आजीवक सम्प्रदाय

आजीवक सम्प्रदाय प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के महत्वपूर्ण श्रमण परंपराओं में से एक था, जिसकी स्थापना मक्खलिपुत्र गौशाल ने की थी। यह सम्प्रदाय कठोर अनुशासन, नियतिवाद और तपस्या पर आधारित था, जो उस समय के सामाजिक-धार्मिक विचारों को नई दिशा देता है। आजीवक विचारधारा ने बौद्ध और जैन परंपराओं के समकालीन रूप में भारतीय दर्शन को विशेष प्रभावित किया।

  • आजीवक सम्प्रदाय को “भाग्यवादी” व “नियतिवादी” भी कहा जाता है।
  • प्रवर्तक – मक्खलिपुत्र गौशाल थे।
  • इस सम्प्रदाय के उदय में नंदवच्छ तथा संकिश नामक भिक्षुओं का प्रथम हाथ था। [बौद्ध अभिलेखों के अनुसार]

साहित्य

  • आजीवक सम्प्रदाय का साहित्य 10 पूर्वी, 8 महानिम्मित तथा 2 मग्गों में विभक्त है।
  • आजीवक सम्प्रदाय के साहित्य को दक्षिण भारत में “नवकदिर” कहा गया है।

मखलिपुत्र गौशाला

  • जैन स्त्रोतों के अनुसार मक्खलिपुत्र गोशाल के पिता “मंखा” (धार्मिक चित्रों की प्रदर्शनी करने वाला) थे इसलिए इनका नाम “मंखलि” पड़ा तथा माता का नाम “भद्दा” था।
  • जन्म – ‘सरावन’ गाँव (श्रावस्ती) की एक गोशाला मे।
  • मक्खलिपुत्र प्रारंभ में महावीर स्वामी के शिष्य थे। [गोसाला की पहली बार महावीर से मुलाकात नालंदा में हुई और उनकी दोस्ती छह साल तक चली।]
  • दक्षिण भारत में मक्खलिपुत्र गोशाल को ‘अवर्णनीय देवता’ कहा गया है। धन
  • “भगवती सूत्र” में महावीर व मक्खलिपुत्र के मध्य संघर्ष का वर्णन मिलता है।

प्रधान केंद्र

  • आजीवक सम्प्रदाय का प्रधान केन्द्र “श्रावस्ती” था।
  • “हालाहला” नामक कुम्हारिन का घर आजीवक मत के प्रमुख केन्द्र के रूप में उपयोग में आता था (श्रावास्ती में)

प्रसार

  • कौशल नरेश प्रसेनजीत आजीवक मत का प्रमुख सदस्य था।
  • मौर्य काल को आजीवक मत की पराकाष्ठा का काल माना जाता है।
  • मौर्य सम्राट अशोक व दशरथ ने आजीवकों को गुफाएँ प्रदान की।
  • महावंश के अनुसार इस सम्प्रदाय का प्रभाव दक्षिण भारत व श्रीलंका में भी था।
  • आजीवक सम्प्रदाय लगभग 1002 ई. तक अस्तित्व में रहा था।
  • अन्य ग्रंथों में आजीवक का उल्लेख
  • धार्मिक सम्प्रदाय के रूप में आजीवकों का वर्णन पतंजलि के “महाभाष्य” में मिलता है।
  • बौद्ध व जैन दोनों ग्रन्थों में आजीवक सम्प्रदाय की घोर आलोचना की गई है।

