मुगल साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने भारत के राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक विकास को गहराई से प्रभावित किया। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अध्ययन में मुगलों की शासन व्यवस्था, कला, स्थापत्य और धार्मिक नीतियाँ विशेष स्थान रखती हैं।
मुगल साम्राज्य
मुगल शासक वस्तुतः चगताई तुर्क थे। मंगोल शासक चंगेज खां के एक पुत्र के नाम पर तुर्किस्तान क्षेत्र को चगताई कहा जाता था। मुगल इसी क्षेत्र के तुर्क थे, अतः इन्हें चगताई तुर्क कहा जाता था।तुर्क-मंगोल विजेता तिमोर के वंशज मध्य एशियाई शासक बाबर ने मुगल साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने शक्तिशाली मुगल साम्राज्य की नींव रखी, जिसे अकबर ने मजबूत किया और यह लगभग दो शताब्दियों तक चला। औरंगजेब के शासनकाल में मुगल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया, जिसके बाद मराठों के साथ संघर्ष के कारण इसका पतन शुरू हो गया।
बाबर [1526 – 30]
- बाबर (ज़हीरुद्दीन मुहम्मद) अपने पिता की ओर से तुर्क-मंगोल विजेता तैमूर का वंशज था और अपनी माता की ओर से चंगेज खान का वंशज था।
- बाबर 12 वर्ष की उम्र में एक छोटे से फरगाना राज्य की गद्दी पर बैठा, लेकिन तुरंत ही उसने अपने पैतृक स्थान पर नियंत्रण खो दिया।
- 1504 में, बाबर ने 24 वर्ष की आयु में काबुल पर कब्ज़ा कर लिया और फिर खैबर दर्रे के माध्यम से भारत में प्रवेश किया।
बाबर का आरंभिक जीवन –
- बाबर ने समरकन्द को दो बार जीता और उस पर कुछ-कुछ समय काबिज रहने के बाद दोनों बार उसे खो दिया।
- पहली बार समरकंद विजय:
- 1497 ई. में बाबर ने समरकंद को जीता परन्तु शीघ्र ही उसने नगर त्याग दिया।
- जब बाबर फरगना के लिए लौटता इससे पहले ही कुछ बेगों ने उसके सौतेले भाई जहांगीर मिर्जा को फरगना की गद्दी पर बैठा दिया। इस प्रकार बाबर समरकन्द के साथ अपना राज्य (फरगना) भी खो बैठा।
- समरकंद पर दूसरी विजय:
- 1501 ई. में बाबर ने समरकन्द पर एक बार विजय प्राप्त की। क्योंकि समरकंद के तैमूरी सुल्तान की मां ने उजबेक के शैबानी खान से सौदा करके समरकन्द शैबानी खान को दे दिया एवं शैबानी खान से विवाह कर लिया था।
- सर-ए-पुल का युद्ध: यह युद्ध 1502 ई. में बाबर एवं उजबेक शासक शैबानी खान के मध्य हुआ। इस युद्ध में ही उज्बेकों ने तुलुगमा पद्धति का प्रयोग कर बाबर को बुरी तरह हराया था। बाद में इसी पद्धति का उपयोग बाबर ने पानीपत के युद्ध में किया एवं इब्राहिम लोदी को हराया था।
बाबर की काबुल विजय:
- काबुल विजय से बाबर को दो प्रमुख लाभ हुए पहला, बाबर को उज्बेकों से चैन मिला। दूसरा, काबुल में बैठकर बाबर अब हिन्दुस्तान एवं खुरासान दोनों पर नजर रख सकता था।
- बाबर ने काबुल एवं गजनी (1504 ई.) पर आक्रमण कर काबुल व गजनी का शासक बन गया।
बाबर का भारत अभियान

- बाबर का पहला भारत अभियान –
- सन् 1519 ई. में बाबर ने अपना आक्रमण बाजौर पर किया और बाजौर एवं भीरा को जीत लिया। भेरा के किले को जीता। यह भारत विजय के लिए किया गया पहला आक्रमण था।
- इसी युद्ध में बाबर ने सर्वप्रथम बारूद एवं तोपखाने का प्रयोग किया।
- दूसरा अभियान भी 1519 में हुआ जब इसने पेशावर को जीता।
- तृतीय अभियान 1520 में हुआ, इस बार इसने स्यालकोट एवं सैयदपुर को जीता।
- चौथा अभियान 1524 में हुआ जब इसने लाहौर और दीपालपुर को जीतकर पंजाब में प्रवेश किया।
| क्रमांक | बाबर युद्ध सूची | वर्ष |
| 1 | पानीपत की पहली लड़ाई | 1526 |
| 2 | खानवा की लड़ाई | 1527 |
| 3 | चंदेरी का युद्ध | 1528 |
| 4 | घाघरा का युद्ध | 1529 |
पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल, 1526)
- यह बाबर का भारत के विरुद्ध पांचवा अभियान था
- तैमूर के विजित प्रदेशों पर अधिकार जताने के लिए बाबर ने इब्राहिम लोदी से क्षेत्र मांगा, पर दौलत खां लोदी और अन्य अफगान सरदारों ने बाबर को समर्थन देकर उसे भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया।
- राणा सांगा ने भी आक्रमण का वादा किया।
- 1525 ई. में बाबर ने काबुल से कूच किया। लाहौर पर कब्जा कर, पंजाब जीतते हुए वह दिल्ली पहुंचा।
- पानीपत में बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।
- लोदी और ग्वालियर के विक्रमजीत की मृत्यु के साथ बाबर ने शानदार विजय प्राप्त की। इस जीत ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।
बाबर तीन कारणों से विजयी –
- बाबर ने युद्ध क्षेत्र में तुलुगमा पद्धति का प्रयोग कर इब्राहिम लोदी की सेना को घेर लिया एवं रूमी पद्धति (तोपों को सजाने की पद्धति) के प्रयोग से तोपों को सजाया तथा तोपची उस्ताद अली एवं मुस्तफा की सहायता से भरपूर गोलाबारी की।
- घोड़ों की आपूर्ति: पश्चिम से अच्छी गुणवत्ता वाले घोड़ों की आपूर्ति खैबर दर्रे से संभव थी, जिस पर मुगलों का नियंत्रण था।
- उत्तर भारत में अफगानों और राजपूतों के अधीन विखंडित राजनीतिक विरोध बाबर के आक्रमण के लिए उपयुक्त था।
नोट –
- तुलुगमा युद्ध पद्धति – अपनी सेना को तीन मुख्य भागो में बंटाना तथा दांये बाए व सामने से आक्रमण करना एवं चौथी रिजर्व टुकड़ी के माद्यम से थकी हुई प्रतिद्वंद्वी सेना पर पीछे से आक्रमण करना | यह उज्बेगो से ली गई पद्धति है |
- उस्मानी पद्धति – अन्य नाम – रूमी पद्धति – विभिन्न गाडियों के मध्य सुरक्षित स्थान छोड़कर तोपे सजाने की कला |
पानीपत के युद्ध के परिणाम
- पानीपत का युद्ध राजनीतिक दृष्टि से इतना निर्णायक नहीं था जितना सैनिक दृष्टि से था परन्तु राजनैतिक रूप में भी इस युद्ध ने अहम भूमिका निभायी तथा उत्तर भारत में एक नयी शक्ति का उदय हुआ।
- लोदियों का सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया तथा सल्तनत की सत्ता अब मुगलों के हाथ में आ गयी।
- लोदी सुल्तानों द्वारा संचित किया गया कोष अब बाबर के पास आ गया जिससे बाबर की वित्तीय कठिनाइयां दूर हो गयी।
तथ्य
- बाबर ने तुलुगमा पद्धति को उज्बेकों से सीखा था।
- बाबर ने 1506 ई. में फैसला लिया किस उसके सभी अनुगामी बाबर को बादशाह कहें।
- बाबर को कलन्दर कहा जाता था। प्रत्येक काबुल वासी को शाहरुखी नामक एक एक चांदी का सिक्का दिया गया इसलिए उसे मस्त कलंदर कहा गया।
- पानीपत युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी गुरु नानक देव जी थे।
खानवा का युद्ध(16 मार्च 1527 ई.)
- बाबर ने मेवाड़ के शासक राणा सांगा से भिड़ने का निर्णय लिया, क्योंकि राणा सांगा राजस्थान और मालवा पर प्रभाव रखते थे। बाबर ने राणा सांगा पर समझौता भंग का आरोप लगाया, जबकि राणा सांगा ने बाबर को भारत से बाहर करने और लोदी शासन पुनः स्थापित करने की योजना बनाई।
- राणा सांगा ने अफगान मुसलमानों, इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी, और मेवात के शासक हसन खान मेवाती की शक्तिशाली सेना के साथ आक्रमण किया।
- खानवा में 16/17 मार्च 1527 को बाबर ने अपनी रणनीति और तोपों के प्रभावी उपयोग से राणा सांगा को हराया।
- इस विजय के बाद, बाबर ने ग्वालियर और धौलपुर के किलों पर कब्जा कर लिया, जिससे उसकी स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई।
नोट –
- खानवा युद्ध से पहले बाबर ने “जिहाद” का नारा दिया तथा काबुल के ज्योतिष “मोहम्म्द शरीफ” ने बाबर के हारने की भविष्य वाणी की थी।
- मुसलमानों पर लगने वाले तमगा नामक कर को समाप्त करने की घोषणा की। शराब न छूने की कसम खाई गई।
- बाबर ने खानवा का युद्ध जीतने के बाद गाजी की उपाधि धारण की।
- इस युद्ध में सांगा के घायल होने पर झाला अज्जा ने छत्र धारण किया था।
नोट –
खानवा युद्ध के परिणाम
- भारत में राजपूतों की सर्वोच्चता का अंत हो गया। राजपूतों का प्रताप अब समाप्त हो गया और उनका प्रभाव घटने लगा।
- मेवाड़ की प्रतिष्ठा और शक्ति से निर्मित राजपूत संगठन भी इस पराजय के साथ समाप्त हो गया।
- भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य स्थापित हो गया और बाबर स्थिर रूप से भारत का बादशाह बन गया।
चन्देरी का युद्ध(29 जनवरी, 1528 ई.)
