प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अध्ययन में भाषाओं और साहित्य का विकास महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस काल में संस्कृत, प्राकृत और तमिल भाषाओं ने न केवल ज्ञान, धर्म और संस्कृति के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई, बल्कि भारतीय साहित्य को भी समृद्ध बनाया।
- प्राचीन भारत का साहित्य
- मध्यकालीन साहित्य
- आधुनिक भारत का साहित्य
प्राचीन भारत का साहित्य
- धार्मिक साहित्य
- लौकिक साहित्य
धार्मिक साहित्य
- ब्राह्मण साहित्य – वेद, उपनिषद, महाकाव्य आदि
- ब्राह्मणेतर साहित्य – बौद्ध व जैन साहित्य
ब्राह्मण साहित्य :
वैदिक साहित्य
- वैदिक साहित्य से तात्पर्य चारों वेदों, (ऋग्वेद सामवेद, यजुर्वेद अथर्व वेद) ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यक, उपनिषद से है। हालांकि कुछ जगह पर उपवेद रखा गया है लेकिन उपवेदों की रचना बहुत बाद की है इसलिए उसको वैदिक साहित्य का अंग नहीं मानते।
- आर्यों को लिपि का ज्ञान नहीं था इसलिए वैदिक ज्ञान ऋषि-मुनियों को आत्मज्ञान के रूप में ईश्वर से मिला था। उन्हें ज्ञान को ऋषि-मुनियों ने श्रुति के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया इन्हीं कारणों से वैदिक साहित्य को श्रुति साहित्य भी कहा जाता है।
- वैदिक साहित्य को अपौरुषेय तथा नित्य माना जाता है। इसके संकलनकर्ता के रूप में महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को माना जाता है।
- चारों वेदों में प्रथम 3 वेदों को वेदत्रयी कहा जाता है।
- वेद शब्द “विद्” धातु से उत्पन्न है जिसका अर्थ है – ज्ञान, विचार। “ज्ञान” का ही दूसरा नाम वेद है।
- ‘वेद’ शब्द ज्ञान का प्रतीक है और ये ग्रंथ वास्तव में पृथ्वी पर और उससे परे अपने समस्त जीवन का संचालन करने हेतु मनुष्यों को ज्ञान उपलब्ध कराने के विषय में हैं।
- इन्हें काव्यात्मक शैली में लिखा गया है और इनकी भाषा प्रतीकों और मिथकों से भरी है।
- प्रारंभ में वेद ब्राह्मण परिवारों की पीढ़ियों द्वारा मौखिक रूप से प्रदान किए जाते थे लेकिन इतिहासकारों द्वारा अनुमान लगाया जाता है कि 1500 ईसा पूर्व-1000 ईसा पूर्व के आसपास इन्हें संकलित किया गया।
- वेदों की रचना करने वालों को ‘दृष्टा’ कहा गया है।
- हिंदू परंपरा में, ये पवित्र क्योंकि – उत्पत्ति दैवीय हैं जिन्हें सदैव मनुष्यों का मार्गदर्शन करने के लिए देवताओं द्वारा विहित किया गया है।
- हमारे जीवन पर भी इनका बड़ा प्रभाव है क्योंकि ये ब्रह्मांड और उसके निवासियों को एक बड़े परिवार का हिस्सा मानते हैं तथा “वसुधैव कुटुम्बकम” का उपदेश देते हैं।
- सभी वेदों में यज्ञ (बलि) को प्रमुखता दी गई है। ब्राह्मण, उपनिषद और आरण्यक प्रत्येक वेद के साथ जुड़े हुए हैं।
ऋग्वैदिक साहित्य
इसके अंतर्गत केवल ऋग्वेद शामिल है।
ऋग्वेद
- संपूर्ण ऋग्वेद-संहिता छंद के रूप में है, जिसे ऋक् के नाम से जाना जाता है।’ऋक्’ उन मंत्रों को दिया गया नाम है जो देवताओं की स्तुति के लिए हैं। इस प्रकार
- ऋग्वेद में कुल दस मंडल एवं 1028 सूक्त और 10,600 मंत्र हैं। इन 1028 सूक्तों में से 11 बालखिल्य सूक्त हैं, जो कि हस्तलिखित प्रतियों में परिशिष्ट के रूप में हैं। बालखिल्य सूक्त आठवें मंडल में हैं।
- ऋचः का शाब्दिक अर्थ है– छंदों और चरणों में गूढ़ मंत्र अथवा छंदोबद्ध मंत्रों को ऋचः या ऋचा कहा जाता है।
- ऋग्वेद की रचना 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच मानी जाती है।
- शौनकाचार्य नामक परंपरागत पंडित के अनुसार ऋग्वेद की पांच शाखाएं हैं– शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन तथा मांडुकायन।
- इनमें से वर्तमान में शाकल संहिता ही उपलब्ध है।
- ऋग्वेद संहिता के केवल दो ब्राह्मण, दो आरण्यक तथा दो उपनिषद ही मिलते हैं, जो इस प्रकार हैं –
- ऐतरेय ब्राह्मण तथा कौषीतकि (शांखायन) ब्राह्मण
- ऋग्वेद का पहला एवं दसवाँ मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया है। प्रथम मंडल के 50 सूक्त कण्व ऋषियों के द्वारा लिखे गये हैं।
- ऋग्वेद का पहला व दसवाँ मंडल सबसे बड़ा (दोनों में 191 सूक्त) है।
- 10वें मंडल में पुरुष सूक्त, नदी सूक्त, नासदीय सूक्त, सूर्य सूक्त (विवाह सूक्त), हिरण्यगर्भ सूक्त प्रमुख हैं।
- ऋग्वेद के सभी मंडलों के रचयिता अलग-अलग ऋषि हैं –
- पाठ
- साकल – 1017 सूक्त
- वालखिल्य – 11 सूक्त
- वास्कल – 56 सूक्त (अब उपलब्ध नहीं)
- अश्वलोयन
- शंखायन
उत्तर वैदिक साहित्य
इसमें सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण साहित्य, आरण्यक एवं उपनिषद् शामिल।
सामवेद
- नामकरण ‘समन’ (राग) के नाम पर, राग या गीतों पर केंद्रित
- कुल सूक्तो की संख्या – 1549 जिनमे से 75 सूक्त नए है। अत: इसे कही न कही ऋग्वेद [ऋग्वेद की शाकल शाखा से लिए गए] से संबध मान लिया जाता है। ग्रिफ़िथ द्वारा अनुवादित सामवेद के संशोधन में कुल 1,875 छंद गिने गए हैं। इसमें अग्नि, इंद्र और अन्य देवताओं का वर्णन।
- इसके सूक्तो को गायन करने वाले पुरोहित को उद्गाता कहा कहा जाता है।
- साम का अर्थ गायन होता है।
- सामवेद, भारतीय संगीत से संबधित प्राचीनतम ग्रन्थ है।
- 7 स्वरों का सर्वप्रथम उल्लेख सामवेद में ही प्राप्त होता है।
- इसके महत्त्व को स्थापित करते हुए श्रीमद भागवत गीता में कृष्ण ने कहा है की “मै वेदों में सामवेद हु”।
- इसमें श्लोक, पृथक् छंद और 16, 000 राग (संगीतात्मक स्वर) और रागनियाँ हैं।
- ग्रंथ की लयबद्ध प्रकृति के कारण – ‘गायन पुस्तक’
- तीन शाखाए –
- जैमिनी
- कौथूम
- राणायनीय
यजुर्वेद
- ‘यजु’ शब्द ‘यज्ञ’ का प्रतीक है और यह वेद वैदिक काल में प्रचलित विभिन्न प्रकार के यज्ञों के कर्मकाण्डों और मंत्रों पर केंद्रित है।
- विषय – बलिदान, समर्पण, यज्ञ
- इसके दो (2) भाग हैं –
- शुक्ल यजुर्वेद
- उत्तर भारत में प्रचलित।
- सबसे प्रामाणिक शाखा।
- वाजसनेयी संहिता भी कहा जाता।
- कृष्ण यजुर्वेद
- दक्षिण भारत में सर्वाधिक मान्यता है।
- तैत्तरीय संहिता भी कहा जाता।
- गद्य एवं पद्य दोनों में रचित है / चम्पू काव्य शैली में।
- इसमें सूक्तो की संख्या 1990। मन्त्र – लगभग 4000
- यजुर्वेद में यज्ञ से संबधित अनुष्ठानिक तथा कर्मकांडीय विधियों का उल्लेख।
- इसके मंत्रो के उच्चारण करने वाले पुरोहितो को अध्वर्यु कहा जाता है।
अथर्ववेद
- वेदत्रयी का भाग नहीं है।
- अन्य नाम –
- अथर्वा आंगीरस वेद
- भीषच वेद
- लोक प्रिय वेद।
- गद्य एवं पद्य दोनों में रचित।
- इसमें 20 अध्याय, 731 सूक्त तथा 5987 मन्त्र।
- अथर्व ऋषि के नाम पर इस वेद का नाम अथर्ववेद पड़ा।
- इसके अलावा अंगीरस ऋषि के नाम पर इसे अथर्व अंगीरस के नाम से भी जाना जाता है।
- अथर्ववेद के सूक्तो का उच्चारण करने वाला पुरोहित को ब्रह्म कहा जाता है।
- शाखाए
- पिप्पलद
- शौनकीय
- इस वेद में विशेष रूप से वशीकरण, जादू टोना, भूत प्रेत तथा औषधियों, कृषि का वर्णन।
- मुख्य रूप से मानव समाज की शांति और समृद्धि से संबंधित है और मनुष्य के दैनिक जीवन के सभी पहलुओं को आ च्छादित करता है, वहीं यह विशेष रूप से कई रोगों के उपचार पर भी केंद्रित है। इस ग्रंथ को लगभग 99 रोगों के लिए उपचार परामर्श देने के लिए भी जाना जाता है।
- इसके अलावा शल्य चिकित्सा सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में ही मिलता है। साथ ही मगध तथा अंग का उल्लेख सुदूर वर्ती प्रदेशो के रूप में मिलता है। यहाँ मगध के लोगो को भृत्य एवं ब्राह्मणों को निचले दर्जे का कहा गया।
- इसी वेद में राजा परीक्षित का उल्लेख मिलता है।
- सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रिया कहा गया है।
