुका था। 
  • अपने राज्याभिषेक के सातवें वर्ष में अशोक ने कश्मीर एवं खोतान क्षेत्र के अनेक भागों को विजित कर मौर्य साम्राज्य में मिलाया। 
  • अशोक का साम्राज्य उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (अफगानिस्तान), दक्षिण में कर्नाटक, पश्चिम में काठियावाड़ एवं पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक था। 
  • राजतरंगिनी के अनुसार अशोक ने कश्मीर में वितस्ता नदी के किनारे ‘श्रीनगर’ नामक नगर की स्थापना की तथा नेपाल में ललितपत्तन नगर बसाया।

नोट – 

  • अशोक की रानियों में महादेवी, तिष्यरक्षिता तथा कारूवाकी का नाम आता है।
  • सिंहली परम्परा के अनुसार अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा विदिशा के श्रेष्ठी पुत्री महादेवी से उत्पन्न हुए थे।
  • अशोक के अभिलेख में उसकी एकमात्र पत्नी कारूवाकी का उल्लेख मिलता है, जो तीवर की माता थी।

सत्ता संघर्ष

  • राज्याभिषेक से पूर्व उज्जैन का गवर्नर
  • प्रधानमंत्री राधागुप्त की सहायता से सत्ता प्राप्त।
  • सिहली अनुश्रुति (महावंश): 99 भाइयों की हत्या कर सिंहासन प्राप्त (269 ई.पू.)।
  • तारानाथ: 6 भाइयों की हत्या।
  • अशोक का राज्याभिषेक – 269 ई.पू.
  • वृहद शिलालेख V – जीवित भाइयों के परिवारों का उल्लेख।

 साम्राज्य की सीमा

  • उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान तक,
  • दक्षिण में कर्नाटक तक,
  • पश्चिम में काठियावाड़ तक,
  • पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक।
  • 7वें वर्ष कश्मीर व खोतान क्षेत्र का विजय।
  • कल्हण (राजतरंगिणी) – कश्मीर में श्रीनगर की स्थापना, नेपाल में ललितपत्तन नगर बसाया।

 कलिंग युद्ध (261 ई.पू.)

  • राज्याभिषेक के 8वें वर्ष कलिंग पर आक्रमण।
  • राजधानी – तोशली, राजा – नंदराज (हाथीगुम्फा अभिलेख)।
  • युद्ध के कारण –
    • कलिंग का रणनीतिक व व्यापारिक महत्त्व (समुद्रतटीय क्षेत्र)।
    • भारत को एकसूत्र में बाँधने की नीति।
  • परिणाम –
    • 1 लाख मृत, 1.5 लाख बंदी।
    • अशोक का मन द्रवित हुआ।
    • भेरी घोष” (युद्धनीति) का त्याग कर “धम्म घोष” अपनाया।

  अशोक का धम्म

  • नैतिक व सामाजिक आचार-संहिता (राजधर्म नहीं)।
  • प्रेरणा: दीर्घ निकाय के “राहुलोवाद सुत्त” से।
  • लक्ष्य: लोककल्याण, स्वर्गप्राप्ति, अहिंसा, सत्य, दया, दान, माता-पिता सेवा।
  • धम्म श्रवण: जनता को दिया गया धर्म सन्देश।
  • प्रमुख बिंदु:
    • प्राणियों की हत्या न करना
    • वृद्धों, ब्राह्मणों, श्रमणों का सम्मान
    • दासों से अच्छा व्यवहार
    • क्रोध, ईर्ष्या, घमण्ड का नियंत्रण

धम्म प्रचारक भिक्षु

प्रचारकक्षेत्र
मज्झन्तिककश्मीर व गांधार
महारक्षितयवन देश
मज्झिम व धर्मरक्षितहिमालय क्षेत्र
महाधर्मरक्षितअपरान्तक (पश्चिम भारत)
महादेवमहाराष्ट्र
रक्षितमहिष्मंडल (मैसूर)
सोन व उत्तरबनवासी (कर्नाटक)
महेन्द्र व संघमित्रालंका (श्रीलंका)

अशोक के धम्म पर विद्वानों के मत

विद्वानमत
फ्लीटराजधर्म
स्मिथ, राधाकुमुद मुखर्जीसार्वभौम धर्म / सभी धर्मों की साझी सम्पत्ति
रमाशंकर त्रिपाठीसार्वभौम धर्म
भंडारकरउपासक बौद्ध धर्म
फादर हेरास, मेकफेलब्राह्मण धर्म
रोमिला थापरराजनीतिक एकता हेतु “अशोक का आविष्कार”
सेनार्टपूर्ण बौद्ध धर्म
नीलकंठ शास्त्रीनैतिक आचार संहिता

 सामाजिक-आर्थिक सुधार

  • समाज के कमजोर वर्गों को गतिशीलता प्रदान।
  • कृषि भूमि का विस्तार, युद्धबंदियों को वनों व खानों में कार्यरत किया।
  • राजस्व का पुनर्वितरण लोकहित कार्यों में किया।
  • 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया।
  • क्रय शक्ति में वृद्धि, उत्पादन व अर्थव्यवस्था को बल मिला।

  विदेश नीति व धार्मिक नीति

  • समकालीन राज्यों से कूटनीतिक संबंध स्थापित किए।
  • धम्म आयोग विदेश भेजे → सांस्कृतिक व धार्मिक संबंध मजबूत हुए।
  • धार्मिक सहिष्णुता पर बल – सभी धर्मों को समान आदर।
  • धर्म थोपने का विरोध, सभी के लिए समान सम्मान।
  • राष्ट्रीय एकता हेतु उपाय:
    • एक धर्म, एक भाषा, एक लिपि की नीति।
    • समान नागरिक व दण्ड संहिता का क्रियान्वयन।
  • सामाजिक न्याय व कानून के शासन की स्थापना।