- चंदेरी का युद्ध बाबर एवं मालवा शासक मेदिनी राय के बीच हुआ। इस युद्ध में बाबर विजयी रहा एवं मेदिनी राय मारा गया।
- इस युद्ध में भी बाबर ने जिहाद का नारा दिया था।
- चन्देरी एवं खानवा के युद्ध में बाबर ने राजपूतों की खोपड़ियों के बुर्ज एवं मीनार बनाने के आदेश दिए थे।
घाघरा का युद्ध(5 अप्रैल, 1529 ई.)
- इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी और उनके दामाद सुल्तान नुसरत शाह ने बाबर के खिलाफ षड्यंत्र रचा।
- घाघरा का युद्ध बाबर एवं अफगानों के बीच बिहार में गंगा नदी की सहायक नदी घाघरा नदी के तट पर लड़ा गया।
- एकमात्र युद्ध जो जल व थल पर गया।
- इस युद्ध में बाबर का भारत पर स्थायी रूप से अधिकार हो गया एवं बाबर के साम्राज्य की सीमा सिंधु से लेकर बिहार एवं हिमालय से ग्वालियर तक फैल गयी।
बाबर की मृत्यु
- बाबर की मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 ई. को आगरा में हुई। बाबर को आगरा के आराम बाग में दफनाया गया था किन्तु बाद में काबुल में दफनाया गया था।
प्रारंभिक मुगल चित्रकला
बाबर
- उसने ईरान व मध्य एशिया की संस्कृति और सौंदर्यात्मक संवेदनशीलता का सम्मिश्रण किया था।
- वह कला प्रेमी और विद्वान थे, उनकी आत्मकथा बाबरनामा में उनके कलात्मक रुचियों का उल्लेख है।
- छवि चित्रण में बाबर की गहरी रुचि थी।
- चित्रकार
- बिहज़ाद (पूर्व का राफेल) – ईरान का चित्रकार
- इसके चित्र सुंदर, पर चेहरों का उत्तम चित्रण नहीं
- शाह मुजफ़्फ़र (केशसज्जा का आकर्षक चित्रण करने वाला उत्कृष्ट चित्रकार)
- बिहज़ाद (पूर्व का राफेल) – ईरान का चित्रकार
बाबर की स्थापत्य कला
- संस्कृति एवं सौंदर्य को प्रोत्साहन दिया।
- रूपात्मक बगीचों का शौकीन था।
- बगीचों के उदाहरण –
- शालीमार बाग (लाहौर)
- पिंजौर बाग (कालका)
- आराम बाग (आगरा)
- निशात बाग (कश्मीर)
नोट – बाबर ने आगरा में ज्यामितीय पद्धति में नूर ए बाग़ लगवाया, जिसे दिल ए आराम बाग़ कहते है।
मुगलकाल के उद्यान
| उद्यान | शासक |
| आराम बाग (आगरा) | बाबर |
| शालीमार बाग एवं निशात बाग (श्रीनगर) | जहाँगीर |
| शालीमार बाग (लाहौर) | शाहजहाँ |
| चश्मा-ए-शाही बाग (श्रीनगर) | शाहजहाँ |
| पिंजौर का बाग (हरियाणा) | औरंगजेब |
- बाबर ने पानीपत में काबुली बाग़ की मस्जिद एवं रूहेलखंड के संभल की जामी मस्जिद बनवाई।
- 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद [अयोध्या] का निर्माण करवाया | (9 नवंम्बर 2019 सर्वोच्च न्यायालय का एतिहासिक फैसला राम मंदिर के पक्ष में रहा, विवादित 2.77 एकड़ राम लला ट्रस्ट तथा 5 एकड़ भूमि सुनी वक्फ बोर्ड को दी गई, 5 अगस्त 2020 राम मंदिर की नींव रखी गई।
- इसके अलावा बाबर ने गज ए बाबरी नामक सड़क माप शुरू करवाया।
हुमायूँ [1530 – 45 & 1555 – 56]
- हुमायूं बाबर एवं माहम बेगम के ज्येष्ठ पुत्र थे।
- हुमायूँ नाम का आशय भाग्यशाली होता है लेकिन यह मुगल शासकों में सबसे अभागा शासक हुआ।
- हुमायूं का राज्याभिषेक आगरा में हुआ।
- गद्दी पर बैठते ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा –
(1) अफगान समस्या
- महमूद लोदी अपने को अभी भी दिल्ली का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता था।
- अफगानों में सबसे महत्त्वपूर्ण शेर खां था जो हुमायूँ के लिए सबसे बड़ी समस्या बना।
(2) कमजोर सैन्य व्यवस्था
- राजकोष खाली हो जाने के कारण हुमायूँ एक बड़ी सेना नहीं रख सका।
(3) हुमायूँ के भाई
- हुमायूँ ने अपने भाइयों के साथ उदारता का व्यवहार किया और साम्राज्य का वास्तविक विभाजन कर दिया।
- कामरान को काबुल, कंधार एवं पंजाब दे दिया, अस्करी को संभल का क्षेत्र एवं हिन्दाल को मेवात का क्षेत्र दे दिया।
- यहीं साम्राज्य विभाजन उसकी असफलता का सबसे बड़ा कारण बना।
हुमायूँ के अभियान
कालिंजर अभियान (1531)
- इस समय कालिंजर का शासक प्रताप रुद्रदेव था।
- एक महीने के घेरे के बाद जब किले को नहीं जीत सका तो प्रताप रुद्रदेव ने संधि कर ली।
दोहरिया का युद्ध(1532 ई.)
- यह युद्ध हुमायूं एवं अफगान शासक महमूद लोदी के बीच हुआ। इसमें हुमायूं की जीत हुई।
चुनार का प्रथम घेरा (1532)
- चुनार का किला इस समय शेर खाँ सूर के अधीन था।
- हुमायूँ चार महीने तक इसका घेरा डाले रहा लेकिन जीत नहीं सका। शेर खाँ भी लड़ने की स्थिति में नहीं था।
- चार महीने की घेराबंदी के बाद, शेरशाह द्वारा वफादारी का वचन देने पर हुमायूँ ने घेराबंदी हटा दी। यह एक बड़ी भूल साबित हुई।
मालवा एवं गुजरात अभियान (1534-35)
- मालवा के शासक बहादुरशाह ने हुमायूँ के भय से भागकर मालवा और गुजरात को उसके अधीन कर दिया।
- हुमायूँ ने अस्करी को सूबेदार नियुक्त किया, लेकिन अस्करी कानून व्यवस्था बनाने में विफल रहा।
- बहादुर शाह ने जनता के सहयोग से गुजरात पर दोबारा कब्जा कर लिया। विद्रोहों से परेशान अस्करी आगरा लौटने लगा, जिससे हुमायूँ को शंका हुई कि वह आगरा पर अधिकार कर सकता है।
- हुमायूँ ने गुजरात-मालवा छोड़कर अस्करी का पीछा किया। राजस्थान में दोनों भाइयों में सुलह हो गई।
चुनार का द्वितीय अभियान (1538)
- शेर खाँ ने 1538 में बंगाल पर आक्रमण किया।
- इस अवसर पर बंगाल के शासक महमूद शाह ने हुमायूँ से सहायता की मांग की परंतु हुमायूँ सहायता नहीं दे सका।
- हुमायूँ ने शेर खाँ के चुनार किले पर आक्रमण अवश्य कर दिया। छह महीने के घेरे के बाद उसने चुनार का किला जीत लिया।
बंगाल अभियान (1538)
- बंगाल का शासक महमूद शाह युद्ध में घायल होकर हुमायूँ के पास पहुँचा और वहीं इसकी मृत्यु हो गई।
- यह देखकर हुमायूँ के हृदय में दया उत्पन्न हुई और शेरखाँ के विरुद्ध अभियान किया।
- इस समय शेरखाँ बंगाल को जीतकर वापस बिहार आ गया।
- जब हुमायूँ बंगाल से वापस आ रहा था तभी शेरखाँ की सेना ने रास्ते में उसे घेर लिया
- हुमायूं बाबर एवं महँ बेगम के ज्येष्ठ पुत्र थे।
- हुमायूँ नाम का आशय भाग्यशाली होता है लेकिन यह मुगल शासकों में सबसे अभागा शासक हुआ।
- हुमायूं का राज्याभिषेक आगरा में हुआ।
हुमांयू व शेरशाह संबध –
चौसा का युद्ध (26 जून, 1539)
- यह युद्ध अफगान शासक शेरखां(शेरशाह सूरी) एवं हुमायूं के बीच हुआ।
- अनेक सैनिक गंगा एवं कर्मनाशा नदी में डूब कर मर गए तथा हुमायूं घोड़े सहित गंगा में कूद गया एवं निजाम रुका नामक भिस्ती की सहायता से जान बचायी। हुमायूं ने इस उपकार के बदले भिस्ती को एक दिन का बादशाह बनाया था। इसने चमड़े के सिक्के जारी किये।
- इस तरह शेरखाँ इस युद्ध में विजयी रहा तथा इस उपलक्ष्य में शेरखाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की।
- आगरा पहुंचने के बाद हुमायूँ ने अपने भाइयों अस्करी और हिंदाल के सहयोग से सेना संगठित की और शेर खान का सामना करने के लिए तैयार हुए।
कन्नौज (विलग्राम) का युद्ध (17 मई 1540)
- यह युद्ध शेरशाह सूरी एवं हुमायूं के बीच लड़ा गया। इसमें हुमायूं बुरी तरह पराजित हुआ।
- शेरशाह सूरी ने दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया एवं सूर वंश की स्थापना की।
नोट –
- हुमायूँ एवं शेरशाह के बीच झगड़े का मुख्य कारण – बंगाल।
- कन्नौज युद्ध का आँखों देखा वर्णन मिर्जा हैदर दुगलत ने किया है क्योंकि यह इस युद्ध में हुमायूँ की तरफ से भाग लिया था।
