गुप्त साम्राज्य प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है। इस काल में कला, साहित्य, विज्ञान और राजनीति का अद्भुत विकास हुआ, जिसके कारण इसे ‘स्वर्ण युग’ के नाम से भी जाना जाता है।
गुप्त साम्राज्य (240 ई0 से 550 ई0 तक)

उत्पत्ति व पृष्ठभूमि
- मौर्य साम्राज्य पतन के बाद भारत की एकता समाप्त।
- कुषाण (उत्तर) व सातवाहन (दक्षिण) सीमित प्रभाव में रहे।
- 4वीं शताब्दी में पूर्वी भारत (मगध) से गुप्त वंश का उदय।
- गुप्त संभवतः कुषाणों के सामंत थे।
- पुराणों में — मागध गुप्त कहा गया।
- स्रोत – विष्णु पुराण, वायु पुराण, भागवत पुराण।
- प्रारंभिक क्षेत्र – मगध व उत्तर-पश्चिम बंगाल तक का गंगा तटीय प्रदेश।
गुप्त काल की उपाधियाँ व विशेषताएँ
- K.M. मुंशी – भारत का स्वर्ण युग
- वार्नेट – भारत का पेरिक्लीज युग
- मैक्समूलर – साहित्य का पुनर्जागरण काल
- R.D. बनर्जी – कला का पुनर्जागरण काल
- मजूमदार व अल्तेकर – गुप्त–वाकाटक युग
अभिलेख व सिक्कों की विशेषता
- रानियों के नाम अभिलेखों में (प्रथम – कुमारदेवी, प्रयाग प्रशस्ति)।
- सिक्कों पर राजा–रानी दोनों की आकृति (चन्द्रगुप्त–कुमारदेवी स्वर्ण मुद्रा)।
उत्पत्ति संबंधी मत
| विद्वान | मत |
| के.पी. जायसवाल | शूद्र / जाट (कीर्तिकौमुदी, चन्द्रगोमिन व्याकरण) |
| हेमचन्द्र राय चौधरी, दशरथ शर्मा | ब्राह्मण (धारण गोत्र – प्रभावती गुप्ता का पूना ताम्रपत्र) |
| रमेश चन्द्र मजूमदार, ओझा | वैश्य |
| अन्य (एलन, अल्तेकर, थापर, शर्मा) | क्षत्रिय / वैश्य मत समर्थक |
प्रारंभिक शासक
श्रीगुप्त (लगभग 240 ई0 280 ई0)
- गुप्तों का आदिपुरुष (गूढ़ पुरुष)
- प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त का उल्लेख गुप्त वंश के ‘आदिराज’ के रूप में किया गया है।
- महाराज की उपाधि धारण की।
- श्री गुप्त स्वतंत्र शासक न होकर संभवतः किसी शासन के अन्तर्गत सामन्त थे।
- चीनी यात्री इत्सिंग ने श्री गुप्त को ‘चिलिकितो’ कहा है।
- श्रीगुप्तों ने “श्रीपतनमृगदाय मंदिर” का निर्माण चीनी भिक्षुओं हेतु करवाया।
घटोत्कच (280 ई0 319 ई0)
- लगभग 280 ई0 में श्रीगुप्त ने घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया, इसने भी महाराज की उपाधि धारण की।
- प्रभावती गुप्ता के पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश का प्रथम राजा बताया गया है, इसका राज्य सम्भवतः मगध के आस-पास तक ही सीमित था।
चन्द्रगुप्त प्रथम (319–335/350 ई.)
- गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक, जिसने वंश को शक्ति प्रदान की।
- हेमचन्द्र राय चौधरी – द्वितीय मगध साम्राज्य का संस्थापक।
- राजधानी – पाटलिपुत्र (प्रारंभ में वैशाली नहीं था)।
- उपाधि – महाराजाधिराज (गुप्त वंश में प्रथम)।
- संवतकर्मा – गुप्त संवत (319–20 ई.) चलाया, जो वल्लभी संवत् के समान है।
- सर्वप्रथम प्रयोग – चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा अभिलेख में।
- अलबरूनी – यह शक संवत् से 241 वर्ष बाद प्रारंभ हुआ (319 ई.)।
- विवाह – लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी (राजा वृषदेव की पुत्री) से।
- इस विवाह से वैशाली गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित हुआ।
- सिक्के – प्रथम स्वर्ण सिक्के जारी किए।
- प्रकार – राजा-रानी, लिच्छवि प्रकार, विवाह प्रकार, राजदम्पति व देवी प्रकार।
- केवल एक चांदी का सिक्का मिला (इसलिए रजतमुद्रा प्रवर्तक नहीं)।
काच विवाद
- फादर हैरास – समुद्रगुप्त ने अपने भाई काच से युद्ध किया।
- काच मुद्राओं पर “सर्वराजोच्छेता” उपाधि अंकित (जो समुद्रगुप्त की है)।
- फ्लीट – काच मुद्राएँ वास्तव में समुद्रगुप्त की ही हैं।
समुद्रगुप्त (335/350–375 ई.)
- जानकारी : प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख)
- रचना : हरिषेण (कवि) [समुद्रगुप्त के दरबार में]
- उत्कीर्ण : तिलभट्ट
- भाषा : अलंकारिक संस्कृत भाषा
- शैली : गद्य + पद्य (चम्पू)
- लिपि : ब्राह्मी लिपि
- प्रयाग प्रशस्ति को प्रकाश मे लाने का श्रेय “एन्ट्रायर” को है।
- यह अभिलेख उसी स्तंभ पर उत्कीर्ण है, जिस पर अशोक का स्तम्भ लेख है।
- समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का उल्लेख
- जिसमें समुन्द्रगुप्त के राज्याभिषेक, दिग्विजय एवं व्यक्तित्व पर विशद् प्रकाश डाला गया है तथा कई अधिकारियों के पदों व नामों के उल्लेख से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
- प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को “कविराज”, गायन व संगीत में दक्षता में गुरु तुम्बरू व नारद को लज्जित करने वाला, लाख गायों का दानी, उच्चकोटि का विद्वान, विद्या का संरक्षक एवं धर्म का प्राचीर कहा गया।
- चन्द्रगुप्त के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना।
- विंसेट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा है।
