73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 भारत में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने वाला एक ऐतिहासिक कदम है, जो “राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था” के अध्ययन में स्थानीय स्वशासन की आधारशिला के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह अधिनियम लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक सशक्त बनाने, विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण शासन में जनभागीदारी सुनिश्चित करने हेतु लागू किया गया। इसके माध्यम से तीन-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली, नियमित चुनाव, आरक्षण एवं वित्तीय सुदृढ़ता जैसी व्यवस्थाओं को सुनिश्चित किया गया।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत पंचायती राज
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने संसद में 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया, जिसे लोकसभा और राज्यसभा ने क्रमशः 22-23 दिसंबर 1992 को पारित किया।
17 राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदन के बाद, 20 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति ने इसे स्वीकृति दी।
अधिनियम 24 अप्रैल 1993 को प्रभाव में आया।
इस अधिनियम के लिए जो संयुक्त प्रवर-समिति बनी उसके अध्यक्ष राजस्थान से सांसद श्री नाथूराम मिर्धा थे।
केंद्र सरकार ने 2010 में हर वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया ।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संघीय व्यवस्था की तीसरी इकाई के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया गया। राज्यों के लिए यही अनिवार्य था कि अधिनिमय लागू होने से अधिकतम 1 वर्ष के भीतर अधिनियम के अनुसार पंचायती राज संस्थाओं का गठन करना होगा।
संविधान में यह स्पष्ट आरेखित है कि पंचायत राज संस्थाओं की स्थापना जनसंख्या के आधार पर की जायेगी। जनसंख्या का निर्धारण राज्य विधानमण्डल द्वारा किया जाता है।
73वें संविधान संशोधन के बाद, सबसे पहले पंचायती राज अधिनियम मई 1993 में कर्नाटक ने लागू किया।
पहले पंचायती राज चुनाव मई-जून 1994 में मध्य प्रदेश में कराए गए।
पंचायतों से संबंधित प्रावधान
भाग-4 (नीति-निदेशक तत्त्व) में अनुच्छेद 40 के अनुसार “राज्य ग्राम पंचायतों का स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के रूप में विकास करेगा।”
पंचायती राज अनुसूची-7 के अनुसार – “राज्य सूची” का विषय है। प्रविष्टी संख्या – 5 पर दर्ज है – स्थानीय स्वशासन
भाग-9
अनुच्छेद 243 – 243(O) (कुल अनुच्छेद – 16)
अनुसूची – 11 वीं
कुल विषय – 29
पंचायतों से संबंधित अनुच्छेद
क्र.सं.
अनुच्छेद
विषय-वस्तु
1
243
परिभाषाएँ
2
243 A
ग्राम सभा
3
243 B
पंचायतों का गठन
4
243 C
पंचायतों की संरचना
5
243 D
स्थानों का आरक्षण
6
243 E
पंचायतों की अवधि आदि
7
243 F
सदस्यता के लिये निरर्हताएँ
8
243 G
पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व
9
243 H
पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ
10
243 I
वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लियेवित्त आयोग का गठन
11
243 J
पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा
12
243 K
पंचायतों के लिये निर्वाचन
13
243 L
संघ-राज्य क्षेत्रोंं में लागू होना
14
243 M
इस भाग का कतिपय क्षेत्रोंं पर लागू न होना
15
243 N
विद्यमान विधियों और पंचायतों का बने रहना
16
243 O
निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्ज़न
11वीं अनुसूची में शामिल 29 विषय
क्र.सं.
