वेधशाला (Observatories)

वेधशाला (Observatories): विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत वेधशालाएँ ऐसे विशेष संस्थान या स्थल होते हैं, जहाँ खगोलीय पिंडों, अंतरिक्ष घटनाओं तथा प्राकृतिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन और अवलोकन किया जाता है। प्राचीन जंतर-मंतर से लेकर आधुनिक दूरबीनों और अंतरिक्ष वेधशालाओं तक, इनका योगदान ब्रह्मांड की समझ को विकसित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

भारत के रेडियो टेलिस्कोप (Radio Telescopes)

जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (GMRT)
  • स्थान: पुणे, महाराष्ट्र के पास।
  • संचालन: नेशनल सेंटर ऑफ रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स (NCRA), पुणे द्वारा।
  • GMRT परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) की एक परियोजना है, जो टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) के तहत संचालित होती है।
  • 30 पूर्ण रूप से नियंत्रणीय परवलयिक रेडियो टेलीस्कोप का समूह, प्रत्येक का व्यास 45 मीटर, 25 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ।
  • GMRT वर्तमान में मीटर तरंगदैर्ध्य पर संचालित होने वाला विश्व का सबसे बड़ा रेडियो टेलीस्कोप है (कम आवृत्ति)।
ऊटी रेडियो टेलीस्कोप (ORT)
  • तमिलनाडु के ऊटी के निकट मुथोरई में स्थित।
  • यह टेलीस्कोप राष्ट्रीय रेडियो खगोलिकी केंद्र (NCRA) का हिस्सा है। 

भारत के ऑप्टिकल एवं सौर टेलीस्कोप (Optical & Solar Telescope)

उदयपुर सौर वेधशाला (USO)

  • स्थान: फतेहसागर झील, उदयपुर, राजस्थान → वायुमंडलीय अशांति बहुत कम → सौर अध्ययन के लिए आदर्श।
  • प्रबंधन: भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL), अहमदाबाद द्वारा।
  • केंद्रबिंदु: भू-आधारित ऑप्टिकल सौर भौतिकी अनुसंधान
  • प्रमुख उपकरण
    • GONG टेलीस्कोप (ग्लोबल ऑसिलेशंस नेटवर्क ग्रुप):
      • 6 टेलीस्कोपों के वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा।
      • 24×7 सौर निगरानी प्रदान करता है।
      • प्रत्येक मिनट डिजिटल वेग छवियां कैप्चर करता है → सौर आंतरिक और हेलियोसिस्मोलॉजी का अध्ययन।
    • MAST (मल्टी एप्लिकेशन सोलर टेलीस्कोप):
      • लार्ज-एपर्चर ऑप्टिकल टेलीस्कोप।
      • सौर चुंबकीय क्षेत्रों और क्रोमोस्फीयर का उच्च-रिज़ॉल्यूशन अध्ययन।
    • USO ने CALLISTO स्पेक्ट्रोग्राफ (40–900 MHz) की मेजबानी की है → सौर रेडियो विस्फोटों का पता लगाता है।
  • USO भारत की एकमात्र प्रमुख भू-आधारित (ground-based) सौर वेधशाला है।

पीआरएल (PRL) माउंट आबू वेधशाला

  • एक्सोप्लैनेट की खोज: भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) और इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों ने एक नया एक्सोप्लैनेट TOI-6038A b खोजा है।
  • खोज का माध्यम:
    • इसे PRL की माउंट आबू वेधशाला में लगे PARAS-2 स्पेक्ट्रोग्राफ का उपयोग करके खोजा गया।
    • PARAS-2: एशिया का सबसे उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला स्थिर रेडियल वेलोसिटी (RV) स्पेक्ट्रोग्राफ है।
  • ग्रह की विशेषताएँ:
    • आकार: सघन ‘सब-सैटर्न’ आकार का ग्रह।
    • द्रव्यमान और त्रिज्या: पृथ्वी के द्रव्यमान का 78.5 गुना और त्रिज्या पृथ्वी की त्रिज्या की 6.41 गुना।
    • प्रणाली: विस्तृत द्वि-तारा (Binary) प्रणाली में स्थित।
    • कक्षा: एक चमकीले और धातु-समृद्ध F-प्रकार के तारे की परिक्रमा हर 5.83 दिनों में करता है।
  • वैज्ञानिक महत्व: यह नेपच्यून जैसे ग्रहों और गैस दानवों (बृहस्पति) के बीच के संक्रमण क्षेत्र (‘सब-सैटर्न’) में आता है, जो सौर मंडल में मौजूद नहीं है, इसलिए यह ग्रहों के विकास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
वेधशाला