- इसके ‘केन सुक्त’ को चिकित्सा विज्ञान की जन्मस्थली कहा जाता है। इसमें शरीर के विभिन्न अंगों और उनसे संबंधित रोगों व उपचारों का वर्णन किया गया हैं।
- अथर्ववेद के ‘भूमि सुक्त’ में राष्ट्र की प्रथम अवधारणा का उल्लेख मिलता है।
- मातृभूमि की अवधारणा का प्रथम उल्लेख भी अथर्ववेद में ही किया गया है।
संहिताएं (Samhitas)
- यह मंत्रों और मंगलकामनाओं की पुस्तकें हैं।
- सभी चार वेदों की अपनी स्वयं की संहिताएं हैं।
- हालांकि संहिताएं वैदिक ग्रंथों तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि कई उत्तर वैदिक संहिताएं भी हैं।
- संहिताएं मूल रूप से स्तुतिग्रन्थ हैं, परन्तु इसमें व्याख्यायें नहीं हैं।
ब्राह्मण ग्रन्थ
- ब्राह्मण वेदों के गद्य भाग, जिनके द्वारा वेदों को समझने में सहायता मिलती है।
- ब्राह्मण ग्रंथो में विशेष रूप से यज्ञो का अनुष्ठान तथा कर्मकांडीय महत्त्व को दर्शाया गया है।
- यहाँ ब्राह्मण शब्द से अभिप्राय ब्रह्म शब्द से है जिसका अर्थ यज्ञ होता है।
- इनका मूल कर्मयोगिय है।
- ब्राह्मण हिंदू श्रुति (प्रकट ज्ञान) साहित्य का भाग हैं। प्रत्येक वेद के साथ एक ब्राह्मण संलग्न है जो अनिवार्य रूपेण विशेष वेद पर टिप्पणियों वाले ग्रंथों का संग्रह हैं। ब्राह्मण सामान्यतः किंवदंतियों, तथ्यों, दर्शन और वैदिक अनुष्ठानों की विस्तृत व्याख्या का मिश्रण हैं।
- इतिहासकार ब्राह्मणों की तिथि निर्धारण को लेकर असहमत हैं, लेकिन सामान्यंतः 900-700 ईसा पूर्व के बीच इनकी रचना और संकलन का अनुमान लगाया जाता है।
- प्रमुख ब्राह्मण ग्रन्थ –
- ऐतरेय ब्राह्मण – राजा की विभिन्न उपाधियो का उल्लेख, पुत्र के महत्त्व का वर्णन तथा उसे संसार सागर से पार लगाने वाली नौका है। शानू शुप की कथा का वर्णन। इसमें कहा गया है की ‘ब्राह्मण, राजा पर आश्रित है परन्तु राजा से श्रेष्ठ है।’ उत्तरवैदिक काल में प्रचलित विभिन्न दिशाओं में शासन व्यवस्था का उल्लेख।
- शतपथ ब्राहमण – लेखक याज्ञवल्क्य थे। सर्वाधिक प्राचीन सबसे बड़ा ब्राहमण ग्रन्थ इसमें यजुर्वेद के उपबंधो का वर्णन मिलता है, इसमें विदेय माधव की कथा, जल प्लावन की कथा, गार्गी का याज्ञवल्क्य से संवाद, जजमानी प्रथा, कृषि का उल्लेख, पुरुरवा – उर्वशी, राम कथा तथा पुनर्जन्म सिद्धांत, च्यवन ऋषि को यवन दान की कथा वर्णन। सर्वप्रथम कराधान और राजा के राज्याभिषेक का उल्लेख।
- तैतरीय ब्राहमण – अधिक से अधिक अन्न के उत्पादन में बल दिया गया।
आरण्यक
- आरण्यक का अर्थ – वन में लिखा जाने वाला साहित्य।
- आरण्यक में रहस्यवादी बातो का वर्णन है। साथ ही यज्ञ व कर्मकांडो का वर्णन है।
- ब्राह्मण ग्रंथों के परवर्ती अंश आरण्यक कहलाते।
- जन्म, मृत्यु और आत्मा के आगे के जीवन से संबंधित हैं।
- विषय – “रहस्यात्मक एवं दार्शनिक ज्ञान” (इसमें सर्वप्रथम दार्शनिक प्रश्नों को अभिव्यक्त किया गया।
- ये वानप्रस्थी व्यक्तियों द्वारा पढ़े और पढाये जाते थे जैसे मुनि और अरण्यों में रहने वाले व्यक्ति
- सर्वप्रथम नगर की रचना तैतरीय आरण्यक में मिलता है।
उपनिषद
- उप तथा निष् धातु से बना है। उप का अर्थ – समीप तथा निष् का अर्थ – बैठना। उपनिषद का अर्थ ‘वह शास्त्र या विद्या जो गुरु के निकट बैठकर एकांत में सीखी जाती है।’
- उपनिषद वेदों का अंतिम भाग है इसीलिए इसे वेदांत कहा जाता है।
- उपनिषदों में दार्शनिक बाते की गयी है। जो ज्ञान पर बल देता है साथ ही ब्रह्म और आत्मा के संबधो को निरुपित करता है।
- उपनिषदों को मानव जीवन के विषय में ‘सत्य’ और मानव मुक्ति या मोक्ष की ओर मार्ग दिखालाने वाला कहा जाता है। इनमें मानव जाति के सामने आने वाली अमूर्त और दार्शनिक समस्याओं, विशेष रूप से इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति, मानव जाति की कल्पित उत्पत्ति, जीवन और मृत्यु के चक्र और मनुष्य के भौतिक व आध्यात्मिक अन्वेषण के विषय में बात करना जारी रखा गया है।
- मुक्तिका सिद्धांतन- 200 उपनिषदों में से 108 उपनिषदों के समूह को मुक्तिका सिद्धांत कहा जाता है। इसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है क्योंकि यह 108 संख्या हिंदू माला में मोतियों की संख्या के बराबर है।
- उपनिषदों और आरण्यक के बीच मात्र सूक्ष्म भेद हैं जिसे इस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है:
| उपनिषद | आरण्यक |
| ज्ञान-कांड | कर्म-कांड |
| ज्ञान/आध्यात्मिकता खण्ड | कर्मकांडीय कर्म/यज्ञ खण्ड |
नोट – उपनिषदों की कुल संख्या 108 है लेकिन 10 उपनिषद ही विशेष महत्व है।
- सबसे प्राचीन उपनिषद छान्दोग्य उपनिषद है।
| छान्दोग्य उपनिषद | पुनर्जन्म की अवधारणा , देवकी पुत्र श्री कृष्ण का पहला उल्लेख, तीन आश्रमों का उल्लेख, बौद्ध धम्म का पंचशील सिद्धांत मिलता |
| मुण्डकोपनिषद् | सत्यमेव जयते, इसमें यज्ञ को व्यर्थ बताते हुए फूटी हुई नाव बताया, द्वैतवाद का प्रसिद्ध वाक्य (द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया) अर्थात् आत्मा और परमात्मा रूपी दो सुन्दर पक्षी परस्पर सख्यभाव से सम्पृक्त हैं |
| ईशोपनिषद् | “ईशावास्यम्” (या ईशावास्योपनिषद्), निष्काम कर्म की अवधारणा, गीता के कर्मयोग का आधार, प्राचीनतम उपनिषद् |
| बृहदारण्यकोपनिषद | तमसो मा सद्गमय, याज्ञवल्क्य गार्गी संवाद, सबसे बड़ा उपनिषद |
| तैतरीय उपनिषद | अतिथि देवो भव, अन्न का महत्त्व, मातृ देवों भव, पितृ देवो भव, बौद्ध धम्म के अष्टांगिक मार्ग का उल्लेख |
| कठोपनिषद् | यम नचिकेता संवाद, कर्मकांड की आलोचना, श्रेय एवं प्रेय (विषय वासना का मार्ग) का दिग्दर्शन कराते हुए श्रेय मार्ग को श्रेष्ठ बतलाया |
| जाबालोपनिषद | चार आश्रमों का उल्लेख |
| माण्डुक्यउपनिषद | सबसे छोटा उपनिषद, ॐ कार की मार्मिक व्याख्या, आत्मा के विभिन्न रूपों का वर्णन, चैतन्य की चार अवस्थाओं जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तथा चैतन्य का विशद विवेचन |
| श्वेताश्वरोपनिषद | शैव सिद्धांत का प्रतिपादन, भक्तितत्व |
नोट – श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदों को सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है जिनमें प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों का तात्त्विक विवेचन है। ये वेदान्त के तीन मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं। इनमें उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, भगवद्गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्रों को न्याय प्रस्थान कहते हैं।
| वेद | संहिता | ब्राह्मण | आरण्यक | उपनिषद | उपवेद | |
| ऋग्वेद | साकल, वालखिल्य, वास्क्ल | ऐतरेय, कौषीतकी | ऐतरेय, कौषीतकी | ऐतरेय, कौषीतकी | आयुर्वेद | |
| सामवेद | कौथुम, जैमिनीय, राणायनीय | पंचविश, षड्विश, जैमिनीय | जैमिनीय, छान्दोग्य | जैमिनीय, छान्दोग्य, केन | गंधर्ववेद | |
| यजुर्वेद | शुक्ल | वाजसनेयी | शतपथ | वृहदारण्यक | वृहदारण्यक, ईश | धनुर्वेद |
| कृष्ण | काठक, मैत्रेयी, तेतरिय | तेतरीय | शतपथ | मैत्रेय, कठ, श्वेताश्व | ||
| अथर्ववेद | शौनक, पीपलाद | गोपथ | मुण्डक, मांडूक्य, प्रश्न | शिल्पवेद | ||
तंत्र साहित्य:
- यह वैदिक प्रथाओं के लिए एक वैकल्पिक आध्यात्मिक मार्ग प्रस्तुत करता है, तथा जाति और लिंग बाधाओं से परे आध्यात्मिक खोज को लोकतांत्रिक बनाता है।
- संहिताओं, आगमों और तंत्रों से मिलकर बने इन ग्रंथों को ज्ञान (ज्ञान), योग (ध्यान), क्रिया (अनुष्ठान क्रिया) और चर्या (आचरण) में वर्गीकृत किया गया है।
- तंत्र ने हिंदू और बौद्ध प्रथाओं को गहराई से प्रभावित किया है, तथा आध्यात्मिक ज्ञान और दिव्य मिलन के लिए मंत्र, यंत्र और ध्यान तकनीकों पर जोर दिया है।
वैदिकोत्तर साहित्य
मुख्यत : वेदांग एवं उपवेद को रखा जाता है।
- वेदांग
