जैव प्रौद्योगिकी की नवीन प्रवृत्तियाँ एवं अनुप्रयोग

जैव प्रौद्योगिकी की नवीन प्रवृत्तियाँ एवं अनुप्रयोग विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें जैविक प्रणालियों के आधुनिक उपयोग और नवीन तकनीकी विकास का अध्ययन किया जाता है। यह क्षेत्र चिकित्सा, कृषि, पर्यावरण संरक्षण तथा औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। इस विषय के अंतर्गत हम जैव प्रौद्योगिकी की विभिन्न नवीन प्रवृत्तियों, अनुप्रयोगों तथा उनके समाज और जीवन पर प्रभाव का अध्ययन करेंगे।

  • क्लोनिंग: जीवों, कोशिकाओं, या डीएनए खंडों ( की आनुवंशिक रूप से बिल्कुल समान (समरूप) प्रतियां बनाने की प्रक्रिया।
  • क्लोनिंग के प्रकार (Types of Cloning)
    • डीएनए क्लोनिंग/आणविक क्लोनिंग
      • संवाहकों (Vectors) – जैसे प्लाज्मिड या जीवाणुभोजी (Phages) – का उपयोग करके विशिष्ट डीएनए खंडों की प्रतिलिपि बनाना।
      • इसका उपयोग पुनर्योगज डीएनए तकनीक, जीन अनुक्रमण, और प्रोटीन उत्पादन में किया जाता है।
    • प्रजननात्मक क्लोनिंग/जननीय क्लोनिंग (Reproductive Cloning)
      • इसमें दाता (Donor) के आनुवंशिक रूप से पूर्णतः समान एक संपूर्ण जीव का उत्पादन किया जाता है।
      • तकनीक: कायिक कोशिका केंद्रक अंतरण (Somatic Cell Nuclear Transfer – SCNT)।
      • उदाहरण: डॉली (Dolly) भेड़।
    • उपचारात्मक क्लोनिंग/चिकित्सीय क्लोनिंग
      • इसमें दाता के आनुवंशिक रूप से समान भ्रूणीय स्टेम (मूल) कोशिकाओं का उत्पादन किया जाता है।
      • इसका उपयोग पुनर्योजी चिकित्सा, ऊतक मरम्मत, और रोग प्रतिरूपण (Disease modeling) के लिए किया जाता है।

कायिक कोशिका केंद्रक अंतरण (SCNT) तकनीक

  • SCNT तकनीक, जिसे “न्यूक्लियर ट्रांसफर द्वारा क्लोनिंग” भी कहा जाता है, प्रजनन क्लोनिंग (Reproductive Cloning) के क्षेत्र में प्रयुक्त एक तकनीक है।
  • इसमें किसी सोमैटिक (कायिक) कोशिका का केन्द्रक (Nucleus) एक एन्यूक्लिएटेड एग सेल (जिसका नाभिक हटा दिया गया हो) में स्थानांतरित किया जाता है ताकि एक आनुवंशिक रूप से समान जीव (क्लोन) बनाया जा सके या रोगी-विशिष्ट स्टेम कोशिकाएँ उत्पन्न की जा सके।
  • प्रक्रिया के चरण
    • सोमैटिक सेल चयन: एक वयस्क कोशिका (त्वचा, बाल, नाखून, मांसपेशी कोशिका आदि) चुनी जाती है – न कि शुक्राणु या अंडाणु। उसका केन्द्रक निकाला जाता है।
    • एन्यूक्लिएशन (Enucleation): एक दाता (Donor) से अंडाणु कोशिका ली जाती है और उसका केन्द्रक हटा दिया जाता है।
    • न्यूक्लियर ट्रांसफर: सोमैटिक कोशिका का नाभिक एन्यूक्लिएटेड अंडाणु में प्रविष्ट किया जाता है।
    • सक्रियण (Activation): अंडाणु को विद्युत स्पंदन (Electric Pulse) या रसायनों द्वारा उत्तेजित किया जाता है ताकि वह विभाजन प्रारंभ करे।
    • भ्रूण निर्माण: कोशिका विभाजित होकर ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) – भ्रूण का प्रारंभिक चरण – बनाती है।
    • परिणाम:
      • प्रजनन क्लोनिंग: भ्रूण को एक सरोगेट (Surrogate) में प्रत्यारोपित किया जाता है।
      • चिकित्सीय क्लोनिंग (Therapeutic Cloning / Stem Cell Therapy): भ्रूण का उपयोग भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएँ प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

SCNT के अनुप्रयोग

क्षेत्रउपयोग
क्लोनिंग (पादप प्रजनन नहीं)डॉली भेड़ (1996) – SCNT द्वारा क्लोन किया गया पहला स्तनधारी (Mammal)
स्टेम सेल अनुसंधानरोगी-विशिष्ट भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं का निर्माण।
रोग प्रतिरूपणपार्किंसन या अल्जाइमर जैसी आनुवंशिक बीमारियों का अध्ययन।
पुनर्योजी चिकित्साऊतक मरम्मत और अंग पुनर्जनन की संभावना।
औषधि परीक्षणभेषज या दवा परीक्षण के लिए व्यक्तिगत कोशिका वंशक्रम तैयार करना।

भारत में SCNT तकनीक की प्रमुख उपलब्धियां

वर्षउपलब्धिसंस्थान
2009समरूपाविश्व की पहली क्लोन की गई नदीय भैंस का बछड़ा (मुर्रा नस्ल)।गरिमा – विश्व की दूसरी क्लोन की गई भैंस का बछड़ातकनीक: हैंडगाइडेड क्लोनिंग तकनीकICAR–NDRI, Karnal
2023गंगाभारत की पहली क्लोन की गई गाय (गिर नस्ल)।ICAR–NDRI, Karnal

नवाचार (Innovations)

  • हैंडमेड क्लोनिंग (HMC): भारत में विकसित एक सरल SCNT विधि, दक्षता बढ़ाने और लागत घटाने हेतु।
  • ओवम पिक-अप (OPU): गायों से अंडाणु निकालने की गैर-आक्रामक तकनीक, जिससे उन्हें कोई हानि नहीं होती।
  • टेल सेल क्लोनिंग: गिर नस्ल की गायों के क्लोनिंग हेतु पूंछ की सोमैटिक कोशिकाओं का उपयोग।

 एकीकृत जीनोमिक चिप (Unified Genomic Chip)

  • विकसित: पशुपालन और डेयरी विभाग (DAHD), पशुपालन, डेयरी और मत्स्य मंत्रालय
  • उद्देश्य: भारतीय गाय और भैंस नस्लों की जीनोमिक प्रोफाइलिंग और मूल्यांकन।
  • दो संस्करण:
    • ‘गौ चिप’ – गायों के लिए।
    • ‘महिष चिप’ – भैंसों के लिए।

राज-शीतल (Raj-Sheetal)

विशेषताविवरण (Details)
यह क्या है?भारत का पहला घोड़े का बछड़ा (Horse Foal), जो क्रायोप्रिज़र्व्ड भ्रूण स्थानांतरण से जन्मा (2019)।
प्रयुक्त तकनीकभ्रूण विट्रीफिकेशन + क्रायोप्रिजर्वेशन + भ्रूण स्थानांतरण।
आनुवंशिक उत्पत्तिमारवाड़ी × ज़ांस्करी घोड़ों से निषेचित भ्रूण।
विकसित किया गयाICAR – राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (NRCE), बीकानेर, राजस्थान द्वारा।
सरोगेट का उपयोगभ्रूण को एक सिंक्रोनाइज़ सरोगेट घोड़ी (Synchronized Surrogate Mare) में प्रत्यारोपित किया गया।
यह क्लोन नहीं हैइसमें कोई न्यूक्लियर ट्रांसफर नहीं हुआ; भ्रूण प्राकृतिक निषेचन द्वारा बनाया गया।

सरोगेसी / स्थानापन्न मातृत्व (Surrogacy)

