रासायनिक प्रक्रिया द्वारा मूल खनिजों को अधात्विक खनिजों के अयस्कों से अलग नहीं किया जाता है। इनका प्रयोग प्राकृतिक रूप में ही किया जाता है।
- इमारती पत्थर
- संगमरमर:
- संगमरमर उत्पादन में राजस्थान का एकाधिकार है।
- राज्य भर में अलग-अलग रंग के संगमरमर के पत्थर पाए जाते हैं: उदयपुर में हरा, भैसलाना में काला, जालौर और बांसवाड़ा में गुलाबी, जैसलमेर में पीला, मकराना में सफेद और पाली में इंद्रधनुषी रंग का संगमरमर।
- राज्य के पास 1100 मिलियन टन उच्च गुणवत्ता वाले संगमरमर का भंडार है, जिसके प्रमुख उत्पादन केंद्र मकराना, राजसमंद, उदयपुर और किशनगढ़ में हैं।
- चूना पत्थर: भारत के भंडार का 10% ⇒ सीमेंट ग्रेड (चित्तौड़, बूंदी), रासायनिक ग्रेड (जोधपुर), स्टील ग्रेड (जैसलमेर)
- बलुआ पत्थर: जोधपुर में सफेद-भूरा, करौली-डांग क्षेत्र में सफेद, कोटा, बूंदी आदि में कोटा पत्थर
- ग्रेनाइट: जालोर, पाली, सिरोही, उदयपुर आदि
- संगमरमर:
- जिप्सम: भारत में जिप्सम की अधिकतम मात्रा राजस्थान में पाई जाती है, जिसका खनन चार प्रमुख क्षेत्रों में होता है: नागौर बेल्ट (गोठ-मांगलोद, भदवासी, मंगोल), चूरू-बीकानेर बेल्ट (जामसर, लूणकरनसर, तारानगर), जैसलमेर-बाड़मेर बेल्ट (मोहनगढ़, हमीरवाली), और पाली-जोधपुर बेल्ट (फलसुंड, मांगलोद)।
- अभ्रक : खैरवाड़ा, ऋषभदेव (उदयपुर); देवल, पिपरदा (डूंगरपुर )
- फ़ेलस्पर: भारत का 60%। राजस्थान का 96% हिस्सा अजमेर में
- अभ्रक: तीन बेल्ट: 1) जयपुर – टोंक बेल्ट (बरला, मानखंड, बंजारी, लक्ष्मी); 2) भीलवाड़ा-उदयपुर बेल्ट: दांता-भूणास, 3) अन्य क्षेत्र: तोरावाटी (सीकर), अजमेर आदि
- रॉक फॉस्फेट: उदयपुर (झामर कोटडा, दफन कोटडा), बांसवाड़ा (सलोपेट), जैसलमेर (बिरमानिया)
- डोलोमाइट: बांसवाड़ा (विट्ठल देव, त्रिपुरा सुंदरी), उदयपुर, राजसमंद (हल्दीघाटी, नाथद्वारा)
- सिलिका रेत: बूंदी (बरोदिया), जयपुर, सवाई माधोपुर, भरतपुर, बाड़मेर
- मिट्टी के खनिज: चीनी मिट्टी, बॉल मिट्टी, अग्नि मिट्टी (बीकानेर), ब्लीचिंग मिट्टी (बाड़मेर)
- कीमती पत्थर: पन्ना (राजसमंद बेल्ट – कालागुमान, टिक्की, गोगुंदा); गार्नेट (राजमहल-टोंक, अजमेर-सरवाड़)
- अन्य: कैल्साइट, बेंटोनाइट, पाइराइट्स (सीकर), सेंधा नमक (डीडवाना, लूनकसर, पचपदरा झील), बैराइट्स, मैग्नेसाइट

बिजली उत्पादन के पारंपरिक स्रोत, विशेष रूप से थर्मल (कोयला और गैस) और जलविद्युत संयंत्र, राजस्थान की बिजली की मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
थर्मल पावर प्लांट:
- कोयला आधारित बिजली संयंत्र: राजस्थान में कई कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र हैं। यहाँ पाए जाने वाले लिग्नाइट कोयले में सल्फर अधिक और कार्बन कम होता है, इसलिए राजस्थान कोयला आयात करता है।
- कोटा सुपर थर्मल पावर प्लांट: 1240 मेगावाट
- सूरतगढ़ थर्मल पावर स्टेशन: 1500 मेगावाट
- छबड़ा थर्मल पावर प्लांट: 2320 मेगावाट
- गिरल लिग्नाइट पावर प्लांट: 250 मेगावाट (लिग्नाइट से चलने वाला)
- गैस आधारित बिजली संयंत्र: राजस्थान में कुछ थर्मल पावर प्लांट भी ईंधन स्रोत के रूप में प्राकृतिक गैस का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए रामगढ़ गैस थर्मल पावर प्लांट, धौलपुर गैस थर्मल पावर प्लांट, अंता गैस पावर प्लांट आदि।
जलविद्युत संयंत्र: राजस्थान में भौगोलिक विशेषताओं के कारण जलविद्युत उत्पादन सीमित है।
- राज्य सरकार: जवाई जल विद्युत परियोजना (8 मेगावाट), झाकम लघु जल विद्युत परियोजना, अनस जल विद्युत परियोजना आदि
- साझाकरण: भाखड़ा नांगल जल विद्युत परियोजना (साझाकरण 168.5), व्यास जल विद्युत परियोजना, माही जल विद्युत परियोजना (140 मेगावाट), चंबल जल विद्युत संयंत्र (386 मेगावाट)
परमाणु ऊर्जा: राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजना (आरएपीपी) रावतभाटा, राजस्थान, भारत में एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जिसमें 6 दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) इकाइयां हैं और कुल स्थापित क्षमता 1,180 मेगावाट है।
- राजस्थान एम-सैंड नीति 2024: यह नीति सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनियंत्रित खनन पर प्रतिबंध के मद्देनजर नदी बालू के स्थान पर एक पारिस्थितिक दृष्टिकोण से मित्रवत विकल्प को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखती है।
- मांग और लक्ष्य:– – राजस्थान में रेत की उच्च मांग है, जिसका लक्ष्य 2028-29 तक एम-सैंड उत्पादन को 30 मिलियन टन तक बढ़ाना है।
- उद्देश्य:- प्रमुख लक्ष्यों में नदी की रेत पर निर्भरता को कम करना, ओवरबर्डन और निर्माण अपशिष्ट के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना और स्थानीय रोजगार पैदा करना शामिल है।
- कच्चा माल:- ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, क्वार्टजाइट अपशिष्ट, खनन ओवरबर्डन और पुनर्चक्रित निर्माण मलबे जैसी सामग्री का उपयोग एम-सैंड के लिए किया जाता है।
- नीति अवधि:- नीति 31 मार्च 2029 तक या प्रतिस्थापित होने तक प्रभावी रहेगी।
- प्रोत्साहन:- नीति सरकारी परियोजनाओं में एम-सैंड इकाई की स्थापना और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय और परिचालन प्रोत्साहन प्रदान करती है।
- अपशिष्ट प्रबंधन:- नीति शून्य-निर्वहन मॉडल को अनिवार्य बनाती है, उपचारित जल और घोल के पुन: उपयोग को प्रोत्साहित करती है और पर्यावरण के अनुकूल निपटान सुनिश्चित करती है।
- कार्यान्वयन:- जयपुर में डीएमजी के अंतर्गत एक समर्पित एम-सैंड सेल कार्यान्वयन की देखरेख करेगा तथा राज्य सरकार किसी भी विवाद का समाधान करेगी।
