भोजन और पोषणविज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो मानव शरीर की ऊर्जा, वृद्धि और समुचित कार्यप्रणाली से संबंधित है। संतुलित आहार के माध्यम से शरीर को आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं, जो स्वास्थ्य संरक्षण और रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाते हैं।
भोजन
भोजन वह सब कुछ है जो हम खाते हैं और जो हमारे शरीर को पोषण प्रदान करता है।
इसमें ठोस, अर्ध-ठोस और तरल पदार्थ शामिल होते हैं। भोजन पादप स्रोतों या जंतु स्रोतों) से प्राप्त किया जा सकता है।
अतः, किसी भी वस्तु को भोजन कहलाने के लिए उसमें दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ होनी चाहिए:
यह खाने योग्य होना चाहिए, अर्थात् यह ‘खाद्य’ होना चाहिए।
इसे शरीर का पोषण करना चाहिए।
यह आवश्यक है क्योंकि इसमें ऐसे पदार्थ/पोषक तत्व होते हैं जो हमारे शरीर में महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न करते हैं।
भोजन के कार्य
पोषण और पोषक तत्व
पोषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा भोजन ग्रहण किया जाता है और शरीर द्वारा उसका उपयोग किया जाता है।
पोषण = भोजन करना → पाचन → अवशोषण → परिवहन → उपयोग।
पोषक तत्व – वे आवश्यक पदार्थ हैं जिनकी शरीर को वृद्धि, विकास, अनुरक्षण या रखरखाव और समग्र स्वास्थ्य के लिए आवश्यकता होती है।
ये पदार्थ विभिन्न शारीरिक या कार्यिकीय कार्यों के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करते हैं और शरीर की संरचना तथा नियामक प्रक्रियाओं में सहायता करते हैं।
पोषक तत्वों का वर्गीकरण
पोषक तत्व मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
वृहत् पोषक तत्व या स्थूल पोषक तत्व
ये खाद्य पदार्थों में बड़ी मात्रा में उपस्थित होते हैं और शरीर को भी इनकी अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है।
उदाहरण: कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, लिपिड – वसा और तेल।
सूक्ष्म पोषक तत्व
ये खाद्य पदार्थों में अल्प (कम) मात्रा में उपस्थित होते हैं, लेकिन हमारे शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं।
उदाहरण: खनिज लवण, विटामिन।
अच्छे स्वास्थ्य के लिए वृहत् पोषक तत्व और सूक्ष्म पोषक तत्व, दोनों ही समान रूप से आवश्यक हैं।
वृहत् पोषक तत्व या स्थूल पोषक तत्व
कार्बोहाइड्रेट
कार्बोहाइड्रेट एक ऐसा अणु होता है जिसमें कार्बन (C), हाइड्रोजन (H) और ऑक्सीजन (O) परमाणु 1:2:1 के अनुपात में होते हैं → Cₙ(H₂O)ₙ।
प्राप्ति के स्रोत: ये अनाज, फलों और सब्जियों जैसे खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं।
ऊर्जा का संचय: पौधों में स्टार्च (मण्ड) के रूप में, और जंतुओं में ग्लाइकोजन (जंतु स्टार्च) के रूप में।
कार्बोहाइड्रेट के कार्य
ये मानव शरीर में ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत होते हैं (4 kcal/g)।
शरीर कार्बोहाइड्रेट्स को ग्लूकोज में तोड़ता है, जो ऊर्जा प्रदान करता है।
ये मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सुचारू रूप से कार्य करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
ये पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के लिए आहारीय रेशे (रुक्षांश) प्रदान करते हैं।
ये अन्य महत्वपूर्ण जैव-अणुओं जैसे कि डीएनए (DNA), आरएनए (RNA) और ग्लाइकोप्रोटीन के निर्माण के लिए पूर्वगामी के रूप में कार्य करते हैं।
कार्बोहाइड्रेट, सेल्यूलोज के रूप में पौधों को संरचनात्मक सहायता प्रदान करते हैं।
सेलूलोज़ एक पॉलीसैकराइड है जो ग्लूकोज इकाइयों से बना होता है, जो विशेष प्रकार से जुड़े होते हैं (β-1,4 बॉन्ड)।
यह पादप कोशिका भित्ति का मुख्य घटक है, जो पौधों को मजबूती और कठोरता प्रदान करता है।
मनुष्य सेल्यूलोज को नहीं पचा सकते (क्योंकि मानव शरीर में इसे पचाने वाले ‘सेल्युलोज़’ एंजाइम का अभाव होता है), इसलिए यह हमारे शरीर में आहारीय रेशे के रूप में कार्य करता है।
कार्बोहाइड्रेट्स का चयापचय (Metabolism)
पाचन : आंतों में कार्बोहाइड्रेट्स विघटित होकर मोनोसैकराइड्स (जैसे ग्लूकोज) में बदल जाते हैं।
ग्लाइकोलाइसिस : ग्लूकोज → पाइरूवेट में बदलता है → ATP (ऊर्जा) उत्पन्न होती है।
क्रेब्स चक्र और इलेक्ट्रॉन ट्रांसपोर्ट चेन (Krebs Cycle & ETC): माइटोकॉन्ड्रिया में ग्लूकोज़ का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है → अधिकतम ATP बनता है।
ग्लुकोनियोजेनेसिस : प्रोटीन/वसा से ग्लूकोज बनाना (उपवास के दौरान)।
