कुषाण साम्राज्य प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विषय के अंतर्गत अध्ययन करने योग्य एक महत्वपूर्ण साम्राज्य है। मध्य एशिया से आए कुषाणों ने भारत में व्यापक राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा दिया। कनिष्क के समय में कुषाण साम्राज्य अपने सर्वोच्च उत्कर्ष पर पहुँचा।
कुषाण साम्राज्य

कुषाणों की उत्पति
- कुषाणों की उत्पत्ति पर इतिहासकार एकमत नही है, इस सम्बन्ध में मान्यता प्राप्त मत यह है कि कुषाण पश्चिमी चीन के कान-सू प्रान्त के रहने वाली ‘यू-ची’ जाति से सम्बन्धित थे।
- लगभग 165 ई.पू. में हूणों द्वारा इस जनजाति को इनकी मातृभूमि से खदेड़ दिये जाने पर यू-ची नये स्थान की तलाश में विभिन्न संघर्षों के बाद आक्सस नदी घाटी के ताहिया (बैक्ट्रिया) प्रदेश में पहुँचे। ताहिया में उस समय शकों का शासन था। यू-ची जाति ने शकों को परास्त कर बैक्ट्रिया पर अधिकार कर लिया।
- यहीं पर रहते हुए यू-ची पाँच शाखाओं में विभक्त हो गए। इन शाखाओं में कुषाण शाखा सर्वाधिक शक्तिशाली थी अतः उसने शेष चारों शाखाओं पर विजय प्राप्त करके उनके राज्यों को भी अपने साम्राज्य में मिला लिया।
- इसी कारण यू-ची के स्थान पर कुषाण शब्द का प्रयोग होने लगा।
- कुषाण वंश का संस्थापक कजुल केडफिसिज था जिसका राज्य बैक्ट्रिया व गान्धार प्रदेश में था। उसका उत्तराधिकारी विम कडफिस था जिसने अपने साम्राज्य का विस्तार भारतीय प्रदेश मथुरा तक में किया था, साथ ही महाराज की उपाधि धारण की थी।
स्त्रोत
- कुषाणों के प्रारंभिक इतिहास पर चीनी इतिहास ग्रंथ बहुमूल्य प्रकाश डालते हैं।
- इसके अलावा भारतीय साहित्य तथा पुरातात्विक सामग्री-मुद्राओं, अभिलेखों, मूर्तियों और खुदाई में प्राप्त प्राचीन स्मारकों से भी कुषाण वंश के इतिहास पर व्यापक एवं प्रामाणिक जानकारी मिलती है।
प्रमुख कुषाण शासक
कुजुल कडफिसस (कडफिसेस I)
- कुषाण वंश का संस्थापक।
- राज्य – बैक्ट्रिया व गांधार क्षेत्र तक सीमित।
- कुषाण सत्ता की नींव रखी।
- सिक्कों पर यूनानी राजा हर्मियस की आकृति → आरंभ में उसके अधीन था।
- रोमन सिक्कों की नकल पर तांबे के सिक्के ढाले।
- उपाधि: महाराजाधिराज, धमथित/धर्मथिदस।
- सिक्के द्विलिपिक (यूनानी + खरोष्ठी)।
- झुकाव: बौद्ध धर्म की ओर।
- सिक्कों पर आगस्टस/टाइबेरियस की आकृतियाँ।
विम कडफिसस (कडफिसस II)
- भारत में कुषाण सत्ता का वास्तविक संस्थापक।
- पिता के साथ संयुक्त शासन, बाद में स्वतंत्र।
- गंधार क्षेत्र पर अधिकार (पहलवों से)।
- सोने, ताँबे, चाँदी के सिक्के चलाए।
- शैव मत का अनुयायी, उपाधि – महेश्वर।
- सिक्कों पर शिव, नंदी, त्रिशूल की आकृतियाँ।
- भारत में पहली बार स्वर्ण मुद्रा जारी।
- सिक्कों पर यज्ञ में लगे राजा की आकृति (पहली बार)।
- मथुरा (माट) से विम की सिंहासन प्रतिमा।
- उसके समय कपिसा से काश्यप मातंग व धर्मरत्न चीन भेजे गए।
- अंतिम शासक जिसके सिक्कों पर द्विभाषा व द्विलिपि (खरोष्ठी+यूनानी)।
- सोटर मेगस – तक्षशिला का राज्यपाल।
कनिष्क (78-101 ई.)
