लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO अधिनियम) बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण देने हेतु बनाया गया था। किन्तु हाल के वर्षों में किशोरों के बीच सहमति आधारित प्रेम संबंधों को लेकर व्यापक बहस उभरी है। सर्वोच्च न्यायालय ने “रोमियो-जूलियट क्लॉज” की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किया है, जिससे सहमति आधारित किशोर संबंधों और शोषणकारी अपराधों में अंतर किया जा सके।

उभरती चुनौतियाँ

1. सहमति आधारित संबंधों का अपराधीकरण

  • POCSO अधिनियम के अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार की यौन गतिविधि को सहमति होने पर भी अपराध माना जाता है। इससे सहमति आधारित किशोर संबंध भी अपराध की श्रेणी में आ जाते हैं।

2. परिवारों द्वारा दुरुपयोग

  • अंतरजातीय, अंतरधार्मिक अथवा सामाजिक रूप से अस्वीकार्य संबंधों का विरोध करने हेतु कई बार अभिभावक POCSO के तहत मामला दर्ज कराते हैं। इससे यह कानून सामाजिक नियंत्रण का साधन बन जाता है।

3. मानसिक एवं सामाजिक प्रभाव

  • आपराधिक मुकदमे, गिरफ्तारी एवं सामाजिक कलंक किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

4. न्यायपालिका पर भार

  • सहमति आधारित संबंधों से जुड़े मामलों की अधिकता न्यायालयों एवं पुलिस पर अतिरिक्त भार डालती है, जिससे गंभीर बाल यौन शोषण मामलों पर ध्यान कम हो सकता है।

5. संरक्षण और स्वायत्तता के बीच संघर्ष

  • यह अधिनियम बाल संरक्षण को प्राथमिकता देता है, परन्तु किशोरों की विकसित होती परिपक्वता, निजता एवं स्वायत्तता को पर्याप्त महत्व नहीं देता।

रोमियो-जूलियट क्लॉज बहस: प्रस्तावित रोमियो-जूलियट क्लॉज का उद्देश्य निकट आयु वाले किशोरों के बीच सहमति आधारित संबंधों को सीमित छूट प्रदान करना है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सहमति आधारित किशोर संबंधों और शोषणकारी यौन अपराधों में अंतर किया जाना चाहिए।

सुझाव

  1. POCSO में “निकट आयु छूट” का प्रावधान किया जाए।
  2. केवल शोषणकारी एवं जबरन संबंधों में कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
  3. किशोर परामर्श एवं जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए।
  4. बाल संरक्षण के साथ निजता एवं गरिमा के संवैधानिक अधिकारों का संतुलन स्थापित किया जाए।

रोमियो-जूलियट क्लॉज बहस यह दर्शाती है कि बाल संरक्षण और किशोर स्वायत्तता के बीच संतुलन आवश्यक है। एक संतुलित कानूनी व्यवस्था POCSO के दुरुपयोग को रोकते हुए वास्तविक लैंगिक शोषण से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 11 के तहत, कोई व्यक्ति, किसी बालक पर लैंगिक उत्पीड़न करता है, यहा कहा जाता है जब ऐसा व्यक्ति लैंगिक आशय से-

  1. कोई शब्द कहता है या कोई ध्वनि या अंगविक्षेप करता है या कोई वस्तु या शरीर का भाग इस आशय के साथ प्रदर्शित करता है कि बालक द्वारा ऐसा शब्द या ध्वनि सुनी जाएगी या ऐसा अंगविक्षेप या वस्तु या शरीर का भाग देखा जाएगा; या
  2. किसी बालक को उसके शरीर या उसके शरीर का कोई भाग प्रदर्शित करवाता है जिससे उसको ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा देखा जा सके;
  3. अश्लील प्रयोजनों के लिए किसी प्ररूप या मीडिया में किसी बालक को कोई वस्तु दिखाता है; या
  4. बालक को या तो सीधे या इलेक्ट्रानिक, अंकीय या किन्हीं अन्य साधनों के माध्यम से बार-बार या निरंतर पीछा करता है या देखता है या संपर्क करता है; या
  5. बालक के शरीर के किसी भाग या लैंगिक कृत्य में बालक के अंतर्ग्रस्त होने का, इलेक्ट्रानिक, फिल्म या अंकीय या किसी अन्य पद्धति के माध्यम से वास्तविक या गढ़े गए चित्रण को मीडिया के किसी रूप में उपयोग करने की धमकी देता है; या
  6. अश्लील प्रयोजनों के लिए किसी बालक को प्रलोभन देता है या उसके लिए परितोषण देता है।

धारा  12 के तहत,  ⁠लैंगिक उत्पीड़न के लिए दंड→ जो कोई, किसी बालक पर लैंगिक उत्पीड़न करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।

POCSO अधिनियम की धारा 5, 20 श्रेणियों में कुछ कार्यों को “गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमले ” के रूप में परिभाषित करती है। 

  • इनमें ऐसे मामले शामिल हैं- जब कोई पुलिस अधिकारी, सशस्त्र बलों का सदस्य या कोई लोक सेवक किसी बच्चे पर यौन उत्पीड़न करता है।
  • इसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं जहां अपराधी बच्चे का रिश्तेदार है, या यदि हमला बच्चे के यौन अंगों को घायल करता है या बच्चा गर्भवती हो जाता है, आदि।
  • POCSO संशोधन अधिनियम 2019, गंभीर प्रवेशन यौन हमले की परिभाषा में दो और आधार जोड़ता है- (i) हमला जिसके परिणामस्वरूप बच्चे की मृत्यु हो जाती है, और (ii) प्राकृतिक आपदा के दौरान, या हिंसा की किसी भी समान स्थिति में किया गया हमला।

यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (POCSO) 2012 की धारा 6 में गंभीर यौन उत्पीड़न के लिए कम से कम 20 साल के कठोर कारावास का प्रावधान है, जिसे आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक बढ़ाया जा सकता है। अपराधी को पीड़ित को चिकित्सा व्यय और पुनर्वास के लिए जुर्माना भी देना होगा।

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