बौद्ध धर्म प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने भारतीय समाज, दर्शन और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित यह धर्म अहिंसा, करुणा और मध्यम मार्ग पर आधारित है, जिसने उस समय की सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों को नई दिशा दी।
बौद्ध धर्म
जन्म व प्रारंभिक जीवन
- संस्थापक: गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ)
- जन्म: 563 ई.पू., वैशाख पूर्णिमा, लुम्बिनी (नेपाल की तराई), शाक्य क्षत्रिय कुल
- पिता: शुद्धोधन (शाक्य कुल के मुखिया)
- माता: महामाया (कोलिय वंश), मृत्यु 7वें दिन → पालन मौसी प्रजापति गौतमी ने किया
- गोत्र: गौतम
- तीन घटनाएँ वैशाख पूर्णिमा को: जन्म, ज्ञान, महापरिनिर्वाण
- अशोक का रूम्मिनदेई अभिलेख: बुद्ध जन्म प्रमाण (’हिद बुधे जातिते शाक्यमुनीत’)
- भविष्यवाणी – कालदेव व कौण्डिल्य ब्राह्मणों ने कहा: यह बालक या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा या संन्यासी।
विवाह व गृहत्याग
- विवाह: 16 वर्ष में यशोधरा (बिम्बा/गोपा/भकच्छना) से
- पुत्र: राहुल
- 29 वर्ष में गृहत्याग (महाभिनिष्क्रमण)
- प्रेरणा: 4 दृश्य – वृद्ध, रोगी, मृत, संन्यासी (मज्झिम निकाय)
- स्थान: अनोमा नदी, सिर मुंडवाकर भिक्षु वस्त्र धारण
- घोड़ा: कन्थक
- सारथी: छन्दक
- डी.डी. कोशाम्बी: गृहत्याग का कारण – शाक्य–कोलिय रोहिणी नदी जल विवाद
- पहले गुरु: आलार कालाम (सांख्य दर्शन, ‘आकिंचन्यायतन’)
- दूसरे गुरु: उद्रक (रूद्रक) रामपुत्त – ‘नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन योग’
- राजगृह में बिम्बिसार से भेंट, सिंहासन का प्रस्ताव ठुकराया
ज्ञान प्राप्ति (सम्बोधि)
- स्थान: उरूवेला (बोधगया), अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के नीचे
- आयु: 35 वर्ष
- दिन: वैशाख पूर्णिमा की रात
- नदी: निरंजना/फल्गु (सेनानी ग्राम के पास)
- सुजाता की खीर ग्रहण की (स्थान: बकरौर)
- ज्ञान के बाद उपाधि: तथागत, बुद्ध (“सिद्धार्थ से शाक्यमुनि बुद्ध”)
- मार देवता ने विघ्न डाला → भूमिस्पर्श मुद्रा प्रतीक
- विनयपिटक: सम्बोधि के बाद 4 सप्ताह ध्यान
- ब्रह्मा ने तीन बार उपदेश देने की प्रार्थना की
प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन)
- स्थान: सारनाथ (ऋषिपत्तन, मृगदाव)
- प्राप्तकर्ता: 5 ब्राह्मण साधक — कौडिन्य, वप्प, भद्रिक, महानाम, अस्सजी
- विषय: चार आर्य सत्य
- ग्रंथ: संयुक्त निकाय (सुत्त पिटक)
दूसरा धर्मचक्र प्रवर्तन:
- गृद्धकूट पर्वत (राजगृह) – प्रज्ञापारमिता शास्त्र, महायान हेतु महत्त्वपूर्ण
उपदेश एवं प्रचार
- प्रथम अनुयायी: तपस्सु व भल्लिक (शूद्र व्यापारी)
- मुख्य प्रचार क्षेत्र: मगध, कोशल, श्रावस्ती
- अधिकतम उपदेश स्थान: श्रावस्ती (25 वर्षावास – जेतवन 19, पूर्वाराम 6)
- कोशल नरेश: प्रसेनजित
- महान अनुयायी: आनंद, उपालि, सारिपुत्र, मौद्गल्यायन, महाकच्चायन
- राजाओं में: बिम्बिसार, प्रसेनजित
- स्त्रियों में: आम्रपाली, क्षेमा, सुप्पावासा
- डाकू अंगुलिमाल – श्रावस्ती में दीक्षित
- भविष्यवाणी: पाटलिपुत्र भारत का प्रधान नगर बनेगा
मृत्यु व महापरिनिर्वाण
- स्थान: कुशीनगर (कसिया, देवरिया)
- नदी: हिरण्यवती
- आयु: 80 वर्ष
- वर्ष: 483 ई.पू.
