पल्लव वंश

पल्लव वंश प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत का एक महत्वपूर्ण दक्षिण भारतीय राजवंश था, जिसने मुख्यतः 4वीं से 9वीं शताब्दी के दौरान सत्ता स्थापित की। यह वंश अपने प्रशासन, कला, वास्तुकला और विशेषकर महाबलीपुरम के शिलाचित्रों और मंदिरों के कारण इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है।

कौन – 

  • पल्लवों का सम्बंध तोंडाइमंडलम से था, जो उत्तर पेनार और उत्तर वेल्लार नदियों के बीच का क्षेत्र था। 
  • दक्षिण भारत मे सात वाहन वंश के सामंत थे।
  • अपने आपको स्वतंत्र कर काँची के नागवंश को पराजित कर अपने वंश की नींव डाली।
  • सिंहविष्णु पल्लव वंश के वास्तविक संस्थापक माने जाते हैं जिन्होंने अवनसिंह की उपाधि धारण की थी।

पल्लवों की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में सहमति नहीं है। कुछ प्रारंभिक विद्वानों का मानना था कि ‘पल्लव’ शब्द ‘पाहलव’ का रूपांतर है, जो पार्थियनों को संदर्भित करता है, जिन्होंने पश्चिमी भारत से दक्षिणी भारत के तटीय क्षेत्र में, साकों और सातवाहनाओं के बीच हुए युद्धों के दौरान द्वितीय शती CE में प्रवास किया। लेकिन आज के अधिकांश विद्वान उन्हें दक्षिण भारत के मूल निवासी मानते हैं, या फिर “उत्तर भारतीय रक्त की कुछ मिलावट” के साथ।

पल्लव

जानकारी के स्रोत-

  1. संगम साहित्य में पल्लवों को “तोडीयार“ कहा गया है।
  2. बाहुर अभिलेख (काँची) में पल्लवों को”तोण्डई” कहा गया है।
  3. रुद्रदामन का जुनागढ़ अभिलेख – इसमें “ सुविशाख” नामक पल्लव को सौराष्ट्र का गवर्नर (प्रांतपाल) बताया गया है जिसने “सुदर्शन  झील” का पुन: निर्माण करवाया था।
  4. दण्डी के ग्रंथ – अवंति सुंदरी में- पल्लव शासक सिंह विष्णु का उल्लेख मिलता है।
  5. मतविलास प्रहसन – पल्लव शासक महेन्द्रवर्मन प्रथम द्वारा रचित है।
  6. जानकारी:- पल्लवकालीन सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।
  7. महावंश – पल्लवों के प्रारम्भिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।
  8. सी.यू.की.- ह्वेनसांग नरसिंह वर्मन प्रथम के समय काँची आया था।
  • ह्वेनसांग ने नरसिंहवर्मन को सबसे महान शासक बताया था।
  • समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार उसने दक्षिणापथ विजय के दौरान पल्लव शासक ”विष्णुगोप“ को पराजित किया था।
  • तमिलनाडु से प्राप्त प्राकृत भाषा के अभिलेखों में ‘पल्लव वंश’ के प्रथम शासक का नाम ‘सिंहवर्मन’ मिलता है।

सिंह विष्णु:- (575 ई. 600ई.)

  • पल्लव वंश के संस्थापक थे।
  • काँची को राजधानी बनाया  था।
  • उपाधि:- अवनी सिंह
  • विजय अभियान- 
    • वैल्लूर पालैयम तमिलनाडु से प्राप्त ताम्रपत्र के अनुसार सिंहविष्णु ने चोल शासक को पराजित कर “चौलमंडल” पर अधिकार कर लिया था।
      • सिंहविष्णु ने अपना साम्राज्य कावेरी नदी तक विस्तृत कर “अवनी सिंह” की उपाधि धारण की थी।
      • कशाकुड़ी (तमिल) से प्राप्त दानपत्र के अनुसार:- सिंह विष्णु ने मलय, मालव, चोल, सिंहल द्वीप व केरल पर विजय प्राप्त की थी।
    • सिंह विष्णु के दरबार में महान विद्वान ”भारवि” निवास करते थे जिन्होंने “किरातार्जुनीयम्”नामक ग्रन्थ लिखा था। ‘किरातार्जुनीयम्’ में भगवान शिव किरात् वेश में अर्जुन के साथ युद्ध का उल्लेख मिलता है।
    • सिंह विष्णु वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।
    • उन्होंने मामल्लपुरम् (वर्तमान महाबलीपुरम्) में एक वराह मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर में स्वयं की प्रतिमा भी स्थापित करवाई थी।

महेन्द्रवर्मन प्रथम  – (600-630 ई.)