ग्लाइकोजेनेसिस : ग्लूकोज को ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहित करना।
ग्लाइकोजनोलाइसिस : ग्लाइकोजन का विघटन → ग्लूकोज को मुक्त करना।
कार्बोहाइड्रेट का वर्गीकरण
डाइसैकेराइड
ये दो मोनोसैकराइड्स से मिलकर बनते हैं, जो ग्लाइकोसिडिक बॉन्ड द्वारा जुड़े होते हैं।
उदाहरण:
सुक्रोज = ग्लूकोज + फ्रक्टोज → टेबल/गन्ना शर्करा
लैक्टोज = ग्लूकोज + गैलेक्टोज → दुग्ध शर्करा
माल्टोज = ग्लूकोज + ग्लूकोज → माल्ट शर्करा।
पॉलीसैकराइड्स
ये जटिल कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो मोनोसैकराइड इकाइयों की लंबी श्रृंखला से बने होते हैं।
गन्ना, शुगर बीट; पाम रस से निकाला जाता है; गैर-अपचायक शर्करा
लैक्टोज
दुग्ध शर्करा
(ग्लूकोज + गैलेक्टोज); दूध
माल्टोज
माल्ट शर्करा
(ग्लूकोज + ग्लूकोज); माल्टेड अनाज
ट्रेहालोज़
मशरूम, यीस्ट; (ग्लूकोज + ग्लूकोज, α,α-1,1)
सुक्रोज + मोलासेस
ब्राउन शुगर
टेबल शुगर + मोलासेस (4.5–6.5%)
ग्लूकोज + फ्रक्टोज
हनी/डेट शुगर (मिश्रित शर्करा)
मधुमक्खियों से प्राप्त प्राकृतिक मधुरक; खजूर में पाया जाता है
इन्वर्ट शुगर (हाइड्रोलाइज्ड फॉर्म)
हाइड्रोलाइज्ड सुक्रोज; सिरप, सॉफ्ट ड्रिंक्स में उपयोग
ओलिगो- सैकेराइड
रेफिनोज
ग्लूकोज + गैलेक्टोज + फ्रक्टोज
मनुष्यों द्वारा अपचनीय; फलियाँ, साबुत अनाज; गैस बनाता है
पॉली-सैकेराइड
स्टार्च
चावल, गेहूं, आलू; पादपों में ऊर्जा भंडारण
सेल्यूलोज
पौधों का रेशा; मनुष्यों द्वारा अपचनीय
ग्लाइकोजन
जंतुओं में ऊर्जा भंडारण (यकृत, मांसपेशियां)
गैर-शर्करा मधुरक (NSS)
परिभाषा: मधुरक वे पदार्थ हैं जो खाद्य पदार्थों को मीठा स्वाद प्रदान करते हैं, परंतु इनमें कैलोरी (ऊर्जा) बहुत कम या शून्य होती है; प्रति ग्राम शर्करा की तुलना में कहीं अधिक मीठे होते हैं।
इनका उपयोग अक्सर आहार संबंधी खाद्य पदार्थों, पेय पदार्थों और मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित व्यक्तियों द्वारा चीनी के विकल्प के रूप में किया जाता है।
सेल्यूलोज = सभी पौधों के पदार्थ का लगभग 33% → यह विश्व का सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला जैविक पॉलिमर है।
ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI)
यह मापता है कि कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य पदार्थ खाने के बाद रक्त शर्करा स्तर कितनी तेजी से बढ़ता है।
यह सूचकांक कार्बोहाइड्रेट-समृद्ध खाद्य पदार्थों को 0 से 100 के पैमाने पर रैंक करता है, जो उनके द्वारा (शुद्ध ग्लूकोज (GI = 100) की तुलना में) रक्त शर्करा स्तर बढ़ाने की क्षमता पर आधारित होता है।
ग्लाइसेमिक इंडेक्स को प्रभावित करने वाले कारक
आंतरिक कारक :
एमायलोज़ : पाचन को धीमा करता है → GI कम करता है।
लिपिड, प्रोटीन: पेट खाली होने की प्रक्रिया में विलंब करते हैं।
बाहरी कारक :
खाना पकाना, प्रसंस्करण, पीसना (GI बढ़ाते हैं)।
रेट्रोग्रेडेशन: स्टार्च का पुनः क्रिस्टलीकरण (ठंडा होने के बाद) → GI कम करता है।
भिगोना, अंकुरण: स्टार्च संरचना को बदलते हैं → सामान्यतः GI कम करता है।
यह गुणवत्ता (GI) और मात्रा (कार्बोहाइड्रेट सामग्री) दोनों को मिलाकर मापता है।
प्रोटीन
प्रोटीन बड़े अणु होते हैं जो एक या अधिक लंबी अमीनो अम्लों की श्रृंखलाओं से बने होते हैं (मानव शरीर में 20 प्रकार के अमीनो अम्ल)।
ये अमीनो अम्ल पेप्टाइड बंधों द्वारा जुड़े होते हैं।
पेप्टाइड बंध एक रासायनिक बंध है जो दो अणुओं के बीच तब बनता है जब एक अणु का कार्बोक्सिल समूह (-COOH) दूसरे अणु के अमीनो समूह (-NH2) के साथ अभिक्रिया करता है। इस प्रक्रिया में जल (H2O) का एक अणु बाहर निकलता है, जिसे संघनन अभिक्रिया कहते हैं।
यह शरीर के ऊतकों की वृद्धि, मरम्मत और रखरखाव के लिए अनिवार्य है। (इसीलिए इन्हें शरीर के निर्माण खंड कहा जाता है)।
रक्त का थक्का जमना: प्रोटीन (जैसे फाइब्रिनोजेन) रक्त के स्कंदन (क्लॉटिंग) में सहायता करते हैं।
अपनी संरचनात्मक, कार्यात्मक और नियामक भूमिकाओं के कारण इन्हें कोशिका का मुख्य कार्यवाहक(वर्कहॉर्स) कहा जाता है।
प्रोटीन के स्रोत: हम प्रोटीन जंतुओं और पादपों (पौधों) दोनों से प्राप्त करते हैं:
जंतु स्रोत: मांस, अंडे, डेयरी उत्पाद (दूध, पनीर)।
पादप स्रोत: दालें, फलियां, सोयाबीन, मेवे।
अमीनो अम्लों का वर्गीकरण
अनिवार्य/आवश्यक अमीनो अम्ल: ये वे अमीनो अम्ल हैं जिन्हें हमारा शरीर स्वयं निर्मित नहीं कर सकता, इसलिए इन्हें आहार के माध्यम से लेना आवश्यक होता है (संख्या: 9)।
