राजस्थानी चित्रकला

राजस्थानी चित्रकला राजस्थान की पारंपरिक कला शैलियों का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें रंगों की चमक, सूक्ष्म रेखांकन और भावनात्मक अभिव्यक्ति विशेष रूप से दिखाई देती है। यह विषय राजस्थानी कला व संस्कृति के अंतर्गत महत्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि इसके माध्यम से राज्य की ऐतिहासिक परंपराओं, राजदरबारों और लोक जीवन का कलात्मक चित्रण देखने को मिलता है। राजस्थानी चित्रकला अपनी विशिष्ट शैली और सांस्कृतिक गहराई के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है।

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राजस्थानी चित्रकला के प्राचीनतम साक्ष्य –

  • जयपुर व बैराठ सभ्यता से अनेक चित्र प्राप्त हुए हैं, इसलिए इसे ‘प्राचीन युग की चित्रकला’ कहा जाता है।
  • आलनिया गाँव (कोटा), चंबल नदी के किनारे से 5 हजार ईसा पूर्व के चित्र प्राप्त हुए हैं।
  • डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर को दर (भरतपुर) से पहनियों के चित्र प्राप्त हुए हैं।
  • अलंकृत ईंटों के साक्ष्य कालीबंगा (हनुमानगढ़) से मिले हैं।
  • राजस्थान के सबसे पुराने उपलब्ध चित्रित ग्रंथ – औध निर्युक्ति वृत्ति’ और ‘दस वैकालिक सूत्र चूर्णि (1060 ईस्वी)

महत्वपूर्ण तथ्य –

  • मेवाड़ – राजस्थानी चित्रकला का प्राचीनतम केन्द्र (अजंता चित्रकला से प्रेरित)
  • आनन्द कुमार स्वामी – राजपूत पेंटिंग” नामक किताब (1916) में पहला वैज्ञानिक विभाजन किया [पहाड़ी चित्र शैली को राजस्थान पेंटिंग के अंदर रखा]
    • राजपूत कला: मिस्टर ब्राउन, स्मिथ, जी. ए. ग्रेयरसन, जी. थॉमस
    • राजपूत शैली: आनंद कुमार स्वामी,ओ.सी. गांगुली एवं हैवेल
    • हिंदू शैली: एच.सी. मेहता, नरसिराव
    • राजस्थानी शैली: रामकृष्ण दास, कर्नल जेम्स टॉड, जी.एस. ओझा
  • स्वर्ण काल – 17वीं शताब्दी और 18वीं शताब्दी का प्रारंभिक काल
  • कार्ल जमशेद खंडालावाला ने 17वीं शताब्दी को राजस्थानी चित्रकला का स्वर्णकाल माना
  • विलियम लॉरेंस – राजस्थानी चित्र शैली भारतीय चित्र शैली का विशुद्ध रूप
  • कुंदनलाल मिश्र – राजस्थान की आधुनिक चित्रकला की शुरुआत का श्रेय
  • लामा तारानाथ – तिब्बती इतिहासकार, मरुप्रदेश के शृंगधर चित्रकार का उल्लेख किया।

विभिन्न सतह के आधार पर चित्रण

सतहचित्रण
दीवार पर चित्रणमांडना – घर की देहरी, आँगन, चौक व पूजन स्थलों को सजाने हेतु बनाए जाने वाले अलंकरण।भराड़ी – भील जनजाति में विवाह अवसर पर दीवार पर बनाया जाने वाला मांगलिक चित्र।थापा – हथेलियों व अंगुलियों के छापों से बना लोक चित्रण।सांझी – गोबर से निर्मित पूजास्थल; श्राद्ध पक्ष में कुंवारी कन्याओं द्वारा माता पार्वती के रूप में बनाया जाता है।
लकड़ी पर चित्रणकावड़ – अनेक द्वारों वाली काष्ठाकृति; प्रत्येक द्वार पर देवताओं के चित्र; प्रायः लाल रंग में।बेवाण – सामने से खुलने वाला काष्ठ मंदिर; जलझूलनी एकादशी पर देव विग्रहों की शोभायात्रा में प्रयुक्त।
कपड़े पर चित्रणपिछवाई – कृष्ण मंदिरों में प्रतिमा के पीछे लगने वाले कपड़ों पर कृष्ण-लीलाओं का चित्रण।बाटिक – कपड़े पर मोम की परत चढ़ाकर चित्र बनाने की कला।
मानव शरीर पर चित्रणगोदना – त्वचा खोदकर काला रंग भरने से बनाया गया स्थायी निशान; जनजातीय समाज में प्रचलित।मेहन्दी – विवाह व शुभ अवसरों पर स्त्रियों द्वारा लगाई जाती है; हरा रंग समृद्धि व लाल रंग प्रेम का प्रतीक।
अन्यमणिकुट्टिम: मोती और लाख का उपयोग।कजली पेंटिंग – काजल से बनाई जाने वाली चित्रकला; ब्रश के स्थान पर हाथ व कपड़े का प्रयोग।

दीवार पर चित्रण

  • मांडना – घर की देहरी, आँगन, चौक व पूजन स्थलों को सजाने हेतु बनाए जाने वाले अलंकरण।
  • भराड़ी – भील जनजाति में विवाह अवसर पर दीवार पर बनाया जाने वाला मांगलिक चित्र।
  • थापा – हथेलियों व अंगुलियों के छापों से बना लोक चित्रण।
  • सांझी – गोबर से निर्मित पूजास्थल; श्राद्ध पक्ष में कुंवारी कन्याओं द्वारा माता पार्वती के रूप में बनाया जाता है।