वेणु बप्पू वेधशाला (Vainu Bappu Observatory)

  • कवलूर, तमिलनाडु
  • भारत की “टेलीस्कोप सिटी” के रूप में जानी जाती है।

ग्रोथ इंडिया टेलीस्कोप (GIT)

  • भारत का पहला पूर्णतः रोबोटिक ऑप्टिकल अनुसंधान टेलीस्कोप। 
  • यह लद्दाख के हैनले स्थित भारतीय खगोलीय वेधशाला में स्थित है, जो विश्व की सबसे ऊँची खगोलीय वेधशालाओं में से एक है। 
वेधशाला

इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप (ILMT)

  • एशिया का सबसे बड़ा लिक्विड मिरर टेलीस्कोप उत्तराखंड के देवस्थल वेधशाला में उद्घाटित किया गया।
  • 4 मीटर व्यास का घूर्णनशील दर्पण, जो द्रव पारा की पतली परत से बना है, का उपयोग प्रकाश को एकत्र करने और केंद्रित करने के लिए करता है। 
  • उद्देश्य: प्रतिदिन रात में आकाश के एक ही भाग को स्कैन करके अस्थायी/परिवर्ती खगोलीय पिंडों (सुपरनोवा, क्षुद्रग्रह, अंतरिक्ष मलबा) का पता लगाना।
  • सहयोग: भारत, बेल्जियम, पोलैंड, उज्बेकिस्तान, और कनाडा।
  • यह दुनिया की पहली समर्पित लिक्विड मिरर टेलीस्कोप है जो खगोलीय सर्वेक्षणों के लिए बनाई गई है।

मेज़र एटमॉस्फेरिक चेरेनकोव एक्सपेरिमेंट (MACE) वेधशाला

  • स्थान: हेनले, लद्दाख में स्थित हेनले डार्क स्काई रिज़र्व (HDSR) में, 4300 मीटर की ऊँचाई पर स्थापित।
  • यह एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का सबसे ऊंचा इमेजिंग चेरेनकोव टेलीस्कोप है।
  • उद्घाटन: डॉ. अजीत कुमार मोहंती, परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष एवं DAE सचिव द्वारा किया गया।
  • मुख्य उद्देश्य: चेरेनकोव इमेजिंग प्रौद्योगिकी का उपयोग कर उच्च-ऊर्जा गामा किरणों का अध्ययन करना, रेडियो तरंगों का नहीं।
  • विकास: भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित, ECIL और अन्य भारतीय औद्योगिक भागीदारों के समर्थन से।

एस्ट्रोसैट अंतरिक्ष टेलिस्कोप (AstroSat Space Telescope)

  • यह भारत की पहली बहु-तरंगदैर्ध्य (Multi-wavelength) अंतरिक्ष दूरबीन है।
  • प्रक्षेपण: इसे वर्ष 2015 में इसरो के PSLV-C30 रॉकेट द्वारा सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया था।
  • लक्ष्य: इसका मुख्य उद्देश्य एक्स-रे (X-ray), ऑप्टिकल (दृश्यमान प्रकाश), और यूवी (UV) स्पेक्ट्रल बैंड में खगोलीय स्रोतों का एक साथ विस्तृत अध्ययन करना है।
  • प्रमुख उपलब्धि: इसने 600 से अधिक गामा-रे बर्स्ट (GRBs) का पता लगाया है। ये बर्स्ट या तो विशाल तारों की मृत्यु या न्यूट्रॉन तारों के विलय का संकेत देते हैं।
  • मुख्य उपकरण: अल्ट्रा-वॉयलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (UVIT)
    • यह एक ‘ट्विन-टेलीस्कोप’ यूवी इमेजर है जो निकट-यूवी (NUV), दृश्यमान (Visible), और सुदूर-यूवी (FUV) बैंड में कार्य करता है।
    • UVIT भारत की पहली यूवी अंतरिक्ष दूरबीन है, और सुदूर-यूवी (FUV) इमेजिंग क्षमता प्रदान करने वाली दुनिया की केवल दूसरी दूरबीन है (हबल स्पेस टेलीस्कोप के बाद)।

