वंशागति और विभिन्नता

वंशागति और विभिन्नता विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो यह समझाता है कि जीवों में गुण माता-पिता से संतानों में कैसे स्थानांतरित होते हैं तथा उनमें भिन्नताएँ क्यों उत्पन्न होती हैं। यह विषय आनुवंशिकता, विविधता और जैविक विकास के मूल सिद्धांतों को समझने में सहायक है। इस विषय के अंतर्गत हम वंशागति के नियमों, आनुवंशिक गुणों तथा विभिन्नता के कारणों का अध्ययन करेंगे।

  • क्या आपने कभी एक जनक और संतति के बीच के अद्भुत जैविक संबंध पर विचार किया है? ऐसा क्यों है कि आम के बीज से हमेशा आम का पेड़ ही उगता है, सेब का पेड़ नहीं? और यह क्यों होता है कि कोई संतति अपने एक जनक से आकर्षक नीली आँखें वंशागत रूप में प्राप्त कर सकती है, जबकि दूसरे जनक से अधिक लंबाई?
  • इन सभी प्रश्नों के उत्तर आनुवंशिकी के आकर्षक क्षेत्र में निहित हैं। यह वह विज्ञान है जो विशेष रूप से वंशागति (माता-पिता से संतानों में गुणों का जाना) और विभिन्नता (संतानों के बीच अंतर) को समझने के लिए समर्पित है।
  • वंशागति या आनुवंशिकता (Inheritance / Heredity):
    • यह एक जैविक क्रियाविधि है जिसके द्वारा विशिष्ट शारीरिक, जैव-रासायनिक और कार्यिकीय (Physiological) लक्षण एक पीढ़ी (जनक) से अगली पीढ़ी (संतति) में संचरित होते हैं।
    • यह परिवार के सदस्यों के बीच समानताओं का प्राथमिक कारण है।
    • तथ्य: ‘आनुवंशिकता’ (Heredity) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्पेंसर ने 1863 में किया था।
  • विभिन्नता (Variation):
    • यह जीवन में पाई जाने वाली विविधता को दर्शाती है।
    • यह एक ही प्रजाति के जीवों (सहोदर/भाई-बहन सहित) के बीच प्राकृतिक रूप से देखे जाने वाले अंतर की मात्रा है।
    • महत्व: विभिन्नता यह सुनिश्चित करती है कि संतति अपने जनकों या आपस में पूर्ण रूप से समान (Perfect clones) न हों। यह उद्विकास या विकास (Evolution) के विवेचन में सहायक है।
    • विभिन्नता का कारण: प्रजातियों में विभिन्नताएँ मुख्य रूप से लैंगिक जनन के दौरान अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) में होने वाले जीन विनिमय के कारण उत्पन्न होती हैं।

आनुवंशिकी के जनक: ग्रेगर मेंडल

  • 19वीं सदी के मध्य में, ऑस्ट्रियाई पादरी ग्रेगर मेंडल ने वंशागति (Heredity) के मूल सिद्धांतों की खोज की। 
  • आश्चर्यजनक रूप से, उन्होंने मानव के बजाय उद्यान मटर (पाइसम सैटाइवम) के पौधों पर अपना अध्ययन केंद्रित किया।
  • सात वर्षों तक हज़ारों मटर के पौधों का प्रजनन या संकरण (Cross-breeding) कराने के बाद, मेंडल ने यह निष्कर्ष निकाला कि लक्षण या विशेषक (Traits) (जैसे पौधे की ऊँचाई – लंबा या बौना या फूलों का रंग – बैंगनी या सफेद) अगली पीढ़ी में बहुत ही पूर्वानुमानित गणितीय प्रतिरूपों के अनुसार संचरित होते हैं।
  • मेंडल ने मटर के पौधे को ही क्यों चुना?
    • छोटा जीवन चक्र: मटर एकवर्षीय पादप है, जो कम समय में कई पीढ़ियों का अध्ययन करने की सुविधा प्रदान करता है।
    • शुद्ध वंशक्रम की सुगमता: मटर के द्विलिंगी पुष्पों में स्व-परागण स्वाभाविक रूप से होता है, जिससे शुद्ध वंशक्रम (Pure-line) या समयुग्मजी (Homozygous) पौधे आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं।
    • सरल पर-परागण: विपुंसन तकनीक (Emasculation technique) का उपयोग करके इसमें कृत्रिम पर-परागण या संकरण कराना सरल था।
    • विशिष्ट लक्षण: मटर का पौधा विभिन्न प्रकार के विपर्यासी (Contrasting) और आसानी से पहचाने जा सकने वाले लक्षण प्रदर्शित करता है।