- घटना: महापरिनिर्वाण (साल वृक्षों के बीच)
- अंतिम उपदेश: “सभी संस्कार नश्वर हैं, प्रमाद रहित रहो।”
- अंतिम भोजन: पावा के चुन्द लुहार के घर – सूकरमाद्दव
- ग्रंथ: दीघनिकाय (महापरिनिर्वाण सुत्त)
- बुद्धघोष की सुमंगल विलासिनी में बुद्ध की दिनचर्या
बुद्ध के जीवन प्रतीक
| घटना | प्रतीक |
| जन्म | कमल |
| यौवन | सांड |
| गृहत्याग | घोड़ा |
| ज्ञान | बोधिवृक्ष |
| उपदेश | चक्र |
| निर्वाण | स्तूप |
प्रमुख ग्रंथों में उल्लेख
| घटना | ग्रंथ |
| चार दृश्य | मज्झिम निकाय |
| महाभिनिष्क्रमण व महाबोधि | माज्झिम निकाय |
| प्रथम उपदेश | संयुक्त निकाय |
| सम्बोधि वर्णन | महावग्ग |
| महापरिनिर्वाण | दीघनिकाय |
अन्य तथ्य
- पहला वर्षावास: सारनाथ (मूलगन्धकुटि विहार)
- अंतिम वर्षावास: वैशाली (वेलुग्राम विहार)
- बुद्ध स्वयं अवन्ति नहीं गये, महाकच्चायन को भेजा
- कपिलवस्तु की पहचान: सिद्धार्थनगर (पिपरहवा) या तिलौराकोट (नेपाल)
- श्रावस्ती: अचिरावती (राप्ती) नदी तट पर, अर्द्धचन्द्राकार नगर
बुद्ध के प्रमुख शिष्य
आनन्द
- बुद्ध का चचेरा भाई व प्रिय शिष्य।
- अनुरोध पर बुद्ध ने महिलाओं को संघ में प्रवेश दिया।
- महापरिनिर्वाण के समय मल्लों को सूचना देने भेजा गया।
देवदत्त
- आनन्द का बड़ा भाई, बुद्ध का विरोधी।
- संघ का अध्यक्ष बनने का असफल प्रयास।
- नालागिरी हाथी से बुद्ध की हत्या का प्रयास।
- बुद्ध की आलोचना की, अलग समुदाय बनाया।
- अजातशत्रु को बिम्बिसार की हत्या के लिए उकसाया।
उपालि
- नाई जाति से, विनय के विशेषज्ञ।
अनिरुद्ध
- बुद्ध का चचेरा भाई (अमृतोदन का पुत्र)।
- “सम्यक स्मृति” के ज्ञाता।
सारिपुत्र
- ब्राह्मण, पूर्व नाम – उपतिष्य।
- धम्म के सेनापति कहलाए।
- राहुल की प्रवज्या सम्पन्न करवाई।
- बुद्ध की मृत्यु से पूर्व इनका निधन, बुद्ध अत्यंत व्यथित।
मौद्गल्यायन
- ब्राह्मण, पूर्व नाम – कोलित।
- सारिपुत्र के मित्र।
- दैवी शक्तियों के ज्ञाता।
- अस्सजि से प्रभावित होकर संघ में प्रवेश।
जीवक
- बिम्बिसार का राजवैद्य, बुद्ध के उदर रोग का उपचारक।
- जीवक के अनुरोध पर ही बुद्ध ने भिक्षुओं के लिए तीन चीवरों (वस्त्रों) का विधान किया था।
नंद
- गौतमी का पुत्र।
राहुल
- बुद्ध का पुत्र।
महाकश्यप
- मगध के ब्राह्मण।
- प्रथम बौद्ध संगीति के अध्यक्ष।
- बुद्ध के एकमात्र ऐसे शिष्य थे जिन्हें बुद्ध ने अपने बराबर का दर्जा दिया और बुद्ध ने इन्हें अपने वस्त्र दिए।
महाकच्चायन
- अवन्तिवासी।
- अवन्ति में बुद्ध का धर्म प्रचार किया।
- चण्ड प्रद्योत को दीक्षित किया।
पोखरसादी
- कोशल निवासी।
- बुद्ध के 32 लक्षण देख बौद्ध धर्म स्वीकारा।
छन्दक (छन्न)
- बुद्ध के सारथी।
- महापरिनिर्वाण से पूर्व ब्रह्मदण्ड दिया गया।
अंगुलिमाल
- श्रावस्ती का डाकू, बाद में संघ में दीक्षित।
दब्ब व चुन्द
- मल्ल गणराज्य के।
- चुन्द के घर बुद्ध ने अंतिम भोजन (सूकरमद्दव) किया।
बुद्ध की प्रमुख अनुयायी स्त्रियाँ