- वेदों को सही ढंग से समझने के लिए वेदांग की रचना हुई जिसकी कुल संख्या 6 बताई गई –
- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष
- पाणिनि के अनुसार वेदांग की तुलना शरीर के अंगो से की गयी – मुख (व्याकरण), नासिका (शिक्षा), कान(निरुक्त), हाथ (कल्प), नेत्र (ज्योतिष), पैर (छंद)
- कल्प वेदांग को सूत्र वेदांग भी कहा जाता है तथा कल्प वेदांग के चार (4) भाग हैं –
- श्रोत सूत्र – व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का उल्लेख।
- गृह सूत्र – पारिवारिक व सामाजिक जीवन से संबंधित अनुशासन या कानूनों का उल्लेख।
- धर्म सूत्र – कानूनों की पुस्तक। यह ‘गौतम धर्म सूत्र’ सामवेद पर आधारित पुस्तक है।
- शुल्व सूत्र – ज्यामिति की उत्पत्ति इसी से मानी जाती है।
- व्याकरण और शिक्षा वेदांग के प्रणेता ‘पाणिनी’ द्वारा रचित ‘अष्टाध्यायी’ (6 शताब्दी ई.पू. में रचना) व्याकरण की प्रथम पुस्तक है।
- ‘अस्पृश्यता’ का उल्लेख सर्वप्रथम ‘अष्टाध्यायी’ में।
स्मृति साहित्य
- ये विधि-विधान संबंधी ग्रंथ हैं।
- इनमें धार्मिक, सामाजिक व आर्थिक कानूनों की जानकारी दी गई है।
मनु स्मृति
- रचना – शुंग काल व सातवाहन काल में।
- इसमें स्त्री तथा पुरुष के लिए आचार-संहिता, उनके आपसी संबंध तथा समाज में उनकी भूमिका को बताया गया है।
- यह सबसे प्राचीन स्मृति ग्रंथ है।
- 12 अध्याय और 2684 श्लोक
- पद्यात्मक शैली
- टीकाकार – कुल्लक भट्ट [‘मन्वर्थ मुक्तावली’], भारूची, गोविन्दराज [‘मन्वाशयानसारिणी टीका’], मेधातिथि [मनुभाष्य]
- मनु स्मृति के विषय में ‘नित्शे’ का कथन है –“बाइबल जला दो एवं मनु स्मृति अपनाओ।“
- मनुस्मृति को संभवतः 200 ईसा पूर्व और 200 ईस्वी के दौरान लिखा और संकलित किया गया था।
अन्य स्मृति ग्रंथ
- याज्ञवल्क्य स्मृति
- नारद स्मृति (दास प्रथा का उल्लेख)
- कात्यायन स्मृति (आर्थिक कानूनों की जानकारी)
गुप्तकाल में हिन्दू विधियों का संकलन
गुप्तकाल में – मनुस्मृति के आधार पर नारद, बृहस्पति, कात्यायन, याज्ञवलक्य आदि स्मृतियों में कानून का संकलन हुआ।
- याज्ञवलक्य – व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी है। इसमें धर्म, वर्ण, आश्रम, विधि समाज, प्रायश्चित, राज्य शास्त्र आदि पक्षों का उल्लेख है। टीकाकार – विश्वरूप, विज्ञानेश्वर, अपरार्क
- नारद स्मृति में व्यवहार व न्यायिक विचार,
- बृहस्पति में दीवानी व फौजदारी दोनों पक्षों का विवेचन किया।
- कात्यायन में कानून के चार अंग धर्म, व्यवहार चरित्र और राजशासन बताया।
नोट – मिताक्षरा, याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका है, रचना 11वीं शताब्दी में हुई। यह ग्रन्थ ‘जन्मना उत्तराधिकार’ (inheritance by birth) के सिद्धान्त के लिए प्रसिद्ध।
श्रुति एवं स्मृति में भेद
- श्रुति और स्मृति दोनों ग्रन्थों की उन श्रेणियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका उपयोग हिन्दू परंपरा के अंतर्गत कानून का शासन स्थापित करने में किया जाता है।
- श्रुति एकमात्र दैविक उत्पत्ति है उनमें नियमों की कोई भी अवधारणा नहीं है। अतः इसको अलग-अलग श्लोकों के बजाय संपूर्णता में सुरक्षित रखा गया है। श्रुति में सस्वर पाठ और उसके दैविक गुणों को सुरक्षित रखने की इच्छा की जाती है न कि स्मृति की भाँति आवश्यक रूप से उस मौखिक परंपरा को समझने और व्याख्या करने की।
पुराण
- अर्थ – ‘पुराने का नवीनीकरण करना’।
- प्राचीन भारतीय पौराणिक ग्रंथ
- इनमें ब्रह्मांड के निर्माण के विषय में कथात्माक कहानियां है और ब्रह्मांड के कल्पित विनाश तक इसके इतिहास का वर्णन करते हैं। इनमें राजाओं, नायकों, संतों, यक्ष यक्षिणियों की कहानियां हैं, लेकिन यह दिव्य हिंदू त्रिमूर्ति या त्रयीतीन भगवानों: ब्रह्मा, विष्णु और महेश पर केंद्रित है।
- 18 प्रमुख पुराण (महापुराण) और प्रत्येक पुराण किसी विशेष देवता को प्रमुखता देता है और उनसे संबंधित दार्शनिक और धार्मिक अवधारणाओं की व्याख्या करता है।
- इनका विकास उस समय से माना जा सकता है जब बौद्ध धर्म का महत्त्व बढ़ रहा था और वह ब्राह्मण संस्कृति का मुख्य विरोधी बन रह था।
- लोहमर्ष ऋषि एवं उनके पुत्र उग्रक्षवा ने पुराणों की रचना की।
- वेदों की सत्यता स्पष्ट करने के लिए पुराणों की रचना की गई थी।
- आरंभ में पुराणों का संकलन गुप्तकाल में किया गया था।
- पुराणों का ऐतिहासिक महत्व है।
- सर्वप्रथम ‘पार्जीटर’ द्वारा पुराणों का ऐतिहासिक महत्व समझाया गया था।
- पांच प्रमुख विषयों पर आधारित हैं, जैसा कि गुप्त काल के संस्कृत कोशकार अमर सिंह द्वारा बताया गया है:
- सर्ग – ब्रह्मांड की रचना
- प्रतिसर्ग – विनाश और पुनर्निर्माण का आवधिक चक्र
- मनवंतर – मनु के जीवनकाल की अवधि
- वंश (चंद्र और सूर्य) – देवताओं और ऋषियों की सूर्य और चंद्र राजवंशों की वंशावलियां
- वंशानुचरित – राजाओं का राजवंशीय इतिहास।
प्रमुख पुराण –
- मत्स्य पुराण – सबसे प्राचीन पुराण, शुंग वंश व सातवाहन वंश की जानकारी का स्रोत है।
- वायु पुराण – गुप्त वंश की जानकारी प्राप्त होती है।
- मार्कण्डेय पुराण – दुर्गा सप्तशती इसी का भाग है।
- विष्णु पुराण – मौर्य वंश की जानकारी मिलती है।
- इनमें वैदिकोत्तर भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन के विषय में उपाख्यान हैं और इतिहासकारों को भूगोल, इतिहास और वंशवादी वंशावलियों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
- पुराणों का विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद और वितरण किया गया है। पुराण अपने संदेश का प्रसार करने के लिए दृष्टान्तों और दंतकथाओं का उपयोग करते हैं:
- दृष्टान्त – लघु कथाएँ जो गद्य या पद्म में हैं, आध्यात्मिक, नैतिक या धार्मिक शिक्षा का वर्णन करती हैं। ये सामान्यतः मानव चरित्र का चित्रांकन करते हैं।
- दंतकथाएं – लघु कथाएँ जो गद्य या पद्य में हैं, सारगर्भित कहावत या चतुराई भरी कहानी के माध्यम से ‘शिक्षा’ का वर्णन करती हैं।
ये पशुओं, निर्जीव वस्तुओं, पौराणिक प्राणियों, पौधों का चित्रांकन करते हैं जिन्हें मानव सदृश गुण दिए गए हैं। जैसे – विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र [जानवरों के माध्यम से विश्व के विषय में नैतिक शिक्षा और ज्ञान वाली कई कहानियां सम्मिलित], नारायण पंडित लिखित हितोपदेश।
उप-पुराण
- आम जनता में पुराण इतने लोकप्रिय थे कि इन्होंने उप-पुराण या लघु पुराण कहलाने वाली एक और उप-शैली को जन्म दिया। लगभग 18 लघु पुराण हैं।
महाभारत और रामायण
- दो महान रचनाओं को महाकाव्य भी कहा जाता है क्योंकि ये हिन्दू धर्म का पालन करने वाले लोगों की सामूहिक स्मृति का भाग बन गए हैं।
रामायण
- रचयिता: ऋषि वाल्मीकि (आदिकवि), इसलिए रामायण को आदिकाव्य कहा जाता है।
- संस्करण:
- प्रारंभ में 6000 श्लोक, वर्तमान में 24,000 श्लोक।
- इसे ‘चतुर्विंशतिसहस्र संहिता’ भी कहा जाता है।
- रचना काल: लगभग 1500 ईसा पूर्व। (पहली बार)
- राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण, रावण।
- 7 काण्ड (अध्याय)
- बालकाण्ड
- अयोध्या काण्ड
- अरण्य काण्ड
- किष्किंधा काण्ड
- सुंदर काण्ड
- लंका/युद्ध काण्ड
- उत्तरकाण्ड
महाभारत: विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य
- रचयिता: वेद व्यास द्वारा संस्कृत में रचित।
- प्रारंभिक रूप:
- 8,800 छंद – ‘जय’ या ‘विजय’ की कथा।
- विस्तार के बाद 24,000 छंद – नाम ‘भारत’।
- वर्तमान में 1,00,000 छंद, इसे इतिहास पुराण भी कहा जाता है।
- संरचना:
- विषय-वस्तु:
- भगवान राम के आदर्श चरित्र के माध्यम से चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का ज्ञान।
- सीता का हरण, राम-रावण युद्ध, और बुराई पर अच्छाई की विज
- मुख्य पात्र:
- 8,800 छंद – ‘जय’ या ‘विजय’ की कथा।
- विस्तार के बाद 24,000 छंद – नाम ‘भारत’।
- वर्तमान में 1,00,000 छंद, इसे इतिहास पुराण भी कहा जाता है।
- संरचना:
- 10 पर्व (अध्याय) में विभाजित।
- कथानक:
- हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए कौरवों व पांडवों के संघर्ष की कहानी।
- भगवान कृष्ण कथा के सूत्रधार व मार्गदर्शक।
- भगवद गीता:
- महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक ग्रंथ।
- अर्जुन और कृष्ण का संवाद – कर्तव्य, धर्म, अहिंसा बनाम हिंसा, कर्म बनाम अकर्म पर गहन चर्चा।
- निष्काम कर्म (निःस्वार्थ कर्तव्यपालन) का उपदेश।
- दर्शन:
- धर्म के विभिन्न प्रकारों का विश्लेषण।
- मानव जीवन व आध्यात्मिकता के लिए मार्गदर्शिका।
- राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण, रावण।
- 7 काण्ड (अध्याय)
- बालकाण्ड
- अयोध्या काण्ड
- अरण्य काण्ड
- किष्किंधा काण्ड
- सुंदर काण्ड
- लंका/युद्ध काण्ड
- उत्तरकाण्ड
ब्राह्मणेतर साहित्य
पालि और प्राकृत में साहित्य
- वैदिकोत्तर काल के दौरान, संस्कृत के अतिरिक्त, प्राकृत और पालि में भी साहित्य की रचना की गई।
- प्राकृत वह शब्द है जिसे मानक भाषा यानी संस्कृत से किसी भी भाषा से शिथिल ढंग से जोड़ा जाता है।
- पालि का सामान्यतः प्राकृत के आदि या पुराने रूप का संकेत करने के लिए प्रयोग किया जाता है और यह कई वर्तमान बोलियों को जोड़ती है।
- इन भाषाओं ने तब प्रमुखता प्राप्त की जब बौद्धों और जैनियों के धार्मिक साहित्य की इस भाषा में रचना की जाने लगी।
बौद्ध साहित्य
- बौद्ध धर्म के साहित्यिक स्रोत मुख्यतः पालि भाषा में रचित हैं।
- बौद्ध ग्रंथ तीन भागों में विभाजित हैं जिन्हें त्रिपिटक कहा जाता है।
- पिटक = टोकरी (Basket)।
- त्रिपिटक की रचना गौतम बुद्ध के निर्वाण के पश्चात् की गई।
- “त्रिपिटक” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग रीज डेविड्स ने अपनी पुस्तक Buddhist India में किया।
- त्रिपिटकों को सर्वप्रथम श्रीलंका के राजा वतगामनी के शासन में ई.पू. पहली शताब्दी में लिपिबद्ध किया गया।
- त्रिपिटकों पर लिखी गई व्याख्या ग्रंथों को अट्ठकथा (Atthakatha) कहा गया।
| पिटक | रचना | भाग | विवरण |
| विनय पिटक (अनुशासन की टोकरी) | प्रथम बौद्ध संगीति में उपाली ने | सुत्तविभंग (महाविभंग: भिक्षुओं के लिए नियमभिक्खुनिविभंग: भिक्षुणियों के लिए नियम),खन्धक (महावग्ग, चुल्लवग्ग),परिवार,पातिमोक्ख (मठवासी अनुशासन की मूल संहिता) | बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए आचरण के नियमों का एक संग्रह; संघ की कार्यप्रणाली, नियमावली की व्याख्या; अनुशासन भंग पर दंड का प्रावधान |
| सुत्त पिटक (प्रवचन की टोकरी)[गद्य- पद्य का मिश्रण] | प्रथम बौद्ध संगीति में, सर्वप्रथम मौखिक पाठ आनंद ने किया | दीघनिकाय,मज्झिमनिकायसंयुत्तनिकाय,अंगुत्तरनिकाय,खुद्दकनिकाय [धम्मपद और सुत्त-निपात शामिल, थेरिगाथा (भिक्षुणियों द्वारा लघु कविताओं का एक संग्रह), थेरगाथा (वरिष्ठ भिक्षुओं को दिए गए छंद) क्रमशः खुद्दक निकाय की आठवीं और नौवीं पुस्तकें हैं] | नैतिकता और धर्म से संबंधित बुद्ध के संवाद और उपदेश सम्मिलित |
| अभिधम्म पिटक (उच्च सिद्धांत की टोकरी) | तृतीय बौद्ध संगीति | धम्मसंगणि,विभंग,धातुकथा,पुग्गलपंञति,कथावत्थु,यमक,पथन | दर्शन और तत्वमीमांसा पर केंद्रित, बौद्ध धर्म के दर्शनों, सिद्धांतों और मनोविज्ञान का एक विस्तृत विश्लेषण |
नोट – बौद्ध विद्वानों ने उक्त त्रिपिटक की अनेक व्याख्याएँ आदि लिखी हैं, जिन्हें अट्ठकथा (अर्थकथा) के नाम से जाना जाता है। अट्ठकथाएँ भी पालि भाषा में हैं।
अट्ठकथाएँ ये हैं-
- समन्तपासादिका (विनय-अट्ठकथा)
- सुमंगलविलासिनी (दीघनिकाय-अट्ठकथा)
- पपंचसूदनी (मज्झिमनिकाय-अट्ठकथा)
- सारत्थपकासिनी (संयुत्तनिकाय-अट्ठकथा)
- मनोरथपूरणी (अंगुत्तरनिकाय-अट्ठकथा)
- अभिधम्मपिटक की भिन्न-भिन्न अट्ठकथाएँ
नोट – बौद्ध संदर्भ में, सुत्त (संस्कृत सूत्र से) उन ग्रंथों को संदर्भित करता है जिनमें माना जाता है कि बुद्ध ने स्वयं क्या कहा था। बुद्ध का पहला स्पष्ट जीवनी विवरण निदानकथा (पहली शताब्दी) में मिलता है।
बौद्ध नॉन कैनोनिकल साहित्य
- जातक कथाएँ
- बौद्ध नॉन-कैनोनिकल साहित्य का सबसे अच्छा उदाहरण।
- सुत्तपिटक अंतर्गत खुद्दकनिकाय का 10वां भाग है।
- बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियों का संकलन।
- बोधिसत्व या (भविष्य) के बुद्ध की कहानियों की भी इन जातकों में चर्चा।
- इन कहानियों में बौद्ध धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार है, तथापि ये संस्कृत और पालि में भी उपलब्ध। प्रत्येक जातक कथा एक नैतिक या आचारिक शिक्षा देती है, तथा करुणा, ज्ञान, उदारता और आत्म-बलिदान जैसे गुणों पर बल देती है।
- बुद्ध के जन्म की प्रत्येक कहानी जातक कथा के समतुल्य है।
- इन कथाओं में लोकप्रिय कहानियों, प्राचीन पौराणिक
- अन्य बौद्ध नॉन कैनोनिकल ग्रंथ
- कथाओं के साथ-साथ 600 ईसा पूर्व और 200 ईसा पूर्व के बीच उत्तर भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का संयोजन है।
- लंका, बर्मा और सिआम में प्रचलित परम्परा के अनुसार जातक 550 हैं। जातक के वर्तमान रूप में 547 जातक कहनियाँ पाई जाती हैं।
- पाँच वर्गों में विभाजित किया है-
- पच्चुपन्नवथु – बुद्ध के वर्तमान अनुयायियों का संग्रह
- अतीतवत्थु – इसमें अतीत की कथाँए संगृहीत
- गाथा
- वैय्याकरण – गाथाएँ व्याख्यायित की गई है।
- समोधन
- कुछ जातक कथाओं के नाम वेणिसंहार, कण्डिन, शिवी, शम, छदंत, रूरू, वेस्सांतर
| ग्रंथ | रचनाकार | भाषा | विवरण |
| दीपवंश | अनुराधापुरा महाविहार के कई भिक्षु | पाली | श्रीलंका का सबसे पुराना ऐतिहासिक अभिलेख; थेरवादी परंपरा का महिमामंडन; अशोक की पुत्री थेरी संगमिता के आगमन का वर्णन; बुद्ध की श्रीलंका यात्रा और बुद्ध के अवशेषों का उल्लेख; महावंश का स्रोत माना जाता है |
| महावंश (Great Chronicle) | महानामा | पाली | 37 अध्याय; विजय द्वारा सिंहल साम्राज्य की स्थापना; बुद्ध की मृत्यु से 3री बौद्ध संगीति तक बौद्ध इतिहास; अशोक के श्रीलंका अभियान और महाविहार की स्थापना का वर्णन |
| कुलवंश (Mahavamsa का दूसरा भाग) | धम्मकिट्टी थेरो | पाली | महावंश की आगे की कथा; सिंहल राजाओं की वंशावली और इतिहास |
| मिलिंदपन्हो (Milinda’s Questions) | नागसेन | पाली | इंडो-ग्रीक राजा मिनेंडर (मिलिंद) और भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद; बौद्ध धर्म के जटिल प्रश्नों का सरल समाधान |
| नेत्तिपकरण (मार्गदर्शन की पुस्तक) | महाकच्चन | पाली | पौराणिक बौद्ध ग्रंथ; कभी-कभी खुद्दक निकाय में सम्मिलित; दो भाग — संघावारा, विभागवारा; बौद्ध शिक्षाओं की व्याख्या के लिए मार्गदर्शक |
| पेटकोपदेश | महाकच्चन | पाली | नेत्तिपकरण से संबंधित ग्रंथ; बौद्ध सिद्धांतों की व्याख्या और शिक्षण पद्धति |
संस्कृत में बौद्ध ग्रंथ :-
- महावस्तु एवं ललित विस्तार में महात्मा बुद्ध के जीवन (जीवनी) का वर्णन मिलता है।
| संस्कृत बौद्ध ग्रन्थ | लेखक |
| बुद्धचरित (महाकाव्य) | अश्वघोष |
| सौन्दरानन्द (महाकाव्य) | अश्वघोष |
| सारिपुत्र प्रकरण (नाटक) | अश्वघोष |
| सूत्रालंकार | अश्वघोष |
| विभाषा शास्त्र | वसुमित्र |
| अभिधर्मकोश | वसुबंधु |
| वज्रच्छेदिका | वसुबंधु |
| योगाचार भूविज्ञान | मैत्रेयनाथ |
| मनुष्यान्त विभंग | मैत्रेयनाथ |
| पंच भूमि | असंग |
| अभिधर्म समुच्चय | असंग |
| महायान संग्रह, महायान सूत्रालंकार | असंग |
| माध्यमिक कारिका | नागार्जुन |
| युक्ति षष्टिका | नागार्जुन |
| अष्ट सहस्र प्रज्ञापारमिता शास्त्र | आर्यदेव |
| चतुः शतक | शांतिदेव |