- कनिष्क कुषाण राजाओं में सबसे महान् था।
- अधिकांश विद्वानों के मतानुसार कनिष्क के राज्याभिषेक की तिथि 78 ई. मानी गई है।
- कनिष्क की महानता का अनुमान इस बात से भली-भांति लग जाता है कि उसका साम्राज्य पश्चिम में आक्सस नदी से पूर्व में गंगा नदी तक मध्य एशिया में खुरासन से लेकर उत्तर-प्रदेश में वाराणसी तक फैला था।
कनिष्क की सैनिक उपलब्धियाँ
कनिष्क एक महान विजेता और कुशल प्रशासक था। उसके शासनकाल में कुषाण साम्राज्य अपने शिखर पर पहुंचा। प्रारंभ में उसे अफगानिस्तान, सिंध, पार्थिया, बैक्ट्रिया और पंजाब का छोटा राज्य मिला।
1. पार्थिया पर अधिकार
- पार्थिया के शासक द्वारा कुषाण साम्राज्य पर आक्रमण करने के दो कारण-
- व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रदेश बैक्ट्रिया पर वह अधिकार करना चाहता था।
- एरियाना प्रदेश पर पहले पार्थिया का अधिकार था, किन्तु बाद में कुषाणों ने इस पर अधिकार कर लिया था, अतः पार्थिया का शासक एरियाना प्रदेश पर पुनः अधिकार करना चाहता था।
- डॉ. स्मिथ की मान्यता है कि ‘कनिष्क ने पार्थियनों के मूर्ख राजा संभवतया खुसरो को हराया था।’ इस युद्ध के बाद सम्पूर्ण पार्थिया प्रदेश कुषाण राज्य का अंग बन गया।
2. पाटलिपुत्र (मगध) को जीतना –
- कनिष्क ने साकेत और पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया। उसने पाटलिपुत्र के शासक को हराकर अश्वघोष और बुद्ध का भिक्षापात्र अपने साथ लाया। बौद्ध परंपराओं के अनुसार, इस विजय के बाद मगध में उसका प्रभुत्व स्थापित हो गया।
- सत्यकेतु विद्यालंकार के अनुसार मगध से सातवाहनों के शासन का अंत करने का श्रेय कनिष्क को ही है।
3. कश्मीर पर विजय
- डॉ. स्मिथ और कल्हण की “राजतरंगिणी” के अनुसार, कनिष्क ने कश्मीर पर विजय प्राप्त कर इसे अपने साम्राज्य में शामिल किया। यहीं पर उसने बौद्ध धर्म की चतुर्थ संगीति आयोजित की और कई विहारों व ‘कनिष्कपुर’ नामक नगर की स्थापना की।
4. उज्जैन पर विजय
- कनिष्क ने उज्जैन के शक शासकों को पराजित किया। उसने मालवा के कुछ हिस्सों पर अधिकार कर पश्चिमी भारत में कुषाण प्रभुत्व स्थापित किया।
5. मध्य एशिया की विजय
- चीनी इतिहास ग्रंथों से पता चलता है कि लगभग 90 ई. में कनिष्क ने हानवंश के सेनापति पान-चाओ (जिसने चीनी तुर्किस्तान को अपने अधिकार में ले लिया था), के विरूद्ध शक्तिशाली सेना भेजी।
- कनिष्क को इस युद्ध में महत्वपूर्ण विजय मिली, जिसके परिणामस्वरूप मध्य एशिया (चीनी तुर्किस्तान) के काशगर, यारकन्द एवं खोतान पर कनिष्क का अधिकार हो गया।
6. चीन पर आक्रमण
- चीनी तुर्किस्तान पर अधिकार के बाद कनिष्क का साम्राज्य पामीर की पहाड़ियों तक फैल गया और हान साम्राज्य की सीमाओं से जा लगा।