- महाप्रजापति गौतमी – बुद्ध की मौसी, पहली महिला भिक्षुणी।
- यशोधरा – बुद्ध की पत्नी।
- नंदा – प्रजापति गौतमी की पुत्री, बुद्ध की मौसेरी बहन।
- खेमा – बिम्बिसार की पत्नी, प्रसेनजीत को दीक्षित किया।
- आम्रपाली – वैशाली की गणिका, भिक्षुणी संघ की अध्यक्ष।
- विशाखा – श्रावस्ती में पुब्बाराम विहार की दाता, मिगार की पुत्री।
- मल्लिका – प्रसेनजीत की पत्नी, मल्लिकाराम विहार निर्मात्री।
- वजिरा – प्रसेनजीत की पुत्री, अजातशत्रु की पत्नी।
- सुप्रवासा – कोलिय गणराज्य की निवासी।
- पटाचारा – अपने बच्चों की मृत्यु के बाद भिक्षुणी बनी, थेरीगाथा में गीत।
- धम्मदीना थेरी – राजगृह की विदुषी, बुद्ध ने प्रशंसा की।
- किसा गौतमी – मृत पुत्र से विरक्त होकर भिक्षुणी बनी।
- उब्बिरी व मित्ता – थेरीगाथा में वर्णित।
बुद्ध के समकालीन शासक
| शासक | राज्य/क्षेत्र | विशेष तथ्य |
| बिम्बिसार | मगध | वेणुवन विहार बनवाया |
| अजातशत्रु | मगध | देवदत्त के प्रभाव में, बाद में बौद्ध अनुयायी |
| प्रसेनजीत | कोशल | पुब्बाराम विहार |
| उदयन | कौशाम्बी | बौद्ध धर्म अपनाया |
| चण्ड प्रद्योत | अवन्ति | महाकच्चायन से दीक्षित |
| भद्रिक | कपिलवस्तु | बुद्ध का शिष्य |
| शूरसेन | मथुरा | अनुयायी |
बुद्ध संघ एवं बौद्ध शिक्षाएँ
बुद्ध संघ (Buddhist Sangha)
- अर्थ: भिक्षुओं और भिक्षुणियों का संगठन जो बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार करता था।
- संघ की स्थापना: बुद्ध द्वारा; प्रारंभिक सदस्य – पंचवर्गीय भिक्षु।
- सदस्यता: केवल उन लोगों को जो गृहस्थ जीवन त्यागकर संघ में प्रवेश करें।
- संघ के प्रकार:
- भिक्षु संघ (पुरुष)
- भिक्षुणी संघ (स्त्री)
- संघ के प्रमुख पद:
- उपाध्याय (Teacher) – दीक्षा देने वाला
- आचार्य – नियम सिखाने वाला
- संघपति – संघ का प्रमुख
- प्रवेश प्रक्रिया (प्रवज्या):
- गृहत्याग
- सिर मुंडन
- केसरिया वस्त्र धारण
- शरण ग्रहण (बुद्ध, धर्म, संघ)
- संघ के नियम:
- विनय पिटक में उल्लिखित
- भिक्षुओं हेतु – 227 नियम
- भिक्षुणियों हेतु – 311 नियम
- संघ की विशेषताएँ:
- लोकतांत्रिक व्यवस्था (निर्णय सर्वसम्मति से)
- अनुशासन पर बल
- संघ सभाएँ – उपोसथ दिवसों पर
- महिलाओं का प्रवेश:
- बुद्ध की सौतेली माँ महाप्रजापती गौतमी द्वारा आरंभ
- प्रारंभ में विरोध, बाद में अनुमति
बौद्ध शिक्षाएँ (Buddhist Teachings)
(A) चार आर्य सत्य (Four Noble Truths)
- दुःख – संसार दुःखमय है।
- दुःख समुदय – दुःख का कारण तृष्णा है।
- दुःख निरोध – तृष्णा के नाश से दुःख का अंत।
- दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा – अष्टांगिक मार्ग ही मुक्ति का उपाय।
(B) अष्टांगिक मार्ग (Eightfold Path)
- सम्यक दृष्टि
- सम्यक संकल्प
- सम्यक वाचा
- सम्यक कर्मांत
- सम्यक आजीव
- सम्यक व्यायाम
- सम्यक स्मृति
- सम्यक समाधि
(C) त्रिरत्न (Three Jewels)
- बुद्ध
- धर्म
- संघ
(D) पंचशील
- हत्या न करना
- चोरी न करना
- असत्य न बोलना