अनावश्यक अमीनो अम्ल: ये वे अमीनो अम्ल हैं जिनका निर्माण हमारा शरीर स्वयं कर सकता है (संख्या: 20 – 9 = 11)।
सबसे महत्वपूर्ण बिंदु
मानव शरीर में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन:कोलेजन
स्वर्ण मानक प्रोटीन (उच्चतम जैविक मूल्य): अंडे का प्रोटीन
QPM (गुणवत्ता युक्त मक्का): यह मक्के की ऐसी किस्म है जो लाइसिन और ट्रिप्टोफैन अमीनो अम्लों से भरपूर होती है (ICAR द्वारा विकसित)।
मायोग्लोबिन : एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी द्वारा अध्ययन किया गया यह प्रथम प्रोटीन है।
LDL (“खराब कोलेस्ट्रॉल”): कोलेस्ट्रॉल को कोशिकाओं तक पहुंचाता है; एथेरोस्क्लेरोसिस का कारण।
HDL (“अच्छा कोलेस्ट्रॉल”): कोलेस्ट्रॉल को हटाता है, यकृत तक वापस पहुँचाता है।
मेटालोप्रोटीन: प्रोटीन + धातु आयन
हीमोग्लोबिन (Fe²⁺): ऑक्सीजन परिवहन
साइटोक्रोम c (heme iron): इलेक्ट्रॉन परिवहन
जिंक फिंगर प्रोटीन्स: DNA से जुड़ना, ट्रांसक्रिप्शन नियमन
व्युत्पन्न प्रोटीन
सरल या संयुग्मित प्रोटीन के आंशिक अपचयन/डिनैचुरेशन से बनते हैं।
उदाहरण: पेप्टोन, प्रोटियोस, पॉलीपेप्टाइड।
पाचन के दौरान उत्पन्न होते हैं (जैसे – पेप्सिन → पेप्टोन)।
संरचना के आधार पर
प्राथमिक संरचना: अमीनो अम्लों की रैखिक श्रृंखला
द्वितीयक संरचना: स्थानीय फोल्डिंग (α-हेलिक्स, β-प्लीटेड शीट)।
तृतीयक संरचना: एकल पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला का 3D फोल्डिंग।
चतुर्थक संरचना: कई पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं की पारस्परिक क्रिया।
उदाहरण: हीमोग्लोबिन (4 उप-इकाइयाँ)।
आकार के आधार पर
रेशेदार प्रोटीन
लंबे, संकुचित, संरचनात्मक भूमिका वाले।
उदाहरण:
कोलेजन: संयोजी ऊतक; मानव शरीर में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला प्रोटीन
केराटिन: बाल, नाखून, पंखों में पाया जाता है; सिस्टीन में समृद्ध (डाइसल्फाइड बंध → स्थिरता)
ग्लोबुलर प्रोटीन
कॉम्पैक्ट, गोलाकार; कार्यात्मक भूमिका
उदाहरण: हीमोग्लोबिन, एंजाइम (जैसे: एमाइलेज)।
पूर्ण प्रोटीन
एक पूर्ण प्रोटीन वह खाद्य स्रोत होता है जिसमें मानव आहार के लिए आवश्यक नौ आवश्यक अमीनो अम्लों का पर्याप्त अनुपात होता है।
शरीर इन अमीनो अम्लों को स्वयं नहीं बना सकता, इसलिए इन्हें भोजन से प्राप्त करना आवश्यक होता है।
स्रोत:
जंतु आधारित: अंडे, दूध, पनीर, दही, मांस, मछली → ये सभी पूर्ण प्रोटीन हैं।
संयोजन पादप आधारित : दालें + अनाज (जैसे: चावल + राजमा) → मिलकर पूर्ण प्रोटीन बना सकते हैं।
प्रोटीन की कमी से होने वाले रोग
रोग / स्थिति
कारण
मुख्य लक्षण / प्रभाव
क्वाशियोरकर
गंभीर प्रोटीन की कमी
सूजन , फैटी लिवर, अवरुद्ध वृद्धि, चिड़चिड़ापन, त्वचा पर घाव
मरास्मस
प्रोटीन + कैलोरी की कमी
अत्यधिक क्षीणता, मांसपेशियों का क्षय, सूजन नहीं, धंसी हुई आँखें
विकास अवरोध
अपर्याप्त प्रोटीन सेवन
शारीरिक और मानसिक विकास में देरी
कमज़ोर प्रतिरक्षा
प्रोटीन स्तर कम
बार-बार संक्रमण, घाव भरने में देरी
फैटी लिवर
अपोलिपोप्रोटीन्स की कमी
यकृत की कार्यक्षमता में गड़बड़ी, क्वाशियोरकर में देखा जाता है
बालों का रंग बदलना
टायरोसिन की कमी (प्रोटीन-संबंधित)
लालिमा रंग या भंगुर बाल (विशेषकर क्वाशियोरकर में)
मोतियाबिंद
आँख का प्राकृतिक लेंस मुख्यतः पानी और संरचनात्मक प्रोटीन (क्रिस्टेलिन्स) से बना होता है।
ये प्रोटीन एक सटीक और व्यवस्थित ढंग से व्यवस्थित रहते हैं, जिससे लेंस पारदर्शी रहता है और प्रकाश स्पष्ट रूप से गुजर पाता है।
मोतियाबिंद तब बनता है जब ये क्रिस्टालिन प्रोटीन:
टूटना या विकृत होना (अपनी सामान्य संरचना खोने) लगते हैं, सामान्यतः उम्र बढ़ने, ऑक्सीकरण या अन्य जोखिम कारकों (जैसे UV किरणें, मधुमेह) के कारण।
आपस में चिपककर गुच्छे बनाने लगते हैं।
अघुलनशील और क्रॉस-लिंक्ड हो जाते हैं।
इन परिवर्तनों के कारण प्रकाश का बिखराव (स्कैटरिंग) होता है और लेंस की पारदर्शिता कम हो जाती है।
उपचार: मोतियाबिंद शल्य चिकित्सा : धुंधले प्राकृतिक लेंस को हटाकर उसकी जगह एक पारदर्शी कृत्रिम अंतःनेत्री लेंस (IOL) प्रत्यारोपित किया जाता है।
वसा
वसा, जिन्हें ट्राइग्लिसराइड्स भी कहा जाता है, तीन वसीय अम्ल और एक ग्लिसरॉल अणु के संयोजन से बने एस्टर होते हैं।
वसा के कार्य :
ऊर्जा का भंडारण: 1 ग्राम वसा से 9.3 kcal ऊर्जा प्राप्त होती है। यह सबसे अधिक ऊर्जा-घनत्व वाला मुख्य पोषक तत्व है।
कोशिका संरचना: वसा कोशिका झिल्लियों का एक अनिवार्य घटक है (जैसे फॉस्फोलिपिड्स)।