लकड़ी पर चित्रण

  • कावड़ – अनेक द्वारों वाली काष्ठाकृति; प्रत्येक द्वार पर देवताओं के चित्र; प्रायः लाल रंग में।
  • बेवाण – सामने से खुलने वाला काष्ठ मंदिर; जलझूलनी एकादशी पर देव विग्रहों की शोभायात्रा में प्रयुक्त।

मानव शरीर पर चित्रण

  • गोदना – त्वचा खोदकर काला रंग भरने से बनाया गया स्थायी निशान; जनजातीय समाज में प्रचलित।
  • मेहन्दी – विवाह व शुभ अवसरों पर स्त्रियों द्वारा लगाई जाती है; हरा रंग समृद्धि व लाल रंग प्रेम का प्रतीक।

कपड़े पर चित्रण

  • पिछवाई – कृष्ण मंदिरों में प्रतिमा के पीछे लगने वाले कपड़ों पर कृष्ण-लीलाओं का चित्रण।
  • बाटिक – कपड़े पर मोम की परत चढ़ाकर चित्र बनाने की कला।

अन्य 

  • मणिकुट्टिम: मोती और लाख का उपयोग।
  • कजली पेंटिंग – काजल से बनाई जाने वाली चित्रकला; ब्रश के स्थान पर हाथ व कपड़े का प्रयोग।

भित्ति चित्रण की विधियाँ

फ्रेस्को के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं:

बुओन फ्रेस्को (Buon Fresco)
  • गीली चूने की पलस्तर वाली दीवार पर रंग लगाए जाते हैं।
  • रंग दीवार के सूखने के साथ स्थायी रूप से जम जाते हैं।
  • सबसे टिकाऊ और पारंपरिक विधि
  • स्थानीय नाम: आरायश, अलगीला, मोरकासी या पणा 
  • शेखावाटी हवेलियों में: बाहरी दीवारें – बुऑन फ्रेस्को (आरायश/गीला तरीका) → मौसम प्रतिरोधी।
फ्रेस्को सेको (Fresco Secco / सूखा फ्रेस्को)
  • पूरी तरह सूखी दीवार पर चित्र बनाए जाते हैं
  • रंग को चिपकाने के लिए गोंद/अंडे की जर्दी जैसे बाइंडर का प्रयोग
  • बुओन फ्रेस्को से कम टिकाऊ, प्राय: touch-up और fine detailing के लिए उपयोग
  • अंदरूनी दीवारें और छतें – सेको फ्रेस्को → डिटेल के लिए
मेज्जो फ्रेस्को (Mezzo Fresco)
  • हल्की नम या लगभग सूखी दीवार पर चित्रण
  • सेको से अधिक मजबूत और बुओन से आसान
  • बड़े चित्रों के लिए उपयोगी

प्रमुख चित्रकला संग्रहालय व संस्थाएँ –

संग्रहालय का नामस्थान
जिनभद्र सूरी भण्डारसोनार दुर्ग (जैसलमेर)
पोथीखानाजयपुर
सरस्वती भण्डारउदयपुर
मान प्रकाश पुस्तकालयमेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर)
संस्था का नामस्थान
पश्चिमी सांस्कृतिक केन्द्रउदयपुर
प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुपउदयपुर
टखमण- 28उदयपुर
पैगजयपुर
कलावृत्तजयपुर
आयामजयपुर
क्रिएटिव आर्टिस्ट ग्रुपजयपुर
जवाहर कला केन्द्रजयपुर
राजस्थान ललित कला अकादमीजयपुर
मयूरवनस्थली (टोंक)
धोराजोधपुर
चित्तेराजोधपुर

भौगोलिक एवं सांस्कृतिक आधार पर राजस्थानी चित्रकला को हम चार शैलियों (स्कूल) में विभक्त कर सकते है

  1. मेवाड़ स्कूल :
    1. चावंड शैली, उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, सावर उपशैली, शाहपुरा उपशैली, और बनेरा, बागोर, बेगूं व केलवा जैसे ठिकानों की चित्रकला
  2. मारवाड़ स्कूल:
    • जोधपुर शैली, बीकानेर शैली, किशनगढ़ शैली, अजमेर शैली, नागौर शैली, सिरोही शैली, जैसलमेर शैली, और घाणेराव, रियां, भीनाय व जुनीयां ठिकानों की चित्रकला
  3. ढूंढाड़ स्कूल:
    1. आमेर शैली, जयपुर शैली, शेखावाटी शैली, अलवर शैली, उनियारा उपशैली, और झिलाई, ईसारदा, शाहपुरा व सामोद जैसे ठिकानों की चित्रकला
  4. हाड़ौती स्कूल:
    1. बूंदी शैली, कोटा शैली, झालावाड़ उपशैली

मेवाड़ स्कूल

मेवाड़/उदयपुर चित्रशैली-

  • मेवाड़ राजस्थानी चित्रकला का सबसे प्राचीन एवं प्रमुख केन्द्र माना जाता है।
  • इस चित्रशैली में पोथी ग्रंथों का सर्वाधिक चित्रण हुआ।
  • विकासमहाराणा कुम्भा के समय (राजस्थान में चित्रकला के जनक)
  • स्वर्णकाल – महाराणा जगतसिंह प्रथम
  • इस चित्र शैली पर अजन्ता शैली का प्रभाव पड़ा था।
  • शिकार के दृश्यों में त्रिआयामी (3D) प्रभाव

चित्रित ग्रंथ 

महत्वपूर्ण तथ्य

श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि

  • मेवाड़ चित्रशैली का सबसे प्राचीन ग्रंथ
  • चित्रण 1260–61 ई. में महाराणा तेजसिंह के समय, स्थान आहड़ (उदयपुर)
  • चित्रकार कमलचन्द्र; ताड़ पत्रों पर चित्रित

सुपासनाह चरियम (सुपार्श्वनाथ चरित्रम)