 राजनीतिक दृष्टि से योगदान

  • मौर्य साम्राज्य को नवदिशा प्रदान की।
  • राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक एकता स्थापित की।
  • राष्ट्र निर्माण की भावना – भारत को एक इकाई के रूप में देखने वाला प्रथम शासक।
  • धम्म नीति – सार्वभौमिक, सार्वकालिक व सार्वजनिक।
  • पितृवत् शासन सिद्धान्त – प्रजा को परिवार समान माना।

 निर्माण कार्य

  • कुएँ, सराय, वृक्षारोपण, धर्मयात्रा मार्गों पर विश्राम स्थल।
  • सार्वजनिक निर्माण कार्यों से आर्थिक विकास।
  • 84000 स्तूपों का निर्माण (बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु)।

धर्म प्रशासनिक तंत्र

  • धम्म महामात्र, धम्मयात्रा, धम्मलिपि, प्रतिवेदक अधिकारी नियुक्त।
  • हर पाँच वर्ष में धर्म प्रचार यात्रा (अनुसंयान)
  • जनसंपर्क व सामाजिक सुधार हेतु प्रत्यक्ष निरीक्षण प्रणाली।

अशोक के अभिलेख

  • अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वप्रथम शिलालेख का प्रचलन किया था। शिलालेखों के माध्यम से राज्यादेशों तथा उपलब्धियों को संकलित किया गया था जिनमें वह जनता को संबोधित करता है।
  • सर्वप्रथम 1750 ई. में टीफेन्थैलर महोदय ने अशोक के दिल्ली – मेरठ स्तम्भ का पता लगाया था।
  • सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप को 1837 ई. में अशोक के अभिलेखों की खोज को पढ़ने में सफलता प्राप्त हुई सर्वप्रथम दिल्ली-टोपरा लेख को पढ़ा गया।
  • अशोक के अभिलेख आरमाइक, खरोष्ठी, यूनानी एवं ब्राह्मी चारों लिपियों में पाए गए हैं। लघमान लेख आरमाइक लिपि में हैं। मानसेहरा एवं शाहबाजगढ़ी से खरोष्ठी लिपि के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। अशोक का ‘शर-ए-कुना’ (कंधार) अभिलेख ग्रीक व अरामाइक लिपि में प्राप्त हुआ है।
  • अशोक के अभिलेख को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- 1. शिलालेख, 2. स्तम्भलेख एवं 3. गुहालेख।