- कुशीलाचार से दूर रहना
- मादक द्रव्यों का सेवन न करना
अन्य प्रमुख सिद्धांत
प्रतीत्यसमुत्पाद (आश्रित उत्पत्ति)
- सभी वस्तुएँ कारण–परिणाम से जुड़ी हैं।
- मुख्य कारण : अविद्या (अज्ञान) → दुःख का मूल।
- 12 कड़ियाँ (द्वादश निदान)
अविद्या → संस्कार → विज्ञान → नामरूप → षडायतन → स्पर्श → वेदना → तृष्णा → उपादान → भव → जाति → जरा-मरण
क्षणिकवाद
- सब वस्तुएँ क्षणभंगुर हैं।
- स्थायित्व केवल भ्रांति है।
निर्वाण / महापरिनिर्वाण
- जीवित अवस्था में ज्ञान से मुक्ति = निर्वाण
- मृत्यु उपरांत = महापरिनिर्वाण
अनात्मवाद (Anatmavada)
- बुद्ध ने स्पष्ट रूप से न तो आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार किया, न अस्वीकार किया।
- आत्मा पर मौन रहते हुए भी उन्होंने कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार किया।
- बौद्ध मत के अनुसार –
- पुनर्जन्म आत्मा का नहीं, बल्कि चेतना-प्रवाह (Character Continuity) का होता है।
- मृत्यु के बाद आत्मा नहीं, बल्कि कर्मों का संस्कार आगे बढ़ता है।
- मिलिन्दपन्हो के अनुसार:
- जैसे जलधारा में एक लहर के बाद दूसरी लहर आती है,
- उसी प्रकार एक जन्म की अंतिम चेतना के विलय होते ही दूसरे जन्म का उदय होता है।
- वर्तमान अवस्था → अगली अवस्था को जन्म देती है।
- पुनर्जन्म “चरित्र” का होता है, आत्मा का नहीं।
- यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक तृष्णा (तन्हा) समाप्त नहीं होती।
कर्मवाद (Karmavada)
- बौद्ध धर्म पूर्णतः कर्मफल सिद्धांत पर आधारित है।
- मनुष्य का अच्छा या बुरा जन्म उसके कर्मों पर निर्भर है।
- कर्म ही दुःख और सुख के कारण हैं।
- मोक्ष (निर्वाण) कर्म बंधन से मुक्ति द्वारा प्राप्त होता है।
अनिश्वरवाद (Atheism)
- बौद्ध धर्म अनिश्वरवादी है।
- बुद्ध ने ईश्वर को सृष्टिकर्ता नहीं माना।
- यदि ईश्वर सृष्टिकर्ता है तो उसे दुःख का भी सृष्टिकर्ता मानना पड़ेगा।
- बुद्ध ने मानव कल्याण को प्राथमिकता दी और ईश्वर-संबंधी प्रश्नों को अनावश्यक समझा।
प्रयोजनवाद / यथार्थवाद (Pragmatism)
- बुद्ध की शिक्षाएँ अनुभव और यथार्थ पर आधारित थीं।
- उन्होंने केवल उन्हीं विषयों पर उपदेश दिया जो मानव कल्याणकारी थे।
- संसर, जीव, आत्मा, परमात्मा संबंधित विवेचना को उन्होंने व्यर्थ समझा। इसलिए उन्होंने दस (10) विषयों पर मौन धारण किया और मौन रहने का उपदेश दिया।
ये दस अकथनीय सिद्धान्त अभिलेखित हैं: यथा-
लोक संबंधी
- क्या लोक नित्य है?
- क्या लोक अनित्य है?
- क्या लोक शान्त है?
- क्या लोक अनन्त है?
- क्या जीव और शरीर एक हैं?
जीव संबंधी
- 6. क्या जीव (आत्मा) और शरीर भिन्न-भिन्न हैं?
तथागत के पुनर्जन्म संबंधी
- 7. क्या मृत्यु के पश्चात तथागत होते हैं?
- 8.क्या मृत्यु के पश्चात तथागत नहीं होते?
- 9.क्या मृत्यु के पश्चात तथागत होते भी हैं और नहीं भी होते हैं?
- 10क्या मृत्यु के पश्चात न तथागत होते ही हैं, नहीं ही होते हैं?