  • सरोगेसी: यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई महिला किसी अन्य व्यक्ति या दंपति के लिए बच्चे को जन्म देने (गर्भधारण करने) के लिए सहमत होती है।
  • सरोगेसी भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo implantation) पर आधारित एक तकनीक है।
  • इस प्रक्रिया में, नर शुक्राणु (Sperm) को मादा अंडाणु / डिंब (Ovum/Egg) के साथ निषेचित किया जाता है।
  • निषेचन के दौरान, माता-पिता दोनों के आनुवंशिक पदार्थ का संलयन होता है।
  • संलयित (निषेचित) कोशिका को प्रयोगशाला में तब तक रखा जाता है जब तक कि वह भ्रूण के रूप में विकसित न हो जाए।
  • इसके पश्चात, भ्रूण को सरोगेट (स्थानापन्न) माता के गर्भाशय (Uterus) में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
  • सरोगेसी के प्रकार: दो
    • परोपकारी सरोगेसी (Altruistic Surrogacy): इसमें सरोगेट माता को केवल चिकित्सा और गर्भावस्था से जुड़े आवश्यक खर्चों के लिए ही मुआवजा दिया जाता है।
    • व्यावसायिक सरोगेसी (Commercial Surrogacy): इसमें सरोगेट माता को चिकित्सा आवश्यकताओं के अतिरिक्त वित्तीय भुगतान (मुनाफा) किया जाता है (भारत में अब यह प्रतिबंधित है)।
विधिक ढाँचा (Legal Framework)
  • सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021
    • यह अधिनियम केवल परोपकारी (Altruistic) सरोगेसी की अनुमति देता है।
    • महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए यह व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध लगाता है। 
    • पात्रता:
      • दंपति: केवल भारतीय विवाहित जोड़े (पुरुष की आयु 21-55 वर्ष, महिला की आयु 23-50 वर्ष) जो प्रमाणित वंध्यता/बांझपन से पीड़ित हों।
      • अन्य: विधवा / तलाकशुदा महिलाएं (35-45 वर्ष की आयु) भी इसके लिए पात्र हैं।
      • वर्जित (Excluded): विदेशी नागरिक, अनिवासी भारतीय (NRI), एकल माता-पिता (Single parents), लिव-इन (Live-in) जोड़े और LGBTQ+ जोड़े इस प्रक्रिया का लाभ नहीं ले सकते हैं।
    • सरोगेट माता के लिए शर्तें:
      • वह एक विवाहित महिला (25-35 वर्ष की आयु) होनी चाहिए, जिसका कम से कम अपना एक बच्चा हो।
      • वह अपने जीवनकाल में केवल एक ही बार सरोगेट माता बन सकती है।
      • दंड: नियमों के उल्लंघन पर 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
    • सहायक जनन प्रौद्योगिकी (ART) अधिनियम, 2021
      • यह अधिनियम आईवीएफ (IVF) क्लीनिकों, युग्मक दान (Gamete donation) और सभी ART प्रक्रियाओं को विनियमित करता है।
      • यह अधिनियम ‘सरोगेसी अधिनियम’ के साथ मिलकर कार्य करता है ताकि प्रजनन चिकित्सा के क्षेत्र में पारदर्शिता और नैतिकता सुनिश्चित की जा सके।

माइटोकॉन्ड्रियल डोनेशन ट्रीटमेंट (MDT)/थ्री-पेरेंट बेबी

पहलू 

विवरण (Details)

MDT क्या है?

  • MDT एक ऐसी तकनीक है जो तीन व्यक्तियों (जैविक माता-पिता + माइटोकॉन्ड्रियल दाता) के डीएनए का उपयोग करके गर्भाधान (Conception) संभव बनाती है।

उद्देश्य

  • माँ से बच्चे में माइटोकॉन्ड्रियल रोगों के संचरण को रोकना, बीमार माइटोकॉन्ड्रिया को स्वस्थ दाता माइटोकॉन्ड्रिया से बदलकर।

प्रक्रिया

IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) के माध्यम से:

  • जैविक माता-पिता से न्यूक्लियर डीएनए
  • स्वस्थ दाता से माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए।

मुख्य विधियाँ

  1. प्रोन्यूक्लियर ट्रांसफर (Pronuclear Transfer) (PNT): निषेचित अंडाणु से प्रोन्यूक्लियस को स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रिया वाले दाता अंडाणु में स्थानांतरित करना।
  2. स्पिंडल ट्रांसफर (Spindle Transfer) (MST): निषेचन से पहले माँ के अंडाणु से स्पिंडल उपकरण (Chromosomes) को दाता अंडाणु में स्थानांतरित करना।

महत्व

  • 2016: मेक्सिको में जन्मा जॉर्डनियन बच्चाविश्व का पहला “थ्री-पेरेंट बेबी”।
  • 2023: ब्रिटेन में इस विधि से पहला सफल जन्म
  • माइटोकॉन्ड्रियल रोगों से प्रभावित परिवारों के लिए समाधान प्रदान करता है (जैसे, लेइघ सिंड्रोम, MELAS)।

नैतिक चिंताएँ

  • आनुवंशिक संशोधन के निहितार्थों के कारण विवादास्पद।

भारत

  • भारत ने अभी तक MRT को नैदानिक उपयोग के लिए मंजूरी नहीं दी है, लेकिन प्रजनन जैव-प्रौद्योगिकी और माइटोकॉन्ड्रियल जीनोमिक्स में अनुसंधान रुचि बढ़ रही है।

रोगग्रस्त माइटोकॉन्ड्रिया को प्रतिस्थापित करता है → माइटोकॉन्ड्रियल रोगों को रोकता है → माता-पिता का न्यूक्लियर डीएनए + दाता का माइटोकॉन्ड्रिया उपयोग करता है।

माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (Mt DNA)

  • Mt DNA केवल माँ से आता है।
  • माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए, न्यूक्लियर डीएनए की तुलना में उत्परिवर्तन के लिए अधिक संवेदनशील होता है।
  • कारण: माइटोकॉन्ड्रिया ऊर्जा उत्पादन के दौरान उत्पन्न मुक्त कणों के संपर्क में रहते हैं, जो डीएनए को क्षति पहुँचा सकते हैं।
डिजाइनर बेबी (Designer Baby)
  • डिजाइनर बेबी वह मानव भ्रूण है जिसे आनुवंशिक रूप से संशोधित किया गया है, सामान्यतः CRISPR-Cas9 जैसी तकनीकों का उपयोग करके।
  • उद्देश्य: रूप-रंग, बुद्धिमत्ता या रोग-प्रवृत्ति जैसे लक्षणों को प्रभावित करना।
  • उदाहरण: एक चीनी वैज्ञानिक ने CCR5 जीन को भ्रूणीय कोशिकाओं में संशोधित किया ताकि वे HIV वायरस के प्रति प्रतिरोधी बन सकें।
  • CCR5 जीन हमारी प्रतिरक्षा कोशिकाओं में रिसेप्टर्स को कोड करता है, जिनका उपयोग HIV कोशिका में प्रवेश करने के लिए करता है।
  • हाल ही में, विवादित एपस्टीन फाइलों में डिजाइनर बच्चों का जिक्र मिला है।
  • ये ऐसी कोशिकाएँ हैं जिनमें शरीर की किसी भी विशिष्ट कोशिका प्रकार में विकसित होने की अद्वितीय क्षमता होती है।
  • ये शरीर की आंतरिक मरम्मत प्रणाली के रूप में कार्य करती हैं और जीवन भर अन्य कोशिकाओं को पुनः उत्पन्न करने के लिए निरंतर विभाजित होती रहती हैं।
  • स्टेम कोशिकाएँ विभिन्न स्रोतों जैसे मनुष्यों, पौधों और कुछ अकशेरुकी जीवों से प्राप्त की जा सकती हैं, ये केवल स्तनधारियों तक ही सीमित नहीं हैं।
  • भारत का पहला भ्रूण बैंकचेन्नई

स्टेम सेल्स के प्रकार

प्रकारविवरणउदाहरण
टोटीपोटेंट (Totipotent)सभी प्रकार की कोशिकाओं + भ्रूण-बाह्य ऊतकों (जैसे प्लेसेंटा, अम्बिलिकल कॉर्ड) में विकसित हो सकती हैं।केवल निषेचित अंडाणु (जायगोट) में पाई जाती हैं।
प्लूरीपोटेंट (Pluripotent)अधिकांश कोशिका प्रकारों में विकसित हो सकती हैं, लेकिन भ्रूण-बाह्य ऊतकों में नहींभ्रूण, प्रेरित प्लूरीपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ (iPSCs)
मल्टीपोटेंट (Multipotent)कुछ सीमित कोशिका प्रकारों में विकसित हो सकती हैं।गर्भनाल (Umbilical cord) (Hematopoietic Stem Cells) → रक्त कोशिकाएं; Mesenchymal Stem Cells → हड्डी, उपास्थि, वसा कोशिकाएँ।
ओलिगोपोटेंट (Oligopotent)कुछ ही कोशिका प्रकारों में विकसित हो सकते हैं।अस्थि मज्जा (मेरुरज्जु) की कोशिकाएं 
यूनिपोटेंट (Unipotent)केवल अपनी ही कोशिकाओं को नवीनीकरण कर सकते हैं और एक विशिष्ट कोशिका प्रकार में विभाजित हो सकते हैं।त्वचा स्टेम कोशिकाएं → नई त्वचा कोशिकाएं।
जैव प्रौद्योगिकी की नवीन प्रवृत्तियाँ एवं अनुप्रयोग