- चीन के हानवंशी सम्राट (हो-ति) को चीनी राजकुमारी से विवाह का प्रस्ताव भेजने पर सेनापति पान-चाओ ने इसे अपमान मानते हुए कुषाण दूत को बंदी बना लिया।
- कनिष्क ने 70,000 घुड़सवारों की सेना भेजी, लेकिन खराब मौसम के कारण यह विफल रही, और उसे चीन को कर देने के लिए विवश होना पड़ा।
- हालांकि, बाद में कनिष्क ने प्रतिशोध लेकर खोतान, काशगर और यारकंद पर अधिकार जमाया, जिससे चीनी जातियाँ भयभीत हो गईं और अपने राजकुमारों को बंधक के रूप में भेजा।
7. पेशावर पर चढ़ाई
- कनिष्क ने अपनी राजधानी पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) में स्थापित की। इसे भव्य स्मारकों, सार्वजनिक भवनों और बौद्ध विहारों से अलंकृत किया।
कुषाणों का साम्राज्य विस्तार
- इस प्रकार विभिन्न विजयों के द्वारा कनिष्क में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उपर्युक्त विजय के अलावा मुद्रा, अभिलेख और साहित्यिक स्रोतों से उसके साम्राज्य की सीमाएँ निर्धारित की जा सकती है।
- कौशाम्बी, सारनाथ, मथुरा से प्राप्त उसके अभिलेख यह संकेत देते है कि शासक के रूप में वह मूलतः पूर्वी प्रदेश से सम्बन्धित था तथा सम्पूर्ण उत्तर पर उसका अधिकार था।
- काशी तथा सारनाथ उसके साम्राज्य के इस भाग के केन्द्र स्थल थे। सिन्ध व पंजाब से प्राप्त उसके लेख वहाँ पर उसके अधिकार की पुष्टि करते हैं।
- चीनी स्रोत, गान्धार पर उसका अधिकार प्रमाणित करते हैं।
- मध्य प्रदेश के कुछ स्थानों से भी कनिष्क की मुद्राएँ और मथुरा शैली की मूर्तियाँ मिली है। ।
- इस प्रकार कनिष्क का साम्राज्य पूर्व में बिहार से लेकर पश्चिम खुरासान तथा उत्तर में पामीर से लेकर दक्षिण में कोंकण प्रदेश तक विस्तृत था।
प्रशासन –
- यूनानियों एवं शकों की भांति कनिष्क का शासन क्षत्रप प्रणाली पर आधारित था।
- सारनाथ के अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसका शासन प्रान्तीय क्षत्रपों के द्वारा होता था। एक की राजधानी मथुरा व दूसरे की संभवतः काशी थी।
- मथुरा में महाक्षत्रप खरपल्लन और काशी में वनस्पर प्रान्तीय शासक थे।
- इस शासन का स्वरूप बहुत कुछ सैनिक था और इसका संगठन बहुत मजबूत नहीं था। “दण्डनायक और महादण्डनायक पद कुषाण प्रशासकीय मशीनरी की कड़ी थे।
बौद्ध धर्म का पोषक कनिष्क
- कनिष्क भारतीय इतिहास में महान विजेता और बौद्ध धर्म के संरक्षक के रूप में प्रसिद्ध है। उसे “दूसरा अशोक” कहा जाता है।
- प्रारंभ में वह ईरानी, यूनानी और हिंदू देवताओं को मानता था, जिसका प्रमाण उसके सिक्कों पर मिहिर, अग्नि, अहुरमज्दा, हेलियोस, शिव आदि के चित्र हैं। बाद में पाटलिपुत्र से लाए गए बौद्ध विद्वान अश्वघोष से प्रभावित होकर उसने बौद्ध धर्म अपनाया।