- ऐरण अभिलेख में समुद्रगुप्त को प्रसन्न होने पर कुबेर के समान तथा रुष्ट होने पर यमराज के समान बताया गया। ऐरण अभिलेख में उसे पराक्रम तथा विजय का स्रोत कहा गया।
- समुद्रगुप्त द्वारा जारी किए गए सिक्कों में कुछ पर ‘अश्वमेध पराक्रम’ अंकन है, तो कुछ पर सम्राट को वीणा वादन करते हुए दिखाया गया है।
- चीनी स्रोत के अनुसार श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से बोधगया में बौद्धमठ बनाने की अनुमति माँगी।
- समुद्रगुप्त को 100 युद्धों का विजेता बताया गया।
- कृष्णचरित्र का रचयिता समुद्रगुप्त था।
- समुद्रगुप्त द्वारा किए गए अश्वमेघ यज्ञ का उल्लेख प्रयाग प्रशास्ति में नहीं आता है।
- प्रयाग प्रशस्ति पर बीरबल व जहाँगीर का लेख भी मिला है।
समुद्रगुप्त के 6 प्रकार के सोने के सिक्के:
| मुद्रा / प्रतीक | विशेषता / उपाधि |
| गरुड़ | अग्र भाग पर गरुड़ अंकित, पृष्ठ भाग पर सिंहासनारूढ़ समुद्र के साथ दत्तदेवी का अंकन, उपाधि : पराक्रमांक – शब्द उत्कीर्ण |
| धनुर्धारी | उपाधि : अप्रतिरथ |
| परशु | उपाधि : कृतांत परशु |
| अश्वमेध | अग्र भाग पर “अश्वमेध पराक्रमांक” उपाधि, पृष्ठभाग पर दत्तदेवी के साथ अश्वमेध यज्ञ अंकित |
| व्याघ्रहनन | मुख भाग पर “व्याघ्र पराक्रम:” उपाधि अंकित |
| वीणावादिन | समुद्रगुप्त को वीणा बजाते हुए दर्शाया गया, उपाधि – कविराज |
नोट : समुद्रगुप्त को उसके सिक्कों पर “लिच्छवी दौहित्र” भी कहा गया है।
समुद्रगुप्त की विजय –
- समुद्रगुप्त एक महान् शासन, सेनापति, कूटनीतिज्ञ, बहुआयामी प्रतिभा से युक्त यर्थाथवादी व्यक्तित्व था।
- समुद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तार में कश्मीर, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी राजपुताना, सिंध और गुजरात के अतिरिक्त शेष सारा भारत सम्मिलित था।
- समुद्रगुप्त ने भारत में एक नए युग की स्थापना की, वह अखिल भारतीय साम्राज्य के आदर्श से प्रेरित हुआ तथा सम्पूर्ण भारत वर्ष को राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधा ।
- उसके दरबारी कवि एवं महासंधिविग्रहक हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति में अपने आश्रयदाता समुद्रगुप्त के पराक्रम व दिग्विजय का वर्णन किया है।
- समुद्रगुप्त द्वारा अपनाई गई नीतियाँ-
- आर्यावर्त – प्रसभोद्वरण (जड़मूल से उखाड़ फेंकना)
- दक्षिणापथ – ग्रहणमोक्षानुग्रह
- आटविक राज्य – परिचारकीकृत नीति
- सीमावर्ती राज्य – सर्वकरदान, आज्ञाकरण, प्राणगमन
- विदेशी शक्तियों – गुरुत्मंदक स्वविषय भुक्तिशासन याचना (शक, कुषाण)
आर्यवर्त अभियान –
- समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम आर्यवर्त अर्थात् गंगा, यमुना दोआब पर सैनिक अभियान किया। जो दो चरणों में पूरा हुआ।
- नौ राजाओं रूद्रवेद, मतिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मन, गणपति, नाग, नागसेन, अच्युत, नंदी एवं बलवर्मा को पराजित किया, जिन्हें राजप्रसभोद्धरण की नीति के तहत साम्राज्य में मिला लिया।
दक्षिण अभियान
- समुद्रगुप्त ने दक्षिण के 12 राज्यों कौशल, महाकान्तर, कोरल, कोट्टूर, पिष्टपुर, एरनपल्ली, कांची, अवमुक्त, वैंगी, पल्लक, देवराष्ट्र, कुस्थलपुर आदि को पराजित किया। लेकिन उसने उन्हें ग्रहणमोक्षानुग्रह की नीति अर्थात् ग्रहण (शत्रु पर अधिकार), मोक्ष (शत्रु को मुक्त करना) एवं अनुग्रह (राज्य को लौटाकर) के तहत फिर मुक्त कर दिया।
- वह जानता था कि इन दूरस्थ भागों पर प्रत्यक्ष शासन असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य था। अतः उसने ग्रहणमोक्षानुग्रह की व्यवहारिक नीति का अवलम्बन किया।
आटविक राज्य
- समुद्रगुप्त ने मध्य भारत के आटविकों को भी परास्त किया व उन्हें अपना भृत्य बना दिया।
सीमावर्ती राज्य
- सीमान्त प्रदेशों के राजतन्त्रात्मक एवं गणतन्त्रात्मक राज्यों में भी भयभीत होकर अधीनता स्वीकार कर ली।
- जिनमें उत्तर पूर्व भारत के समतट डवाक् कामरूप, नेपाल, कर्तपुर व पश्चिमी भारत के नौ गणतन्त्र राज्य आभीर, अर्जुनायन मालव, यौद्धेय, मद्रक, प्रार्जुन, सनकानिक, काक व खरपरिक थे। इनके साथ सर्वदानाज्ञाकरण प्राणायाम की नीति का अवलंबन किया।
विदेशी शक्तियाँ
- देवपुत्र, शाहिशाहानुशाही, शक-मुरूण्ड तथा सिंहल आदि विदेशी शासकों ने समुद्रगुप्त से भयभीत होकर उससें मैत्रीयाचना की, इनके साथ आत्म-निवेदन, कन्योपायान, गुरूत्मदंकित, स्वविषय, भुक्ति, शासन याचना की नीति का अनुसरण किया।
- इस प्रकार समुद्रगुप्त ने भारत के बहुत बड़े भाग को अपने अधीन कर एकता के सूत्र में बाँधा और उससे कहीं अधिक भू-भाग में उसका लोहा माना जाता था, जो उसकी यथार्थवादी नीति का प्रतीक है। स्मिथ ने समुद्रगुप्त उसकी बहादुरी एवं युद्ध कौशल के कारण भारत का नेपोलियन कहा है।
समुद्रगुप्त के दो पुत्र :
- रामगुप्त(375 ई.- 380 ई.) :- उल्लेख गुप्त वंशावली में नहीं मिलता।
- चंद्रगुप्त II (380 ई.- 412/14 ई.)
रामगुप्त (375 ई.-380 ई.)
