मौर्य साम्राज्य

मौर्य साम्राज्य प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। यह साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप का पहला व्यापक रूप से एकीकृत राजनीतिक राज्य माना जाता है। मौर्य शासकों ने प्रशासन, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देकर एक सुदृढ़ और संगठित शासन प्रणाली स्थापित की।

  • मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ भारतीय इतिहास ठोस आधार पर अवतरित हुआ।
  • इसके विषय में हमें साहित्यिक, विदेशी, और पुरातात्त्विक स्रोतों से जानकारी मिलती है

स्त्रोत 

  • कौटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, सोमदेव की कथा सरितसागर, क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी, दीपवंश, महावंश टीका, भद्रबाहु के कल्पसूत्र, स्ट्रेबो, प्लूटार्क, जस्टिन आदि यूनानी यात्री, फाह्यान, ट्रेनसांग, इत्सिंग आदि चीनी यात्री, रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख एवं अशोक के अभिलेख जो हमें पुरातात्विक खुदाई के दौरान मिले हैं, आदि मुख्य स्रोत हैं।
मौर्य साम्राज्य

मौर्यों की उत्पत्ति

  • ब्राह्मण परम्परा के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की माता शूद्र जाति की मुरा नामक स्त्री थी। 
  • बौद्ध परम्परा के अनुसार मौर्य ‘क्षत्रिय कुल’ से संबंधित थे।
  • महापरिनिब्बानसुत्त के अनुसार मौर्य पिपलीवन के शासक तथा क्षत्रिय वंश से संबंधित थे।

चन्द्रगुप्त मौर्य (322–298 ई.पू.)

“भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट, मुक्तिदाता एवं राष्ट्रीय एकता का संस्थापक”

मौर्य साम्राज्य के संस्थापक।

यूनानी ग्रंथों में नाम –

  • सेण्ड्रोकोट्स / एण्ड्रोकोट्स (स्ट्रेबो, मेगस्थनीज, एरियन, जस्टिन)
  • एण्ड्रोकोट्स – एपियन, प्लूटार्क
  • सेण्ड्रोकोप्टस – फिलार्कस
  • विलियम जोन्स ने सेण्ड्रोकोट्स = चन्द्रगुप्त मौर्य और पालिब्रोथा = पाटलीपुत्र सिद्ध किया।
  • गुरु – चाणक्य (कौटिल्य)
  • अंतिम नंद राजा धनानंद को पराजित कर मौर्य वंश की स्थापना।
  • इसका वर्णन विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में मिलता है।

राजनीतिक उपलब्धियाँ

 (1) यूनानियों को पराजित करना
  • पंजाब व पश्चिमोत्तर से यूनानियों को खदेड़ा।
  • सिंध में फिलिप द्वितीय, पंजाब में यूडेमस सिकंदर के क्षत्रप थे।
  • प्लूटार्क: “चन्द्रगुप्त ने 6 लाख सेना लेकर सम्पूर्ण भारत पर अधिकार किया।”
  • जस्टिन: सेना को “डाकुओं की सेना” कहा, पर “भारतीयों ने दासता का जुआ उतारा।”
(2) मगध विजय
  • महाबोधिवंश: प्रथम आक्रमण मगध पर।
  • महावंश टीका वंशत्थपकासिनी: पंजाब व मगध विजय का वर्णन।
  • मिलिन्दपन्हो: युद्ध में धनानंद के अमात्य शकटार ने सहायता की।
  • धनानंद का सेनापति – भद्दशाल।
(3) सेल्यूकस निकेटर से युद्ध (305 ई.पू.)
  • यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया।
  • संधि के अनुसार –
    • सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त से किया।
    • चार प्रान्त दहेज में मिले
      • एरिया (हेरात)
      • अराकोसिया (कंधार)
      • जेड्रोसिया (बलूचिस्तान/मकरान)
      • पेरोपनिसडाई (काबुल)
    • बदले में 500 हाथी दिये।
  • विवरण – एप्पियानस, स्ट्रेबो, प्लूटार्क, मुद्राराक्षस में।
  • सेल्यूकस ने अपना राजदूत मेगस्थनीज को पाटलीपुत्र भेजा।
 (4) साम्राज्य विस्तार
  • विन्सेंट स्मिथ: “चन्द्रगुप्त ने हिन्दुकुश तक भारत की वैज्ञानिक सीमा निर्धारित की।”
  • प्रारम्भिक विजय में पर्वतक शासक से सहयोग।
  • मुद्राराक्षस: साम्राज्य “चतुःसमुद्र पर्यन्त” बताया गया।
  • अहानानूर (तमिल संगम ग्रंथ): दक्षिण में राजा मोहर पर आक्रमण, सहयोगी – कौशर व वाडुगर जातियाँ।
  • दक्षिण सीमा – मैसूर तक
  • महास्थान अभिलेख: बंगाल विजय व काकिणी मुद्रा का उल्लेख।
  • सौराष्ट्र: गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य द्वारा सुदर्शन झील निर्माण।
  • जूनागढ़ अभिलेख (रुद्रदामन): “चन्द्रगुप्त” शब्द का सबसे पुराना अभिलेखीय प्रमाण।
  • दरबार में मंत्री – जटिलक
 (5) अकाल प्रबंधन
  • शासन के अंतिम वर्षों में 12 वर्ष तक अकाल (जैन ग्रंथों से प्रमाण)।
  • महास्थान व सौहगरा अभिलेख में अनाज भंडारण और राशन प्रणाली का उल्लेख।
 (6) अंतिम समय व मृत्यु
  • अंतिम समय में जैन मुनि भद्रबाहु से दीक्षा ली।
  • श्रवणबेलगोला (मैसूर) में सल्लेखना (उपवास) द्वारा देह त्याग – 298 ई.पू.
  • हेमचन्द्र के परिशिष्टपर्व में जैन धर्म ग्रहण का उल्लेख।
  • भद्रबाहु गुफाचन्द्रगिरि पर्वत (श्रवणबेलगोला) उनसे संबद्ध।

मेगस्थनीज – इण्डिका

  • मेगस्थनीज यूनानी राजदूत था, जिसे सेल्यूकस निकेटर ने चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा।
  • वह पाटलिपुत्र में 305-298 ई.पू. के बीच उपस्थित हुआ और उसने अपने अनुभवों और प्रेक्षणों को “इण्डिका” नामक पुस्तक में संकलित किया। 
  • मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र सबसे बड़ा नगर था, जिसे उसने “पोलीब्रोथा” कहा। उसने मौर्य प्रशासन को छह समितियों द्वारा संचालित बताया, प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य होते थे। 
  • उसने चंद्रगुप्त द्वारा निर्मित “उत्तरापथ” नामक सबसे लंबी सड़क का वर्णन किया।मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात जातियों में विभाजित किया: दार्शनिक, कृषक, शिकारी/पशुपालक, व्यापारी/शिल्पी, योद्धा, निरीक्षक, और मंत्री। 
  • वह भारत में हेराक्लीज और डायनोसियस की पूजा का उल्लेख करता है।मेगस्थनीज के अनुसार राजा कर के रूप में 1/4 भाग लेता था, जबकि कौटिल्य ने 1/6 भाग बताया है।
  • मेगस्थनीज की भ्रामक बातें:-भारत में अकाल नहीं पड़ते हैं। (महास्थान व सहोगरा से प्राप्त ताम्रपत्र, अभिलेख से अकाल की जानकारी मिलती है।)भारतीय लोगों को लिखने का ज्ञान नहीं।
  • भारत में दास प्रथा नहीं है। (भारत में यूनान के समान दास प्रथा नहीं थी)बौद्ध धर्म का उल्लेख नहीं मिलता है।

बिन्दुसार (298 ई.पू. – 274 ई.पू.)

  • चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र बिन्दुसार 298 ई० पू० में साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना। 
  • यूनानी लेखक उसे ‘अमित्रोचेड्रस’ और ‘अलिट्रोकेड्स’ [स्ट्रेबो] कहते हैं, फ्लीट ने अमित्रघात अर्थात् “शत्रुओं का वध करने वाला।” उसका अन्य नाम “सिंहसेन” था। 
  • बिन्दुसार ने अपने पिता के जीते हुए क्षेत्रों को स्थिर रखा।
  • ‘दिव्यावदान’ में तक्षशिला के दो विद्रोहों का वर्णन है, जिन्हें दबाने के लिए उसने अशोक और सुसीम को भेजा।
  • उसने सुसीम को तक्षशिला और अशोक को उज्जयिनी का राज्यपाल बनाया। 
  • स्ट्रेबो के अनुसार यूनानी शासक ऐण्टियोकस प्रथम ने बिन्दुसार के दरबार में डाइमेकस नाम के राजदूत को भेजा। बिन्दुसार ने ऐण्टियोकस प्रथम से मदिरा, सूखे अंजीर एवं एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की थी। 
  • मिस्र के राजा फिलाडेल्फस (टालमी द्वितीय) ने पाटलिपुत्र में ‘डायोनिसस’ नाम के एक राजदूत को भेजा था।
  • बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।

 अशोक (273 ई.पू.–232 ई.पू.)

  • बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था। जैन ग्रंथों के अनुसार अशोक ने बिन्दुसार की इच्छा के विरुद्ध मगध के शासन पर अधिकार किया था, पुराणों में अशोक को ‘अशोकवर्धन’ तथा दीपवंश में ‘करमोली’ कहा गया है।
  • अभिलेखों में अशोक को ‘देवानामप्रिय’, ‘देवनाप्रियदर्शी’ एवं राजा के सम्बोधन से सम्बोधित किया गया है। 
  • सर्वप्रथम मस्की एवं गूर्जरा अभिलेख में ‘अशोक’ नाम मिलता है। अशोक को भाब्रु अभिलेख में “प्रियदर्शी” तथा मास्की अभिलेख में “बुद्धशाक्य” कहा गया है।
  • बिन्दुसार की मृत्यु की उपरान्त अशोक विशाल मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। करीब चार वर्ष के सत्ता संघर्ष के बाद अशोक का विधिवत् राज्याभिषेक करीब 269 ई पू में हुआ, वैसे तो अशोक 273 ईपू में ही मगध के राजसिंहासन पर बैठ चुका था। 
  • अपने राज्याभिषेक के सातवें वर्ष में अशोक ने कश्मीर एवं खोतान क्षेत्र के अनेक भागों को विजित कर मौर्य साम्राज्य में मिलाया। 
  • अशोक का साम्राज्य उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (अफगानिस्तान), दक्षिण में कर्नाटक, पश्चिम में काठियावाड़ एवं पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक था। 
  • राजतरंगिनी के अनुसार अशोक ने कश्मीर में वितस्ता नदी के किनारे ‘श्रीनगर’ नामक नगर की स्थापना की तथा नेपाल में ललितपत्तन नगर बसाया।

नोट – 

  • अशोक की रानियों में महादेवी, तिष्यरक्षिता तथा कारूवाकी का नाम आता है।
  • सिंहली परम्परा के अनुसार अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा विदिशा के श्रेष्ठी पुत्री महादेवी से उत्पन्न हुए थे।
  • अशोक के अभिलेख में उसकी एकमात्र पत्नी कारूवाकी का उल्लेख मिलता है, जो तीवर की माता थी।

सत्ता संघर्ष

  • राज्याभिषेक से पूर्व उज्जैन का गवर्नर
  • प्रधानमंत्री राधागुप्त की सहायता से सत्ता प्राप्त।
  • सिहली अनुश्रुति (महावंश): 99 भाइयों की हत्या कर सिंहासन प्राप्त (269 ई.पू.)।
  • तारानाथ: 6 भाइयों की हत्या।
  • अशोक का राज्याभिषेक – 269 ई.पू.
  • वृहद शिलालेख V – जीवित भाइयों के परिवारों का उल्लेख।

 साम्राज्य की सीमा

  • उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान तक,
  • दक्षिण में कर्नाटक तक,
  • पश्चिम में काठियावाड़ तक,
  • पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक।
  • 7वें वर्ष कश्मीर व खोतान क्षेत्र का विजय।
  • कल्हण (राजतरंगिणी) – कश्मीर में श्रीनगर की स्थापना, नेपाल में ललितपत्तन नगर बसाया।

 कलिंग युद्ध (261 ई.पू.)

  • राज्याभिषेक के 8वें वर्ष कलिंग पर आक्रमण।
  • राजधानी – तोशली, राजा – नंदराज (हाथीगुम्फा अभिलेख)।
  • युद्ध के कारण –
    • कलिंग का रणनीतिक व व्यापारिक महत्त्व (समुद्रतटीय क्षेत्र)।
    • भारत को एकसूत्र में बाँधने की नीति।
  • परिणाम –
    • 1 लाख मृत, 1.5 लाख बंदी।
    • अशोक का मन द्रवित हुआ।
    • भेरी घोष” (युद्धनीति) का त्याग कर “धम्म घोष” अपनाया।

  अशोक का धम्म

  • नैतिक व सामाजिक आचार-संहिता (राजधर्म नहीं)।
  • प्रेरणा: दीर्घ निकाय के “राहुलोवाद सुत्त” से।
  • लक्ष्य: लोककल्याण, स्वर्गप्राप्ति, अहिंसा, सत्य, दया, दान, माता-पिता सेवा।
  • धम्म श्रवण: जनता को दिया गया धर्म सन्देश।
  • प्रमुख बिंदु:
    • प्राणियों की हत्या न करना
    • वृद्धों, ब्राह्मणों, श्रमणों का सम्मान
    • दासों से अच्छा व्यवहार
    • क्रोध, ईर्ष्या, घमण्ड का नियंत्रण

धम्म प्रचारक भिक्षु

प्रचारकक्षेत्र
मज्झन्तिककश्मीर व गांधार
महारक्षितयवन देश
मज्झिम व धर्मरक्षितहिमालय क्षेत्र
महाधर्मरक्षितअपरान्तक (पश्चिम भारत)
महादेवमहाराष्ट्र
रक्षितमहिष्मंडल (मैसूर)
सोन व उत्तरबनवासी (कर्नाटक)
महेन्द्र व संघमित्रालंका (श्रीलंका)

अशोक के धम्म पर विद्वानों के मत

विद्वानमत
फ्लीटराजधर्म
स्मिथ, राधाकुमुद मुखर्जीसार्वभौम धर्म / सभी धर्मों की साझी सम्पत्ति
रमाशंकर त्रिपाठीसार्वभौम धर्म
भंडारकरउपासक बौद्ध धर्म
फादर हेरास, मेकफेलब्राह्मण धर्म
रोमिला थापरराजनीतिक एकता हेतु “अशोक का आविष्कार”
सेनार्टपूर्ण बौद्ध धर्म
नीलकंठ शास्त्रीनैतिक आचार संहिता

अशोक और बौद्ध धर्म  

  • अभिलेखों के अनुसार अशोक को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने का श्रेय उपगुप्त को जाता है।
  • भाब्रु शिलालेख में अशोक ने बौद्ध, संघ और धम्म में विश्वास व्यक्त किया है (अशोक के बौद्ध होने का प्रमाण)
  • अशोक का व्यक्तिगत धर्म बौद्ध। 
  • महावंश व दीपवंश के अनुसार अशोक ने मोगलिपुत्र तिस्स की अध्यक्षता में तृतीय बौद्ध संगीति (सभा) बुलाई और मोगलिपुत्र तिस्स की सहायता से संघ में एकता और अनुशासन लाने का प्रयास किया।
  • अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने 84000 स्तूपों का निर्माण करवाया था।

 सामाजिक-आर्थिक सुधार

  • समाज के कमजोर वर्गों को गतिशीलता प्रदान।
  • कृषि भूमि का विस्तार, युद्धबंदियों को वनों व खानों में कार्यरत किया।
  • राजस्व का पुनर्वितरण लोकहित कार्यों में किया।
  • 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया।
  • क्रय शक्ति में वृद्धि, उत्पादन व अर्थव्यवस्था को बल मिला।

  विदेश नीति व धार्मिक नीति

  • समकालीन राज्यों से कूटनीतिक संबंध स्थापित किए।
  • धम्म आयोग विदेश भेजे → सांस्कृतिक व धार्मिक संबंध मजबूत हुए।
  • धार्मिक सहिष्णुता पर बल – सभी धर्मों को समान आदर।
  • धर्म थोपने का विरोध, सभी के लिए समान सम्मान।
  • राष्ट्रीय एकता हेतु उपाय:
    • एक धर्म, एक भाषा, एक लिपि की नीति।
    • समान नागरिक व दण्ड संहिता का क्रियान्वयन।
  • सामाजिक न्याय व कानून के शासन की स्थापना।

 राजनीतिक दृष्टि से योगदान

  • मौर्य साम्राज्य को नवदिशा प्रदान की।
  • राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक एकता स्थापित की।
  • राष्ट्र निर्माण की भावना – भारत को एक इकाई के रूप में देखने वाला प्रथम शासक।
  • धम्म नीति – सार्वभौमिक, सार्वकालिक व सार्वजनिक।
  • पितृवत् शासन सिद्धान्त – प्रजा को परिवार समान माना।

 निर्माण कार्य

  • कुएँ, सराय, वृक्षारोपण, धर्मयात्रा मार्गों पर विश्राम स्थल।
  • सार्वजनिक निर्माण कार्यों से आर्थिक विकास।
  • 84000 स्तूपों का निर्माण (बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु)।

धर्म प्रशासनिक तंत्र

  • धम्म महामात्र, धम्मयात्रा, धम्मलिपि, प्रतिवेदक अधिकारी नियुक्त।
  • हर पाँच वर्ष में धर्म प्रचार यात्रा (अनुसंयान)
  • जनसंपर्क व सामाजिक सुधार हेतु प्रत्यक्ष निरीक्षण प्रणाली।

अशोक के अभिलेख

  • अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वप्रथम शिलालेख का प्रचलन किया था। शिलालेखों के माध्यम से राज्यादेशों तथा उपलब्धियों को संकलित किया गया था जिनमें वह जनता को संबोधित करता है।
  • सर्वप्रथम 1750 ई. में टीफेन्थैलर महोदय ने अशोक के दिल्ली – मेरठ स्तम्भ का पता लगाया था।
  • सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप को 1837 ई. में अशोक के अभिलेखों की खोज को पढ़ने में सफलता प्राप्त हुई सर्वप्रथम दिल्ली-टोपरा लेख को पढ़ा गया।
  • अशोक के अभिलेख आरमाइक, खरोष्ठी, यूनानी एवं ब्राह्मी चारों लिपियों में पाए गए हैं। लघमान लेख आरमाइक लिपि में हैं। मानसेहरा एवं शाहबाजगढ़ी से खरोष्ठी लिपि के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। अशोक का ‘शर-ए-कुना’ (कंधार) अभिलेख ग्रीक व अरामाइक लिपि में प्राप्त हुआ है।
  • अशोक के अभिलेख को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- 1. शिलालेख, 2. स्तम्भलेख एवं 3. गुहालेख।