निर्वासन काल में हुमायूं
- बिलग्राम के युद्ध में पराजित होने के बाद प्रारंभ में हुमायूं ने अमरकोट के राणा वीरसाल के यहां शरण ली।
- राजगद्दी से निष्काषित हुमायूँ को मारवाड़ के शासक मालदेव ने अपने राज्य में आमंत्रित किया। कहते है की हुमायूँ मारवाड़ के पास जोगीतीर्थ स्थान तक पहुँच भी गया किन्तु मेवात के सूबेदार हिंदाल ने हुमायूँ को मालदेव के इरादो से अवगत करवाकर स्वयं के पास बुलाया।
- इसी समय 1541 में हिंदाल के शिया मौलवी अमीर अली की पुत्री हमीदा बानो बेगम से हुमायूँ का निकाह हुआ एवं अमरकोट में ही हमीदा बानो ने अकबर को जन्म दिया।
- 1543 में हुमायूँ ने अकबर को अस्करी के संरक्षण में छोड़कर हमीदा बानो के साथ ईरान चला गया और वहां के शासक शाह तहमास के यहां शरण ली।
गद्दी पर बैठते ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा – इसकी मुख्य समस्याएं थीं (1) अफगान समस्या (2) कमजोर सैन्य व्यवस्था (3) हुमायूं के भाई
(1) अफगान समस्या
- महमूद लोदी अपने को अभी भी दिल्ली का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता था।
- अफगानों में सबसे महत्वपूर्ण शेर खां था जो हुमायूँ के लिए सबसे बड़ी समस्या बना।
(2) कमजोर सैन्य व्यवस्था
- राजकोष खाली हो जाने के कारण हुमायूँ एक बड़ी सेना नहीं रख सका।
(3) हुमायूँ के भाई
- हुमायूँ ने अपने भाइयों के साथ उदारता का व्यवहार किया और साम्राज्य का वास्तविक विभाजन कर दिया।
- कामरान को काबुल, कंधार एवं पंजाब दे दिया, अस्करी को संभल का क्षेत्र एवं हिन्दाल को मेवात का क्षेत्र दे दिया।
- यहीं साम्राज्य विभाजन उसकी असफलता का सबसे बड़ा कारण बना।
हुमायूँ के अभियान
कालिंजर अभियान (1531)
- इस समय कालिंजर का शासक प्रताप रुद्रदेव था।
- एक महीने के घेरे के बाद जब किले को नहीं जीत सका तो प्रताप रुद्रदेव ने संधि कर ली।
दोहरिया का युद्ध(1532 ई.)
- यह युद्ध हुमायूं एवं अफगान शासक महमूद लोदी के बीच हुआ। इसमें हुमायूं की जीत हुई।
चुनार का प्रथम घेरा (1532)
- चुनार का किला इस समय शेर खाँ सूर के अधीन था।
- हुमायूँ चार महीने तक इसका घेरा डाले रहा लेकिन जीत नहीं सका। शेर खाँ भी लड़ने की स्थिति में नहीं था।
- चार महीने की घेराबंदी के बाद, शेरशाह द्वारा वफादारी का वचन देने पर हुमायूँ ने घेराबंदी हटा दी। यह एक बड़ी भूल साबित हुई।
मालवा एवं गुजरात अभियान (1534-35)
- मालवा के शासक बहादुरशाह ने हुमायूँ के भय से भागकर मालवा और गुजरात को उसके अधीन कर दिया।
- हुमायूँ ने अस्करी को सूबेदार नियुक्त किया, लेकिन अस्करी कानून व्यवस्था बनाने में विफल रहा।
- बहादुर शाह ने जनता के सहयोग से गुजरात पर दोबारा कब्जा कर लिया। विद्रोहों से परेशान अस्करी आगरा लौटने लगा, जिससे हुमायूँ को शंका हुई कि वह आगरा पर अधिकार कर सकता है।
- हुमायूँ ने गुजरात-मालवा छोड़कर अस्करी का पीछा किया। राजस्थान में दोनों भाइयों में सुलह हो गई।
चुनार का द्वितीय अभियान (1537)
- शेर खाँ ने 1537 में बंगाल पर आक्रमण किया।
- इस अवसर पर बंगाल के शासक गयासुद्दीन महमूद शाह ने हुमायूँ से सहायता की मांग की परंतु हुमायूँ सहायता नहीं दे सका।
- हुमायूँ ने शेर खाँ के चुनार किले पर आक्रमण अवश्य कर दिया। छह महीने के घेरे के बाद उसने चुनार का किला जीत लिया।
बंगाल अभियान (1538)
- बंगाल का शासक गयासुद्दीन महमूद शाह युद्ध में घायल होकर हुमायूँ के पास पहुँचा और वहीं इसकी मृत्यु हो गई।
- यह देखकर हुमायूँ के हृदय में दया उत्पन्न हुई और शेरखाँ के विरुद्ध अभियान किया।
- इस समय शेरखाँ बंगाल को जीतकर वापस बिहार आ गया।
- जब हुमायूँ बंगाल से वापस आ रहा था तभी शेरखाँ की सेना ने रास्ते में उसे घेर लिया
हुमांयू व शेरशाह संबध –
चौसा का युद्ध (26 जून, 1539)
- यह युद्ध अफगान शासक शेरखां(शेरशाह सूरी) एवं हुमायूं के बीच हुआ।
- अनेक सैनिक गंगा एवं कर्मनासा नदी में डूब कर मर गए तथा हुमायूं घोड़े सहित गंगा में कूद गयाा एवं निजाम रुका नामक भिस्ती की सहायता से जान बचायी। हुमायूं ने इस उपकार के बदले भिस्ती को एक दिन का बादशाह बनाया था। इसने चमड़े के सिक्के जारी किये।
- इस तरह शेरखाँ इस युद्ध में विजयी रहा तथा इस उपलक्ष्य में शेरखाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की।
- आगरा पहुंचने के बाद हुमायूँ ने अपने भाइयों अस्करी और हिंदाल के सहयोग से सेना संगठित की और शेर खान का सामना करने के लिए तैयार हुए।
कन्नौज (विलग्राम) का युद्ध (17 मई 1540)
- यह युद्ध शेरशाह सूरी एवं हुमायूं के बीच लड़ा गया। इसमें हुमायूं बुरी तरह पराजित हुआ।
- शेरशाह सूरी ने दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया एवं सूर वंश की स्थापना की।
नोट –
- हुमायूँ एवं शेरशाह के बीच झगड़े का मुख्य कारण – बंगाल।
- कन्नौज युद्ध का आँखों देखा वर्णन मिर्जा हैदर दुग्लत ने किया है क्योंकि यह इस युद्ध में हुमायूँ की तरफ से भाग लिया था।
निर्वासन काल में हुमायूं
- बिलग्राम के युद्ध में पराजित होने के बाद प्रारंभ में हुमायूं ने अमरकोट के राणा वीरसाल के यहां शरण ली।
- राजगद्दी से निष्काषित हुमायूँ को मारवाड़ के शासक मालदेव ने अपने राज्य में आमंत्रित किया। कहते है की हुमायूँ मारवाड़ के पास जोगीतीर्थ स्थान तक पहुँच भी गया किन्तु मेवात के सूबेदार हिंदाल ने हुमायूँ को मालदेव के इरादो से अवगत करवाकर स्वयं के पास बुलाया।
- इसी समय 1541 में हिंदाल के सिया मौलवी अमीर अली की पुत्री हमीदा बानो बेगम से हुमायूँ का निकाह हुआ एवं अमरकोट में ही हमीदा बानो ने अकबर को जन्म दिया।
- 1543 में हुमायूँ ने अकबर को अस्करी के संरक्षण में छोड़कर हमीदा बानो के साथ ईरान चला गया और वहां के शासक शाह तहमास के यहां शरण ली।
हुमायूं द्वारा पुनः राज्य की प्राप्ति
- पठान शक्ति में आई फूट का लाभ उठाकर हुमायूँ एक बार फिर भारत की और बढ़ा तथा दो युद्धों के बाद पुन: बादशाहत प्राप्त की
- 1545 ई. में हुमायूं ने काबुल तथा कांधार पर हमला कर कब्जा कर लिया।
- फरवरी 1555 ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया था।
- मच्छीवाड़ा का युद्ध(15 मई, 1555) लुधियाना पंजाब
- यह सतलज नदी के किनारे पर हुमायूं एवं शासक आदिलशाह सूर के अफगान सरदार (नसीब खां एवं तातार खां) के बीच हुआ।
- इसमें हुमायूं की जीत हुई। अब मुगलों का अधिकार पंजाब पर हो गया।
- सरहिन्द का युद्ध(22 जून, 1555) –
- यह युद्ध अफगान एवं मुगल सेना के बीच हुआ। अफगानों का नेतृत्व सिकन्दर सूर एवं मुगल सेना का नेतृत्व बैरम खां ने किया। अफगान सेना पराजित हुई।
- सरहिन्द के युद्ध में विजय के बाद भारत के सिंहासन पर एक बार पुनः मुगलों का शासन स्थापित हो गया।
- सरहिन्द विजय का श्रेय हुमायूँ ने अकबर को दिया।
- 23 जुलाई, 1555 को हुमायूं पुन: दिल्ली के तख्त पर बैठा।
हुमायूं की मृत्यु
- 27 जनवरी, 1556 को दिल्ली के किले दीनपनाह के शेरमंडल नामक पुस्तकालय की सीढ़ी से गिरकर हुमायूँ की मृत्यु हो गयी। हुमायूँ को दिल्ली में ही दफनाया गया।
प्रश्न – “वह जीवन भर ठोकर खाता रहा और अंत में ठोकर खा कर ही मर गया”। कथन किसका है व्याख्या भी करे –
