राजस्थान के विभिन्न शासकों की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ (18वीं शताब्दी तक)

  • विदेशी मूल के सिद्धांत : 
    • शक, कुषाण, हूण वंशज
      • समर्थक: डॉ. वी. ए. स्मिथ, कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक्स
      • मत: राजपूतों का मूल शक, कुषाण और हूण जैसे विदेशी जातियों से हुआ, जो भारत में आकर हिंदू समाज में समाहित हो गए।
    • यू-ची जनजाति के वंशज
      • समर्थक: कनिंघम
      • आधार: ब्रौच-गुर्जर ताम्रपट्ट अभिलेख
  • स्वदेशी मूल के सिद्धांत : 
    • अग्निकुंड सिद्धांत 
      • समर्थक: मुहणोत नैणसी, सूर्यमल्ल मिश्रण
      • मत : राजपूतों की उत्पत्ति गुरु शिखर (माउंट आबू) पर ऋषि वशिष्ठ द्वारा किए गए यज्ञ (अग्निकुंड) से हुई। इससे चार वंश — परमार, चौहान, प्रतिहार और चालुक्य/सोलंकी उत्पन्न हुए।
    • क्षत्रिय वंशज सिद्धांत
      • समर्थक: सी. वी. वैद्य
      • मत: राजपूत प्राचीन पौराणिक क्षत्रिय योद्धाओं जैसे भगवान राम के वंशज हैं।
    • मिश्रित मूल सिद्धांत
      • समर्थक: डॉ. डी. पी. चट्टोपाध्याय
      • मत: राजपूत एक मिश्रित नस्ल के हैं — कुछ आर्य मूल के हैं जबकि अन्य हूण, शक जैसे विदेशी जातियों से आए और भारतीय समाज में सम्मिलित हो गए।
    • ब्राह्मण मूल सिद्धांत
      • समर्थक: डॉ. भंडारकर, गोपीनाथ शर्मा
      • साक्ष्य: बिजोलिया अभिलेख — इसके अनुसार चौहान वंश वत्स गोत्र के ब्राह्मण थे।

राव चंद्रसेन राठौड़ (1562–1581) मुगल सम्राट अकबर के खिलाफ आजीवन संघर्ष करने वाले राजपूत योद्धा थे। उनकी अडिग प्रतिरोध नीति और स्वतंत्रता प्रेम के कारण उन्हें “मारवाड़ का प्रताप” कहा गया।

  • प्रतिरोध की नीति
    • मुगल अधीनता से इनकार: उन्होंने अपने भाइयों की तरह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
    • गुरिल्ला युद्ध नीति: छापामार रणनीति अपनाई, खुली लड़ाइयों से बचते रहे।
    • संधियाँ: अफगानों, भीलों और कुछ स्थानीय सरदारों से सहयोग लिया।
  • अकबर के विरुद्ध संघर्ष
    • सिंहासन विवाद (1562): अकबर ने उनके भाई उदय सिंह का समर्थन किया, जिससे चंद्रसेन विद्रोह के लिए विवश हुए।
    • लगातार युद्ध: थोड़े समय के लिए जोधपुर पर अधिकार किया, परंतु बाद में सिवाना और जालोर जैसे दुर्गों से संघर्ष जारी रखा।
    • बाहरी सहयोग की कोशिश: महाराणा प्रताप और दक्कन के शासकों से मदद मांगी, पर ठोस सहयोग नहीं मिला।
  • पतन और मृत्यु
    • मुगल दबाव: लगातार हमलों के कारण सहयोगियों और गढ़ों की हानि हुई।
    • निर्वासन में मृत्यु (1581): अपने राज्य से दूर निर्वासन में निधन हुआ, परंतु उनकी विरासत अमर रही।
  • महाराणा प्रताप से तुलना
    • समान दृष्टिकोण: दोनों ने अकबर के समर्पण से इनकार किया।
    • सामरिक नीति: दोनों ने छापामार युद्ध रणनीति अपनाई।
    • राजपूत एकता की कमी: दोनों को एकजुट समर्थन नहीं मिला।

राव चंद्रसेन का संघर्ष भले ही सफल न रहा, लेकिन उन्होंने अपने आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए जो त्याग किया, वह राजपूत इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। वे प्रताप की भांति “अपराजित भाव” के प्रतीक हैं।