मेंडल के नियमों और आधुनिक आनुवंशिक अवधारणाओं को भली-भांति समझने के लिए, कुछ प्रमुख पदों (Terms) का ज्ञान होना आवश्यक है:

पदसरलीकृत परिभाषाविस्तृत व्याख्या
जीन (मेंडल के ‘कारक’)(Genes)किसी विशिष्ट लक्षण के लिए निर्देश।यह आनुवंशिकी की कार्यात्मक इकाई (Functional unit) है जो किसी विशेष लक्षण (जैसे आंखों का रंग या एंजाइम उत्पादन) को निर्धारित करती है। यह डीएनए (DNA) का एक विशिष्ट अनुक्रम होता है जो गुणसूत्र पर एक निश्चित स्थान (विस्थल या Locus) पर स्थित होता है।
युग्मविकल्पी / एलील(Alleles)एक ही जीन के विभिन्न रूप या संस्करण।एक जीन के वैकल्पिक रूप जो उत्परिवर्तन (Mutation) द्वारा उत्पन्न होते हैं और गुणसूत्र पर एक ही स्थान पर पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, लंबाई जैसे लक्षण के लिए, एक एलील “लंबे” के लिए कूट (code) कर सकता है और दूसरा “बौने” के लिए।
जीनप्ररूप / जीनोटाइप(Genotype)शरीर के अंदर आनुवंशिक कूट (जेनेटिक कोड)।किसी जीव को वंशागत रूप में प्राप्त एलील का विशिष्ट समूह (उदाहरण के लिए, दोनों जनकों से “लंबे” एलील प्राप्त करना)। यह किसी लक्षण के अंतर्निहित आनुवंशिक संघटन को दर्शाता है।
लक्षणप्ररूप / फीनोटाइप(Phenotype)वह भौतिक लक्षण जिसे हम वास्तव में देख सकते हैं।पर्यावरण के साथ जीव के जीनोटाइप की अंतःक्रिया (Interaction) के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले दृश्यमान, भौतिक या जैव-रासायनिक लक्षण (उदाहरण के लिए, पौधे का स्पष्ट रूप से लंबा दिखाई देना)।
समयुग्मजी(Homozygous)समान युग्म।किसी लक्षण के लिए दो समान एलील (युग्मविकल्पी) का उपस्थित होना (जैसे- TT या tt)।
विषमयुग्मजी(Heterozygous)मिश्रित युग्म।किसी लक्षण के लिए दो असमान (भिन्न) एलील का उपस्थित होना (जैसे- Tt)।

मेंडल के वंशागति के नियम: लक्षण कैसे व्यक्त होते हैं?

जब जीव लैंगिक जनन (Sexually reproduce) करते हैं, तो उन्हें प्रत्येक जीन की दो प्रतियाँ प्राप्त होती हैं – एक माता से और एक पिता से। ये प्रतियाँ, जिन्हें युग्मविकल्पी या एलील कहा जाता है, कभी-कभी एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।