विषय
1
कृषि (कृषि विस्तार शामिल)।
2
भूमि विकास, भूमि सुधार कार्यान्वयन, चकबंदी और भूमि संरक्षण।
3
लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जल-विभाजक क्षेत्र का विकास।
4
पशुपालन, डेयरी उद्योग और कुक्कुट पालन।
5
मत्स्य उद्योग।
6
सामाजिक वानिकी और फार्म वानिकी।
7
लघु वन उपज।
8
लघु उद्योग जिसके अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी शामिल हैं।
9
खादी, ग्राम उद्योग एवं कुटीर उद्योग।
10
ग्रामीण आवासन।
11
पेयजल। (गांवों में पानी की व्यवस्था)
12
ईंधन और चारा।
13
सड़कें, पुलिया, पुल, फेरी, जलमार्ग और अन्य संचार साधन।
14
ग्रामीण विद्युतीकरण, जिसके अंतर्गत विद्युत का वितरण शामिल है।
15
अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत।
16
गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।
17
शिक्षा, जिसके अंतर्गत प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी हैं।
18
तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा।
19
प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा।
20
पुस्तकालय।(हर पंचायत में पुस्तकालय होना चाहिए)
21
सांस्कृतिक क्रियाकलाप।
22
बाज़ार और मेले।
23
स्वास्थ्य और स्वच्छता (अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय)।
24
परिवार कल्याण।
25
महिला और बाल विकास।
26
समाज कल्याण (दिव्यांग और मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों का कल्याण)।
27
दुर्बल वर्गों का तथा विशिष्टतया अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का कल्याण।
28
सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
29
सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण।
73वें संशोधन का प्रमुख प्रावधान
इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है।
(i) अनिवार्य प्रावधान
(ii) ऐच्छिक प्रावधान
अनुच्छेद 243 : परिभाषाएँ
ग्राम और ज़िला स्तरों के बीच के मध्यवर्ती स्तर का निर्धारण राज्य का राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा मध्यवर्ती स्तर के रूप में विनिर्दिष्ठ करता है।
अनुच्छेद 243(A) : ग्राम सभा
अनुच्छेद 243(A) के तहत् प्रत्यक्ष प्रजातंत्र की इकाई के रूप में ग्राम सभा की स्थापना का प्रावधान ।
ग्राम सभा – सभी व्यस्क मतदाता जिनका नाम मतदाता सूची में उल्लिखित है, से मिलकर ग्राम सभा का गठन होगा।
ग्राम पंचायत अपने कार्य हेतु ग्राम सभा के प्रति ज़िम्मेदार है ।
ग्राम सभा दो कार्य करती है-
ग्राम पंचायत द्वारा गत वर्ष किये गये कार्यों की जाँच करना।
ग्राम सभा के इस कार्य को सामाजिक अंकेक्षण कहा जाता है।
इसकी अध्यक्षता सरपंच के द्वारा की जाती है तथा इसकी बैठक बुलाने का अधिकार सरपंच के पास है।
73वें संविधान संशोधन में ग्राम सभा की वर्ष में दो बैठकें अनिवार्य थीं, लेकिन 1999 में इनकी संख्या बढ़ाकर 4 कर दी गई।
वर्तमान समय में 01 वर्ष में कुल 4 बैठकें (26 जनवरी, 01 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर)
संविधान के अनुसार, हर 6 महीने में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य है।
बैठक का समय, तिथि और स्थान का निर्धारण सरपंच करता है, और उसकी अनुपस्थिति में उपसरपंच यह कार्य करता है।
यदि सरपंच व उपसरपंच दोनों अनुपस्थित हों, तो ग्राम सभा के सदस्य अध्यक्ष का चयन करते हैं।
बैठक की सूचना आकस्मिक परिस्थितियों में 3 दिन पूर्व, जबकि सामान्य परिस्थितियों में 7 दिन पूर्व दी जाती है।
राजस्थान में विशेष परिस्थितियों में 8 मार्च और 14 नवंबर को दो अतिरिक्त बैठकें बुलाई जा सकती हैं।
ग्राम सभा में कोरम (गणपूर्ति) कुल सदस्यों का 1/10 निर्धारित है।
ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्रथम इकाई कहा जाता है।
राजस्थान में पहली ग्राम सभा 1999 में मुहाना (जयपुर) में गठित की गई।