ईश्वर व आत्मा पर दृष्टि
- बुद्ध ने ईश्वर पर मौन साधा।
- आत्मा का निषेध – अनात्मवाद
- कर्म का सिद्धांत – मोमबत्ती उदाहरण
- पंचस्कन्ध: रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान।
बौद्ध संघ की भूमिका
- लोककल्याण के लिए धर्म प्रचार।
- शिक्षा व अनुशासन का प्रसार।
- राजाओं व जनता के बीच संपर्क।
- सामाजिक सुधार (जैसे जाति-विरोध, स्त्री सम्मान)।
बौद्ध संघ की संस्थाएँ
| संस्था | कार्य | उदाहरण |
| संघ सभा | निर्णय, अनुशासन | उपोसथ दिवस पर बैठक |
| विहार | निवास व अध्ययन स्थल | नालंदा, वैशाली |
| उपाध्याय-आचार्य | प्रशिक्षण व दीक्षा | संघ प्रमुख मार्गदर्शक |
बोधिसत्व (Bodhisattva)
अर्थ: वे व्यक्ति जो स्वयं के निर्वाण से पहले दूसरों का उद्धार करना चाहते हैं।
| बोधिसत्व | प्रतीक / लक्षण | विशेषता |
| वज्रपाणि | वज्रधारी | असत्य और पाप का शत्रु |
| अवलोकितेश्वर (पद्मपाणि) | दया, करुणा | महायान में प्रधान बोधिसत्व |
| मैत्रेय | कलश, दयालु | भावी बुद्ध; हीनयान व महायान दोनों में स्वीकृत |
| अमिताभ | पद्म | स्वर्गीय बुद्ध |
| मंजुश्री | खड्ग | प्रज्ञा (बुद्धि) के प्रतीक |
बुद्ध से शास्त्रार्थ करने वाले विद्वान
- निग्रोध
- वच्छगोत्त
- कुण्डलिय
- अजितो
- वरधारो
विषय:
- भिक्षु जीवन,
- गृहस्थ के मोक्षाधिकार,
- चेतन की अवस्थाएँ,
- चार धम्मपद आदि।
बौद्ध धर्म के अष्ठ महास्थान
- लुम्बिनी
- बोधगया
- सारनाथ
- कुशीनारा
- श्रावस्ती
- संकीसा
- राजगृह
- वैशाली
चार बौद्ध संगीति (Councils)
| संगीति | समय | स्थान | अध्यक्ष | शासक | प्रमुख कार्य |
| प्रथम | 483 ई.पू. | सप्तपर्णी गुफा (राजगृह) | महाकस्सप | अजातशत्रु | सुत्त व विनय पिटक का संकलन; पाँच सौ भिक्षु (पंचशतिका) |
| द्वितीय | 383 ई.पू. | वैशाली (बालुकाराम विहार) | सावकामी (सर्वकामनी) | कालाशोक | विनय मतभेद से संघ का विभाजन – स्थविर (थेरवाद) व महासांघिक; सप्तशतिका |
| तृतीय | 251 ई.पू. | पाटलिपुत्र (अशोकराम) | मोग्गलिपुत्त तिस्स | अशोक | अभिधम्म पिटक (कथावत्थु) का संकलन; संघ शुद्धिकरण; 60,000 भिक्षु निष्कासित |
| चतुर्थ | 1वीं शताब्दी ई. | कुंडलवन (कश्मीर) | वसुमित्र; उपाध्यक्ष – अश्वघोष | कनिष्क | विभाषाशास्त्र की रचना; हीनयान-महायान विभाजन; सर्वास्तिवाद प्रभावशाली |
बौद्ध संप्रदाय
(A) हीनयान / थेरवाद
- बुद्ध को महापुरुष मानते हैं, ईश्वर नहीं।
- मूर्तिपूजा, भक्तिभाव नहीं।
- लक्ष्य: अर्हत् पद (स्व-मुक्ति)।
- भाषा: पाली
- प्रसार: श्रीलंका, बर्मा, जावा
- प्रमुख शाखाएँ:
- वैभाषिक (सर्वास्तिवादी) – केंद्र: कश्मीर
- सौत्रान्तिक – सुत्त पिटक पर आधारित
- प्रमुख ग्रंथ: अभिधम्मकोश (वसुबंधु), विसुद्धिमग्ग (बुद्धघोष)
- हीनयान के पाँच बुद्ध: कुकुच्छानंद, कनकभुंज, कश्यप, शाक्यमुनि, मैत्रेय
(B) महायान
- संस्थापक: नागार्जुन
- अर्थ: “महान मार्ग”
- बुद्ध को ईश्वर मानते हैं; मूर्ति पूजा प्रारंभ
- भाषा: संस्कृत
- आदर्श: बोधिसत्व (परहितवादी)
- 10 पारमिताएँ / भूमियाँ
- सिद्धांत: त्रिकार्य सिद्धांत – सम्भोगकार्य, धर्मकार्य, निर्माणकार्य
दो प्रमुख शाखाएँ:
1.शून्यवाद (माध्यमिक):
- प्रवर्तक: नागार्जुन
- ग्रंथ: माध्यमिक कारिका
- प्रमुख आचार्य: आर्यदेव, बुद्धपालित, चंद्रकीर्ति, शांतिदेव, कमलशील
