राजस्थान में वानिकी

राजस्थान में वानिकी: विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत राजस्थान में वानिकी का विशेष महत्व है, क्योंकि यह राज्य के शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक है। वन संसाधन जैव विविधता संरक्षण, मरुस्थलीकरण नियंत्रण तथा स्थानीय आजीविका को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिनके लिए वैज्ञानिक प्रबंधन और संरक्षण उपाय अपनाए जा रहे हैं।

  • राज्य पशु – चिंकारा एवं ऊँट
  • राज्य पक्षी – ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण)
  • राज्य वृक्ष – खेजड़ी
  • राज्य पुष्प – रोहिड़ा
  • राजस्थान का कुल वन क्षेत्र – 33,014 वर्ग किमी, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.64% है।

वनों का वर्गीकरण (वन अधिनियम, 1953 के अनुसार)

आरक्षित वनसंरक्षित वनअवर्गीकृत वन
12,198.71 वर्ग किमी (36.99%)
पशु चराना, शिकार करना और लकड़ी काटना सख्त वर्जित है। 
मुख्यतः उदयपुर में।
18,631.13 वर्ग किमी (56.51%)
सीमित चराई और नियंत्रित कटाई।


मुख्यतः बारां में।
2,184.16 वर्ग किमी (6.50%)
चराई या कटाई पर कोई प्रतिबंध नहीं है।


अधिकतम – बीकानेर
  • वन आवरण (FSI 2023) – कुल वन आवरण – 16,548.21 वर्ग किमी
  • कुल वन + वृक्ष आवरण – 27,389.33 वर्ग किमी, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 8.00% है।
वन आवरण का प्रकारक्षेत्रफल (वर्ग किमी)भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिशत
अति सघन वन223.20.07%
मध्यम सघन वन4,237.411.24%
खुला वन12,087.603.53%
कुल16548.214.84%
झाड़ी क्षेत्र5,476.751.60%

ISFR 2023 के अनुसार राजस्थान में आग संभावित क्षेत्र

श्रेणीक्षेत्रफलप्रतिशत
अत्यंत आग संभावित92.640.42%
बहुत अधिक आग संभावित622.772.83%
अधिक आग संभावित964.794.38%
मध्यम आग संभावित1,299.195.90%
कम आग संभावित19,045.5786.47%

अन्य प्रयास

अरावली ग्रीन वॉल परियोजना

  • यह अरावली पर्वतमाला के चारों ओर 1,400 किमी लंबी और 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना है।
  • यह परियोजना हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और दिल्ली को कवर करती है।
  • इसमें कुल 29 जिले शामिल हैं, जिनमें से 19 जिले राजस्थान के हैं।
  • प्रारंभिक चरण
    • 75 जलाशयों का पुनर्जीवित किया जाएगा।
    • अरावली क्षेत्र के प्रत्येक जिले में 5 जलाशयों से शुरुआत की जाएगी।
  • प्रेरणा – यह परियोजना अफ्रीका की “ग्रेट ग्रीन वॉल” परियोजना से प्रेरित है, जो 2007 में सेनेगल से जिबूती तक शुरू की गई थी।
  • ISRO के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस (2018–19) के अनुसार –97.85 मिलियन हेक्टेयर भूमि (भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र 328.72 मिलियन हेक्टेयर का 29.7%) भूमि क्षरण से प्रभावित है।
  • अरावली क्षेत्र को एक प्रमुख क्षरणग्रस्त क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है, जिसे भारत की 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि पुनर्स्थापन योजना के अंतर्गत हरित बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

राजस्थान सर्कुलर इकोनॉमी इंसेंटिव स्कीम, 2025

  • प्रारंभ – 5 जून 2025
  • इस योजना का उद्देश्य सामग्री के पुनः उपयोग , पुनरुद्धार और पुनर्रचना को बढ़ावा देना है। इसके तहत उद्योगों, अनुसंधान संस्थानों, स्टार्ट-अप, MSMEs और नवाचारकर्ताओं को समर्थन देकर राजस्थान में सतत सर्कुलर अर्थव्यवस्था तंत्र विकसित किया जाएगा।
  • राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस योजना के अंतर्गत निम्नलिखित प्रावधान करेगा:
  • पुनर्चक्रण एवं पुनः उपयोग के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास के लिए अधिकतम 2 करोड़ रुपये तक का वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
  • सर्कुलर इकोनॉमी क्षेत्र में कार्यरत MSMEs और स्टार्टअप्स को मौजूदा वित्तीय सहायता योजनाओं में अतिरिक्त 0.5% की छूट दी जाएगी।

राजस्थान में जलवायु परिवर्तन प्रतिक्रिया और पारिस्थितिकी तंत्र सेवा संवर्धन

  • यह परियोजना जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) द्वारा वित्तपोषित है।
  • परियोजना अक्टूबर 2024 से प्रभावी है और इसे मार्च 2035 तक पूरा किया जाना प्रस्तावित है।
  • इस परियोजना के अंतर्गत राजस्थान के 19 जिलों में विकास कार्य किए जाएंगे – अजमेर, बाड़मेर, बांसवाड़ा, बीकानेर, चूरू, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, जयपुर, जैसलमेर, जालौर, झुंझुनू, जोधपुर, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, सीकर, सिरोही, राजसमंद और उदयपुर।
राजस्थान में वानिकी
  • परियोजना की गतिविधियों को तीन प्रमुख घटकों में वर्गीकृत किया गया है— (1) मरुस्थलीय क्षेत्र (2) गैर-मरुस्थलीय क्षेत्र (3) संस्थागत सुदृढ़ीकरण
  • सम्पूर्ण परियोजना क्षेत्र को 30 प्रभागीय प्रबंधन इकाइयों तथा 90 क्षेत्रीय प्रबंधन इकाइयों में विभाजित किया गया है।

राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता विकास परियोजना

  • यह परियोजना एजेंस फ्रांसेस दे डेवलपमेंट (AFD) के सहयोग से चलाई जा रही है और 2023–24 से 2030–31 तक आठ वर्षों की अवधि के लिए है।
  • वित्तपोषण – AFD और राज्य सरकार द्वारा 70:30 के अनुपात में।
  • यह परियोजना राजस्थान के 13 जिलों में लागू की जा रही है – अलवर, बारां, भीलवाड़ा, भरतपुर, बूंदी, दौसा, धौलपुर, जयपुर, झालावाड़, करौली, कोटा, सवाई माधोपुर और टोंक।
  • इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण तथा पूर्वी राजस्थान के पर्णपाती वनों के संसाधनों को सुदृढ़ करना है, ताकि समुदाय सशक्तिकरण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन का सामना किया जा सके।
  • परियोजना के क्रियान्वयन के लिए 800 गांवों का चयन किया गया है।
  • पूरे परियोजना क्षेत्र को 23 प्रभागीय प्रबंधन इकाइयों (DMUs) और 90 क्षेत्रीय प्रबंधन इकाइयों (FMUs) में विभाजित किया गया है।
  • मुख्य गतिविधियां
    • 55,000 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण 
    • 3,000 हेक्टेयर में ओरण विकास
    • कृषि वानिकी के अंतर्गत 100 प्लांट माइक्रो रिजर्व 
    • 55 लाख पौधों का वितरण
    • वन्यजीव संरक्षण के लिए 610 किमी पक्की दीवार का निर्माण।

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