- समुद्रगुप्त की मृत्यु के बाद रामगुप्त शासक बना, यह कमजोर व निर्बल शासक था।
- रामगुप्त के शासन के समय शकों का आक्रमण हुआ इसने अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को शकों को सौंप दिया।
- चन्द्रगुप्त-II ने ध्रुवस्वामिनी को स्वतंत्र करवाया व भाई रामगुप्त की हत्या कर स्वयं शासक बना।
- इस सम्पूर्ण कथा का उल्लेख विशाखदत्त ने अपने ग्रंथ देवीचन्द्र-गुप्तम में किया है।
- रामगुप्त का उल्लेख बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरितम् व राजशेखर की काव्यमीमांसा में भी मिलता है।
नोट : आधुनिक भारत में राखालदास बनर्जी ने 1924 ई. में सर्वप्रथम रामगुप्त की ऐतिहासिकता को साबित करने का प्रयास किया।
चन्द्रगुप्त द्वितीय (375 ई0 414 ई0)
- समस्त गुप्त राजाओं में समुद्रगुप्त का पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से सम्पन्न था।
- चीनी यात्री फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया था। फाह्यान ने ‘फो-क्यों-की’ नामक ग्रंथ लिखा।
- इसके दरबार में कालिदास एवं अमर सिंह जैसे विद्वान रहते थे।
- शकों को पराजित करने की स्मृति में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चांदी के विशेष सिक्के जारी किए।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों को पराजित कर ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपाधियाँ – देवक्षी, देवगुप्त, देवराज, तत्परिगृहीत, विक्रमादित्य, विक्रमांक, परमभागवत, राजाधिराऋर्षि
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सर्वप्रथम वैवाहिक संबंधों द्वारा अपनी स्थिति सुदृढ़ की, उसने नागवंश की कुबेर नागा तथा कदम्ब वंश की राजकुमारी से स्वयं एवं वाकाटक वंश के रूद्रसेन द्वितीय से अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह किया। इनसे प्रभावशाली शासकों की मित्रता व संरक्षण प्राप्त हो गया।
- रूद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त ने अप्रत्यक्ष रूप से वाकाट्क राज्य को अपने राज्य में मिलाकर उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनायी।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया और सौराष्ट्र प्रायद्वीप को विजित किया। उसने पश्चिमी भारत के शकों को पराजित किया तथा शक शासक रूद्रसेन तृतीय को हराया। इससे गुजरात, मालवा व कठियावाड़ गुप्त साम्राज्य के अंग बन गए।
- हुणों की सक्रियता को देखते हुए उसने उत्तर पश्चिम के गणराज्यों का विलय कर लिया।
- महरौली अभिलेख से विदित होता है कि उसने पश्चिम में बाहलिक (बैक्ट्रिया) व पूर्व में बंगाल तक अपनी सत्ता का विस्तार किया।
- उज्जैन को दूसरी राजधानी बनाने से राज्य के समुद्री व्यापार एवं गुजरात प्रान्त के संसाधनों में वृद्धि हुई। प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र को।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नवरत्न।
- कालिदास
- वराहमिहिर
- शंकु
- धन्वन्तरी
- क्षपणक
- अमरसिंह
- वेताल भट्ट
- घटकर्पर
- वर रुचि
नोट – आर्यभट्ट नवरत्नों में शामिल नहीं था।
कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य / शक्रादित्य)
- काल: 415–455 ई.
- पिता: चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य
- माता: ध्रुवदेवी
- पत्नी: अनन्तादेवी
- 623 मुद्राएँ – बयाना मुद्रा भंडार से प्राप्त।
- शासन के अंतिम समय – पुष्यमित्र जनजातियों का विद्रोह।
- स्कन्दगुप्त के भीतरी स्तंभ लेख से विद्रोह का साक्ष्य।
उपाधियाँ : महेंद्रादित्य, श्रीमहेंद्र, अश्वमहेंद्र, शक्रादित्य (ह्वेनसांग के अनुसार), परमभागवत (गढ़वा अभिलेख)
अभिलेख (18 प्रमुख)
- बिलसड़ लेख – वंशावली ज्ञात, ध्रुव शर्मा का उल्लेख (कार्तिकेय भक्त)
- मंदसौर प्रशस्ति (473 ई.) – कवि वत्सभट्टी रचित, रेशम बुनकरों द्वारा सूर्य मंदिर निर्माण व दशपुर (मंदसौर) का उल्लेख, बंधुवर्मा राज्यपाल
- करमदण्डा अभिलेख (436 ई.) – पृथ्वीसेन द्वारा शिवलिंग स्थापना
- मथुरा लेख (432 ई.) – जैन मुनि दलिताचार्य का उल्लेख
- मानकुंवर लेख (448 ई.) – बुद्धमित्र द्वारा बुद्ध प्रतिमा स्थापना
- उदयगिरि लेख (425 ई.) – पार्श्वनाथ मूर्ति स्थापना
- सांची लेख (450 ई.) – हरिस्वामिनी नामक उपासिका द्वारा दान
- तुमैन लेख (435 ई.) – घटोत्कच गुप्त राज्यपाल; कुमारगुप्त को शरद् सूर्य कहा गया
- गढ़वा अभिलेख – दीनार सिक्कों का उल्लेख, पाटलिपुत्र में “सत्र” का दान
- दामोदरपुर, वैग्राम, धनदैह ताम्रपत्र (432–448 ई.) – भूमि क्रय-विक्रय विवरण, ग्राम प्रशासन: ग्रामिक, महत्तर, कुटुम्बिन, अष्टकुलाधिकारी
→ राज्यपाल: चिरादत्त (पुण्ड्रवर्धन)
सिक्के (14 प्रकार)
- मध्यम भारत में चाँदी के सिक्कों का प्रचलन प्रारम्भ
- प्रतीक: मयूर (कार्तिकेय), अप्रतिघ, गजारूढ़, खड्ग-निहन्ता प्रकार
- खड्ग-निहन्ता मुद्रा: कुमारगुप्त गैंडा मारते हुए
- अश्वमेध व वीणावादन प्रकार (समुद्रगुप्त समान)
- अश्वमेध यज्ञ – दो बार किया
- बयाना से 623 मुद्राएँ, सतारा से 1395 मुद्राएँ मिलीं
धार्मिक व सांस्कृतिक कार्य
- वैष्णव होते हुए भी सहिष्णु
- नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना – “शक्रादित्य” (कुमारगुप्त की उपाधि) द्वारा
→ महायान बौद्ध धर्म का केंद्र, “बौद्धों का ऑक्सफोर्ड” कहा गया
स्कन्दगुप्त (क्रमादित्य / विक्रमादित्य)
- काल: 455–467 ई.