एक्स-रे पोलरीमीटर सैटेलाइट (XPoSat) मिशन

  • भारत का पहला समर्पित उपग्रह जो ब्रह्मांडीय X-Ray विकिरण की पोलराइज़ेशन (ध्रुवीकरण) के साथ-साथ पल्सर, ब्लैक होल और न्यूट्रॉन सितारों जैसे चमकीले खगोलीय स्रोतों की गतिशीलता का अध्ययन करता है।
  • वैश्विक स्थिति: यह मिशन NASA के इमेजिंग X-Ray पोलरिमेट्री एक्सप्लोरर (IXPE), जिसे 2021 में प्रक्षेपित किया गया था, के बाद अपनी तरह का विश्व का दूसरा मिशन है।
  • प्रक्षेपण: इसे 2024 में प्रक्षेपित किया गया।
  • कक्षा: यह निम्न पृथ्वी कक्षा (लगभग 650 किमी की ऊँचाई) से अवलोकन के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • वैज्ञानिक पेलोड्स (उपकरण): 2
    • POLIX (पोलरीमीटर इंस्ट्रूमेंट इन एक्स-रे)
    • XSPECT (एक्स-रे स्पेक्ट्रोस्कोपी और टाइमिंग)।

खगोलीय वेधशाला केंद्र के रूप में लद्दाख (Ladakh as an Observatory Hub)

लद्दाख खगोल विज्ञान के लिए आदर्श क्यों है?
  • भौगोलिक और वातावरणीय लाभ:
    • उच्च ऊँचाई (3,000–4,500 मीटर): वायुमंडलीय विक्षोभ को कम करती है, जिससे स्पष्ट अवलोकन संभव होता है।
    • शुष्क और ठंडा रेगिस्तानी मौसम: जलवाष्प की अत्यंत कम मात्रा, जो अवरक्त और ऑप्टिकल अवलोकनों के लिए अति उत्तम है।
    • स्वच्छ आकाश: वर्ष भर में 300 से अधिक रातें पूरी तरह से साफ आकाश उपलब्ध रहता है।
  • न्यूनतम हस्तक्षेप:
    • न्यूनतम प्रकाश प्रदूषण: विरल जनसंख्या के कारण कृत्रिम प्रकाश का हस्तक्षेप लगभग नगण्य है।
    • निम्न रेडियो हस्तक्षेप: रेडियो खगोल विज्ञान के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है।
लद्दाख में प्रमुख वेधशालाएँ
  • भारतीय खगोलीय वेधशाला, हेनले (IAO): यह दुनिया की सबसे ऊँची वेधशालाओं में से एक है।
  • हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप (HCT): हेनले में स्थित 2 मीटर का ऑप्टिकल-अवरक्त टेलीस्कोप।
  • ग्रोथ-इंडिया टेलीस्कोप (GROWTH-India): क्षणिक खगोल विज्ञान (Transient astronomy) के लिए एक रोबोटिक टेलीस्कोप।
  • ILMT (प्रस्तावित): अंतरराष्ट्रीय तरल दर्पण दूरबीन।
  • आगामी महत्वपूर्ण परियोजनाएं:
    • डार्क स्काई रिजर्व (Dark Sky Reserve)
      • 2022 में लद्दाख के हनले में भारत का पहला डार्क स्काई रिजर्व स्थापित किया गया।
      • उद्देश्य: खगोल विज्ञान के लिए आकाश की गुणवत्ता की रक्षा करना और प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित करना।
      • संयुक्त पहल: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन और भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA)।
    • होप (HOPE – Human Outer Planet Exploration)
      • प्रोटोप्लैनेट (बेंगलुरु स्थित स्पेस टेक फर्म) द्वारा इसरो के सहयोग से लद्दाख के त्सो कार (Tso Kar) क्षेत्र में स्थापित। 
      • यह चंद्रमा और मंगल जैसी स्थितियों का अनुकरण करता है।
      • एनालॉग स्टेशन (Analogue Stations)
        • ये अंतरिक्ष तकनीक के परीक्षण, चालक दल के प्रशिक्षण, आवास क्षमता (Habitability) के अध्ययन और जीवन की खोज के लिए ‘परीक्षण आधार’ के रूप में कार्य करते हैं।
        • प्रमुख वैश्विक एनालॉग स्टेशन (कुल 33): BIOS-3 (रूस), HERA (USA), SHEE (यूरोप), MDRS (USA)।