शिलालेख

  • संख्या 14 है, जो आठ भिन्न – भिन्न स्थानों से प्राप्त किए गए हैं।
शिलालेखस्थानलिपिविवरण 
शाहबाजगढ़ीपेशावर (पाक)खरोष्ठी1836 ई. में जनरल कोर्ट ने खोजा।
मानसेहरामानसेहरा (हजारा जि.)खरोष्ठीकैप्टन लेह और पंजाब पुरातत्व सर्वेक्षण के एक भारतीय कर्मचारी ने 1889 ई. में खोजा था।
कलसीदेहरादून (उत्तरांचल)ब्राह्मी1860 ई. में फोरेस्ट ने इसे खोजा।
गिरनारजूनागढ़ (गुजरात)ब्राह्मी1822 ई. में कर्नल टॉड ने इन लेखों का पता लगाया।
एर्रगुड़ीकुर्नूल (आंध्र प्रदेश)ब्रुस्टोफेदन [लिपि दाएँ से बाएँ]खोज भू-वैज्ञानिक अनुघोष ने 1929 ई. में की थी।
धौलीपुरी (ओडिशा)ब्राह्मीखोज 1837 ई. में किटो ने
जौगढ़गंजाम, आंध्र प्रदेशब्राह्मीवॉल्टर इलियट ने 1850 ई. में खोजा था।
सोपाराथाणे (महाराष्ट्र)ब्राह्मीबीएल इंद्रजी ने 1881-82 ई. खोजा
  1. पहला शिलालेख – पशुबलि व सामाजिक उत्सवों-समारोहों पर प्रतिबंध, सभी मानव मेरी संतान की तरह हैं।
  2. दूसरा शिलालेख – पशु चिकित्सा, मानव चिकित्सा एवं लोक कल्याणकारी कार्य, चोल पांड्य, सत्तियपुत्त एवं केरलपुत्त (चेर) की चर्चा।
  3. तीसरा शिलालेख – माता-पिता का सम्मान करना, राजकीय अधिकारियों (युक्त, रज्जुक व प्रादेशिक) को प्रत्येक पाँचवें वर्ष दौरा करने का आदेश।
  4. चौथा शिलालेख – धम्म की नीति के द्वारा अनैतिकता तथा ब्राह्मणों एवं श्रवणों के प्रति निरादर की प्रवृत्ति, हिंसा आदि को रोका जा सके। धर्माचरण के भेरीनाद द्वारा धम्म का उद्घोष।
  5. पाँचवाँ शिलालेख – इसमें प्रथम बार अशोक के शासन के 13वें वर्ष में धम्म महामात्रों की नियुक्ति की चर्चा। मौर्य कालीन समाज व वर्णव्यवस्था की जानकारी।
  6. छठाँ शिलालेख – धम्म महामत्रों के लिए आदेश लिखे हैं। अशोक ने इसमें कहा है कि राज्य कर्मचारी-अधिकारी उससे किसी भी समय राज्य के कार्य के संबंध में मिल सकते हैं।  आत्मनियंत्रण की शिक्षा दी गई है, आम जनता किसी भी समय राजा से मिल सकती है।
  7. सातवाँ शिलालेख – सभी संप्रदायों के लिए सहिष्णुता की बात।
  8. आठवाँ शिलालेख– अशोक की धर्मयात्राओं की जानकारी, सार्वजनिक निर्माण कार्यों का वर्णन है। बोधगया के भ्रमण का उल्लेख।
  9. नवाँ शिलालेख – धम्म समारोह की जानकारी, नैतिकता पर बल दिया गया है तथा इसमें ‘धम्म मंगल’ को श्रेष्ठ बताया गया।
  10. दसवाँ शिलालेख – धम्म नीति की श्रेष्ठता पर बल दिया गया है, राजा और उच्च अधिकारियों को आदेश है कि हर क्षण प्रजा के हित में सोचें।
  11. ग्यारहवाँ शिलालेख – धम्म दान को श्रेष्ठ बताया।
  12. बारहवाँ शिलालेख – सम्प्रदायों के मध्य सहिष्णुता रखने का निर्देश है। सभी सम्प्रदायों को सम्मान देने की बात है। स्त्री महामात्र की चर्चा तथा इसमें बृजभूमिक व धम्म महामात्र का भी उल्लेख आता है।
  13. तेरहवाँ शिलालेख – इसमें युद्ध के स्थान पर धम्म विजय का आह्वान है, कलिंग युद्ध की जानकारी, अपराध करने वाली आटविक जातियों का उल्लेख तथा पड़ोसी राज्यों का वर्णन।
  14. चौदहवाँ शिलालेख – अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है यह दो पृथक् शिलालेख हैं जो कलिंग में लगाए गए हैं, इसमें कलिंग की समस्त जनता को पुत्र-पुत्रियों के समान कहा है।
अशोक के लघु शिलालेख :-
  1. ब्रह्मगिरि – यह कर्नाटक के चित्तलदुर्ग जिले में स्थित है।
  2. भाब्रु (बैराठ) – यह राजस्थान के जयपुर जिले में है। इसकी खोज कैप्टन बर्ट के द्वारा 1840 ई. में की गई। यह शिलालेख अशोक के बौद्ध होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
  3. सहसाराम – यह बिहार में है, इसे वेगलर ने खोजा है।
  4. गुजर्रा – मध्य प्रदेश के दतिया जिले में है, 1954 ई. में बहादुर चन्द्र दावड़ा ने खोजा।
  5. रूपनाथ – मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में है, 1872 ई. में कर्नल एलिस के भारतीय सेवक ने इसकी खोज की।
  6. मास्की – कर्नाटक के रायचूर जिले में है। 1915 ई. में बीडन ने खोजा।
  7. एर्रगुड़ी – आन्ध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित है।
  8. राजुल मंडगिरि – आन्ध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित है।
  9. अहरौरा – उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में है। 1961 ई. में प्रो. शर्मा ने खोजा।
  10.  गोविमठ – मैसूर के कोपबल नामक स्थान के समीप स्थित है, 1931 ई. में बी.एन.शास्त्री ने खोजा।
  11. जटिंगरामेश्वर – कर्नाटक के ब्रह्मगिरि के तीन मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है।
  12. सिद्धपुर – ब्रह्मगिरि के एक मील पश्चिम में स्थित है।
  13. पालकिगुण्डु – गोविमठ से चार मील की दूरी पर स्थित है, 1931 ई. में बी.एन.शास्त्री ने खोजा।
  14. सारोमारो – शहडोल, मध्य प्रदेश में है।
  15. उडेगोलम – बेलारी कर्नाटक में है।

स्तम्भ लेख

  • स्तम्भ लेख की संख्या 7 है जो 6 अलग-अलग स्थानों से मिले हैं।
  • अशोक के 7 स्तंभलेख टोपरा (दिल्ली), मेरठ, इलाहाबाद, रामपूरवा, लौरिया अरेराज (चंपारण), लौरिया नन्दनगढ़ (चंपारण) में पाए गए है। 
  • लघु स्तंभ लेख सांची, सारनाथ, रुम्मिनदेई, कौशाम्बी और निगाली सागर में पाए गए है|
स्तम्भलेख: Iअशोक के राज्याभिषेक के 26 वर्ष बाद लिखित।धम्म के पालन, सम्मान, उत्साह और आत्मनिरीक्षण द्वारा आनंद प्राप्ति का उल्लेख।
स्तम्भलेख: IIधम्म की विशेषताओं यथा-शुभ, करुणा, उदारता, सत्यता, पुण्यवर्धक, पापनाशक आदि का उल्लेख।
स्तम्भलेख: IIIमनुष्य को आत्माचिंतन करने, दुर्गुणों का निदान करने और  सद्गुणों को अपनाने की शिक्षा का उल्लेख।
स्तम्भलेख:- IVरज्जुकों के कर्तव्यों का उल्लेख।
स्तम्भलेख:- Vकुछ पशु-पक्षियों का वध निषिद्ध एवं 25 कैदियों को मुक्त करने का वर्णन।
स्तम्भलेख:- VIप्रजा के कल्याण एवं लाभ के लिए धम्मलिपि लिखवाने एवं धम्म का वर्णन।
स्तम्भलेख:- VIIअशोक द्वारा धम्म के अनुपालन में किए गए कार्यों का वर्णन।

