विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों का योगदान

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों का योगदान: विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत भारतीय वैज्ञानिकों और नवप्रवर्तकों ने प्राचीन काल से आधुनिक युग तक गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, अंतरिक्ष और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। “आर्यभट्ट”, “सी. वी. रमन”, “होमी भाभा” और “ए. पी. जे. अब्दुल कलाम” जैसे महान व्यक्तित्वों के कार्यों ने भारत को वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक पहचान दिलाई है।

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  • प्राचीन भारतीय सभ्यता ने गणित और खगोल विज्ञान के क्षेत्रों में अत्यंत गहन और आधारभूत योगदान दिए हैं। इनमें से कई योगदान अपने समय से सदियों आगे थे और उन्होंने वैश्विक वैज्ञानिक विकास को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया।

प्राचीन भारत में विज्ञान के अग्रदूत (Ancient India)

क्षेत्रवैज्ञानिक/ व्यक्तित्वयोगदान/ उपलब्धियाँ
गणित और खगोल विज्ञानआर्यभट्ट (आर्यभट) (लगभग 476–550 ईस्वी)– इन्होंने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘आर्यभटीय’ की रचना की।
– उन्होंने गणनाओं में ‘शून्य’ (Zero) का उपयोग ‘प्लेसहोल्डर’ (स्थानधारक) के रूप में किया और पाई (π) का मान सटीक रूप से 3.1416 परिकलित किया।
– उन्होंने ही यह खोजा था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है (जिसके कारण दिन और रात होते हैं) और उन्होंने सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की।
वराहमिहिर (लगभग 505–587 ईस्वी)इन्होंने ‘बृहत संहिता’ (एक विश्वकोश जिसमें वास्तुकला, ज्योतिष और मौसम का वर्णन है) और ‘पंचसिद्धांतिका’ (पाँच प्रमुख खगोलीय सिद्धांतों का सार) की रचना की।
ब्रह्मगुप्त (लगभग 598–668 ईस्वी)इन्होंने ‘ब्रह्मस्फुट सिद्धांत’ लिखा, जिसमें पहली बार संख्या के रूप में शून्य और ऋणात्मक संख्याओं (Negative numbers) से जुड़ी गणनाओं के नियम प्रतिपादित किए गए।
भास्कर II (भास्कराचार्य) (लगभग 1114–1185 ईस्वी)– 12वीं शताब्दी के महान गणितज्ञ जिन्होंने ‘सिद्धांत शिरोमणि’ नामक ग्रंथ लिखा। इसके चार भाग हैं: लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित और गोलाध्याय
– मुगल काल के दौरान फ़ैज़ी ने भास्कर के ‘बीजगणित’ का अनुवाद किया था।
– उन्हें अवकलन गणित (Differential Calculus) के सिद्धांतों की खोज करने वाला अग्रणी माना जाता है।
संगमग्राम के माधव (लगभग 1340–1425 ईस्वी)– इन्होंने प्रसिद्ध ‘केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स’ की स्थापना की।
– उन्होंने गणित में अनंत (Infinity) की अवधारणा पेश की और त्रिकोणमितीय फलनों (साइन और कोसाइन) के लिए अनंत श्रेणी (Infinite series)तैयार की, जिससे न्यूटन और लेबनिज से बहुत पहले ‘कैलकुलस’ का आधार तैयार हुआ।
नारायण पंडित: इन्होंने ‘गणितकौमुदी’ और ‘बीजगणितवतंशा’ की रचना की।
गंगाधर: ‘लीलावती करमदीपिका’, ‘सिद्धांतदीपिका’ और ‘लीलावती व्याख्या’ जैसे ग्रंथों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया।
महेंद्र सूरी: इन्होंने खगोलीय उपकरण ‘यंत्रराज’ (Yantraja) का विकास किया।
महाराजा सवाई जय सिंह-द्वितीय: इन्होंने दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा और जयपुर में पाँच खगोलीय वेधशालाओं (जंतर-मंतर) की स्थापना की।
चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और जीवन विज्ञान (Medicine, Surgery, and Life Sciences)सुश्रुत (Sushruta)– इन्हें “शल्य चिकित्सा का जनक” (Father of Surgery) कहा जाता है।
– इन्होंने ‘सुश्रुत संहिता’ की रचना की।