प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)
  1. सिद्धांत: जब किसी जीव को एक लक्षण के लिए दो अलग-अलग आनुवंशिक प्रतियाँ (एलील) प्राप्त होती हैं, तो उनमें से एक एलील – जिसे प्रभावी कारक (Dominant factor) कहा जाता है – जीव के दृश्यमान लक्षण (लक्षणप्ररूप/Phenotype) में पूरी तरह से व्यक्त होता है। दूसरा एलील – जो अप्रभावी कारक (Recessive factor) है – छिपा रहता है और व्यक्त नहीं हो पाता।
  2. पहचान: यह नियम एकसंकर क्रॉस (Monohybrid cross) की पहली पीढ़ी (F1) में प्रभावी लक्षण के प्रकट होने की व्याख्या करता है।
  3. उदाहरण: यदि लंबेपन का प्रभावी एलील ‘T’ है और बौनेपन का अप्रभावी एलील ‘t’ है, तो एक संकर पौधा (Tt) हमेशा लंबा होगा, क्योंकि ‘T’ एलील ‘t’ के प्रभाव को दबा देता है।
पृथक्करण का नियम/युग्मकों की शुद्धता का नियम (Law of Segregation)
  • सिद्धांत: युग्मक (Gametes – जनन कोशिकाएँ, जैसे शुक्राणु और अंडाणु) के निर्माण के समय, किसी लक्षण के लिए द्विगुणित (Diploid) जनक में मौजूद दो एलील (कारक) एक-दूसरे से अलग/विसंयोजित (Segregate) हो जाते हैं। यह पृथक्करण यादृच्छिक होता है, और परिणामस्वरूप, प्रत्येक युग्मक जोड़े में से केवल एक एलील प्राप्त करता है। यह महत्वपूर्ण है कि ये एलील अलग होने से पहले मिश्रित नहीं होते हैं, जिससे युग्मक की “शुद्धता” बनी रहती है।
  • महत्व: यह सिद्धांत F2 पीढ़ी में अप्रभावी लक्षण के फिर से प्रकट होने का कारण स्पष्ट करता है।
  • उदाहरण: एक विषमयुग्मजी (Heterozygous) लंबा पौधा (Tt) दो प्रकार के युग्मक समान अनुपात (50% ‘T’ एलील वाले और 50% ‘t’ एलील वाले) में उत्पन्न करता है।
स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
  1. सिद्धांत: यह नियम तब लागू होता है जब दो या दो से अधिक अलग-अलग लक्षणों की वंशागति का अध्ययन किया जाता है।
  2. कार्यविधि: जब किसी संकर में लक्षणों के दो जोड़े एक साथ आते हैं, तो एक जोड़े के एलील का पृथक्करण (अलग होना) दूसरे जोड़े के एलील के पृथक्करण से पूरी तरह से स्वतंत्र होता है।
  3. प्रदर्शन: इस सिद्धांत को द्विसंकर क्रॉस (Dihybrid cross) – जिसमें बीज का रंग और आकार जैसे दो विपर्यासी लक्षणों पर विचार किया जाता है – के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है।
  4. परिणाम: F1 संकरों के द्विसंकर क्रॉस के परिणामस्वरूप F2 पीढ़ी में एक विशिष्ट 9:3:3:1 लक्षणप्ररूपी अनुपात (Phenotypic ratio) प्राप्त होता है।
  5. शर्त: यह नियम मुख्य रूप से उन जीनों के लिए लागू होता है जो या तो अलग-अलग गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं या एक ही गुणसूत्र पर एक-दूसरे से काफी दूर होते हैं (जहाँ जीन विनिमय उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है)।