2.विज्ञानवाद (योगाचार):
- प्रवर्तक: असंग, वसुबंधु
- प्रमुख विद्वान: स्थिरमति, धर्मकीर्ति
- ग्रंथ: प्रमाणवार्तिक कारिका
महायान ग्रंथ:
- प्रज्ञापारमितासूत्र,
- प्रमाणसमुच्चय (दिङ्नाग),
- न्यायबिन्दु (धर्मकीर्ति)

हीनयान बनाम महायान तुलना
| पक्ष | हीनयान | महायान |
| प्रकृति | प्राचीन, रूढ़िवादी | नवीन, उदारवादी |
| लक्ष्य | अर्हत् – स्व-मुक्ति | बोधिसत्व – सर्व-मुक्ति |
| बुद्ध का स्वरूप | महापुरुष | ईश्वर / अवतार |
| भाषा | पाली | संस्कृत |
| पूजा-पद्धति | मूर्तिपूजा नहीं | मूर्तिपूजा प्रारंभ |
| प्रसार क्षेत्र | श्रीलंका, बर्मा, जावा | चीन, जापान, तिब्बत |
| सिद्धांत | आत्मा निषेध | आत्मा व पुनर्जन्म स्वीकार |
| आदर्श | आत्मकल्याण | परकल्याण |
बौद्ध धर्म के अन्य सम्प्रदाय
वज्रयान सम्प्रदाय
- पूर्व मध्यकाल में बौद्ध धर्म के अन्दर तंत्र मंत्र का प्रभाव बढ़ रहा था। इसी के प्रभाव से वज्रयान सम्प्रदाय का उद्भव हुआ।
- तिब्बत इस पंथ का जन्मस्थान था। वज्रयान, जिसे अक्सर तांत्रिक बौद्ध धर्म के रूप में जाना जाता है, का अर्थ है “वज्र वाहन”।
- वज्रयानी सम्प्रदाय के लोग “वज्र” का सम्बन्ध धर्म के साथ स्थापित करते थे एवं इसकी प्राप्ति के लिए पंचमकार (मध, मांस, मैथुन, मथ्स्य, मुद्रा) की साधना करते थे।
- इसके अनुयायियों का मानना था कि मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र तरीका वज्र के रूप में जानी जाने वाली जादुई शक्ति प्राप्त करना है।
- इस संप्रदाय में देवियों की पूजा की जाती है। तारा इस नए धर्म के प्रमुख देवी थी।
- यह अन्य बौद्ध संप्रदायों के विपरीत, गूढ विशेषताओं और संस्कारों के एक लंबे नियमों के समूह पर आधारित है।
- केन्द्र – नालंदा, विक्रमशिला, सोमपुरी और जगदल्ला थे।
- तंत्रवाद को बौद्ध सम्प्रदाय में अपनाने वाला सर्वज्ञमित्र था।
- चक्रयान एवं सहजयान का संबंध वज्रयान सम्प्रदाय से था।
बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार
- अशोक: सर्वप्रथम प्रचारक
- कनिष्क काल: मध्य एशिया (खोतान, ताशकंद, यारकंद)
- चीन: कश्यप मतंग, धर्मरत्न, कुमारजीव, बोधिधर्म, शांतरक्षित, पद्मसंभव
- तिब्बत: बौद्ध धर्म राजधर्म बना (शांतरक्षित व पद्मसंभव द्वारा)
- श्रीलंका: त्रिपिटक का लिपिबद्ध होना
- दक्षिण-पूर्व एशिया: बर्मा, सुमात्रा, जावा, कम्बोडिया
- कम्बोडिया: 1989 में बौद्ध धर्म राष्ट्रीय धर्म घोषित
- बोरोबुदूर (इंडोनेशिया): विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप
बौद्ध धर्म की मान्यताएं/दर्शन
- बौद्ध दर्शन क्षणिकवादी है।
- बौद्ध दर्शन अन्तः शुद्धिवादी है।
- बौद्ध दर्शन कर्मवादी है। कर्म का आशय कायिक, वाचिक व मानसिक चेष्टाओं से है।
- बौद्ध दर्शन अनीश्वरवादी है।
- बौद्ध धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है।
- बौद्ध धर्म अनात्मवादी है। (बौद्ध धर्म की शाखा सामित्य ने आत्मा को माना है।)
- बौद्ध धर्म का मूलाधार चार आर्य सत्य हैं।
- बौद्ध धर्म के त्रिरत्नः बुद्ध, संघ एवं धम्म।
बौद्ध साहित्य
- बौद्ध धर्म के साहित्यिक स्रोत मुख्यतः पालि भाषा में रचित हैं।
- बौद्ध ग्रंथ तीन भागों में विभाजित हैं जिन्हें त्रिपिटक कहा जाता है।