राजस्थान में वार्ड सभा का गठन वर्ष 2002 में किया गया, और यह भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ वार्ड सभा का उल्लेख है।
ग्राम विकास की सभी योजनाओं का मूल्यांकन ग्राम सभा के द्वारा किया जाता है।
अनुच्छेद 243(B) : पंचायतों का गठन
प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और ज़िला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा।
मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का उस राज्य में गठन नहीं किया जा सकेगा जिसकी जनसंख्या 20 लाख से अधिक ना हो।
अनुच्छेद 243(B) के तहत पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।
संवैधानिक उपबन्धों के अनुसार भारत में पंचायती राज संस्थाएँ त्रिस्तरीय है न कि चार स्तरीय। पश्चिमी बंगाल में भी 1973 के बाद से त्रिस्तरीय है।
पश्चिमी बंगाल में 1963-73 तक (10 वर्ष) ही चार स्तरीय थी, उसके बाद से अब तक त्रिस्तरीय।
दिल्ली में अभी तक पंचायती राज व्यवस्था लागू नहीं हैं।
मध्यवर्ती स्तर नहीं यानि सिर्फ द्वि-स्तरीय पंचायती राज तीन राज्यों गोवा, सिक्किम, मणिपुर, तथा तीन संघ शासित क्षेत्रों दादरा नगर हवेली व दमन द्वीप, पुड्डुचेरी तथा लक्षद्वीप में है।
चार UT अण्डमान निकोबार, चण्डीगढ़, जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में त्रिस्तरीय है।
जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनिमय, 2019 के प्रवर्तन में आने से जम्मू-कश्मीर संघ एवं लहाख राज्य क्षेत्रों पर भाग 9 अनु. 243ठ) लागू होने से वहाँ भी अब पंचायतों के तीन स्तर होंगे।
राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों में मध्यवर्ती/खण्ड स्तर पर पंचायतों के नाम:-
पंचायत समिति : बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, अण्डमान और निकोबार, चण्डीगढ़।
आंचलिक समिति: असम
जनपद पंचयात: छत्तीसगढ़
तालुका पंचायत : गुजरात, कर्नाटक
ब्लॉक विकास बोर्ड: जम्मू कश्मीर, लद्दाख
क्षेत्र पंचायत: उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड
पंचायत युनियन कौंसिल तमिलनाडु
जनपद समिति मध्यप्रदेश
अनुच्छेद 243(C) : पंचायतों की संरचना
ग्राम पंचायत :-
यह त्रिस्तरीय पंचायती राज का आधार है। यह सरपंच व वार्ड पंचों से मिलकर बनती है।
बैठक – 15 दिन में एक बार होती है जिसका कोरम 1/3 होता है।
उपसरपंच के चुनाव के लिए आयोजित बैठक ग्राम पंचायत की पहली बैठक होती है। इस चुनाव में सरपंच भी मत देता है तथा उसके मत का मूल्य 2 के बराबर माना जाता है।
यह उल्लेखनीय है कि पंचायत समिति और जिला परिषद् के अध्यक्ष के निर्वाचन की पद्धति ( अप्रत्यक्ष पद्धति) का संविधान में ही उपबन्ध [ अनु. 243ग(5) (ख) ] है वहीं ग्राम पंचायत के अध्यक्ष की निर्वाचन की रीति का संविधान में उल्लेख नहीं है अपितु उसे राज्य के विधान मण्डल की विधि पर छोड़ दिया है । इन सभी पदों के लिए आवश्यक न्यूनतम आयु 21 वर्ष हैं।
अविश्वास प्रस्ताव –
उपसरपंच व सरपंच को इसके द्वारा हटाया जाता है।
पहले दो वर्ष तक यह प्रस्ताव नहीं लाया जाता है।
प्रस्ताव लाने हेतु 1/3 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है।
पारित करने हेतु न्यूनतम 3/4 समर्थन आवश्यक होता है।
यदि प्रस्ताव असफल हो जाये तो 1 वर्ष तक वापस नहीं लाया जा सकता है तथा अंतिम एक वर्ष में नहीं लाया जाता है।
पंचायत समिति-
एक लाख की जनसंख्या पर इसका गठन होता है। इस जनसंख्या पर 15 वार्ड होते है।
पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में से प्रधान व उपप्रधान का चुनाव करते है।
जिला परिषद्-
किसी जिले की 4 लाख ग्रामीण जनसंख्या पर इसका गठन होता है। इस जनसंख्या पर 17 वार्ड होते है।
1 लाख अतिरिक्त जनसंख्या पर 2 अतिरिक्त वार्ड होते है।
जिला परिषद् के निर्वाचित सदस्य अपने में से जिला प्रमुख व उपजिला प्रमुख का चुनाव करते है।