    अपवाद: जब प्रकृति मेंडल के नियमों का पालन नहीं करती

    • अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance) – मिश्रण प्रभाव:
      • सिद्धांत: इस स्थिति में, दो अलग-अलग लक्षणों में से कोई भी पूरी तरह से प्रभावी नहीं होता है। इसके बजाय, वे रंगों की तरह आपस में मिलकर एक मध्यवर्ती या मिश्रित लक्षणप्ररूप बनाते हैं।
      • उदाहरण: जब एक लाल और एक सफेद स्नैपड्रैगन (श्वान पुष्प) फूल वाले पौधे का संकरण कराया जाता है, तो उत्पन्न होने वाली संतति (F1 पीढ़ी) के फूल गुलाबी रंग के होंगे।
    • सह-प्रभाविता (Co-dominance) – “दोनों की जीत”:
      • सिद्धांत: यहाँ, किसी भी लक्षण का मिश्रण नहीं होता है और न ही कोई लक्षण दूसरे पर हावी होता है। दोनों एलील (युग्मविकल्पी) लक्षणप्ररूप (Phenotype) में एक साथ और पूरी तरह से समान रूप से व्यक्त होते हैं।
      • उदाहरण:मानव ABO रक्त समूह इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यदि किसी व्यक्ति को माता-पिता से ‘A’ और ‘B’ रक्त समूह के जीन मिलते हैं, तो उसे ‘AB’ रक्त समूह मिलता है (मिश्रित होकर कोई “C” रक्त समूह नहीं मिलता), जहाँ ‘A’ और ‘B’ दोनों गुण पूरी तरह से व्यक्त होते हैं।
    • बहुजीनी लक्षण (Polygenic Traits) – व्यापक स्पेक्ट्रम:
      • सिद्धांत: मेंडल ने ऐसे लक्षणों का अध्ययन किया जो एक एकल जीन द्वारा नियंत्रित होते थे (एकजीनी)। हालांकि, कई मानव लक्षण, जैसे कि लंबाई, त्वचा का रंग और बुद्धिमत्ता, एक सरल “हाँ या ना” वाली स्थिति में नहीं होते हैं।
      • व्याख्या: ये लक्षण एक विस्तृत श्रेणी में मौजूद होते हैं क्योंकि वे कई स्वतंत्र जीनों के संचयी प्रभाव से नियंत्रित होते हैं जो एक साथ काम करते हैं। इसके अलावा, पर्यावरणीय कारक (जैसे पोषण) भी अक्सर इन लक्षणों को प्रभावित करते हैं।
    • बहुप्रभाविता (Pleiotropy / प्लीओट्रॉपी):
      • सिद्धांत: जब एक अकेला जीन कई अलग-अलग लक्षणप्ररूपी अभिव्यक्तियों को नियंत्रित या प्रभावित करता है, तो इसे बहुप्रभाविता कहते हैं। यह अक्सर किसी उपापचयी (Metabolic) पथ को प्रभावित करने के कारण होता है।
      • उदाहरण: फिनाइलकीटोन्यूरिया (Phenylketonuria – PKU) नामक आनुवंशिक रोग। इस रोग में एक जीन में उत्परिवर्तन के कारण मानसिक मंदता के साथ-साथ बालों और त्वचा के रंग में भी कमी आ जाती है।
    • कोई शिशु नर (Male) के रूप में विकसित होगा या मादा (Female) के रूप में, इसके निर्देश विशिष्ट संरचनाओं पर स्थित होते हैं जिन्हें लिंग गुणसूत्र कहा जाता है।
      • मादा (स्त्री): इनमें दो एक समान लिंग गुणसूत्र होते हैं: XX
      • नर (पुरुष): इनमें दो भिन्न लिंग गुणसूत्र होते हैं: XY
        • Y गुणसूत्र, X गुणसूत्र की तुलना में काफी छोटा होता है।

    मानव में लिंग का निर्धारण

    • चूँकि मादा में केवल X गुणसूत्र होते हैं, इसलिए उनके द्वारा उत्पन्न प्रत्येक अंड कोशिका (Ovum) में अनिवार्य रूप से एक X गुणसूत्र ही होता है। 
    • इसके विपरीत, नर दो प्रकार के शुक्राणु उत्पन्न करते हैं: आधे शुक्राणुओं में X गुणसूत्र होता है, और शेष आधे शुक्राणुओं में Y गुणसूत्र होता है।
    • परिणाम:
      • यदि X गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडे को निषेचित (Fertilize) करता है, तो परिणाम XX होगा, जिससे एक मादा/लड़की शिशु का जन्म होता है।
      • यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडे को निषेचित करता है, तो परिणाम XY होगा, जिससे एक नर/लड़का शिशु का जन्म होता है।
    • इसलिए, जैविक और वैज्ञानिक रूप से, बच्चे का लिंग पूरी तरह से पिता के शुक्राणु के आनुवंशिक योगदान द्वारा ही निर्धारित होता है। लड़का या लड़की होने की प्रायिकता (संभावना) हमेशा 50% होती है।
    • यह वैज्ञानिक तथ्य उस ऐतिहासिक या सामाजिक कलंक (रूढ़िवादी धारणा) का पूर्णतया खंडन करता है जो कन्या शिशु (लड़की) के जन्म के लिए माँ को दोष देने का प्रयास करता है।
    वंशागति और विभिन्नता