– उन्होंने राइनोप्लास्टी (नाक की प्लास्टिक सर्जरी), मोतियाबिंद (Cataract) हटाने जैसी नवीन प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया। वे आंतों को जोड़ने के लिए चींटियों के सिर का उपयोग ‘घुलनशील टांकों’ के रूप में करते थे।
चरक (Charaka)– इन्हें “भारतीय चिकित्सा शास्त्र का जनक” कहा जाता है।
– इन्होंने ‘चरक संहिता’ का संकलन किया, जो पाचन, चयापचय (Metabolism) और प्रतिरक्षा (Immunity) की अवधारणा का आधारभूत ग्रंथ है।
त्रिदोष सिद्धांत: उन्होंने ‘वात, कफ और पित्त’ के बीच असंतुलन को रोग का कारण माना और हृदय को शरीर का नियंत्रण केंद्र बताया।
आनुवंशिकी (Genetics): इसमें रोगों के आनुवंशिक आधार का सबसे प्राचीन संदर्भ मिलता है, जो बताता है कि माता और पिता दोनों के कारक बच्चे के स्वास्थ्य और विशेषताओं को प्रभावित करते हैं।
सूक्ष्म विकृति विज्ञान (Microscopic Pathology): यूरोप में सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार से सदियों पहले, संहिता में सूक्ष्म रोगजनक जीवों (कृमियों) के अस्तित्व का उल्लेख किया गया है।
पशु चिकित्सा विज्ञानशालिहोत्र कृत हयआयुर्वेद (Hayayurveda): यह घोड़ों के उपचार और उनकी शारीरिक रचना (Anatomy) पर केंद्रित था।
पालकाप्य कृत गजआयुर्वेद (Gajayurveda): यह हाथियों के उपचार के लिए समर्पित ग्रंथ है।
पादप विज्ञान (वृक्षायुर्वेद)प्राचीन भारतीयों ने पादप जीवन और कृषि का व्यापक अध्ययन किया, जिसमें मृदा परीक्षण, फसल चक्र (Crop rotation) और रोग प्रबंधन शामिल था।
हंसदेव: इन्होंने 13वीं शताब्दी में ‘मृग-पक्षी-शास्त्र’ का संकलन किया, जो शिकार किए जाने वाले जानवरों और पक्षियों पर आधारित कार्य है।
सम्राट जहाँगीर: उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ में पशुओं के प्रजनन (Breeding) और संकरण (Hybridization) पर अपने अवलोकनों और प्रयोगों को दर्ज किया।
भौतिकी, रसायन विज्ञान और धातुकर्ममहर्षि कणाद (Maharishi Kanad)– इन्होंने वैशेषिक दर्शन (Vaisheshika school) की स्थापना की।
– जॉन डाल्टन से सदियों पहले इन्होंने परमाणु सिद्धांत (Atomic theory) प्रतिपादित किया।
– इन्होंने प्रस्तावित किया कि सभी पदार्थ अविनाशी और अदृश्य कणों से बने होते हैं, जिन्हें ‘परमाणु’ (Atoms) कहा जाता है।
जंग-मुक्त लौह स्तंभ (The Rust-Free Iron Pillar)संरचना: 7.2 मीटर ऊँचा, 6 टन भारी यह स्तंभ चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्त काल) में निर्मित किया गया था।
विशेषता: यह अपनी असाधारण क्षरण प्रतिरोधकता (Corrosion resistance) के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
वैज्ञानिक कारण: लोहे में फास्फोरस की उच्च मात्रा और पर्यावरणीय स्थितियों के कारण इस पर आयरन ऑक्सी हाइड्रॉक्साइड और फॉस्फेट की एक सुरक्षात्मक पतली निष्क्रिय परत (मिसावाइट परत – Misawite layer) बन गई है।
महत्व: यह धातुओं की शुद्धता और उनके उपचार (Treatment) के संबंध में प्राचीन भारतीयों की उन्नत समझ को दर्शाता है।
प्रमुख ग्रंथ: वृन्द द्वारा रचित ‘सिद्धयोग’ और चक्रपाणि दत्त द्वारा रचित ‘चक्रदत्त’ इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
प्रमुख व्यक्तित्व: नागार्जुन: ‘रसरत्नाकर’ के लेखक, जिन्हें रसायन शास्त्र और धातुकर्म का महान विद्वान माना जाता है।
वाग्भट: ‘रसार्णव’ और ‘रसरत्नसमुच्चय’ के रचयिता, जो इस क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे।

आधुनिक भारतीय विज्ञान के प्रणेता (Modern Indian)

क्षेत्रवैज्ञानिकयोगदान
रसायन विज्ञानआचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय भारतीय रसायन विज्ञान के जनक: इन्हें भारत में आधुनिक रसायन शास्त्र का संस्थापक माना जाता है।
वैज्ञानिक योगदान: इन्होंने अकार्बनिक और कार्बनिक नाइट्राइट्स तथा कार्बनिक थायो यौगिकों (Organic thio compounds) पर महत्वपूर्ण शोध किया।