- पिता: कुमारगुप्त प्रथम
- राजधानी: अयोध्या
- धर्म: वैष्णव (परमभागवत)
उपाधियाँ : क्रमादित्य, विक्रमादित्य, शक्रोपम, श्रीपरिक्षिप्तवक्षा, परम भागवत
प्रमुख अभिलेख
- जूनागढ़ लेख – हूण नरेश खुशनेवाज पर विजय; सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण
→ निर्माण: पर्णदत्त का पुत्र चक्रपालित
→ झील मूलतः चन्द्रगुप्त मौर्य काल में पुष्यगुप्त वैश्य ने बनवाई थी - भीतरी अभिलेख (गाजीपुर) – पुष्यमित्र व हूणों पर विजय, “गुप्तवंशैकवीर” कहा गया
→ हूण युद्ध गंगा घाटी में हुआ (“श्रोत्रेषु गंगाध्वनि”) - कहौम स्तम्भ लेख (460 ई.) – ‘शक्रोपम’ उपाधि, भद्र द्वारा 5 जैन तीर्थंकर प्रतिमाएँ
- गढ़वा अभिलेख (467 ई.) – अन्तिम लेख; चित्रकूट स्वामी (राम), अनन्त स्वामी (विष्णु) का उल्लेख
- सूपिया अभिलेख (रीवा, 460 ई.) – गुप्तों को घटोत्कच वंश का बताया
- इन्दौर ताम्रपत्र (465 ई.) – सूर्य मंदिर व दान
सिक्के
- सबसे भारी स्वर्ण मुद्रा (144–146 ग्रेन)
- नयी मुद्राएँ: नन्दी (बैल) प्रकार, वेदिका प्रकार
- चाँदी के सिक्कों का अन्तिम प्रयोग गुप्तों में
- 466 ई. में चीन के सांग सम्राट के दरबार में राजदूत भेजा
स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारी
| शासक | काल | प्रमुख तथ्य |
| पुरुगुप्त | 467–473 ई. | कुमारगुप्त व अनन्तादेवी का पुत्र; बौद्ध धर्मावलंबी; पत्नी – चन्द्रदेवी |
| कुमारगुप्त द्वितीय | 473–476 ई. | मंदसौर अभिलेख (रेशम बुनकरों का जीर्णोद्धार) |
| बुद्धगुप्त | 476–494 ई. | ‘श्रीविक्रम’ उपाधि; परमभट्टारक; दामोदरपुर ताम्रपत्र; बौद्ध मतावलंबी |
| नरसिंहगुप्त बालादित्य | 495–510 ई. | हूण नरेश मिहिरकुल को पराजित कर क्षमादान; बौद्ध अनुयायी; गुरु – वसुबंधु |
| भानुगुप्त | 510 ई. | एरण अभिलेख; सेनापति गोपराज की पत्नी का सती होना – सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय उल्लेख |
| वैन्यगुप्त | 510–? ई. | बंगाल का शासक; गुणैधर अभिलेख – ‘महासामंत’ व ‘पाटक’ का उल्लेख; शैव होते हुए महायान संघ को दान |
| कुमारगुप्त तृतीय | अंतिम प्रमुख शासक | माता मित्रदेवी; ‘चन्द्रादित्य’ उपाधि |
| विष्णुगुप्त | लगभग 550 ई. | गुप्त वंश का अन्तिम शासक |
गुप्त साम्राज्य का पतन
- हूण आक्रमण (खुशनेवाज, मिहिरकुल)
- साम्राज्य तीन भागों में बँट गया (मगध, मालवा, बंगाल)
- प्रांतीय राज्यपाल शक्तिशाली हुए
- मुद्रा व प्रशासनिक अव्यवस्था
गुप्त प्रशासन
- गुप्त काल को हिन्दू संस्कृति का स्वर्ण-युग व क्लासिकल युग कहा गया है।
- गुप्त साम्राज्य उत्तर में हिमालय से दक्षिण में विंध्य पर्वत तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक था।
- गुप्त साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी।
- गुप्त साम्राज्य की शासन व्यवस्था राजतन्त्रात्मक थी।
- गुप्त प्रशासन में मौर्यकाल के विपरीत विकेन्द्रीकरण की प्रवृति बढ़ने लगी।
- गुप्त सम्राटों को ‘महाराजाधिराज’, परमभट्टारक, एकाधिराज, महाराजाधिराज पृथ्वीपाल, परमेश्वर, सम्राट, परमदेवता, चक्रवर्तिन आदि उपाधियाँ थी।
| केन्द्रीय अधिकारी:- | |
| प्रतिहार | सुरक्षा अधिकारी |
| महाप्रतिहार | सुरक्षा अधिकारियों का मुखिया |
| महाबलाधिकृत | सेनापति (महासेनापति) |
| महादण्डनायक | मुख्य न्यायाधीश |
| महासंधिविग्राहिक | सामान्य दिनों में विदेशी मंत्री तथा युद्धकाल में शांति/संधि करना |
| कुमारामात्य | सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी |
| अमात्य | गुप्तकालीन नौकरशाह |
| पुस्तपाल | भूमि का लेखा-जोखा रखने वाला |
| दण्डपाशिक | गुप्तकालीन पुलिस अधिकारी |
| गोल्मिक | वन अधिकारी |
| विनयस्थिति स्थापक | सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी |
| महाअक्षपटलिक | आय-व्यय का ब्यौरा रखने वाला (वित्त मंत्री), लेखाधिकारी |
| शोल्किक | सीमा शुल्क वसूलने वाला अधिकारी |
| ध्रुवाधिकारणिक | राजस्व संग्रह करने वाला अधिकारी |
| रणभंडागारिक | सेना की सामग्री जुटाने वाला अधिकारी |
| महा भंडाराधिकृत | कोषाध्यक्ष (राजकोषीय अधिकारी) |
| अग्रहारिक | दान विभाग का प्रमुख |
| करणिक | लिपिक |
- समुद्र गुप्त के समय महादण्डनायक, महासंधिविग्रहक व कुमारामात्य-तीनों पद ‘हरिषेण’ नामक कवि के पास थे, जबकि चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय यह तीनों पद हरिषेण के पुत्र ‘वीरषेण’ के पास थे।
- गुप्तों का राज्य चिह्न – गरुड़ था।
- राजा को विष्णु के रूप में पूजा जाता था।
प्रान्तीय शासन
- गुप्त काल में प्रान्त को भुक्ति, अवनी, देश कहा जाता था।
- प्रांतपति को ‘गोप्ता’ या ‘उपरिक’ कहा जाता था
- गुप्त प्रशासन के प्रमुख प्रान्त थे-
| काल | प्रान्त | प्रान्तीय शासन |
| चन्द्रगुप्त द्वितीय | तीरभुक्ति | गोविंद गुप्त |
| कुमार गुप्त प्रथम | पूर्वी मालवा (एरण) | घटोत्कच गुप्त |
| कुमार गुप्त प्रथम | उत्तरी बंगाल (पुण्ड्रवर्द्धन) | चिरादत्त |
| स्कन्द गुप्त | सौराष्ट्र | पर्णदत्त |
अन्य प्रान्त पश्चिमी मालवा (अवन्ति), मगध आदि।
गुप्त साम्राज्य की इकाई विभाजन
- जिला को ‘विषय’ कहा जाता था, जिसका प्रधान अधिकारी ‘विषयपति’ (कुमारामात्य) होता था।
- गुप्तकाल में प्रमुख नगर में नगरपालिकाएँ चलती थी और नगर का प्रधान अधिकारी ‘पुरपाल’ होता था।
- जूनागढ़ के लेख से जानकारी मिली कि गिरनार नगर का ‘पुरपाल चक्रपालित’ था, जो सौराष्ट्र के उपरिक (राज्यपाल) पर्णदत्त का पुत्र था।
- गुप्तकाल में राजा द्वारा सीधे संचालित प्रान्त प्रदेश जिनको ‘देश’ कहते थे, इसी देश के राज्यपाल, को ‘गोप्ता’ कहा जाता था।