  • मेवाड़ चित्रशैली का दूसरा प्राचीन ग्रंथ
  • चित्रण 1423 ई. में महाराणा मोकल के समय; चित्रकार देवकुल पाठक; स्थान देलवाड़ा (सिरोही)
  • जैन व गुजराती शैली का मिश्रण
  • वर्तमान – सरस्वती संग्रहालय में संरक्षित

चौरपंचाशिका शैली का उद्गम

  • कला इतिहासकार डगलस बैरेट एवं बेसिल गे ने इस शैली का उद्गम मेवाड़ में माना
महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628–1652 ई.)
  • इन्होंने राजमहल में ‘चितेरों की ओवरी’ / ‘तस्वीरां रो कारखानों’ नामक चित्रकला विद्यालय की स्थापना की।
  • इनके काल में चित्रकला को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ।
  • प्रमुख चित्रकार – मनोहर एवं साहबद्दीन 
  • साहबद्दीन – महाराजाओं के व्यक्तिचित्र (Portraits) बनाए
  • भारी वस्तु गहरे रंग तीव्र ऊर्जस्विता वाले रंग से चित्रित 
  • हल्की वस्तु हल्के न्यून ऊर्जस्विता वाले रंग से चित्रित
  • महाराणा जगतसिंह प्रथम के समय कृष्ण चरित्र की भाँति रामचरित्र का भी चित्रांकन हुआ।
  • रामायण का चित्रांकन 1649–1653 ई. के मध्य
  • साहबद्दीन एवं मनोहर द्वारा किया गया।
  • महाराणा उदयसिंह (1535–1572 ई.) के काल में भागवत पुराण का प्रसिद्ध चित्र ‘पारिजात अवतरण’ (1540 ई. मेवाड़ के चित्रकार नानाराम द्वारा बनाया गया था।
  • महाराणा जयसिंह के काल में लघु चित्रों का सर्वाधिक निर्माण हुआ।
  • महाराणा हम्मीर सिंह के काल में ‘बड़े पन्नों’ पर चित्र बनाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
  • महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के समय प्रमुख चित्रकार नुरुद्दीन था, जिसने विष्णु शर्मा द्वारा रचित ‘पंचतंत्र’ पर अनेक चित्र बनाये।
  • कलीला-दमना मेवाड़ चित्रशैली में चित्रित पंचतंत्र की कहानी के दो प्रमुख पात्र है। यह दो गीदड़ों की एक कहानी है।
  • मेवाड़ शैली के प्रमुख चित्रकार – भक्ता, साहबद्दीन, मनोहर, शाह उमरा, कमलचन्द, हीरानंद, जीवाराम, भैंरुराम, नासिरुद्दीन, कृपाराम, नुरुद्दीन, जगन्नाथ।

पुरुष चित्रण की विशेषताएँ

महिला चित्रण की विशेषताएँ

  • छोटा कद
  • गोल अण्डाकार चेहरा
  • घनी दाढ़ी-मूँछें,गठीला लम्बा शरीर
  • विशाल नयन
  • छोटी और मोटी ग्रीवा
  • मेवाड़ी पगड़ी
  • बड़ी-बड़ी आँखें
  • कपोल तक जुल्फें
  • कानों में मोती
  • छोटा कद
  • उदात्त व सरल भाव लिए चेहरा
  • पत्तियों के समान भौहें
  • मीनाकृत आँखें
  • गरूड़ जैसी नाक
  • छोटी ठोड़ी
  • गाल पर काला तिल
  • पोशाक या आभूषण – कर्णफूल, बाजूबन्द, पायल, बोर, कंगन
  • पेड़, पशु-पक्षी – कदम्ब, चकोर, हंस, मोर
  • रंग – चटकीले रंगों का प्रयोग इस शैली में किया गया है।

नाथद्वारा चित्रशैली

  • उदयपुर + ब्रज शैली का मिश्रण
  • पुष्टिमार्ग की मुख्य पीठ → नाथद्वारा (1672 ई. में श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापना)
  • प्रारंभ: महाराणा राजसिंह का काल (1652–80 ई.)
  • वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव → वल्लभ चित्रशैली
  • मुख्य विषय: कृष्ण-यशोदा चित्र, कृष्ण बाल-लीला, गायें 
  • प्रमुख विषय – भित्ति चित्र, पिछवाइयाँ, श्रीनाथजी, गायों का अंकन
  • प्रमुख चित्रकार
    • बाबा रामचन्द्र, नारायण, रामलिंग, चतुर्भुज, चम्पालाल, घासीराम, तुलसीराम, उदयराम, हरदेव, हीरालाल, विठ्ठल
    • महिला चित्रकार: कमला, इलायची
  • महिला चित्रण
    • प्रौढ़ता, छोटा कद
    • तिरछी/चकोर आँखें, नथ में मोती
    • स्थूल शरीर, वात्सल्य भाव
    • मंगलसूत्र
  • रंग: हरा, पीला
  • वृक्ष: केला (कदली)

देवगढ़ उप-चित्रशैली

  • मारवाड़ + जयपुर + मेवाड़ शैली का मिश्रण
  • प्रारम्भ: देवगढ़ के रावल द्वारकादास चूंडावत का समय
  • प्रकाश में लाने का श्रेय: डॉ. श्रीधर अंधारे
  • स्वर्णकाल – द्वारका दास चुण्डावत का काल  
  • देवगढ़ के सामंत — ‘सोलहवें उमराव’
  • सर्वाधिक विकास: महाराणा जयसिंह का काल
  • इस चित्र शैली के भित्ति चित्र ‘अजारा की ओवरी’, ‘मोती महल’ में चित्रित है।
  • प्रमुख चित्रकार – बगता,चोखा, कँवला प्रथम, कँवला द्वितीय, हरचंद, नगा, बैजनाथ।