भारतीय टेलीस्कोप: वर्गीकरण और मुख्य विशेषताएँ

श्रेणीटेलीस्कोप का नामस्थानप्रबंधन / संबद्धतामुख्य उपकरण / विशेषताएँवैज्ञानिक महत्व
रेडियो टेलीस्कोप (Radio Telescopes)जाइंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (GMRT)पुणे के पास, महाराष्ट्रNCRA (DAE और TIFR के तहत)30 संचालित करने योग्य परवलयिक रेडियो डिश (प्रत्येक 45 मीटर)विश्व का सबसे बड़ा निम्न-आवृत्ति (Low-frequency) रेडियो टेलीस्कोप।
ऊटी रेडियो टेलीस्कोप (ORT)मुथोरई, ऊटी के पास, तमिलनाडुNCRAएकल लंबी बेलनाकार (Cylindrical) रेडियो दूरबीन, 530 मीटर लंबी।रेडियो खगोल विज्ञान और सौर पवन का अध्ययन।
USO (CALLISTO स्पेक्ट्रोग्राफ)फतेह सागर झील, उदयपुर, राजस्थानभौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL), अहमदाबादसहायक CALLISTO स्पेक्ट्रोग्राफ (40–900 MHz)सौर रेडियो विस्फोटों (Solar radio bursts) का पता लगाना।
ऑप्टिकल और सौर टेलीस्कोप (Optical & Solar Telescopes)उदयपुर सौर वेधशाला (USO)फतेहसागर झील, उदयपुर, राजस्थानPRL, अहमदाबादGONG टेलीस्कोप (सौर भूकंप विज्ञान); MAST (मल्टी एप्लीकेशन सोलर टेलीस्कोप)भू-आधारित ऑप्टिकल सौर भौतिकी; भारत की प्रमुख सौर वेधशाला।
वेणु बापू वेधशालाकवालूर, तमिलनाडुIIA (भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान)कई ऑप्टिकल टेलीस्कोपइसे भारत की “टेलीस्कोप सिटी” के रूप में जाना जाता है।
ग्रोथ इंडिया टेलीस्कोप (GIT)हनले, लद्दाखभारतीय खगोलीय वेधशाला (IIA)भारत का पहला पूर्णतः रोबोटिक ऑप्टिकल अनुसंधान टेलीस्कोप।क्षणिक घटनाओं (Transient events) का अध्ययन।
इंटरनेशनल लिक्विड मिरर टेलीस्कोप (ILMT)देवस्थल, उत्तराखंडभारत, बेल्जियम, पोलैंड, उज्बेकिस्तान, कनाडा4 मीटर का घूमने वाला तरल पारा दर्पण (Liquid mercury mirror)एशिया का सबसे बड़ा लिक्विड मिरर टेलीस्कोप; गहन अंतरिक्ष का सर्वेक्षण।