- गुप्त काल में ग्राम सभा को मध्य भारत में ‘पंचमण्डली’ कहते थे।
- नगरश्रेष्ठि – व्यापारी /श्रेणियों का प्रधान
- सार्थवाह – व्यवसायियों का प्रधान
गुप्त काल न्याय-प्रशासन-
- गुप्त काल में सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश होता था।
- सम्राट के अलावा एक मुख्य न्यायाधीश होता था-महादण्डनायक।
- स्मृति ग्रन्थों में ‘पूग’ तथा ‘कुल’ नामक न्याय करने वाली संस्थाओं का भी उल्लेख है।
गुप्तकालीन सैनिक संगठन-
- महाबलाधिकृत– सेना का सर्वोच्च अधिकारी
- महापीलुपति -हाथियों की सेना का प्रधान अधिकारी
- भटाश्वपति -घुड़सवारों की सेना का प्रधान अधिकारी।
- रणभाण्डागरिक – सेना में साजो-सामान की व्यवस्था करने वाला अधिकारी।
- प्रयाग प्रशस्ति में गुप्त काल के प्रमुख अस्त्र-शस्त्रों के नाम-शर, तोमर, मिन्दिपाल, नाराच, परशु, शंकु आदि मिले हैं।
भूमि व राजस्व-
- मन्दिरों, ब्राह्मणों को जो भूमि दान में दी जाती थी उसे ‘अग्रहार’ कहा जाता था। यह भूमि सभी करों से मुक्त होती थी।
- गुप्तकाल में भूमि – कर संग्रह करने के लिए भू-आलेखों को सुरक्षित रखने के लिए ‘महाक्षपटलिक’ और ‘करणिक’ नाम के अधिकारी होते थे।
- गुप्त अभिलेखों में भूमिकर को ‘उद्रंग तथा भागकर’ कहा जाता था। स्मृति ग्रन्थों में इसे राजा की वृत्ति कहा गया है।
- गुप्तकाल में नगर की वस्तुओं के आयात-निर्यात पर ‘भूतोवात प्रत्याय’ नामक कर का उल्लेख है।
- स्कन्द गुप्त के बिहार लेख में ‘शौल्किक’ नामक अधिकारी का उल्लेख है वह सीमा शुल्क विभाग का प्रधान होता था।
- गुप्तकाल में कर की दर 1/4 से 1/6 के बीच होती थी।
- कृषक हिरण्य (नकद) या मेय (अन्न) दोनों रूप में कर जमा कर सकते थे।
- राजस्व के स्रोत – गुप्तकाल में भू राजस्व राजकीय आय का प्रमुख स्रोत था। साहित्य में निम्न प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है – –
- भाग – राजा का भूमि के उत्पादन से प्राप्त होने वाला 1/6 हिस्सा ।
- भोग-राजा को हर दिन फल-फूल, सब्जियों के रूप में दिया जाने वाला कर।
- उपरिकर एवं उद्रंग – ये एक प्रकार के भूमि कर थे।
- इस समय भूमि, रत्न, खाने एवं नमक आदि राजस्व के अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत थे।
- भू राजस्व कुल उत्पादन का 1/4 से 1/6 भाग तक होता था।
गुप्त काल – सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक जीवन
सामाजिक जीवन
- गुप्तकाल में वर्णव्यवस्था में अनेक जातियाँ थी।
- चार वर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र थे।
- गुप्तकाल में ‘मृच्छकटिकम’ रचना में चारुदत्त नामक ब्राह्मण को ‘सार्थवाह’ (व्यापारी) कहा गया है।
- स्मृति ग्रन्थों व फाह्यान के विवरण से जानकारी मिली है कि गुप्तकाल के समाज में अस्पृश्यता मौजूद थी।
- फाह्यान ने अछूतों को ‘चाण्डाल’ कहा है।
- गुप्तकालीन समाज में ब्राह्मण व क्षत्रिय जाति की सर्वाधिक प्रतिष्ठा थी।
गुप्तकालीन आर्थिक जीवन
गुप्त काल शासनकाल आर्थिक दृष्टि से समृद्ध व सम्पन्न था।
1. कृषि –
- स्मृतियों, बृहत्संहिता, अमरकोश आदि से गुप्तकालीन कृषि के बारे में जानकारी मिलती है।
- हल में लोहे के फाल का प्रयोग किया जाता था।
- बृहत्संहिता में बीजों की गुणवत्ता बढ़ाने एवं धरती की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करने के तरीकों का उल्लेख ।
- कृषक अधिकांशतः वर्षा पर निर्भर , लेकिन गुप्त सम्राटों की ओर से प्रजा को सिंचाई की सुविधाएँ प्रदान करने का प्रयास किया गया। जैसे – सुदर्शन झील का पुनरुद्धार। सिंचाई में रहट या घटीयंत्र का प्रयोग।
- अमरकोष में उपज की विभिन्न वस्तुओं के नाम मिलते हैं- गेहूँ, धान, ज्वार, ईख, बाजरा, मटर, दाल, तिल, सरसों, अलसी, अदरक, कालीमिर्च आदि। बृहत्संहिता में तीन फसलों का उल्लेख है। एक फसल श्रावण के महीने में तैयार होती थी, दूसरी बसंत में और तीसरी चैत्र या बैसाख में तैयार होती थी।
- ह्वेनसांग के अनुसार पश्चिमोत्तर भारत में ईख व गेहूँ तथा मगध एवं उसके पूर्वी क्षेत्रों में चावल की पैदावार होती थी।
- अमरसिंह ने अपने ग्रंथ अमरकोष में 12 प्रकार की भूमि का उल्लेख किया है। इस समय प्रचलन में करीब 5 प्रकार की भूमि का उल्लेख मिलता है- क्षेत्र भूमि, वास्तु भूमि, चारागाह भूमि, सिल व अप्रहत भूमि इत्यादि ।
2. पशुपालन –
- पशुपालन जीविका का एक अन्य प्रमुख साधन था।
- कामन्दकीय नीतिसार के अनुसार गोपालन वैश्य का पेशा है।
- अमरकोश में पालतू पशु के रूप में गाय के अतिरिक्त घोड़े, भैंस, ऊँट, बकरी, भेड़, गधा, कुत्ता, बिल्ली आदि को गिनाया गया है। बैल हल चलाने और सामान ढोने के काम आता था।
3. उद्योग एवं शिल्प-
- गुप्तकाल में उद्योग और शिल्प में विशेषज्ञता और तकनीकी कौशल में उल्लेखनीय प्रगति हुई।
- धातु-शिल्प, वस्त्र-निर्माण, आभूषण-कला, काष्ठ-शिल्प, पाषाण-शिल्प, और हाथीदाँत का काम प्रमुख उद्योग थे।
- धातुविज्ञान के क्षेत्र में हुई अद्भुत प्रगति का एक भव्य उदाहरण मैहरोली (दिल्ली) का लौह स्तम्भ है जो इतनी शताब्दियों बाद भी बिना जंग लगे हुए, अक्षत खड़ा है।
- गुप्तकालीन ताम्रशिल्प का एक श्रेष्ठ उदाहरण तांबे की विशालकाय बुद्ध की मूर्ति है जो सुलतानगंज (जिला भागलपुर, बिहार) से मिली थी और इस समय इंग्लैण्ड के बरमिंघमन के संग्रहालय में है।
- गुप्तकाल के सिक्के और ताम्रपत्रों पर मुहरें भी धातुशिल्प की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।
- वस्त्र-निर्माण भी गुप्तकाल का एक प्रमुख उद्योग था। ‘अमरकोश’ में उसका उल्लेख आता है। गुप्तकाल में धनी व्यक्तियों के लिए बहुत बारीक कपड़ा बनाया जाता था। इसी ग्रंथ में रेशम का कपड़ा बुनने की पूरी प्रक्रिया का विवेचन है।