सिद्धांत

  • पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास तथा वैदिक संन्यासियों की कठोर तपस्या की आलोचना और उपहास।
  • आजीवक लोग अशोक नामक वृक्ष की पूजा करते थे तथा शरीर को गंदा रखते थे और मोर पंख धारण करते थे।
  • आजीवक सम्प्रदाय में जातिगत आधार पर कोई विभाजन नहीं किया जाता था।
  • आजीवकों के अनुसार समस्त प्राणी नियति (भाग्य) के अधीन हैं तथा मनुष्य के जीवन पर उसके कर्मों का कोई प्रभाव नही पड़ता है।
  • आजीवक मत में पाँच तत्त्वों पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा जीव को स्वीकार किया गया है।
  • आजीवकों के अनुसार, जीवन में छह अपरिहार्य कारक – लाभऔर हानि, खुशी और दुःख, और जीवन और मृत्यु।
  • आजीवक मत के लोग भिक्षा माँगकर दिन में केवल एक बार हथेली में रखकर भोजन ग्रहण करते थे, इसलिए उन्हें “हत्थापलेखण” कहा गया है।
  • आजीवक नग्न तपस्वी थे।
  • आजीवक जीवन के अन्तिम समय नृत्य व गान के साथ शरीर त्याग देते थे।

नोट –

  • नगरीय व्यापारी, गृहस्थी तथा स्त्रियाँ भी इस में दीक्षित होने की अधिकारी थी।
  • → आजीवकों को एक दण्ड धारण करने के कारण “एक दण्डिन” भी कहा गया है।
  • → आजीवकों के पास कुम्हार और बैंकर जैसे अमीर शिष्य थे।
  • → आजीविका संप्रदाय देश के कोने-कोने में फैल गया, हालाँकि उनका प्रभाव बौद्ध और जैन धर्म की तुलना में बहुत कम था।

मक्खलि गोसाल (आजीविक संप्रदाय के संस्थापक)

मुख्य विचार:

  • जीवन में सब कुछ नियतिवाद (Predeterminism) के अनुसार होता है।
  • न कोई व्यक्ति अपने कर्मों से कुछ बदल सकता है, न किसी की क्रिया से परिणाम प्रभावित होते हैं।
  • कर्म या नैतिक प्रयास व्यर्थ हैं।

पूरण कस्सप (Purana Kassapa)

  • गोसाल की मृत्यु के बाद आजीविक संप्रदाय से जुड़े।
  • सिद्धांत:
    • कर्म में न कोई पाप है न पुण्य।
    • दूसरों को मारना, कष्ट देना या सहायता करना – सभी कर्म नैतिक दृष्टि से समान हैं।
    • कर्म से मुक्ति संभव नहीं, क्योंकि सब कुछ पहले से निर्धारित है।
    • कर्म न करना ही मुक्ति का मार्ग है।

पकुध कच्चायन 

  • गोशाल के बाद आजीविकों से जुड़ा दूसरा प्रमुख दार्शनिक।
  • सिद्धांत (सप्त-पदार्थवाद):
    • संसार 7 पदार्थों से बना है — जो
      “अनिर्मित, अपरिवर्तनीय, स्थिर, अचल और एक-दूसरे से स्वतंत्र” हैं।
    • ये पदार्थ एक-दूसरे को सुख या दुख नहीं पहुँचा सकते।
    • परिवर्तन असंभव है; सब कुछ नियत और स्थिर है।

 अजित केस कम्बलिन 

  • भौतिकवादी (Materialist) दार्शनिक।
  • सिद्धांत:
    • मनुष्य चार मूल तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) से बना है।
    • मृत्यु के बाद ये तत्व पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं — कोई आत्मा या पुनर्जन्म नहीं।
    • उदारता, संयम, सत्यभाषण आदि व्यर्थ हैं; मृत्यु के बाद न स्वर्ग न नरक।
    • शरीर के नष्ट होते ही बुद्धिमान और मूर्ख दोनों नष्ट हो जाते हैं।

परिचय

  • लोकायत / चार्वाक = भारतीय भौतिकवादी दर्शन।
  • यह दर्शन इहलौकवाद, प्रत्यक्षवाद, अनुभववाद और सुखवाद पर आधारित है।
  • चार्वाक और अजित केसकम्बलिन ने इसे औपचारिक दार्शनिक प्रणाली बनाया।
  • बृहस्पति को पारंपरिक रूप से इसका संस्थापक माना गया है।
  • “लोकायत” शब्द का अर्थ है — “जो लोक में प्रचलित है” (common among people)।