प्रेरित बहुशक्त स्टेम कोशिकाएं (Induced Pluripotent Stem Cells – iPSCs)

  • परिभाषा: वयस्क कायिक कोशिकाओं को पुनः प्रोग्राम करके उत्पन्न की गई प्लुरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएं।
  • पुनः प्रोग्रामिंग प्रक्रिया: इसमें चार ‘यामानाका कारकों’ (Yamanaka factors) को प्रविष्ट कराया जाता है → c-Myc, Klf4, Oct4 और Sox2
    • 2012 में इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • अनुप्रयोग (Applications):
    • पुनर्योजी चिकित्सा– ऊतक अभियांत्रिकी और अंग प्रत्यारोपण।
    • औषधि विकास (Drug Development)।
    • रोगों का कोशिकीय स्तर पर अध्ययन।
  • मुख्य लाभ (Key Advantage)
    • रोगी की अपनी कोशिकाओं से प्राप्त की जाती हैं → भ्रूणीय कोशिकाओं के उपयोग से बचाव → प्रतिरक्षा अस्वीकृति (immune rejection) का खतरा नहीं होता।
  • भारतीय नियामक ढाँचा: राष्ट्रीय स्टेम सेल अनुसंधान दिशानिर्देश (NGSCR) 2017
    • भारत में वर्तमान में केवल रक्त विकारों (जैसे- रक्त कैंसर, थैलेसीमिया) के उपचार के लिए अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण या हेमेटोपोएटिक स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण की ही अनुमति है।
    • प्रतिबंधित प्रथाएँ
      • जर्मलाइन जीन थेरेपी: यह प्रक्रिया अंडाणुओं या शुक्राणुओं के डीएनए (DNA) को रूपांतरित कर देती है, जिससे वंशानुगत परिवर्तन होते हैं। नैतिक और सुरक्षा चिंताओं के कारण भारत में यह पूर्णतः प्रतिबंधित है।
      • चिकित्सीय क्लोनिंग (Therapeutic Cloning): स्टेम कोशिकाएं निकालने के उद्देश्य से भ्रूण का निर्माण करना निषिद्ध है। अनुसंधान के लिए केवल 14 दिनों तक ‘अतिरिक्त आईवीएफ भ्रूण’ (Surplus IVF embryos) के उपयोग की ही अनुमति है।
      • सभी आनुवंशिक रोगों के लिए जीन थेरेपी: सामान्य उपचार के रूप में इसकी अनुमति नहीं है। यह केवल ICMR, DBT और नैतिकता समिति द्वारा स्वीकृत नैदानिक परीक्षणों के अंतर्गत ही अनुमत है।

स्टेम कोशिका चिकित्सा (Stem Cell Therapy)

  • प्रयोगशाला में स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करके स्वस्थ वयस्क कोशिकाएं विकसित की जाती हैं ताकि शरीर की क्षतिग्रस्त, दोषपूर्ण या नष्ट हुई कोशिकाओं को प्रतिस्थापित किया जा सके।
  • अनुप्रयोग
    • तंत्रिका संबंधी विकार (Neurological Disorders): अल्जाइमर, पार्किंसन रोग (विशेष रूप से महत्वपूर्ण क्योंकि न्यूरॉन्स स्वयं विभाजित नहीं होते हैं)।
    • अंग क्षति (Organ Damage): दुर्घटनाओं, वृद्धावस्था, या अन्य कारणों से अंगों को हुई क्षति का उपचार।
    • रक्त विकार (Blood Disorders): सिकल सेल एनीमिया, बीटा थैलेसीमिया।
  • उपचार की विधियाँ:
    • स्वस्थ दाता से स्टेम सेल का प्रत्यारोपण।
    • प्रेरित प्लूरिपोटेंट स्टेम (iPS) कोशिकाएँ बनाना और फिर उनसे स्वस्थ वयस्क कोशिकाओं को विकसित करना।
    • व्यक्ति के अपने शरीर से जीन-संपादित स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करना।
टाइप-1 डायबिटीज (T1D) में स्टेम सेल थेरेपी
  • चीन में, एक महिला रोगी ने स्टेम सेल थेरेपी के माध्यम से इंसुलिन का उत्पादन फिर से शुरू कर दिया है।
  • प्रयुक्त तकनीक: प्लुरिपोटेंट स्टेम कोशिकाओं को विशेष रूप से इंसुलिन-उत्पादक कोशिकाओं में पुन: प्रोग्राम किया गया, जो स्वस्थ अग्न्याशय में पाई जाने वाली कोशिकाओं के समान हैं।
  • प्रक्रिया: पूर्व-प्रोग्राम की गई कोशिकाओं को रोगी में प्रत्यारोपित किया गया → प्रत्यारोपित कोशिकाओं ने इंसुलिन का उत्पादन शुरू कर दिया, जिससे रोगी के रक्त शर्करा (ग्लूकोज) का स्तर सफलतापूर्वक नियंत्रित हुआ।
  • महत्व: यह विकास टाइप-1 मधुमेह के उपचार में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। यह रोग को उलटने और रोगी की इंसुलिन इंजेक्शन पर निर्भरता को समाप्त करने की अपार क्षमता रखता है।
CAR (काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर) – टी कोशिका चिकित्सा
  • यह एक कोशिका-आधारित जीन थेरेपी है। इसमें कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने के लिए रोगी की प्रतिरक्षा कोशिकाओं, जिन्हें T-cells कहा जाता है, को आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है।
  • प्रक्रिया: रोगी के रक्त से T-cells निकाले जाते हैं → इनमें CAR जीन प्रविष्ट किया जाता है → संशोधित CAR T-cells को पुनः रोगी के रक्त में प्रविष्ट किया जाता है।
  • इस थेरेपी को ‘लिविंग ड्रग’ (जीवित औषधि) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें जीवित कोशिकाओं का उपयोग शामिल होता है।
Biotechnology Trends and Applications | जैव प्रौद्योगिकी की नवीन प्रवृत्तियाँ एवं अनुप्रयोग
भारत की पहली स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी: NexCAR19
  • NexCAR19 को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) द्वारा बाजार में उपयोग के लिए मंजूरी मिल गई है, जिससे भारत के पास अब अपना स्वदेशी CAR-T और जीन थेरेपी प्लेटफॉर्म है।
  • यह थेरेपी विशेष रूप से उन कैंसर कोशिकाओं को लक्षित करती है जिन पर CD19 प्रोटीन मौजूद होता है।
  • ImmunoACT, (आईआईटी बॉम्बे में स्थापित एक कंपनी) द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित थेरेपी।
ऑर्गन-ऑन-चिप तकनीक (Organ on Chip Technology)
  • यह एक सूक्ष्म-अभियांत्रिक उपकरण (सूक्ष्म-इंजीनियर्ड उपकरण) है जो मानव अंगों की संरचना और कार्य को अनुकरण करता है।
  • उपयोग: दवा परीक्षण, रोग मॉडलिंग और जैव चिकित्सा अनुसंधान।
  • कोशिका, डीएनए में मौजूद निर्देशों का उपयोग करके मैसेंजर आरएनए (mRNA) का संश्लेषण करती है। (इस प्रक्रिया को अनुलेखन – Transcription कहते हैं)।
  • इसके बाद, कोशिका mRNA से निर्देशों को पढ़कर कार्यात्मक प्रोटीन का निर्माण करती है।
  • समस्या: अनुलेखन प्रक्रिया के दौरान, कोशिका mRNA के अनुक्रम में त्रुटियाँ कर सकती है, जिसके परिणामस्वरूप दोषपूर्ण प्रोटीन बन सकते हैं। इन दोषपूर्ण प्रोटीनों के कारण मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसे कई गंभीर विकार उत्पन्न होते हैं।
  • समाधान: आरएनए संपादन → वैज्ञानिकों को यह सुविधा प्रदान करता है कि वे कोशिका द्वारा mRNA के संश्लेषण के बाद, लेकिन प्रोटीन निर्माण से पहले ही, mRNA में हुई इन त्रुटियों को ठीक कर सकें।

जीन साइलेंसिंग (Gene Silencing)