- वस्त्र-निर्माण में रेशमी, मलमल, ऊनी और सूती कपड़े की विदेशों में भारी मांग थी।
- गुप्तकाल में आभूषण बनाने का शिल्प भी उन्नत अवस्था में था। आभूषण बनाने के लिए स्वर्ण एवं रजत के अलावा विभिन्न प्रकार के रत्नों का भी बहुलता से प्रयोग किया जाता था। ‘बृहत्संहिता’ में 22 प्रकार के रत्नों का उल्लेख है।
- साहित्यिक साक्ष्य बताते हैं कि गुप्तकाल में काष्ठ-शिल्प भी विकसित अवस्था में था।
- इलाहाबाद के निकट भीत नामक स्थल पर गुप्तकालीन हाथीदाँत की बनी दो मुहरें प्राप्त हुई है।
4. श्रेणी-संगठन –
- गुप्तकाल में शिल्पी, उद्यमी और व्यापारी संगठित थे और उनके संघों को ‘श्रेणी’, ‘निगम’ या ‘गण’ कहा जाता था।
- ये संघ अपने व्यवसायों के संचालन के लिए नियम और कोष रखते थे, जैसे आधुनिक बैंकों की तरह ऋण देते थे।
- श्रेणियों में वस्त्रोद्योग, बैंकिंग आदि का कार्य प्रमुख था।
- श्रेणियाँ आर्थिक दृष्टि से समृद्ध थीं और समाजिक कार्यों में भी शामिल थीं, जैसे मन्दिर, जलाशय, और विश्रामगृहों का निर्माण।
- मन्दसौर के एक कुमारगुप्त – कालीन लेख से ज्ञात होता है कि दशपुर (मन्दसौर) में तन्तुवाहों (जुलाहों) की एक श्रेणी थी जिसने सूर्य-मन्दिर की स्थापना की थी।
- श्रेणियाँ अपने आन्तरिक मामलों में पूर्ण स्वतंत्र होती थीं।
- गुप्तकाल में श्रेणी से बड़ी संस्था होती थी, जिसकी शिल्प श्रेणियाँ सदस्य होती थीं, उसे निगम कहा जाता था अर्थात् व्यापारिक समितियों को निगम कहते थे।
- श्रेणी का प्रमुख ‘ज्येष्ठक’ होता था, और निगम का प्रधान ‘श्रेष्ठि’ कहलाता था।
- प्रत्येक शिल्पियों की अलग-अलग श्रेणियाँ होती थीं। ये श्रेणियाँ अपने कानून एवं परम्परा की अवहेलना करने वालों को सजा देने का अधिकार रखती थीं।
- व्यापारिक कारवाँ का नेतृत्वकर्ता सार्थवाह कहलाता था।
- मंदसौर अभिलेख में रेशमी सूत बुनने वालों की समिति – पट्वाय श्रेणी का उल्लेख है।
- इन्दौर अभिलेख में ‘तैलिक श्रेणी’ का उल्लेख है।
5. गुप्तकाल में व्यापार एवं उद्योग
आन्तरिक व्यापार-
- गुप्तकाल में आंतरिक व्यापार अत्यधिक उन्नत था, जो मुख्यतः सड़कों और नदियों के माध्यम से होता था।
- राजनीतिक स्थिरता, शांति, और स्वर्ण मुद्राओं के प्रचलन ने व्यापार को बढ़ावा दिया।
- प्रमुख व्यापारिक वस्तुओं में दैनिक उपयोग की चीजें और विलासितापूर्ण वस्तुएं शामिल थीं।
- सार्थ व्यापारी नगरों में महत्वपूर्ण थे, और नारद तथा बृहस्पति की स्मृतियों में व्यापारियों के लिए नियम थे।
- गुप्तकाल में मार्गों से यात्रा सुरक्षित एवं निरापद थी। चीनी यात्री फाह्यान ने भारत में अपनी यात्रा के दौरान कहीं असुरक्षा महसूस नहीं की।
- प्रमुख व्यापारिक नगरों में उज्जैन, भड़ौच, पाटलिपुत्र, मथुरा, और ताम्रलिप्ति थे, जिनमें उज्जैन सबसे महत्वपूर्ण था।
विदेशी व्यापार-
- भारतीय बन्दरगाहों का बाहर के अनेक देशों से स्थायी सामुद्रिक संबंध बना हुआ था। ये देश थे- चीन, श्रीलंका, फारस, अरब, इथोपिया, बैजन्टाइन (रोमन) साम्राज्य तथा हिन्द महासागर के द्वीप।
- गुप्तकाल में चीन से रेशम का व्यापार बढ़ा, और बैजन्टाइन साम्राज्य की स्थापना के बाद पश्चिमी व्यापार में भी वृद्धि हुई। यहां निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में रेशम व मसाले प्रमुख थे।
- प्रमुख बन्दरगाहों में भृगुकच्छ (भड़ौच), कैम्बे, सोपार, कल्याण, घंटशाला, कदूरा, और ताम्रलिप्ति शामिल थे।
- ताम्रलिप्ति पूर्वी भारत में होने वाले सामुद्रिक व्यापार का बड़ा केन्द्र था। भारत से मसाले, मोती, वस्त्र, हाथीदांत, और नील का निर्यात होता था, जबकि चीन से रेशम, इथोपिया से हाथीदांत, और अरब से घोड़े आयात होते थे।
गुप्तकालीन सिक्कों पर टिप्पणी :-
- चन्द्रगुप्त प्रथम ने विवाह प्रकार/श्री प्रकार/रानी-राजा/ कुमार देवी प्रकार प्रकार के सिक्के चलाये।
- समुद्रगुप्त ने 6 प्रकार के सिक्के चलाये –
- गरुड़ सिक्के
- अश्वमेघ सिक्के
- वीणावादन सिक्के
- धनुर्धर सिक्के
- व्याघ्रहन्ता सिक्के
- परशु सिक्के
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चांदी के विशेष सिक्के जारी किए।
- कुमारगुप्त ने सर्वाधिक सोने के सिक्के चलाये।
- कुमारगुप्त ने सर्वाधिक प्रकार के सिक्के (14 प्रकार) चलाने का श्रेय प्राप्त है।
- कुमारगुप्त ने मयूर शैली के सिक्के चलाये।
- गुप्त काल में सोने व चाँदी के सिक्कों का अनुपात क्रमश: 1:16 था।
- फाह्यान ने बताया कि गुप्तकाल में साधारण जनता दैनिक जीवन के विनिमय में वस्तुओं के आदान – प्रदान या फिर कौड़ियों से काम चलाती थी।
- प्राचीन भारत के सिक्कों पर टिप्पणी :-
- निस्क – ऋग्वैदिक कालीन व उत्तरवैदिक कालीन नाक आभूषण।
- भारत के आरम्भिक सिक्कों को आहत/पंचमार्क सिक्के कहते हैं।
- यूनानियों ने लेख युक्त सिक्के चलायें।
- मौर्यकालीन सिक्के
- सुवर्ण- सोने का सिक्का
- कार्षापण, धरण, पण – चाँदी के सिक्के भाषक,
- काकनी – ताँबे के सिक्के
- कुषाण शुद्ध सोने के सिक्के चलाये।
- शक- विशेषता चाँदी के सिक्के (केवल चाँदी के सिक्के)
- सातवाहन – सीसे एवं पोटिन के सिक्के चलाये।
- गुप्त – सर्वाधिक सोने के सिक्के
गुप्तकालीन धार्मिक जीवन
- गुप्त सम्राट वैष्णव धर्म के अनुयायी थे इनकी उपाधि ‘परमभागवत’ थी। गुप्त शासक सहिष्णु शासक थे।
- गुप्त काल ब्राह्मण (हिन्दू) धर्म की उन्नति के लिए प्रख्यात है।
- समुद्र गुप्त ने बौद्ध विद्वान वसुबन्धु को अपने पुत्र की शिक्षा–दीक्षा के लिए नियुक्त किया था।
- गुप्त काल के उत्तर भारत में वैष्णव धर्म अत्यधिक प्रचलित था। गुप्त काल में भगवान विष्णु के मन्दिरों के निर्माण का उल्लेख है।