मुख्य सिद्धांत

  1. भौतिकवाद (Materialism): केवल भौतिक जगत ही सत्य है।
    • ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, कर्म, मोक्ष, परलोक — सबका खंडन।
  2. चार तत्व सिद्धांत:
    • पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि — केवल यही चार तत्व अस्तित्व में हैं।
  3. प्रत्यक्षवाद (Empiricism): केवल प्रत्यक्ष अनुभव ही ज्ञान का साधन है।
    • अनुमान, शास्त्र, वेद आदि ज्ञान के स्रोत नहीं हैं।
  4. सुखवाद (Hedonism):
    • जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य सुख की प्राप्ति है।
    • “सुख ही नैतिक, दुख ही अनैतिक” — यही नैतिकता का आधार।
  5. इहलौकवाद (This-worldliness):
    • यह संसार ही अंतिम सत्य है, मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं।
  6. केवल दो पुरुषार्थ:
    • अर्थ और काम (धर्म व मोक्ष को अस्वीकार)।

चार्वाक का नैतिक दृष्टिकोण

  • “जब तक जियो, सुख से जियो; उधार लेकर घी पियो।”
  • मृत्यु के बाद कोई वापस नहीं आता; अतः वर्तमान में ही आनंद लो।
  • भविष्य के अनिश्चित सुख से बेहतर वर्तमान का निश्चित सुख है।
  • छोटा दुख देखकर बड़ा सुख नहीं छोड़ना चाहिए।
    (उदाहरण: काँटे के डर से मछली न छोड़ना।)

  धार्मिक एवं दार्शनिक अस्वीकृति

  • वेद, यज्ञ, कर्मकांड, पुनर्जन्म, संसार, मोक्ष — सभी को असत्य व मूर्खता कहा।
  • उन्होंने हिंदू, बौद्ध, जैन, आजीवक सभी मतों का खंडन किया।
  • आत्मा को “पान के उदाहरण” से समझाया — जब चार तत्व मिलते हैं तभी चेतना बनती है।
  • मृत्यु के बाद यह चेतना समाप्त हो जाती है; अतः मोक्ष = मृत्यु मात्र।

जैन, बौद्ध, आजीवक और लोकायत : तुलनात्मक अध्ययन

पहलूजैन धर्म (महावीर, 6वीं स.पू.)बौद्ध धर्म (गौतम बुद्ध, 6वीं स.पू.)आजीवक (मक्खलि गोशाल, 6वीं स.पू.)लोकायत/चार्वाक (भौतिकवादी धारा)
स्वरूपनैतिक-दार्शनिक, तप-प्रधानव्यावहारिक-नैतिक, मध्यम मार्गनियतिवादी-संन्यासवादीभौतिकवादी-नास्तिक
ईश्वर की मान्यताअनिश्वरवादीअनिश्वरवादीईश्वर-निषेध, केवल नियतिअनिश्वरवादी
आत्मा का विचारआत्मा (जीव) नित्य, मोक्ष-योग्यअनात्मवाद (कोई आत्मा नहीं)आत्मा है, पर वह भी नियति-नियंत्रितआत्मा का निषेध
सृष्टि का आधारजीव + अजीवप्रतित्यसमुत्पादनियतिपंचमहाभूत
कर्म का स्थानकर्म-बंधन व मोक्ष हेतु संवर-निर्जराकर्म व प्रतित्यसमुत्पादकर्म का महत्व नहीं, सब नियति-प्रधानकर्म, पुनर्जन्म अस्वीकार
मोक्ष/जीवन लक्ष्यतप, त्रिरत्न द्वारा मोक्षअष्टांगिक मार्ग से निर्वाणमोक्ष असंभव, नियति
के अधीन
मोक्ष अस्वीकार, भोग ही लक्ष्य
जीवन दृष्टिकठोर तपश्चर्या, अहिंसा, अपरिग्रहमध्यम मार्ग, करुणा, अहिंसाभाग्यवाद, कठोर तपभोगवाद, “यावत जीवेत सुखं जीवेत”
विशेष सिद्धांतअनेकान्तवाद, स्याद्वादमध्यम मार्ग, क्षणिकवादनियतिवादप्रत्यक्षवाद, भौतिकवाद
ऐतिहासिक महत्त्वश्रमण परंपरा का बड़ा स्तंभ, मगध में लोकप्रियएशिया में सर्वाधिक प्रसार, भारत का महान निर्यातसमकालीन परंतु धीरे-धीरे लुप्तभारतीय भौतिकवाद का प्रतिनिधि