    मधुमक्खी में लिंग निर्धारण

    • मधुमक्खियों में लिंग निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि किसी जीव (व्यष्टि) को गुणसूत्रों के कितने समुच्चय प्राप्त होते हैं।
    • मादा (रानी या श्रमिक): यह एक निषेचित अंड (शुक्राणु और अंड के संलयन) से विकसित होती है। ये द्विगुणित (Diploid) होती हैं और इनमें 32 गुणसूत्र होते हैं।
    • नर (ड्रोन): यह अनिषेकजनन (Parthenogenesis) की प्रक्रिया के माध्यम से एक अनिषेचित अंड से विकसित होता है। ये अगुणित (Haploid)होते हैं और इनमें 16 गुणसूत्र होते हैं।
    • इस प्रणाली को अगुणित-द्विगुणित लिंग निर्धारण प्रणाली के रूप में जाना जाता है।
    • नर की विशेष विशेषताएँ:
      • ये समसूत्री विभाजन (Mitosis) द्वारा शुक्राणु उत्पन्न करते हैं (चूँकि ये पहले से ही अगुणित होते हैं, इसलिए इनमें अर्धसूत्री विभाजन नहीं होता)।
      • इनका कोई पिता या पुत्र नहीं होता है (क्योंकि ये सीधे अनिषेचित अंडे से बनते हैं)।
      • इनके दादा होते हैं और पोते हो सकते हैं (क्योंकि इनकी माता का एक पिता था, और इनकी बेटियाँ आगे चलकर नर संतानों को जन्म दे सकती हैं)

    लिंग निर्धारण की क्रियाविधि (Sex Determination Mechanisms)

