सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (धारा 2(ज)) के अनुसार “लोक/सार्वजनिक प्राधिकारी” से अभिप्राय किसी ऐसे प्राधिकरण, निकाय या स्वशासन संस्था से है, जो—

  • संविधान द्वारा या उसके अधीन स्थापित हो,
  • संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा स्थापित हो,
  • राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा स्थापित हो,
  • समुचित सरकार द्वारा अधिसूचना या आदेश द्वारा गठित हो।
  • इसके अंतर्गत निम्न भी शामिल हैं—
    • ऐसे निकाय जो सरकार के स्वामित्व, नियंत्रण या सारभूत वित्तपोषण में हों,
    • ऐसे गैर-सरकारी संगठन (NGO) जो सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सारभूत रूप से वित्तपोषित हों।
  • उदाहरण: 
    • गृह मंत्रालय — कानून द्वारा स्थापित
    • राजस्थान उच्च न्यायालय — संविधान के अधीन स्थापित
    • सरकारी विद्यालय — सरकार द्वारा पर्याप्त वित्तपोषित
    • मिड-डे मील योजना चलाने वाला NGO — सरकार द्वारा वित्तपोषित
    • UGC अनुदान प्राप्त करने वाला निजी कॉलेज — सारभूत रूप से वित्तपोषित

हाँ, ऐसे निजी विद्यालय को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत सूचना प्रदान करने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

  • RTI अधिनियम की धारा 2(ज) के अनुसार, “लोक प्राधिकारी” में ऐसे निकाय या गैर-सरकारी संगठन भी शामिल हैं जो सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सारभूत रूप से वित्तपोषित (Substantially Financed) हों। चूँकि उक्त निजी विद्यालय को सरकार से पर्याप्त अनुदान प्राप्त हो रहा है, इसलिए वह लोक प्राधिकारी की श्रेणी में आएगा।
  • अतः उसकी फीस संरचना से संबंधित सूचना RTI के तहत मांगी जा सकती है, क्योंकि यह लोक हित, पारदर्शिता एवं जवाबदेही से संबंधित विषय है। केवल निजी प्रबंधन होने के आधार पर विद्यालय सूचना देने से इंकार नहीं कर सकता।
  • साथ ही, DAV College Trust v. Director of Public Instructions मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्तपोषित संस्थाएँ एवं NGO RTI के दायरे में आते हैं।

इस प्रकार, विद्यालय को RTI अधिनियम के अंतर्गत फीस संरचना की सूचना देने हेतु बाध्य किया जा सकता है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत जन सूचना अधिकारी (PIO) नागरिकों को सूचना उपलब्ध कराने वाला प्रमुख अधिकारी होता है। इसके कर्तव्यों का उल्लेख मुख्यतः धारा 5, 6 एवं 7 में किया गया है।

पीआईओ के प्रमुख कर्तव्य

  • आरटीआई आवेदन प्राप्त करना
    • नागरिकों द्वारा मांगे गए सूचना आवेदन स्वीकार करना।
  • आवेदक को सहायता प्रदान करना
    • धारा 5(3) के अनुसार, PIO का कर्तव्य है कि वह सूचना चाहने वाले व्यक्ति, विशेषकर निरक्षर या दिव्यांग व्यक्ति, की सहायता करे।
  • सूचना आवेदन का निपटारा करना
    • आवेदन की जांच करके सूचना उपलब्ध कराना अथवा विधि अनुसार अस्वीकार करना।
  • निर्धारित समय सीमा में सूचना देना
    • धारा 7 के अनुसार सामान्यतः सूचना 30 दिनों के भीतर दी जानी चाहिए।
    • जीवन एवं स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में सूचना 48 घंटे के भीतर देना अनिवार्य है।
  • आवेदन का अंतरण (Transfer)
    • धारा 6(3) के अनुसार यदि सूचना किसी अन्य लोक प्राधिकारी से संबंधित है, तो आवेदन को 5 दिनों के भीतर संबंधित प्राधिकारी को स्थानांतरित करना होगा।
  • पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करना
    • PIO शासन में Transparency और Accountability को बढ़ावा देता है।
  • अस्वीकृति के कारण बताना
    • यदि सूचना देने से मना किया जाता है, तो PIO को:
      • अस्वीकृति के कारण,
      • अपील की समय सीमा,
      • अपीलीय प्राधिकारी का विवरण बताना आवश्यक है।
  • अन्य अधिकारियों से सहायता लेना
    • धारा 5(4) के अंतर्गत PIO आवश्यकता पड़ने पर अन्य अधिकारियों की सहायता ले सकता है।

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