  • उद्देश्य: सवाई जयसिंह ने हुरडा में राजस्थान के सभी शासकों को इकट्ठा करने का प्रयास किया, ताकि मराठों का प्रभावी ढंग से सामना करने और राजपूताना में उनके प्रवेश को रोकने के लिए रणनीति बनाई जा सके।
  • अध्यक्ष: मेवाड़ के नए महाराणा जगत सिंह प्रथम की अध्यक्षता में।
  • अन्य प्रतिभागी: मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह प्रथम, जयपुर के सवाई जयसिंह, जोधपुर के अभय सिंह, नागौर के बख्त सिंह, बीकानेर के जोरावर सिंह और अन्य राजपूत शासक शामिल थे।
  • समझौता: 17 जुलाई, 1734 को हस्ताक्षरित, जिसका उद्देश्य राजपूत राज्यों के बीच एकता बनाए रखना था। मुख्य बिंदु:
    • राज्यों के बीच आपसी सम्मान और एकजुटता।
    • अन्य राज्यों के विद्रोहियों को कोई आश्रय नहीं।
    • बरसात के मौसम के बाद रामपुरा में एकत्रित होकर मराठा सेना के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई।
  • परिणाम: समझौतों के बावजूद, व्यक्तिगत शासकों के स्वार्थी हितों के कारण सम्मेलन विफल हो गया, जिससे एकीकृत कार्रवाई में बाधा उत्पन्न हुई।
  • हुरडा सम्मेलन राजपूताना में मराठा विस्तार के खिलाफ राजपूत रक्षा को समन्वित करने का एक असफल प्रयास है। जब मराठों को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने अपना हस्तक्षेप बढ़ा दिया।

मुगल साम्राज्य के पतन के दौरान, राजपूताना राज्यों के बीच आंतरिक संघर्ष बढ़ गए, जिससे 17वीं शताब्दी के अंत में राजस्थान में मराठा प्रभाव में वृद्धि हुई।

  1. प्रारंभिक संपर्क: राजपूतों का मराठों से प्रथम संपर्क औरंगज़ेब द्वारा शिवाजी को दबाने के प्रयास में हुआ, जब जसवंत सिंह (जोधपुर) और जय सिंह (आमेर) भेजे गए। असफलता के बावजूद, राजपूत शिवाजी के स्वतंत्रता प्रयासों और हिंदू गौरव से प्रभावित हुए।
  2. प्रारंभिक सौहार्दपूर्ण संबंध: सवाई जय सिंह ने मालवा में मराठों का गुप्त समर्थन किया ताकि मुगल सत्ता कमजोर हो और उनका प्रभाव बढ़े।
  3. राजस्थान में मराठा प्रसार: 1720 के बाद मुगलों के पतन के बीच पेशवा बाजीराव प्रथम ने मालवा और गुजरात में विस्तार किया। प्रारंभिक प्रतिरोध के बावजूद, मराठों ने मालवा पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
  4. मराठा आक्रमण और संघर्ष:
    • कोटा, बूंदी, मेवाड़ और मारवाड़ में लगातार मराठा आक्रमण हुए।
    • 1726 में बाजी भीम ने मेवाड़ पर हमला कर चौथ वसूली।
    • 1728 में डूंगरपुर और बांसवाड़ा के शासकों ने कर चुकाया।
      मार्ग: मुकंदरा दर्रा और इदर-जालौर।
    • मंदसौर युद्ध (1733):
      मल्हार राव होल्कर और राणोजी शिंदे ने जय सिंह को घेर लिया। जय सिंह ने ₹6 लाख और 38 परगने चौथ में दिए।
  5. मराठों का राजस्थान में हस्तक्षेप :
    • बूंदी में मराठा भूमिका :
      • जय सिंह और बुध सिंह के बीच संघर्ष हुआ।
      • मल्हार राव होल्कर ने उमेद सिंह को बूंदी का शासक बनाया।
      • हुरडा सम्मेलन (1734) : जयपुर, मेवाड़, जोधपुर, कोटा और बूंदी के शासकों ने मराठों के विरुद्ध एकजुट मोर्चा बनाया और 17 जुलाई 1734 को संधि की।
    • जयपुर में मराठा हस्तक्षेप : सवाई जय सिंह की मृत्यु के बाद ईश्वरी सिंह और माधव सिंह में उत्तराधिकार संघर्ष हुआ।
      • 1747 (राजमहल ) और 1748 (बगरू) के युद्ध।
      • अंततः ईश्वरी सिंह ने आत्महत्या की और माधव सिंह को मराठों ने गद्दी पर बैठाया।
    • मारवाड़ में मराठा हस्तक्षेप : राम सिंह और विजय सिंह के बीच संघर्ष हुआ।
      • मराठा समर्थन से राम सिंह को आरंभिक सफलता मिली, परंतु स्थानीय विरोध के बाद समर्थन विजय सिंह को मिला।
    • जाट मामलों में मराठा हस्तक्षेप : जवाहर सिंह और नाहर सिंह के बीच संघर्ष हुआ।
      • जवाहर सिंह ने विजय सिंह के साथ मिलकर मराठा हस्तक्षेप का विरोध किया।
  6. मराठा हस्तक्षेप के परिणाम :
    • आर्थिक परिणाम: चौथ और सरदेशमुखी करों ने राजस्थान की आर्थिक नींव को कमजोर किया।
      राजनीतिक परिणाम:
    • राजपूत शासकों की संप्रभुता का ह्रास।
    • उत्तराधिकार संघर्षों की वृद्धि।
    • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव का विस्तार।

इस प्रकार, मराठों ने घरेलू झगड़ों को निपटाने के लिए राजस्थान में प्रवेश किया, जिसके लिए उन्हें काम पर रखा गया, बाद में वे स्वामी बन गए जो कर वसूलते थे और जब भी वे चाहते थे भूमि को तबाह कर देते थे।

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