औद्योगिक योगदान: रासायनिक अनुसंधान के अग्रदूत के रूप में, उन्होंने 1892 में ‘बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स वर्क्स’ की स्थापना की, जो भारत की पहली फार्मास्युटिकल कंपनी थी।
लेखन: उन्होंने प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री’ लिखी, जिसमें प्राचीन भारतीय रसायन विज्ञान के गौरवशाली इतिहास का वर्णन है।
सर शांति स्वरूप भटनागरभारतीय अनुसंधान प्रयोगशालाओं के जनक: इन्होंने 1942 में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसके पहले महानिदेशक के रूप में कार्य किया।
संस्थागत ढांचा: उन्होंने राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (NPL) और राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (NCL) सहित 12 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं को स्थापित करने में मदद की।
सम्मान: उनके सम्मान में प्रतिष्ठित ‘एस.एस. भटनागर पुरस्कार’ प्रदान किया जाता है, जिसे अक्सर विज्ञान के क्षेत्र में ‘भारतीय नोबेल पुरस्कार’ कहा जाता है।
सी.एन.आर. राव (CNR Rao)अनुसंधान क्षेत्र: इनका कार्य मुख्य रूप से संरचनात्मक और ठोस अवस्था रसायन, रासायनिक स्पेक्ट्रोस्कोपी, सतह रसायन और उच्च तापमान अतिचालकता पर केंद्रित है।
भारतीय नैनो टेक्नोलॉजी के जनक: कार्बन और अकार्बनिक नैनोट्यूब में उनके योगदान के कारण उन्हें “भारतीय नैनो-प्रौद्योगिकी का जनक” कहा जाता है।
भौतिकी (Physics)सर सी.वी. रमन (Sir C.V. Raman)रमन प्रभाव (Raman Effect): इन्होंने ‘रमन प्रभाव’ (सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन) की खोज की, जो यह समझाता है कि समुद्र का रंग नीला क्यों दिखाई देता है।
उपलब्धि: वह 1930 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय वैज्ञानिक थे।
संस्थागत योगदान: उन्होंने बैंगलोर में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) को सुदृढ़ किया और 1948 में रमन अनुसंधान संस्थान (RRI) की स्थापना की।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस: इस ऐतिहासिक खोज की स्मृति में प्रतिवर्ष 28 फरवरी को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ मनाया जाता है।
सत्येंद्र नाथ बोस (Satyendra Nath Bose)क्वांटम भौतिकी: इन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ मिलकर ‘बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी’ विकसित की।
प्लांक के नियम का प्रतिपादन: इन्होंने विकिरण को ‘फोटॉन की गैस’ के रूप में मानते हुए और नई सांख्यिकीय विधियों का उपयोग करके ‘प्लांक के नियम’ का एक नया व्युत्पत्ति प्रदान किया।
बोसोन (Bosons): उप-परमाणु कणों, जिनमें ‘हिग्स बोसोन’ भी शामिल है, का नाम इनके सम्मान में ‘बोसोन’ रखा गया है।
जगदीश चंद्र बोस (Jagadish Chandra Bose)पादप कार्यिकी (Plant Physiology): वे वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध करने वाले पहले व्यक्ति थे कि पौधे उत्तेजनाओं के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं। उन्होंने पौधों की वृद्धि और स्पंदन को रिकॉर्ड करने के लिए ‘क्रेस्कोग्राफ’ (Crescograph) नामक उपकरण का आविष्कार किया।
– बेतार संचार (Wireless Communication): उन्होंने गुग्लिएल्मो मार्कोनी द्वारा पेटेंट कराए जाने से एक वर्ष पूर्व, 1895 में कोलकाता में बेतार टेलीग्राफी (Wireless Telegraphy) का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था।
मेघनाद साहा (Meghnad Saha)खगोल भौतिकी (Astrophysics): मेघनाद साहा अपने मौलिक कार्य, मुख्य रूप से ‘साहा आयनीकरण समीकरण’ के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित हैं।
महत्व: यह समीकरण सूर्य और तारों में तत्वों के तापमान और उनके आयनीकरण अवस्था के बीच संबंध की व्याख्या करता है, जो आधुनिक खगोल भौतिकी का आधार है।