विश्व की प्रमुख टेलिस्कोप 

महान वेधशाला कार्यक्रम (Great Observatory Programme)
  • यह नासा (NASA) द्वारा 1990 और 2003 के बीच अंतरिक्ष में प्रक्षेपित चार प्रमुख वेधशालाओं की एक श्रृंखला थी।
    • हबल स्पेस टेलीस्कोप (HST)
    • कॉम्पटन गामा रे ऑब्जर्वेटरी (CGRO)
    • चंद्रा एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी (CXO)
    • स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कोप (SST)
  • प्रत्येक टेलीस्कोप को विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम की एक विशिष्ट श्रेणी का निरीक्षण करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिससे ब्रह्मांड का एक व्यापक दृश्य प्राप्त हो सके।
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST)
  • प्रक्षेपण: 2021 में नासा (NASA) द्वारा।
  • अवस्थिति: यह पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर L2 लैग्रेंज बिंदु पर सूर्य की परिक्रमा कर रहा है।
  • विशेषता: यह अब तक निर्मित सबसे बड़ा इन्फ्रारेड (अवरक्त) टेलीस्कोप है, जिसका प्राथमिक दर्पण 6.5 मीटर चौड़ा है।
  • कार्यप्रणाली: यह अत्यधिक धुंधली और दूर स्थित खगोलीय वस्तुओं का पता लगाने के लिए निकट-अवरक्त (Near-infrared) और मध्य-अवरक्त (Mid-infrared) तरंग दैर्ध्य का उपयोग करता है।
थर्टी मीटर टेलीस्कोप (TMT) – तीस मीटर दूरबीन
  • प्रकृति: यह एक अत्यंत विशाल ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड टेलीस्कोप है, जिसे 492 षट्कोणीय टुकड़ों से बने 30 मीटर व्यास वाले दर्पण के साथ बनाया जा रहा है।
  • परियोजना स्थल: यह अंतर्राष्ट्रीय परियोजना मौना किया (Mauna Kea), हवाई (USA) में स्थापित की जा रही है।
  • सहयोगी देश: कनाडा, चीन, भारत, जापान और अमेरिका के संस्थान इस संयुक्त प्रयास में शामिल हैं।
  • मुख्य उद्देश्य: इसका लक्ष्य प्रारंभिक आकाशगंगाओं, ब्लैक होल और एक्सोप्लैनेट (बाह्य ग्रहों) के अध्ययन के लिए उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग उपलब्ध कराना है।
  • भारत का योगदान: भारत इस परियोजना में दर्पण (Mirrors), एक्चुएटर्स (Actuators), सेंसर और सॉफ्टवेयर का विकास करके महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसका समन्वय इंडिया-TMT केंद्र (भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, बेंगलुरु) द्वारा किया जा रहा है।
स्क्वायर किलोमीटर एरे (SKA) परियोजना
  • स्वरूप: यह दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में दो चरणों में निर्मित एक अंतरराष्ट्रीय, अत्याधुनिक, मेगा साइंस सुविधा है।
  • उद्देश्य: दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील रेडियो टेलीस्कोप समूह बनाना, जिसका कुल संग्रहण क्षेत्र अंततः एक वर्ग किलोमीटर से अधिक होगा। यह अत्यधिक दूरियों से आने वाले क्षीण (कमजोर) रेडियो संकेतों का पता लगाने में सक्षम है।
  • कार्यप्रणाली (आवृत्ति रेंज):
    • दक्षिण अफ्रीकी एरे: मध्य-आवृत्ति (350 MHz से 15.4 GHz) संकेतों को स्कैन करेगा।
    • ऑस्ट्रेलियाई टेलीस्कोप: निम्न-आवृत्ति (50-350 MHz) रेंज में कार्य करेगा।
  • भारत की भागीदारी: भारत जनवरी 2024 में SKA परियोजना का पूर्ण सदस्य बन गया।
सोफिया (SOFIA – स्ट्रैटोस्फेरिक ऑब्जर्वेटरी फॉर इंफ्रारेड एस्ट्रोनॉमी)
  • यह एक बोइंग 747 SP विमान पर स्थापित एक टेलीस्कोप था, जो ब्रह्मांड में वस्तुओं द्वारा उत्सर्जित अवरक्त प्रकाश (ऊष्मा) का अध्ययन करता था।
  • संचालन: नासा (NASA) और जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा संयुक्त रूप से संचालित।
  • विशेषता: यह दुनिया की सबसे बड़ी वायुवाहित खगोलीय वेधशाला (Airborne astronomical observatory) थी।
  • वर्तमान स्थिति: 12 वर्षों तक कार्य करने के बाद, सोफिया परियोजना को 2022 में समय से पहले समाप्त कर दिया गया।
यूक्लिड अंतरिक्ष दूरबीन (Euclid Space Telescope – EST)
  • प्रक्षेपण: 2023 में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) द्वारा लॉन्च किया गया।
  • स्थान: इसे पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर स्थित लैग्रेंज बिंदु 2 (L2) पर स्थापित किया गया है।
  • मुख्य उद्देश्य: ब्रह्मांड का सबसे बड़ा त्रि-आयामी (3D) मानचित्र तैयार करना।
  • वैज्ञानिक लक्ष्य: डार्क मैटर के वितरण को बेहतर ढंग से समझना और प्रारंभिक ब्रह्मांड में डार्क एनर्जी के प्रभाव का पता लगाना।

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