हार्मोन उत्पादन: यह स्टेरॉयड हार्मोन और अन्य संकेतक अणुओं के निर्माण के लिए पूर्वगामी के रूप में कार्य करता है।
स्रोत : तेल, मेवे, वसायुक्त मछली, मक्खन, घी।
गुणधर्म :
कमरे के तापमान पर ठोस: फैट्स (मुख्यतः संतृप्त वसा)।
कमरे के तापमान पर तरल: तेल (असंतृप्त वसा)।
जल में अघुलनशील
ये शरीर के मुख्य ऊर्जा भंडार के रूप में कार्य करते हैं और वसा-घुलनशील विटामिन (A, D, E, K) के अवशोषण में सहायक होते हैं।
वसा के प्रकार
असंतृप्त वसा (स्वास्थ्यप्रद वसा): इनकी संरचना में कम से कम एक डबल बंध होता है, जिसके कारण हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम होती है। सामान्यतः ये कमरे के तापमान पर तरल होती हैं (जैसे – जैतून का तेल, मछली का तेल)। प्रकार:
एकल-असंतृप्त वसा (MUFA)
संरचना: कार्बन के बीच एक डबल बॉन्ड
स्रोत: जैतून का तेल, एवोकाडो, मेवे, बीज
स्वास्थ्य प्रभाव: हृदय के लिए लाभदायक, नियंत्रित मात्रा में लेने पर कोलेस्ट्रॉल में सुधार करती हैं।
पॉली-असंतृप्त वसा (PUFAs)
संरचना: कार्बन के बीच कई डबल बंध।
स्रोत: वसायुक्त मछलियाँ (सैल्मन, मैकेरल), अलसी के बीज, अखरोट, वनस्पति तेल (सोयाबीन, सूरजमुखी)।
इसमें आवश्यक वसीय अम्ल (EFAs) शामिल हैं → ओमेगा-3 (अलसी, मछली), ओमेगा-6 (सोयाबीन तेल)।
संतृप्त वसा (अस्वास्थ्यप्रद वसा)
संरचना: केवल एकल C–C बंध (हाइड्रोजन से पूर्णतः संतृप्त)।
सामान्यतः कमरे के तापमान पर ठोस होती हैं (जैसे – मक्खन, लार्ड)।
असंतृप्त वसा की तुलना में अधिक स्थिर होते है और जल्दी खराब नहीं होते (रैंसिडिटी के प्रति कम संवेदनशील)।
स्वास्थ्य प्रभाव: LDL कोलेस्ट्रॉल में वृद्धि, हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाती हैं।
ट्रांस वसा (अस्वस्थ वसा)
ये असंतृप्त वसीय अम्ल होते हैं जिनमें “ट्रांस डबल बंध” पाए जाते हैं।
ये कृत्रिम रूप से वनस्पति तेलों के हाइड्रोजनीकरण प्रक्रिया द्वारा बनाए जाते हैं → तरल तेलों को अर्ध-ठोस या ठोस वसा में परिवर्तित करते हैं।
स्रोत:
औद्योगिक: आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत तेल (PHO) – वनस्पति घी, मार्जरीन, बेकरी उत्पाद, तले और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में।
प्राकृतिक: बहुत कम मात्रा में मांस और डेयरी उत्पादों में (जुगाली करने वाले पशुओं जैसे गाय, भेड़ में पाया जाता है)।
विशेषताएँ →सस्ते, लंबी शेल्फ लाइफ, बनावट और स्वाद में सुधार।
स्वास्थ्य प्रभाव: LDL (“खराब कोलेस्ट्रॉल”) बढ़ाता है, HDL (“अच्छा कोलेस्ट्रॉल”) घटाता है; यह सबसे हानिकारक वसा है → मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगों से संबंधित।
अनिवार्य/आवश्यक वसीय अम्ल
कुछ विशिष्ट वसीय अम्लों को आहार में सम्मिलित करना अनिवार्य होता है, क्योंकि हमारा शरीर इनका संश्लेषण स्वयं नहीं कर सकता।
ये बहु-असंतृप्त वसीय अम्ल (PUFA) होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से लिनोलिक, लिनोलेनिक और अराकिडोनिक अम्ल शामिल हैं। इन्हें सामूहिक रूप से ‘अनिवार्य’ वसीय अम्ल कहा जाता है।
ये शरीर की विभिन्न उपापचयी क्रियाओं और सामान्य और स्वस्थ त्वचा के रखरखाव को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
वास्तव में हमें केवल लिनोलिक अम्ल की ही अनिवार्य आवश्यकता होती है, क्योंकि शेष दो (लिनोलेनिक और अराकिडोनिक) का संश्लेषण हमारा शरीर लिनोलिक अम्ल की सहायता से कर सकता है।
सोयाबीन के तेल में लिनोलिक अम्ल (55%) मुख्य रूप से पाया जाने वाला वसीय अम्ल है।
स्रोत: मूंगफली, कपास के बीज, मक्का और सूरजमुखी का तेल।
ओमेगा वसीय अम्ल
ओमेगा-3 वसीय अम्ल:
ये विभिन्न शारीरिक कार्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से मस्तिष्क स्वास्थ्य, सूजन को कम करने, और हृदय को स्वस्थ बनाए रखने के लिए।
“3” का अर्थ है → कार्बन श्रृंखला में पहला द्वि-बंध मिथाइल छोर (the “omega” end) से तीसरे कार्बन पर होता है।
मुख्य मूल वसीय अम्ल: अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA)।
ओमेगा-6 वसीय अम्ल:
यह भी स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, त्वचा और बालों की वृद्धि, हड्डियों के स्वास्थ्य, और चयापचय के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
“6” का अर्थ है → पहला डबल बॉन्ड omega end से छठे कार्बन पर होता है।
मूल फैटी एसिड: लिनोलिक एसिड (LA)
ओमेगा-9 वसीय अम्ल:
यह फैटी एसिड्स गैर-आवश्यक माने जाते हैं।