अशोक के सात स्तम्भ-लेख

  1. लौरिया नन्दनगढ़ – यह बिहार के चम्पारन जिले में स्थित है इस स्तंभ पर मोर का चित्र बना हुआ है।
  2. लौरिया अरराज – यह बिहार के चम्पारन जिले में स्थित है।
  3. दिल्ली-टोपरा – यह सर्वाधिक प्रसिद्ध स्तम्भ लेख है। यह उत्तर प्रदेश सहारनपुर के खिज्राबाद जिले में टोपरा नामक जगह पर दबा हुआ था। फिरोजशाह तुगलक ने टोपरा से यह अशोक स्तंभ दिल्ली मंगवाए थे। ये स्तम्भ फिरोजशाह की लाट, भीमसेन की लाट, दिल्ली शिवालिक लाट, सुनहरी लाट आदि नामों से भी जाने जाते हैं। इस पर अशोक के सातों अभिलेख उत्कीर्ण हैं, जबकि शेष स्तंभों पर केवल 6 लेख ही उत्कीर्ण मिलते हैं। इस स्तंभ लिपि को सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने पढ़कर अंग्रेजी में अनुवाद किया।
  4. दिल्ली-मेरठ – यह पहले मेरठ में स्थित था, बाद में फिरोजशाह तुगलक इस स्तंभ को दिल्ली लाए।
  5. रामपुरवा – यह बिहार के चम्पारन में स्थित है।
  6. प्रयाग – यह पहले कौशाम्बी में था, बाद में अकबर ने इलाहाबाद के किले में रखवाया। अशोक की रानी करुवाकी द्वारा दान दिए जाने का उल्लेख है, इसे रानी का अभिलेख भी कहा गया है।
अन्य स्तंभलेख
  • रुम्मिनदेई स्तंभलेख – इस स्तंभलेख में अशोक की लुम्बिनी यात्रा और लुम्बिनी के लोगों को कर में दी गई छूट का वर्णन। उसने कर की दर को घटाकर 1/8 कर दिया।
  • अशोक का सर्वाधिक छोटा अभिलेख है, विषय आर्थिक है।निगालीसागर स्तंभलेख – यह स्तंभलेख मूलतः “कपिलवस्तु” में स्थित था। इस स्तंभलेख में कहा गया है कि अशोक ने “कनकमुनि बुद्ध” के स्तूप की ऊँचाई को बढ़ाकर दुगुना कर दिया था।

लघु स्तम्भ लेख :

  • लघु स्तम्भ लेख पर अशोक की “राजकीय घोषणाओं” का उल्लेख है। साँची (रायसेन, मध्य प्रदेश), कौशांबी (इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश), सारनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश), रुम्मिनदेई (नेपाल), निग्लीवा (निगाली सागर, नेपाल) तथा इलाहाबाद से लघु स्तम्भ लेख मिले हैं।
  • गुहा लेख में धार्मिक सहिष्णुता का उत्कीर्णन होता है। 

अशोक के बाद, जालोक, कुणाल [दिव्यावदान में उसे ‘धर्मविवर्धान’ कहा गया है], दशरथ, सम्प्रति, शालिशूक, देववर्मन आदि शासकों ने शासन किया। बृहद्रथ अन्तिम मौर्य सम्राट था। बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र ने 184 ई0 पू० में उसकी हत्या कर एक नये शुंग साम्राज्य की नींव रखी

मौर्य साम्राज्य

अशोक के उत्तराधिकारी

शासकविवरण
जालोक / कुणालअशोक का पुत्र
दशरथकुणाल का पुत्र, अशोक के बाद शासन
सम्प्रतिजैन धर्म का प्रचारक
शालिशूकदुश्चरित्र (गर्गी संहिता)
देववर्मनउत्तराधिकारी
बृहद्रथअंतिम मौर्य शासक; सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई.पू. में हत्या की

अशोक का महत्व

  • धर्म, राजनीति व समाज का संगम।
  • धर्म पर आधारित शासन का आदर्श मॉडल।
  • अंतरराष्ट्रीय शान्ति व सद्भाव का अग्रदूत।
  • विश्व कल्याणकारी शासन का प्रवर्तक।
  • भारत के एकीकरण का प्रथम यथार्थ प्रयास।

मौर्य प्रशासन (Mauryan Administration)

मुख्य विशेषताएँ
  • शासन प्रणाली: केन्द्रीय राजतंत्रात्मक प्रशासन।
  • भारत की प्रथम राजनीतिक एकता मौर्यों के अधीन स्थापित।
  • राजा की आज्ञा = कानून
  • दैवी उत्पत्ति सिद्धांत नहीं, राजा लोकहित के लिए उत्तरदायी।
  • लोककल्याणकारी राज्य की संकल्पना साकार हुई।
  • अर्थव्यवस्था पर राज्य नियंत्रण सर्वाधिक था।

“प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है।” – कौटिल्य (अर्थशास्त्र)

  राजा (King)

  • सर्वोच्च सत्ता का धारक।
  • कानून, प्रशासन व सेना का प्रधान।
  • लोककल्याण का दायित्व – “राज्य प्रजावत्सल होना चाहिए।”
  • राजा की सहायता हेतु विस्तृत नौकरशाही व मंत्री परिषद।

सप्तांग सिद्धांत (कौटिल्य के अनुसार राज्य के 7 अंग)

  1. राजा
  2. अमात्य (मंत्री वर्ग)
  3. राष्ट्र / जनपद
  4. दुर्ग
  5. कोष (राजकोष)
  6. बल (सेना / दण्ड)
  7. मित्र

मंत्री परिषद (Council of Ministers)

  • कौटिल्य: “राज्य एक पहिए पर नहीं चल सकता।”
  • मंत्रिपरिषद वैधानिक आवश्यकता थी।
  • अशोक के अभिलेखों में परिषा कहा गया है।

वेतन व्यवस्था

श्रेणीपदवार्षिक वेतन (पण में)
प्रथममन्त्रिण (मुख्य मंत्री आदि)48,000 पण
द्वितीयअमात्य12,000 पण
तृतीयसेवक / अंगरक्षक60 पण (न्यूनतम)

अर्थशास्त्र = पहली पुस्तक जिसमें कर्मचारियों के नकद वेतन का उल्लेख है।

केन्द्रीय प्रशासन (Central Administration)