चावण्ड चित्रशैली

  • प्रारम्भ: 1585 ई., महाराणा प्रताप का काल
  • स्वर्णकाल: महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597–1620 ई.)
  • 1592 ई.: निसारदीन द्वारा ढोला–मारू चित्र (दिल्ली संग्रहालय)
  • 1605 ई.: निसारदीन द्वारा रागमाला ग्रंथ का चित्रण
  • महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय (1710–34 ई.) के समय प्रमुख चित्र: गीत गोविन्द, सुन्दर श्रृंगार, मुल्ला दो प्याजा के लतीफे, बिहारी सतसई, कलीला–दमना(नुरुद्दीन), बारहमासा
  • मुख्य चित्रकार – नसुरुद्दीन, साहिबुद्दीन, मनोहर, कृपाराम, गंगाराम, जगन्नाथ, नुरुद्दीन

मारवाड़ स्कूल

मारवाड़ / जोधपुर चित्रशैली

  • तिब्बती इतिहासकार तारानाथ लामा ने 7वीं सदी में मारू देश में चित्रकार श्रृंगधर का उल्लेख किया। जिसने पश्चिमी भारत में यक्ष शैली को जन्म दिया। इसके प्रारम्भिक चित्रावेश हमे प्रतिहारकालीन ओध निर्युक्ति वृत्ति में मिलते हैं।
  • प्रमुख विषय: प्रेमाख्यान।
  • आरम्भ: राव मालदेव का काल।
    • राव मालदेव द्वारा चोखेलाव महल (मेहरानगढ़) में दो चित्र:
      • राम–रावण युद्ध
      • सप्त सती (मारवाड़ शैली के प्रारम्भिक चित्र)
  • एच. के. मूलर ने दुर्गादास राठौड़ का चित्र बनाया।
  • महाराजा अभयसिंह के काल में चित्रकार: डालचन्द।
  • सूरसिंह के समय ढोला–मारूभागवत पुराण का चित्रण
  • वीरजी भाटी ने वीर पुरुष विठ्ठलदास चंपावत के लिए रागमाला का चित्रण किया
  • महाराजा उदयसिंह प्रथम मुगल शैली का प्रभाव
  • महाराजा तख्तसिंह – कम्पनी शैली का प्रभाव
  • जसवंतसिंह–I 
    • स्वर्णकाल – जसवंतसिंह–I, महाराजा मानसिंह
    • कृष्ण लीलाओं का चित्रण; 1803–1843 तक मुगल प्रभाव।
  • महाराजा अजीतसिंह सर्वाधिक सुंदर व प्राणवान चित्र।
  • महाराजा मानसिंह के समय
    • नाथों के मठों में जोधपुर शैली का विकास
    • महामंदिर व उदयमंदिर में ग्रंथ चित्रण
    • 1623 ई.: वीरजीदास भाटी द्वारा रागमाला
    • शिव पुराण, दुर्गा पुराण, नाथ चरित्र आदि का चित्रण
  • प्रमुख चित्रकार
    • वीरजी, दाना भाटी, रतनजी भाटी, माधोदास, शंकरदास, अमरदास, बिशनदास, शिवदास, देवदास, फतेह मोहम्मद, चाँद तैय्यब, रामसिंह भाटी, जीतमल, रामा, नाथा, छज्जू, सैफू 
  • प्रमुख ग्रंथ / विषय
    • ढोला–मारू, सूरसागर, रसिकप्रिया, रागमाला (वीरजी)
  • मारवाड़ / जोधपुर चित्रशैली की विशेषताएँ 
    • मरुस्थल, घोड़े, झाड़ियाँ आदि का चित्रण
    • प्रेमाख्यानों का चित्रण → ढोला-मारू, महेन्द्र-मूमल
    • चित्रों में गति एवं मुद्राओं में नाटकीयता
    • ऊँची पाग जोधपुर शैली की विशिष्ट देन
    • रंग – लाल एवं पीले रंगों की प्रधानता
    • नेत्र – बादाम के समान 
    • वृक्ष – आम का चित्रण
    • पुरुष: लंबे-चौड़े, गठीले शरीर, ऊँची पाग, राजसी वस्त्राभूषण।
    • महिलाएं: ठेठ राजस्थानी ओढ़नी, लाल फूंदणा, लहँगा, ठिगना कद।

बीकानेर चित्रशैली

  • मुग़ल + दक्कन शैली का समन्वय 
  • महाराजा रायसिंह के काल में 
    • भागवत पुराण बीकानेर शैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ
    • नूर मोहम्मद दरबारी चित्रकार
    • उस्ता अली रजा हामिद रुकनुद्दीन को मुगल दरबार से लाए जिससे उस्ता शैली उदभव हुई  
    • धार्मिक चित्रों का सर्वाधिक चित्रण
  • फव्वारों व दरबारी दृश्यों में दक्षिण शैली का प्रभाव
  • 18वीं सदी में ठेठ राजस्थानी रंगत वाले चित्र
  • महाराजा अनूपसिंह का काल
    • सर्वाधिक चित्रों का निर्माण → बीकानेर शैली का स्वर्णकाल
    • विशुद्ध बीकानेर चित्रशैली का विकास
    • द्रविड़ शैली का प्रभाव
    • उस्ता कला व मथैरणा कला का विकास
  • महाराजा सूरतसिंह – कम्पनी शैली का प्रभाव
कला प्रमुख विशेषताएँ प्रमुख कलाकार
उस्ता कलाऊँट की खाल एवं कूम्पों पर सोने की नक्काशी; बीकानेर की विशिष्ट अलंकरण कलाGI Tag – 2023अलीरजा, रुकनुद्दीन,हिसामुद्दीन उस्ता (पद्मश्री), हसन, अहमद उमरानी, क़ासिम उमरानी, नाथू, मुराद, शाह मोहम्मद, अब्दुल्ला, 
मथैरणा कलाबीकानेर के स्थानीय चित्रकारों की कलामथैरणा जैन समाज द्वारा विकसितनम दीवारों पर चूने की सतह पर देवी -देवताओं व धार्मिक कथाओं का चित्रणमुन्नालाल, रामकिशन, मुकुन्द, चन्दूलाल, जयकिशन, शिवराम, जोशी मेघराज
बीकानेर चित्रशैली की विशेषताएँ 
  • बरसते बादलों में सारस-मिथुनों का नयनाभिराम अंकन 
  • बीकानेरी रहन-सहन, राजपूती संस्कृति तथा मुगल स्कूल का मिश्रित प्रभाव
  • चित्रकार चित्र बनाकर उसके नीचे अपना नाम व तिथि का अंकन
  • प्रारम्भ से ही मुगल शैली का प्रभाव।
  • महिलाएं – इकहरी, तन्वंगी व कोमल नारी आकृतियाँ
  • पुरुष ऊँची मारवाड़ी पगड़ियां (शाहजहाँ-औरंगजेब शैली)
  • रंग – पीला (प्रधान), नीला, हरा, लाल, सलेटी, बैंगनी व जामुनी का प्रयोग
  • पशु – ऊँट, हिरण, घोड़ों का सर्वाधिक चित्रण