  • जीन साइलेंसिंग एक जैविक प्रक्रिया है जिसमें किसी जीन की अभिव्यक्ति (Expression) को रोका (Suppressed) या कम किया जाता है, जिससे उस जीन से बनने वाले प्रोटीन का उत्पादन रुक जाता है।
  • क्रियाविधि:
    • यह एक ‘जीन नॉकडाउन’ (Gene Knockdown) क्रियाविधि है, न कि ‘जीन नॉकआउट’ (जो जीन को स्थायी रूप से हटाता है)।
    • यह अंतर्निहित डीएनए अनुक्रम (DNA sequence) में कोई बदलाव किए बिना, जीन की अभिव्यक्ति को काफी हद तक (अक्सर 70% या उससे अधिक तक) कम कर देती है।
    • यह एक प्राकृतिक नियामक तंत्र (Regulatory mechanism) है जिसे अनुसंधान और चिकित्सा के लिए कृत्रिम रूप से भी प्रेरित किया जा सकता है।
  • प्रकार और तकनीकें:
    • डीएनए मेथिलिकरण (DNA Methylation)
    • हिस्टोन रूपांतरण (Histone Modification)
    • एंटीसेंस ओलिगो न्यूक्लियोटाइड (ASOs)
    • आरएनए-मध्यस्थ क्रियाविधि, जैसे आरएनए अंतक्षेप (RNAi)
  • अनुप्रयोग
    • चिकित्सा:
      • आनुवंशिक विकार: दुर्लभ रोगों या आनुवंशिक विकारों (जैसे- हंटिंगटन रोग, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी) का उपचार।
      • कैंसर चिकित्सा: ओंकोजीन (कैंसरकारी जीन) को शमित करके।
    • प्रतिविषाणु चिकित्सा: एचआईवी (HIV), हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों का उपचार।
    • FDA-स्वीकृत दवाएं:
      • पैटिसिरैन (Patisiran): वंशानुगत ट्रांसथायरेटिन एमाइलॉयडोसिस के लिए (एक RNAi दवा)।
      • गिवोसिरैन (Givosiran): एक्यूट हेपेटिक पोर्फिरिया के लिए।
  • कृषि:
    • फसल विकास: पीड़क-प्रतिरोधी (Pest-resistant) और तनाव-सहिष्णु फसलों का विकास।
    • पोषण संवर्धन: हानिकारक या अवांछित तत्वों की मात्रा कम करना (जैसे- गेहूँ में ग्लूटेन, तंबाकू में निकोटीन, कॉफी में कैफीन)।
    • भंडारण आयु में वृद्धि (Shelf-life Extension):
      • उदाहरण: ‘फ्लेवर सेवर टमाटर’ (पहली जीएम खाद्य फसल) में फलों को मुलायम बनाने के लिए जिम्मेदार जीन को शमित करने हेतु एंटीसेंस तकनीक (Antisense technology) का उपयोग किया गया था।

आरएनए अंतक्षेप (RNA interference – RNAi) तकनीक

  • आरएनए अंतक्षेप (RNAi) एक ऐसी तकनीक है जिसका उपयोग जीन अभिव्यक्ति (Gene expression) को नियंत्रित करने और जीन शमन (Gene-silencing) के लिए किया जाता है।
  • यह तकनीक हानिकारक प्रोटीनों के निर्माण को बाधित (disrupt) करती है। यह राइबोसोम तक पहुँचने से पहले mRNA ट्रांसक्रिप्ट को रोककर उसे निष्क्रिय (incapacitate) कर देती है, जिससे संबंधित प्रोटीन का निर्माण नहीं हो पाता।
  • RNAi → डीएनए (DNA) अनुक्रम में बिना कोई परिवर्तन किए जीन साइलेंसिंग।
  • जैव ईंधन ऐसे हाइड्रोकार्बन ईंधन होते हैं जिनका उत्पादन कार्बनिक पदार्थ (वर्तमान या पूर्व जीवित सामग्री) से अल्प अवधि (कुछ दिनों से लेकर महीनों तक) में किया जाता है। 
  • ये ठोस, द्रव या गैसीय अवस्था में पाए जा सकते हैं।
  • CRISPR तकनीक का उपयोग सूक्ष्मजीवों (जैसे यीस्ट) को आनुवंशिक रूप से संशोधित करने के लिए किया जाता है। यह संशोधन किण्वन (Fermentation) की दक्षता को बढ़ाता है, जिससे एथेनॉल का उत्पादन तेजी से होता है।
  • प्रमुख फीडस्टॉक्स → गन्ना, मक्का, धान का पुआल, बगास, प्रयुक्त खाना पकाने का तेल, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट।

बायोफ्यूल के प्रकार (पीढ़ी के आधार पर)

पीढ़ीस्रोत सामग्रीउदाहरणमुख्य विशेषताएँ
प्रथमपीढ़ीखाद्य फसलें (गन्ना, मक्का, सोयाबीन)बायोएथेनॉल, बायोडीजलफूड बनाम फ्यूल संघर्ष; सीमित उत्पादन क्षमता
द्वितीयपीढ़ी गैर-खाद्य बायोमास, कृषि अपशिष्टसेलुलोसिक इथेनॉल, बायो-ऑयलफसल अवशेष, पराली, वानिकी अपशिष्ट का उपयोग
तृतीय पीढ़ीशैवाल (Algae), सूक्ष्मजीवशैवाल-आधारित बायोडीजल, बायोहाइड्रोजनउच्च उत्पादन, कम भूमि उपयोग
चतुर्थ पीढ़ीआनुवंशिक रूप से अभियांत्रिक जीव (GE Algae)सिंथेटिक बायोफ्यूल्सकार्बन-निगेटिव क्षमता
भारत में जैव ईंधन (बायोफ्यूल) की स्थिति और विकास
  • उत्पादन: भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बायोफ्यूल उत्पादक देश है।
  • प्रमुख पहल – 2G एथेनॉल रिफाइनरी:
    • स्थान: पानीपत, हरियाणा (IOCL द्वारा स्थापित)।
    • विशेषता: यह एशिया की पहली 2G (द्वितीय पीढ़ी) एथेनॉल रिफाइनरी है।
    • फीडस्टॉक (कच्चा माल): धान का पुआल (Rice Straw)।
  • एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम:
    • मूल लक्ष्य: पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य 2030 तक प्राप्त करना।
    • संशोधित लक्ष्य: कार्यक्रम में तीव्र प्रगति के कारण, इस लक्ष्य को 2025 तक अग्रिम (पहले) कर दिया गया।
    • वर्तमान स्थिति (मार्च 2025): 20% एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य मार्च 2025 तक प्राप्त कर लिया गया है।
भारत में जैव ईंधन के लिए नीतिगत समर्थन
  • राष्ट्रीय बायो-एनर्जी कार्यक्रम (2021–2026)
    • मंत्रालय: नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE)।
    • बजट: ₹858 करोड़।
    • उद्देश्य: भारत के बायो-एनर्जी पारिस्थितिकी तंत्र को एकीकृत और मजबूत करना – जिसमें बायोगैस, बायोमास आधारित बिजली, और उन्नत जैव ईंधन शामिल हैं।
    • उप-योजनाएं:
      • वेस्ट टू एनर्जी: शहरी, औद्योगिक और कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा।
      • बायोमास कार्यक्रम (फसल अवशेष, बगास से विद्युत उत्पादन)
      • बायोगैस कार्यक्रम (छोटे और बड़े पैमाने पर बायोगैस संयंत्र)।
  • SATAT योजना (सस्टेनेबल अल्टरनेटिव टुवर्ड्स अफोर्डेबल ट्रांसपोर्टेशन)
    • लॉन्च: अक्टूबर 2018, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG)।
    • उद्देश्य: अपशिष्ट बायोमास से संपीड़ित बायोगैस (CBG) का उत्पादन और उपयोग।
    • लक्ष्य: 5000 संयंत्रों से प्रति वर्ष 1.5 करोड़ टन CBG
    • फीडस्टॉक: कृषि अवशेष, गोबर, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट।
    • तेल पीएसयू (IOCL, BPCL, HPCL, GAIL, IGL) निश्चित मूल्य (₹46/किग्रा) पर CBG खरीदते हैं।
  • प्रधानमंत्री जैव-ईंधन पर्यावरण अनुकूल फसल अवशेष निवारण योजना (PM-JIVAN Yojana)
    • लॉन्च: 2019, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG)।
    • उद्देश्य: गैर-खाद्य बायोमास से 2G एथेनॉल को बढ़ावा देना → लिग्नोसेलुलोसिक फीडस्टॉक (जैसे धान का पुआल, बगास, वानिकी अवशेष)।
    • कार्यान्वयन एजेंसी: सेंटर फॉर हाई टेक्नोलॉजी (CHT), MoPNG के अधीन तकनीकी निकाय।
    • प्रावधान: 2G एथेनॉल संयंत्रों के लिए Viability Gap Funding (VGF)
    • उपलब्धि: पहला 2G एथेनॉल संयंत्र 2022 में पानीपत में इंडियन ऑयल द्वारा उद्घाटित किया गया।
    • विस्तार: 2028–29 तक बढ़ाया गया ताकि अधिक निवेश आकर्षित किया जा सके।
ड्रॉप-इन फ्यूल (Drop-in Fuel)
  • एक ऐसा ईंधन जो मौजूदा पेट्रोलियम अवसंरचना के साथ पूरी तरह से संगत है → इसके लिए वाहन प्रौद्योगिकी या ईंधन प्रणालियों में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती है।
  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) तब उत्पन्न होता है जब जीवाणु, विषाणु, कवक, और परजीवी समय के साथ विकसित (उत्परिवर्तित) हो जाते हैं और रोगाणुरोधी औषधियों (जैसे- प्रतिजैविक, प्रतिविषाणु, और मलेरिया-रोधी) के प्रति प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप दवाएं बेअसर हो जाती हैं और संक्रमण का इलाज मुश्किल हो जाता है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने AMR को मानवता के सामने मौजूद शीर्ष 10 वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में से एक घोषित किया है।
  • AMR के कारण:
    • प्रतिजैविकों का अनियंत्रित उपयोग: औषधियों का आवश्यकता से अधिक उपयोग और चिकित्सकों द्वारा अनावश्यक रूप से इन्हें पर्ची पर लिखना।
    • कृषि उपयोग: कृषि कार्यों और पशु आहार में प्रतिजैविकों (एंटीबायोटिक्स) को अत्यधिक मात्रा में मिलाना।
    • खराब स्वच्छता (Poor hygiene): साफ-सफाई का अभाव और संक्रमण नियंत्रण के अपर्याप्त उपाय आदि।