कैलेंडर सुधार: अपने करियर के उत्तरार्ध में, उन्होंने 1952 की कैलेंडर सुधार समिति का नेतृत्व किया और भारत के लिए सटीक, वैज्ञानिक रूप से आधारित राष्ट्रीय कैलेंडर (शक संवत) तैयार किया।
संस्थागत योगदान: 1947 में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स’ की स्थापना की, जिसे बाद में ‘साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स’ नाम दिया गया।
– वे भारत में नदी घाटी योजना के मुख्य वास्तुकार थे और उन्होंने दामोदर घाटी परियोजना (DVC) की मूल योजना तैयार की थी।
दौलत सिंह कोठारी (D.S. Kothari)(जन्म: 1906, उदयपुर, राजस्थान)शिक्षा और नीति: UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) और NCERT की स्थापना में इनकी प्रमुख भूमिका रही।
रक्षा विज्ञान: वे रक्षा मंत्रालय के पहले वैज्ञानिक सलाहकार (1948-1961) थे।
कोठारी आयोग (1964-66): भारत की शिक्षा प्रणाली के आधुनिकीकरण के लिए इन्होंने ‘कोठारी आयोग’ की अध्यक्षता की।
अनुसंधान: सांख्यिकीय ऊष्मागतिकी (Statistical Thermodynamics) और खगोल भौतिकी में इनके शोध को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है।
होमी जे. भाभा (Homi J. Bhabha)परमाणु भौतिकी: इन्हें “भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक” कहा जाता है। इन्होंने भारत के लिए त्रि-स्तरीय परमाणु शक्ति कार्यक्रम तैयार किया।
संस्थान: शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा विकास का नेतृत्व करते हुए उन्होंने TIFR (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च) और BARC (भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र) की स्थापना की।
– अप्सरा (1956): यह भारत का पहला परमाणु विखंडन रिएक्टर (Nuclear fission reactor) था।
वर्तमान स्थिति: भारत वर्तमान में 24 परमाणु विखंडन रिएक्टर (8780 MWe क्षमता) संचालित करता है और अंतरराष्ट्रीय ITER (फ्यूजन/संलयन परियोजना) का सदस्य है।
कण भौतिकी परियोजनाएं: भारत वैश्विक स्तर पर कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोगों में सक्रिय रूप से शामिल है:
INO (International Neutrino Observatory): अंतरराष्ट्रीय न्यूट्रिनो वेधशाला परियोजना।
CERN: सर्न (यूरोप) में हो रहे प्रयोगों (ALICE, CMS) में भारत का महत्वपूर्ण योगदान।
LIGO-India: गुरुत्वाकर्षण तरंगों के अध्ययन के लिए ‘लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी’ (LIGO) की स्थापना भारत में की जा रही है।
अंतरिक्ष विज्ञानविक्रम साराभाईअंतरिक्ष प्रौद्योगिकी: इन्हें “भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक” कहा जाता है।
संस्थागत योगदान: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) की स्थापना में इनकी निर्णायक भूमिका रही।
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखरखगोल भौतिकी: तारों की संरचना और विकास के सैद्धांतिक अध्ययन के लिए इन्हें 1983 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
चंद्रशेखर सीमा (Chandrasekhar Limit): यह एक स्थिर ‘श्वेत बौने’ (White Dwarf) तारे के अधिकतम द्रव्यमान को निर्धारित करती है, जो हमारे सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1.44 गुना है।
सिद्धांत: यदि किसी मरते हुए तारे का द्रव्यमान इस सीमा के बराबर या उससे कम है, तो वह एक सघन और स्थिर ‘श्वेत बौने’ तारे में बदल जाता है।
– यदि द्रव्यमान 1.44 की सीमा से अधिक हो जाता है, तो गुरुत्वाकर्षण बल तारे के आंतरिक बाहरी दबाव (इलेक्ट्रॉन अपभ्रष्टता दबाव – Electron degeneracy pressure) पर हावी हो जाता है, जिससे तारा निरंतर सिकुड़कर न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल में बदल जाता है।
वैमानिकी और रक्षा (Aerospace and Defence)डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाममिसाइल मैन ऑफ इंडिया: एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के मुख्य वास्तुकार; उन्होंने पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, नाग और आकाश जैसी मिसाइलें विकसित कीं।
नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम: इन्होंने भारत के पहले उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV-III) के विकास में योगदान दिया, जिसने 1980 में ‘रोहिणी’ उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया।
परमाणु क्षेत्र में भूमिका: 1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों में प्रमुख भूमिका निभाई; उन्होंने हमेशा परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का समर्थन किया।
जनता के राष्ट्रपति (2002–2007): वे ‘पीपुल्स प्रेसिडेंट’ के रूप में जाने गए; उन्होंने PURA (ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएँ प्रदान करना) के माध्यम से विकसित भारत का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
शिक्षा और साहित्य: उन्होंने “विंग्स ऑफ फायर” (अग्नि की उड़ान) और “इग्नाइटेड माइंड्स” जैसी प्रेरक पुस्तकें लिखीं।
सम्मान: भारत रत्न (1997), पद्म विभूषण (1990) और पद्म भूषण (1981)।
गणित और सांख्यिकीश्रीनिवास रामानुजन (1887–1920)गणितीय योगदान: इन्होंने संख्या सिद्धांत (Number Theory), अनंत श्रेणी (Infinite series) और सतत भिन्न (Continued fractions) में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके सूत्रों, सिद्धांतों और प्रमेयों ने व्यापक शोध को प्रेरित किया है।
हार्डी-रामानुजन संख्या (1729): यह वह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो अलग-अलग तरीकों से दो घनों (Cubes) के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है: 
1729 = 13 + 123 = 93 + 103. 
राष्ट्रीय गणित दिवस: उनके जन्मदिन, 22 दिसंबर को भारत में ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
प्रशांत चंद्र महालनोबिस (1893–1972)संस्थागत योगदान: इन्होंने भारतीय सांख्यिकीय संस्थान (ISI) की स्थापना की।
आर्थिक योजना: भारत की द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) मुख्य रूप से ‘महालनोबिस मॉडल’ पर आधारित थी, जिसने भारी उद्योगों और औद्योगीकरण पर जोर दिया।
सांख्यिकी में योगदान: उन्होंने ‘महालनोबिस दूरी’ (Mahalanobis Distance) नामक एक सांख्यिकीय माप विकसित किया, जिसका उपयोग डेटा विश्लेषण में व्यापक रूप से किया जाता है।
सांख्यिकी दिवस: उनके योगदान के सम्मान में 29 जून को भारत में ‘राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस’ मनाया जाता है।
जीवन विज्ञान (Life Sciences)सलिम अली (Salim Ali) (1896–1987)भारतीय पक्षी विज्ञान के जनक (Father of Indian Ornithology): इन्होंने भारत में पक्षी अध्ययन को लोकप्रिय बनाया।
प्रमुख कार्य: इन्होंने “द बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स” लिखी, जिससे पक्षी-निरीक्षण (Birdwatching) को सामान्य जन के लिए सुलभ बनाया गया।
सर्वेक्षण: भारत में व्यापक पक्षी सर्वेक्षण किए और पक्षी वर्गीकरण (Taxonomy) में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
संरक्षण: केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (भरतपुर पक्षी अभयारण्य) की स्थापना में इनकी निर्णायक भूमिका रही।
संस्थाएं: ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ (BNHS) के साथ मिलकर कार्य किया। उनके सम्मान में ‘सालिम अली पक्षी विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र’ (SACON) की स्थापना की गई।
कोशिका विज्ञान: इसकी शुरुआत ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ (TIFR) में हुई। प्रमुख उपलब्धियों में एक्सोटॉक्सिन (Exotoxins) की खोज और कोलेजन का परमाणु संरचनात्मक मॉडल शामिल है।