  • सिंह विष्णु का पुत्र था।
  • उपाधियाँ – मतविलास, विचित्रचित्त, गुणभर
  • इसी के समय चालुक्य (बादामी) पल्लव संघर्ष प्रारंभ हुआ।
    • चालुक्य शासक-पुलकेशिन II ने आक्रमण किया।
  • महेन्द्रवर्मन प्रारंभिक समय में जैन अनुयायी था परन्तु शैव संत “अप्पर” के प्रभाव में आकर शैव अनुयायी बना था।
  • महेन्द्रवर्मन ने त्रिचनापल्ली, महेन्द्रवाड़ी, दलवणूर में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया था।
  • पल्लव वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था।
  •  इसका काल पल्लवों का स्वर्णिम युग था।
  • ग्रंथ – महेन्द्रवर्मन ने “मतविलास प्रहसन” नामक ग्रन्थ लिखा था। यह हास्य नाटिका है।
    • इसमें बौद्ध भिक्षुओं व कापालिकों (शैव) पर व्यंग्य किया गया है।
  • महेन्द्र ने दो तालाब महेन्द्रवाड़ी तथा चित्रमेघ का निर्माण करवाया।
  • यह संगीतज्ञ भी था संगीत गुरु का नाम – रुद्राचार्य था।

नरसिंह वर्मन प्रथम – (630-668 ई.)

  • महेन्द्रवर्मन का पुत्र था।
  • नरसिंहवर्मन ने साम्राज्य विस्तार हेतु अनेक युद्ध लड़े थे-
1. पल्लव – चालुक्य संघर्ष
  • उल्लेख:-
  • कुरम अभिलेख – इसके अनुसार नरसिंह वर्मन प्रथम ने पुलकेशिन II को क्रमश: पारियाल, शूरमार व मणिमंगलम के युद्ध में पराजित किया तथा पराजित करने के बाद उसकी पीठ पर “विजयाक्षर” अंकित करवा दिया था।
  • – 642 ई. में चालुक्यों की राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया था, पुलकेशिन द्वितीय को हराया।
  • – मल्लिकार्जुन मंदिर (बादामी) के पीछे लगे शिलालेख में भी नरसिंह वर्मन प्रथम की विजय का उल्लेख है।
  • उपाधि – वातापीकोंड (वातापी को तोड़ने वाला / वातापी का अपहर्ता)
2. सिंहल द्वीप (श्रीलंका) अभियान:
  • पुलकेशिन II के विरुद्ध श्रीलंका के राजकुमार मानवर्मा की सहायता की थी।
  • अत: नरसिंह वर्मन I ने मानवर्मा की सहायता हेतु अपनी एक विशाल नौ सेना भेजकर – मानवर्मा की सहायता की थी।
  • मानवर्मा अपने विरोधी “हत्थदत्थ” को मारकर श्रीलंका का शासक बना था।
  • कुरम अभिलेख के अनुसार नरसिंह वर्मन ने – चोल, चेर व पाण्ड्यों को पराजित किया था।
  • निर्माण कार्य:- नरसिंह वर्मन प्रथम ने “महाबलीपुरम्” में एकाश्मक रथ मंदिरों का निर्माण करवाया था।
  • नरसिंह वर्मन शैली प्रचलित थी।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने काँची के वैभव का वर्णन किया है, उसके अनुसार – काँची 6 मील में फैला हुआ था – 100 से अधिक 48 व 1000 बौद्ध भिक्षुक निवास करते थे। ह्नेनसांग ने 641 ई. में काँची की यात्रा की।
  • काँची विश्वविद्यालय शिक्षा का एक महान केन्द्र था।
  • कदम्बवंशीय मयुरशर्मन ने 18 अश्वमेध यज्ञ किए।

नोट – नरसिंह वर्मन प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महेन्द्र वर्मन II शासक बना (668-670) जिसे चालुक्य शासक – विक्रमादित्य ने मार डाला।

परमेश्वरवर्मन – (670-695 ई.)

  • महेन्द्रवर्मन द्वितीय का पुत्र था।
  • उपाधियाँ – लोकादित्य, एकमल्ल, रणजय, अत्यंतकाम, उग्रदण्ड, गुणभाजन, विद्याविनीत
  • प्रमुख घटना –
    • बादामी चालुक्य शासक विक्रमादित्य ने काँची पर आक्रमण कर राजधानी पर अधिकार कर लिया था।
    • कुछ समय बाद परमेश्वरवर्मन ने काँची पर पुन: अधिकार कर लिया था।
  • शैव अनुयायी था – माम्मलपुरम में एक गणेश मंदिर का निर्माण कराया था।

नरसिंह वर्मन II (700-728 ई.)