अठारह तीर्थ – कौटिल्य के अनुसार प्रमुख पदाधिकारी

क्रमपदनामकार्य
1मन्त्रीराज्य नीतियों का निर्माण
2पुरोहितधार्मिक कार्य
3समाहर्ताराजस्व संकलन
4सन्निधाताआय-व्यय का लेखा-जोखा
5सेनापतिसेना प्रमुख
6युवराजउत्तराधिकारी
7प्रदेष्टाअपराध न्यायाधीश
8नायकसेना संचालन
9कर्मान्तिकउद्योग व धन्धे निरीक्षण
10व्यावहारिकदीवानी न्यायाधीश
11मंत्रिपरिषदाध्यक्षप्रशासनिक समन्वयक
12दण्डपालदण्ड व अनुशासन अधिकारी
13अन्तपालसीमावर्ती दुर्ग सुरक्षा
14दुर्गपालदुर्ग प्रबंधन
15नागरकनगर प्रमुख अधिकारी
16प्रशस्त्रिराजकीय दस्तावेज लेखन व जेल प्रबंधन
17दौवारिकद्वारपाल व राजप्रासाद अधिकारी
18आटविकवन विभाग प्रमुख

अशोक के अभिलेखों में पुरोहित का उल्लेख नहीं (चन्द्रगुप्त काल में महत्त्वपूर्ण)।

अध्यक्ष प्रणाली (26 Adhyakshas – Executive Heads) यूनानी स्रोत इन्हें Magistrates कहते हैं।

क्रमअध्यक्षकार्य
1मुद्राध्यक्षमुद्रा निर्माण, टकसाल प्रमुख
2रूपदर्शकमुद्रा परीक्षण अधिकारी
3पण्याध्यक्ष व्यापार व वाणिज्य अधिकारी
4कुप्याध्यक्षवन उत्पाद निरीक्षक
5पोतवाध्यक्ष मापन प्रणाली नियंत्रण
6शुल्काध्यक्ष चुंगी अधिकारी
7सूत्राध्यक्ष वस्त्र निर्माण व बुनाई नियंत्रण
8सूत्रधारशस्त्र रखरखाव अधिकारी
9आयुधागाराध्यक्षशस्त्रागार प्रमुख
10सीताध्यक्ष कृषि विभाग अध्यक्ष
11उपप्रधान / सूर्यमुखियाआबकारी अधिकारी
12आकराध्यक्षखान विभाग प्रमुख
13विविताध्यक्षचारागाह विभाग प्रमुख
14नवाध्यक्षनौसेना प्रमुख
15गणिकाध्यक्षवेश्याओं की देखरेख
16संस्थाध्यक्षव्यापारिक मार्ग निरीक्षण
17लवणाध्यक्षनमक अधिकारी
18मुद्राध्यक्षपासपोर्ट व दस्तावेज अधिकारी
19कोष्ठागाराध्यक्षगोदाम प्रमुख
20स्वर्णाध्यक्षस्वर्ण अधिकारी
21अश्वाध्यक्ष / गौध्यक्षपशुधन अधिकारी
22हस्त्याध्यक्षहाथी विभाग प्रमुख
23बन्धनागाराध्यक्षजेल अधिकारी
24देवताध्यक्षमंदिर व धार्मिक विभाग
25लोहाध्यक्ष / अक्षशालाध्यक्षधातु उद्योग प्रमुख
26पत्तनाध्यक्षबंदरगाह अधिकारी
द्यूताध्यक्षजुआ नियंत्रण व समय संकेतक अधिकारी

गुप्तचर विभाग का प्रमुख महामात्यापसर्प कहलाता था। जेल निरीक्षक प्रशस्त्रि

 प्रशासनिक विभाजन

स्तरइकाईविवरण / गाँवों की संख्या
1️साम्राज्यसंपूर्ण राज्य
2️कोष्ठ / प्रान्तप्रमुख प्रशासनिक इकाई
3️मंडलकमिश्नर क्षेत्र
4️आहार / विषयजिला
5️द्रोणमुख800 गाँवों का समूह
6️खार्वटिक400 गाँवों का समूह
7️संग्रहण200 गाँवों का समूह
8️ग्राम10 गाँवों का समूह (सबसे छोटी इकाई)

प्रान्तीय प्रशासन

  • पाटलिपुत्र सम्पूर्ण मौर्य साम्राज्य की केन्द्रीय राजधानी थी।
  • यूनानी लेखकों ने पाटलिपुत्र को पोलिबोथा कहा है। 
  • मौर्य साम्राज्य प्रान्तों में विभाजित था।
  •  चन्द्रगुप्त मौर्य के समय चार तथा अशोक के समय कलिंग विजय के साथ पाँच प्रान्त हो गये। प्रान्तों को चक्र कहा जाता था।
प्रान्त
  1. उत्तरापथ (पश्चिमोत्तर)
  2. दक्षिणापथ
  3. अवन्ति (पश्चिम प्रान्त)
  4. मध्यदेश (प्राची-पूर्वी प्रदेश)
  5.  कलिंग
  • चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्यकुस से प्राप्त चार प्रान्तों को उत्तरापथ प्रान्त में शामिल किया।
  • प्रान्तों का शासन राजवंश के किसी निकट संबंधी/राजकुमार द्वारा चलाया जाता था।
  • अशोक ने तक्षशिला, उज्जैन एवं तोसाली में कुमार नियुक्त किये। ये प्रान्तपति थे तथा युवराज होते थे।
  • . प्रान्तों के अन्तर्गत छोटे शासन केन्द्र भी थे, जिनमें कुमार के अधीन महामात्य शासन करते थे।
  • प्रान्तों का विभाजन मण्डल में हुआ था। मण्डल का प्रमुख प्रादेशिक था, जिसे अर्थशास्त्र का प्रदेष्टा कहा गया है। प्रादेशिक/प्रदेष्टा समाहर्ता के अधीन कार्य करता था एवं स्थानिक एवं गोप के कार्यों की जाँच करता था।
  • मण्डलों की स्थानीय प्रशासनिक केन्द्र होते थे जो प्रान्तीय राजधानियों से भिन्न थे। जैसे-
    • संपा मंडल का केंद्रीय केंद्र- तोसाली
    • इशिला मंडल का केन्द्र सुवर्णगिरि (ब्रह्मगिरि, मास्की एवं सिद्धपुर अभिलेख में इसिला का उल्लेख है)।
    • गिरनार मण्डल का प्रशासनिक केन्द्र सौराष्ट्र 
    • कौशाम्बी मण्डल का प्रशासनिक केन्द्र पाटलिपुत्र
  • नगर का जनगणना अधिकारी एवं प्रशासक नागरक कहलाता था।