AMR को नियंत्रित करने के प्रयास

WHO के प्रयासभारत के प्रयास
रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर वैश्विक कार्ययोजना रोगाणुरोधी प्रतिरोध के रोकथाम हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAP-AMR), 2017
AWaRe टूल (Access, Watch, Reserve): प्रतिजैविकों (एंटीबायोटिक्स) के उपयोग की निगरानी और प्रबंधन करने के लिए।दिल्ली और चेन्नई घोषणा: AMR के खिलाफ सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देने वाली घोषणाएँ।
वैश्विक रोगाणुरोधी प्रतिरोध और उपयोग निगरानी प्रणाली (GLASS)प्रतिजैविकों पर ‘रेड लाइन अभियान’ (MoH&FW): एंटीबायोटिक्स के जिम्मेदार उपयोग के लिए जागरूकता। लोगों से यह आग्रह करना कि वे बिना डॉक्टर की पर्ची के Red vertical line वाली दवाओं का उपयोग न करें।
औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की अनुसूची H1
राष्ट्रीय ‘वन हेल्थ’ मिशन
प्रधानमंत्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (PM-STIAC), 2022 द्वारा प्रस्तावित।
– उद्देश्य: मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करना ताकि महामारी की तैयारी और मानव एवं पशु दोनों क्षेत्रों की प्राथमिक बीमारियों के खिलाफ एकीकृत रोग नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।

बायोफिल्म/जैव पटल (Biofilm)

  • यह सूक्ष्मजीवों (मुख्यतः जीवाणुओं) की एक पतली परत है जो विभिन्न सतहों (जैसे- चिकित्सा प्रत्यारोपण, रसोई के काउंटर, भोजन और खाद्य-प्रसंस्करण सतहों, कॉन्टैक्ट लेंस, तथा मानव और पशु ऊतकों) पर बनती है।
  • यह रोगाणुरोधी प्रतिरोध प्रदर्शित करती है, अर्थात् इस परत पर सामान्य रोगाणुरोधी औषधियों या एंटीबायोटिक्स का आसानी से असर नहीं होता है।
  • महत्व
    • यह दीर्घकालिक संक्रमणों और चिकित्सा, औद्योगिक तथा खाद्य क्षेत्रों में संदूषण का प्रमुख कारण है।
    • बायोफिल्म निर्माण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए नवीन रणनीतियों की आवश्यकता है।

नेफिथ्रोमाइसिन (Nafithromycin)

  • भारत का पहला स्वदेशी प्रतिजैविक (Antibiotic)

वन हेल्थ की अवधारणा

  • वन हेल्थ एक ऐसा समेकित दृष्टिकोण है जो इस बात को मान्यता देता है कि मनुष्य, पशु और साझा पर्यावरण का स्वास्थ्य आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए और एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
  • यह एक सहयोगात्मक (Collaborative), बहु-क्षेत्रीय (Multi-sectoral) और अंतःविषयक दृष्टिकोण है, जो मानता है: 
  • “मनुष्यों, पशुओं और पारिस्थितिक तंत्रों का स्वास्थ्य परस्पर जुड़ा हुआ है  और परस्पर निर्भर है।उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य लोगों, पशुओं और पर्यावरण के बीच उत्पन्न होने वाले स्वास्थ्य खतरों की रोकथाम, पहचान और प्रतिक्रिया करना है। यह विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित है: ज़ूनोटिक रोग, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, खाद्य सुरक्षा।
Biotechnology Trends and Applications

मुख्य घटक

क्षेत्रस्वास्थ्य संबंध
मानव स्वास्थ्यCOVID-19, क्षय रोग (TB), खाद्य जनित रोग
पशु स्वास्थ्यएवियन फ्लू, रेबीज़, ब्रुसेलोसिस, एंटीमाइक्रोबियल का दुरुपयोग
पर्यावरणीय स्वास्थ्यवनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, जल प्रदूषण
भारत में वन हेल्थ: हाल के विकास
  • नेशनल वन हेल्थ मिशन
    • 2022 में प्रधानमंत्री विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सलाहकार परिषद (PM-STIAC) द्वारा अनुमोदित अंतर-मंत्रालयी पहल
    • साझेदारी: ICMR, ICAR, MoEFCC, MoHFW और राज्य सरकारें।
    • कार्यान्वयन एजेंसी: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR)।
    • उद्देश्य: भारत में सभी वन हेल्थ गतिविधियों का समन्वय, समर्थन और एकीकरण करना तथा मंत्रालयों के बीच एकीकृत दृष्टिकोण के माध्यम से खामियों को दूर करना।
    • फोकस: महामारी तैयारी, ज़ूनोटिक रोग निगरानी और अंतःविषयक अनुसंधान।
    • शासन संरचना
      • कार्यकारी समिति: 
        • अध्यक्ष – स्वास्थ्य मंत्री। 
        • उपाध्यक्ष – भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA)।
      • वैज्ञानिक संचालन समिति
        • अध्यक्ष – प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA)।
    • सरकार ने राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन के अधीन “एनिमल पैंडेमिक प्रिपेयर्डनेस इनिशिएटिव (APPI)” और विश्व बैंक समर्थित AHSSOH (Animal Health System Support for One Health) परियोजना की शुरुआत की।
  • वन हेल्थ कॉन्क्लेव 2025, मेघालय में आयोजित → क्षेत्रीय और वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करने हेतु।
  • ICMR–ICAR सहयोग: पोल्ट्री और पशुधन में एएमआर निगरानी।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और पूर्वानुमान विश्लेषण (Predictive Analytics) का उपयोग → रोग प्रकोप पूर्वानुमान एवं ज़ूनोटिक मैपिंग।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
  • WHO, FAO, UNEP, और WOAH ने क्वाड्रिपार्टाइट वन हेल्थ सहयोग का गठन किया।
    • वन हेल्थ उच्च स्तरीय विशेषज्ञ पैनल (OHHLEP): वैश्विक नीति का मार्गदर्शन करता है → Quadripartite संगठनों के लिए वैज्ञानिक और रणनीतिक सलाहकार समूह।
    • वन हेल्थ संयुक्त कार्य योजना (2022-2026).
  • कोविड-19 महामारी ने विश्व स्तर पर वन हेल्थ सिद्धांतों के अपनाने की गति को तेज किया।
  • जेनेरिक दवाएँ (Generic Drugs):
    • रासायनिक रूप से मूल ब्रांडेड दवा के समान होती हैं।
    • इनकी लागत काफी कम होती है क्योंकि इन्हें अधिक परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती।
  • बायोसिमिलर्स (Biosimilars):
    • जीवित जीवों से बनाई जाती हैं।
    • इनमें मूल ब्रांडेड जैविक दवा के समान सामग्री नहीं होती, इस कारण इन्हें कुछ परीक्षणों की आवश्यकता होती है।
    • इनकी लागत जेनेरिक से अधिक लेकिन लेकिन ब्रांडेड जैविक दवाओं से कम होती है।

बायोसिमिलर्स बनाम जेनेरिक (Biosimilars vs Generic)

विशेषताबायोसिमिलरजेनेरिक
स्रोतआम तौर पर प्राकृतिक या जीवित स्रोतों से निर्मित।सामान्यतः रसायनों से बनाए जाते हैं
उत्पादन प्रक्रियाउत्पादन के लिए एक विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता होती हैकॉपी करने की सरल प्रक्रिया
समानतासंदर्भ जैविक दवा से काफी मिलती-जुलती है, लेकिन यह हूबहू नकल नहीं है।रासायनिक रूप से ब्रांड-नाम दवा के समान
लागतआमतौर पर मूल बायोलॉजिक्स की तुलना में कम महंगाब्रांडेड दवाओं की तुलना में 80-85% सस्ता