| शिक्षा समुच्चय | शांतिदेव |
| सूत्र समुच्चय | शांतिदेव |
| बोधिचर्यावतार | शांतिदेव |
| तत्व संग्रह | शांति रक्षित |
जैन साहित्य

- भगवान महावीर के उपदेशों को मौखिक रूप से और विधिपूर्वक कई ग्रंथों (शास्त्रों) में, उनके तात्कालिक शिष्यों, जिन्हें गणधर कहा जाता है, और बड़े भिक्षुओं, जिन्हें श्रुत-केवली कहा जाता है, ने संकलित किया।
- प्राकृत और अर्ध मागधी में लिखने के अतिरिक्त, काल, क्षेत्र और अपना समर्थन करने वाले संरक्षकों के आधार पर जैन भिक्षुओं ने कई अन्य भाषाओं में भी लिखा था। दक्षिण भारत में संगम काल के दौरान उन्होंने तमिल में लिखा। उन्होंने संस्कृत, शौरसेनी, गुजराती और मराठी में भी लिखा।
- जैन साहित्य को व्यापक रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – ‘जैन आगम नामक धर्मवैधानिक’ या धार्मिक ग्रंथ और धर्मेत्तर साहित्यिक रचनाएं।
- जैन साहित्य का विकास
- जैन तीर्थंकर के दिव्य उपदेश – समवशरण कहा जाता था , जिसे तपस्वियों और आम लोगों ने सुना।
- इन प्रवचनों को श्रुत ज्ञान कहा जाता था और इसमें हमेशा 11 अंग और 14 पूर्व होते थे।
- श्रुत ज्ञान को उनके शिष्यों द्वारा सुत्त में परिवर्तित किया।
- तत्तावार्थ सूत्र: जैन ग्रंथ उमास्वामी द्वारा संस्कृत में लिखे गए।
- इसका एक सूत्र, परस्परोपग्रहो जीवनम्, जैन धर्म का आदर्श वाक्य है।
- श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों में प्रामाणिक।
जैन आगम
- पवित्र ग्रंथ और इन्हें जैन तीर्थकरों की शिक्षाएं।
- मूल रूप से गणधरों द्वारा संकलित किया गया बताया जाता है जो महावीर के करीबी शिष्य थे।
- श्वेतांबरों के लिए ये ग्रंथ महत्वपूर्ण।
- संकलन – प्रथम जैन संगीति (300 ई.पू.) में पाटलिपुत्र में तथा वर्तमान अंगों को मध्य 5 वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान वल्लभी (गुजरात) में आयोजित श्वेतांबर पंथ के भिक्षुओं की परिषद में पुर्नसंकलित किया गया बताया जाता है।
- दिगम्बर संप्रदाय का मानना है कि मूल शिक्षाएं बहुत समय पहले लुप्त गई थीं और वे वल्लभी में संकलित आगम का प्राधिकार स्वीकार नहीं करते हैं।
- “आगम” में 46 ग्रंथ सम्मिलित हैं. जिनमें से 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्णक, 4 मूलसूत्र, 6 छेदसूत्र, 2 चुलिका सुत्र हैं।
- अर्ध-मागधी प्राकृत भाषा में लिखा गया है। अंग, जीवन के सभी प्रकार के लिए आदर, शाकाहार, तपश्चर्या, दया और अहिंसा की कठोर संहिताएं सिखाते हैं।
- 12 अंग हैं –
- आचारांग सूत्रः सबसे प्राचीन आगम, क्षमाश्रमण देवर्धिगणि द्वारा पुनः संकलित और संपादित, महावीर की शिक्षाओं के आधार पर संकलित [जैन मुनियों के जीवन के लिए आचार नियम।]
- सूत्रकृतांगः जैन भिक्षुओं के लिए आचार संहिता, तत्वमीमांसा आदि का वर्णन करता है।
- स्थानानंग सूत्र
- समवयंग सुत्रः जैन धर्म के सार, खगोल शास्त्र, गणित आदि पर चर्चा।
व्याख्याप्रजनापति या भगवती सूत्र –
महावीर के जीवन तथा कृत्यों एवं उनके समकालीनों का वर्णन। इसमें सोलह महाजनपदों का उल्लेख है। [रचना जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के सुधर्मस्वामी ने की थी, यह जैन प्राकृत में लिखा गया है।
- ज्ञात्रधर्म कथा / नायाधम्मकहा – महावीर की शिक्षाओं का संग्रह।
- उपासकदशा
- अंतक्रदशा
- अनुत्राउपापातिकदशा
- प्रश्नव्याशकरणानीः पापों का विवरण
- विपक्षसूत्रः कहानियां और उदाहरण
- दृष्टिवदः 14 पूर्व सम्मिलित हैं
- 12 उपांग – इसमें ब्राह्मण का वर्णन, प्राणियों का वर्गीकरण, खगोल विधा, काल विभाजन, मरणोपरान्त जीवन का वर्णन आदि।
- 10 प्रकीर्ण – जैन धर्म से संबंधित विधि विषयों का वर्णन।
- 6 छेदसूत्र – इसमें भिक्षुओं के लिए उपयोगी नियम तथा विधियों का संग्रह।
- नादि सूत्र एवं अनुयोग सूत्र – जैनियों के शब्द कोष है। इसमें भिक्षुओं के लिए आचरण संबंधी बातें है।
- दिगंबरों के लिए दो प्राचीनतम ग्रंथ सबसे पवित्र हैं – कर्मप्रभृत (कर्म पर चर्चा) या शतखंडगम और कश्यपप्रभूत।
शतखंडगम
- लेखक: पुष्पदंत और भूतबलि
- भाषा: प्राकृत
- कर्म और उसका आत्मा से संबंध, साथ ही कर्म की प्रकृति।
- संक्षिप्त गद्य में लिखा गया, मुख्यतः सूत्रात्मक शैली में ।
- छह भागों में विभाजित –
- जीव स्थान (जीवित प्राणियों की श्रेणियाँ)
- क्षुद्रक बंध (बंधन की सूक्ष्मता)
- बन्धस्वामित्व (बंधन का स्वामित्व)
- वेदना (धारणा)
- महाबंध (महान बंधन)
- वर्गणा (कर्मों का विभाजन)
कश्यपप्रभूत।
- दूसरी से तीसरी शताब्दी ई. में भिक्षु गुणभद्र द्वारा संकलित ।
- 180 श्लोक
- वीरसेन ने इसे प्राकृत और संस्कृत में लिखना शुरू किया और जिनसेना ने इसे 820 ई. में पूरा किया।
- यह भी पूर्वों पर आधारित है ।
- यह संसार की वस्तुओं के प्रति वासनाओं – कषायों – या आसक्ति से संबंधित है।
- श्वेताम्बर ग्रन्थ
| ग्रन्थ | लेखक | ग्रन्थ विवरण |
| योगशास्त्र | हेमचंद्र | सामान्य लोगों और तपस्वियों के लिए आचरण के नियमों पर एक ग्रंथ तथा भाषा: संस्कृत |
| त्रिषष्ठिशलाकापुरुषचरित | 63 महान प्राणी जो प्रत्येक अर्ध-काल चक्र के दौरान प्रकट होते हैं। | |
| परिशिष्टपर्वण | प्रारंभिक जैन शिक्षकों का इतिहास विस्तृत | |
| अर्हन्निति | जैन दृष्टिकोण से राजनीति पर ग्रन्थ |
हेमचन्द्र सूरी के अन्य ग्रन्थ –
काव्यानुशासन, छन्दानुशासन, सिद्धहैमशब्दानुशासन (प्राकृत और अपभ्रंश का ग्रन्थ), उणादिसूत्रवृत्ति, देशीनाममाला, अभिधानचिन्तामणि, द्वाश्रय महाकाव्य, काव्यानुप्रकाश,अलङ्कारचूडामणि, प्रमाणमीमांसा. वीतरागस्तोत्र
| ग्रन्थ | लेखक | ग्रन्थ विवरण |
| ज्ञानार्णव या योगप्रदीपाधिकार | शुभचंद्र | विभिन्न विषयों पर आधारित एक संस्कृत ग्रन्थ है, जो मुख्य रूप से ध्यान पर केंद्रित |
| योगदृष्टिसमुच्चय | हरिभद्र सूरी | आठ दृष्टियों का वर्णन किया है जो योग साधना के लिए महत्वपूर्ण |
| शास्त्रवार्तासमुच्चय | ||
| ध्यानशतक | ||
| समराइच्चकहा | एक राजकुमार के जीवन और उसके द्वारा प्राप्त ज्ञान का वर्णन नैतिक शिक्षा देने के लिए लिखी गई | |
| हरिभद्र सूरी के अन्य ग्रन्थ – श्रावकधर्मविधि, यतिदिनकृत्य,श्रर्मपरीक्षा, महावीरस्तव, सामाचारीप्रकरण | ||
दिगम्बर ग्रन्थ
| ग्रन्थ | लेखक | विवरण |
| उवासगधरम स्तोत्र | भद्रबाहू (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व – जैन धर्म में अंतिम श्रुत केवलिन), सबसे बड़े जैन भिक्षुओं में से एक थे और चंद्रगुप्त मौर्य के शिक्षक, दिगंबर संप्रदाय के अगुआ | |
| कल्प सूत्र (जैन तीर्थंकरों की आत्मकथा) | संस्कृतजैन तीर्थंकरों, विशेषकर पार्श्वनाथ और महावीर की जीवनियाँ सम्मिलित | |
| लीलावतीसार | आचार्य जिनरत्न | यह आत्माओं के एक समूह के जीवन की कहानियां बताता है, जब वे अंतिम मुक्ति के मार्ग पर अवतारों की एक श्रृंखला से गुजरते हैं । |
| समयसार | आचार्य कुन्दकुन्द | कर्म, आस्रव, बंध और मोक्ष जैसी जैन अवधारणाओं की व्याख्या। |
| नियमसार | मोक्ष के मार्ग पर प्रकाश डालता | |
| प्रवचनसार | ||
| रत्न करन्द श्रावकचर (जैन गृहस्थ का जीवन) | समंतभद्र स्वामी | दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपासभाषा: संस्कृत |
| आप्तमीमांसा | ||
| सर्वार्थसिद्धि | पुज्यपादा | तत्त्वार्थ सूत्र पर सबसे पुरानी टिप्पणी भाषा: संस्कृत |
| त्रिशस्तिलक्षणा महापुराण | जिनसेन [प्रसिद्ध जैन भिक्षु वीरसेन के शिष्य] | राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष के शासन काल में रचितदो भाग – पहला भाग (आदि पुराण) – जिनसेन द्वारा संस्कृत में दूसरा भाग (उत्तर पुराण) – गुणभद्र [जिनसेन का शिष्य] अपभ्रंश में |
| धवला | कश्यपप्रभूत पर टीका | |
| नोट – हरिवंशपुराण ग्रन्थ अन्य जिनसेन ने लिखा था। | ||