हालांकि ये स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं (जैसे: ओलिक एसिड – जैतून तेल का मुख्य घटक), लेकिन शरीर इन्हें अन्य असंतृप्त वसा से स्वयं बना सकता है, इसलिए इन्हें आहार से प्राप्त करना आवश्यक नहीं है।
चूंकि शरीर ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड्स को स्वयं नहीं बना सकता, इसलिए ये आवश्यक फैटी एसिड्स माने जाते हैं और स्वस्थ आहार का हिस्सा होना अनिवार्य है।
सूजन-रोधी (Anti-inflammatory), मस्तिष्क स्वास्थ्य को बढ़ावा, हृदय की सुरक्षा, ट्राइग्लिसराइड्स को कम करना
वृद्धि, विकास और प्रतिरक्षा कार्यों में सहायक, लेकिन अधिक मात्रा में सूजन को बढ़ावा दे सकता है
वसा की कमी से होने वाले रोग
फ्रिनोडर्मा – “टोड स्किन”: त्वचा खुरदरी और मोटी हो जाती है। शरीर के विशिष्ट हिस्सों, विशेष रूप से जांघों, नितंबों और धड़ पर पिन के सिर के आकार के कड़े, सींग जैसे पैक्यूल्स या दाने निकल आते हैं।
वसा की अधिकता से होने वाले रोग
मोटापा : शरीर में अत्यधिक वसा का संचय होना।
जठरांत्र संबंधी विकार: पाचन तंत्र में गड़बड़ी और असंतुलन।
मधुमेह : वसा की अधिकता इंसुलिन प्रतिरोध का कारण बन सकती है।
हृदय रोग : ये वे स्थितियाँ हैं जिनमें रक्त वाहिकाएँ संकीर्ण या अवरुद्ध हो जाती हैं। इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
हृदय घात : हृदय की मांसपेशियों को रक्त आपूर्ति बाधित होना।
एंजाइना : सीने में तेज दर्द होना।
स्ट्रोक : मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में अवरोध के कारण ‘मस्तिष्क घात’।
ट्रांस फैट्स को कम करने संबंधित पहल
वैश्विक संदर्भ
वैश्विक पहल
नेतृत्व
टिप्पणी
REPLACE फ्रेमवर्क
WHO (2018)
औद्योगिक रूप से उत्पन्न ट्रांस-वसा को 2025 तक वैश्विक स्तर पर समाप्त करने के लिए छह-चरणीय रोडमैप।समीक्षा , स्वास्थ्यकर वसा को बढ़ावा देना , कानून बनाना , मूल्यांकन , जागरूकता पैदा करना , प्रवर्तन।
वैश्विक ट्रांस-फैट उन्मूलन पर डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट (2022)
निष्कर्ष: विश्व स्तर पर 5 अरब लोग अब भी हानिकारक ट्रांस-फैट के संपर्क में हैं।सिफारिश: कुल ट्रांस-फैट सेवन (औद्योगिक + रूमिनेंट) को दैनिक ऊर्जा सेवन का <1% तक सीमित करें।2000 कैलोरी आहार के लिए → <2.2 ग्राम/दिन।
उदाहरण
डेनमार्क, यूएसए, थाईलैंड
डेनमार्क: पहला देश जिसने खाद्य पदार्थों में 2% TFA सीमा लागू की।
भारत की प्रमुख पहलें
पहल / नीति
वर्ष / एजेंसी
मुख्य विशेषताएं और प्रभाव
FSSAI ट्रांस-फैट विनियमन
2021–22
तेलों और वसा में ट्रांस-वसा की अधिकतम सीमा 2021 तक 3% और 2022 तक 2% तय की गई (पहले 5%)।भारत = 2022 में इसे अपनाने वाला पहला निम्न-मध्यम आय वाला देश।
2022 तक ट्रांस फैट–फ्री इंडिया
FSSAI + स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
औद्योगिक ट्रांस-वसा को समाप्त करने का राष्ट्रीय लक्ष्य; गैर-संचारी रोगों (NCDs) की रोकथाम रणनीति का हिस्सा।
ईट राइट इंडिया मूवमेंट
2018 से शुरू
जन-जागरूकता अभियान (“हार्ट अटैक रिवाइंड”); सुरक्षित, स्वस्थ और सतत खाद्य उपभोग को प्रोत्साहित करता है।
ट्रांस फैट–फ्री प्रतिष्ठानों के लिए लोगो
2020
ट्रांस-फैट मानदंडों को पूरा करने वाले खाद्य प्रतिष्ठानों के लिए स्वैच्छिक प्रमाणन।
A1 और A2 दूध
A1 और A2 बीटा (β)-केसीन प्रोटीन के आनुवंशिक रूपांतर हैं।
केसीन दूध में पाए जाने वाले दो प्रकार के प्रोटीनों में से एक है (दूध के कुल प्रोटीन का 80%)। प्रोटीन का दूसरा प्रकार है व्हे प्रोटीन ।
अंतर: अमीनो अम्ल अनुक्रम में संरचनात्मक भिन्नता → A1, A2 से प्राकृतिक उत्परिवर्तन द्वारा विकसित हुआ।
दूध के प्रकार (Milk Types):
सामान्य दूध: A1 और A2 दोनों प्रकार के β-केसीन को शामिल करता है।
A2 दूध: केवल A2 प्रकार का β-केसीन होता है → देशी गायों और भैंसों के दूध में पाया जाता है (NBAGR अध्ययन के अनुसार)।
तुलनात्मक तालिका
पैरामीटर
A1 दूध
A2 दूध
पोषण
अधिक वसा, कैलोरी, प्रोटीन
कम वसा और कैलोरी, प्रोलाइन युक्त
स्वास्थ्य प्रभाव
हिस्टिडीन मौजूद → हिस्टामीन में परिवर्तित → कुछ लोगों में पाचन समस्याएं उत्पन्न करता है
पचने में आसान क्योंकि यह BCM-7 नहीं बनाता; प्रोलाइन → कोलेजन, जोड़ों और टेंडन के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी
स्रोत
यूरोप की गाय नस्लें (होलस्टीन, फ्रिज़ियन, आयरशायर, ब्रिटिश शॉर्टहॉर्न)
भारतीय देशी नस्लें (गिर, साहिवाल) और कुछ एशियाई/अफ्रीकी गायें
मुख्य पोषक तत्वों की ऊर्जा मात्रा
प्रत्येक प्रमुख पोषक तत्व समान मात्रा में ऊर्जा प्रदान नहीं करता। इनकी मानक ऊर्जा मात्रा, जिसे एटवॉटर प्रणाली कहा जाता है, इस प्रकार है:
कार्बोहाइड्रेट: प्रति ग्राम 4 किलो कैलोरी (kcal) ऊर्जा प्रदान करते हैं। ये शरीर के लिए ऊर्जा का पसंदीदा और सबसे आसानी से उपलब्ध स्रोत हैं।
प्रोटीन: प्रति ग्राम 4 kcal ऊर्जा प्रदान करते हैं। हालांकि इन्हें ऊर्जा के लिए उपयोग किया जा सकता है, इनका मुख्य कार्य ऊतकों का निर्माण और मरम्मत, एंजाइम और हार्मोन का उत्पादन, तथा प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन करना है।
वसा: प्रति ग्राम 9.3 किलो कैलोरी ऊर्जा प्रदान करते हैं। यही कारण है कि वसा सबसे अधिक ऊर्जा प्रदान करने वाला मैक्रोन्यूट्रिएंट है।
सूक्ष्म पोषक तत्व
विटामिन
क्योंकि शरीर में विटामिन का निर्माण नहीं हो सकता, इसलिए इन्हें आहार के माध्यम से ही ग्रहण करना आवश्यक है।
विटामिन को मुख्य रूप से दो समूहों में वर्गीकृत किया गया है:
वसा में घुलनशील विटामिन जैसे विटामिन A, D, E और K
जल में घुलनशील विटामिन जैसे विटामिन B और विटामिन C।
विटामिन
रासायनिक नाम
कमी से होने वाले रोग
वसा में घुलनशील विटामिन
विटामिन A
रेटिनॉल, रेटिनल, रेटिनोइक एसिड
रतौंधी, जीरोफ्थैल्मिया(सूखी आंखें), कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली
विटामिन D
कैल्सिफेरोल
रिकेट्स (बच्चों में), ऑस्टियोमलेशिया(वयस्कों में)
विटामिन E
टोकोफेरोल
न्यूरोमस्कुलर (तंत्रिका-मांसपेशी संबंधी) समस्याएं
विटामिन K
फिलोक्विनोन, मेनाक्विनोन
रक्तस्राव संबंधी विकार
जल में घुलनशील विटामिन
विटामिन B₁
थायमिन
बेरीबेरी
विटामिन B2
राइबोफ्लेविन
एरिबोफ्लेविनोसिस
विटामिन B3
नियासिन
पेलाग्रा
विटामिन B5
पैंटोथैनिक एसिड
पैरेस्थीसिया
विटामिन B6
पाइरिडोक्सिन
एनीमिया, तंत्रिका संबंधी समस्याएँ
विटामिन B7
बायोटिन
त्वचा रोग, तंत्रिका लक्षण
विटामिन B9
फोलेट (फोलिक एसिड)
मेगालोब्लास्टिक एनीमिया, गर्भावस्था में न्यूरल ट्यूब दोष
विटामिन B12
कोबालामिन
परनीशियस एनीमिया
विटामिन C
एस्कॉर्बिक एसिड
स्कर्वी
खनिज लवण
मानव शरीर के कुल वजन का लगभग 4% हिस्सा खनिजों से बना होता है।
शरीर को विभिन्न मात्राओं में कुल मिलाकर लगभग 19 खनिजों की आवश्यकता होती है।
शरीर में उपस्थित कुल खनिजों का तीन-चौथाई (3/4) भाग केवल कैल्शियम और फास्फोरस से बना होता है।
मानव शरीर में खनिजों को उनकी दैनिक आवश्यकता की मात्रा के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
हड्डियों और दांतों का निर्माण, रक्त का थक्का बनाना
आयरन
एनीमिया
लाल मांस, पालक, मसूर
रक्त में ऑक्सीजन परिवहन, ऊर्जा चयापचय
जिंक
वृद्धि में देरी
मांस, डेयरी, मेवे, दालें
प्रतिरक्षा कार्य, घाव भरना, DNA संश्लेषण
मैग्नीशियम
मांसपेशियों की कमजोरी
मेवे, बीज, साबुत अनाज
तंत्रिका कार्य, मांसपेशी संकुचन, हड्डी स्वास्थ्य
पोटैशियम
मांसपेशियों की कमजोरी
केले, संतरे, आलू
तरल संतुलन, तंत्रिका संकेत, मांसपेशी संकुचन
सोडियम
हाइपोनेट्रेमिया
टेबल सॉल्ट (सोडियम क्लोराइड), प्रोसेस्ड फूड्स
तरल संतुलन, तंत्रिका संकेत, मांसपेशी संकुचन
फास्फोरस
कमजोर हड्डियां
डेयरी उत्पाद, मांस, मेवे
हड्डियों और दांतों का निर्माण, ऊर्जा चयापचय
सेलेनियम
थकान, मांसपेशियों में दर्द
ब्राज़ील नट्स, मछली, अंडे
एंटीऑक्सीडेंट, थायरॉयड कार्य, प्रतिरक्षा समर्थन
कॉपर
एनीमिया
शेलफिश, मेवे, बीज, अंग मांस
आयरन चयापचय, संयोजी ऊतक निर्माण
आयोडीन
गॉइटर
समुद्री भोजन, आयोडीन युक्त नमक, डेयरी
थायरॉयड हार्मोन निर्माण, चयापचय नियमन
फ्लोराइड
दांतों की सड़न
फ्लोराइड युक्त पानी, चाय, मछली की हड्डियाँ
दंत स्वास्थ्य, हड्डी मजबूती
मैंगनीज
हड्डी विकृति
मेवे, बीज, साबुत अनाज, चाय
एंजाइम सक्रियण, हड्डी निर्माण, एंटीऑक्सीडेंट
क्रोमियम
ग्लूकोज असहिष्णुता
ब्रोकली, साबुत अनाज, मेवे
इंसुलिन कार्य, ग्लूकोज़ चयापचय
जल
शारीरिक संरचना: जल हमारे शरीर के कुल वजन का लगभग दो-तिहाई (~70%) भाग बनाता है।
यह मुख्य रूप से पेय पदार्थों और नमी युक्त खाद्य पदार्थों (फलों, सब्जियों आदि) में पाया जाता है।
जल के मुख्य कार्य :
जल भोजन के पाचन, पोषक तत्वों के अवशोषण और शरीर में उनके परिवहन में सहायता करता है।
यह शरीर से अवांछित और अपशिष्ट पदार्थों को मूत्र के रूप में बाहर निकालने में मदद करता है।
यह पसीनेके माध्यम से शरीर के तापमान को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रतिऑक्सीकारक
प्रतिऑक्सीकारक वे यौगिक हैं जो हानिकारक मुक्त मूलकों को निष्क्रिय करने में मदद करते हैं, जिससे कोशिकाएं क्षति से बची रहती हैं।