- कनिष्क ने बौद्ध धर्म को संरक्षण देकर कनिष्कपुर, पुरुषपुर, मथुरा और तक्षशिला में स्तूप और विहार बनवाए।
- उसने धर्म प्रचार के लिए भिक्षुओं को मध्य एशिया, चीन, तिब्बत और जापान भेजा।
- हवेनसांग, राजतरंगिणी ने कनिष्क को बौद्ध धर्म का महान् संरक्षक एवं प्रचारक बताया है।
- चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन भी किया।
- धार्मिक सहिष्णुता रखते हुए अन्य धर्मों का सम्मान किया, जिसका प्रमाण उसके सिक्कों से मिलता है।
बौद्ध धर्म का विभाजन व चतुर्थ बौद्ध संगिति
- कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर के कुण्डलवन विहार में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। लगभग 500 बौद्ध विद्वानों ने इसमें भाग लिया था।
- इसमें वसुमित्र अध्यक्ष और अश्वघोष उपाध्यक्ष थे।
- छह माह तक चली इस सभा में त्रिपिटकों पर टीकाएँ लिखी गईं और उन्हें “महाविभाष” नामक ग्रंथ में संकलित किया गया। महाविभाष को बौद्ध धर्म का विश्व कोष कहा जाता है।
- तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के अनुसार बौद्ध सभा में बौद्ध धर्म के तत्कालीन 18 स्कूलों के मतभेदों का निवारण किया और इन सभी स्कूलों को धर्म-परायण स्वीकार कर लिया गया।
- इस सभा में बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयान और महायान शाखाओं में हुआ। महायान में मूर्ति-पूजा, स्वर्ग और धार्मिक क्रियाओं को अपनाया गया, जिससे इसकी लोकप्रियता बढ़ी।
- कनिष्क ने महायान को राजधर्म घोषित किया, जिससे बौद्ध धर्म का व्यापक प्रसार हुआ।
- बौद्ध धर्म की इस नई शाखा महायान के उदय के कारण बौद्ध धर्म का विकास तेजी से हुआ क्योंकि इसके सिद्धान्त सरल थे जिनका पालन जनसाधारण में एक गृहस्थ व्यक्ति भी सरलतापूर्वक कर सकता था।
कला व साहित्य की उन्नति
- कनिष्क एक महान विजेता और कला प्रेमी शासक था।
- उसने पेशावर, मथुरा, तक्षशिला और कनिष्कपुर में बौद्ध विहार, स्तूप और अन्य स्मारकों का निर्माण कराया।
- उसकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन मूर्तिकला के क्षेत्र में थी।
- तक्षशिला का सिरमुख नगर उसी ने स्थापित किया, जिसमें एक बड़ा भवन व विहार था।
- मथुरा उसकी कला का प्रमुख केंद्र था, जहां से उसकी सिर रहित मूर्ति मिली।
- मूर्ति-निर्माण और स्थापत्य की दृष्टि से कनिष्क के शासनकाल में तीन विभिन्न केन्द्रों में तीन प्रमुख शैलियों का विकास हुआ- मथुरा, अमरावती एवं गान्धार।
- कनिष्क की राजसभा में अनेक उच्चकोटि के दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं साहित्यकार रहते थे।
- कनिष्क के काल में साहित्य की विविध विधाओं का सर्वांगीण विकास हुआ। इस काल में पहली बार संस्कृत लेख लिखे गये। अश्वघोष, भास और शूद्रक इस विधा के महान साहित्यकार थे।