शिलालेख

  • संख्या 14 है, जो आठ भिन्न – भिन्न स्थानों से प्राप्त किए गए हैं।
शिलालेखस्थानलिपिविवरण 
शाहबाजगढ़ीपेशावर (पाक)खरोष्ठी1836 ई. में जनरल कोर्ट ने खोजा।
मानसेहरामानसेहरा (हजारा जि.)खरोष्ठीकैप्टन लेह और पंजाब पुरातत्व सर्वेक्षण के एक भारतीय कर्मचारी ने 1889 ई. में खोजा था।
कलसीदेहरादून (उत्तरांचल)ब्राह्मी1860 ई. में फोरेस्ट ने इसे खोजा।
गिरनारजूनागढ़ (गुजरात)ब्राह्मी1822 ई. में कर्नल टॉड ने इन लेखों का पता लगाया।
एर्रगुड़ीकुर्नूल (आंध्र प्रदेश)ब्रुस्टोफेदन [लिपि दाएँ से बाएँ]खोज भू-वैज्ञानिक अनुघोष ने 1929 ई. में की थी।
धौलीपुरी (ओडिशा)ब्राह्मीखोज 1837 ई. में किटो ने
जौगढ़गंजाम, आंध्र प्रदेशब्राह्मीवॉल्टर इलियट ने 1850 ई. में खोजा था।
सोपाराथाणे (महाराष्ट्र)ब्राह्मीबीएल इंद्रजी ने 1881-82 ई. खोजा

अशोक के प्रमुख शिलालेख

शिलालेख संख्याप्रमुख विषय / संदेश
पहला शिलालेखपशुबलि व सामाजिक उत्सवों-समारोहों पर प्रतिबंध, सभी मानव मेरी संतान की तरह हैं।
दूसरा शिलालेखपशु चिकित्सा, मानव चिकित्सा एवं लोक कल्याणकारी कार्य, चोल, पांड्य, सत्तियपुत्त एवं केरलपुत्त (चेर) की चर्चा।
तीसरा शिलालेखमाता-पिता का सम्मान करना, राजकीय अधिकारियों को प्रत्येक पाँचवें वर्ष दौरा करने का आदेश।
चौथा शिलालेखधम्म नीति द्वारा अनैतिकता, ब्राह्मणों एवं श्रवणों के प्रति निरादर, हिंसा आदि को रोका जा सके।
पाँचवाँ शिलालेखधम्म महामात्रों की नियुक्ति (शासन के 13वें वर्ष में), मौर्य कालीन समाज व वर्णव्यवस्था की जानकारी।
छठा शिलालेखधम्म महामत्रों के लिए आदेश, जनता किसी भी समय राजा से मिल सकती है, आत्मनियंत्रण की शिक्षा।
सातवाँ शिलालेखसभी संप्रदायों के लिए सहिष्णुता।
आठवाँ शिलालेखअशोक की धर्मयात्राओं की जानकारी, सार्वजनिक निर्माण कार्यों का वर्णन, बोधगया भ्रमण का उल्लेख।
नवाँ शिलालेखधम्म समारोह की जानकारी, नैतिकता पर बल, ‘धम्म मंगल’ को श्रेष्ठ बताया।
दसवाँ शिलालेखधम्म नीति की श्रेष्ठता, राजा और उच्च अधिकारियों को प्रजा के हित में सोचने का आदेश।
ग्यारहवाँ शिलालेखधम्म दान को श्रेष्ठ बताया।
बारहवाँ शिलालेखसम्प्रदायों के मध्य सहिष्णुता का निर्देश, स्त्री महामात्र की चर्चा, बृजभूमिक व धम्म महामात्र का उल्लेख।
तेरहवाँ शिलालेखयुद्ध के स्थान पर धम्म विजय का आह्वान, कलिंग युद्ध की जानकारी, अपराधी जातियों का उल्लेख, पड़ोसी राज्यों का वर्णन।
चौदहवाँ शिलालेखकलिंग में दो पृथक् शिलालेख, जनता को धार्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया, कलिंग की जनता को पुत्र-पुत्रियों समान कहा।
अशोक के लघु शिलालेख :-
  1. ब्रह्मगिरि – यह कर्नाटक के चित्तलदुर्ग जिले में स्थित है।
  2. भाब्रु (बैराठ) – यह राजस्थान के जयपुर जिले में है। इसकी खोज कैप्टन बर्ट के द्वारा 1840 ई. में की गई। यह शिलालेख अशोक के बौद्ध होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
  3. सहसाराम – यह बिहार में है, इसे वेगलर ने खोजा है।
  4. गुजर्रा – मध्य प्रदेश के दतिया जिले में है, 1954 ई. में बहादुर चन्द्र दावड़ा ने खोजा।
  5. रूपनाथ – मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में है, 1872 ई. में कर्नल एलिस के भारतीय सेवक ने इसकी खोज की।
  6. मास्की – कर्नाटक के रायचूर जिले में है। 1915 ई. में बीडन ने खोजा।
  7. एर्रगुड़ी – आन्ध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित है।
  8. राजुल मंडगिरि – आन्ध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित है।
  9. अहरौरा – उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में है। 1961 ई. में प्रो. शर्मा ने खोजा।
  10.  गोविमठ – मैसूर के कोपबल नामक स्थान के समीप स्थित है, 1931 ई. में बी.एन.शास्त्री ने खोजा।
  11. जटिंगरामेश्वर – कर्नाटक के ब्रह्मगिरि के तीन मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है।
  12. सिद्धपुर – ब्रह्मगिरि के एक मील पश्चिम में स्थित है।
  13. पालकिगुण्डु – गोविमठ से चार मील की दूरी पर स्थित है, 1931 ई. में बी.एन.शास्त्री ने खोजा।
  14. सारोमारो – शहडोल, मध्य प्रदेश में है।
  15. उडेगोलम – बेलारी कर्नाटक में है।

स्तम्भ लेख

  • स्तम्भ लेख की संख्या 7 है जो 6 अलग-अलग स्थानों से मिले हैं।
  • अशोक के 7 स्तंभलेख टोपरा (दिल्ली), मेरठ, इलाहाबाद, रामपूरवा, लौरिया अरेराज (चंपारण), लौरिया नन्दनगढ़ (चंपारण) में पाए गए है। 
  • लघु स्तंभ लेख सांची, सारनाथ, रुम्मिनदेई, कौशाम्बी और निगाली सागर में पाए गए है|
स्तम्भलेख: Iअशोक के राज्याभिषेक के 26 वर्ष बाद लिखित।धम्म के पालन, सम्मान, उत्साह और आत्मनिरीक्षण द्वारा आनंद प्राप्ति का उल्लेख।
स्तम्भलेख: IIधम्म की विशेषताओं यथा-शुभ, करुणा, उदारता, सत्यता, पुण्यवर्धक, पापनाशक आदि का उल्लेख।
स्तम्भलेख: IIIमनुष्य को आत्माचिंतन करने, दुर्गुणों का निदान करने और  सद्गुणों को अपनाने की शिक्षा का उल्लेख।
स्तम्भलेख:- IVरज्जुकों के कर्तव्यों का उल्लेख।
स्तम्भलेख:- Vकुछ पशु-पक्षियों का वध निषिद्ध एवं 25 कैदियों को मुक्त करने का वर्णन।
स्तम्भलेख:- VIप्रजा के कल्याण एवं लाभ के लिए धम्मलिपि लिखवाने एवं धम्म का वर्णन।
स्तम्भलेख:- VIIअशोक द्वारा धम्म के अनुपालन में किए गए कार्यों का वर्णन।

अशोक के सात स्तम्भ-लेख

  1. लौरिया नन्दनगढ़ – यह बिहार के चम्पारन जिले में स्थित है इस स्तंभ पर मोर का चित्र बना हुआ है।
  2. लौरिया अरराज – यह बिहार के चम्पारन जिले में स्थित है।
  3. दिल्ली-टोपरा – यह सर्वाधिक प्रसिद्ध स्तम्भ लेख है। यह उत्तर प्रदेश सहारनपुर के खिज्राबाद जिले में टोपरा नामक जगह पर दबा हुआ था। फिरोजशाह तुगलक ने टोपरा से यह अशोक स्तंभ दिल्ली मंगवाए थे। ये स्तम्भ फिरोजशाह की लाट, भीमसेन की लाट, दिल्ली शिवालिक लाट, सुनहरी लाट आदि नामों से भी जाने जाते हैं। इस पर अशोक के सातों अभिलेख उत्कीर्ण हैं, जबकि शेष स्तंभों पर केवल 6 लेख ही उत्कीर्ण मिलते हैं। इस स्तंभ लिपि को सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने पढ़कर अंग्रेजी में अनुवाद किया।
  4. दिल्ली-मेरठ – यह पहले मेरठ में स्थित था, बाद में फिरोजशाह तुगलक इस स्तंभ को दिल्ली लाए।
  5. रामपुरवा – यह बिहार के चम्पारन में स्थित है।
  6. प्रयाग – यह पहले कौशाम्बी में था, बाद में अकबर ने इलाहाबाद के किले में रखवाया। अशोक की रानी करुवाकी द्वारा दान दिए जाने का उल्लेख है, इसे रानी का अभिलेख भी कहा गया है।
अन्य स्तंभलेख
  • रुम्मिनदेई स्तंभलेख – इस स्तंभलेख में अशोक की लुम्बिनी यात्रा और लुम्बिनी के लोगों को कर में दी गई छूट का वर्णन। उसने कर की दर को घटाकर 1/8 कर दिया।
  • अशोक का सर्वाधिक छोटा अभिलेख है, विषय आर्थिक है।निगालीसागर स्तंभलेख – यह स्तंभलेख मूलतः “कपिलवस्तु” में स्थित था। इस स्तंभलेख में कहा गया है कि अशोक ने “कनकमुनि बुद्ध” के स्तूप की ऊँचाई को बढ़ाकर दुगुना कर दिया था।
  • निगालीसागर स्तंभलेख – यह स्तंभलेख मूलतः “कपिलवस्तु” में स्थित था। इस स्तंभलेख में कहा गया है कि अशोक ने “कनकमुनि बुद्ध” के स्तूप की ऊँचाई को बढ़ाकर दुगुना कर दिया था।