अन्य जैन ग्रन्थ
| ग्रन्थ | लेखक | विवरण |
| शिलप्पादिकारम [नूपुर की कहानी”] | इलंगो आदिगल | दूसरी-तीसरी शताब्दी ई. में तमिल साहित्य के सबसे महान महाकाव्यों में से एकग्रंथ के केन्द्र में कन्नगी है जिसने पांड्य वंश के न्याय व्यवस्था की गलती से अपना पति खोने पर उसके राज्य पर अपना प्रतिशोध उतारा। |
| जीवक चिंतामणी | तिरुतक्कतेवर | तमिल साहित्य का एक महाकाव्य |
| नलतियर | प्राचीन तमिल ग्रंथ जैन भिक्षुओं द्वारा लिखित | |
| तत्वार्थ सूत्र | उमास्वामि | पहली दूसरी शताब्दी ईस्वीतर्क, ज्ञानमीमांसा, आचार और खगोल विज्ञान परसंस्कृत में महत्वपूर्ण जैन रचना है। |
गैर धार्मिक साहित्य
- संस्कृत नाटक
- नाटक काव्य और गद्य की सबसे लोकप्रिय शैलियों में से एक लोकप्रिय रोमांटिक कहानियां हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य जनता का मनोरंजन करना या लोकरंजन था।
- सामान्यतः कहानियों के रूप में लिखा गया था फिर भी इनमें जीवन पर अद्वितीय दृष्टिकोण दिया गया था।
- प्रदर्शन, अभिनय, हाव-भाव, मंच निर्देश और अभिनय के संबंध में नियमों का भरत (प्रथम ईसा पूर्व प्रथम ईस्वी) के नाट्यशास्त्र में वर्णन किया गया है।
- संस्कृत काव्य
- इस शैली को काव्य या कविता भी कहा जाता है।
- नाटक खण्ड में जहाँ कहानी ग्रंथ का मुख्य केंद्र बिंदु होती है वहीं इसमें कविता प्रकार, शैली, अलंकारों आदि पर अधिक केंद्रित होती है, सबसे महानतम संस्कृत कवियों में से एक कालिदास हैं।
1. कालिदास
- कवि कुलगुरु की उपाधि
- संस्कृत कवियों में श्रेष्ठ
दो काव्य :-
(i) रघुवंश –
- भगवान राम के वंश की कहानी
- सर्ग- 19, रीति-वैदर्भी।
- विषय – इक्ष्वाकुवंश के विभिन्न राजाओं का विस्तृत वर्णन
- गृहस्थ जीवन की श्रेष्ठता का प्रतिपादन ।
- रघुवंशी राजाओं के उच्च आदर्शों का द्योतन।
- सभी रसों के प्रकाशक प्रसाद गुण से परिपूर्ण।
(ii) कुमार संभव
- सर्ग-8, रीति-वैदर्भी।
- विषय : शिव-पार्वती के विवाह तथा कुमार कार्तिकेय के जन्म की कथा।
- कालिदास के श्रृंगार रस के प्रति विशिष्ट आकर्षण का द्योतक।
दो अर्द्धकाव्य :-
(i) मेघदूत –
- पति की वेदना [एक यक्ष द्वारा मेघ को अपने प्रियतमा के पास संदेश ले जाने के लिए प्रेरित करने का एक मार्मिक वर्णन], मालिनी और मंदाक्रांता छंदों का प्रयोग, श्रृंगार रस का प्रयोग
(ii) ऋतुसंहार –
- छह सर्गों में विभाजित है, जिसमें भारत की छह ऋतुओं – ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत का सुंदर वर्णन, मुख्य रूप से शृंगार रस का प्रयोग।
नाटक
(i) मालविकाग्निमित्रम्-

कालिदास की प्रथम नाट्य कृति, शुंग राजकुमार अग्निमित्र व मालविका की कहानी, शृंगार रस का प्रयोग, पाँच अंकों में विभाजित
प्रमुख पात्र
- अग्निमित्र: विदिशा का राजा
- मालविका: मालवदेश की राजकुमारी
- धारिणी: अग्निमित्र की रानी
- विदूषक: एक हास्य पात्र
(ii) विक्रमोर्वशीयम् –
राजकुमार पुरूरवा एवं उर्वशी की कहानी, पांच अंकों में विभाजित, शृंगार रस का प्रयोग
प्रमुख पात्र
- पुरुरावा: एक राजा
- उर्वशी: एक अप्सरा
- गंधर्व: एक देवता
- विदूषक: एक हास्य पात्र
(iii) अभिज्ञान शाकुन्तलम
- राजा दुष्यन्त एवं शकुन्तला की कहानी
- कालिदास की सर्वश्रेष्ठ एवं अन्तिम रचना
- पाँच अंकों का नाटक
- प्रथम भारतीय पुस्तक जिसका यूरोपीय भाषा में अनुवाद हुआ।
प्रमुख पात्र
- दुष्यंत: एक राजा
- शाकुन्तला: एक अप्सरा मेनका की संतान
- कान्व ऋषि: शकुंतला के दत्तक पिता
- दुर्मुख: दुष्यंत का मंत्री
2. भास
नाटक
- कुल 13 नाटकों की रचना की थी, जिन्हें सामूहिक रूप से भास नाटक चक्र के नाम से जाना जाता है।
- नाटकों की खोज 20वीं सदी की शुरुआत में टी. गणपति शास्त्री द्वारा।
(i) स्वप्नवासवदत्ता :-
- वत्स के शासक उदयन एवं अवन्ति के शासक प्रद्यौत की पुत्री वासवदत्ता की कहानी
- यह भारत का प्रथम नाटक था।
- 6 अंक
- प्रधान रस शृंगार
- अन्य नाटक – प्रतिमा: एक राजकुमारी की प्रतिमा के साथ एक राजकुमार का प्रेम प्रसंग, अभिषेक: एक राजकुमार का राज्याभिषेक और उसके बाद होने वाली घटनाओं का वर्णन, मध्यम व्यायोग: एक व्यापारी की कहानी, कर्णभार, पंचरात्र: पांच रातों में घटित होने वाली घटनाओं पर आधारित, उरुभंग: शिव और पार्वती के विवाह से संबंधित, बाल चरित, दूतवाक्य, दूत घटोत्कच, प्रतिज्ञायौगन्धरायण: एक राजकुमारी की कहानी है जो एक योगी बनने का निर्णय लेती, अविमारक, दरिद्र चारुदत्त: एक गरीब विद्वान चारुदत्त की कहानी
3. शुद्रक :-
(i) मृच्छकटिकम [नाटक]-
- शब्दिक अर्थ – मिट्टी की छोटी गाडी
- प्रथम पुस्तक जिसमें एक आम आदमी को नायक बनाया।
- नाटक की मुख्य कहानी एक गरीब विद्वान चारुदत्त और एक वेश्या वसंतसेना के प्रेम की है। उनके प्रेम की परीक्षा कई विपत्तियों और सामाजिक बाधाओं से होती है। शक्तिशाली शक शासक पुष्यमित्र शुंग भी वसंतसेना से आकर्षित होता है और उसे पाने के लिए कई चालें चलता है।
(ii) पद्मप्रभृतका
4. विशाखादत्त
(i) मुद्राराक्षस
- राजनीतिक नाटक
- सात अंक और इसका प्रमुख रस वीर
- भारत में सत्ता में राजा चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण का वर्णन
- इसमें चन्द्रगुप्त मौर्य को वृषल कहा गया है।
- संस्कृत का ऐतिहासिक नायिका विहीन नाटक।
- रचना चौथी शताब्दी में।
- इसमें चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य संबंधी ख्यातवृत्त के आधार पर चाणक्य की राजनीतिक सफलताओं का अपूर्व विश्लेषण मिलता है।
- इस कृति की रचना पूर्ववर्ती संस्कृत-नाट्य परंपरा से सर्वथा भिन्न रूप में हुई है- लेखक ने भावुकता, कल्पना आदि के स्थान पर जीवन-संघर्ष के यथार्थ अंकन पर बल दिया है। यह भारत का प्रथम जासूसी ग्रंथ माना जाता है।
- इस महत्त्वपूर्ण नाटक को हिंदी में सर्वप्रथम अनुदित करने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को है।
- मुद्रा राक्षस से मौर्यवंश, गुप्तकाल व नंद वंश की जानकारी मिलती है।
(ii) देवी चन्द्र गुप्तम्
- गुप्त वंश के शासक रामगुप्त की पत्नी देवी तथा उनके छोटे भाई चंद्रगुप्त द्वितीय की कहानी
(iii) राघवानन्द नाटकम्
5. भवभूति
- तीन नाटक
(i) महावीरचरित:
- महावीर स्वामी के जीवन पर आधारित
(ii) मालतीमाधव:
- मालती और माधव के प्रेम की कहानी को चित्रित किया
(iii) उत्तर रामचरितम् (राम का परवर्ती जीवन)।
- इसमें राम और सीता के वनवास, सीता के अपहरण और राम द्वारा रावण का वध जैसी घटनाओं को चित्रित किया गया है।
- इसे 700 ईस्वी में लिखा गया था।
6. हर्षवर्धन
- 3 संस्कृत नाटकों की रचना की
(i) रत्नावली
- श्रीलंका के राजा की पुत्री राजकुमारी रत्नावली और राजा उदयन की प्रेम कहानी के संबंध में।
- इसमें हम पहली बार होली उत्सव का उल्लेख पाते हैं।
(ii) नागानन्द
- गरुड़ देवता को साँपों की बलि देने से रोकने के लिए किस प्रकार राजकुमार जीमूतवाहन ने अपना शरीर त्याग दिया था, उसकी कहानी।
- एक भक्ति नाटक
- इस नाटक में एक अनोखा चरित्र नंदी पद्य में भगवान बुद्ध का आह्वान है
(iii) प्रियदर्शिका
- उदयन और राजा दृढ़वर्मन की पुत्री प्रियदर्शिका का संयोग
अन्य संस्कृत काव्य
7. भारवि
- भारवि ने संस्कृत महाकाव्य को एक नई दिशा दी। इनके पहले के कवि कथावस्तु के विकास पर अधिक ध्यान देते थे, वर्णनों पर कम। भारवि ने कथानक से अधिक सम्बद्ध वस्तु के
- वर्णन-वैचित्र्य को महत्त्व दिया। महाकाव्य की इस पद्धति को अलंकृत पद्धति या विचित्र मार्ग कहा गया है।
- भारवि का काल 500 ई. से 600 ई. के बीच माना गया है।
- ऐहोल अभिलेख (634 ई.) में भारवि का नाम कालिदास के साथ लिया गया है।
(i) किरातार्जुनीयम्
- सर्ग-18
- विषय- इन्द्रकील पर्वत पर दिव्य अस्त्र प्राप्त करने वाले अर्जुन और किरातवेशधारी भगवान् शंकर के युद्ध का वर्णन।