जैन, बौद्ध, आजीवक और लोकायत : समानताएँ

समानताविवरण
श्रमण परंपरा का हिस्साये सभी 6वीं सदी ई.पू. के आसपास वैदिक परंपरा के विरोध में विकसित हुए।
अनिश्वरवादचारों ने सृष्टि में सृजनकर्ता ईश्वर को अस्वीकार किया।
वैदिक कर्मकांड का विरोधयज्ञ, बलि, पुरोहितवाद और कर्मकांडीय जटिलताओं का विरोध किया।
जाति-पेशागत ऊँच-नीच का विरोधब्राह्मण प्रभुत्व और कठोर जाति व्यवस्था को चुनौती दी।
तर्क और प्रत्यक्ष अनुभव पर बलचारों ने किसी न किसी रूप में तर्क, अनुभव और नैतिक आचरण को महत्व दिया।
आत्मा व जीवन संबंधी प्रश्नों पर चर्चायद्यपि दृष्टिकोण अलग था (जैन आत्मा मानते, बुद्ध अनात्मवाद, लोकायत आत्मा नकारते), पर सभी ने आत्मा-मोक्ष/जीवन उद्देश्य पर विमर्श किया।
भोग और तप की धारणाएँजीवन के लक्ष्य पर अलग मत होने के बावजूद, सभी ने साधारण मानव की समस्याओं को केंद्र में रखा।
समाज में व्यापक प्रभाववैदिक परंपरा से बाहर जनसाधारण में लोकप्रिय हुए और सामाजिक-दार्शनिक बहुलता को जन्म दिया।