किशनगढ़ चित्रशैली 

  • कागज़ी शैली भी कहा जाता है
  • वल्लभ संप्रदाय का अधिक प्रभाव  
  • स्वर्णकाल – महाराजा सावंत सिंह/नागरीदास (1748–1764 ई.)
  • प्रकाश में लाने का श्रेय – डॉ. फैय्याज अली एरिक डिक्सन 
  • प्रेम-रस प्रधान शैली; गुलाबी रंग की प्रधानता।
  • विशेषताएँ
    • कृष्ण-लीलाओं का अधिक चित्रण
    • कांगड़ा शैली + ब्रज साहित्य का प्रभाव
    • नारी सौन्दर्य का प्रमुख अंकन
    • नारी चित्रों में नाक का आभूषण वेसरी (वेसर) बनाया गया है
    • आँखें – बादाम जैसी 
    • वृक्ष – मुख्यत: केला 
    • रंग – श्वेत, गुलाबी, स्लेटी, सिंदूरी
  • मानव आकृतियाँ
    • पुरुष – लंबा इकहरा नील छवियुक्त शरीर, उन्नत ललाट, सफेद/मूँगिया मोतीजड़ित पगड़ी।
    • स्त्री – तन्वंगी, लंबी, सुराही-सी गर्दन, पतली कमर, कर्णान्त (खंजन समान) आँखें, नुकीली चिबुक।
  • प्राकृतिक वातावरण
    • सिन्दूरी बादल, चाँदनी रात में राधा-कृष्ण की क्रीड़ाएँ, केले के वृक्ष, झीलों का अंकन।
  • प्रमुख चित्रकार
    • मोरध्वज निहालचंद, नानकराम, सीताराम, सूरध्वज, लालड़ीदास, सवाईराम, रामनाथ, तुलसीदास, अमरचंद, भंवरलाल, अमरु, सूरजमल, बदनसिंह
  • बणी-ठणी
    • किशनगढ़ शैली का प्रमुख चित्र।
    • चित्रकार – मोरध्वज निहालचंद (लियोनार्डो-द-विंची)।
    • 5 मई 1973 को 20 पैसे का डाक टिकट जारी।
    • एरिक डिक्सन द्वारा ‘भारत की मोनालिसा’ कहा गया।
    • वर्तमान – अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित 
    • अन्यचाँदनी रात की गोष्ठी (अमीरचंद)।

अजमेर चित्रशैली 

  • रंग – बैंगनी प्रधान
  • मसूदा, कैकड़ी, भिनाय ठिकानों के भित्ति चित्र इसी शैली के हैं।
  • चित्रकार –  चाँद (जूनियाँ), रामसिंह भाटी (नांद), तैय्यब (सावर) जालजी, नारायण भाटी (खरवा), माधोजी, राम (मसूदा), अल्लाबक्स (अजमेर), तैय्यब (सावर) आदि।
  • उस्ना और साहिबा (अजमेर) नामक महिला चित्रकार का भी नाम मिलता है।
  • जूनियाँ के चाँद द्वारा चित्रित राजा पाबूजी का सन् 1698 ई. का व्यक्ति चित्र इस चित्र शैली का सुन्दर उदाहरण है।
  • हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्म को समान प्रश्रय इस शैली में मिला है।

जैसलमेर शैली 

  • इस शैली के संरक्षणकर्त्ता महारावल हरराज, अखेसिंह एवं मूलराज भाटी II (स्वर्णकाल) हैं।
  • इस शैली को मांड शैली भी कहा जाता है।
  • पूर्णत: स्थानीय शैली (किसी भी चित्रशैली का प्रभाव नहीं)
  • चित्रण – मरुस्थल, झाड़ियों और ऊँटों का 
  • भित्ति चित्र हवेलियों पर चित्रित – नथमल की हवेली, पटवों की हवेली और सालिम सिंह मेहता की हवेली।
  • विशेषता – पारदर्शी पहनावा, मूमल का चित्रण मुख्य विषय
  • ढोलामारू का चित्रण जोधपुर शैली का मुख्य विषय था।

नागौर चित्रशैली –

  • कलात्मक बादल महल पर भित्ति चित्र बनाये गए।
  • वृद्धावस्था के चित्र तथा बुझे हुए रंगों का प्रयोग किया गया।
  • पारदर्शी वेशभूषा इस शैली की विशेषता।
  • लकड़ी के किवाड़ और किले के भित्ति चित्रण में मारवाड़ शैली का प्रभाव दिखाई देता है।