दवा क्षेत्र (फार्मा सेक्टर) की पहल

राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (National Biopharma Mission)

  • शुरुआत: 2017, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा।
  • वित्तपोषण: ₹1,500 करोड़ (2017–2022), विश्व बैंक द्वारा समर्थित।
  • उद्देश्य: नए बायोफार्मा उत्पादों (टीके, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़, बायोलॉजिक्स) के विकास और वाणिज्यीकरण को बढ़ावा देना।
  • दृष्टि (Vision): भारत को बायोफार्मास्यूटिकल नवाचार, विनिर्माण और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना।
  • इनोवेट इंडिया (i3) कार्यक्रम
    • नेशनल बायोफार्मा मिशन के अंतर्गत एक कार्यक्रम।
    • उद्देश्य: नवाचार और उद्योग-अकादमिक सहयोग को प्रोत्साहित करना।

प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP)

  • शुरुआत: मूल रूप से नवंबर 2008 में जन औषधि योजना के रूप में; 2016 में नाम बदलकर PMBJP किया गया।
  • कार्यान्वयन: फार्मा एंड मेडिकल ब्यूरो ऑफ इंडिया (PMBI) द्वारा, जो रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग के अंतर्गत है।
  • उद्देश्य: गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाइयाँ, शल्य चिकित्सा उपकरण और उपभोग्य सामग्रियाँ सस्ती दरों पर उपलब्ध कराना, विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को; साथ ही स्वास्थ्य पर जेब से होने वाला खर्च कम करना।
  • लागत: जेनेरिक दवाइयाँ ब्रांडेड दवाओं से 50–90% तक सस्ती होती हैं।
  • प्रोत्साहन संरचना
    • प्रति केंद्र अधिकतम ₹5 लाख तक।
    • आकांक्षी जिलों और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अतिरिक्त ₹2 लाख
    • मासिक प्रोत्साहन: खरीद का 15% (अधिकतम ₹15,000/माह)।
  • जनवरी 2025 तक भारत में 15,057 जनऔषधि केंद्र स्थापित हो चुके थे, जो मार्च 2025 के लक्ष्य से दो महीने पहले ही पूरा हो गया।
जन औषधि दिवस 2025
  • 7 मार्च को ‘जन औषधि दिवस’ मनाया जाता है ताकि योजना के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके और जेनेरिक दवाओं के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा सके।
  • 1–7 मार्च तक ‘जन औषधि सप्ताह’ मनाया जाता है।
  • थीम: “जन औषधि: दाम कम, दवाई उत्तम”
PMBJP के अंतर्गत प्रमुख पहल
  • सुविधा सेनेटरी नैपकिन:
    • लॉन्च: 27 अगस्त 2019।
    • उद्देश्य: भारतीय महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा → ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नैपकिन।
    • मूल्य: ₹1 प्रति पैड।
  • जन औषधि सुगम मोबाइल ऐप (2019)
    • विशेषताएँ: गूगल मैप्स से नज़दीकी केंद्र ढूँढना, जेनेरिक दवाओं की खोज, जेनेरिक बनाम ब्रांडेड दवाओं की कीमतों की तुलना, बचत की गणना।
    • उद्देश्य: पहुँच और पारदर्शिता को बढ़ाना।
Biotechnology Trends and Applications | जैव प्रौद्योगिकी की नवीन प्रवृत्तियाँ एवं अनुप्रयोग

बायोमेट्रिक्स/जीवमिति (Biometrics)

  • यह एक ऐसी तकनीक है जो व्यक्तियों की पहचान (Identify) करने के लिए उनकी अद्वितीय जैविक (Biological) और व्यावहारिक (Behavioral) विशेषताओं या लक्षणों का उपयोग करती है।
  • बायोमेट्रिक पहचानकर्ताओं के प्रकार
    • दैहिक/शारीरिक (Physiological)
      • ये भौतिक शरीर की संरचना से संबंधित होते हैं।
      • उदाहरण: उंगलियों के निशान (फिंगरप्रिंट), आइरिस स्कैन, चेहरे की पहचान, हाथ की ज्यामिति, डीएनए और रेटिना स्कैन।
    • व्यावहारिक (Behavioral)
      • ये मानव क्रियाओं या व्यवहार के स्वरूपों (पैटर्न्स) से संबंधित होते हैं।
      • उदाहरण: स्वर/आवाज़ पहचान, टाइपिंग की लय (कीस्ट्रोक की गतिशीलता), चाल (चलने का तरीका), और सिग्नेचर डायनामिक्स।
  • भारत में अनुप्रयोग
    • आधार प्रणाली: यह विश्व की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है, जो फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन का उपयोग करती है।
    • डिजिटल शासन: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), ई-केवाईसी (e-KYC), और मतदाता प्रमाणीकरण जैसी सेवाओं में उपयोग।
    • सुरक्षा और नियंत्रण: हवाई अड्डों पर चेहरे की पहचान तकनीक, सीमा नियंत्रण और पुलिस डेटाबेस में उपयोग।
    • बैंकिंग और फिनटेक: वित्तीय लेनदेन के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जैसे- आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (AEPS)।
    • स्वास्थ्य देखभाल: रोगी की सटीक पहचान और चिकित्सा रिकॉर्ड के प्रबंधन में सहायक।
  • UIDAI अपडेट (2025): धोखाधड़ी को कम करने के लिए, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण को ‘चेहरे की पहचान’ और ‘एआई-आधारित जीवंतता पहचान’ के साथ और अधिक मज़बूत किया गया है।
  • चुनाव आयोग की पहल (2025): मतदाता सत्यापन के लिए बायोमेट्रिक्स का उपयोग करने वाली प्रायोगिक परियोजनाएं शुरू की गई हैं।

डीएनए फिंगरप्रिंटिंग / डीएनए प्रोफाइलिंग

  • डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एक प्रयोगशाला तकनीक है जो व्यक्तियों के डीएनए का विश्लेषण करके उनकी पहचान (बायोमेट्रिक पहचान) करती है।
  • डीएनए-आधारित पहचान परीक्षण की शुरुआत सर एलेक जेफ़्रीज़ (Sir Alec Jeffreys) ने की थी।
  • डीएनए फिंगरप्रिंटिंग का कार्य सिद्धांत डीएनए अनुक्रमों में बहुरूपता (Polymorphism in DNA sequences) पर आधारित है।

सदर्न ब्लॉटिंग तकनीक (Southern Blotting Technique)

  • यह एक प्रयोगशाला तकनीक है जिसका उपयोग डीएनए का अध्ययन करने और किसी जटिल मिश्रण में विशिष्ट डीएनए अनुक्रमों की पहचान करने के लिए किया जाता है।
  • डीएनए फिंगरप्रिंटिंग में इसका उपयोग विभिन्न लोगों के डीएनए नमूनों द्वारा उत्पन्न रेखाओं (बैंड) की तुलना करने के लिए किया जाता है।
  • सदर्न ब्लॉटिंग के चरण:
चरण विवरण / प्रक्रिया
Digest/Extract DNA (डीएनए का पाचन/निष्कर्षण)जैविक नमूने से शुद्ध डीएनए प्राप्त किया जाता है और प्रतिबंधन एंजाइमों (Restriction Enzymes) से काटा जाता है, जिससे अलग-अलग आकार के डीएनए खंड प्राप्त होते हैं।
Separate DNA fragments (डीएनए खंडों का पृथक्करण)डीएनए खंडों को उनके आकार के आधार पर जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस विधि का उपयोग करके अलग किया जाता है। छोटे खंड बड़े खंडों की तुलना में जेल में तेजी से गति करते हैं।
Transfer DNA fragments (डीएनए खंडों का स्थानांतरण)अलग किए गए डीएनए खंडों को जेल से हटाकर एक ठोस झिल्ली (जैसे नाइट्रोसेल्यूलोज या नायलॉन) पर स्थानांतरित किया जाता है।
Expose to DNA probe (डीएनए प्रोब के संपर्क में लाना)झिल्ली को एक डीएनए प्रोब के संपर्क में लाया जाता है, जिस पर रेडियोधर्मी, प्रतिदीप्त (fluorescent) या रासायनिक टैग लगा होता है।
Visualize DNA fragments (डीएनए खंडों का अवलोकन)वे डीएनए खंड जिनमें प्रोब अनुक्रम के पूरक अनुक्रम मौजूद होते हैं (यानी जो प्रोब के साथ जुड़ जाते हैं/संकरण करते हैं), उन्हें दृश्यमान बनाया जाता है। इसके लिए आमतौर पर एक्स-रे फिल्म या ऑटोरेडियोग्राफी का उपयोग किया जाता है।
Biotechnology Trends and Applications | जैव प्रौद्योगिकी की नवीन प्रवृत्तियाँ एवं अनुप्रयोग