षड्दर्शन

वेदों की अंतिम सत्ता में विश्वास रखने वाले 6 आस्तिक दर्शन

  • इन्हें सामूहिक रूप से “षड्दर्शन” कहा जाता है।
  • ये हैं — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा (वेदांत)।
पक्षविवरण
संस्थापकमहर्षि कपिल (कोलायत, बीकानेर)
स्वभावयोग का जुड़वा दर्शन, विकासवादी दर्शन
प्रारंभिक स्वरूपभौतिकवादी – सृष्टि का कारण प्रकृति, न कि ईश्वर
बाद मेंअध्यात्मवादी – आत्मा (पुरुष) को भी तत्व माना गया
मुख्य सिद्धांतसृष्टि – प्रकृति (प्रकृति) व पुरुष (आत्मा) से बनी
मोक्ष का मार्गवास्तविक ज्ञान (प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द) से
प्रकृति के 3 गुणसत्त्व, रज, तम
विशेषपुरुष = चेतना, प्रकृति = भौतिक जगत
पक्षविवरण
संस्थापकमहर्षि पतंजलि
संबंधसांख्य दर्शन का जुड़वा दर्शन
अर्थ“योग = चित्त वृत्ति निरोध (मन पर नियंत्रण)”
लक्ष्यमोक्ष प्राप्ति हेतु शरीर, प्राण, इन्द्रियों का नियंत्रण
अष्टांग योगयम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि
महत्वशारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक अनुशासन का समन्वय
सिद्धांतमन को सांसारिक विषयों से हटाकर एकाग्र करना मोक्ष का साधन
पक्षविवरण
प्रतिपादकमहर्षि गौतम
स्वभाव“भारतीय दर्शन का तर्कशास्त्र”
संबंधवैशेषिक दर्शन का जुड़वा दर्शन
ईश्वर संबंधी विचारईश्वर सृष्टि का रचयिता, पालनकर्ता व संहारकर्ताप्रारंभिक न्याय = स्पष्ट रूप से आस्तिक नहीं।परवर्ती न्याय → ईश्वर को स्वीकार करता है।
लक्ष्यसही ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति
ज्ञान के साधन (प्रमाण)प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान
तर्क का उदाहरणपहाड़ में आग है क्योंकि धुआँ है; जहाँ धुआँ, वहाँ आग
विशेषताव्यवस्थित और तार्किक विचार प्रणाली का विकास
पक्षविवरण
प्रतिपादकमहर्षि कणाद (औलुक्य दर्शन)
संबंधन्याय दर्शन का जुड़वा दर्शन
मुख्य सिद्धांतपरमाणुवाद — सभी वस्तुएँ परमाणुओं से बनी
द्रव्य के 6 भागद्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय
विश्व की संरचनापाँच तत्वों से मिलकर बना है—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाशवैशेषिक 9 द्रव्यों (पदार्थों) को स्वीकार करता है👉 पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन
विशेषभारत में भौतिकी (Physics) की प्रारंभिक नींव रखी
बाद का स्वरूपईश्वर और मोक्ष में विश्वास जुड़ा
शीर्षकविवरण
शाब्दिक अर्थतर्क और व्याख्या की कला
मुख्य उद्देश्यवैदिक अनुष्ठानों को तर्क द्वारा सिद्ध करना
मूल मान्यतावेदों में ही शाश्वत सत्य निहित है
मोक्ष का आधारवैदिक यज्ञ एवं कर्मकाण्ड का शुद्ध प्रदर्शन
सामाजिक प्रभावपुजारियों की सेवा आवश्यक; सामाजिक स्तर (वर्ण व्यवस्था) बनाए रखने पर बल
ब्राह्मण भूमिकाधार्मिक अनुष्ठानों पर अधिकार और ब्राह्मण प्रधान सामाजिक स्तरीकरण बनाए रखने का प्रयास
प्रमाण (6)प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि
शीर्षकविवरण
अर्थवेद का अन्त
मूल ग्रंथब्रह्मसूत्र (बादरायण, ई.पू. दूसरी शताब्दी)
प्रमुख टीकाएँ9वीं शताब्दी – शंकर; 12वीं शताब्दी – रामानुज
मूल आधारप्राचीन उपनिषद
प्रमुख सिद्धांतब्रह्म ही सत्य, जगत माया
आत्मा-ब्रह्म संबंधआत्मा और ब्रह्म अभेद
मोक्ष का मार्गआत्मज्ञान से ब्रह्मज्ञान → मोक्ष
ब्रह्म का स्वरूपशंकर – निर्गुण; रामानुज – सगुण
मुक्ति साधनशंकर – ज्ञान; रामानुज – भक्ति/प्रेम
ब्रह्म व आत्माशाश्वत एवं अविनाशी
दार्शनिक प्रभावस्थिरता एवं अपरिवर्तन का विचार
कर्म सिद्धान्तवर्तमान जीवन = पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम
पुनर्जन्मवेदान्त सहित अन्य हिन्दू दर्शनों में महत्वपूर्ण
पहलू / दर्शनबौद्धजैनआजीवकलोकायत (चार्वाक)षड्दर्शन 
कर्म✔️✔️❌ (नियतिवाद)✔️
पुनर्जन्म✔️✔️✔️✔️
आत्मा✔️✔️✔️ (भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ)
ईश्वरआंशिक ✔️ (सांख्य में ❌, वेदान्त-न्याय-वैशेषिक में ✔️)
वेद की प्रामाणिकता✔️

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