- गुप्त काल में विष्णु के अलावा नाग, सूर्य, शिव, यक्ष, दुर्गा, गंगा-यमुना आदि की उपासना होती थी।
- हरिहर, अर्द्धनारीश्वर, मकरवाहिनी गंगा, कर्मवाहिनी यमुना की आराधना होने लगी।
- समुद्रगुप्त ने श्रीलंका के शासक मेघवर्मन को बोधगया में विहार बनाने की अनुमति प्रदान की।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय का मंत्री वीरसेन शाव (शिव भक्त) या शैव धर्म का अनुयायी था। उसने उदयगिरी के शिव मंदिर को बड़ा दान दिया।
- इस समय शैव धर्म, वैष्णव धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म एवं शाक्त (शक्ति) धर्म सभी का सामूहिक विकास हुआ।
- षड़दर्शन का विकास भी इसी काल में हुआ।
फाह्यान-
- चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल के दौरान-भारत आया। वह 399 ई.-414 ई. तक भारत में रहा।
- ‘फाह्यान भारत में धर्माचार्य के रूप में आया।
- बौद्ध धर्म का विस्तृत ज्ञान प्राप्त करने हेतु भारत आया।
- उसका ग्रंथ ‘फो-क्यों-की’’ है अपने इस ग्रंथ में ‘’चन्द्रगुप्त द्वितीय’’ के बारे में उल्लेख नहीं किया है।
- निम्न जानकारी प्राप्त होती है –
- उसने मध्य प्रदेश, पाटलिपुत्र (मगध) को ब्राह्मणों का देश बताया।
- लोग मांस, लहसुन नहीं खाते। लोग अपने घरों में ताले नहीं लगाते थे।
- मध्य प्रदेश के लोग व्यापार हेतु ‘’कौड़ियों’’ का प्रयोग करते थे।
- फाह्यान ने न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए लिखा है कि-‘’राज्य में अपराध नहीं के बराबर।’’ ब्राह्मणों को दंड नहीं दिया जाता था।
अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य:-
- गुप्तकालीन समाज में स्त्रियों का स्थान गौण था।
- स्त्रियाँ व्यक्तिगत सम्पत्ति समझी जाती थीं। बाल विवाह प्रचलन था तथा पर्दाप्रथा केवल उच्च वर्ग में प्रचलित थी। सती प्रथा का प्रचलन था।
- सती प्रथा का प्रथम उल्लेख 510 ई. के भानगुप्त एरण अभिलेख से मिलता है।
- गुप्तकाल में नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है। दासों की स्थिति दयनीय थी, दासत्व से मुक्ति का पहला प्रयास नारद ने किया मनु ने 7 प्रकार के दासों का उल्लेख किया।
उदयगिरि का गुहाभिलेख (विदिशा, मध्य प्रदेश)
- निर्माण:- हरिषेण के पुत्र-वीरषेण द्वारा करवाया गया।
- गुफा में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया।
मथुरा स्तम्भ लेख-
- यह अभिलेख चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय था।
- मथुरा स्तम्भ लेख में जैन तीर्थंकरों का उल्लेख मिलता है।
- चन्द्रगुप्त प्रथम द्वारा प्रचलित गुप्त संवत् की पहली बार जानकारी मिलती है।
पूना ताम्र पत्र (महाराष्ट्र):-
- पूना ताम्र पत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था।
- इसमें शकों पर विजय व वाकाटकों के साथ गठबंधन का उल्लेख मिलता है।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय के साथ किया इसी की सहायता से इसने शकों को पराजित किया तथा शकों को पराजित करने के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की।
- इसमें धरण गौत्र का उल्लेख मिलता है।
गुप्तकालीन साहित्य और विज्ञान
- साहित्य, विज्ञान, कला व संस्कृति के चहुँमुखी विकास के दृष्टिकोण से गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग कहा जाता है।
- गुप्त काल में संस्कृत भाषा की उन्नति हुई तथा गुप्त काल की राजभाषा ‘संस्कृत’ बनी।
- गुप्त शासक संस्कृत भाषा व साहित्य के प्रेमी थे।
- प्रयाग एवं महरौली आदि प्रशस्तियों की रचना हुई। हरिषेण की प्रसिद्ध कृति ‘प्रयाग–प्रशस्ति’ है, जिसे इसमें ‘काव्य’ कहा गया है, इसका आधा भाग पद्य में तथा आधा भाग गद्य में है। मालव प्रदेश के दशपुर में सूर्य मंदिर स्थित है, इसका उल्लेख मंदसौर प्रशस्ति में है।
- स्मृतियों, रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों को अन्तिम रूप दिया गया। संस्कृत व्याकरण का विकास हुआ। अमरसिंह ने अमरकोश, चन्द्रगोमिन् ने चन्द्रव्याकरण आदि व्याकरण ग्रन्थ रचे।
- विष्णु शर्मा ने पंचतन्त्र नामक जैसे नीति ग्रंथ, ईश्वर कृष्ण ने सांख्यकारिका एवं दिङ्नाग ने प्रमाण समुच्चय आदि दार्शनिक ग्रंथो की रचना की, वाक्पतिराज का गोहडवो, प्रवरसेन का सेतुबंध आदि प्राकृत ग्रंथों की रचना भी इसी काल में हुई। इस युग में लौकिक साहित्य का बाहुल्य था।
- कुमार गुप्त का प्रथम दरबारी कवि वत्सभट्टि था। वह संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान था। ग्रन्थ – रावणवध
- भाष ने स्वप्नवासवदत्ता, शुद्रक ने मृच्छकटिकम्, विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस, कालिदास ने अभिज्ञान शकुन्तलम् आदि सुखान्त नाटकों एवं रघुवंश जैसे महाकाव्यों की रचना की।
- कवि कालिदास चन्द्रगुप्त द्वितीय के समकालीन था।
- कवि कालिदास ने सात ग्रन्थों की रचना की – कुमार संभव, रघुवंश, ऋतुसंहार, मेघदूत, विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्र तथा अभिज्ञान शाकुन्तलम्।
- ‘किरातार्जुनीय’ महाकाव्य 18 सर्गों का भारवि ने लिखा।
- ‘मृच्छकटिकम’ नाटक शूद्रक ने लिखा जिसमें कुल 10 अंक हैं।
- ‘मुद्राराक्षस’ व ‘देवीचन्द्रगुप्तम्’ नाटक की रचना विशाखदत्त ने की।
- ‘वासवदत्ता’ की रचना सुबन्धु ने की।
- ‘पंचतंत्र’ कथा संग्रह की रचना विष्णु वर्मा ने की। सर्वाधिक 50 भाषाओं में अनुवादित ग्रंथ है।
- कामन्दक का नीतिसार और वात्स्यायन का कामसूत्र गुप्त काल की रचना है।
नोट – साहित्य टॉपिक में विस्तार से चर्चा की गयी।
विज्ञान एवं तकनीकी विकास