- अश्वघोष ने संस्कृत में ‘बुद्धचरित’ नामक महाकाव्य व ‘सौदरानन्द महाकाव्य, ‘सूत्रालंकार’ और ‘सारीपुत्र प्रकरण’ की रचनाएँ की।
- संस्कृत भाषा और उसकी उन्नति के साथ ही पाली व प्राकृत भाषा में भी इस युग में उत्कृष्ट रचनाएँ लिखी गई। बौद्ध सम्प्रदाय की प्रगति के फलस्वरूप अनगिनित अवदानों की रचना हुई जैसे दिव्यावदान आदि।
- शून्यवाद एवं सापेक्षवाद का प्रवर्तक नागार्जुन कनिष्क के दरबार की एक अन्य महान् विभूति था। वह केवल दार्शनिक ही नहीं, वैज्ञानिक भी था। उसने अपनी पुस्तक ‘माध्यमिक सूत्र’ में सापेक्षता का सिद्धान्त प्रस्तुत किया है। उसे ही भारतीय आइंस्टीन कहा गया है।
- चरक कनिष्क का राज्य वैद्य था उसकी रचना ‘चरक संहिता’ आयुर्वेद की अमूल्य निधि है।
- वसुमित्र, पार्श्व एवं संघरक्षक कनिष्क के समय के अन्य प्रसिद्ध विद्वान थे।
- उसके दरबार का एक मंत्री ‘मंथर’ प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ एवं कुशाग्र बुद्धि था।
- यूनानियों के सम्पर्क के बाद इस युग में भारतीय ज्योतिष में नवीन सिद्धान्तों की स्थापना हुई और खगोल विद्या की वैज्ञानिक प्रामाणिकता बढ़ी।
- मध्य एवं रोमन साम्राज्य के सम्पर्कों के परिणामस्वरूप प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई तकनीक विकसित जैसे तांबे के कुषाणकालीन सिक्के रोमन स्वर्ण मुद्राओं की नकल थे।
कुषाण मुद्रा –
- कुषाण युग के सिक्के बहुत बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं कनिष्क प्रथम, हुविष्क तथा वासिस्क ने सोने तथा ताँबे के सिक्के चलाए। उन्होंने चाँदी के सिक्के नहीं चलाए।
- कुषाण सिक्कों का एक रूचिकर लक्षण यह है कि कुषाण साम्राज्य के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के देवताओं को कुषाण सिक्कों पर अंकित किया है।
- शक सम्वत् – अधिकांश इतिहासकार एक मत है कि कनिष्क ने ‘सिंहसानुरुद्ध होने के समय 78 ई. से एक नया सम्वत् शुरू किया, यह शक सम्वत कहलाता है।
वासिष्क
- कनिष्क का उत्तराधिकारी।
- सिक्कों पर हिन्दू व ईरानी (आहुरमज्दा) देवताओं का अंकन।
हुविष्क (106–138 ई.)
- सत्ता का केन्द्र – मथुरा।
- सिक्कों पर शिव, स्कन्द, विष्णु, उमा (शृंगधारी रूप)।
- चतुर्भुजी विष्णु के सिक्के।
- उमा व पाशुपत धर्म का प्राचीनतम अंकन।
- कार्तिकेय के तीन रूप:
- महासेन
- स्कन्द कुमार-विषाख युग्म
- स्कन्द कुमार-महासेन-विषाख त्रिक
- मथुरा लेख – “श्रेणियाँ बैंक का कार्य करती थीं”; “आटा पीसने वाली श्रेणी” उल्लेख।
कनिष्क द्वितीय
- हुविष्क के साथ संयुक्त शासन।
- उपाधि: कैसर/सीजर (रोमन अनुकरण)।
- आरा शिलालेख (खरोष्ठी): “महरजस रजतिरज देवपुत्रस कैसरस”।
- “कैसर”(सीजर) उपाधि अपनाने वाला पहला शासक।
वासुदेव प्रथम (192–232 ई.)
