राजनीतिक दल: विकास और स्थिति राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग हैं, जो राज्य की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दिशा और स्थिरता प्रदान करते हैं। समय के साथ इन दलों का विकास सामाजिक, आर्थिक और क्षेत्रीय परिवर्तनों के अनुरूप हुआ है। वर्तमान में राजस्थान में राजनीतिक दलों की स्थिति प्रतिस्पर्धात्मक होने के साथ-साथ जन-आधारित राजनीति को भी प्रतिबिंबित करती है |
राजस्थान में दलों का उदय, संभावना एवं वर्तमान स्थिति
राम राज्य परिषद
- स्थापना: 1948 में करपात्री महाराज (स्वामी हरिहरानंद सरस्वती) ने हिंदू राष्ट्र की संकल्पना के साथ इस पार्टी की स्थापना की।
- राजस्थान की राजनीति में धार्मिक मुद्दों को प्रमुखता देने वाली पहली पार्टी थी।
- यह राजस्थान का पहला विपक्षी दल था, जिसकी स्थापना 1947 में जयपुर और जोधपुर के प्रमुख जागीरदारों द्वारा की गई थी।
- इसका उद्देश्य जागीरदारों और राजाओं के नेतृत्व में कांग्रेस विरोधी, सामंतवादी और अनुदार तत्वों को संगठित करना था।
1952 राजस्थान विधानसभा चुनाव और रामराज्य परिषद की सफलता
- पहले आम चुनाव (1952) में रामराज्य परिषद ने राजस्थान में उल्लेखनीय सफलता पाई।
- 24 सीटों पर जीत दर्ज की (राजस्थान विधानसभा में)।
- कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।
- राजस्थान में धार्मिक राजनीति का प्रारंभिक चरण इसी चुनाव से शुरू हुआ।
1957 विधानसभा चुनाव: पार्टी का प्रभाव कम होना
- 1957 के चुनाव में रामराज्य परिषद की सीटें घटकर 17 रह गईं।
- कांग्रेस की लोकप्रियता बढ़ने और जनसंघ एवं स्वतंत्र पार्टी के उभरने से रामराज्य परिषद का प्रभाव कम होने लगा।
- राजस्थान में शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस का दबदबा बढ़ा, जिससे धार्मिक आधार पर गठित दलों की लोकप्रियता घटी।
1962 और 1967 विधानसभा चुनावों में गिरावट
- 1962 में रामराज्य परिषद केवल 1 सीट जीत पाई।
- 1967 में भी पार्टी कोई प्रभाव नहीं डाल सकी और धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिए पर चली गई।
- हिंदू महासभा और जनसंघ के बढ़ते प्रभाव के कारण रामराज्य परिषद के समर्थक इन दलों की ओर आकर्षित होने लगे।
1971 में भारतीय जनसंघ के साथ विलय
- 1971 में रामराज्य परिषद का जनसंघ में विलय हो गया।
- इस विलय के बाद राजस्थान में पार्टी की स्वतंत्र पहचान समाप्त हो गई।
स्वतंत्र पार्टी
स्थापना एवं विचारधारा (1959)
- संस्थापक: सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने 1-2 अगस्त 1959 को बंबई में स्थापना की।
- कारण: कांग्रेस की समाजवादी नीतियों (नागपुर अधिवेशन, 1959) जैसे—सहकारी कृषि, भूमि सीमा निर्धारण और अन्न के राष्ट्रीयकरण के विरोध में।
- प्रमुख नेता: मीनू मसानी, के.एम. मुंशी, महारावल लक्ष्मण सिंह, महारानी गायत्री देवी।
- समर्थक वर्ग: राजघराने, जागीरदार, उद्योगपति और भू-स्वामी।
- वैचारिक आधार: यह एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) और मुक्त व्यापार (Free Market) की समर्थक पार्टी थी।
महारानी गायत्री देवी का राजनीतिक प्रवेश
- पृष्ठभूमि: 1957 में कांग्रेस के प्रस्ताव को ठुकराने के बाद 1960 में स्वतंत्र पार्टी से जुड़ीं।
- उद्देश्य: कांग्रेस के ‘कुशासन’ के विरुद्ध एक मजबूत लोकतांत्रिक विकल्प खड़ा करना।
- स्वतंत्र पार्टी से तीन बार जयपुर लोकसभा सांसद बनीं।
चुनावी प्रदर्शन एवं उपलब्धियाँ
- तृतीय विधानसभा चुनाव (1962)
- सीटें: स्वतंत्र पार्टी 36 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनी (उपचुनावों के बाद संख्या 40 हुई)।
- गायत्री देवी का रिकॉर्ड: जयपुर लोकसभा सीट से पौने दो लाख मतों के अंतर से जीतकर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
- परिवार का दबदबा: महाराजा मानसिंह (राज्यसभा), जबकि पुत्र जयसिंह और पृथ्वीराज क्रमशः मालपुरा व दौसा से निर्वाचित हुए।
