न्यायिक सक्रियता

हाल ही में दिल्ली में एक न्यायाधीश के आवास से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने (2024) की घटना ने भारत की न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चिंताओं को पुनर्जीवित कर दिया है। इसने एक बार फिर यह प्रश्न उठाया है कि किस प्रकार न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) और न्यायिक उत्तरदायित्व (Judicial Accountability) के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।

न्यायिक स्वतंत्रता बनाम न्यायिक उत्तरदायित्व :

पहलून्यायिक स्वतंत्रतान्यायिक उत्तरदायित्व
परिभाषान्यायपालिका का कार्यपालिका, विधायिका, मीडिया आदि बाह्य दबावों से मुक्त होनान्यायाधीशों द्वारा ईमानदारी, पारदर्शिता एवं जवाबदेही के सिद्धांतों का पालन करना
उद्देश्यनिष्पक्ष और निर्भीक न्याय सुनिश्चित करनाउत्तरदायी व नैतिक आचरण को सुनिश्चित करना
संवैधानिक आधारअनुच्छेद 50, अनुच्छेद 124(4), कार्यकाल की सुरक्षाविधि के शासन (Rule of Law) के अंतर्गत अंतर्निहित; बैंगलोर सिद्धांतों द्वारा समर्थित
प्रकृतिसंस्थागत और व्यक्तिगत स्वायत्ततानैतिक और प्रक्रियात्मक उत्तरदायित्व
मुख्य तंत्र– कार्यकाल की सुरक्षा- शक्तियों का पृथक्करण- वित्तीय स्वतंत्रता– आंतरिक जांच प्रक्रियाएं- न्यायिक मूल्यों की पुनर्पुष्टि- बैंगलोर सिद्धांत
यदि अनुपस्थित हो तो जोखिमन्यायिक पक्षपात, राजनीतिक हस्तक्षेपमनमाने निर्णय, भ्रष्टाचार, जनविश्वास की हानि
आदर्श स्थितिएक निष्पक्ष, निर्भीक न्यायपालिकाएक पारदर्शी, उत्तरदायी न्यायपालिका

न्यायिक स्वतंत्रता का महत्व :

  1. संवैधानिक प्रावधान
    • अनुच्छेद 50 – न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का निर्देश देता है।
    • अनुच्छेद 124 और 217 – न्यायाधीशों को कार्यकाल की सुरक्षा, निश्चित वेतन, और महाभियोग द्वारा ही हटाने का प्रावधान द्वारा उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं।
    • अनुच्छेद 121 और 211 – संसद और राज्य विधानमंडल में न्यायिक आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करते हैं (केवल महाभियोग की प्रक्रिया को छोड़कर)।
    • अनुच्छेद 32 और 226 – मौलिक अधिकारों को लागू करने हेतु उच्चतम और उच्च न्यायालयों को शक्तियाँ प्रदान करते हैं, जिससे न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से कार्य कर सके।
  2. विधि के शासन के लिए आवश्यक:
    • न्यायपालिका को राजनीतिक और कार्यपालिका के दबाव से संरक्षण देता है।
    • निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा को सुनिश्चित करता है।
    • संवैधानिक समीक्षा को संभव बनाता है और संविधान में शक्ति के पृथक्करण को बनाए रखता है।
    • बहुसंख्यकवादी लोकतंत्र में अल्पसंख्यक और असहमति की रक्षा करता है।
  3. महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
    • केशवानंद भारती मामला (1973): न्यायिक स्वतंत्रता को संविधान की मूल संरचना का भाग माना गया।
    • एस. पी. गुप्ता मामला (1981): न्यायिक नियुक्तियों में स्वायत्तता की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।
    • दूसरा न्यायाधीश मामला (1993): न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता को स्थापित किया गया।
    • एनजेएसी निर्णय (2015): कार्यपालिका के प्रभाव को रोकते हुए न्यायपालिका की स्वायत्तता को बनाए रखा गया।

न्यायिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता : 

  1. न्यायिक जीवन के मूल्यों की पुनर्पुष्टि (1997): न्यायाधीशों के लिए नैतिक अपेक्षाएँ निर्धारित करता है, परंतु यह बाध्यकारी नहीं है और इसका कोई प्रवर्तन तंत्र नहीं है।
  2. बैंगलोर न्यायिक आचरण सिद्धांत (2002): भारतीय न्यायपालिका द्वारा अपनाए गए वैश्विक नैतिक मानक, जिनमें ईमानदारी, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व शामिल हैं।
  3. लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व : 
    • न्यायपालिका को संवैधानिक मूल्यों और जन अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य करना चाहिए।
    • उत्तरदायित्व से मनमानेपन और अधिकारों के दुरुपयोग की संभावना कम होती है।
    • यह न्यायपालिका की वैधता को बनाए रखता है।
    • व्यक्तिगत पक्षपात और अपारदर्शिता की गुंजाइश को कम करता है।
  4. वर्तमान व्यवस्था की समस्याएँ :
    • कॉलेजियम प्रणाली में अपारदर्शिता: संस्थागत पारदर्शिता का अभाव।
    • नैतिक संहिता और अनुशासनात्मक तंत्र का अभाव।
    • उच्च-प्रोफ़ाइल मामलों में अत्यधिक विलंब और न्याय में देरी।
    • दुर्व्यवहार के बावजूद कुछ ही महाभियोग, क्योंकि यह प्रक्रिया अत्यंत कठिन है।
    • कोलेजियम के निर्णयों में सार्वजनिक तर्कों की कमी, जिससे विश्वास में गिरावट आती है।

दोनों के बीच संतुलन हेतु उपाय :

  1. पारदर्शी कॉलेजियम प्रणाली: नियुक्तियों में संस्थागत सुधार और खुली कार्यवाही की आवश्यकता।
  2. आंतरिक नैतिक ढाँचा: कोड ऑफ कंडक्ट और आंतरिक अनुशासनात्मक व्यवस्था को सशक्त करना।
  3. न्यायिक निष्पादन अंकेषण (Judicial Performance Audit) : न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित किए बिना कार्यकुशलता और मामलों के निपटान की समीक्षा।
  4. संवैधानिक निरीक्षण तंत्र : राजनीतिक दुरुपयोग से संरक्षित न्यायिक उत्तरदायित्व आयोग की स्थापना।
  5. न्यायिक प्रशिक्षण और नैतिक शिक्षा :  न्यायाधीशों में नैतिक मानकों के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
  6. डिजिटल पारदर्शिता और सार्वजनिक प्रकटीकरण :  कॉलेजियम के निर्णय, न्यायाधीशों की संपत्ति, और अदालती आँकड़े ऑनलाइन प्रकाशित किए जाएँ।
  7. नागरिक समाज और शैक्षणिक सहभागिता : कानूनी शिक्षाविदों और नागरिक समाज की भागीदारी से सुधारों में प्रतिक्रिया और सुझाव प्राप्त हों।

आगे की राह :

  • न्यायिक मानक और उत्तरदायित्व विधेयक (2010)
    • शिकायत निवारण तंत्र और नैतिक संहिता का प्रस्ताव था।
    • परंतु कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप की आशंका के चलते यह विधेयक पारित नहीं हो सका।

जबकि लोकतंत्र के लिए न्यायिक स्वतंत्रता अपरिहार्य है, जवाबदेही यह सुनिश्चित करती है कि यह न्यायिक निरंकुशता में न बदले। एक वैधानिक आचार संहिता, पुनर्गठित नियुक्ति प्रक्रिया और निष्पादन अंकेषण इस संतुलन को प्राप्त कर सकती हैं।

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