लघु स्तम्भ लेख :

  • लघु स्तम्भ लेख पर अशोक की “राजकीय घोषणाओं” का उल्लेख है। साँची (रायसेन, मध्य प्रदेश), कौशांबी (इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश), सारनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश), रुम्मिनदेई (नेपाल), निग्लीवा (निगाली सागर, नेपाल) तथा इलाहाबाद से लघु स्तम्भ लेख मिले हैं।
  • गुहा लेख में धार्मिक सहिष्णुता का उत्कीर्णन होता है। 
  • अशोक के बाद, जालोक, कुणाल [दिव्यावदान में उसे ‘धर्मविवर्धान’ कहा गया है], दशरथ, सम्प्रति, शालिशूक, देववर्मन आदि शासकों ने शासन किया। बृहद्रथ अन्तिम मौर्य सम्राट था। बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र ने 184 ई0 पू० में उसकी हत्या कर एक नये शुंग साम्राज्य की नींव रखी
मौर्य साम्राज्य

अशोक के उत्तराधिकारी

शासकविवरण
जालोक / कुणालअशोक का पुत्र
दशरथकुणाल का पुत्र, अशोक के बाद शासन
सम्प्रतिजैन धर्म का प्रचारक
शालिशूकदुश्चरित्र (गर्गी संहिता)
देववर्मनउत्तराधिकारी
बृहद्रथअंतिम मौर्य शासक; सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई.पू. में हत्या की

अशोक का महत्व

  • धर्म, राजनीति व समाज का संगम।
  • धर्म पर आधारित शासन का आदर्श मॉडल।
  • अंतरराष्ट्रीय शान्ति व सद्भाव का अग्रदूत।
  • विश्व कल्याणकारी शासन का प्रवर्तक।
  • भारत के एकीकरण का प्रथम यथार्थ प्रयास।

मौर्य प्रशासन (Mauryan Administration)

  • मौर्यकालीन प्रशासन की जानकारी हमें मुख्यत: मेगस्थनीज की इंडिका, कौटिल्य की अर्थशास्त्र और अशोक के अभिलेखों से मिलती है। 
  • मौर्य प्रशासन के अन्तर्गत भारत में प्रथम बार राजनीतिक एकता देखने को मिली तथा सत्ता का केन्द्रीकरण हुआ। 
  • साम्राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्तियों से पूर्व उनकी योग्यता एवं चरित्र को परखा जाता था, जिसे ‘उपधा परिक्षण’ कहते थे। 

मौर्यकालीन प्रशासनिक संरचना:प्रान्त

  • प्रमुख अधिकारी: कुमार या आर्यपुत्र
  • मण्डल – प्रमुख अधिकारी: प्रदेष्टा/प्रादेशिक
  • आहार/विषय (जिला) – प्रमुख अधिकारी: विषयपति/स्थानिक
  • स्थानीय (800 ग्रामों का समूह)
  • द्रोणमुख (400 ग्रामों का समूह)
  • खार्वटिक (200 ग्रामों का समूह)
  • संग्रहण (100 ग्रामों का समूह) – प्रमुख अधिकारी: गोप
  • ग्राम – प्रमुख अधिकारी: ग्रामिक

मौर्य साम्राज्य के प्रशासन का ढांचा निम्नलिखित था-

केन्द्रीय प्रशासन

  • राजा – 
    • राजा शासन प्रणाली का केन्द्र बिन्दु, महत्त्वपूर्ण एवं नीति संबंधी निर्णय राजा स्वयं लेता था। 
    • ‘व्यवस्थापिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका की समस्त शक्तियाँ उसमें निहित थी।
  • मंत्रिपरिषद् – 
    • राजा को परामर्श देने के लिए मन्त्रिपरिषद् थी, जिनकी नियुक्ति वंश व योग्यता के आधार पर राजा करता था। अन्तिम निर्णय का अधिकार राजा का था। 
    • एक आन्तरिक परिषद् होती थी, जिसे मन्त्रिण कहा जाता था। जिसके 3-4 सदस्य होते थे। महत्त्वपूर्ण विषयों पर राजा मन्त्रियों से परामर्श करता था।
  • अधिकारी – 
    • शीर्षस्थ राज्याधिकारी जो संख्या में 18 थे। इन्हें ‘तीर्थ’ कहा जाता था। वे केन्द्रीय विभागों का कार्यभार देखते थे, जिनमें कोषाध्यक्ष, कर्मान्तिक, समाहर्ता, पुरोहित एवं सेनापति प्रमुख थे।

मौर्य साम्राज्य के प्रमुख पदाधिकारी

क्रमपदनामकार्य
1मन्त्रीराज्य नीतियों का निर्माण
2पुरोहितधार्मिक कार्य
3समाहर्ताराजस्व संकलन
4सन्निधाताआय-व्यय का लेखा-जोखा
5सेनापतिसेना प्रमुख
6युवराजउत्तराधिकारी
7प्रदेष्टाअपराध न्यायाधीश
8नायकसेना संचालन
9कर्मान्तिकउद्योग व धन्धे निरीक्षण
10व्यावहारिकदीवानी न्यायाधीश
11मंत्रिपरिषदाध्यक्षप्रशासनिक समन्वयक
12दण्डपालदण्ड व अनुशासन अधिकारी
13अन्तपालसीमावर्ती दुर्ग सुरक्षा
14दुर्गपालदुर्ग प्रबंधन
15नागरकनगर प्रमुख अधिकारी
16प्रशस्त्रिराजकीय दस्तावेज लेखन व जेल प्रबंधन
17दौवारिकद्वारपाल व राजप्रासाद अधिकारी
18आटविकवन विभाग प्रमुख
  • इसके अतिरिक्त अर्थशास्त्र में 26 अध्यक्षों का उल्लेख मिलता है, जो राज्य की आर्थिक गतिविधियों का नियमन करते थे। 
  • वे कृषि, व्यापार, वाणिज्य, बांट-माप, कताई-बुनाई, खान, वनों आदि का नियमन एवं नियंत्रण करते थे।
क्रमअध्यक्षकार्य
1मुद्राध्यक्षमुद्रा निर्माण, टकसाल प्रमुख
2रूपदर्शकमुद्रा परीक्षण अधिकारी
3पण्याध्यक्ष व्यापार व वाणिज्य अधिकारी
4कुप्याध्यक्षवन उत्पाद निरीक्षक
5पोतवाध्यक्ष मापन प्रणाली नियंत्रण
6शुल्काध्यक्ष चुंगी अधिकारी
7सूत्राध्यक्ष वस्त्र निर्माण व बुनाई नियंत्रण
8सूत्रधारशस्त्र रखरखाव अधिकारी
9आयुधागाराध्यक्षशस्त्रागार प्रमुख
10सीताध्यक्ष कृषि विभाग अध्यक्ष
11उपप्रधान / सूर्यमुखियाआबकारी अधिकारी
12आकराध्यक्षखान विभाग प्रमुख
13विविताध्यक्षचारागाह विभाग प्रमुख
14नवाध्यक्षनौसेना प्रमुख
15गणिकाध्यक्षवेश्याओं की देखरेख
16संस्थाध्यक्षव्यापारिक मार्ग निरीक्षण
17लवणाध्यक्षनमक अधिकारी
18मुद्राध्यक्षपासपोर्ट व दस्तावेज अधिकारी
19कोष्ठागाराध्यक्षगोदाम प्रमुख
20स्वर्णाध्यक्षस्वर्ण अधिकारी
21अश्वाध्यक्ष / गौध्यक्षपशुधन अधिकारी
22हस्त्याध्यक्षहाथी विभाग प्रमुख
23बन्धनागाराध्यक्षजेल अधिकारी
24देवताध्यक्षमंदिर व धार्मिक विभाग
25लोहाध्यक्ष / अक्षशालाध्यक्षधातु उद्योग प्रमुख
26पत्तनाध्यक्षबंदरगाह अधिकारी
द्यूताध्यक्षजुआ नियंत्रण व समय संकेतक अधिकारी
  • अन्य अधिकारी
    • (1) आयुधगाराध्यक्ष – आयुधगार का अध्यक्ष
    • (2) गो-अध्यक्ष – पशुधन का अध्यक्ष
    • (3) मानाध्यक्षक – दूरी व समय से संबंधित साधनों को नियंत्रित करने वाला अध्यक्ष
    • (4) अश्वाध्यक्ष – घोड़ों का अध्यक्ष
    • (5) हस्त्याध्यक्ष – हाथियों का अध्यक्ष
    • (6) सुर्वणाध्यक्ष – सोने का अध्यक्ष
  • मौर्य प्रशासन में अध्यक्षों का महत्त्वपूर्ण स्थान था, इसको 1000 पण वार्षिक वेतन मिलता था।
  • इन अध्यक्षों को यूनानी लेखकों के द्वारा मजिस्ट्रेट की संज्ञा दी गई है।
  • नगर प्रबन्ध- 
    • नगर प्रबन्ध हेतु 5-5 सदस्यों की 6 समितियां होती थी, जो विभिन्न कार्यों, उद्योग एवं शिल्प, विदेशियों, जनगणना, वाणिज्य-व्यापार, निर्मित वस्तुओं की देखभाल, बिक्रीकर आदि के नियमन विपणन एवं रखरखाव का कार्य करती थी। 
    • अर्थशास्त्र के अनुसार ‘नागरक’ नगर प्रशासन का अध्यक्ष, गोप तथा स्थानिक उसके सहायतार्थ कर्मचारी थे।
  • सेना –
    • सैन्य विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था। 
    • सेना की छः शाखाएँ थी। जो क्रमशः पैदल, अश्व, हाथी, रथ, यातायात एवं नौ सेना में विभक्त थी। 
    • 5-5 सदस्यों की समिति इनकी देखरेख करती थी, जबकि कौटिल्य अर्थशास्त्र में चतुरंगबल को सेना का मुख्य अंग बताता है। 
    • ‘नायक’ युद्धक्षेत्र में सेना का नेतृत्व करने वाला अधिकारी होता था।
  • गुप्तचर व्यवस्था- 
    • प्रशासन तन्त्र के साथ-साथ गुप्तचर का भी विस्तृत जाल बिछाया गया था, जो मन्त्रियों से लेकर आम जनता की गतिविधियों पर नजर रखते थे। 
    • गुप्तचरों को संस्था एवं संचार नाम से पुकारा जाता था। 1. संस्था – वे गुप्तचर जो एक ही स्थान पर संस्थाओं में संगठित होकर कार्य करते थे। 2. संचार – ऐसे गुप्तचर जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते हुए सूचना इकट्‌ठी कर राजा तक पहुँचाते थे।
    • मौर्यकाल में गुप्तचरों को गूढ़पुरुष, सर्पमहामात्य, कहा गया है।
    • महिला गुप्तचरों को ‘वृषली’ कहा जाता था।
  • न्याय –
    • धर्म, व्यवहार, चरित्र एवं राजशासन न्याय संहिता के स्रोत। 
    • धर्मस्थीय एवं कंटक शोधक न्यायालय क्रमशः दीवानी तथा फौजदारी मामले सुलझाते थे। 
    • न्यायपीठ पद्धति विद्यमान थी, राजा सर्वोच्च न्यायधीश था। 
    • राजुक, व्यावहारिक आदि न्यायिक अधिकारी थे। 
    • संग्रहण व द्रोणमुख स्थानीय एवं जनपद स्तर के न्यायालय होते थे। 
  • राजस्व प्रशासन – 
    • समाहर्ता राजस्व विभाग का प्रमुख अधिकारी था। 
    • दुर्ग, राष्ट्र, व्रज, सेतु, वन, खाने, आयात-निर्यात आदि राजस्व प्राप्ति के मुख्य स्रोत थे। 
    • सन्निधाता राजकीय कोष का मुख्य अधिकारी होता था।
  • प्रांतीय शासन 
    • साम्राज्य चार प्रान्तों में विभाजित था। जिनका प्रशासक राजकुमार होता था, जो मंत्रिपरिषद् एवं अमात्यों के माध्यम से शासन संचालित करता था। 
    • चार प्रमुख प्रान्त थे-उत्तरापथ, दक्षिणापथ, अवन्तिपथ एवं मध्यप्रान्त। 
    • धर्म महामात्र तथा अमात्य प्रान्तीय अधिकारी थे, जो धम्म एवं अन्य कार्य देखते थे। 
    • प्रान्तों को आहार या विषय में बाँटा गया था, जो विषयपति के अधीन होते थे।
  • जनपद व ग्रामीण
    • जनपद स्तर पर प्रदेशिका, राजुक व युक्त नाम अधिकारी थे जो भूमि, न्याय व लेखों संबंधी दायित्व निभाते थे। 
    • ग्रामिक, ग्रामीण स्तरीय अधिकारी था। 
    • गोप एवं स्थानिक जनपद व गाँवों के बीच मध्यस्थता का कार्य करते थे।