स्रोत: ये प्रचुर मात्रा में फलों, सब्जियों और कुछ विशेष प्रकार की चाय (जैसे ग्रीन टी) में पाए जाते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य:जल प्रतिऑक्सीकारक का स्रोत नहीं है।
कुपोषण
कुपोषण से तात्पर्य किसी व्यक्ति के ऊर्जा और पोषक तत्वों के सेवन में कमी, अधिकता या असंतुलन से है।
कुपोषण के प्रकार
अल्पपोषण : यह पोषक तत्वों की कमी के कारण होता है, जो अपर्याप्त भोजन सेवन या खराब अवशोषण से उत्पन्न होता है। इसके चार मुख्य रूप हैं:
गंभीर तीव्र कुपोषण ( SAM): ऊँचाई के मुकाबले बहुत कम वजन, MUAC <115 मिमी या पोषण संबंधी सूजन। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण मृत्यु का उच्च जोखिम।
मध्यम तीव्र कुपोषण (MAM): ऊँचाई के मुकाबले वजन -3 से -2 z-स्कोर के बीच या MUAC 11 से 12.5 सेमी। कुपोषित लेकिन तत्काल जीवन के लिए खतरा नहीं।
प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM):
क्वाशियोरकर : प्रोटीन की कमी → सूजन, त्वचा की समस्याएं, वृद्धि में रुकावट।
मरास्मस : सामान्य पोषण की गंभीर कमी → अत्यधिक वजन घटता है, मांसपेशियों की क्षीणता, कमजोरी।
कीटोसिस : लंबे समय तक कार्बोहाइड्रेट की कमी से उत्पन्न अवस्था, जिसमें शरीर में कीटोन बॉडीज़ की मात्रा बढ़ जाती है। अक्सर सांस से मीठी गंध आती है।
वेस्टिंग : तीव्र कुपोषण, जिसमें ऊँचाई के अनुसार वजन बहुत कम होता है (वसा/मांसपेशियों की तेजी से हानि)।
स्टंटिंग : दीर्घकालिक कुपोषण, जिसमें आयु के अनुसार ऊँचाई बहुत कम होती है (लंबे समय से पोषण की कमी)।
अंडरवेट : आयु के अनुसार वजन बहुत कम होना (तीव्र और दीर्घकालिक कुपोषण का मिश्रण)।
सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी : विशिष्ट विटामिन या खनिजों (जैसे आयरन, विटामिन A, आयोडीन, जस्ता) की अपर्याप्त मात्रा से स्वास्थ्य समस्याएँ होती हैं — जैसे एनीमिया या रतौंधी।
अतिपोषण : पोषक तत्वों विशेषकर कैलोरी का अधिक मात्रा में सेवन।
मोटापा : शरीर में अत्यधिक वसा का संचय, जिससे मधुमेह और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ता है।
मिश्रित कुपोषण : ऐसे व्यक्ति जो अधिक वजन या मोटे होते हैं, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी रखते हैं। अल्पपोषण और अतिपोषण मिलकर कुपोषण का त्रि-भार बनाते हैं।
छिपी हुई भूख : ऐसी स्थिति जिसमें पर्याप्त कैलोरी लेने के बावजूद आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों (विटामिन और खनिजों) की कमी रहती है।
आयरन की कमी (एनीमिया): आयरन की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण घटता है और ऑक्सीजन परिवहन प्रभावित होता है।
विटामिन A की कमी: विटामिन A की कमी से दृष्टि और प्रतिरक्षा कार्य प्रभावित होते हैं – नाइट ब्लाइंडनेस।
आयोडीन की कमी (IDD): आयोडीन की अपर्याप्तता से थायरॉयड संबंधी समस्या (जैसे गलगंड) उत्पन्न होती है।
FSSAI और उच्च-जोखिम वाली खाद्य श्रेणी (2025)
उच्च-जोखिम वाले खाद्य पदार्थ वे ‘रेडी टू ईट’ खाद्य पदार्थ हैं जो रोगजनक बैक्टीरिया की वृद्धि को समर्थन देते हैं और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
उदाहरण:
डेयरी उत्पाद: दूध, चीज़, क्रीम
मांस और पोल्ट्री उत्पाद
मछली और मछली उत्पाद
पैकेज्ड पीने का पानी: हाल ही में शामिल किया गया है।
सभी उच्च-जोखिम वाले खाद्य पदार्थों के केंद्रीय स्तर पर लाइसेंस प्राप्त निर्माता/प्रोसेसर को वार्षिक ऑडिट कराना आवश्यक है।
मिथाइलकोबालामिन पर FSSAI के दिशा-निर्देश
मिथाइलकोबालामिन: विटामिन B12 का सक्रिय रूप → कोशिका विभाजन, रक्त निर्माण, प्रोटीन संश्लेषण, DNA और RBC उत्पादन, तथा तंत्रिका कार्यों के लिए आवश्यक।
स्रोत: दूध और डेयरी उत्पाद (प्राकृतिक आहार स्रोत)।
चिकित्सकीय उपयोग:
डायबिटिक न्यूरोपैथी में दर्द से राहत
मेगालोब्लास्टिक एनीमिया (विटामिन B12 की कमी) का उपचार
अल्ज़ाइमर रोग और संज्ञानात्मक गिरावट में सहायक चिकित्सा।
2016 में प्रतिबंधित किया गया था → 2021 में कुछ शर्तों के तहत प्रतिबंध हटाया गया, अधिसूचना लंबित।
विटामिन B12 के अन्य रूप
सायनोकोबालामिन: सिंथेटिक रूप (आम तौर पर सप्लीमेंट्स में पाया जाता है)।
हाइड्रॉक्सी कोबालामिन: इंजेक्टेबल रूप, गंभीर कमी में उपयोग।
मिथाइलकोबालामिन: जैविक रूप से सक्रिय, शरीर द्वारा सीधे उपयोग किया जाता है।
भोजन संबंधी विकार
ईटिंग डिसऑर्डर्स (EDs) गंभीर मानसिक स्वास्थ्य स्थितियाँ हैं, जिनमें असामान्य खान-पान की आदतें और शरीर के प्रति विकृत धारणा शामिल होती है, जिससे शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कार्य प्रणाली प्रभावित होती है।