सभी पदाधिकारियों को पीठासीन अधिकारी पद व गोपनीयता की शपथ दिलाते है।
निर्वाचन के 30 दिन के भीतर उन्हें शपथ लेनी होती है अन्यथा स्थान रिक्त माना जाता है।
ग्राम पंचायत के चुनाव को छोड़कर अन्य संस्थाओं के चुनाव दलीय आधार पर होते है।
10वीं अनुसूची के अंतर्गत दलबदल कानून यहाँ लागू नहीं होता है।
अनुच्छेद 243(D) : स्थानों का आरक्षण
अनु. जाति और अनु.जनजाति के वर्गों हेतु प्रत्येक स्तर पर जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण, जो बारी-बारी से आवर्तित (रोटेशन) होता रहता है। अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जातियों’ के लिए आरक्षण नहीं है। इसे 83वें संविधान संशोधन 2000 द्वारा हटाया गया था।
आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक तिहाई स्थान, यथास्थिति अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षित रहेंगे। अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान राज्यों की इच्छा पर छोड़ दिया गया।
हालांकि संविधान संशोधन नहीं हुआ लेकिन 19 राज्य, राजस्थान सहित महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान कर चुके हैं।
महिलाओं के लिए प्रारंभ में 1/3 (33%) आरक्षण था, जिसे राजस्थान में 2003 में बढ़ाकर 50% किया गया, और 2010 के चुनावों में लागू किया गया।
OBC के लिए प्रारंभ में आरक्षण 15% था, जिसे 4 अक्टूबर 1999 को बढ़ाकर 21% कर दिया गया।
प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक तिहाई स्थान (st/sc स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थान शामिल) स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे।
प्रत्येक स्तर पर पंचायतों में अध्यक्षों के पदों की कुल संख्या के कम से कम 1 तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे।
राज्य द्वारा पिछड़े वर्ग को पंचायत में स्थानों के या पंचायतों के अध्यक्ष के पदों के लिए आरक्षण दिया जा सकता है।
पंचायत राज संस्थाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति को दिया गया आरक्षण अनुच्छेद 334 के अधीन लागू होगा। यह बात महिला आरक्षण पर लागू नहीं होगी।
कोई राज्य विधानमण्डल महिला आरक्षण को 1/3 से अधिक करना चाहे तो कर सकता है।
अनुच्छेद 243(E) : पंचायतों की अवधि आदि
पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल सामान्यत: 5 वर्ष होता है।
कार्यकाल समाप्ति से पूर्व चुनाव आवश्यक है।
कार्यकाल समाप्त होने से पहले पंचायत को भंग किया जा सकता है।
भंग होने की स्थिति में 6 माह के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य है।
अगर कार्यकाल 6 माह से कम है तो चुनाव आवश्यक नहीं। पुनर्गठित पंचायत का कार्यकाल शेष अवधि के लिए, होता है ना कि पूरे 5 साल के लिए।
नए चुनाव के बाद गठित पंचायत केवल शेष कार्यकाल के लिए कार्यरत रहेगी।
पंचायतों से संबंधित अविश्वास प्रस्ताव कार्यकाल के दो वर्ष बाद लाया जा सकता है, जिसमें 1/3 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं, और प्रस्ताव पारित करने के लिए 3/4 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
यदि अविश्वास प्रस्ताव एक बार अस्वीकृत हो जाए, तो अगले 1 वर्ष तक इसे पुनः नहीं लाया जा सकता।
अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर चुनाव शेष कार्यकाल के लिए ही होंगे, जिन्हें 1 माह के भीतर करवाना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 243(F) : सदस्यता के लिये निरर्हताएँ
उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होगी।
अन्य सभी योग्यताओं का निर्धारण राज्य विधान मण्डल द्वारा किया जाएगा।
स्थानीय नागरिक होना अनिवार्य।
मतदाता सूची में नाम दर्ज होना चाहिए।
न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए।
अयोग्यता के आधार पर सदस्यता समाप्त हो सकती है, यदि:
लाभ का पद ग्रहण कर लिया हो।
सरकारी पद पर कार्यरत हो।
नैतिक रूप से अयोग्य हो या किसी कारणवश पद से हटाया गया हो।
मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम हो।
1995 के बाद, यदि किसी सदस्य के दो से अधिक संतान हैं, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा-19 के तहत वसुंधरा राजे सरकार ने शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य की थी, जिसे 2018 में राज्य सरकार ने समाप्त कर दिया।
अनुच्छेद 243(G) : पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार औरउत्तरदायित्व
पंचायतें आर्थिक और सामाजिक न्याय से जुड़े कार्यक्रम बनाकर उनका क्रियान्वयन करती हैं।
11वीं अनुसूची के अंतर्गत पंचायतों को 29 विषयों पर कानून बनाने की शक्ति दी गई।
2010 तक इनमें से 21 विषय पंचायतों को हस्तांतरित किए जा चुके थे।
अनुच्छेद 243(H) : पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने कीशक्तियाँ और उनकी निधियाँ
जो कर राज्य सरकार द्वारा लगाये जायेगें उनका राज्य सरकार व पंचायती राज इकाइयों के मध्य वितरण किया जा सकेगा और जो कर पंचायती राज संस्थाऐं आरोपित करेंगी उन्हें न केवल एकत्र कर सकेंगी अपितु उनका व्यय भी अपने स्तर पर कर सकेंगी।
अनुच्छेद 243(I) : वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लियेवित्त आयोग का गठन
राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा।
राज्य वित्त आयोग पंचायतों को करों, राज्य संचित निधि से सहायता तथा वित्तीय सुदृढ़ीकरण के संबंध में राज्यपाल को रिपोर्ट देगा।
राज्य वित्त आयोग संवैधानिक निकाय है।
संविधान में इसकी सदस्य संख्या उल्लेखित नहीं है।
अनुच्छेद 243 Y के तहत यहीं आयोग नगरपालिकाओं के संदर्भ में यह सब कार्य करता है।
राजस्थान में अब तक 5 बार वित्त आयोग बन चुका है।
अनुच्छेद 243(J) : पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा
राज्य विधानमण्डल विधि बनाकर पंचायतों के लेखों खातों की देखभाल व परीक्षण के लिए उपबंध कर सकती है।
अनुच्छेद 243(K) : पंचायतों के लिये निर्वाचनराज्य निर्वाचन आयोग
पंचायतों के चुनाव करवाने हेतु राज्यपाल द्वारा राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना की जायेगी।
यह आयोग निर्वाचन नामावली तैयार करेगा तथा चुनाव सम्पन्न करवायेगा।
निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और पंचायतों के निर्वाचनों के संचालन, अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण इस राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा।
यह एक सदस्यीय आयोग है जिसका मुखिया राज्य निर्वाचन आयुक्त कहलाता है।
राजस्थान में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को इस पर नियुक्त किया जाता है। इस हेतु उन्हें राज्य सरकार में 5 वर्ष का सचिव के पद का अनुभव होना चाहिए।
इनका कार्यकाल 5 वर्ष तथा सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष है।
अनुच्छेद 243(L) : संघ-राज्य क्षेत्रोंं में लागू होना
इस संबंध में राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है।
भारत का राष्ट्रपति किसी भी संघ राज्य क्षेत्र अपवादों अथवा संशोधनों के साथ लागू करने के लिए निर्देश दे सकता है।
अनुच्छेद 243(M) : इस भाग का कतिपय क्षेत्रोंं पर लागू नहोना
भाग-9 के प्रावधान निम्न राज्यों व क्षेत्रों में लागू नहीं होते।
(i) नागालैण्ड, मेघालय, मिजोरम राज्य में।
(ii) मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्रों में।
(iii) पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के पर्वतीय क्षेत्र, जहाँ दार्जिलिंग गोरखा हिल परिषद् कार्यरत हैं।
(iv) 244(1) में वर्णित अनुसूचित क्षेत्रों व जनजाति क्षेत्रों मे लेकिन संसद, अधिनियम बनाकर 244 में वर्णित इन क्षेत्रों में पंचायती राज को लागू कर सकती है।