अथवा
“हुमायूँ का सबसे बड़ा कारण उसकी सुन्दर किन्तु विवेकरहित दयालुता है”
हुमायूँ की स्थापत्य कला
हुमायूँ का काल अव्यवस्थित रहा फिर भी उसने स्थापत्य में ध्यान दिया –
- हुमायूँ ने दिल्ली में इंद्रप्रस्थ के खंडहरों पर दीन पनाह नगर बसाया। जो की गरीबो की शरण स्थली थी।
- दिल्ली के किले के दीनपनाह में शेरमंडल नामक पुस्तकालय बनाया गया जिसमे पांडू लिपिया रखी गई।
हुमायूँ का मकबरा
- फारसी स्थापत्य कला से प्रेरित
- निर्माण – 1565ई. में हुमायूँ की विधवा बेगा बेगम (हाजी बेगम) ने शुरू करवाया।
- हुमायु के मकबरे को अकबर काल की प्रथम इमारत माना जाता है।
- ताजमहल और जहाँगीर का मकबरा इसकी वास्तुकला से ही प्रेरित है। इसे ताजमहल का पूर्वगामी कहा जाता है।
- दो मंजिला इमारत है।
- विशाल चबूतरे पर स्थित है।
- लाल और बलुआ पत्थर से निर्मित
- पहली बार गुलाबी बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का प्रभावी रूप से प्रयोग किया गया।
- फारसी वास्तुकार मीरक मिर्जा ग्यास के नेतृत्व में बनवाया गया यह भारत की पहली ईमारत जिसमे चार बाग़ शैली का इस्तेमाल हुआ है।
- इसमें दोहरे गुम्बद का उपयोग हुआ है।

शेरशाह सूरी (1540-45 ई. )
- शेरशाह सूरी भारत में द्वितीय अफगान वंश का संस्थापक था।
- शेरशाह ने जो कार्य किये उसके आधार पर न केवल साम्राज्य निर्माता बल्कि इसे अकबर का अग्रगामी कहा जाता है।
- इसके बचपन का नाम फरीद था। इसका जन्म 1472 में बजबारा या नरनौल में हुआ तथा इसके पिता का नाम हसन था।
- 1494 में सिकन्दर लोदी ने जमाल खाँ को जौनपुर के फौजदार पद पर नियुक्त किया।
- 1494 में फरीद पिता से नाराज होकर जौनपुर आया और यहां पर इसने शिक्षा प्राप्त की।
- 1520 में हसन की मृत्यु के बाद यह अपनी पिता की गद्दी का मालिक हो गया।
- बहार खाँ (महमूदशाह) के साथ एक शिकार यात्रा में इसने एक शेर का वध कर दिया जिससे इसने शेरखां की उपाधि धारण की।
- लोहानी सरदारों के षडयंत्र के कारण इसे बिहार छोड़ना पड़ा और ये बाबर की सेना में शामिल हो गया और चन्देरी के युद्ध में इसने बाबर की तरफ से युद्ध किया।
- 1539 में इसने चौसा के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर शेरशाह की उपाधि धारण की।
- 1540 में इसने कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर भारत का सुल्तान बना।
- शेरशाह सुल्तान बनने से पहले 1529 ई. में बंगाल के शासक नुसरतशाह को पराजित कर ‘हजरते-आला’ की उपाधि धारण की। 1540 ई. में कन्नौज के युद्ध में हुमायूं को पराजित कर ‘सुल्तान‘ की उपाधि धारण की।
- उसका साम्राज्य बंगाल से लेकर सिंधु तक फैला हुआ था, कश्मीर को छोड़कर , और पश्चिम में उसने मालवा और लगभग पूरे राजस्थान पर विजय प्राप्त की।

शेर शाह सूरी के विजय अभियान –
बंगाल विद्रोह का दमन (1541)
- बंगाल के गवर्नर खिज्रखाँ ने 1541 में विद्रोह कर दिया।
- उसने अब बंगाल को 19 सरकारों में बांट दिया और प्रत्येक सरकार में एक शिकदार-ए-शिकदारान की नियुक्ति की जो सुल्तान के सीधे नियंत्रण में थे।
मालवा विजय (1542)
- इस समय यहां मल्लू खां (कादिरशाह) शासक था। जिसने अपनी राजधानी उज्जयिनी में शेरशाह का स्वागत किया और मालवा राज्य शेरशाह को सौंप दिया।
रायसीन विजय (1543)
- यहां का राजा पूरनमल चौहान था।
- शेरशाह ने रायसीन के दुर्ग को चालाकी एवं धोखे से विजित किया, जो इसके जीवन में कलंक था।
- इस घटना के बाद शेरशाह के बेटे कुतुब खां ने आत्महत्या कर ली थी।
मारवाड़ विजय
- यहां का शासक मालदेव था।
- यह राजपूतों के शौर्य से इतना प्रभावित हुआ कि इसने कहा- मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान का साम्राज्य खो चुका था।
कालिंजर अभियान (1544)
- यहां का शासक कीर्ति सिंह था।
- यहाँ घेरा लगभग 7 महीने तक रहा। जब किले को विजित नहीं कर सका तब शेरशाह ने मई 1545 में किले की दीवार को गोला बारूद से उड़ा देने की आज्ञा दी।
- शेरशाह उक्का नामक आग्नेयास्त्र से गोला फेंक रहा था परन्तु गोला उसके पास रखे बारूद के ढ़ेर पर गर गया जिससे शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गयी। लेकिन मरने से पहले इसे किले को जीतने का समाचार प्राप्त हो गया था।
शेरशाह सूरी द्वारा किए गए सुधार
- शेरशाह का प्रशासन केन्द्रीकृत और अनुशासित था।
- उसने साम्राज्य को 47 सरकारों और बंगाल को 19 सरकारों में विभाजित किया।
- शिकदार सैनिक, और मुंसिफ-ए-मुंसिफान न्यायिक अधिकारी थे।
- भूमि को उत्पादन के आधार पर अच्छी, मध्यम, और खराब श्रेणियों में बाँटा।
- चौधरी और मुकद्दम गांवों में कानून-व्यवस्था के जिम्मेदार थे।
- शेरशाह ने इस्लामी कानून को लिखित रूप दिया।
- शेरशाह ने सैनिकों को नकद वेतन और घोड़ों पर दाग लगाने की प्रथा पुनः लागू की।
- कानूनगो ने शेरशाह सूरी के लिए कहा है कि ‘वह बाहर से मुस्लिम अन्दर से हिन्दु था।’
- अब्बास खां शरवानी के अनुसार वह अनुभवों एवं बुद्धिमता में दूसरा हैदर था।
- शेरशाह बड़े पैमाने पर दान करते थे। उन्होंने खजाने से निर्धनों को नियमित भत्ते दिए।
- वह एक रूढ़िवादी और धर्मनिष्ठ सुन्नी थे। कहा जाता है कि उन्होंने न्याय में कभी पक्षपात नहीं किया और अत्याचारियों को, चाहे वे कुलीन हों या उनके रिश्तेदार, सजा दी। उन्होंने विद्रोही ज़मींदारों, कुलीनों, चोरों और डाकुओं को कठोर दंड देकर साम्राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए रखी।
भू-राजस्व व्यवस्था
- सर्वप्रथम शेरशाह ने भूमि की पैमाइश हेतु 32 अंक वाले गज – ए – सिकन्दरी के माध्यम से भूमि की नाप कराई।
- कृषि योग्य भूमि को तीन श्रेणियों (1) उत्तम, (2) मध्यम, (3) निम्न श्रेणी। तीनों का औसत उपज निकालकर 1/3 भाग भू-राजस्व निर्धारित किया। इस व्यवस्था को जब्ती प्रणाली / भूमि बंदोबस्त के नाम से जाना जाता है। दीवान टोडरमल ने इसे विकसित किया।
- भू-राजस्व के अतिरिक्त किसानों से दो अन्य कर वसूल कियेः-
- जरीबाना [भूमि सर्वेक्षण शुल्क] :- यह भूमि की नाप के लिए लिया जाने वाला कर था जो उपज का ढाई प्रतिशत था।
- महासीलाना [कर संग्रह शुल्क] :- यह कर वसूली के लिये लिया जाता था जो उपज का 5 प्रतिशत था।
- इसने किसानों को भूमि का स्वामी बनाया और किसानों को पट्टा दिया और किसानों से इसने कबूलियत (स्वीकृत पत्र) प्राप्त किया।
मुद्रा
- शेरशाह ने पुराने सिक्कों को बंद करके सोने-चाँदी-तांबे के नए सिक्के चलाये।
- इसने सर्वप्रथम चाँदी का रुपया [180 ग्रेन] चलाया और तांबे का दाम [380 ग्रेन] चलाया।
- रुपये और दाम में 1:64 का अनुपात था।
- उनका मानकीकृत रुपिया (चांदी का सिक्का) ब्रिटिश काल तक मुख्य मुद्रा थी।
- शेरशाह ने अपने सिक्कों पर फारसी भाषा के साथ-साथ देवनागरी में भी लेख लिखवाए।
- अशरफ – सोने का सिक्का
- इतिहासकार विंसेट आयर स्मिथ ने लिखा कि “सूरी की मुद्रा प्रणाली ही आगे चलाकर ब्रिटिश मुद्रा व्यवस्था का आधार बनी।

शेरशाह द्वारा लिया जाने वाला कर
- खिराज (भूमि कर) औसत उपज का 1/3 भाग
- जरीबाना-भूमि की नाप के लिए उपज का ढाई %
- महासीलाना – राजस्व अधिकारियों के लिए उपज का 5%