    प्रणाली विषमयुग्मकी लिंग विवरण उदाहरण 
    XO प्रकारनर (अलिंगसूत्र + XO)मादाओं में XX गुणसूत्र होते हैं, जबकि नर में केवल एक X गुणसूत्र (XO) होता है; Y गुणसूत्र अनुपस्थित रहता है।टिड्डे (Grasshoppers)
    XY प्रकारनर (अलिंगसूत्र + XY)मादाओं में XX और नर में XY गुणसूत्र होते हैं। Y गुणसूत्र X की तुलना में छोटा होता है।मनुष्य, ड्रोसोफिला/फल मक्खी
    ZW प्रकारमादा (अलिंगसूत्र + ZW)नर में ZZ और मादा में ZW गुणसूत्र होते हैं। यहाँ मादा हेटेरोगैमेटिक होती है।पक्षी 
    अगुणित-द्विगुणित (Haplodiploid)लागू नहीं (N/A)मादाएँ द्विगुणित होती हैं और निषेचित अंडों से विकसित होती हैं। नर (ड्रोन) अगुणित होते हैं और अनिषेकजनन द्वारा, अर्थात् अनिषेचित अंडों से विकसित होते हैं। नर शुक्राणु का उत्पादन समसूत्री विभाजन (Mitosis) द्वारा करते हैं।मधुमक्खियाँ 
    • उत्परिवर्तन डीएनए अनुक्रमों में होने वाला वह बदलाव या परिवर्तन है जिसके परिणामस्वरूप किसी जीव के जीनप्ररूप (Genotype) और लक्षणप्ररूप (Phenotype) में बदलाव आ जाता है। पुनर्योजन (Recombination) के साथ-साथ, यह भी आनुवंशिक विभिन्नता का एक प्रमुख स्रोत है।
    • आनुवंशिक विभिन्नता का स्रोत → उद्विकास (Evolution) और प्राकृतिक चयन (Natural selection) का आधार है।
    • गुणसूत्रों में होने वाले परिवर्तनों (डीएनए खंडों की हानि/विलोपन, प्राप्ति, निवेशन, या द्विगुणन) के परिणामस्वरूप असामान्यताएं या विपथन (Aberrations) उत्पन्न होते हैं, जिन्हें आमतौर पर कैंसर कोशिकाओं में देखा जाता है।
    • उत्परिवर्तन के प्रकार
      • जीन उत्परिवर्तन या बिंदु उत्परिवर्तन (Gene Mutation / Point mutation)
        • यह एकल डीएनए क्षार युग्म में होने वाला परिवर्तन है।
        • उदाहरण: दात्र कोशिका अरक्तता / सिकल सेल एनीमिया।
        • फ्रेम-शिफ्ट उत्परिवर्तन: यह तब होता है जब न्यूक्लियोटाइड को ऐसी संख्या में प्रवेशित या विलोपित किया जाता है जो तीन से विभाज्य नहीं होती है।इसके कारण अनुवादन (Translation) के दौरान प्रकूटों (Codons) का पठन ढांचा (Reading frame) खिसक या बदल जाता है।
      • गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation)
        • संरचनात्मक परिवर्तन (Structural changes): गुणसूत्र की संरचना में परिवर्तन। इसमें विलोपन, द्विगुणन, प्रतिलोमन, और स्थानांतरण शामिल हैं।
        • संख्यात्मक परिवर्तन (Numerical changes): गुणसूत्रों की कुल संख्या में परिवर्तन।
          • असुगुणिता या एन्यूप्लॉइडी (Aneuploidy): गुणसूत्रों की संख्या में एकाधिक वृद्धि या कमी (जैसे- डाउन सिंड्रोम, जिसमें 21वें गुणसूत्र की त्रिसूत्रता (Trisomy) 21 होती है)।
          • बहुगुणिता (Polyploidy): गुणसूत्रों के पूरे समुच्चय (Set) में वृद्धि।
    • उत्परिवर्तजन वे रासायनिक और भौतिक कारक हैं (जैसे- पराबैंगनी या UV विकिरण) जो जीवों में उत्परिवर्तन को प्रेरित करते हैं।

    आनुवंशिक विकार (Genetic Disorders)