जैव-हस्ताक्षर/जैव-संकेतक

  • जैव-हस्ताक्षर कोई भी ऐसी मापन योग्य परिघटना, रासायनिक यौगिक, या भौतिक संरचना है जो अतीत या वर्तमान के जीवन का वैज्ञानिक साक्ष्य प्रदान करती है।
  • मुख्य रूप से इसका उपयोग खगोल जीव विज्ञान और जीवन की उत्पत्ति से जुड़े अध्ययनों में किया जाता है।
  • मुख्य सिद्धांत: किसी साक्ष्य को जैव-हस्ताक्षर के रूप में पुष्ट करने से पहले सभी संभावित अजैविक (Abiotic – निर्जीव) कारणों को खारिज करना आवश्यक है।
  • अनुप्रयोग
    • खगोल जीव विज्ञान: मंगल, यूरोपा (Europa), एन्सेलेडस (Enceladus) और बाह्य ग्रहों पर जीवन की खोज। (उदाहरण: NASA का ‘बायो-इंडिकेटर लाइडर इंस्ट्रूमेंट’ – BILI)।
    • पृथ्वी विज्ञान: प्रारंभिक जीवन रूपों और उद्विकास का अध्ययन करना।
    • अंतरिक्ष मिशन:
      • NASA के मंगल रोवर– जैसे ‘पर्सीवरेंस’ (Perseverance) – द्वारा जैव-हस्ताक्षरों का पता लगाने के लिए चट्टानों का विश्लेषण किया जा रहा है।
      • जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST): इसने ट्रैपिस्ट-1 (TRAPPIST-1) प्रणाली के एक बाह्यग्रह (Exoplanet) पर संभावित जैव-हस्ताक्षर गैसों (मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड के असंतुलन) का पता लगाया है।

डीएनए भंडारण (DNA Storage)

  • डीएनए भंडारण डेटा भंडारण की एक प्रक्रिया है जिसमें डिजिटल जानकारी (जैसे 0 और 1) को डीएनए के संश्लेषित अनुक्रमों में कूटबद्ध (Encode) करने के लिए क्षार युग्मों (चार न्यूक्लियोटाइड: A, T, G, C) का उपयोग किया जाता है। 
  • इस तकनीक में, प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड बाइनरी डेटा (0 और 1) का प्रतिनिधित्व करता है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • सघनता/घनत्व (Density): सैद्धांतिक रूप से 1 ग्राम डीएनए में लगभग 215 पेटाबाइट डेटा संग्रहीत किया जा सकता है।
    • स्थायित्व (Durability): यदि इसे उचित रूप से संरक्षित किया जाए, तो डीएनए शताब्दियों तक सुरक्षित रह सकता है।
    • ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency): पारंपरिक चुंबकीय या इलेक्ट्रॉनिक भंडारण प्रणालियों की तुलना में इसके रखरखाव के लिए न्यूनतम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
    • चुनौतियाँ
      • डेटा को पढ़ने और लिखने की गति धीमी होती है।
      • डीएनए संश्लेषण और अनुक्रमण (Sequencing) की लागत अत्यधिक उच्च होती है।

डीएनए बारकोडिंग (DNA Barcoding)

  • डीएनए बारकोडिंग: यह प्रजातियों (Species) की पहचान करने के लिए एक छोटे और मानकीकृत डीएनए अनुक्रम का उपयोग करने की एक तकनीक है।
  • यह एक “आनुवंशिक बारकोड” (Genetic barcode) की तरह काम करता है → जो प्रत्येक प्रजाति के लिए अद्वितीय होता है, जिससे जीवों की तीव्र और सटीक पहचान संभव हो पाती है।
  • उदाहरण: वैश्विक डीएनए बारकोड पुस्तकालयों का निर्माण करना (जैसे- BOLD – बारकोड ऑफ लाइफ डेटा सिस्टम)।
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प्रमुख एंजाइम – स्रोत, कार्य और महत्व

एंजाइम स्रोत/स्थान कार्य/भूमिका महत्व 
EcoRI (प्रतिबंध एंडोन्यूक्लिएज़ II)एस्चेरिचिया कोलाई बैक्टीरियमडीएनए को विशिष्ट पैलिन्ड्रोमिक अनुक्रमों पर काटता है → आणविक क्लोनिंग ।“Sticky ends” उत्पन्न करता है → आनुवंशिक अभियांत्रिकी में प्रयुक्त
एक्रोसिन (Acrosin)शुक्राणु एक्रोसोम (Sperm Acrosome)प्रोटीएज़ (Protease) → ज़ोना पेल्यूसिडा को पचाता है → शुक्राणु को अंडाणु (Ovum) में प्रवेश करने में मदद करता है।निषेचन को सुगम बनाता है; केवल शुक्राणु द्वारा स्रावित
सक्सिनिक डिहाइड्रोजनेज (Succinic Dehydrogenase)माइटोकॉन्ड्रियाक्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) और इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला (ETC) का प्रमुख एंजाइममार्कर एंज़ाइम; ऊर्जा चयापचय (Energy Metabolism) में शामिल
एसिड फॉस्फेटेज (Acid Phosphatase)लाइसोसोमफॉस्फेट एस्टर्स का हाइड्रोलिसिस → मैक्रोमोलीक्यूल का अपघटनलाइसोसोमल मार्कर एंज़ाइम
कैटेलेज (Catalase)पेरॉक्सीसोम (Peroxisomes)H₂O₂ को जल और ऑक्सीजन में विघटित करता है →ऑक्सीडेटिव क्षति से कोशिकाओं की रक्षा करता है।ऑक्सीडेटिव तनाव (Oxidative Stress) से सुरक्षा
साइटोक्रोम सी ऑक्सीडेज (Cytochrome C Oxidase)माइटोकॉन्ड्रियाETC का अंतिम एंज़ाइम → ऑक्सीजन का अपचयन करता हैATP संश्लेषण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण
हयालुरोनिडेज (Hyaluronidase)शुक्राणु और कुछ कैंसर कोशिकाएँबाह्य कोशिकीय मैट्रिक्स में हयालुरोनिक अम्ल को विघटित करता है।शुक्राणु की गति में सहायक; कैंसर मेटास्टेसिस में मददगार
लाइसोसोमल एसिड लाइपेज  (Lysosomal Acid Lipase)लाइसोसोमकॉलेस्ट्रिल एस्टर और ट्राइग्लिसराइड्स का हाइड्रोलिसिस करता है।इसकी कमी से लिपिड भंडारण विकार होते हैं।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग की वर्षांत समीक्षा 2025