घाणेराव उप चित्रशैली 

  • घाणेराव गोड़वाड़ क्षेत्र का प्रमुख ठिकाना है जो जोधपुर के दक्षिण में स्थित है।
  • चित्रकार – नारायण, छज्जू और कृपाराम।

 ढूंढाड़ स्कूल

आमेर चित्रशैली –

  • चित्रकार – पुष्पदत्त, हुक्मचंद, मुरली
  • प्रारम्भकर्ता – मानसिंह + मिर्जा राजा जयसिंह
  • स्वर्णकाल – मिर्जाराजा जयसिंह प्रथम का काल 
  • चित्रकार पुष्पदत्त ने ‘आदि पुराण’ (1606) नामक ग्रन्थ का चित्रण किया था
  • चित्रित ग्रंथ –
    • यशोधरा चरित्र – (इस शैली के प्रारम्भिक काल का चित्रित ग्रंथ)
    • रज्मनामा की प्रति – (अकबर के लिए जयपुर सूरतखाने में- 1588, 169 बड़े आकार के चित्र)
    • बिहारी सतसई (चित्रकार मुरली)
    • रसिकप्रिया + कृष्ण-रुक्मिणी वेलि 1639 ई. (मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम ने अपनी रानी चंद्रावती के लिए)
  • विशेषता
    • आरम्भ से ही मुगल शैली का प्रभाव – बैराठ के मुगल गार्डन, मौजमाबाद के भित्ति चित्र
    • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग , आलागीला पद्धती का प्रारंभ

जयपुर चित्रशैली-

  • सवाई जयसिंह प्रथम – शैली का प्रारम्भ हुआ के समय
    • ‘छत्तीस कारखानों’ की स्थापना की, जिसमें सूरतखाना (चित्रकारी हेतु) भी एक है।
  • मोहम्मद शाह (सवाई जयसिंह द्वितीय का दरबारी चित्रकार) ने ‘रज्मनामा’ ग्रन्थ चित्रित करके सवाई जयसिंह द्वितीय को भेंट किया। (कृष्ण लीला के चित्र बनाये)।
  • रागमाला (1785-90) सम्पूर्ण सैट जिसमें 34 चित्र उपलब्ध हैं (छत्तीस राग-रागनियों पर आधारित है)।
  • सवाई ईश्वरी सिंह
    • सूरतखाना आमेर से जयपुर लाया गया
    • साहिबराम – ईश्वरी सिंह का आदमकद चित्र (राजस्थान में प्रथम) बनाया, राधा-कृष्ण का नृत्य का चित्र 
    • लालचंद – पशुओं की लड़ाई के चित्र 
  • सवाई माधो सिंह
    • मणिकुट्टिम तकनीक – चित्रकारों ने रंगों के स्थान पर मोती, लाख और अन्य उपयुक्त सामग्री को बाइंडर के साथ इस्तेमाल करना शुरू किया
    • भित्ति चित्र – गलताजी के मंदिर, सिसोदिया रानी का बाग (महल), चंद्र महल तथा पुंडरिक की हवेली की दीवारों पर बड़ी संख्या में 
    • प्रमुख चित्रकार – लाल चितेरा
  • सवाई प्रतापसिंह 
    • इनका काल जयपुर चित्रशैली का स्वर्णकाल रहा
    • राधाकृष्ण लीला, नायिका भेद, राग-रागिनी, बारहमासा का चित्रण  
    • गंधर्व बाइसी – इनके काल में 22 चित्रकार, 22 कवि, 22 संगीतकार, 22 विद्वानों की मंडली थी।
    • प्रताप सिंह ने हवामहल में ‘सूरतखाना’ चित्रकला का विभाग बनाया (अब सुरतखाना में 50 से ज्यादा कलाकार काम करने लगे)
  • प्रमुख चित्रकार –
    • रामसेवक, गोपाल, चिमना, हुकमा, सालिगराम, लालचन्द, लाल चित्तेरा
  • सवाई रामसिंह-II 
    • कम्पनी शैली का प्रभाव
    • चित्रकला के स्कूल मदरसा-ए-हुनरी/राजस्थान स्कूल आर्ट एण्ड क्राफ्ट की स्थापना।
    • कच्छवाहा – मुगल संबंध परिणाम – भित्ति चित्रों में फ्रेस्को का प्रयोग (स्थानीय भाषा में आला-गीला, अरायश या मोराकसी)
    • प्रकृति –
      • रूईदार सफेद बादलों का चित्रण, रात्रि में बिजली की तड़कन का चित्रण
    • पेड़ – आम, केला, पीपल, कदंब के वृक्ष।
  • जयपुर चित्र शैली की विशेषता –
    • रंग – हाशिये में गहरा लाल 
    • सोना और चाँदी भी प्रयुक्त किया जाता था।
    • चित्र – वात्स्यायन कृत कामसूत्र, फकीरों को भिक्षा देती नारी, कुरान पढ़ती शहजादी, हाथी घोड़ों के दंगल, लैला – मजनू  
    • मुगल प्रभाव, व्यक्तियों के यथार्थवादी और सटीक चित्र के कारण ‘शबीह’ शैली (‘प्रतिरूप’ या ‘समानता) भी कहा जाता है 
    • इस शैली में आरम्भ से ही मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव था।