5 वीं अनुसूची तथा अनुच्छेद-244( 1) में 10 राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र है – महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, तेलंगाना,ओडिशा, हिमाचल प्रदेश ,गुजरात
Note:
244(1) का संबंध अनुसूचि 5 (10 राज्य) व 244(2) का संबंध अनुसूचि 6 (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम) से है।
1994 में अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज लागू करने हेतु “दलीप सिंह भूरिया समिति” का गठन किया गया।
पेसा अधिनियम, 1996
1994 में अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज लागू करने हेतु ‘दिलीप सिंह भूरिया समिति’ का गठन किया गया।
भूरिया समिति की सिफारिश पर ‘ पंचायती राज अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम’ – 1996 में बनाया गया।
‘भूरिया समिति’ की सिफारिशों के आधार पर संसद में वर्ष 1996 में ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रोंं का विस्तार) विधेयक’ प्रस्तुत किया गया। दिसंबर 1996 में दोनों सदनों से पारित होने के उपरांत 24 दिसंबर को राष्ट्रपति की सहमति के पश्चात् ‘पेसा अधिनियम’ अस्तित्व में आया।
इसे पेसा (PESA- Panchyati raj Extention in (Scheduled Area) कहा जाता है। पेसा अधिनियम (PESA Act) पहले 9 राज्यों, फिर तेलंगाना निर्माण के बाद से 10 राज्यों में लागू है।
राज्यों में पेसा अधिनियम के तहत् संस्थागत व नियम समरुपता के लिए संघीय पंचायती राज मंत्रालय ने 2006 में बी.डी. शर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। पेसा अधिनियम के तहत् रीति-रिवाजों, परम्पराओं व सामुदायिक संसाधनों के प्रबंध के लिए ग्रामसभा को विशिष्ट शक्तियाँ दी गई हैं।
पेसा अधिनियम के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
संविधान के भाग 9 के पंचायतों से जुड़े प्रावधानों को जरूरी संशोधन के साथ अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तारित करना।
जनजातीय जनसंख्या को स्वशासन प्रदान करना।
जनजातीय समुदायों की परम्पराओं एवं रिवाजों की सुरक्षा तथा संरक्षण करना।
किसी क्षेत्र को संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत् अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने की शक्ति राष्ट्रपति को है। राष्ट्रपति ऐसा आदेश सम्बन्धित राज्य के राजयपाल से परामर्श करके समय-समय पर ऐसे आदेश जारी करता है।
राजस्थान के आठ जिलें (बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं प्रतापगढ़ सम्पूर्ण जिले, पाली, उदयपुर, राजसमन्द, चित्तौड़गढ़ और सिरोही आंशिक रूप से) के 5697 गांव हैं, जिनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा अनुसूचित जनजाति की आबादी के कारण अनुसूचित क्षेत्र घोषित किए गए है।
राजस्थान में निम्नलिखित जनजातियां प्रमुख रूप से पाई जाती हैं:
मीणा (जयपुर, उदयपुर)
भील (उदयपुर)
कंजर (कोटा)
सहरिया (बारां)
डामोर (डूंगरपुर)
कधौड़ी (झाड़ोल, उदयपुर)
गरासिया (सिरोही)
ग्राम सभा :
अन्धविश्वास (Superstiton) और भूतसिद्धि (Sorcery), जादू (Magic) आदि पर चर्चा राजस्थान पेसा नियम (2011) में यह प्रावधान किया गया है कि अन्धविश्वास, भूतसिद्धि और जादू सम्बन्धी मामलों पर ग्राम सभा की खुली बैठक में विचार विमर्श किया जाएगा।
राजस्थान में PESA अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं को 20 सदस्यों की शांति समिति बनाने का अधिकार दिया गया है।
अनुच्छेद 243(N) : विद्यमान विधियों और पंचायतों का बनेरहना
अनुच्छेद 243(O) : निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों केहस्तक्षेप का वर्ज़न
न्यायालय पंचायतों के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, उन क्षेत्रों में सीट आवंटन आदि में दखलअंदाजी नहीं कर सकता।
📱 For better view, please rotate your phone horizontally.
