उद्देश्यपरक तर्कसंगतता का ध्यान दक्षता और लक्ष्य की प्राप्ति पर होता है, जिसमें उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठ साधनों का चयन किया जाता है। इसके विपरीत, मूल्यपरक तर्कसंगतता का मार्गदर्शन न्याय और समानता जैसे नैतिक सिद्धांतों से होता है। मैक्स वेबर ने तर्क दिया है कि – आधुनिक नौकरशाही के लिए दोनों आवश्यक हैं। केवल उद्देश्यपरक तर्कसंगतता पर आधारित व्यवस्था ऐसी स्थिति पैदा कर देती है जिसे मैक्स वेबर ने “लोहे का पिंजरा” कहा है – अर्थात ऐसा प्रशासन जो दक्ष तो है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों से रहित हैं।

पहलूकेवल उद्देश्यपरक तर्कसंगततामूल्यपरक तर्कसंगतता के साथ
निर्णय का आधारलागत-लाभ विश्लेषण, दक्षता के मानकउदाहरण – स्वच्छ सर्वेक्षण रैंकिंग नगरपालिकाओं के बीच प्रतिस्पर्धात्मक दक्षता को बढ़ाती हैनैतिक सिद्धांत, संवैधानिक नैतिकताउदाहरण – आपातकालीन परिस्थितियों में सद्भावना से किया गया कार्य, जैसे कोविड-19 राहत वितरण में जनकल्याण हेतु कुछ प्रोटोकॉल को लचीला बनाना
परिणामसंसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग, परंतु अन्याय की संभावनाउदाहरण – दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद प्रणाली प्रशासनिक रूप से दक्ष थी, लेकिन मूलतः अन्यायपूर्ण थीसतत और न्यायसंगत विकास
उदाहरणन्यूनतम लागत पर जबरन बेदखलीगरिमापूर्ण पुनर्वास (LARR अधिनियम, 2013)
दार्शनिक आधारबेंथम का मात्रात्मक उपयोगितावादमिल का गुणात्मक उपयोगितावाद, कांट का कर्तव्यवाद
प्रशासनिक प्रभावलालफीताशाही में कमी, लेकिन तानाशाही का जोखिमजनविश्वास के साथ संतुलित शासन

जैसा कि महात्मा गांधी और अमर्त्य सेन ने तर्क दिया, दोनों तर्कसंगतताएँ परस्पर पूरक हैं – 

  • मूल्यपरक तर्कसंगतता यदि दक्षता के बिना हो, तो वह आदर्शवादी (यूटोपियन) और अव्यावहारिक/अस्थिर बन जाती है।
  • उद्देश्यपरक तर्कसंगतता यदि मूल्यों के बिना हो, तो वह “लोहे का पिंजरा” की समस्या उत्पन्न करती है।

इसलिए अरस्तू के मध्य मार्ग का अनुसरण करते हुए साधनों की नैतिकता (मूल्यपरक तर्कसंगतता) और लक्ष्यों की प्राप्ति (उद्देश्यपरक तर्कसंगतता) – दोनों की निरंतर समीक्षा आवश्यक है।

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