- पिटक = टोकरी (Basket)।
- त्रिपिटक की रचना गौतम बुद्ध के निर्वाण के पश्चात् की गई।
- “त्रिपिटक” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग रीज डेविड्स ने अपनी पुस्तक Buddhist India में किया।
- त्रिपिटकों को सर्वप्रथम श्रीलंका के राजा वतगमनी के शासन में ई.पू. पहली शताब्दी में लिपिबद्ध किया गया।
- त्रिपिटकों पर लिखी गई व्याख्या ग्रंथों को अट्ठकथा (Atthakatha) कहा गया।
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पिटक |
रचना |
भाग |
विवरण |
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विनय पिटक (अनुशासन की टोकरी) |
प्रथम बौद्ध संगीति में उपालि ने |
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सुत्त पिटक (प्रवचन की टोकरी)[गद्य- पद्य का मिश्रण] |
प्रथम बौद्ध संगीति में, सर्वप्रथम मौखिक पाठ आनंद ने किया |
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अभिधम्म पिटक (उच्च सिद्धांत की टोकरी) |
तृतीय बौद्ध संगीति |
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नोट – बौद्ध विद्वानों ने उक्त त्रिपिटक की अनेक व्याख्याएँ आदि लिखी हैं, जिन्हें अट्ठकथा (अर्थकथा) के नाम से जाना जाता है। अट्ठकथाएँ भी पालि भाषा में हैं। अट्ठकथाएँ ये हैं- 1. सामन्तपासादिका (विनय-अट्ठकथा) 2. सुमंगलविलासिनी (दीघनिकाय-अट्ठकथा) 3. पपंचसूदनी (मज्झिमनिकाय-अट्ठकथा) 4. सारत्थपकासिनी (संयुत्तनिकाय-अट्ठकथा) 5. मनोरथपूरणी (अंगुत्तरनिकाय-अट्ठकथा) 6. अभिधम्मपिटक की भिन्न-भिन्न अट्ठकथाएँ नोट – बौद्ध संदर्भ में, सुत्त (संस्कृत सूत्र से) उन ग्रंथों को संदर्भित करता है जिनमें माना जाता है कि बुद्ध ने स्वयं क्या कहा था। बुद्ध का पहला स्पष्ट जीवनी विवरण निदानकथा (पहली शताब्दी) में मिलता है। |
बौद्ध नॉन कैनोनिकल साहित्य
- जातक कथाएँ
- बौद्ध नॉन-कैनोनिकल साहित्य का सबसे अच्छा उदाहरण।
- सुत्तपिटक अंतर्गत खुद्दकनिकाय का 10वां भाग है।
- बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियों का संकलन।
- बोधिसत्व या भविष्य के बुद्ध की कहानियों की भी इन जातकों में चर्चा।
- इन कहानियों में बौद्ध धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार है, तथापि ये संस्कृत और पालि में भी उपलब्ध। प्रत्येक जातक कथा एक नैतिक या आचारिक शिक्षा देती है, तथा करुणा, ज्ञान, उदारता और आत्म-बलिदान जैसे गुणों पर बल देती है।
- बुद्ध के जन्म की प्रत्येक कहानी जातक कथा के समतुल्य है।
- इन कथाओं में लोकप्रिय कहानियों, प्राचीन पौराणिक
- कथाओं के साथ-साथ 600 ईसा पूर्व और 200 ईसा पूर्व के बीच उत्तर भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का संयोजन है।
- लंका, बर्मा और सिआम में प्रचलित परम्परा के अनुसार जातक 550 हैं। जातक के वर्तमान रूप में 547 जातक कहानियाँ पाई जाती हैं।
- पाँच वर्गों में विभाजित किया है-
- पच्चुपन्नवत्थु – बुद्ध के वर्तमान अनुयायियों का संग्रह
- अतीतवत्थु – इसमें अतीत की कथाँए संगृहीत
- गाथा
- व्याकरण – गाथाएँ व्याख्यायित की गई है।
- समोधन
- कुछ जातक कथाओं के नाम वेणिसंहार, कण्डिन, शिवी, शम, छदंत, रूरू, वेस्सांतर
अन्य बौद्ध नॉन–कैनोनिकल ग्रंथ