व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा:
- शेरशाह ने व्यापारियों के साथ भी समान संवेदनशीलता दिखाई। व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने कर प्रणाली को सरल बनाया, जिससे केवल प्रवेश और बिक्री के बिंदु पर कर वसूला जाता था।
- उन्होंने पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बंगाल तक पुराने ग्रैंड ट्रंक रोड का जीर्णोद्धार किया ।
- उन्होंने कई सराय बनवाईं और मुख्य सड़कों पर हर दो कोस (करीब आठ किलोमीटर) पर इन्हें बनवाया। इन सरायों में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई थी।
- उन्होंने बाट और माप के मानक भी तय करने का प्रयास किया।
- उन्होंने मुद्रा सुधार किए और एक समान मानक के सोने, चांदी और तांबे के सिक्के चलाए।
सूरी का पतन:
- शेरशाह सूरी के बाद उसका पुत्र इस्लाम शाह सूरी शासक बना (1545 – 53) इसका मूल नाम जलाल खां था।
- इस्लाम शाह के पुत्र फिरोजशाह की हत्या उसके मामा आदिलशाह सूरी ने की तथा राजगद्दी छीन ली जो 1553 से 1555 तक शासक रहा। इसका मूल नाम मुबारिज खां था।
- इसने रेवाड़ी के नामक विक्रेता हेमू को अपना सेनापति नियुक्त किया।
- शेरशाह की सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण अंततः सूरी साम्राज्य को कमजोर कर दिया और उसके अंत का कारण बन गया।
- अंततः 1555 में हुमायूं ने अफगानों को पराजित कर दिल्ली और आगरा पर पुनः अधिकार कर लिया।
नोट – दिल्ली का अन्तिम हिन्दु शासक – हेमू –
- शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारियों में मुहम्मद आदिल शाह एक अयोग्य एवं दुराचारी शासक था। इसने हेमू को अपना प्रशासन का संपूर्ण भार सौंप दिया।
- आदिल शाह ने चुनार को अपनी राजधानी बनाया तथा हेमू मुगलों को हिन्दुस्तान से बाहर निकालने के लिए नियुक्त किया।
- आदिल शाह के शासक बनते ही हेमू को प्रधानमंत्री बनाया गया। हेमू ने अपने स्वामी के लिए 24 लड़ाइयां लड़ी जिसमें उसे 22 लड़ाइयों में सफलता मिली।
- हेमू ने विक्रमादित्य की उपाधि (भारत का अंतिम व 14 वां विक्रमादित्य) धारण की।
- वह दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला अंतिम हिन्दु सम्राट था। इसका शासन बहुत अल्पकालिक था।
शेरशाह सूरी की स्थापत्य कला में महान उपलब्धिया उल्लेखित है –
सासाराम का मकबरा –
- स्वयं शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित।
- चारो और पानी से घिरा हुआ मकबरा।
- चारों ओर बरामदा
- दीवारें मेहराब युक्त
- बड़े विस्तृत गुम्बद द्वारा ढ़का हुआ हॉल।
- यह बिहार के बलुआ पत्थर से निर्मित है।
- पुरातत्त्ववेत्ता कनिंघम ने इसे ताजमहल से भी सुन्दर इमारत बताया।
- शेरशाह ने रोहतास गढ़ नामक किला बनवाया था।
- सूरी ने कनौज नगर को नष्ट करके शेरसूर नगर बसाया।
- दिल्ली का पुराना किला बनवाया।
- किला-ए-कुहना मस्जिद – पुराने किले में स्थित है। जिसका निर्माण शेरशाह सूरी द्वारा ही करवाया गया था।
- शेरशाह ने पटना नगर की स्थापना की थी।
- अपने शासन को चिह्नित किया
- करने के लिए, उसने अफगान शैली में पटना में शेर शाह सूरी मस्जिद का निर्माण कराया।
- शेरशाह सूरी ने कुल 1700 सराए बनायी। इसका मुख्य कारण था डाक एवं सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक द्रुत गति से पहुँचाना। इतिहासकार हेमचन्द्र कानूनगो ने इन सराय को साम्राज्य रुपी शरीर की धमनिया कहा है।
- सूरी ने व्यापारिक समृद्धि के लिए एवं सांस्कृतिक आदान- प्रदान के लिए चार सड़कों का निर्माण करवाया –
- सड़क-ए-आजम- यह सड़क बंगाल के सोनार गांव से लेकर पंजाब में अटक तक जाती थी। लगभग 1500 मील लम्बी थी। अन्य नाम ग्रांड ट्रंक रोड।
- आगरा से बुरहानपुर (up )तक।
- आगरा से जोधपुर होते हुए चित्तौड़गढ़ तक।
- लाहौर से मुल्तान तक।


अकबर (1556-1605 ई.)
अकबर (1556-1605 ई.)
- अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट (सिंध) में राणा वीरसाल के घर हुआ, जहाँ हुमायूँ ने शरण ली थी।
- बचपन में उसका नाम बदरुद्दीन था। हुमायूँ के फारस जाने पर अकबर अस्करी के संरक्षण में रहा।
- बाल्यकाल में वह लाहौर और गजनी का सूबेदार था।
- 17 दिन तक हुमायूँ की मृत्यु की खबर छुपाकर मुल्ला बेगासी नामक हमशक्ल से झरोखा दर्शन करवाया गया।
- 14 फरवरी 1556 को 13-14 वर्ष की आयु में गुरदासपुर के कालानौर में उसका राज्याभिषेक बैरम खां की देखरेख में हुआ। बैरम खां को वजीर नियुक्त किया गया।
अकबर के अधीन विस्तार के चरण:
प्रारंभिक विद्रोह:
पानीपत का दूसरा युद्ध(5 नवंबर, 1556) –
- हेमचंद्र विक्रमादित्य (हेमू), आदिल शाह सूरी के वजीर, ने मुगलों के खिलाफ अफगानों को संगठित किया। उन्होंने आगरा और दिल्ली पर कब्जा कर स्वतंत्र शासक घोषित करते हुए विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।
- 5 नवंबर 1556 को पानीपत के मैदान में अकबर की सेना ने बैरम खां के नेतृत्व में हेमू को हराया, जिससे सूरी सत्ता का अंत हुआ।
- आर त्रिपाठी ने कहा है कि “हेमू की पराजय एक दुर्घटना थी तथा बैरम खां की विजय एक दैवीय संयोग था।”
यह युद्ध भारत में मुगल शक्ति को पुनः स्थापित करने का निर्णायक क्षण बना।
बैरम खान
- बैरम खान ने अकबर के रीजेंट के रूप में चार वर्षों तक साम्राज्य का कुशल प्रबंधन किया, जिसका विस्तार काबुल से जौनपुर तक था।
- 1560 में अकबर ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। विद्रोह के बाद हारने पर, गुजरात के पाटन में उनकी हत्या कर दी गई।
- तिलवाडा का युद्ध
- बैरम खां, अकबर के वयस्क होने पर भी शासन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता था, जिससे उसने विद्रोह किया।
- तिलवाडा में हुए युद्ध में अकबर ने बैरम खां को पराजित किया।
- जब बैरम खाँ मक्का जा रहा था 1561 में तब एक पठान युवक (मुबारिज खां) ने बैरम खां की हत्या कर दी क्युकी बैरम खां ने उसके पिता को मच्छीवाडा के युद्ध में मारा।
- अकबर ने बैरम की विधवा से विवाह कर लिया एवं बैरम का पुत्र अब्दुर्रहीम को खान ए खाना के पद तक पहुँचाया।
- इतिहासकार अबुल फजल के अनुसार बैरम खां के पतन का सबसे बड़ा कारण महाम अनगा थी।
पेटीकोट शासन /पर्दाशासन/ घाघरा शासन
- अकबर के शासनकाल में 1560-1564 का समय पर्दाशासन या पेटीकोट शासन कहलाता है, जब शाही परिवार की महिलाएं शासन पर प्रभावशाली थीं।
- इस सरकार के तीन सदस्य थे :- महम अनगा, जीजी अनगा, आधम खां। अकबर पर इसकी धाय मां माहमअनगा का सर्वाधिक प्रभाव था।
अकबर का राजत्व सिद्धांत
- अकबर के राजत्व सिद्धांत के अनुसार राजा के पद को दैवीय देन माना गया तथा राजा को दैवीय प्रकाश माना जिसके आगे सबका झुकना अनिवार्य था।
- अकबर का राजत्व उदार निरंकुशता पर आधारित था।
- राजनीतिक व्यवस्था पर कट्टरवाद का प्रभाव कम था।
- शासक जनहित संबंधी अपने कर्तव्य के प्रति सजग था।
- प्रजा के लिए पितृवत प्रेम, सत्य-असत्य का विवेक आदि शामिल था।
साम्राज्य विस्तार
मालवा के विरुद्ध अभियान से लेकर असीरगढ़ के पतन तक चार दशकों (40 वर्ष) के दौरान अकबर की भूमिका एक महान विजेता तथा साम्राज्य निर्माता की थी।
अकबर के अधीन गंगा के मैदानों पर विजय:
मालवा अभियान(1561 ई.)