जिला प्रशासन (District Administration)

मुख्य अधिकारी

  • विषयपति / आहारपति – प्रमुख जिला अधिकारी (मेगस्थनीज: एग्रोनोमोई)
  • जिले में अधिकारी: युक्त, राजुक, प्रादेशिक
अधिकारीकार्य
प्रादेशिक वर्तमान संभागीय आयुक्त समान, न्यायिक व कर जाँच अधिकारी
युक्त केन्द्रीय व स्थानीय प्रशासन के बीच कड़ी, लेखाकार व कर वसूलने वाला
राजुक ग्रामीण प्रशासन, कर-संग्रह, न्यायिक अधिकार; आधुनिक कलेक्टर समान
  • अशोक के चौथे बृहद स्तंभलेख में उल्लेख — राज्याभिषेक के 27वें वर्ष में राजुकों को न्यायिक व दण्डात्मक अधिकार दिए गए।

मध्य व स्थानीय प्रशासन

स्तरइकाई / अधिकारीविवरण
मध्य स्तरकोटिया / द्रोणमुख / खार्वटिक / संग्रहणग्रामों के समूह
संग्रहण प्रमुखगोप10 गाँवों का प्रमुख, लेखपाल, जनगणना अधिकारी
स्थानिकमध्यस्तर कर अधिकारी, गोप के ऊपर, प्रादेशिक के अधीन
ग्राम प्रमुखग्रामिकग्राम प्रशासन का मुखिया
युक्तलेखा व राजस्व अधिकारी; भ्रष्टाचार प्रवृत्त – “मछली उदाहरण” (अर्थशास्त्र)

प्रशासनिक पदक्रम 

  • गोप → स्थानिक → युक्त → राजुक → प्रादेशिक → विषयपति → समाहर्ता → महामात्य / महामात्र → प्रान्तपति → राजा
अन्य प्रशासनिक अधिकारी
  • महामात्र / महामात्य – उच्चाधिकारी; सीधे राजा से आदेश प्राप्त (प्रान्तपति की जानकारी के बिना)।
  • अन्तपाल – सीमावर्ती अर्धस्वायत्त राजाओं पर नियंत्रण व दुर्गों की देखरेख।
  • रक्षिण – पुलिस अधिकारी।
  • प्रतिवेदक – राजा को सूचना देने वाला।

नगर प्रशासन (Urban Administration)

  • कौटिल्य ने नगर प्रशासन का उल्लेख नहीं किया।
  • मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र का प्रशासन –
    30 सदस्यों की परिषद, 6 समितियों में विभाजित, प्रत्येक में 5 सदस्य।
समिति      कार्य
1उद्योग व शिल्प निरीक्षण
2विदेशियों की देखरेख
3जन्म-मरण पंजीकरण / जनगणना
4व्यापार व वाणिज्य नियंत्रण
5निर्मित वस्तुओं की बिक्री जाँच
6बिक्रीकर (1/10 भाग) वसूली
  • नगर अधिकारी –  ऐस्टोनोमोई  (मेगस्थनीज)
  • जिला निर्माण कार्य अधिकारी – एग्रोनोमोई

न्याय प्रशासन (Judicial System)

  • राजा – सर्वोच्च व अंतिम न्यायाधीश।

न्याय के दो प्रकार (अर्थशास्त्र)

  1. धर्मस्थीय न्यायालय – दीवानी मामले; प्रमुख: धर्मस्थ / व्यावहारिक
  2. कण्टकशोधन न्यायालय – फौजदारी मामले; 
    • फौजदारी मामलों के न्यायाधीश को प्रदेष्टा कहा जाता था।
    • जनपद के न्यायाधीश को राजुक कहा जाता था।
    • न्याय व्यवस्था के ये चार प्रमुख स्त्रोत थे, जिन्हें चतुष्पाद कानून कहा गया। इन चारों में कौटिल्य ने राजशासन को सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोच्च माना है।
    • चोरी एवं लूट के मामलों को साहस कहा जाता था। इन्हें धर्मस्थीय न्यायालयों में पेश किया जाता था।

गुप्तचर व्यवस्था (Intelligence System)

  • प्रमुख: महामात्यापसर्प
  • गुप्तचर = गूढ़पुरुष (Secret agents)
  • दो प्रकार:
    • संस्था – एक स्थान पर रहकर कार्य करने वाले।
    • संचारा – भ्रमणशील गुप्तचर।

संस्था गुप्तचर (5 प्रकार)

      प्रकार        वेश / कार्य
1. कापटिकविद्यार्थी वेश, रहस्य ज्ञाता
2. उदास्थितसंन्यासी वेश

संचारा गुप्तचर (4 प्रकार)

प्रकारविवरण
1. सत्रीज्योतिष, इन्द्रजाल, नृत्यकला में निपुण
2. तीक्ष्णप्राणों की परवाह न कर कार्य करने वाला
3. सरदनिर्दयी, स्वजनविहीन, क्रूर
4.परिव्राजिकासंन्यासिनी / वेश्या रूपी महिला गुप्तचर
  • राजा के पुरुष गुप्तचर – सन्ती, तिष्ण, सरद
  • विदेशी गुप्तचर – उभयवेतन
  • महिला अंगरक्षिका – समारानुरांगिनी (मेगस्थनीज व स्ट्रेबो द्वारा वर्णित)

