जनसंख्या – वृद्धि, वितरण, घनत्व, लिंगानुपात, साक्षरता, नगरीय एवं ग्रामीण जनसंख्या

भारत में जनसंख्या का वितरण अत्यंत असमान है। किसी क्षेत्र विशेष में जनसंख्या के सघन या विरल होने के पीछे निम्नलिखित भौगोलिक, आर्थिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कारक उत्तरदायी हैं:

  • जलवायु: अत्यधिक विषम जलवायु वाले क्षेत्र जैसे अति-शीत (हिमालयी क्षेत्र), अत्यधिक उष्ण (थार का मरुस्थल) तथा अत्यधिक आर्द्र (पूर्वी हिमालय) मानव बसाव के अनुकूल नहीं होते, अतः यहाँ जनसंख्या विरल पाई जाती है। इसके विपरीत, समशीतोष्ण एवं अनुकूल जलवायु वाले क्षेत्र (जैसे गंगा के मैदान) उच्च जनसंख्या घनत्व को आकर्षित करते हैं।
  • उच्चावच एवं स्थलाकृति: समतल एवं उपजाऊ मैदान, जैसे सिन्धु-गंगा का मैदान, कृषि, परिवहन तथा उद्योग के लिए उपयुक्त होने के कारण सघन आबादी का समर्थन करते हैं। इसके विपरीत, पर्वतीय, विषम तथा उबड़-खाबड़ भू-भाग मानवीय अधिवास एवं अवसंरचना विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं, जिससे यहाँ जनसंख्या कम पाई जाती है।
  • जल की उपलब्धता : जल जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। नदियां एवं उनके कछार (जैसे गंगा और ब्रह्मपुत्र की नदियाँ) तथा सिंचाई सुविधाओं से युक्त क्षेत्र (जैसे पंजाब और हरियाणा) सघन बसे हुए हैं। राजस्थान जैसे शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जनसंख्या का वितरण मुख्य रूप से नहरों (जैसे इंदिरा गांधी नहर) की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
  • मृदा की उर्वरता: उपजाऊ जलोढ़ मृदा गहन कृषि को प्रोत्साहन देती है, जिसके कारण उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जनघनत्व अत्यधिक उच्च है। इसके विपरीत, पठारी एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों की अनुर्वर अथवा बंजर मृदा सीमित कृषि के कारण कम जनसंख्या को पोषित कर पाती है।
  • खनिज एवं औद्योगिक संसाधन: खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र खनन, उद्योगों तथा रोजगार के अवसरों का सृजन करते हैं। छोटानागपुर पठार और दामोदर घाटी क्षेत्र अपनी औद्योगिक एवं खनन गतिविधियों के कारण सघन जनसंख्या को आकर्षित करते हैं।
  • परिवहन एवं कनेक्टिविटी: सुदृढ़ परिवहन नेटवर्क एवं बेहतर गतिशीलता वाले क्षेत्र (जैसे दिल्ली, मुंबई और कोलकाता) उच्च आर्थिक गतिविधियों तथा अवसंरचनात्मक सुविधाओं के कारण सघन जनसंख्या वाले महानगर बन चुके हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक कारक: ऐतिहासिक महत्व, धार्मिक आस्था तथा प्राचीन व्यापारिक केंद्र (जैसे वाराणसी, जयपुर और मैसूर) सदियों से मानव बसाव के मुख्य केंद्र रहे हैं, जिससे यहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक पाया जाता है।
  • राजनीतिक एवं सुरक्षा स्थितियां: राजनीतिक अस्थिरता, अशांति तथा सीमावर्ती तनाव वाले क्षेत्रों (जैसे जम्मू एवं कश्मीर तथा पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्से) में जन-जीवन तथा आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं, जिससे यहाँ जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत कम रहता है।

भारत की भौगोलिक संरचनाएँ हिमालय पर्वत, इंडो-गंगेटिक मैदान, दक्कन पठार, तटीय क्षेत्र और रेगिस्तानों को शामिल करती हैं। ये विविध भौगोलिक रूप जनसंख्या वितरण और भूमि उपयोग को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करते हैं:

  • हिमालय और उत्तरी पर्वत
    • जनसंख्या: हिमालयी क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी पहाड़ी राज्य दुर्गम स्थलाकृतियों और कठिन पहुंच के कारण कम जनसंख्या घनत्व वाले हैं। यहां की जनसंख्या मैदानों की तुलना में कम है।
    • भूमि उपयोग: खड़ी ढलानों और समतल भूमि की कमी के कारण कृषि गतिविधियां सीमित हैं। ये क्षेत्र मुख्य रूप से जंगलों और जनजातीय बस्तियों के लिए उपयोग किए जाते हैं।
  • इंडो-गंगेटिक मैदान 
    • जनसंख्या: यह भारत का सबसे घनी जनसंख्या वाला क्षेत्र है। इंडो-गंगेटिक मैदान की उर्वर मृदा, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा में, कृषि को समर्थन देती है और उच्च जनसंख्या घनत्व का कारण बनती है।
    • भूमि उपयोग: भूमि का मुख्य रूप से कृषि (चावल, गेहूं और गन्ना) के लिए उपयोग होता है, और यहां व्यापक सिंचाई प्रणालियाँ स्थापित हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी नदियों से जल उपलब्धता और जलोढ़ मृदा इसे उच्च उत्पादकता वाली कृषि के लिए उपयुक्त बनाती है। (कुल उत्पादन का 40%)
  • दक्कन पठार
    • जनसंख्या: महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना में स्थित दक्कन पठार में मध्यम जनसंख्या घनत्व है। पहाड़ी इलाकों में जनसंख्या कम है, लेकिन कावेरी डेल्टा जैसे समतल क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व अधिक है।
    • भूमि उपयोग: पठार के कृषि भूमि का उपयोग मुख्य रूप से कपास, मूंगफली और दालों की खेती के लिए किया जाता है। इस क्षेत्र में खनिज संसाधनों की प्रचुरता के कारण खनन और औद्योगिक गतिविधियां भी महत्वपूर्ण हैं।
  • तटीय क्षेत्र
    • जनसंख्या: तमिलनाडु, केरल, गुजरात और पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्रों में उर्वर मृदा, अनुकूल जलवायु और व्यापारिक मार्गों के निकटता के कारण उच्च जनसंख्या घनत्व होता है।
    • भूमि उपयोग: इन क्षेत्रों का व्यापक रूप से कृषि (विशेष रूप से चावल और नारियल) और मछली पालन के लिए उपयोग होता है। तटीय शहरों में बंदरगाह भी होते हैं, जो व्यापार और वाणिज्य का समर्थन करते हैं, जिससे शहरीकरण में वृद्धि होती है।
  • थार रेगिस्तान
    • जनसंख्या: राजस्थान में स्थित थार रेगिस्तान में कठोर जलवायु परिस्थितियाँ, जैसे कम वर्षा, अत्यधिक तापमान और सीमित जल संसाधन, के कारण कम जनसंख्या घनत्व होता है।
    • भूमि उपयोग: भूमि मुख्य रूप से चराई और वनस्पति के लिए उपयोग की जाती है, और कृषि सूखा सहिष्णु फसलों तक सीमित होती है। इंदिरा गांधी नहर जैसे सिंचाई परियोजनाएँ कुछ क्षेत्रों में खेती की भूमि बढ़ाने में मदद करती हैं।

भारत की भौगोलिक संरचना जनसंख्या और भूमि उपयोग को प्रभावित करती हैं। उर्वर मैदान, नदी घाटियाँ और तटीय क्षेत्र घनी जनसंख्या और कृषि का समर्थन करते हैं, जबकि पर्वत, पठार और रेगिस्तान में कम जनसंख्या और सीमित कृषि होती है, जिसके कारण क्षेत्रीय विषमताएँ उत्पन्न होती हैं।

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