Sol –
महिलाओं के स्वास्थ्य पर बाल विवाह का प्रभाव –
- खराब स्वास्थ्य संकेतक: कम उम्र में गर्भधारण से भ्रूण के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव ।
- कम उम्र में बच्चे पैदा करने से मातृ मृत्यु दर और रुग्णता दर बढ़ जाती है।
- 20-24 वर्ष की आयु की 23.3% महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हो गई थी, जिससे स्वास्थ्य जोखिम अधिक हो गया (NFHS-5)।
- उच्च बाल मृत्यु दर: युवा माताओं से पैदा होने वाले बच्चों की मृत्यु दर और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं अधिक होती हैं (NFHS-5)।
- बढ़ा हुआ एसटीडी जोखिम: युवा दुल्हनों को एचआईवी और अन्य यौन संचारित रोगों(एसटीडी) का अधिक जोखिम होता है (NFHS-4)
- पोषण संबंधी कमियाँ: तैयारी के अभाव से माँ और बच्चे में विभिन्न स्वाथ्य संबंधी कमियाँ हो जाती हैं
- मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं: घरेलू हिंसा से PTSD और अवसाद हो सकता है।
- दुर्व्यवहार का अधिक जोखिम: युवा विवाहित महिलाओं को अक्सर घरेलू और यौन दुर्व्यवहार व सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है।
- बढ़ी हुई प्रजनन दर: परिवार नियोजन के बारे में जागरूकता की कमी से प्रजनन दर में वृद्धि होती है।
Solution:
बाल विवाह को बनाए रखने में समाजीकरण और परंपराओं की भूमिका
- समाजीकरण → बचपन से ही बच्चों को सिखाया जाता है कि लड़कियों की जल्दी शादी करना सामान्य है और यह परिवार का कर्तव्य है।
- परंपराएँ और सांस्कृतिक मान्यताएँ → जल्दी विवाह को परिवार की इज्जत बचाने, जातीय शुद्धता बनाए रखने और महिला यौनिकता पर नियंत्रण का माध्यम माना जाता है। उदाहरण: ग्रामीण भारत में लड़कियों की जल्दी शादी को उन्हें विवाह पूर्व संबंधों से बचाने का तरीका माना जाता है।
- पितृसत्तात्मक मानसिकता → महिलाओं की भूमिका केवल विवाह और संतानोत्पत्ति तक सीमित मानी जाती है, जिससे जल्दी विवाह को बल मिलता है।
- आर्थिक कारण → लड़कियों को आर्थिक बोझ समझा जाता है, जिससे दहेज खर्च कम करने के लिए जल्दी विवाह को प्रोत्साहन मिलता है।
- सामुदायिक दबाव → बेटियों की जल्दी शादी न करने पर सामाजिक बहिष्कार का डर।
- धार्मिक और क्षेत्रीय प्रथाएँ → बाल विवाह को वैधता और निरंतरता प्रदान करती हैं। उदाहरण: राजस्थान में अक्षय तृतीया (आखा तीज) के दौरान बाल विवाह में वृद्धि देखी जाती है।
- शिक्षा की कमी और गरीबी → जागरूकता घटती है, लड़कियों के लिए विकल्प सीमित हो जाते हैं।
- NFHS-5 (2019–21): 20–24 वर्ष की आयु की 23.3% महिलाएँ 18 वर्ष से पहले विवाह कर चुकी थीं।
Sol –
आंकड़े:- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, राज्य में 20 से 24 वर्ष की आयु की 25.4% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हो गया।
बाल विवाह को नियंत्रित करने के लिए उपाय
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 की धारा 6 की उपधारा 16 के अन्तर्गत “बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी” की नियुक्ति।
- “रोकथाम, संरक्षण एवं अभियोजन” मॉडल अपनाया गया है।
- राजस्थान पंचायती राज नियम, 1996 के अन्तर्गत बाल विवाह रोकने की जिम्मेदारी ग्राम सरपंच की है।
- चाइल्ड हेल्प लाइन 1098
- ऑपरेशन लाडली: बाल विवाह रोकने का अभियान
- जनप्रतिनिधियों में प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ “चेतना बैठक” का आयोजन।
- वर-वधू की जन्मतिथि मुद्रित करने पर जोर।
- अक्षय तृतीया पीपल पूर्णिमा जैसे “अबूझ सावों” पर जिला एवं उपखण्ड कार्यालयों में नियंत्रण कक्ष स्थापित करना।
- ग्राम सभाओं में सामूहिक रूप से बाल विवाह के दुष्प्रभावों पर चर्चा करना तथा इसे रोकने के लिए कार्यवाही करना। बाल विवाह को रोकने के लिए 181 कॉल सेंटर तथा पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर 24 घंटे कॉलिंग की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। विद्यालयों में बाल विवाह के दुष्प्रभावों तथा इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराना।
Sol –
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 41: राज्य को काम करने, शिक्षा प्राप्त करने और बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी और विकलांगता के मामलों में सार्वजनिक सहायता के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 46: समाज के कमजोर वर्गों, जिसमें दिव्यांग व्यक्ति भी शामिल हैं, के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देता है और उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से बचाता है।
- (सामान्य बिंदु जो जोड़े जा सकते हैं)
- अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता।
- अनुच्छेद 15: भेदभाव का निषेध।
- अनुच्छेद 21: सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार।
कानूनी प्रावधान
दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016:
- नौकरियों और शिक्षा में 4% आरक्षण।
- सार्वजनिक सेवाओं में पहुँच को अनिवार्य बनाता है।
- सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और पुनर्वास प्रावधान।
- भेदभाव और दुर्व्यवहार से सुरक्षा।
राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999: ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता और कई विकलांगताओं वाले व्यक्तियों का समर्थन करता है।
भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992: पुनर्वास पेशेवरों के प्रशिक्षण को विनियमित करता है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम, 2017: मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करता है और मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है।
ये प्रावधान भारत में विकलांग व्यक्तियों के लिए समानता, गैर-भेदभाव और अवसर सुनिश्चित करते हैं।
योजनाएँ और नीतियाँ (extra)
- दीनदयाल विकलांग पुनर्वास योजना (DDRS): शिक्षा और पुनर्वास के लिए वित्तीय सहायता।
- सुगम्य भारत अभियान: इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों और सेवाओं को सुलभ बनाना है।
- दिव्यांग व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय नीति, 2006: पुनर्वास और सहायता के लिए व्यापक उपाय।