सैन्य प्रशासन (Military Administration)

  • सेना: पैदल, अश्व, रथ, हाथी – चार भाग।
  • सैनिक छावनी: कटक।
  • प्रमुख अधिकारी: अन्तपाल (सीमांत दुर्ग व सेना प्रशासन)।
  • नवाध्यक्ष – नौसेना प्रमुख।

 मेगस्थनीज के अनुसार – 6 समितियाँ (हर समिति में 5 सदस्य):     

  • ये 6 समितियां निम्न है:
    1. पैदल सेना
    2. घुड़सवार सेना
    3. रथ सेना
    4. हाथी सेना
    5. नौसेना
    6. रसद व सामग्री विभाग
  • जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना को डाकुओं का गिरोह कहा है।
  • अन्तपाल नामक अधिकारी सेना का प्रशासन देखता था। इसके अतिरिक्त वह सीमान्त क्षेत्रों में स्थित दुर्गों की देखभाल भी करता था।
  • नौ-सेना का प्रधान नवाध्यक्ष कहलाता था।
  • सर्वप्रथम ग्रुनवेडेल ने यह बताया कि मौर्यों का वंश चिह्न मोर था।

मौर्यकालीन समाज

समाज की रचना

  • मौर्य समाज चार वर्णों में विभक्त था — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
  • कौटिल्य ने वर्णाश्रम को सामाजिक संगठन का आधार बताया।
  • अर्थशास्त्र में शूद्रों को मलेच्छों से पृथक आर्य शूद्र कहा गया है।
  • शूद्रों को कृषक बताया गया है।

मेगस्थनीज की 7 जातियाँ

  1. दार्शनिक
  2. कृषक
  3. शिकारी व पशुपालक
  4. व्यापारी व शिल्पी
  5. सैनिक
  6. निरीक्षक/गुप्तचर
  7. मंत्री/सलाहकार
दार्शनिक दो प्रकार के —
  • ब्रोकेमेन (गृहस्थी)
  • सारामेन (संन्यासी)
  • मेगस्थनीज के अनुसार भारतीयों को लेखन कला का ज्ञान नहीं था।
  • भारतीय शिव को डायोनिसियस और विष्णु को हेराक्लीज कहा गया।

 स्त्रियों की स्थिति

  • विवाह विच्छेद (मोक्ष), पुनर्विवाह और नियोग की अनुमति थी।
  • असूर्यपश्या — वे स्त्रियाँ जो सूर्य का दर्शन नहीं करतीं (घरेलू स्त्रियाँ)।
  • छंदवासिनी और अढया — विधवाएँ जो पुनर्विवाह नहीं करतीं।
  • रूपाजीवा — वेश्याएँ, जिनका निरीक्षण गणिकाध्यक्ष करता था।
  • रंगोपजीवनी — रंगमंच पर नाचने वाली महिलाएँ।

दास प्रथा

  • कौटिल्य ने केवल अनार्य (म्लेच्छ, युद्धबंदी) को दास बनाने की अनुमति दी।
  • आर्य दास नहीं बन सकते।
  • ऋण न चुकाने पर बने दास — आहितक कहलाते थे।
  • मेगस्थनीज व स्ट्रैबो के अनुसार — भारत में दास प्रथा नहीं थी (क्योंकि स्थिति मानवीय थी)।
  • दास संपत्ति रख सकते थे।

मनोरंजन

  • प्रमुख सामूहिक कार्यक्रम — प्रवहण, विहार, यात्रा, समाज।
  • प्रेक्षागृह हेतु लाइसेंस अनिवार्य था।
  • प्रेक्षावेतन के रूप में 5 पण कर देना पड़ता था।
मनोरंजन वर्ग :
  1. प्लवक — रस्सी पर नाचने वाले
  2. कुहक — जादूगर
  3. रंगोपजीवी — नट
  4. कुशीलव — तमाशा दिखाने वाले
  5. सौभिक — मदारी

मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था

आधार

  • कृषि, पशुपालन व व्यापार पर आधारित — तीनों मिलकर वार्ता कहलाते थे।
  • कौटिल्य ने कृषि को सर्वोत्तम उद्योग कहा।
  • चावल सर्वोत्तम फसल, गन्ना निकृष्टतम।
  • वर्ष में तीन फसलें।
  • राजकोषीय वर्ष — आषाढ़ (जुलाई) से आरंभ।

भूमि

  • भूस्वामी – क्षेत्रक, कृषक – उपवास।
  • भूमि राजा की संपत्ति मानी गई।
  • करमुक्त गाँव – परिहारिका, सैनिक आपूर्ति वाले – आयुधिका।

भूमि कर

  • सिंचित भूमि पर उपज का ½, असिंचित पर 1/3 भाग कर के रूप में।
  • प्रमुख कर – भाग (1/6), बलि, हिरण्य, प्रणय (आपातकालीन), विष्टि (बेगार)
  • रज्जुग्राहक — भूमि मापकर कर निर्धारण करने वाला अधिकारी।

राजकीय कृषि विभाग

  • अध्यक्ष — सीताध्यक्ष
  • राजकीय भूमि की उपज — सीता, निजी भूमि की — भाग।
  • अकाल में जनता के हित हेतु उपायों का उल्लेख अर्थशास्त्र में है।