स्तर
निम्न स्तर (ग्राम पंचायत)
मध्यम स्तर (पंचायत समिति)
उच्च स्तर (जिला परिषद)
कुल संख्या
11,341
352
33
प्रशासनिक अधिकारी
ग्राम विकास अधिकारी (VDO)
खंड विकास अधिकारी (BDO)
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO)
राजनीतिक अधिकारी
सरपंच
प्रधान
जिला प्रमुख
निर्वाचन प्रक्रिया
वॉर्ड पंच सदस्य (प्रत्यक्ष)सरपंच (प्रत्यक्ष)उपसरपंच (अप्रत्यक्ष)
पंचायत समिति सदस्य (प्रत्यक्ष)प्रधान (अप्रत्यक्ष)उपप्रधान (अप्रत्यक्ष)
जिला परिषद सदस्य (प्रत्यक्ष)जिला प्रमुख (अप्रत्यक्ष)उपजिला प्रमुख (अप्रत्यक्ष)
आयु सीमा
21 वर्ष
21 वर्ष
21 वर्ष
गणपूर्ति
1/10
1/10
1/10
राजस्थान पंचायती राज प्रणाली – शपथ, त्यागपत्र, बैठक और निर्वाचित सदस्य संख्या
शपथ ग्रहण प्रक्रिया
स्तर
शपथ ग्रहण कराने वाला अधिकारी
ग्राम पंचायत
वार्ड पंच, उपसरपंच, सरपंच को पीठासीन अधिकारी शपथ दिलाता है।
पंचायत समिति
पंचायत समिति सदस्यों को पीठासीन अधिकारी शपथ दिलाता है।प्रधान व उपप्रधान को उपखंड अधिकारी शपथ दिलाता है।
जिला परिषद
जिला परिषद सदस्यों को पीठासीन अधिकारी शपथ दिलाता है।जिला प्रमुख और उप जिला प्रमुख को जिला कलेक्टर शपथ दिलाता है।
त्यागपत्र प्रक्रिया
पद
त्यागपत्र सौंपने वाला अधिकारी
वार्ड पंच, उपसरपंच, सरपंच
खंड विकास अधिकारी (BDO)
पंचायत समिति सदस्य, उपप्रधान
प्रधान
प्रधान
जिला प्रमुख
जिला परिषद सदस्य, उप जिला प्रमुख
जिला प्रमुख
जिला प्रमुख
संभागीय आयुक्त
बैठक आयोजित करने की न्यूनतम अवधि
स्तर
बैठक की न्यूनतम आवश्यकता
ग्राम पंचायत
15 दिन में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य
पंचायत समिति
1 माह में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य
जिला परिषद
3 माह में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य
निर्वाचित सदस्यों की संख्या
स्तर
न्यूनतम सदस्य संख्या
अतिरिक्त सदस्य चयन प्रक्रिया
ग्राम पंचायत
1 पंच (3000 की आबादी तक)
प्रति 1000 की वृद्धि पर 2 अतिरिक्त वार्ड पंच
पंचायत समिति
15 सदस्य (1 लाख की आबादी तक)
1 लाख से अधिक होने पर प्रत्येक 15,000 की वृद्धि पर 2 अतिरिक्त सदस्य
जिला परिषद
17 सदस्य (4 लाख की आबादी तक)
4 लाख से अधिक होने पर प्रत्येक 1 लाख की वृद्धि पर 2 अतिरिक्त सदस्य
पदेन सदस्य
स्तर
पदेन सदस्य
ग्राम पंचायत
ग्राम विकास अधिकारी (VDO), संबंधित पंचायत समिति व जिला परिषद सदस्य
पंचायत समिति
खंड विकास अधिकारी (BDO), संबंधित क्षेत्र के विधायक, सांसद, जिला परिषद सदस्य, पंचायत समिति में आने वाले सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच, विधायक द्वारा मनोनीत व्यक्ति
जिला परिषद
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), जिले के सभी सांसद (लोकसभा व राज्यसभा), सभी विधायक (विधानसभा व विधान परिषद), जिले के सभी प्रधान, सांसद द्वारा मनोनीत सदस्य, जिला कलेक्टर
वेतन विवरण
पद
वेतन (रु.)
सरपंच
4,800
प्रधान
8,400
जिला प्रमुख
12,000
नोट: वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजट में सरपंच, प्रधान और जिला प्रमुख के वेतन में 20% वृद्धि की घोषणा की गई थी।
ऐच्छिक प्रावधान
73वें संशोधन अधिनियम के कुछ प्रावधानों को लागू करना या न करना, राज्यों की इच्छा पर छोड़ा गया। वे प्रावधान हैं-
पंचायती राज संस्थाओं का नामकरण।
M.P. व M.L.A. वगैरा को पंचायती राज संस्थाओं में प्रतिनिधित्व देना।
पिछड़े वर्गों (OBC) को आरक्षण।
पंचायती राज संस्थाओं विभिन्न शक्तियाँ, कार्य व वित्तीय अधिकार आदि देना।
कार्य –
अनुच्छेद 243A के तहत इन संस्थाओं के लिए 29 कार्य निर्धारित किये गये हैं। इन 29 कार्यों का तालेख 11वीं अनुसूची में है।
इन 29 कार्यों में से कितने कार्य पंचायत राज संस्थाओं को देने है यह राज्य विधानमण्डल पर छोड़ा गया है।
राजस्थान में इन 29 में से 25 कार्य इन संस्थाओं को दिये जा चुके है।
अनुच्छेद 243H के तहत राज्य विधानमण्डल इन संस्थाओं को कर लगाने की भी शक्ति दे सकता है।