  • परमेश्वरवर्मन का पुत्र था।
  • उपाधि – राजसिंह, शंकरभक्त, आगमप्रिय (विद्या का प्रेमी)
  • प्रमुख घटनाएँ
    • चालुक्य – पल्लव संघर्ष विराम
  • राजधानी काँची में “कैलाशनाथ मंदिर” का निर्माण करवाया।
  • महाबलीपुरम् में “शौर” मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • इसने राजसिंह शैली प्रचलित की थी।
  • इसके दरबार में संस्कृत के महान विद्वान “दण्डिन (दण्डी)” निवास करते थे, जिनकी रचनाएँ – अवन्ति सुंदरी, दशकुमार चरित, काव्यादर्श
  • अपना दूत मंडल – चीन भेजा
  • नागपट्टनम (तमिल) में बौद्ध भिक्षुओं हेतु “बौद्ध विहार” का निर्माण करवाया था।

परमेश्वरवर्मन II (728-730 ई.)

  • नरसिंह वर्मन II का पुत्र था।
  • तिरूवाड़ी में एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • चालुक्य शासक – विक्रमादित्य II ने गंगवंश (ओडिशा) के राजकुमार “एरेयप्प” की सहायता से काँची पर आक्रमण कर इसे मार डाला ।

नंदिवर्मन II (730-800 ई.)

  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार – परमेश्वरवर्मन संतानहीन था।
  • अत: काँची के विद्वानों ने पल्लव वंश की एक समान्तर शाखा के राजकुमार “नंदिवर्मन II” जो कि “हिरण्यवर्मन” का पुत्र था, को काँची का शासक बनाया था।
  • अनेक राज्यों ने पल्लवों पर आक्रमण कर दिया जैसे:-
पांड्य आक्रमण 
  • कारण:- कुछ इतिहासकारों के अनुसार “परमेश्वरवर्मन II” का एक पुत्र “चित्रमाय” था जिसे परमेश्वरवर्मन II ने उत्तराधिकार से वंचित कर दिया, वह पाण्डेय शासकों से जा मिला।
  • पिता की मृत्यु के बाद पाण्ड्यों से मिलकर  काँची पर आक्रमण किया था।
  • नंदिवर्मन II के सेनापति “उदयचन्द्र” ने चित्रमाय को युद्ध में मार दिया था।
चालुक्य शासक –
  • विक्रमादित्य II व पुत्र कीर्तिवर्मन ने काँची पर आक्रमण कर अपार धन लूटा।
राष्ट्रकूट संघर्ष :-
  • राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग ने “नंदिवर्मन II को पराजित किया था।
  • दोनों में संधि हुई।
  • दंतिदुर्ग ने अपनी पुत्री “रेखा” का विवाह नंदिवर्मन के साथ कर दिया था।
  1. नंदिवर्मन II वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
  2. निर्माण कार्य:- नंदिवर्मन II ने काँची में “मुक्तेश्वर” शिव मंदिर व “बैकुण्ड पेरूमाल” मंदिरों का निर्माण करवाया था।

नोट – नंदिवर्मन II के बाद दंतिवर्मन 800-846 तक शासक रहा, जिसे अभिलेखों में “विष्णु का अवतार” कहा गया है।

नंदिवर्मन III 

  • दंतिवर्मन का पुत्र था। इसने गंगों को पराजित किया।
  • नौवीं शताब्दी के प्रारंभ में, राष्टकूट राजा गोविंद III ने पल्लव राजा दंतिवर्मन के शासनकाल में कांची पर आक्रमण किया। 
  • चोल, राष्ट्रकूट व गंगवंश के साथ मिलकर “पाण्डेयों” को थिरुपुरम्बियम की लड़ाई में पराजित किया तथा कावेरी के क्षेत्र पर पुन: अधिकार कर लिया था।
  • राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष ने अपनी पुत्री “शंखा” का विवाह नंदिवर्मन III के साथ कर दिया था।
  • इसके दरबार में तमिल के महान विद्वान “पेरून्देवनार” निवास करते थे जिन्होंने “भारत वैणवा” नामक ग्रन्थ की रचना की थी।

नोट – नंदिवर्मन III की मृत्यु के बाद उसका पुत्र “नृपतुंगवर्मन (869-880) शासक बना।

  • इस वंश का अंतिम शासक अपराजित (880-903 ई.) इसे चोल शासक “आदित्य प्रथम” ने मार डाला था।
  • इसके बाद, तोंडाइमंडलम पर नियंत्रण चोलों के हाथ में चला गया।
  • काँची के पल्लवों का पतन हो गया था।

नृपतुंग वर्मन (869–880 ई.)

अपराजित वर्मन (881–903 ई.)

  • पल्लव वंश का अन्तिम महत्त्वपूर्ण शासक।
  • उसके बाद पल्लव राज्य चोल राज्य में विलय हुआ।
error: Content is protected !!
Scroll to Top