DNA फिंगरप्रिंटिंग: भारत में इसे 1988 में ‘सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी’ (CCMB) के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया गया। इसके साथ ही भारत अपना स्वयं का ‘प्रोब’ (Probe) रखने वाला दुनिया का तीसरा देश बना।
लालजी सिंह: इन्हें भारत में “DNA फिंगरप्रिंटिंग का जनक” कहा जाता है।
प्रमुख वैज्ञानिक व्यक्तित्व:
हर गोबिंद खुराना (Har Gobind Khorana): 
उपलब्धि: इन्हें फिजियोलॉजी (शरीर क्रिया विज्ञान) या चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार (रॉबर्ट डब्ल्यू. हॉली और मार्शल डब्ल्यू. निरेनबर्ग के साथ संयुक्त रूप से) से सम्मानित किया गया।
वैज्ञानिक योगदान: इन्होंने न्यूक्लियोटाइड्स के उस सटीक क्रम का प्रदर्शन किया जो आनुवंशिक कूट (Genetic Code) को ले जाते हैं और प्रोटीन संश्लेषण को नियंत्रित करते हैं। 
जी.एन. रामचंद्रन (G.N. Ramachandran): 
क्षेत्र: इन्होंने आणविक जीव भौतिकी (Molecular Biophysics) में अभूतपूर्व योगदान दिया।
रामचंद्रन प्लॉट: इन्होंने ‘रामचंद्रन प्लॉट’ का निर्माण किया, जो प्रोटीन की संरचना को समझने के लिए आज भी वैश्विक स्तर पर मानक उपकरण है।
कोलेजन संरचना: इन्होंने कोलेजन (Collagen) की तिहरी कुंडलिनी संरचना) की खोज की।
वेंकटरमण रामकृष्णन: 
उपलब्धि: रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता।
वैज्ञानिक योगदान: इनका कार्य राइबोसोम और क्रोमेटिन (Chromatin) की परमाणु संरचना पर आधारित है, जो यह समझने में मदद करता है कि कोशिकाएं आनुवंशिक जानकारी को जीवन में कैसे बदलती हैं।
बीरबल साहनी (Birbal Sahni)
पुरावनस्पति विज्ञान (Paleobotany): इन्हें भारत में पुरावनस्पति विज्ञान का जनक माना जाता है।
वैज्ञानिक योगदान: इन्होंने जीवाश्मों (Fossils) और प्राचीन पादप जीवन पर अपने शोध के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे पृथ्वी की प्रागैतिहासिक वनस्पतियों (Prehistoric flora) के बारे में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई।
कृषि और डेयरी क्षेत्रएम.एस. स्वामीनाथन (M.S. Swaminathan)भारतीय हरित क्रांति के जनक (Father of the Indian Green Revolution): इन्हें भारत में कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाने का श्रेय दिया जाता है।
वैज्ञानिक योगदान: इन्होंने गेहूं और चावल की उच्च उपज वाली किस्मों (High-yielding varieties – HYV) को विकसित किया, जिससे भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना।
पुरस्कार और सम्मान: विश्व खाद्य पुरस्कार (1987): इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के प्रथम प्राप्तकर्ता।
पद्म पुरस्कार: पद्म श्री (1967), पद्म भूषण (1972), पद्म विभूषण (1989)।
भारत रत्न (2024): मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित।
डॉ. वर्गीज कुरियन (1921–2012)श्वेत क्रांति के जनक और “भारत के मिल्कमैन”: इन्हें भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बनाने का श्रेय दिया जाता है।
ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood – 1970): उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के माध्यम से यह कार्यक्रम शुरू किया गया। इसने एक – देशव्यापी दुग्ध ग्रिड (Milk Grid) का निर्माण किया और डेयरी किसानों को सशक्त बनाया।
अमूल (AMUL) के संस्थापक: इन्होंने ‘कैरा जिला सहकारी समिति’ (Kaira District Cooperative) को एक वैश्विक ब्रांड ‘अमूल’ में परिवर्तित कर दिया।
सहकारी मॉडल: उन्होंने सहकारी विपणन (Cooperative marketing) का एक सफल मॉडल पेश किया, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हुई।
इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी)सर एम. विश्वेश्वरैया (1861–1962)प्रमुख इंजीनियरिंग कार्य:
कृष्ण राज सागर बांध: कावेरी नदी पर स्थित इस विशाल बांध के निर्माण का पर्यवेक्षण किया, जो कर्नाटक में सिंचाई (Irrigation) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बाढ़ सुरक्षा: कोलार गोल्ड फील्ड्स के लिए प्रभावी बाढ़ सुरक्षा प्रणाली का डिजाइन तैयार किया।