अलवर चित्रशैली 

  • राव राजा प्रतापसिंह
    • अलवर शैली की शुरुआत (1775 ई.) 
    • चित्रकार – शिवकुमार और डालूराम दोनों को जयपुर से अलवर लाये
  • राव बख्तावर सिंह
    • ‘अलवर शैली’ का विकास → राजगढ़ के महलों में ‘शीशमहल’ का चित्रण 
    • प्रमुख चित्रकार – बलदेव, डालूराम, सालगा, सालिगराम
  • बलबंत सिंह –
    • लघुचित्र, लिपख़ाँ पटचित्र का चित्रांकन 
    • दुर्गा शप्तशती का चित्रांकन 
    • प्रमुख चित्रकार – छोटेलाल(परदाज/स्टिपलिंग में दक्ष), जमनालाल, सालिगराम, बकसाराम, नंदराम 
  • महाराजा विनयसिंह
    • अलवर चित्रशैली का स्वर्णकाल 
    • चित्रकार – डालूराम, नानकराम, नंदराम, मूलचंद सोनी, छोटेलाल, जमनालाल, सालिगराम, बकसाराम, बलदेव 
    • विनय सिंह बलदेव से चित्रकारी सीखते थे, इसने ‘गुलिस्तां’ (सूफी संत शेख सादी की पुस्तक) नामक पुस्तक के संस्करण का चित्रण किया
    • नंदराम जमनादास तिजारा उपशैली के चित्रकार थे।
  • महाराजा शिवदान सिंह – ‘कामशास्त्र’ के आधार पर चित्रण, ‘वैश्याओं के चित्र’ सर्वाधिक चित्रित किए गए
  • महाराजा मंगलसिंह
    • चित्रकार – मूलचंद, उदयराम
    • ‘हाथी दाँत’ पर चित्रकारी 
  • प्रमुख चित्रकार – जमनादास, जगमोहन, सालिगराम, छोटेलाल, बक्साराम, बलदेव, गुलाम अली, रामसहाय, रामगोपाल, रामप्रसाद, नन्दलाल, नेपालिया 
  • प्रमुख विशेषताएँ –
    • ईरानी + मुगल + जयपुर की चित्रकला का समन्वय
    • पुरुष – आम आकृति का मुख
    • महिलाएं – ठिंगने क़द, उठी हुई वेणियां 
    • सुन्दर बेल बूँटों वाली वसलियों का निर्माण, योगासन चित्रण और लघु चित्रण, चित्रों में ‘बॉर्डर’ को महत्त्व
    • बॉर्डर को महत्त्व देने वाली शैली को ‘बैसलो शैली’ कहते हैं

उणियारा चित्रशैली 

  • नरूका ठिकाने द्वारा विकसित की गई शैली है। (रावराजा सरदारसिंह)
  • उणियारा, जयपुर राज्य का एक ठिकाना था, जो वर्तमान में टोंक जिले में है।
  • जयपुर शैली + बून्दी शैली का मिश्रण 
  • चित्रकार – काशीराम, राम-लखन, मीरबक्श, धीमा, उगमा, भीम, कँवला, बख्ता, 
  • प्रसिद्ध चित्र –
    • बारहमासा, राग-रागिनी (कवि केशव की कविप्रिया पर आधारित)
    • राम-सीता, लक्ष्मण एवं हनुमान – मीरबक्श द्वारा

शेखावाटी चित्रकला –

  • यह कला स्थानीय साहूकारों, सेठों तथा जागीरदारों द्वारा हवेलियों पर चित्रण करवाकर विकसित की गई।
  • भित्ति चित्रण के लिए प्रसिद्ध (जयपुर शैली का प्रभाव), इसलिए ‘ऑपन आर्ट गैलरी’ भी कहते हैं।
  • नवलगढ़, लक्ष्मणगढ़, मुकुन्दगढ़, रामगढ़, पिलानी, बिसाऊ, मण्डावा आदि भित्ति चित्रण (फ्रेस्को) के लिए प्रसिद्ध है।
  • विशेषता –
    • भित्ति चित्रों के नीचें तिथि और नाम, 19वीं सदी के संक्रमण काल के बदलते परिवेश, परिवहन साधन, सामान्य जनजीवन का चित्रण, बड़े -बड़े हाथी घोड़े
    • राग-रागिनी, कामकला, गौ दोहन, मल्लयुद्ध, कुश्ती, साधुसंत और लोक कथाओं का विशेष अंकन (छज्जों के नीचें टोडों के मध्य)
    • ‘बलखाती बालों की लट का एक ओर अंकन’ इस शैली में हुआ।
    • प्रधान रंग – कत्थई, नीले व गुला

हाड़ौती स्कूल

बूँदी चित्रशैली

  • शुरुआत – राव सुरजन के समय 
  • राव शत्रुशाल (छत्रशाल) – चित्रशैली का विकास
    • रंग महल – सुन्दर भित्ति चित्रों के लिए विश्व प्रसिद्ध 
  • स्वर्ण काल – राव उम्मेद सिंह का काल
    • रणशाला/चित्रशाला महल – उम्मेद सिंह
      • ‘भित्ति चित्रों का स्वर्ग’ 
      • बूँदी शैली के सर्वाधिक चित्र
    • प्रसिद्ध चित्र – राव उम्मेद सिंह का जंगली सुअर का शिकार (1750 ई.)
  • प्रमुख चित्रकारसुर्जन, श्रीकिशन, नूर मोहम्मद, रामलाल, साधुराम, अहमद अली, रतन सिंह, लच्छीराम 
  • प्रमुख विषय
    • पशुओं और पक्षियों का चित्रण → ‘पक्षी शैली’ (चिंघाड़ते हाथी, सर्प, सारस, कबूतर, दौड़ते हुए सिंह, नाचते मोर, हाथियों की लड़ाई)
    • प्राकृतिक दृश्य – उमड़ते काले बादल, घनघोर वर्षा, बिजली की चमक, हरे-भरे वृक्ष, नाचते मयूर, हिंडोलों के चित्रण, लाल बादल, सुनहरे रंगों में इन्द्रधनुष,
    • राग-रागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, कृष्णलीला दरबार, शिकार, उत्सव अंकन, राजस्थानी संस्कृति का पूर्ण चित्रण 
  • विशेषता
    • हरे, नारंगी रंग की प्रधानता, सोने, चाँदी के रंगों की प्रधानता
    • मोर का चित्रण राज्य के सभी शैलियों में हुआ है, लेकिन नाचते हुए मोर का चित्रण केवल बूँदी शैली में हुआ 
    • रेखाओं का सुन्दरतम अंकन 
    • वृक्ष – खजूर
    • पुरुष – लम्बे, भरा हुआ मुख, बड़ी मूँछें, गोल माथा
    • स्त्री – लम्बी स्फूर्ति भरी इकहरी बदन वाली, पतले होंठ
    • नेत्र – परवल के समान
  • कार्ल खंडेलावाला ने बूँदी शैली पर अध्ययन किया और ‘बूँदी ग्रन्थावली’ नामक ग्रन्थ लिखा।