    • कभी-कभी, आनुवंशिक सामग्री में यादृच्छिक परिवर्तन या उत्परिवर्तन हो जाते हैं। यद्यपि इनमें से अधिकांश हानिरहित होते हैं, लेकिन कुछ आनुवंशिक विकारों का कारण बन सकते हैं, जिन्हें मोटे तौर पर निम्नलिखित रूप से वर्गीकृत किया जाता है:
    1. मेंडलीय विकार (एकल जीन उत्परिवर्तन)
      1. ये विकार तब उत्पन्न होते हैं जब किसी एक जीन में उत्परिवर्तन हो जाता है।
      2. वर्णांधता (लाल-हरा):
        1. यह लाल और हरे रंग के शेड्स के बीच अंतर करने में असमर्थता है। 
        2. यह एक X-सहलग्न अप्रभावी विकार (X-linked recessive disorder) है, जिसका अर्थ है कि दोषपूर्ण जीन X गुणसूत्र पर स्थित होता है। 
        3. चूँकि नरों (पुरुषों) में केवल एक X गुणसूत्र होता है, इसलिए वे मादाओं (लगभग 0.4%) की तुलना में इसके प्रति अधिक संवेदनशील (लगभग 8% नर) होते हैं, क्योंकि मादाओं (महिलाओं) के पास एक “बैकअप” X गुणसूत्र होता है।
      3. हीमोफीलिया:
        1. इसे अक्सर “रक्तस्राव रोग” (Bleeder’s disease) कहा जाता है। 
        2. इसमें रक्त का थक्का जमने की क्षमता (Blood Clotting) कम हो जाती है, जिसका अर्थ है कि एक साधारण कट लगने पर भी लगातार रक्तस्राव हो सकता है। 
        3. यह भी एक X-सहलग्न अप्रभावी विकार है।
      4. सिकल-सेल एनीमिया:
        1. यह HBB जीन में एक बिंदु उत्परिवर्तन के कारण होता है जो बीटा-ग्लोबिन (हीमोग्लोबिन का एक हिस्सा) बनाने के लिए निर्देश प्रदान करता है।
        2. ऑक्सीजन ले जाने वाली लाल रक्त कोशिकाएं (RBCs) अपने सामान्य गोल आकार के बजाय विकृत होकर हँसिये (Sickle/दात्र) के आकार की हो जाती हैं।
        3. वंशागति का प्रतिरूप: यह एक अलिंगसूत्री अप्रभावी विकार है। (इसका अर्थ है कि इस रोग से ग्रसित होने के लिए बच्चे को माता-पिता दोनों से एक-एक दोषपूर्ण जीन वंशागत रूप में प्राप्त होना चाहिए)।
      5. फिनाइलकीटोन्यूरिया (Phenylketonuria – PKU):
        1. यह एक अलिंगसूत्री अप्रभावी (Autosomal recessive) लक्षण है जिसमें उस एंजाइम की कमी होती है जो अमीनो अम्ल फिनाइल एलानिन को टायरोसिन (tyrosine) में परिवर्तित करता है। 
        2. इसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क में फिनाइल पाइरुविक अम्ल जमा हो जाता है, जिससे मानसिक मंदता होती है।
      6. थैलेसीमिया: यह एक अलिंग सूत्री अप्रभावी रक्त रोग है जिसके परिणामस्वरूप अल्फा या बीटा ग्लोबिन श्रृंखलाओं के संश्लेषण की दर कम हो जाती है। यह एक मात्रात्मक समस्या है (यानी ग्लोबिन के अणु बहुत कम बनते हैं)।
        1. α थैलेसीमिया: गुणसूत्र 16 पर स्थित जीन HBA1 और HBA2 द्वारा नियंत्रित होता है।
        2. β थैलेसीमिया: गुणसूत्र 11 पर स्थित एकल जीन HBB द्वारा नियंत्रित होता है।
    2. गुणसूत्रीय विकार (असामान्य गुणसूत्र संख्या या व्यवस्था)
      • असुगुणिता (Aneuploidy): कोशिका विभाजन के दौरान अर्धगुणसूत्रों के विसंयोजन (अलग होने) में विफलता के कारण किसी गुणसूत्र की प्राप्ति या हानि (जैसे- त्रिसूत्रता/Trisomy या एकसूत्रता/Monosomy)।
      • बहुगुणिता (Polyploidy): गुणसूत्रों के पूरे समुच्चय (Set) में वृद्धि होना (यह पौधों में आम है)।
    विकार कैरियोटाइप/कारणलक्षण 
    डाउन सिंड्रोम(Down Syndrome)गुणसूत्र 21 की ट्राइसॉमी → (47, XX या XY, +21)छोटा कद, गोल सिर, दरारयुक्त/मोटी जीभ, चौड़ी हथेली (जिसमें विशिष्ट पामर क्रीज़/हथेली की लकीर होती है), और मानसिक मंदता
    क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम(Klinefelter Syndrome)पुरुषों में एक अतिरिक्त X गुणसूत्र → (47, XXY)पुरुषों में कुछ स्त्रीलक्षणों का विकास (Gynaecomastia), बांझपन 
    टर्नर सिंड्रोम(Turner Syndrome)स्त्रियों में एक X गुणसूत्र का अभाव → (45, XO)बांझ स्त्रियाँ, अविकसित अंडाशय, द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का अभाव

    प्रातिक्रिया दे

    आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

    error: Content is protected !!
    Scroll to Top
    Telegram WhatsApp Chat