हैदराबाद बाढ़ सुरक्षा: हैदराबाद शहर को मूसी नदी की बाढ़ से बचाने के लिए एक आधुनिक सुरक्षा प्रणाली का निर्माण किया।
नवाचार और तकनीकी योगदान:
स्वचालित रेत निस्यंदन प्रणाली: खेती में जल दक्षता में सुधार के लिए इस प्रणाली का विकास किया।
स्वचालित स्लुइस गेट्स (1903): एनीकट (Weir) के लिए स्वचालित जल कपाटों (Floodgates) की एक अभिनव प्रणाली विकसित की, जिसे सबसे पहले पुणे के खड़कवासला जलाशय में लगाया गया था।
नगर नियोजन: आधुनिक शहरी विकास और नगर नियोजन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई।
सार्वजनिक सेवा: उन्होंने 1912 से 1918 तक मैसूर राज्य के दीवान के रूप में कार्य किया।
सम्मान:
नाइट कमांडर (1915): ‘ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर’ के नाइट कमांडर की उपाधि से सम्मानित।
भारत रत्न (1955): भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजे गए।
विरासत
– उनकी स्मृति में बेंगलुरु में ‘विश्वेश्वरैया औद्योगिक और तकनीकी संग्रहालय’ और ‘विश्वेश्वरैया कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग’ जैसे प्रतिष्ठित संस्थान स्थापित हैं।
– उनके जन्मदिन, 15 सितंबर को भारत में ‘अभियंता दिवस’ (Engineers’ Day) के रूप में मनाया जाता है।

भारत की प्रमुख महिला वैज्ञानिक (Women Scientists)

  • दिति पंत (Aditi Pant): वे भारतीय अंटार्कटिका कार्यक्रम (1983-84) के तहत अंटार्कटिका की यात्रा करने वाली पहली भारतीय महिलाओं में से एक थीं। 
  • अन्ना मणि (Anna Mani): मौसम विज्ञानी: इन्हें “भारत की वेदर वुमन” कहा जाता है। उन्होंने मौसम संबंधी उपकरणों का विकास किया और भारत के सौर विकिरण निगरानी नेटवर्क (Solar radiation monitoring network) की स्थापना की।
  • असीमा चटर्जी (Asima Chatterjee): कार्बनिक रसायन: इन्होंने मलेरिया-रोधी (Anti-malarial) और मिर्गी-रोधी (Anti-epileptic) दवाओं का विकास किया। उपलब्धि: भारतीय विज्ञान कांग्रेस (1975) की पहली महिला जनरल प्रेसिडेंट बनीं
  • जानकी अम्माल (Janaki Ammal): पादप विज्ञान: वे एक वनस्पति शास्त्री और कोशिका-आनुवंशिकीविद् (Cytogeneticist) थीं।योगदान: उन्होंने गन्ने की उच्च उपज वाली किस्मों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
  • राजेश्वरी चटर्जी: वे माइक्रोवेव अनुसंधान में विशेषज्ञता रखने वाली भारत की पहली महिला इंजीनियर थीं और IISc में प्रोफेसर रहीं। उन्होंने रडार सिस्टम और एंटीना पर शोध किया।
  • कमला सोहोनी: उपलब्धि: वैज्ञानिक विषय में पीएच.डी. (Ph.D.) प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला।शोध: उन्होंने एंजाइमों (Enzymes) और विटामिनों पर महत्वपूर्ण शोध किया।
  • कल्पना चावला: अंतरिक्ष यात्री: अंतरिक्ष (स्पेस शटल कोलंबिया, 1997) में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला। 2003 में कोलंबिया आपदा में उनकी दुखद मृत्यु हो गई।
  • टेसी थॉमस: इन्हें “मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया” कहा जाता है। वे अग्नि-IV (Agni-IV) और अग्नि-V के विकास में प्रमुख व्यक्तित्व रहीं। वे भारत (DRDO) में मिसाइल परियोजना का नेतृत्व करने वाली पहली महिला हैं।इंदिरा हिंदुजा: स्त्री रोग विशेषज्ञ: वे IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) की प्रणेता हैं। उन्होंने 1986 में भारत के पहले टेस्ट-ट्यूब बेबी के जन्म में मुख्य भूमिका निभाई।
  • गगनदीप कांग: विषाणु विज्ञानी (Virologist): वे रॉयल सोसाइटी की फेलो चुनी जाने वाली पहली भारतीय महिला हैं। उन्होंने रोटावायरस वैक्सीन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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