1. जैव-अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्थिति
  1. जैव-अर्थव्यवस्था की वृद्धि: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था (Bio-economy) 2014 के 10 बिलियन डॉलर से 16 गुना बढ़कर 2024 में 165.7 बिलियन डॉलर हो गई है। इसका लक्ष्य 2030 तक 300 बिलियन डॉलर के स्तर तक पहुँचना है।
  2. वैश्विक रैंक: जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत विश्व में 12वें और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तीसरे स्थान पर है।
  3. पारिस्थितिकी तंत्र: भारत विश्व स्तर पर तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की मेजबानी करता है और दुनिया का सबसे बड़ा टीका (वैक्सीन) निर्माता है।
2. प्रमुख नीतियां और संस्थागत ढांचे
  1. बायोई3 नीति (BioE3 Policy): 
    • यह नीति उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण के माध्यम से “अर्थव्यवस्था, रोजगार और पर्यावरण” पर केंद्रित है।
    • विषयगत क्षेत्र (Thematic Sectors): इसमें जैव-आधारित रसायन, स्मार्ट प्रोटीन, सटीक जैव-चिकित्सा, जलवायु-सहिष्णु कृषि, कार्बन प्रग्रहण (Carbon capture), और भविष्योन्मुखी समुद्री/अंतरिक्ष अनुसंधान शामिल हैं।
    • बायोई3 प्रकोष्‍ठ (BioE3 Cells): राज्य स्तर पर परस्पर जुड़े ज्ञान केंद्र (Knowledge hubs) स्थापित किए जा रहे हैं (जैसे- असम समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने वाला पहला राज्य था; सिक्किम में एक अधिसूचित प्रकोष्‍ठ मौजूद है)।
    • बायोई3 “D.E.S.I.G.N” चुनौती: जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से महत्वपूर्ण समस्याओं को हल करने के लिए युवाओं को सशक्त बनाने हेतु इसे शुरू किया गया है।
  2. राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क (National Biofoundry Network): स्वदेशी जैव-विनिर्माण को सुदृढ़ करने के लिए भारत के पहले ‘छह बायोफाउंड्री के नेटवर्क’ का शुभारंभ किया गया।
  3. बायोमेडिकल अनुसंधान करियर कार्यक्रम (BRCP) चरण-III (2025-2031): इसे ₹1,500 करोड़ के परिव्यय (Outlay) के साथ स्वीकृति दी गई है (जिसमें DBT का योगदान ₹1,000 करोड़ और वेलकम ट्रस्ट, यूके का योगदान ₹500 करोड़ है)।
  4. जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और नवाचार परिषद (BRIC): अनुसंधान में समन्वय और तालमेल स्थापित करने के लिए यह संस्था 13 स्वायत्त अनुसंधान संस्थानों को एक एकल शासी निकाय के अंतर्गत समाहित करती है।
3. स्वास्थ्य एवं चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी
  • जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट: 10,000 संपूर्ण जीनोम अनुक्रमों का ‘इंडियन जीनोमिक डेटा सेट’ में उपलब्ध होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
  • टीबी उन्मूलन (Dare2eraD TB): क्षय रोग (टीबी) में औषधि प्रतिरोध की मैपिंग के लिए एआई-सक्षम उपकरणों का उपयोग करते हुए माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (MTB) के 18,000 पृथक्कृत नमूनों (Isolates) का अनुक्रमण किया गया है।
  • गर्भ-इनी कार्यक्रम (GARBH-INi Program):
    • भारतीय महिलाओं में समय-पूर्व जन्म के जोखिम (Preterm birth risk – sPTB) का पूर्वानुमान लगाने हेतु 66 SNP (आनुवंशिक मार्कर) का एक पैनल विकसित।
    • सटीक गर्भावधि आयु (Gestational age) निर्धारण के लिए एआई-आधारित उपकरण बनाए गए।
    • 12,000 गर्भवती महिलाओं का नामांकन किया गया है, जिनसे 14 लाख जैव-नमूने (Biospecimens) और 1 लाख अल्ट्रासाउंड चित्र संग्रहीत किए गए हैं।
  • राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (NBM): ZyCoV-D, Corbevax, लिराग्लूटाइड (Liraglutide) जैसे जैव-समरूप (Biosimilars) और भारत के पहले स्वदेशी एमआरआई (MRI) स्कैनर सहित स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास किया गया।
  • CAR T-सेल थेरेपी: बी-सेल मैलिग्नेंसी (B-cell malignancies) के उपचार के लिए ‘वार्निमकाबटाजीन ऑटोल्यूसेल’ (Varnimcabtagene autoleucel – IMN-003A) का शुभारंभ।
  • स्वदेशी चिकित्सा उपकरण:
    • सेप्टिचेक (Septicheck): HPLC-आधारित मल्टीप्लेक्स दवा निगरानी किट।
    • ऑन्कोअलर्ट (OncoAlert): मुँह के कैंसर (Oral cancer) की जांच (स्क्रीनिंग) के लिए उपकरण।
    • हिप प्रो (Hip Pro): बुजुर्गों के लिए स्मार्टबेल्ट, जो गिरने पर स्वचालित रूप से कुशन (Cushion) फुला देती है।
4. कृषि एवं खाद्य जैव प्रौद्योगिकी
  • जीन-संपादित चावल: DEP1 (DENSE PANICLE-1) जीन में संपादन करके उच्च उपज वाली किस्में विकसित की गईं, जिससे उपज में 20% की वृद्धि हुई।
  • जलवायु सहिष्णुता:
    • सूखा-सहिष्णु किस्में: अद्विका और सात्विक (Advika & Saatvik) – “दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन” हेतु चुनी गई चने की किस्में (BRIC-NIPGR द्वारा विकसित)।
    • जलमग्नता-सहिष्णु किस्म: ADT 39-Sub1 – चावल की किस्म।
    • पूर्वोत्तर क्षेत्र (NER) हेतु सूखा-प्रतिरोधी: अरुण (Arun) – चावल की किस्म (असम कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित)।
    • आबू सौंफ-440 (Abu Saunf-440): सिरोही के श्री इशाक अली (DBT ‘बायोटेक-किसान हब’ के तहत) द्वारा विकसित यह किसान-नेतृत्व वाला नवाचार, एक जलवायु-विशिष्ट, सूखा-प्रतिरोधी, उच्च उपज वाली और रोग-प्रतिरोधी सौंफ (Fennel) की किस्म है। आबू सौंफ सामुदायिक जीन बैंक को जैव विविधता संरक्षण हेतु सिरोही में स्थापित किया गया है।
  • CRISPR-संपादित सरसों: हानिकारक ग्लूकोसाइनोलेट्स को कम करने और उच्च ग्लूकोराफेनिन (कैंसर-रोधी गुणों वाला) के साथ पारजीन-मुक्त (Transgene-free) सरसों (Brassica juncea) की किस्में विकसित की गईं। इसके लिए AOP2 (ALKENYL HYDROXALKYL PRODUCING 2) जीन परिवार का नॉकआउट (Knockout) किया गया।
  • किट्ट रोग प्रतिरोधी सरसों की किस्में: वरुणा, पूसा बोल्ड, पूसा जय किसान और रोहिणी
  • पैन-जीनोम-आधारित एसएनपी जीनोटाइपिंग परीक्षण:
    1. इंडियन राइस पैनएरे (IndRA): फसली पौधों के लिए विकसित पहला परीक्षण।
    2. इंडियन चिकपी पैनएरे (IndiCA): चने (Chickpea) के लिए एसएनपी जीनोटाइपिंग एरे।
  • जीनोमिक्स: अलसी (Linseed) के लिए संदर्भ जीनोम अनुक्रमण (T 397- टीलोमियर-टू-टीलोमियर जीनोम)।
  • नए दिशानिर्देश:जैव-सुरक्षा मूल्यांकन हेतु ‘स्टैक्ड इवेंट्स युक्त आनुवंशिक रूप से इंजीनियर पौधों पर दिशानिर्देश, 2025’ अधिसूचित किए गए।
5. अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी (एक्सिओम-4 मिशन)
  1. पेशी पुनर्जनन: अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर किए गए भारत के पहले मानव ‘पेशी स्टेम-कोशिका’ प्रयोग ने यह दर्शाया कि सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण में पेशियों का पुनर्जनन बाधित होता है और माइटोकॉन्ड्रियल (सूत्रकणिका) कार्यप्रणाली कम हो जाती है। यह स्थिति पृथ्वी पर उम्र बढ़ने के साथ होने वाले मांसपेशियों के क्षरण (सार्कोपेनिया) के समान है।
  2. जीवन समर्थन: यह सत्यापित किया गया है कि सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण में सूक्ष्म-शैवाल (Chlorella sorokiniana-1) और सायनोबैक्टीरिया वृद्धि कर सकते हैं और पोषण के लिए मानव अपशिष्ट (CO2/यूरिया) का उपयोग कर सकते हैं, जो मानव अपशिष्ट के पुनर्चक्रण और पोषक तत्वों में बदलने की क्षमता को प्रमाणित करता है।
6. ऊर्जा, पर्यावरण और जैव सूचना विज्ञान
  1. जैव ईंधन/1G एथेनॉल: अंतर्राष्ट्रीय आनुवंशिक इंजीनियरिंग और जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (ICGEB), नई दिल्ली द्वारा एक ऐसा अभिकल्पित (Engineered) ‘ग्लूकोमाइलेज स्रावित यीस्ट प्रभेद’ (Glucoamylase Secreting yeast strain) विकसित किया गया है जो अनाज के किण्वन के दौरान बाहरी एंजाइम की आवश्यकता को 50% तक कम कर देता है।
  2. भारतीय जैविक डेटा केंद्र (IBDC): जैविक डेटा के मॉड्यूलर प्रबंधन को सुविधाजनक बनाने के लिए FeED (डेटा प्रोटोकॉल के आदान-प्रदान के लिए ढांचा) जैसे पोर्टल शुरू किए गए हैं।
7. जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित योजनाएँ
  1. बायोनेस्ट (BioNEST – Bio-incubators Nurturing Enterprise for Scaling Technologies): यह BIRAC (जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद) का एक उष्मायन नेटवर्क (Incubation network) है, जिसका उद्देश्य प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए उद्यमों का पोषण करना है।
  2. ई-युवा (EYUVA – Encouraging Youth for Undertaking Innovative Research Through Vibrant Acceleration): यह भी BIRAC की एक पहल है। इसे पूरे भारत में युवा छात्रों के बीच अनुप्रयुक्त अनुसंधान और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

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