- कुषाणों का अंतिम महान शासक।
- नाम भारतीय देवता पर।
- सिक्कों पर शिव, उमा, हाथी के साथ शिव।
वासुदेव द्वितीय (275–300 ई.)
- अंतिम कुषाण शासक।
- ससैनियन शासक शापूर ने पराजित किया → कुषाण वंश का अंत।
- इसके सिक्के: शिव–नंदी प्रकार → “ससैनियन-कुषाण सिक्के”।
विदेशी व्यापार की उन्नति (आर्थिक स्थिति)
- कनिष्क के समय विदेशी व्यापार में जबरदस्त उन्नति हुई, जिससे भारत आर्थिक रूप से समृद्ध राष्ट्र बन गया।
- स्थल और नदी मार्गों के विकास ने आंतरिक व्यापार को प्रोत्साहित किया, जबकि समुद्री मार्गों ने विदेशी व्यापार को सुदृढ़ बनाया।
- भारत का व्यापार रेशम मार्ग और समुद्री मार्गों के माध्यम से मध्य एशिया, चीन, रोम, बर्मा, श्रीलंका, जावा, सुमात्रा जैसे देशों से जुड़ा।
- कुषाणों ने “रेशम मार्ग” पर नियंत्रण कर चीन और रोमन साम्राज्य के बीच मध्यस्थता की, जिससे उन्हें भारी लाभ हुआ।
- भारत में हाथीदाँत का सामान, काली मिर्च, लौंग, मसाले, सुगन्धित पदार्थ और औषधियाँ तथा सूती व रेशमी कपड़े बड़ी मात्रा में रोम निर्यात किये जाते थें भारत की बारीक मलमल रोम में बहुत लोकप्रिय हुई। इस व्यापार का केन्द्र केरल प्रदेश था।
- व्यापार में वृद्धि के कारण भारत में सोने की मुद्रा का प्रचलन बढ़ा। कुषाण और इण्डोग्रीक शासकों ने बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के चलाए।
- इस युग में मथुरा, पेशावर, जालंधर, और लुधियाना जैसे नगरों का विकास हुआ। खुदाई से प्राप्त अवशेष इस समृद्धि और नगरीकरण के प्रमाण देते हैं।स्वयं सम्राट कनिष्क एक बड़ा निर्माता था जिसने कनिष्कपुर और सिरमुख सहित अनेक नगरों की स्थापना की थी।
- पुरूषपुर या पेशावर उसकी प्रथम और मथुरा उसकी द्वितीय राजधानी थी, जो कुषाण कालीन समृद्धि का प्रतीक बन गई थी।
धार्मिक जीवन
- मौर्योत्तर काल में राजत्व की एक विशिष्ठ अवधारणा उभर कर आई इसमें कुषाण राजाओं ने अपनी तुलना देवताओं से की। उन्होंने देवपुत्र की उपाधी धारण की।
- वस्तुतः इन विदेशी शासकों की सामाजिक स्वीकृति हेतु धार्मिक वैधता आवश्यक थी।
- ऐसी पद्धति समकालीन रोमन, यूनानी और ईरानी पद्धति में विद्यमान थी, इन्होंने सिक्कों पर भी अपने चित्र छापकर अपने प्रभामण्डल को राजतत्त्व से देवतत्त्व सिद्धान्त जैसा प्रतिपादित किया है।
प्रशासन
- उपाधियाँ: शाही, शाहानुशाही, देवपुत्र (कनिष्क प्रथम द्वारा आरंभ)।
- द्वैध/संयुक्त शासन प्रणाली (बाद में शकों ने अपनाई)।
- देवकुल स्थापना (राजाओं की मूर्तियाँ): माट, सुर्खाकोटल, खलयान, स्यालकोट से प्रमाण।
- अधिकारी पद: दण्डनायक, महादण्डनायक (सैनिक अधिकारी)।
- ग्राम शासन – ग्रामिक द्वारा।
- अक्षयनवी (न्यास संपत्ति) की परंपरा आरंभ।