- इस अभियान में मुगल सेना का नेतृत्व अधम खां एवं पीर मुहम्मद खां ने किया।
- मालवा का शासक बाज बहादुर पराजित हुआ एवं भाग कर बुरहानपुर में शरण ली।
- बाज बहादुर की परम सुन्दरी पत्नि रानी रूपमती ने अपने सम्मान की रक्षा के उद्देश्य से मृत्यु को अपनाया।
- बाज बहादुर को मनसबदार बना दिया गया।
गढ़ कटंगा अभियान(1564 ई.)
- गढ़ कटंगा, गोंडवाना प्रदेश था जो जबलपुर के पास का क्षेत्र था। यहां के राजा की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी रानी दुर्गावती राज कर रही थी।
- अकबर साम्राज्य में कडा (इलाहाबाद) के सुबेदार आसफ खां ने दमोह के पास रानी दुर्गावती को पराजित किया।
- पराजित होने के बाद रानी दुर्गावती ने बंदी बनाए जाने के भय से स्वयं को छुरा घोंप कर आत्महत्या कर ली। गढ़ कटंगा पर भी अकबर का राज्य स्थापित हो गया।

राजपूताना अभियान
अकबर की राजपूत नीति
- अकबर की राजपूत नीति दमन, सहयोग एवं समझौते पर आधारित थी जो अलग अलग तीन चरणों में विभाजित थी। अकबर की राजपूत नीति का उद्देश्य साम्राज्य के स्थायित्व के लिए राजपूतों की सहानुभूति प्राप्त करना था।
- प्रथम चरण, 1572 तक था इस समय दमन की नीति को अपना कर राजपूतों पर आधिपत्य स्थापित करने पर बल था।
- द्वितीय चरण 1572-78 तक था इस चरण में राजपूतों से माम्राज्य विस्तार में सहयोग प्राप्त करने की नीति प्रभावी थी। इस चरण में राजपूत शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन स्थापित करना भी उद्देश्य शामिल था।
- तृतीय चरण 1578 के बाद का काल था। इस नीति में हिन्दु एवं मुस्लिम धर्म के कारण उत्पन्न हुए विरोधों का निराकरण वैवाहिक संबंधों द्वारा किए जाने की झलक मिलती है।
- राजस्थान में साम्राज्य विस्तार के लिए अकबर द्वारा अपनाई गई नीति की विशेषता थी :-
- स्वेच्छा से अधीनता स्वीकार करने वाले अथवा विवाह संबंधों के इच्छुक राजपूत राजाओं को अपनी अधीनता में लेना और उनका राज्य उन्हें वापस कर देना तथा मुगल सेना में उन्हें उच्च पद प्रदान करना।
- शत्रुतापूर्ण व्यवहार में लिप्त राजाओं को पराजित कर उनके राज्य को मुगल साम्राज्य में मिलाना।
- राजस्थान पर अभियान के कारण
- साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करना था। गुजरात और मालवा तक पहुंचने का मार्ग राजस्थान से होकर जाता था, इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण आवश्यक था।
- राणा उदयसिंह ने बाज बहादुर और संभल से भागने वाले मिर्जा को शरण देकर अकबर को चुनौती दी।
- हुमायूं की सलाह पर राजपूतों के दमन या मित्रता द्वारा उनकी शक्ति का उपयोग करना आवश्यक समझा गया।
- इन अभियानों का मुख्य उद्देश्य शत्रुओं की शक्ति को समाप्त करना या उन्हें सहयोगी बनाना था, न कि प्रादेशिक विस्तार या धन प्राप्ति।
घटनाक्रम
- सन् 1562 ई. में आमेर (जयपुर) के शासक भारमल पहला राजपूत राजा था जिसने 1562 में स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की और अपनी पुत्री का विवाह अकबर के साथ किया।
- 1562 ई. में ही मेडता पर अधिकार।
- 1568 ई. में लगभग 4 महीने की घेराबंदी के बाद मेवाड का विनाश किया, मेवाड़ ने आधिपत्य स्वीकार नहीं किया।
- 1569 ई. में रणथम्भौर पर अधिकार।
- 1570 ई. में मारवाड़, बीकानेर एवं जैसलमेर के राजाओं द्वारा मुगल आधिपत्य स्वीकार।
- मारवाड़ के राठौड़ राजपूत:
- जोधपुर के चंद्रसेन राठौड़ ने शाही मुगल सेना को कड़ी टक्कर दी।
- 1564 में जोधपुर के पतन के बाद भी वह लड़ते रहे। अंततः 1580 के दशक तक मुगल सेना ने पूरे मारवाड़ को अपने नियंत्रण में ले लिया।
- चित्तौड़ के सिसोदिया राजपूतों के साथ संघर्ष:
- चित्तौड़ के सिसोदिया राजपूतों ने अकबर की अधीनता नहीं स्वीकारी। 1568 ई. में चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण में 4 महीने की घेराबंदी के बाद 30,000 से अधिक लोग मारे गए। राजा उदयसिंह ने किला छोड़कर पहाड़ियों में शरण ली। । अकबर ने जयमल और फत्ता के साहस की प्रशंसा में आगरा के मुख्य द्वार पर उनकी मूर्तियाँ स्थापित करवाईं।
- उदयसिंह की मृत्यु (1572) के बाद राणा प्रताप सिंह मेवाड़ के शासक बने और आजीवन अकबर से संघर्ष किया
- 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में राणा प्रताप और हकीम खां सूर की सेना ने मुगल सेना का सामना किया, परंतु युद्ध अनिर्णीत रहा। राणा ने अधीनता न स्वीकारते हुए गोरिल्ला युद्ध जारी रखा, नई राजधानी चावंड बसाई, और मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करते रहे।
अकबर का गुजरात अभियान
- सन् 1572 ई. में अंत में अकबर गुजरात पहुंचा। सबसे पहले अहमदाबाद पर कब्जा किया फिर दक्षिण गुजरात एवं सूरत पर कब्जा किया।
- अकबर ने गुजरात में खान ए आजम अजीज कोका को सुबेदार नियुक्त किया।
अकबर का बंगाल अभियान
- इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद बंगाल स्वतंत्र हो चुका था। सत्ता की बागडोर सुलेमान कुर्रानी के हाथ में थी।
- अकबर के पूर्वी अभियान का लक्ष्य ‘बिहार को फतह करना था।’ परन्तु कार्यवाही का तात्कालिक कारण दाउद खां द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा थी।
- दाउद खां को पराजित कर अकबर ने मुनिम खां को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया एवं मुनिम खां की मृत्यु के बाद हुसैन-कुली खान-ए-जहां को बंगाल का नया सुबेदार नियुक्त किया।
दक्षिण विजय
- अकबर पहला मुगल शासक था जिसने दक्षिण अभियान किया।
गंगा मैदान से आगे विस्तार:
- 1585 ई. में काबुल के शासक मिर्जा हकीम की मृत्यु के बाद अकबर ने मानसिंह को काबुल पर अधिकार करने के लिए भेजा तथा मानसिंह को काबुल का सूबेदार बना दिया।
- सन् 1586 ई. में अकबर ने कश्मीर को जीतने का निश्चय किया वहां के शासक याकूब खां ने अकबर की अधीनता स्वीकर कर ली थी परन्तु सशरीर अकबर के सामने उपस्थित होकर समर्पण करने से मना कर दिया था। वास्तविक रूप में कश्मीर पर अधिकार 1587 ई. में कासिम खां द्वारा कश्मीर शासक याकूब खां को पराजित करने के बाद हुआ।
- कश्मीर पर अधिकार के बाद लद्दाख एवं ब्लूचिस्तान पर अधिकार कर लिया।
- सिंध पर विजय 1590 में हुई ।
- 1592 में बंगाल के मुगल गवर्नर राजा मान सिंह ने उड़ीसा पर कब्जा कर लिया था ।
दक्कन के सुल्तानों के विरुद्ध अभियान:
- इस समय दक्षिण में खान देश, अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा प्रमुख सल्तनत थे।
- खान देश दक्षिण का पहला राज्य था जिसने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
- अहमदनगर अभियान
- सर्वप्रथम 1593 में अकबर ने एक मुगल सेना अब्दुल रहीम खान-ए-खानम के नेतृत्व में अहमदनगर विजय के लिए भेजी।
- इस समय अहमदनगर की सुरक्षा का भार चांद बीबी पर था जो अहमदनगर के शासक निजामशाह की पुत्री थी।
- उन्होंने 1595 में अहमदनगर किले पर घेरा डाल दिया,जिससे चांद बीबी को बरार सौंपने पर मजबूर होना पड़ा;
- 1601 में इसने किले को जीत लिया तथा दक्षिण विजय के उपलक्ष्य में अकबर ने दक्षिण के बादशाह की उपाधि धारण की।
- राजकुमार दानियाल के अधीन अहमदनगर, बरार और खानदेश के सूबों की स्थापना की ।
- अकबर की अंतिम कार्यवाही कन्धार को मुगल साम्राज्य में शामिल करना था।
अक्टूबर 1605 ई. में अकबर ने बीमार होने के कारण 21 अक्टूबर 1605 को जहांगीर (सलीम) को उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। 25-26 अक्टूबर 1605 ई. को अकबर की मृत्यु हो गई। अकबर का मकबरा आगरा से 10 मील की दूरी पर सिकन्दरा में है। इस मकबरे का निर्माण जहांगीर के शासन काल में करवाया गया।
अकबर का प्रशासन
अकबर की राजस्व प्रणाली:
- भू-राजस्व के लिए जब्ती प्रणाली: सूरी से अपनाई गई थी , जिसमें राजस्व का भुगतान उत्पादकता के वार्षिक मूल्यांकन के अनुसार किया जाता था।
लेकिन बाद में उन्होंने इसमें संशोधन किया और दहसाला प्रणाली को अपनाया जिसमें उत्पादकता आकलन के लिए पिछले दस वर्षों की औसत उपज का उपयोग किया गया।
- हालाँकि, कुछ क्षेत्रों में राजस्व की गणना के लिए जब्ती , बटाई और नसाक/कनकुट जैसी अन्य प्रणालियों का उपयोग किया जाता था।
सैन्य प्रशासन:
- अकबर ने अपनी सेना और कुलीन वर्ग को मनसबदारी प्रणाली के तहत संगठित किया, जहां प्रत्येक अधिकारी को एक पद (मनसब) सौंपा गया था।