विभिन्न कर :-

  1. भाग – कृषकों द्वारा उत्पादित कृषि उत्पादों पर कर
  2. सीता – सरकारी एवं वन्य भूमि से आय पर कर 
  3. प्रणय – आपातकालीन कर
  4. बलि – एक प्रकार का भू-राजस्व
  5. हिरण्य – नकद कर
  6. सेतुबन्ध – राज्य की ओर से सिंचाई के प्रबन्ध हेतु कर
  7. विष्टि – बेगार (निःशुल्क श्रम)

अन्य कर व आय के स्रोत

  • पंकोदसन्निरोधे सड़क पर कीचड़ फैलाने पर
  • वर्तनीसड़क कर
  • तरदेयपुल पार करने पर
  • सेतुफल-सब्जी कर
  • पिण्डकरसामूहिक कर
  • आय के 7 साधन — दुर्ग, राष्ट्र, खनिज, सेतु, वन, ब्रज, वणिकपथ।
  • आयात कर – प्रवेश्य (20%)
  • निर्यात कर – निष्क्राम्य
 भूमि व सिंचाई
  • भूमि के प्रकार — अदेवमातृक, देवमातृक, कृष्ट, अकृष्ट, स्थल आदि।
  • सुदर्शन झीलपुष्यगुप्त वैश्य द्वारा निर्मित (सौराष्ट्र), मरम्मत अशोक के यवनराज तुषास्प द्वारा।
  • सहोदय सेतु (प्राकृतिक सिंचाई), आहार्योदक सेतु (कृत्रिम)।

 मौर्यकालीन सिक्के

  • पण – चाँदी का सिक्का (¾ तौला)।
  • माषक – ताँबे का सिक्का।
  • काकणि – ताँबे का छोटा सिक्का।
  • पंचमार्क (आहत) सिक्के प्रचलित।
  • प्रतीक – वेदिका से घिरा वृक्ष।
  • टकसाल अधिकारी – लक्षणाध्यक्ष; मुद्रा परीक्षक – रूपदर्शक
  • सिक्के जारी करने हेतु 13.5% ब्याज देना पड़ता था।

व्यापार व उद्योग

  • थल व जल दोनों मार्गों से व्यापार।
  • व्यापारी संघ – श्रेणी, प्रमुख – श्रेष्ठि
  • श्रेणी न्यायालय का प्रधान – महाश्रेष्ठि।
  • आंतरिक केंद्र — तक्षशिला, उज्जैन, काशी, पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, तोसाली।
  • प्रमुख बंदरगाह — भृगुकच्छ, सोपारा, ताम्रलिप्ति, बारबेरिकम (सिंध)।
  •  निर्यात: हाथीदांत, मोती, नील, वस्त्र
  • आयात: सोना, कीमती वस्त्र, शराब
  • देशी वस्तुओं पर 4%, आयातित पर 10% बिक्रीकर।
  • वार्षिक ब्याज दर — सामान्य 15%, समुद्री व्यापार पर सर्वाधिक।
  • हाथीदांत व्यापार — काशी प्रमुख केंद्र।
  • वस्त्र उद्योग विकसित —
    • काशी, बंग, पुण्ड्र, कलिंग, मालवासूती वस्त्र
    • काशी, पुण्ड्ररेशमी वस्त्र
    • बंगमलमल
    • चीनीपट्टचीन का रेशम
    • दुकुलपेड़ की छाल का वस्त्र
    • क्षौम रेशमी वस्त्

उद्योग

  • प्रमुख — सूत कातना व बुनाई।
  • लौह उद्योग विकसित (श्वेत लोहे की तलवार का उल्लेख कर्टियस ने किया)।
  • राज्य का जहाज निर्माण पर एकाधिकार।

मौर्यकालीन शब्द और उनके अर्थ

शब्दअर्थ
सीताराजकीय भूमि तथा इस भूमि से प्राप्त आय
बलिएक प्रकार का धार्मिक कर या चढ़ावा
क्षेत्रकभूमि का मालिक
उपवासकाश्तकार
रूपजीवावेश्यावृत्ति कर जीविकायापन करने वाली स्त्रियाँ
जेठठ्ठक शिल्पी संघ का मुखिया
श्रेष्ठी व्यापरिक संघ का मुखिया
गहपतिभू-स्वामी
सेतुफल, फूल, सब्जियों पर लिया जाने वाला कर
विष्टिबेगार
भागभूमिकर (किसानों की निजी भूमि पर कर)
अमात्यउच्च प्रशासनिक अधिकारियों का वर्ग
रज्जुभूमि माप के समय लिया जाने वाला कर
उद्रंगसिंचाई कर
प्रणयआपातकालीन कर
सेनाभक्तमसेना कर, जो सेना के प्रयाण के समय तेल व चावल के रूप में लिया जाता था।
हिरण्यनकद कर, जो अनाज के रूप में नहीं लिया जाता था
राष्ट्रअन्य साधनों से प्राप्त राजस्व
पौरराजधानी का शासक
अक्षपटलाध्यक्षमहालेखा पाल
महामात्यास्पर्पगुप्तचर विभाग का अध्यक्ष
वार्ता कृषि, पशुपालन एवं व्यापार का सम्मिलित रूप
पथिकरसमाहर्ता द्वारा वसूल किया गया अतिरिक्त कर
विवीत पशुओं की रक्षा के लिए वसूला गया कर
रक्षितपुलिस (अर्थशास्त्र के अनुसार)
कौष्ठेयकसरकारी जलाशय से सिंचित भूमि से लिया जाने वाला कर
सार्थवाह व्यापारिक काफिला
परिहीनकसरकारी भूमि पर पशुओं द्वारा हानि पहुँचाने पर लिया जाने वाला कर
पिण्डकर पूरे गाँव से वर्ष में एक बार वसूला जाने वाला कर
औपशनिक विशेष अवसरों पर राजा को दी जाने वाली भेंट
पार्श्वअधिक लाभ होने पर व्यापारियों से लिया जाने वाला कर
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