अशोक के प्रांतीय प्रशासन के अधीन प्रांत

स्तरइकाईविवरण / गाँवों की संख्या
1️साम्राज्यसंपूर्ण राज्य
2️कोष्ठ / प्रान्तप्रमुख प्रशासनिक इकाई
3️मंडलकमिश्नर क्षेत्र
4️आहार / विषयजिला
5️द्रोणमुख800 गाँवों का समूह
6️खार्वटिक400 गाँवों का समूह
7️संग्रहण200 गाँवों का समूह
8️ग्राम10 गाँवों का समूह (सबसे छोटी इकाई)

अशोक के तृतीय शिलालेख में तीन पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं:-

  1. युक्त    
  2. राजुक    
  3. प्रादेशिक

अशोक के बारहवें शिलालेख में तीन और पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं :-

  1. धम्ममहामात्र – धम्ममहामात्र का कार्य विभिन्न सम्प्रदायों के बीच सामंजस्य बनाए रखना होता था।
  2. स्त्र्याध्यक्ष महामात्र – स्त्र्याध्यक्ष महिलाओं के नैतिक आचरण की देख-रेख करने वाला अधिकारी होता था।
  3. ब्रज भूमिक महामात्र – ब्रजभूमिक गोचर-भूमि (ब्रज) में बसने वाले गोपों की देख-रेख करने वाला अधिकारी था।

अशोक के प्रशासनिक सुधार 

  • अशोक ने चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रशासनिक व्यवस्था का अनुसरण किया, लेकिन कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार किए। 
  • उसने प्रजा को अपनी संतान माना और लोकहित को प्राथमिकता दी। 
  • राजुक, युक्त और प्रादेशिक अधिकारियों की नियुक्ति की, जो न्याय और लेखा से संबंधित थे। 
  • 13वें वर्ष में धम्म महापात्र पद की स्थापना की, जिनका कार्य विभिन्न सम्प्रदायों में सांमजस्य, अकारण दण्डितों के परिवार को सहायता प्रदान करना था। 
  • अशोक ने प्रतिवेदकों की नियुक्ति की, ताकि जनता की समस्याओं का राजा तक पहुँच सके। 
  • न्यायिक व्यवस्था को एकरूप बनाने के लिए राजुकों को न्यायिक अधिकार दिए और दण्डविधान को उदार बनाया। 
  • उसने अमानवीय यातनाओं को समाप्त किया और राज्याभिषेक दिवस पर बन्दियों को मुक्त किया।
  • स्त्राध्यक्ष, वृजभूमिक महामात्र, नगर व्यावहारिक, अन्तमहामात्र आदि की नियुक्ति क्रमशः स्त्री, पशु संरक्षण, न्याय व सीमावर्ती क्षेत्रों से संबंधित थी। 

मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण :

  1. दुर्बल व अयोग्य उत्तराधिकारी,
  2. साम्राज्य विभाजन,
  3. केन्द्रीकृत व्यवस्था,
  4. आर्थिक संकट व सांस्कृतिक समस्याएँ
  5. अशोक की धार्मिक नीति,
  6. अशोक की अतिशांतिवादिता नीति, नौकरशाही का अधिकाधिक अनुत्तरदायी होना,
  7. वित्तीय करों की अधिकता
  8. भौतिक संस्कृति पर प्रसार
  9. प्रांतीय शासकों की महत्त्वाकांक्षाएँ

मौर्यकालीन सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक दशाए तथा भाषा तथा साहित्य

सामाजिक दशा 

  • मेगस्थनीज ने भारतीय समाज में सात वर्गों का उल्लेख किया है :- 1. दार्शनिक, 2. कृषक, 3. योद्धा, 4. पशुपालक, 5. कारीगर, 6. निरीक्षक, 7. मंत्री
  • कौटिल्य ने चर्तुवर्णीय सामाजिक व्यवस्था को सामाजिक संरचना का आधार माना है।
  • कौटिल्य ने शुद्रों को आर्य कहा है और इन्हें मलेच्छों से भिन्न बतलाया है।
  • स्त्रियों को पुनर्विवाह तथा नियोग की अनुमति थी। स्त्रियाँ प्रायः घर के अंदर रहती थीं। ऐसी स्त्रियों को कौटिल्य ने ‘अनिष्कासिनी’ कहा है।
  • मेगस्थनीज ने उल्लेख किया है कि भारत में कोई दास नहीं है।

आर्थिक दशा :-

  • मौर्य काल में कृषि जीवन का मुख्य आधार था।
  • मौर्यकाल में गेहूँ, जौ, चना, चावल, गन्ना (ईख), तिल, सरसों, मसूर, शाक आदि प्रमुख फसलें थी।
  •  कृषि, पशुपालन एवं व्यापार को अर्थशास्त्र में सम्मिलित रूप से ‘वार्ता’ कहा गया है।
  • सीता भूमि’ सरकारी भूमि होती थी।
  • भूमि पर उपज का 1/4  से 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाता था।
  • राज्य की ओर से सिंचाई का पूर्ण प्रबंध था, जिसे सेतुबंध कहा गया है।
  • सोहगौरा और महास्थान अभिलेख में दुर्भिक्ष के समय राज्य द्वारा अनाज वितरण का उल्लेख है।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य ने सौराष्ट्र प्रान्त में सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था।