- उन्होंने मौजूदा स्थानीय प्रशासन और परगना और सरकार को जारी रखा
- सर्वशक्तिमान वजीर की मध्य एशियाई परंपरा समाप्त कर दी गई।
अकबर की धार्मिक नीति:
- उनकी धार्मिक नीति को ‘सुहल-ए-कुल’ (सार्वभौमिक शांति) के नाम से जाना जाता है ।
- अकबर के धार्मिक विचारों पर अब्दुल लतीफ की विचारधारा का प्रभाव था।
नोट – सुलह-ए-कुल नीति – सुलह-ए-कुल का अर्थ सभी धर्मों को महत्व देना, आदर करना एवं धार्मिक सहिष्णुता से है। सूफी संतों ने सुलह-ए-कुल नीति पर जोर दिया था। यह धार्मिक कट्टरता को कम करती है।
- धार्मिक स्वतंत्रता पुनर्जीवित हुई: 1563 में इसने तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 में जजिया कर समाप्त किया।
- जैन विद्वानों में हरि विजय सूरि जिसको इसने जगतगुरु तथा जिन चन्द्र सूरि जिसे इसने युग प्रधान की उपाधि दी।
- हिन्दू धर्म के कर्म एवं पुनर्जन्म के सिद्धान्त को ग्रहण किया।
- 1580 में पहला ईसाई मिशन फतेहपुर सीकरी पहुँचा जिसमें मॉसरेट, अक्वेविया और एनरिक्वेज इसके सदस्य थे। अकबर ने इनसे भी वार्ता की।
- सितम्बर 1579 में महजर घोषणा-पत्र नाम से एक दस्तावेज जारी किया जिसकी रचना शेख मुबारक ने की थी। इसके द्वारा अकबर को इस्लाम धर्म से सम्बंधित विवादों के निबटारे का सर्वोच्च अधिकार प्राप्त हुआ और अब यह इमाम-ए-आदिल हो गया।
- इस दस्तावेज को लाने का उद्देश्य उलेमाओं के विरोध को कम करना एवं राजत्व की गरिमा को बढ़ाना था।
- उन्होंने युद्धबंदियों को जबरन इस्लाम में धर्मांतरित करने की प्रथा पर भी रोक लगा दी।
- अकबर ने अपनी हिंदू पत्नियों को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी और उनके माता-पिता और रिश्तेदारों को कुलीन वर्ग में सम्मानजनक स्थान दिया। उनकी राजपूत नीति गैर-मुसलमानों के प्रति उनकी सहिष्णुता की नीति के अनुरूप थी।
- अकबर के अधीन धार्मिक सुधार:
- उन्होंने जबरन सती प्रथा को रोका और विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दी।
- उन्होंने शिक्षा में सुधार का भी प्रयास किया और गणित, खगोल विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि धर्मनिरपेक्ष विषयों पर जोर दिया।
- 1575 में फतेहपुर सीकरी में इसने एक इबादतखाना का निर्माण कराया। इसका उद्देश्य धर्म की सत्यता को जानने की उत्सुकता थी।
- इबादत खाना में, वे विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक विचारों पर चर्चा करते थे। आरंभ में इबादत खाने में केवल मुसलमान भाग ले सकते थे व 1578 ई. में इबादतखाना सभी धर्मों के विद्वानों के लिए खोला गया।
- अकबर ने विभिन्न धर्मों के प्रमुख व्यक्तियों जैसे पुरूषोत्तम और देवी (हिंदू धर्म), मेहरजी राणा (पारसी धर्म), पुर्तगाली अक्वाविवा और मोंसेरेट (ईसाई धर्म), और हीर विजय सूरी (जैन धर्म) के साथ व्यक्तिगत चर्चा कीं।
- परन्तु इबादत खाने का जो उद्देश्य था ‘सत्य की खोज’ के स्थान पर अपने-अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने लगे अतः अकबर ने 1582 में इबादत खाने को बंद कर दिया।
- इन चर्चाओं के माध्यम से अकबर ने महसूस किया कि नामों की विविधता के पीछे केवल एक ही ईश्वर है। तौहीद-ए-इलाही या दीन-ए-इलाही का सिद्धांत इसी विचार को दर्शाता है। तौहीद-ए-इलाही का शाब्दिक अर्थ है “दैवी एकेश्वरवाद”।
- 1582 में अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना की। जिसमें विभिन्न धर्मों के विचार शामिल थे।
- दीन ए इलाही अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और उदार लोकेश्वरवाद का प्रतीक था। जिसमें विभिन्न धर्मों के अच्छे सिद्धांतों का समावेश किया गया।
- दीन-ए-इलाही के सिद्धांत
- सम्राट को अपना आध्यात्मिक गुरू मानना
- यह धर्म एकेश्वरवाद में विश्वास करता था
- दानशीलता
- सांसारिक इच्छा का परित्याग
- शाकाहारी भोजन, शिकारियों एवं मछुआरों के साथ भोजन न करना।
- विशुद्ध नैतिक जीवन व्यतीत करना।
- अल्पायु, बांझ व गर्भवती स्त्रियों से शारीरिक संबंध निषेध
- अबुल फजल इस सम्प्रदाय का मुख्य पुरोहित बना।
- प्रतिष्ठित हिन्दुओं में केवल बीरबल ने ही इसे स्वीकार किया।
- अकबर के दीन-ए-इलाही के बारे में स्मिथ ने लिखा है कि दीन – ए – इलाही अकबर की बुद्धिमत्ता का नहीं बल्कि इसकी मुर्खता का प्रतीक था।
अकबर के नवरत्न
- बीरबल – इनका जन्म काल्पी में हुआ था। बचपन का नाम महेशदास था। आमेर के राजा भारमल के पुत्र भगवान दास ने इन्हें अकबर तक पहुंचाया था। अकबर ने इन्हें कविराज एवं राजा की उपाधि तथा 2000 का मनसब प्रदान किया। दीन ए इलाही धर्म स्वीकार करने वाले एकमात्र हिन्दु राजा बीरबल थे। इनकी मृत्यु युसुफजई कबीले के साथ होने वाले संघर्ष में हुई।
- अबुल फजल – मजहरनामा शेख मुबारक का पुत्र व अनुवाद विभाग का अध्यक्ष फैजी के भाई, अकबर का घनिष्ठ मित्र, निजी सचिव, सलाहकार थे । इन्होंने आइन ए अकबरी,(अकबर काल का सरकारी गजट) अकबरनामा की रचना की। अबुल फजल दीन ए इलाही धर्म के मुख्य पुरोहित थे। इनकी हत्या शहजादा सलीम के कहने पर वीरसिंह बुन्देला ने करी थी।
- तानसेन – ये ग्वालियर के थे। अकबर ने इन्हें कण्ठाभरण वाणी विलास की उपाधि दी। इनके समय ध्रुपद गायन शैली का विकास हुआ। इन्होंने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था।
- अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना – ये बैरम खां का पुत्र था। इनका पालन पोषण स्वयं अकबर ने किया था। इन्होंने बाबरनामा का फारसी में अनुवाद किया था।
- मानसिंह – ये आमेर के राजा भारमल के पौत्र तथा भगवान दास के पुत्र थे। अकबर के मेवाड़ (हल्दीघाटी), काबुल, बंगाल एवं बिहार के अभियानों में मुख्य भुमिका निभायी।
- टोडरमल – इसका जन्म अवध के सीतापुर में हुआ। अकबर से पहले ये शेरशाह सूरी के यहां नौकरी करते थे। अकबर के शासन में दहशाला (भूमि सुधार) की व्यवस्था दी। इन्होंने दीन-ए-इलाही धर्म को स्वीकार नहीं किया था।
- फैजी – अकबर ने इन्हें राजकवि के पद पर आसीन किया था। इन्होंने गणित की प्रसिद्ध पुस्तक लीलावती का फारसी में अनुवाद किया।
- हकीम हुमाम – अकबर के रसोईघर का कार्य संभालते थे।
- मुल्ला-दो-प्याजा – ये अरब के रहने वाले थे। ये अपनी बुद्धिमानी व वाकपटुता के कारण नवरत्नों में शामिल थे।
नोट – अब्दुल कादिर बदायुनी को भी शामिल किया जाता है।
अकबर के समय की प्रमुख घटनाएँ
| 1562 ई. | युद्ध बन्दियों के लिए दास प्रथा की समाप्ति। |
| 1563 ई. | तीर्थ यात्रा कर की समाप्ति। |
| 1564 ई. | जजिया की समाप्ति। |
| 1569-70ई. | फतेहपुर सीकरी की स्थापना। |
| 1574-75 ई. | समाचार देने वाले गुप्तचर विभाग की स्थापना। |
| 1574 ई. | घोड़े दागने की प्रथा आरम्भ। |
| 1571 / 75 ई. | मनसबदारी व्यवस्था प्रारम्भ की गई। |
| 1575 ई. | फतेहपुर सीकरी में इबादत्त खाने का निर्माण। |
| 1577 ई. | सिक्ख गुरु रामदास को 500 बीघा जमीन दी जहां बाद में अमृतसर नगर बसा। |
| 1577-78 ई. | सिजदा एवं पायबोस की शुरुआत |
| 1578 ई. | इबादत खाने को सभी धर्मों के लिए खोल गया। |
| 1579 ई. | महजर की घोषणा। तथा दहसाला प्रणाली की घोषणा |
| 1580 ई. | संपूर्ण साम्राज्य को सूबों में बांटा गया (दक्षिण विजय के बाद सूबों की संख्या 15 हो गयी) |
| 1580 ई. | टोडरमल द्वारा दहसाला प्रणाली लागू। |
| 1580 ई. | फादर एक्वाबीवा के नेतृत्व में प्रथम पुर्तगाली जैसूट मिशन फतेहपुर सीकरी आया। |
| 1582 ई. | दास प्रथा की पूर्ण समाप्ति। |
| 1582 ई. | इबादत खाने में बहस पर रोक। |
| 1582 ई. | दीए-ए-इलाही की घोषणा। |
| 1583 ई. | इलाही संवत् या फसली संवत् नामक नया कैलेंडर जारी किया गया। |
| 1583 ई. | कुछ निश्चित दिनों पर पशुवध पर रोक। |
| 1588 ई. | गज ए इलाही या बीघा ए इलाही की शुरुआत |
अकबर कला स्थापत्य
अकबर कालीन स्थापत्य कला
- कला एवं वास्तुकला में रुचि रखता था।
- इस काल में हिन्दू-मुस्लिम कला का समन्वय देखा जा सकता है। (निर्माण +अलंकरण)
- अकबर के शासनकाल के दौरान निर्माण कार्यों की प्रमुख विशेषता लाल बलुआ प्रस्तर का उपयोग था। उसने ‘ट्यूडर आर्क’ ‘चतुष्कोणीय मेहराब” के उपयोग का भी प्रचलन किया।
आगरा का किला
- निर्माण – 1565 -74 ई.