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ग्रंथ |
रचनाकार |
भाषा |
विवरण |
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दीपवंश |
अनुराधापुरा महाविहार के कई भिक्षु |
पालि |
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महावंश (Great Chronicle) |
महानामा |
पालि |
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कुलवंश (Mahavamsa का दूसरा भाग) |
धम्मकीर्ति |
पालि |
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मिलिंदपन्हो (Milinda’s Questions) |
नागसेन |
पालि |
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नेत्तिपकरण (मार्गदर्शन की पुस्तक) |
महाकच्चन |
पालि |
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पेटकोपदेश |
महाकच्चन |
पालि |
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संस्कृत में बौद्ध ग्रंथ :-
- महावस्तु एवं ललित विस्तार में महात्मा बुद्ध के जीवन (जीवनी) का वर्णन मिलता है।
| संस्कृत बौद्ध ग्रन्थ | लेखक |
| बुद्धचरित (महाकाव्य) | अश्वघोष |
| सौन्दरानन्द (महाकाव्य) | अश्वघोष |
| सारिपुत्र प्रकरण (नाटक) | अश्वघोष |
| सूत्रालंकार | अश्वघोष |
| विभाषा शास्त्र | वसुमित्र |
| अभिधर्मकोश | वसुबंधु |
| वज्रच्छेदिका | वसुबंधु |
| योगाचार भूमिशास्त्र | मैत्रेयनाथ |
| मनुष्यान्त विभंग | मैत्रेयनाथ |
| पंच भूमि | असंग |
| अभिधर्म समुच्चय | असंग |
| महायान संग्रह, महायान सूत्रालंकार | असंग |
| माध्यमिक कारिका | नागार्जुन |
| युक्ति षष्टिका | नागार्जुन |
| अष्ट सहस्र प्रज्ञापारमिता शास्त्र | नागार्जुन |
| चतुः शतक | आर्यदेव |
| शिक्षा समुच्चय | शांतिदेव |
| सूत्र समुच्चय | शांतिदेव |
| बोधिचर्यावतार | शांतिदेव |
| तत्त्व संग्रह | शांति रक्षित |
महत्त्वपूर्ण तथ्य
- अष्टसहस्र प्रज्ञापारमिता : बौद्धों द्वारा विकसित आध्यात्मिक सिद्धांतों का संग्रह।
- अश्वघोष ने बुद्धचरित की रचना की, जिसे बौद्धों का रामायण तथा अश्वघोष का कीर्ति स्तम्भ भी कहा जाता है।
- दिव्यावदान (संस्कृत, 4वीं शताब्दी) में परवर्ती मौर्य शासकों एवं पुष्यमित्र शुंग का वर्णन है। इसके अनुसार बुद्ध की पहली मूर्ति मथुरा में बनी।
- महावस्तु एवं ललित विस्तार : बुद्ध की पौराणिक जीवनियाँ।
- ललित विस्तार महायान संप्रदाय का प्राचीनतम ग्रंथ; महावस्तु को हीनयान–महायान के बीच सेतु माना जाता है।
- सर एडविन अर्नोल्ड ने ललित विस्तार के आधार पर Light of Asia (एशिया का ज्योति पुंज) लिखा। ललित विस्तार के लेखक हरिभद्र माने जाते हैं।
- ललित विस्तार में प्राचीन भारत की 64 लिपियों का वर्णन; महावस्तु में 32 लिपियों का उल्लेख।
- आर्यमंजूश्रीमूलकल्प में गुप्त सम्राटों का वर्णन; हर्षकालीन इतिहास की भी जानकारी देता है। इसे सर्वप्रथम गणपति शास्त्री ने 1925 ई. में प्रकाशित किया।
- बुद्धचरित में काव्य रूप में बुद्ध के जीवन का सरल वर्णन;
- सौन्दरानन्द में बुद्ध के सौतेले भाई सुन्दरणन्द के संन्यास का वर्णन।
- सारिपुत्र प्रकरण में शिष्य सारिपुत्र के बौद्ध धर्म ग्रहण करने का वर्णन।
- तिब्बती बौद्ध लामा तारानाथ (12वीं सदी) ने कंग्युर व तंग्युर ग्रंथ लिखे, जिनमें भारत संबंधी जानकारी मिलती है; दुल्वा ग्रंथ भी इन्हीं का है।