कोटा चित्र शैली (शिकार शैली)

  • बूँदी एवं मुगल शैली का मिश्रण
  • शुरुआत – महाराव रामसिंह-प्रथम (1661-1705 ई.)
  • प्रकाश में लाने का श्रेय – कर्नल डी.जी. गैयर एण्डरसर(1952)
  • महाराव उम्मेद सिंह-I 
    • इस शैली का स्वर्णकाल  
    • आखेट/शिकार के दृश्य मुख्यत:
  • महाराव भीमसिंह के समय
    • वल्लभ संप्रदाय के प्रभाव – कृष्ण-लीलाओं का चित्रण
  • प्रमुख चित्रकार – डालू, लच्छीराम, रामजीराम, गोविन्दराम, नूर मोहम्मद, रघुनाथ हैं।
  • डालू नामक चित्रकार ‘रागमाला’ (1768) नामक ग्रन्थ का चित्रण किया है जिसमे अधिकांश चित्र, शिकार पर आधारित हैं 
  • भगवान कृष्ण की लीला एवं राजा की शबीह आदि शामिल हैं।
  • ‘झालाओं की हवेली’ में कोटा शैली के सर्वाधिक भित्ति चित्र बने हैं।
  • विशेषताएँ 
    • इसमें सर्वाधिक चित्र शिकार पर, राजाओं के साथ-साथ रानियों को भी शिकार करते हुए दर्शाया, नारी सौन्दर्य का अधिक चित्रण 
    • रंग – हल्का हरा, पीला एवं नीला रंग
    • स्त्रियाँ – नाक छोटी, पतली कमर, आँखे बड़ी, ललाट बड़ा, लंहगे ऊँचे, वेणी अकड़ी हुई
    • पुरुष – मांसल शरीर, भरी-भरी दाढ़ी मूँछें, तलवार, कटार आदि युक्त वेशभूषा, चौड़े कन्धे इनकी छवि को आकर्षक बनाते हैं।

झालावाड़ उपशैली 

  • झालावाड़ के राजमहलों में श्रीनाथजी, राधाकृष्ण लीला, रामलीला, राजसी वैभव के जो भित्ति चित्र मिलते हैं, उनके माध्यम से झालावाड़ शैली का निर्धारण होना अभी शेष है।
  • दुगारी चित्र शैली का संबंध बूंदी चित्रकला शैली से है।
आधुनिक चित्रकारचित्रण विषय 
सौभाग्यमल गहलोतनीड़ का चितेरा
गोवर्धनलाल बाबाभीलों का चितेरा, आदिवासी जनजीवन 
राजगोपाल विजयवर्गीयसाहित्यकार व परम्परावादी चित्रकार
परमानन्द चोयलभैंसों का चितेरा – आधुनिक प्रयोगवादी चित्रकार 
देवकीनन्दन शर्माभित्ति चित्रण व पशु-पक्षी चित्रण में श्रेष्ठ
भूरसिंह शेखावतगाँवों का चितेरा – जनजीवन का चित्रण 
मास्टर कुन्दनलाल मिस्त्रीआधुनिक राजस्थानी चित्रकला के जनक
ज्योतिस्वरूपइनर जंगल (प्रसिद्ध चित्र श्रृंखला)
कैलाश चन्द्रजैन शैली का चितेरा
प्रतिभा पाण्डेकैनवास की चितेरी, प्रकृति चित्रण, “फॉल ऑफ़ बर्लिन” प्रसिद्ध चित्र 
जगमोहन माथोड़ियाश्वानों का चितेरा
किशन लाल शर्माराई का चितेरा
उमेश चन्द्र शर्माबातिक शैली के चितेरे
कैलाश जागोटियाक्लॉथ आर्ट के प्रणेता
किशन शर्माराई के दाने पर मीरा का चित्रण
एस. शाकिर अली मुगल शैली का चित्रकार 
प्रदीप मुखर्जीफड़ चित्रण का चितेरा
शिल्पगुरू बाबूलाल मारोटियामिनिएचर पेंटिंग कलाकार

राजस्थान की प्रमुख चित्र शैलियाँ और उनकी प्रमुख विशेषताएँ

क्रं.स  चित्र शैलीप्रमुख रंगआंखेवृक्षपशुपक्षी
1मेवाड़लाल व पीलामृग के समानकदम्बहाथीचकोर
2जोधपुरपीलाबादाम के समानआमऊँटकौआ व चील
3बीकानेरपीलातीर कमान के समानआमऊँटकौआ व चील
4+5जयपुर + अलवरहरामछली के समानपीपल / बरगदअश्वमोर
6कोटानीलाआम के समानखजूर  हरिण शेरबतख
7बूँदीसुनहराआम के समानखजूरहरिण शेरबतख
8किशन गढ़श्वेत/ गुलाबीखंजर के तीर कमान के समानकलागायमोर, हंस, बतख
9नाथद्वाराहरा व पीलाहिरण व गाय के समानकेलागायमोर
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