- यह अकबर के शासनकाल के दौरान आरंभ किए गए पहले निर्माण कार्यों में से एक था। हालांकि, इस किले के अंदर अब भी वर्तमान अधिकांश संरचनाएं शाहजहां के शासनकाल के दौरान बनवाई गई थीं।
- कासिम खाँ की देखरेख में।
- प्राचीर की दीवार में अवनत पत्थर का प्रयोग। (पहली बार)
- विशेषताएँ
- बुर्ज
- विशाल सभागृह
- महल [जहांगीरी महल (शाहजहां को यहीं पर नजरबंदी में डाला गया था)।]
- मस्जिद, हरम, बगीचे
- दरबारियों और अभिजात वर्ग के लोगों के लिए घर।

दिल्ली दरवाजा
- आगरा किले का पश्चिमी दरवाजा।
- 1566 ई. में बनकर तैयार हुआ।
फतेहपुर सीकरी
- आगरा से 23 किमी. दूर सीकरी नामक गाँव में स्थित।
- लगभग सभी इमारतें ‘शहतीरी शिल्प पद्धति’ में निर्मित हैं।
- इस नगर में जोधाबाई का महल, मरियम का महल, बीरबल का महल, पंचमहल, खास महल, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा, शेख सलीम चिश्मी का मकबरा, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास आदि स्थित है।
- शेख सलीम चिश्ती का मकबरा –
- निर्माण – 1581 ईस्वी में।
- इसमें सफेद संगमरमर की जाली का काम किया गया है।
- दीवारों पर अरबी शैली में कुरान की आयतें अंकित।
- यह एक शाही परिसर में स्थित है, जिसमें बुलंद दरवाजा और जामा मस्जिद भी हैं। 1606 में इसे जहांगीर द्वारा भी सजाया गया था।

पंचमहल
- पाँच मंजिला इमारत है।
- फतेहपुर सीकरी की सबसे ऊँची इमारत।
- हिन्दू शैली पर आधारित।
- यह खम्बों पर निर्मित है और फारसी बदगीर (Wind Catcher) की अवधारणा से प्रेरित है।
- विशेषता – इमारत के शीर्ष के ऊपर रखा सर्वोच्च गुंबद वाला मण्डप इसके मध्य में नहीं है। (अपवाद)

दीवान-ए-खास
- चौकोर कक्ष
- तीन ओर से खुले द्वार
- मध्य में नक्काशीदार स्तंभ जिसके शीर्ष पर पुष्पाकृति निर्मित है।
- जालीदार खिड़कियाँ
- पहली मंजिल पर सभागृह, जिसके चारों ओर आकर्षक छज्जा बना हुआ है।

तुर्कीबेगम का महल
- अंदर-बाहर सुंदर नक्काशी
- पशु-पक्षियों, वृक्षों सहित जंगल के दृश्यों को दर्शाया गया है।
- इसमें काष्ठकला का अनुसरण किया गया है।

बुलंद दरवाजा
- निर्माण – 1601 ई. में
- गुजरात पर अकबर का विजयोत्सव मनाने के लिए लाल बलुआ पत्थर की 40 मीटर ऊंची भव्य सरंचना के रूप में निर्मित।
- विश्व का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार
- आयताकार
- किनारे के दोनों भाग तीन (3) मंजिला एवं तीनों मंजिलों पर खिड़कियाँ
- मध्य भाग – मेहराब युक्त
- दरवाजे की दीवार और स्तम्भों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण की गई हैं।
- दरवाजे के तोरण पर ‘ईसा मसीह’ से संबंधित कुछ लाइनें लिखी हैं।
- जोधाबाई का महल या मरियम-उज-जमानी का महल (युग का मेरी) में घंटियों और फूलों के सुंदर हिन्दू भित्तिचित्र हैं।
- पचीसी आंगन एक आंगन है जहाँ अकबर शतरंज खेला करता था।
- हिरन मीनार का निर्माण अकबर के चहेते हाथी हिरण की याद में कराया गया था। यह यात्रियों के लिए एक प्रकाश स्तम्भ के रूप में भी कार्य करता था। इसे अनूठे रूप से डिजाइन किया गया और इसकी बाह्य दीवारों पर हाथी के दांत जैसे नुकीले कोने हैं।

मुग़लकाल की चित्रकला
- इस काल में पांडुलिपियों के अनुवाद और चित्रण की बड़ी परियोजनाएँ पूरी हुईं।
- अकबरकालीन चित्रकार – दसवंत, बसावन, लालमुकुन्द, गोवर्धन, मिस्किन, केशव, महेश, माधव, जगन्नाथ, खेमकरण तारा, हरिवंश
- अकबरकालीन मुगल चित्रकला में विषयवस्तु – राजनैतिक विजय, दरबार के मौलिक दृश्य, धर्म निरपेक्ष ग्रंथ, , महत्वपूर्ण व्यक्तियों की छवियों के साथ-साथ हिंदू पौराणिक, फ़ारसी व इस्लामिक विषय।
नोट – हम्जानामा
- आरंभ: हुमायूँ ने मीर सैयद अली व अब्दुस्समद को सौंपा, अकबर ने इसे पूरा कराया।
- विषयवस्तु: पैगंबर मुहम्मद के चाचा हमजा के वीरतापूर्ण कार्यों का चित्रण।
- पूरा नाम: दास्ताने अमीर हमजा।
- 1200 चित्र, 14 खंडों में विभाजित।
- चित्र बड़े आकार के, सतह कागज़ पर चिपकाए गए कपड़े की।
- गाउच (अपारदर्शी रंग) तकनीक व सफ़वी शैली का प्रयोग।
- 1400 पन्नों के चित्रण में 15 वर्ष लगे।
- अकबर ने संस्कृत ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद और चित्रण करवाया।
- महाभारत → रज़्मनामा (1589), दसवंत के निरीक्षण में 169 चित्र, मुहम्मद शरीफ द्वारा पर्यवेक्षित।
- रामायण का भी अनुवाद व चित्रण हुआ।
- अकबरनामा: अकबर की व्यक्तिगत व राजनैतिक ज़िंदगी पर आधारित असाधारण पांडुलिपि।
- चित्रकला में नवाचार:
- फॉरशॉर्टनिंग का उपयोग (निकट और दूर की वस्तुओं को परिप्रेक्ष्य में दिखाने की तकनीक, यूरोपीय प्रभाव)।
- यूरोपवासियों के संपर्क से चित्रों में यथार्थवाद का झुकाव बढ़ा।
- “मेडोना एंड चाइल्ड” (1580) – प्रारंभिक मुगल शैली का महत्त्वपूर्ण चित्र (मनोहर, वसावन द्वारा)।
- अकबर कालीन चित्रकला में
- चित्रकला पर ईरानी प्रभाव में कमी
- राजपूत चित्रकला का प्रभाव – लाल एवं गहरा फिरोजा रंग का प्रभाव।
- अकबर कालीन चित्रकला – नीला लाल पीला हरा गुलाबी एवं सिंदूरी रंग का प्रयोग।