नोट – 

  • रुद्रदामन के जूनागढ़ लेख से पता चलता है कि इस झील का निर्माण कार्य चन्द्रगुप्त के राज्यपाल पुष्यगुप्त वैश्य ने प्रारम्भ करवाया था तथा अशोक के राज्यपाल तुषास्प/तुपास्य (यवनराज) ने पूर्ण करवाया था।
  • सुदर्शन झील सुवर्णसिकता व पलासिनी नदियों के संगम पर उर्जियत पहाड़ी पर स्थित है।
  • मौर्यकाल में भारत का बाह्य व्यापार सीरिया, मिस्र तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ होता था।
  • पश्चिमी भारत में भृगुकच्छ व सोपारा तथा पूर्वी भारत में ताम्रलिप्ति बन्दरगाहों से व्यापार होता था।
  • सिन्धु के मुहाने पर ‘बारबैरिकम’ नामक बन्दरगाह था।
  • प्रमुख व्यापारिक मार्ग :- उत्तरापथ – यह मार्ग बंगाल के समुद्र-तट पर स्थित ताम्रलिप्ति बन्दरगाह से पश्चिमोत्तर भारत में पुष्कलावती तक जाता था। जिस पर चम्पा, पाटलिपुत्र, वैशाली, राजगृह, गया, काशी, प्रयाग, कौशाम्बी, कान्यकुब्ज, हस्तिनापुर, साकल एवं तक्षशिला जैसे प्रमुख नगर स्थित थे।
  • अर्थशास्त्र के अनुसार मदुरा, अपरान्त, कलिंग, काशी, बंग, वत्स तथा महिर्षी में उच्चकोटि प्रकार के सूती वस्त्र तैयार होते थे। ‘दुकूल’ (श्वेत तथा चिकना वस्त्र), ‘क्षौम’ (रेशमी वस्त्र)
  • धातुकारी का भी उद्योग उन्नति पर था। सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, शीशा, टिन, पीतल, काँसा आदि धातुओं से अस्त्र-शस्त्र, बर्तन, आभूषण व उपकरण बनाए जाते थे।
  • उद्योग-धन्धों की संस्थाओं को ‘श्रेणी’ (Guilds) कहा जाता था।
    • जातक ग्रन्थों में 18 प्रकार की श्रेणियों का उल्लेख हुआ है।
  • मौर्यकाल में व्यापार-व्यवसाय में नियमित सिक्कों का प्रचलन हो चुका था।
    • सोने के सिक्के को ‘सुवर्ण’‘निष्क’ कहते थे।
    • चाँदी के सिक्के को ‘कार्षापण’ या ‘धरण’ कहते थे।
    • ताँबे के सिक्के को ‘माषक’ कहते थे। छोटे-छोटे ताँबे के सिक्के को ‘काकणी’ कहते थे।
    • मुद्राओं को जाँचने वाला अधिकारी ‘रूपदर्शक’ कहा जाता था।

धार्मिक दशा :-

  • मौर्य काल के मुख्य धर्म एवं सम्प्रदाय वैदिक, बौद्ध, जैन, आजीवक आदि थे।
  • महावंश के अनुसार बिंदुसार ने साठ हजार ब्राह्मणों के प्रति उदारता दिखाई।
  • अर्थशास्त्र में राजप्रासाद के समीप बनी हुई ‘यज्ञशाला’ (इज्या-स्थानम्) का उल्लेख मिलता है।
  • संन्यासियों को ‘श्रमण’ कहा जाता था। मेगस्थनीज के अनुसार ‘मंडनिस’ नामक संन्यासी ने अपने ज्ञान से सिकन्दर को बहुत अधिक प्रभावित किया था।
  • अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ।
    • अशोक के समय में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति हुई।
  • अशोक के सातवें स्तम्भ-लेख में आजीवकों का उल्लेख किया गया है।
    • बराबर पहाड़ी पर अशोक ने आजीवकों के लिए सुदामा, विश्वझोपड़ी, लोमस ऋषि और करण चौपड़ का निर्माण करवाया था।
    • अशोक के पौत्र दशरथ ने नागर्जुनी पहाड़ियों में आजीवक सम्प्रदाय के लिए गोपिका (गोपीका-कुभा) गुफा, वदिथिका गुफा, वापियाका गुफा का निर्माण। झोपड़ी की गुफा।
  • निर्ग्रन्थ से तात्पर्य जैन धर्म से है।
    • जैन सम्प्रदाय के महान आचार्य भद्रबाहु ने चन्द्रगुप्त को जैन मत में दीक्षित किया था।
    • अशोक का एक उत्तराधिकारी सम्प्रति, जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म का संरक्षक था।
    • दिव्यावदान के अनुसार निर्ग्रन्थ लोग अशोक के समय में उत्तरी बंगाल के पुण्ड्रवर्द्धन प्रदेश में भी निवास करते थे।

भाषा तथा साहित्य :-

  • मुख्य भाषा: पालि (आम बोलचाल)
  • राजभाषा: प्राकृत (अशोक के अभिलेख)
  • अशोक के अभिलेखों में मुख्य चार प्रकार की लिपियों का प्रयोग मिलता है – ब्राह्मी, खरोष्ठी (ईरानी प्रभाव, दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी), अरेमाइक, यूनानी
  • संस्कृत: शिक्षित वर्ग एवं साहित्य की 

मौर्य काल से सम्बन्धित ग्रंथ

क्र. सं.ग्रंथ / पुस्तकरचयिता / लेखकसम्बंध / विवरण
1कथावत्थुमोग्गलिपुत्त तिस्सअभिधम्मपिटक का भाग (बौद्ध ग्रंथ)
2कल्पसूत्रभद्रबाहुजैन ग्रंथ
3अर्थशास्त्रकौटिल्य (चाणक्य)मौर्यकालीन राजनीति, अर्थनीति और प्रशासन
4इण्डिका (Indica)मेगस्थनीजयूनानी दूत; सेल्युकस निकेटर का राजदूत, जिसने चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार का वर्णन किया
5कथा सरित्सागरसोमदेवकथाओं का ग्रंथ, गुप्तोत्तर-मौर्यकालीन सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
6बृहत्कथा मंजरीक्षेमेन्द्रकथाओं का ग्रंथ, मूल बृहत्कथा (गुणाढ्य) पर आधारित
7मुद्राराक्षसविशाखदत्तनाटक; चाणक्य–चंद्रगुप्त मौर्य और राक्षस का संघर्ष
8दीपवंश, महावंश, महाबोधिवंश, दिव्यावदानविभिन्न बौद्ध भिक्षुबौद्ध ग्रंथ; मौर्य काल और अशोक सम्बन्धी विवरण
9परिशिष्ट पर्वनहेमचंद्रजैन आचार्य ग्रंथ; मौर्यकालीन घटनाओं का उल्लेख

मौर्यकालीन शब्द और उनके अर्थ

    शब्दअर्थ
सीताराजकीय भूमि तथा इस भूमि से प्राप्त आय
बलिएक प्रकार का धार्मिक कर या चढ़ावा
क्षेत्रकभूमि का मालिक
उपवासकाश्तकार
रूपजीवावेश्यावृत्ति कर जीविकायापन करने वाली स्त्रियाँ
जेठठ्ठक शिल्पी संघ का मुखिया
श्रेष्ठी व्यापरिक संघ का मुखिया
गहपतिभू-स्वामी
विष्टिबेगार
भागभूमिकर (किसानों की निजी भूमि पर कर)
अमात्यउच्च प्रशासनिक अधिकारियों का वर्ग
उद्रंगसिंचाई कर
प्रणयआपातकालीन कर
सेनाभक्तमसेना कर, जो सेना के प्रयाण के समय तेल व चावल के रूप में लिया जाता था।
हिरण्यनकद कर, जो अनाज के रूप में नहीं लिया जाता था
राष्ट्रअन्य साधनों से प्राप्त राजस्व
पौरराजधानी का शासक
अक्षपटलाध्यक्षमहालेखा पाल
महामात्यास्पर्पगुप्तचर विभाग का अध्यक्ष
वार्ता कृषि, पशुपालन एवं व्यापार का सम्मिलित रूप
पथिकरसमाहर्ता द्वारा वसूल किया गया अतिरिक्त कर 
विवीत पशुओं की रक्षा के लिए वसूला गया कर
रक्षितपुलिस (अर्थशास्त्र के अनुसार)
कौष्ठेयकसरकारी जलाशय से सिंचित भूमि से लिया जाने वाला कर
सार्थवाह व्यापारिक काफिला
परिहीनकसरकारी भूमि पर पशुओं द्वारा हानि पहुँचाने पर लिया जाने वाला कर
पिण्डकर पूरे गाँव से वर्ष में एक बार वसूला जाने वाला कर
औपषनिक विशेष अवसरों पर राजा को दी जाने वाली भेंट
पार्श्वअधिक लाभ होने पर व्यापारियों से लिया जाने वाला कर

मौर्यकालीन कला एवं स्थापत्य

राजकीय कला 

1. राजप्रासाद (दरबारी/राजकीय कला)
  • मौर्यों ने राजनीतिक व धार्मिक दोनों कारणों से बड़े पैमाने पर स्थापत्य कार्य शुरू किए।
  • अशोक से पूर्व मौर्य वास्तुकला की जानकारी यूनानी लेखकों से मिलती है।
  • पाटलिपुत्र का महल 
    • चारों ओर लकड़ी की दीवार
    • 64 द्वार, 570 बुर्ज
    • आकार: चतुर्भुजाकार
    • सुरक्षा हेतु 60 फीट गहरी और 600 फीट चौड़ी खाई
  • चंद्रगुप्त मौर्य का राजप्रासाद –
    • एरियन ने सूसा और एकबेतना के प्रासादों जैसा भव्य बताया।
    • ईरान के पर्सेपोलिस के एकमेनियन महलों से प्रेरित।
  • मेगस्थनीज़ ने इसे मानव जाति की “सबसे महान रचनाओं में से एक” कहा।
  • कुम्हरार व बुलंदीबाग:
    • 80 स्तम्भों पर आधारित विशाल भवन
    • लकड़ी का ढांचा
    • सोने-चांदी की सजावट
  • काष्ठ कला अत्यधिक विकसित, नगर नियोजन की यूनानी यात्रियों ने प्रशंसा की।