- इस महाकाव्य के प्रसिद्ध नीतिवाक्य-
- हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः। सहसा विदधीत न क्रियाम्।।
- समय- छठी शताब्दी ।
- भारवि की कविता को नारियल के फल के समान कहा गया है, जो ऊपर से रूक्ष है, किन्तु भीतर से सरस है।
प्रसिद्ध काव्य
| लेखक | ग्रन्थ | ग्रन्थ विवरण |
| भट्टि[संस्कृत शास्त्र काव्य-परम्परा का आरम्भ किया] | रावणवध (भट्टिकाव्य) | समय – छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध एवं सातवीं शताब्दी का आरम्भ।विषय– रामायण की कथा का सरल एवं संक्षिप्त रूप में वर्णन ।22 सर्ग |
| कुमारदास | जानकीहरण | विषय- राम की कथा पर आधारितसमय छठी शताब्दी ।20 सर्ग |
| माघराजस्थान के भीनमाल या श्रीमाल निवासी। समय – 700 ई. माना जाता है। भारवि शिव का यशोगान करते हैं, तो माघ विष्णु का। | शिशुपालवध | समय – 700 ई.।विषय – कृष्ण द्वारा शिशुपाल के वध की कथा का वर्णन20 सर्ग मेघे माघे गतं वयः। |
| श्रीहर्ष [कान्यकुब्जनरेश जयचन्द्र की सभा में रहते थे] | नैषधीयचरित | समय- 12वीं शताब्दीविषय– निषध देश के राजा नल के जीवन का वर्णन है।नल और दमयन्ती के परस्पर प्रेम तथा विवाह 22 सर्ग |
| खण्डनखण्डखाद्य |
नोट –
- बृहत्त्रयी – भारवि, माघ और श्रीहर्ष इन तीनों के महाकाव्यों (किरातार्जुनीय, शिशुपालवध, और नैषधीयचरित) को संस्कृत विद्वान् बृहत्त्रयी कहते हैं। इन तीनों ने अलंकृत पद्धति का अनुसरण किया है।
- लघुत्रयी – कालिदास के तीन काव्यों (रघुवंश, कुमारसम्भव और मेघदूत) को सरल शैली का आश्रय लेने के कारण लघुत्रयी कहा जाता है।
| दण्डी संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान – वास्तविक नाम – सोढ्ढ़न/सोढ्ढ़ल | दशकुमारचरित (‘द टेल ऑफ़ द टेन प्रिंसेस’) | 10 राजकुमारों के कारनामों का वर्णन |
| काव्यादर्शन | ||
| अवन्तिसुन्दरी | ||
| रत्नाकर (कश्मीरी कवि) | हरविजय | समय 850 ई.।विषय – भगवान् शिव की अन्धकासुर पर विजय का विस्तृत वर्णन।50 सर्ग |
| भर्तृहरि | नीतिशतक, शृंगारशतक और वैराग्यशतक | |
| वात्स्यायन | कामसूत्र | काम शास्त्र, यानी यौन संबंधों और प्रेम के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत वर्णन; कला, शिल्पकला एवं साहित्य का भी विवेचन |
| न्यायसूत्रभाष्य | ||
| शिवस्वामी | कप्फणाभ्युदय | विषय बौद्धग्रन्थ अवदानशतक की कथा पर आश्रित।20 सर्गों वाला बौद्ध काव्य |
| क्षेमेन्द्र | रामायणमञ्जरी, भारतमञ्जरी, बृहत्कथामञ्जरी,दशावतारचरित | विषय- प्रसिद्ध कथाओं पर आश्रित |
| मंख (कश्मीरी कवि) | श्रीकण्ठचरित | समय: बारहवीं शताब्दी।विषय – शिव द्वारा त्रिपुर की पराजय का वर्णनसर्ग- 25 सर्ग। |
| जयदेव | गीत-गोविंद | समय – 12वीं सदीभगवान कृष्ण के जीवन और शरारतों पर केंद्रित |
| नीलकण्ठ दीक्षित | शिवलीलार्णव | समय- सत्रहवीं शताब्दी।12 सर्ग। |
| रामभद्र दीक्षित | पतञ्जलिचरित | सर्ग-8 |
| वेंकटनाथ | यादवाभ्युदय | |
| धनेश्वर सूरि | शत्रुञ्जय | |
| वाग्भट | नेमिनिर्माणकाव्य | |
| वीरनंदी | चन्द्रप्रभचरित | |
| हरिश्चन्द्र | धर्मशर्माभ्युदय | |
अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ
अर्थशास्त्र :-
- कौटिल्य या चाणक्य या विष्णुगुप्त(चौथी शताब्दी ईसा पूर्व) द्वारा रचित संस्कृत का एक ग्रन्थ।
- मौर्य साम्राज्य की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर केंद्रित।
- इसमें राज्यव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति आदि के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है।
- अपने तरह का (राज्य-प्रबन्धन विषयक) यह प्राचीनतम ग्रन्थ है। शैली – उपदेशात्मक और सलाहात्मक।
- 15 अधिकरणों (भागों) में विभक्त।
- कौटिल्य को भारत के ‘मैकियावली’ की संज्ञा दी गई है।
- चाणक्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (322-298 ई.पू.) के महामंत्री थे। उन्होंने चंद्रगुप्त के प्रशासकीय उपयोग के लिए इस ग्रंथ की रचना की थी।
- मुख्यत: सूत्र शैली में लिखा हुआ है और संस्कृत के सूत्रसाहित्य के काल और परंपरा में रखा जा सकता है। यह शास्त्र अनावश्यक विस्तार से रहित, समझने और ग्रहण करने में सरल एवं कौटिल्य द्वारा उन शब्दों में रचा गया है, जिनका अर्थ सुनिश्चित हो चुका है।
- इसकी खोज वर्ष 1905 में तंजौर के एक ब्राह्मण ”भट्ट स्वामी” ने हस्तलिखित पांडुलिपि के रूप में की थी, उन्होंने वर्ष 1906-1909 के दौरान इसका संस्कृत भाषा में प्रकाशन करवाया तथा मद्रास के पुस्तकालय अध्यक्ष प्रो.श्याम शास्त्री को यह पांडुलिपि भेंट की।“ अर्थशास्त्र” को डॉ. श्याम शास्त्री ने सर्वप्रथम 1909 ई. में प्रकाशित करवाया।
- 15 अधिकरण
- विनयाधिकरण [शासन सञ्चालन से संबधित नियम
- अध्यक्षप्रचार
- धर्मस्थीयाधिकरण
- कंटकशोधन
- वृत्ताधिकरण
- योन्यधिकरण [सप्तांग सिद्धांत]
- षाड्गुण्य
- व्यसनाधिकरण
- अभियास्यत्कर्माधिकरणा
- संग्रामाधिकरण
- संघवृत्ताधिकरण
- आबलीयसाधिकरण
- दुर्गलम्भोपायाधिकरण
- औपनिषदिकाधिकरण और
- तंत्रयुक्त्यधिकरण
- सप्तांग सिद्धांत :- राज्य को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने हेतु राज्य के सात अंग बताए गए हैं। मौर्य प्रशासन में कौटिल्य ने सप्तांग सिद्धांत बताए हैं, जो निम्नलिखित है:- 1. राजा-शीर्ष, 2. अमात्य – आँख, 3. जनपद – जंघा, 4. दुर्ग – बाँह, 5. कोष – मुख, 6. दंड/सेना/बल – मस्तिष्क, 7. मित्र – कान

राजतरंगिणी:-
- कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ।
- ‘राजतरंगिणी’ का शाब्दिक अर्थ है – राजाओं की नदी, जिसका भावार्थ है – ‘राजाओं का इतिहास या समय-प्रवाह’।
- यह कविता के रूप में है।
आठ तरंग (अर्थात, अध्याय) और संस्कृत में कुल 7826 श्लोक हैं। अंतिम दो अध्याय कल्हण की व्यक्तिगत जानकारी एवं ग्रंथावलोकन पर आधारितहै।
- इसमें कश्मीर का इतिहास वर्णित है जो महाभारत काल से आरम्भ होता है।
- रचना काल 1147 ई. से 1149 ई. तक बताया जाता है ।
- इसके अनुसार कश्मीर का नाम “कश्यपमेरु” था जो ब्रह्मा के पुत्र ऋषि मरीचि के पुत्र थे।
- राजतरंगिणी में अशोक द्वारा झेलम नदी के किनारे “श्रीनगर” नामक नवीन नगर बसाने का उल्लेख।
- इसमें कश्मीर का प्रथम मौर्य शासक ‘जालौक’ को बताया गया है।
- भारत का प्रथम ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है।
- 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औरेल स्टीन ने पण्डित गोविन्द कौल के सहयोग से राजतरंगिणी का अंग्रेजी अनुवाद कराया।
| लेखक | ग्रन्थ | विवरण |
| चरक | चरक संहिता | चिकित्सा पर पुस्तक |
| सुश्रुत | सुश्रुत संहिता (शल्यक्रिया पर पुस्तक) | |
| माधव | माधव निदान | रोगविज्ञान पर पुस्तक |
| हरिषेण[समुद्रगुप्त के दरबारी कवि एवं मंत्री] | प्रयाग प्रशस्ति [इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख] | हरिषेण द्वारा रचित 33 पंक्तियाँ हैंगुप्त वंश के राजनीतिक इतिहास के बारे में जानने के लिए महत्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोतों में से एक हैसमुद्रगुप्त की वीरता का वर्णन |
| वाराहमिहिर | पंच-सिद्धांतिका [पौलिशसिद्धान्त, रोमकसिद्धान्त, वसिष्ठसिद्धान्त, सूर्यसिद्धान्त तथा पैतामहसिद्धान्त] | ज्योतिष पर पुस्तक, पांच प्रमुख खगोलीय सिद्धांतों का वर्णन और तुलना |
| वृहद संहिता | ग्रहीय चाल, भूविज्ञान, वास्तुकला, आदि जैसे व्यापक विषयों पर पुस्तक | |
| लघु संहिता, वृहद जातक तथा योगयात्रा | ||
| आर्यभट्ट | आर्यभट्टीयम् | खगोल विज्ञान और गणित पर पुस्तक |
| सूर्यसिद्धान्त | त्रिकोणमिति की जानकारी | |
| दसगीतिकासूत्र | ||
| लगधाचार्य | वेदांग ज्योतिष | ज्योतिष पर पुस्तक,वैदिक यज्ञों के अनुष्ठान के समय निर्धारण के लिए आवश्यक खगोलीय गणनाओं का वर्णनपंचांग निर्माण का आधार |