इन्हें DSM‑5 (मनोवैज्ञानिक विकारों का वर्गीकरण) के अंतर्गत रखा गया है।
सामान्यतः 14 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों में देखे जाते हैं।
प्रमुख प्रकार
एनोरेक्सिया नर्वोसा – भोजन से इनकार)
यह अल्पपोषण से उत्पन्न एक मानसिक विकार है। भोजन की अत्यधिक कमी के कारण तेजी से वजन घटना, वजन बढ़ने का अति भय और शरीर के प्रति विकृत दृष्टिकोण।
केस उदाहरण:सोनम – “परफेक्ट” शरीर पाने की इच्छा में खाना लगभग बंद कर देती है, कुपोषित रहती है लेकिन फिर भी खुद को मोटी मानती है।
स्वास्थ्य जोखिम: अंगों को नुकसान, ऑस्टियोपोरोसिस, बांझपन।
बुलीमिया नर्वोसा – बार-बार अत्यधिक भोजन करना)
बिंज ईटिंग (बेकाबू भोजन करना – अत्यधिक भोजन करने) के बाद उल्टी करना, रेचक लेना, अत्यधिक व्यायाम जैसे प्रतिकारक/क्षतिपूर्ति व्यवहार अपनाए जाते हैं।
स्वास्थ्य जोखिम: इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, दांतों का क्षरण, पाचन तंत्र की समस्याएँ।
प्रचलन : भारत में अनुमानतः 2–3% जनसंख्या इससे प्रभावित है।
शहरी युवा: बेंगलुरु, मैसूर और दक्षिण भारत में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि 13–26% छात्र ईटिंग डिसऑर्डर विकसित करने के जोखिम में हैं।
अन्य संबंधित अवधारणाएँ
फाइटोकेमिकल्स
ये पौधों में पाए जाने वाले जैव सक्रिय यौगिक होते हैं जिनमें संभावित स्वास्थ्य लाभ होते हैं।
ये फलों, सब्जियों और साबुत अनाज में पाए जाते हैं।
फाइटोकेमिकल्स के उदाहरण
फाइटोकेमिकल
खाद्य स्रोत
स्वास्थ्य लाभ
फ्लेवोनॉयड्स
सेब, प्याज, खट्टे फल, ग्रीन टी
एंटीऑक्सीडेंट, सूजन-रोधी, हृदय और मस्तिष्क स्वास्थ्य
प्रोबायोटिक्स जीवित सूक्ष्मजीव (मुख्यतः बैक्टीरिया और यीस्ट) होते हैं, जो पर्याप्त मात्रा में सेवन करने पर विशेष रूप से पाचन तंत्र के लिए स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। इन्हें अक्सर “अच्छे” या “मित्र” बैक्टीरिया कहा जाता है।
प्रोबायोटिक्स कुछ खाद्य पदार्थों, डायटरी सप्लीमेंट्स, और यहां तक कि कुछ त्वचा देखभाल उत्पादों में भी पाए जाते हैं।
श्रेणी
प्रमुख जानकारी
उदाहरण
प्रकार
बैक्टीरिया: सबसे सामान्य प्रकार, आंतों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक।
लैक्टोबैसिलस (जैसे L. acidophilus), बिफिडोबैक्टीरियम (जैसे B. bifidum)।
यीस्ट: एक विशेष प्रकार जो पाचन सहायता के लिए जाना जाता है।
सैक्रोमाइसीज़ बौलार्डी
स्रोत
प्रोबायोटिक्स प्राकृतिक रूप से किण्वित खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं और सप्लीमेंट्स के रूप में भी उपलब्ध हैं।
दही (Yogurt), केफिर, सौकरौट, किमची, मिसो, और कुछ प्रकार के अचार.
संभावित लाभ
समग्र पाचन स्वास्थ्य का समर्थन, समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा, और प्रतिरक्षा प्रणाली को संतुलित करना।
—
ग्लूटेन संवेदनशीलता के लिए लाभ
प्रोबायोटिक्स आहार घटकों (जैसे ग्लूटेन) के विघटन में सहायता कर सकते हैं और आंतों की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को संतुलित कर सकते हैं।
विशिष्ट Lactobacillus और Bifidobacterium स्ट्रेन्स का अध्ययन ग्लूटेन से संबंधित समस्याओं के लिए किया गया है।
कार्बनिक अम्ल और उनके स्रोत
अम्ल का नाम
स्रोत
उपयोग
एसीटिक अम्ल
सिरका
परिरक्षक, स्वाद बढ़ाने के लिए
सिट्रिक अम्ल
नींबू, मौसमी, संतरा (खट्टे फल)
परिरक्षक, एंटीऑक्सीडेंट, स्वाद एवं अम्लता नियंत्रक
लैक्टिक अम्ल
दही, किण्वित खाद्य पदार्थ (Yogurt)
परिरक्षक, प्रोबायोटिक; दूध की शर्करा (लैक्टोज़) के किण्वन से उत्पन्न
बेंज़ोइक अम्ल
क्रैनबेरी, आलूबुखारा, दालचीनी (प्राकृतिक); कृत्रिम रूप से भी
पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में परिरक्षक (अक्सर सोडियम बेंज़ोएट के रूप में)
टार्टरिक अम्ल
इमली, अंगूर
बेकिंग, झाग उत्पन्न करने में
मैलिक अम्ल
सेब, पके केले, अनार, बेरीज़
फॉस्फोरिक अम्ल
फल-स्वाद युक्त शीतल पेय
कार्बोनिक अम्ल
सोडा पानी, कार्बोनेटेड पेय
सिरका और कार्बनिक अम्ल
सिरका गन्ने के रस, फलों के रस या शीरे (molasses) जैसे शर्करायुक्त द्रवों के किण्वन से बनाया जाता है।
सिरके में मुख्य अम्ल एसीटिक अम्ल (CH₃COOH) होता है, जो सिरके को खट्टा स्वाद और संरक्षक गुण प्रदान करता है।
एसिटिक अम्ल के कारण सिरके की उच्च अम्लता (pH ≈ 2.4−3.4) अधिकांश बैक्टीरिया, यीस्ट और फफूंद के विकास को रोकती है, इसी वजह से इसका अचार और खाद्य पदार्थों को परिरक्षित करने में व्यापक उपयोग होता है।