मौर्यकालीन स्तम्भ

मौर्यकाल की सर्वश्रेष्ठ वास्तुकला

  • उद्देश्य:
    • युद्ध विजय
    • राजकीय संदेश/उपदेशों का प्रचार
  • औसत ऊँचाई: 40 फीट
  • सामग्री: चुनार का बलुआ पत्थर
  • एकाश्म (single piece) स्तम्भ— कलाकारों की उच्च तकनीक का प्रमाण।
  • लगभग सभी पर चमकदार मौर्य पॉलिश।
  • चोटी पर: सिंह, सांड, हाथी आदि पशु आकृतियाँ।
  • वेदी: उल्टे कमल की पंखुड़ियों से सजी।
  • शीर्षाकृतियाँ हृष्ट-पुष्ट, प्रभावशाली।
    • प्रमुख स्थल: लौरिया-नंदनगढ़, रामपुरवा, संकिसा, सारनाथ।
स्तम्भ संरचना (Parts)
  1. दण्ड – गोलाकार, नीचे से ऊपर संकरा (ताड़ वृक्ष जैसा)
  2. मेखला – इकहरी/दोहरी, लाट के ठीक ऊपर
  3. वेदी (बैठकी) – गोल/वर्गाकार, उल्टा कमल
  4. कंठा – वेदी के ऊपर
  5. चौकी – गोल/चौकोर
  6. शीर्ष – पशु आकृतियाँ

प्रमुख मौर्यकालीन स्तम्भ – शीर्ष

स्थानशीर्ष आकृति
सारनाथ (UP)4 सिंह
सांची (MP)4 सिंह
लौरिया-नंदनगढ़ (बिहार)सिंह व मोती चुगते हंस
संकिसा (UP)हाथी
रामपुरवा (बिहार)सिंह व बैल
लौरिया-अरराजखण्डित; R.P. Chadda अनुसार गरुड़
वैशाली (बिहार)1 सिंह
  • सारनाथ स्तंभ—सर्वोत्तम उदाहरण
  • इसके शीर्ष पर चार सिंह एक-दूसरे की ओर पीठ किए हुए खड़े हैं।
  • उनके नीचे एक सरपट दौड़ते घोड़े, एक बैल, एक सिंह और एक हाथी की आकृतियाँ बनी हैं, जो गतिशीलता का प्रतीक हैं।

स्तूप

1. स्तूप निर्माण का संदर्भ
  • बौद्ध व जैन धर्म की लोकप्रियता → स्तूपों और विहारों का बड़े पैमाने पर निर्माण।
  • साथ ही हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी बनती रही।
2. स्तूप: परिचय
  • शाब्दिक अर्थ: थूह/ढेर।
  • परिभाषा: अर्द्धगोलाकार टीला/गुंबदाकार स्मारक, जिसमें बुद्ध की अस्थियाँ, अवशेष या पवित्र वस्तुएँ संरक्षित की जाती थीं।
3. स्तूपों के प्रकार
  • (1) शारीरिक स्तूप
    • सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण।
    • बुद्ध/बौद्ध महापुरुषों की अस्थियाँ, केश, दाँत आदि रखे जाते।
    • उदाहरण: सांची स्तूप (बुद्ध के अवशेष)।
  • (2) परिभोगिका स्तूप
    • बुद्ध या उनके शिष्यों के उपयोग की वस्तुएँ—भिक्षापात्र, चीवर आदि।
    • उदाहरण: सोपारा स्तूप (मुंबई) – बुद्ध के भिक्षापात्र पर आधारित।
  • (3) उद्देशिका (स्मारक) स्तूप
    • बुद्ध/शिष्यों के जीवन की प्रमुख घटनाओं से जुड़े स्थानों पर निर्मित।
    • उदाहरण:
      • धम्मचक्र प्रवर्तन स्तूप (सारनाथ)
      • बुद्धत्व स्तूप (बोधगया)
  • (4) प्रतीकात्मक स्तूप
    • बौद्ध दर्शन को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाते।
    • उदाहरण: शांति स्तूप (लेह)
  • (5) मनौती स्तूप
    • श्रद्धालु द्वारा छोटे रूप में निर्मित।
    • सामग्री: धातु, पत्थर, काँच।

4. स्तूप की संरचना (Architecture)

  • अंदर: अधजली ईंट, बाहर: पकी ईंट + मोटा प्लास्टर।
  • अंड (Anda): मुख्य गुंबदाकार ठोस संरचना।
  • मेधी: अंड का आधार/मंडप।
  • हर्मिका: छत्रों के चारों ओर जालीदार वर्गाकार संरचना।
  • छत्र / छत्रावली:
    • 1 छत्र = छत्र
    • अनेक छत्र = छत्रावली
    • 3 छत्र → बुद्ध, धम्म, संघ (त्रिरत्न)
  • यष्टि: स्तंभ जो छत्रावली को सहारा देता है।
  • प्रदक्षिणा-पथ: परिक्रमा मार्ग।
  • वेदिका: प्रदक्षिणा-पथ को घेरे रेलिंग।

स्तूप

1. प्रारंभिक विकास
  • अशोक से पहले भी स्तूप निर्माण परंपरा प्रचलित।
  • बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद अवशेषों को 8 भागों में बाँटकर 8 स्तूप निर्मित:
    राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अलकप्प, रामग्राम, वेट्ठद्वीप, पावा, कुशीनगर।
  • 9वाँ स्तूप: बुद्ध से संबंधित बर्तन रखा गया।
  • पिपरहवा स्तूप (बस्ती, UP): एकमात्र सुरक्षित प्राचीन स्तूप।

2. स्तूपों पर कला

  • स्तूपों पर बुद्ध के जीवन की 5 प्रमुख घटनाओं के अंकन:
    जन्म, महाभिनिष्क्रमण, बोधि प्राप्ति, धम्मचक्र प्रवर्तन , महापरिनिर्वाण
  • जातक कथाओं का चित्रण भी मिलता है।

3. मौर्य काल में स्तूप निर्माण

  • अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण → स्तूप कला का चरमोत्कर्ष।
  • परंपरा अनुसार 84,000 स्तूप निर्मित।
  • प्रमुख स्तूप: सांची, चौखंडी (सारनाथ), धर्मराजिका।
  • कनक मुनि स्तूप का भी जीर्णोद्धार।

4. अशोककालीन शेष स्तूप

  • (1) सांची के 3 स्तूप (मध्य प्रदेश)
    • महान स्तूप – शारीरिक स्तूप (बुद्ध के अवशेष)।
    • दूसरा स्तूप – बौद्ध प्रचारकों की अस्थियाँ।
    • तीसरा स्तूप – सारिपुत्र व महामोद्गल्यायन के अवशेष।
  • (2) धर्मराजिका स्तूप (सारनाथ, UP)
    • बुद्ध द्वारा प्रथम उपदेश का स्थल।
    • मूल स्वरूप नष्ट; अवशेष शेष।
  • (3) धर्मराजिका स्तूप (तक्षशिला, पाकिस्तान)
    • गांधार क्षेत्र में अशोक द्वारा निर्मित।
    • बुद्ध के अवशेषों का संरक्षण।
  • (4) चौखंडी स्तूप (सारनाथ, वाराणसी)
    • ईंट निर्मित; परंपरा अनुसार अशोक का निर्माण।
    • शीर्ष पर अष्टभुजाकार मीनार — मुगल काल (1588, अकबर यात्रा के समय)।
    • हाल ही में ASI द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित।
5. अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य
  • राजस्थान, बैराठ का स्तूप: ईसा पूर्व 3वीं शताब्दी की संरचना का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • मौर्यकाल और बाद में स्तूपों की संख्या तेजी से बढ़ी।
  • संरक्षक: जन-साधारण, गहपति, व्यापारी, कभी-कभी राजा।
  • दान-पत्रों में दानदाताओं व पेशों का उल्लेख मिलता है; कलाकारों के नाम दुर्लभ।
  • कलाकार उदाहरण:
    • पीतलखेड़ा गुफा (महाराष्ट्र) – शिल्पकार कान्हा
    • कोंडाने गुफा – उसका शिष्य बालक
  • शिल्पकार श्रेणियाँ: प्रस्तर उत्कीर्णक, स्वर्णकार आदि।
  • स्तूप निर्माण सामूहिक प्रयास, पर कुछ भाग विशिष्ट संरक्षकों द्वारा।

गुफाएँ और विहार

विहार
  • बौद्ध भिक्षुओं के आवास हेतु चट्टानों/पहाड़ियों को काटकर बने स्थान = विहार।
  • उद्देश्य: नगरों से दूर श्रमणों के निवास व शिक्षण हेतु।
  • शुरुआत: अशोक द्वारा।
  • निर्माण: राजकीय सहयोग, बाद में शिल्प संघ द्वारा।
  • शुरू में केवल निवास; बाद में महत्त्वपूर्ण शिक्षा केंद्र बने।
अशोक द्वारा निर्मित गुफाएँ
  • सुदामा गुफा (12वें वर्ष) – धनुषाकार मेहराब।
  • विश्वझोपड़ी गुफा – चट्टान में “अशोक की सीढ़ियाँ”।
  • लोमस ऋषि गुफा – चैत्य चाप (अर्द्धवृत्ताकार) जैसा प्रवेश; गतिमान हाथी की मूर्ति; आयताकार हॉल + पीछे गोलाकार कक्ष; आजीविकों के लिए समर्पित।
  • कर्णचौपाट  (19वें वर्ष) – शिलालेख; सुपिया गुफा नामांकित।
  • बाराबर पहाड़ी की गुफाएँ
  • नागार्जुनी पहाड़ी (दशरथ)

अशोक के पोते दशरथ द्वारा आजीविकों हेतु:

  1. गोपी /गोपिका-कुभा – सबसे बड़ी।
  2. वदिथिका-कुभा
  3. वापीयाका-कुभा

गुफाओं की विशेषताएँ

  • भीतरी दीवारों पर चमकीली पॉलिश।
  • कलात्मक प्रवेश द्वार।

लोककला / मौर्यकालीन मूर्तिकला — 

मौर्यकाल
  • अशोक काल में मूर्तिकला का उत्कर्ष—यह स्वतंत्र कला बनी।
  • संरक्षण: स्थानीय राज्यपाल व स्थानीय कलाकार, राजकीय संरक्षण कम।
  • उपयोग: स्तूप सजावट, तोरण, मेधी, धार्मिक अभिव्यक्ति।
यक्ष–यक्षिणी मूर्तियाँ
  • निर्माण: ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी।
  • पहला उल्लेख: तमिल रचना शिलप्पादिकारम।
  • प्रमुख स्थल: पटना, विदिशा, मथुरा।
  • सामग्री: चुनार बलुआ पत्थर, चिकनी पॉलिश।
  • विशेषताएँ: प्राकृतिक चेहरे, अंग-उभार स्पष्ट।
दीदारगंज यक्षिणी (पटना)
  • अवस्थिति: पटना के पास, अब पटना संग्रहालय में।
  • ऊँची, संतुलित, लालित्यपूर्ण प्रतिमा; दाहिने हाथ में चामर।
  • गोल, मांसल शरीर; चेहरा भरा हुआ; तीखी नाक, होंठ, आँखें।
  • मौर्यकालीन पॉलिश और नारी-सौंदर्य का श्रेष्ठ उदाहरण।

अन्य मूर्तियाँ

  • धौली चट्टान का हाथी (ओडिशा)—अशोक शिलालेख के साथ; विशाल, बलिष्ठ रूप।
  • लोमस ऋषि गुफा का हाथी (बिहार)—गतिमान स्वरूप।
  • बोधगया का वज्रासन—चुनार पत्थर; मौर्यकालीन पॉलिश।
यक्ष–यक्षी मूर्तियाँ (मुख्य लोक कला):
  • मथुरा (परखम ग्राम): मणिभद्र यक्ष
  • पटना (दीदारगंज): चामर-धारिणी यक्षिणी 
  • बेसनगर: यक्षी
  • ग्वालियर: मणिभद्र यक्षी
  • वाराणसी (राजघाट): त्रिमुख यक्ष
  • शिशुपालगढ़: यक्ष
  • विदिशा: यक्षी
  • अन्य महत्त्वपूर्ण खोजें:
    • पटना (बुलंदीबाग): नर्तकी की मृण्मूर्ति, 24 तीलियों वाला रथ का पहिया
    • उड़ीसा (धौली): चट्टान काटकर हाथी की आकृति
    • लोहानीपुर (पटना): दो जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ
    • अयोध्या: मौर्यकालीन मृण्मूर्तियाँ
    • कालसी (देहरादून): गजतमे अंकित हाथी की मूर्ति
    • रोपड़: हाथीदांत की मुहर—शासक का नाम भदूपालकस लिखा
    • कनगनहल्ली: अशोक की मूर्ति—इस पर रान्यो अशोक लिखा

मौर्य कला की प्रमुख विशेषताएँ

  • अत्यंत बारीकी, अनुपातिकता, यथार्थवाद।
  • प्रसिद्ध मौर्य पॉलिश – अत्यंत चमकदार सतह।
  • नारी सौंदर्य का सौष्ठव और लालित्य।
मौर्यकालीन मृदभाण्ड 

विशेषताएँ

  • मौर्य–प्राक् मौर्य युग की सर्वाधिक विकसित परंपरा।
  • उपयोग: विलासिता के पात्र।
  • गुण:
    • अत्यंत पतले, हल्के।
    • बेहतरीन गुथी हुई मिट्टी।
    • जलोढ़ मिट्टी का प्रयोग।
    • अत्यधिक चमक—काला या गहरा रंग।
    • अधिकांश अन-अलंकृत; कुछ चित्रित पात्र स्थल:
      हस्तिनापुर, कौशाम्बी, श्रावस्ती, चंपा।                        
  • मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में मौर्य साम्राज्य का अंत किया। 
  • मौर्योत्तर काल (200 ई.पू. से गुप्त साम्राज्य के उद्भव तक) में कोई बड़ा साम्राज्य स्थापित नहीं हुआ, लेकिन यह काल ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है। 
  • इस समय मध्य एशिया से सांस्कृतिक संबंध बने और विदेशी तत्त्व भारतीय समाज में घुल-मिल गए। यूनानियों ने भारतीय धर्म और संस्कृति को अपनाया और भारतीय समाज में समाहित हो गए। 
  • इस काल में भारत विभिन्न क्षेत्रीय और स्थानीय राजवंशों में विभाजित था।
जानकारी के स्त्रोत- 
  • गार्गी संहिता, पंतजलि के महाभाष्य, दिव्यावदान, कालिदास के मालविकाग्निमित्र तथा बाणभट्ट के हर्षचरित व इतिहासकार कल्हण की ऐतिहासिक पुस्तक राजतंरगिणी।
  • अश्वघोष, जिसने संस्कृत में बुद्धचरित, सौदरानन्द महाकाव्य व सूर्यालंकार और सारीपुत्रप्रकरण लिखे। 
  • शून्यवाद, सापेक्षवाद व माध्यमिक सूत्र के प्रवर्त्तक नागार्जुन भी इसी कालखण्ड के प्रसिद्ध दार्शनिक हुए हैं जो सार्थक, जानकारी प्रदान करते है ।
  • चरक संहिता के रचयिता महर्षि चरक के अलावा चीनी इतिहास ग्रन्थ व चीनी यात्री ह्वेनसांग की यात्रा विवरण, तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के साथ-साथ बौद्ध विद्वान वसुमित्र व बौद्ध साहित्य त्रिपिटक, “मिलिन्दपन्हो” भी हमें विदेशी आक्रमणकारियों की जानकारियाँ उपलब्ध करवाता है। 
  • कौशाम्बी, सारनाथ व मथुरा की कनिष्क कालीन मुद्राएँ भी सही संकेत देती है। यह सिक्के बहुत महत्त्वपूर्ण स्त्रोत है क्योंकि उन पर शासकों के नाम अंकित है। 
  • सिकन्दर के साथ आयें नियार्कस, आनेस्टिक्रिटस और एरिस्टोब्युलस जैसे लेखको के विवरण।

यूनानी आक्रमण का उद्देश्य एवं प्रभाव

  • सिकन्दर की जल्दी ही मृत्यु हो जाने के कारण यूनानी भारत में स्थायी बस्ती नहीं बसा सके। 
  • सिकन्दर के आक्रमण की तुलना में भारतीय यूनानियों का उत्तर पश्चिम सीमान्त प्रदेशों पर अधिकार अधिक समय तक रहा था। 
  • बैक्ट्रियां के यूनानियों ने इस प्रदेशों पर लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया और इसलिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए यह समुचित समय था, यद्यपि भारतीय यूनानी शासन की देन उत्तर पश्चिमी क्षेत्र तक ही मानी जाती रही है तथापि उसके भारतीय प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। 
  • वास्तव में यूनानी विशेषताएँ भारत में ही आत्मसात् होकर मुख्य धारा में विलीन हो गई।
  • मुद्रा (सिक्के)-
    • यूनानी प्रभाव से पूर्व भारतीय चांदी के चिह्नित सिक्के तकनीकी रूप से कम श्रेष्ठ। सिक्कों पर किसी का नाम या तिथि नहीं लिखी होती। 
    • भारतीय यूनानी पहले शासक थे जिन्होंने सोने के ऐसे सिक्कों की ढलाई की जिन पर राजा का नाम, उपाधि और तिथि अंकित होती थी। 
    • निर्माण कला की श्रेष्ठता के कारण वह बेहतर होते थे। 
    • चूँकि यूनानी ग्रहणशील थे – कभी-कभी भारतीय मौद्रिक तकनीकी को अपनाकर भी प्रयोग करते थे।
  • कला और मूर्तिकला के क्षेत्र 
  • उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में हेलेनिस्टिक कला से परिचय कराया, जिसने बाद में गांधार कला शैली का रूप लिया। 
  • भारतीय और यूनानी मिश्रण से उत्तर पश्चिम में कला की प्रसिद्ध गांधार शैली का विकास हुआ। 
  • भारतीय यूनानी शासन में खगोल शास्त्र, साहित्य, भवन निर्माण और धर्म के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी। 
  • साथ ही नए जल और थल मार्गों के खुलने से भारत और यूनान के मध्य व्यापार और वाणिज्य का विस्तार हुआ।
  • व्यापार-वाणिज्य- 
    • भारत रत्न, हाथी दाँत मसाले और अच्छे वस्त्रों जैसी वस्तुओं की यूनान में काफी मांग थी जबकि भारतीय बाजार में भी यूनान से आने वाली विलास सामग्री और श्रृंगार-प्रसाधनों की भरमार थी। 
    • राजा एंटीयोकस चतुर्थ द्वारा लगभग 166 ई.पू. पूरे यूनान में एक प्रदर्शनी का आयोजन -जिसमें भारत के मसाले और हाथी दाँत में वस्तुएँ प्रदर्शित थी। 
    • समकालीन सिक्कों की एक बड़ी संख्या में कम से कम 30 भारतीय यूनानी शासकों के नाम मालूम हो जाते हैं। उत्तर में काबुल तथा दिल्ली के निकट मथुरा में मिनाण्डर के सिक्के प्राप्त हुए हैं। 
  • नोट – भारतीय यूनानियों का इतिहास मुख्यतः इन्हीं सिक्कों की सहायता से लिखा गया है। इन सिक्कों पर यूनानी भाषा में अनुश्रुतियाँ अंकित है, बाद में खरोष्ठी तथा ब्राह्मी लिपि भी मिलती है। इन प्रमाणों को समझने में कहीं-कहीं कठिनाई भी होती है, क्योंकि कुछ राजाओं के नाम एक से थे। इसलिए एक शासन के समय के सिक्कों को दूसरे से अलग करना आसान नहीं है। सिक्के इस युग के बढ़ते हुए व्यापार संबंधों पर प्रकाश डालते हैं।

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