| भाष्कराचार्य [आर्यभट्ट की पुस्तकों पर कार्य किया एवं उनकी व्याख्या की] | वृहद् भास्कर्यतथा लघुभास्कर्य | |
| ब्रह्मगुप्त | ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त | पचीस अध्याय |
| खण्ड खाद्यक | ||
| भास्कराचार्य द्वितीय [ महान गणितज्ञ] | सिद्धान्त शिरोमणी | 4th संस्करण है-i. बीजगणितii. गणिताध्ययनiii. गोलाध्ययनiv. लीलावती [यह उनकी बेटी का नाम था। यह गणितज्ञ थी] |
| वाग्भट्ट | अष्टांगहृदय | |
| पालकाव्य | हस्ति आयुर्वेद | हाथियों की चिकित्सा की जानकारी |
| पिंगल [भारतीय विद्वान और गणितज्ञ] | छंदःशास्त्र या पिंगल-सूत्र | छंदों की संरचना और पैटर्न को समझने के लिए एक मौलिक ग्रंथ |
| सोमदेव | कथा-सरित्सागर | कई छोटी-छोटी कहानियां एक-दूसरे से जुड़ी, भारतीय कथा परम्परा का ‘महाकोश’ और भारतीय कहानी एवं जातीय विरासत का सबसे अच्छा प्रतिनिधि |
| गुणाढ्य | बृहत्कथा | एक लाख श्लोक |
| चन्द्रगोमिन | चन्द्रगोमिन व्याकरण | |
| अमरसिंह | अमरकोष | |
| वात्स्यायन | कामसूत्र | |
| विष्णु शर्मा | पंचतंत्र | कूटनीति/राजनीति |
हर्षकालीन प्रमुख विद्वान एवं साहित्यकार :-
हर्ष कला व साहित्य का उदार संरक्षक था, अपने राजस्व का ¼ भाग विद्वानों को दान देता था।
- बाणभट्ट
- मयूर/मोर:-
- अन्य विद्वान :-
- जयसेन – बौद्ध भिक्षुक
- सुबंधु मातंगदिवाकर – चाण्डाल जाति का विद्वान था।
- ईशान- शीलभद्र
नोट – हर्ष के समय ही भर्तृहरि ने – शृंगार शतक, वैराग्य शतक, नीतिशतक जैसे प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की
| बाणभट्ट दरबारी कवि एवं प्रमुख विद्वान।ग्रंथ – संस्कृत भाषा में लिखे। | कादम्बरी | बाणभट्ट की सबसे प्रसिद्ध रचना, एक उपन्यास है जिसमें प्रेम, रोमांच और राजनीति का सुंदर मिश्रण है। चंद्रापीड नामक राजकुमार की कहानी है। इसे पुत्र पुलिनभट्ट ने पूरा किया |
| हर्षचरित 620 ई. (8 भागों में) | हर्षवर्धन के जीवन पर आधारित एक ऐतिहासिक काव्य | |
| चंडीशतक, मुकुटताडीतक | ||
| ‘पार्वती परिणय’ | वस्तुतः इसका लेखक कोई पश्चाद्वर्ती वामन भट्टबाण है। | |
| मयूरबाणभट्ट का ससुर था।हर्ष का दूसरा प्रमुख कवि। | सूर्यशतक | सूर्यदेव की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन |
| मयूर शतक, | ||
| खण्ड प्रशस्ति। |
चालुक्य कालीन साहित्य
- पुलकेशिन द्वितीय के मंत्री गंगराज दुर्विनीत ने ‘शब्दावतार’ पुस्तक (व्याकरण) की रचना की।
- पण्डित उदयदेव ने ‘जैनेन्द्र व्याकरण’ की रचना की।
- सोमदेव सूरी ने ‘नीति वाक्यामृत’ की रचना की।
- चीनी यात्री ह्वेनसांग ने चालुक्यों को शिक्षा का व्यसनी बताया है।
द्रविड़ साहित्य
- इसमें चार प्रमुख द्रविड़ भाषाओंः तमिल, कन्नड़, तेलुगू और मलयालम, का साहित्य सम्मिलित है। इन चारों भाषाओं में तमिल को सबसे पुरानी मानी जाती है और माना जाता है कि संस्कृत के बहुत निकट है विशेष रूप से व्याकरण और शब्दों को उधार लेने के संबंध में।
- तमिल में सबसे प्रसिद्ध साहित्य शास्त्रीय रचनाएं या संगम साहित्य है।
तमिल (संगम) साहित्य
- ‘संगम’ का अर्थ भातृत्व होता है और यह साहित्य लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय था।
- अन्य – संगम शब्द का अर्थ संघ, परिषद्, गोष्ठी तथा तमिल कवियों का सम्मेलन है। इन परिषदों का संगठन “पांड्य” राजाओं के संरक्षण में किया गया था।
- यह साहित्य ऐसी रचनाओं का संग्रह है जिसमें लगभग 2381 कविताएं सम्मिलित हैं, जिसके लिए 473 कवियों को श्रेय दिया जाता है और गुमनाम बने रहने वाले 102 कवियों द्वारा लिखित साहित्य का कोष भी है। कवियों में समाज के विभिन्न वर्गों के पुरुष और महिलाएं सम्मिलित थीं।
- साहित्यिक परंपरा इतनी अधिक लोकप्रिय थी कि 300 ई. पू. से 300 ई. के बीच की अवधि को प्रायः संगम काल कहा जाता है. जिस अवधि के दौरान इनमें से अधिकतर की रचना और संकलन किया गया था।
- 600-700 वर्षों की अवधि के दौरान तीन संगमों का आयोजन किया गया था। हालांकि, पहले दो संगमों का निर्णायक ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं हैं। कई विद्वानों द्वारा पहले और दूसरे संगम किंवदंती और मिथक माने जाते हैं।
- तीन प्रमुख संगम आयोजित किए गए थेः
- प्रथम संगम
- स्थान: मदुरै
- राज्य: पांड्य
- अध्यक्ष: ऋषि अगस्त्य
- उपलब्ध ग्रंथ: कोई नहीं (केवल अगतियम व्याकरण के रूप में प्रयुक्त)
- द्वितीय संगम
- स्थान: कपाटपुरम्
- राज्य: पांड्य
- अध्यक्ष: प्रारंभ में अगस्त्य, फिर उनके शिष्य तोल्काप्पियर
- मानक ग्रंथ: तोल्काप्पियम, मापुरानम्, भूतपुरोनम, कलि, कुरूक, वेन्दालि
- उपलब्ध ग्रंथ: तोल्काप्पियम – तमिल व्याकरण पर आधारित ग्रंथ, जिसमें शब्द संरचना, वाक्य रूपांतरण, पर्यावरण, वनस्पति, जीव व मानव वर्गीकरण सम्मिलित।
- तृतीय संगम
- स्थान: मदुरै
- राज्य: पांड्य
- अध्यक्ष: नक्कीरर
- मानक ग्रंथ:
- पत्थुप्पात्तु, इत्थुथोकै, पदिनेन कीलकन्क्कु, नेडुण्थोकै, कुरून्थोकै, परिपादल
- उपलब्ध ग्रंथ:
- पत्थुप्पात्तु, इत्थुथोकै,पदिनेन कीलकन्क्कु व समस्त अन्य उपलब्ध तमिल ग्रंथ।
- निवर्तमान संगम साहित्य में कविता की लगभग 30,000 पंक्तियां हैं जो इत्थुथोकै नामक आठ संग्रहों में व्यवस्थित हैं। आगे ये दो और समूहों में विभाजित हैं; पुराना और ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक प्रासंगिक समूह पदिनेन कीलकन्क्कु (अठारह निम्न संग्रह) और दूसरा पत्थुप्पात्तु (दस गीत) कहलाता है।
- अत्यधिक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित तमिल संत तिरूवल्लूर ने संगम साहित्य में ‘कुरल’ का योगदान दिया था। अब इसका कई भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है और यह महाकाव्य, राजनीति-शासन और प्रेम के विषय में चर्चा करने वाले तीन भागों में विभाजित है।
- संगम साहित्य में योगदान देने वाली एक अन्य प्रसिद्ध महिला संत अव्वइयर हैं।
- संगम साहित्य के अतिरिक्त, तमिल में लिखित कई अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ भी हैं।
- तमिल व्याकरण और कविता की बारीकियों पर प्रकाश डालने के लिए तोलकाप्पिम् की रचना की गई थी।
- जुड़वां संस्कृत महाकाव्य रामायण और महाभारत की भांति, तमिल में भी छठी शताब्दी ईस्वी में लिखे गए दो प्रमुख ग्रंथ हैं अर्थात्, इलंगो आदिगल द्वारा लिखा गया शिलप्पादिकारम् (शाब्दिक अर्थ – नूपुर / पायल की कहानी, यह एक तमिल साहित्य का प्रथम महाकाव्य है। इस महाकाव्य के नायक और नायिका कोवलन और कन्नगी हैं।) और दूसरा ग्रंथ मदुरा के बौद्ध व्यापारी सत्त्नार द्वारा लिखित मणिमेखलाई (मणिमेखलाई की कहानी) है। ये ग्रंथ तमिल समाज और उन आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों पर केंद्रित हैं जिसका यह अनुभव कर रहा था।
- अंतिम मोड़ प्रारंभिक मध्यकाल के दौरान तब आया जब वैष्णव भक्ति भावनाओं ने तमिल साहित्य को रंगना प्रारंभ किया। सातवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच रचित ग्रंथ प्रकृति में अत्यधिक भक्तिमय है। तमिल भाषी क्षेत्रों में, ईश्वर की भक्ति में डूबे बारह अल्वारों या संत कवियों ने अनेक ग्रंथों की रचना की।
- अल्वार संतों में से एक अंडाल नामक महिला थी। इसे उस समय की स्त्री जाति का आगे की दिशा में कदम माना जाता था।
- एक अन्य महत्वपूर्ण भक्ति समूह नयनारों या शिव की प्रशंसा में गाने वाले लोगों का था।
- इनके अतिरिक्त, धर्मनिरपेक्ष तमिल लेखन में पेरियपुराणम और कम्बरामायणम् नामक दो प्रमुख कविताएं बहुत लोकप्रिय थीं।
- जीवक चिन्तामणि : जैन मुनि तिरूतक्कदेवर की कृति है।
- संगम साहित्य से चेर, चोल एवं पांड्य तीन राजवंशों के विषय में जानकारी मिलती है।