- गुप्तकाल में विज्ञान एवं तकनीक की विभिन्न शाखाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल में गणित, ज्योतिष, खगोल, रसायन, भौतिक, आयुर्वेद, शल्यचिकित्सा आदि का विकास प्रमुख रूप से हुआ।
- गुप्त काल के आर्यभट्ट, वराहमिहिर एवं ब्राह्मगुप्त संसार के प्रसिद्ध नक्षत्र वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे।
- आर्य भट्ट
- आर्यभट्ट का गणित एवं ज्योतिष में विशेष स्थान था।
- आर्यभट्ट ने सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण के कारण को बताया।
- इसने पृथ्वी की त्रिज्या बताई। (व्यास)
- इसने पाई (𝝅) का मान दिया।
- इसने त्रिभुज के क्षेत्रफल का मान दिया।
- प्रथम व्यक्ति जिसने अपने नाम पर पुस्तक लिखी :
- ग्रंथ –
- ‘आर्यभट्टीयम्’ (आर्यभट्टीयान) में सर्वप्रथम प्रस्तुत किया कि पृथ्वी गोल है, वह अपनी धूरी पर घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाती है जिससे सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होते हैं।
- आर्यभट्टीयम के चार भाग है- (1) दशगीतिकापाद (2) गणितपाद (3) कालक्रियापाद (4) गोलापाद
- ‘आर्यभट्टीयम्’ (आर्यभट्टीयान) में सर्वप्रथम प्रस्तुत किया कि पृथ्वी गोल है, वह अपनी धूरी पर घूमते हुए सूर्य का चक्कर लगाती है जिससे सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होते हैं।
नोट – 800 ई. में आर्य भट्ट के ग्रंथ ‘आर्य भट्टीयम्’ का अरबी भाषा में अनुवाद ‘जीज – अल – बहर’ के नाम से जॉर्ज बूलर के द्वारा किया गया।
- दशगितिक सूत्र
- आर्याष्ट शतक
- सूर्यसिद्धान्त – इसमें त्रिकोणमिति की जानकारी मिलती है।
- आर्य भट्ट ने दशमलव प्रणाली का विकास किया।
- आर्यभट्ट ने गणित को ज्योतिष से अलग किया, ऐसा करने वाले ये प्रथम व्यक्ति थे।
- वराहमिहिर
- ग्रन्थ – पंच सिद्धान्तिका, वृहत्संहिता, वृहत्जातक, लघु जातक
- ‘वृहत्संहिता’ खगोल शास्त्र, वनस्पति विज्ञान तथा प्राकृतिक इतिहास का विश्वकोष है।
- भारतीय एवं यूनानी ज्योतिष का समन्वय कर रोमक तथा पौलिश का सिद्धान्त प्रतिपादन किया।
- इसने फलित ज्योतिष एवं कुण्डली पर कार्य किया।
- उन्होंने वर्गमूल व घनमूल निकालने की पद्धति तथा खगोल विज्ञान की विस्तृत विवेचना की।
- गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा (पृथ्वी वस्तुओं को आकर्षित करती है)।
नोट – पंचसिद्धान्तिका के टीकाकार भटोत्पल थे इसके पाँच ज्योतिष सिद्धान्त– पितामह, वशिष्ठ, रोमक, पोलिश, सूर्य।
- भास्कर प्रथम – प्रसिद्ध खगोलशास्त्री
- भाष्य नामक ग्रंथ व आर्यभट्ट के ग्रंथों दशगितिक सूत्र एवं आर्यष्टि शतक पर टीका लिखी। भास्कराचार्य :-
- पुस्तकें :- 1. वृहद् भास्कर्य 2. लघुभास्कर्य
- भास्कराचार्य द्वितीय यह महान गणितज्ञ थे।
- पुस्तक – सिद्धान्त शिरोमणी
- इसके 4 संस्करण है-
- i. बीजगणित
- ii. गणिताध्ययन
- iii. गोलाध्ययन
- iv. लीलावती यह उनकी बेटी का नाम भी था। यह गणितज्ञ थी।
- ब्रह्मगुप्त
- प्रथम ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
- ब्रह्मगुप्त ने गणित, ज्योतिष खगोल शास्त्र पर ब्रह्मफुट सिद्धान्त, खण्ड खाद्यक आदि ग्रंथ लिखे एवं गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
- औषधिशास्त्र का सैद्धान्तिक पक्ष गुप्तकाल में प्रबल हुआ।
- वाग्भट्ट ने आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अष्टांग हृदय’ की रचना की, धनवन्तरी एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक एवं शल्य चिकित्सक थे। नवनीतकम आयुर्वेद का ग्रंथ था।
- इस समय वानस्पतिक औषधियों का प्रयोग होता है। पशु चिकित्सा पर भी ग्रंथ लिखे गये। पलकाप्व ने हस्तायुर्वेद नामक ग्रंथ लिखा, जो हाथियों की चिकित्सा से सम्बन्धित था।
- भौतिक एवं रसायन विज्ञान के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अध्ययन हुए। कणाद ऋषि ने गुप्त काल में वैशेषिक दर्शन एवं अणु सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
- बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन रसायन तथा धातु विज्ञान के विद्वान थे। उन्होंनें चांदी, सोना आदि खनिज पदार्थों के रसायनिक प्रयोगों से रोगों के निवारण को प्रमाणित किया एवं पारद का आविष्कार किया। ‘रस चिकित्सा सिद्धांत’ की रचना नागार्जुन ने की।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय का महरौली लौह स्तम्भ लेख (दिल्ली) गुप्तकालीन धातु-विज्ञान का अद्भुत नमूना है।
- बिहार के सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की खड़ी हुई ताँबे की प्रतिमा, एक टन वजनी और 71/2 फीट ऊँची है, धातु विज्ञान का उत्कृष्ट नमूना है।
गुप्तकालीन चित्रकला
- गुप्त चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता व ग्वालियर की बाघ गुफाओं से प्राप्त हुए हैं।
- अजंता के चित्रों में प्राकृतिक सौन्दर्य, बुद्ध व बौधिसत्व तथा जातक ग्रंथों के वर्णात्मक दृश्यों का अंकन हुआ है।
- सुन्दर कल्पना, रंगों की प्रभा, रेखाओं का लालित्य, विषय वस्तु की विविधता, अभिव्यक्ति से सम्पन्नता व अभिव्यंजना के कौशल के कारण अजंता के चित्र अद्वितीय हैं।
- इनमें गुफा सं. 16 में उर्कीण मरणासन्न राजकुमारी के सहित अवलोकिश्वर, यशोधरा व राहुल आदि चित्र प्रसिद्ध हैं।
- गुफा सं. 17 के चित्र को चित्रशाला कहा गया है। इस गुफा में माता और शिशु का चित्र सर्वर्वोत्कृष्ट है।
- बाघ में नौ गुफाएँ मिलती हैं। बाघ के भित्ति चित्र, लौकिक जीवन से संबंधित हैं, जो तत्कालिक वेशभूषा, केश विन्यास, प्रसाधन आदि की जानकारी देती है। यहाँ संगीत एवं नृत्य आदि के दृश्य का एक प्रसिद्ध चित्र मिलता है।
- समुद्रगुप्त का वीणा लिए हुए सिक्कों पर अंकित किया जाना, उसके संगीत प्रेम को सिद्ध करता है।