- चतुर्थ विधानसभा चुनाव (1967)
- गठबंधन: जनसंघ के साथ चुनावी तालमेल किया (हालाँकि गायत्री देवी जनसंघ को ‘रूढ़िवादी’ मानती थीं)।
- परिणाम: स्वतंत्र पार्टी 49 सीटें जीतकर राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी (26.6% मत)।
- उद्योगपतियों का प्रवेश: इस चुनाव में पार्टी के टिकट पर 5 बड़े उद्योगपति विधायक बनकर आए।
जनसंघ के साथ संबंध एवं मतभेद
- वैचारिक टकराव: गायत्री देवी जनसंघ को कट्टर हिंदूवादी मानती थीं और मुस्लिम वोटों के नुकसान से आशंकित थीं।
- किशनपोल विवाद: 1962 में जनसंघ के भैरोंसिंह शेखावत के विरुद्ध स्वतंत्र पार्टी द्वारा उम्मीदवार उतारने से संबंधों में खटास आई।
- 1967 गठबंधन: राष्ट्रीय नेतृत्व के दबाव में गठबंधन हुआ, जिससे कांग्रेस को कड़ी चुनौती मिली।
पतन एवं विलय
- 1972 का चुनाव: पार्टी का प्रभाव तेजी से घटा और केवल 11 सीटें ही जीत पाई।
- अंत: अंततः पार्टी का विलय चौधरी चरण सिंह की पार्टी (भारतीय लोकदल/जनता पार्टी) में हो गया।
भारतीय जनसंघ
स्थापना एवं पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय स्तर पर स्थापना: 21 अक्टूबर 1951।
- संस्थापक अध्यक्ष: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (पूर्व हिंदू महासभा अध्यक्ष एवं नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य)।
- सहयोग: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वैचारिक और संगठनात्मक सहयोग से स्थापना।
- तात्कालिक कारण: 1950 में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति को लेकर नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में डॉ. मुखर्जी का केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा।
मुख्य विचारधारा एवं उद्देश्य
- आधार: राष्ट्रवाद और हिंदू संस्कृति।
- नारा: “एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र”।
- विरोध: कांग्रेस की कश्मीर नीति, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और पश्चिमी अंधानुकरण का विरोध।
- आर्थिक विचार: स्वदेशी और निजी उद्योगों का समर्थन।
- पंडित दीनदयाल उपाध्याय का योगदान: ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन और अंत्योदय की अवधारणा।
राजस्थान में जनसंघ का उदय (1951-1960)
- स्थापना: अखिल भारतीय स्थापना से पूर्व 12-13 सितंबर 1951 को जयपुर में सम्मेलन।
- प्रथम अधिवेशन: 13-14 अक्टूबर 1951 (अध्यक्ष: पं. चिरंजीलाल मिश्र)।
- प्रमुख प्रारंभिक नेता: सुंदरसिंह भंडारी, भैरोंसिंह शेखावत, सतीशचंद्र अग्रवाल, जगदीश प्रसाद माथुर।
- राजधानी विवाद (1956): * अजमेर विलय के बाद पी. सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर जयपुर राजधानी बनी।
- 1958 में हाईकोर्ट जोधपुर स्थानांतरित करने का जनसंघ ने विरोध किया।
- 31 जनवरी 1977 को जयपुर में हाईकोर्ट की बेंच स्थापित की गई।
चुनावी यात्रा एवं राजनीतिक विस्तार
- प्रथम आम चुनाव (1952)
- विधानसभा: 8 सीटें जीतीं (मुख्यतः राजपूत समुदाय का समर्थन)।
- लोकसभा: चित्तौड़गढ़ सीट से उमाशंकर त्रिवेदी विजयी (माणिक्य लाल वर्मा को हराया)।
- द्वितीय आम चुनाव (1952)
- 6 विधायक निर्वाचित हुए।
- 1957 में 6 उम्मीदवार लोकसभा चुनाव में उतारे, सभी पराजित हुए, लेकिन वोट प्रतिशत बढ़कर 11.1% हो गया।
- तृतीय एवं चतुर्थ विधानसभा (1962-1967)
- 1962: 15 सीटें जीतीं। स्वतंत्र पार्टी (शाही परिवारों का दल) के उदय के बावजूद जनसंघ का आधार बढ़ा।
- 1967 का चुनाव (गठबंधन राजनीति):
- जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और जनता पार्टी (कुंभाराम आर्य) ने मिलकर चुनाव लड़ा।
- परिणाम: जनसंघ ने 22 सीटें जीतीं। कोटा जिले की सभी 8 सीटों पर कब्जा।
- राष्ट्रपति शासन: बहुमत के बावजूद राज्यपाल संपूर्णानंद ने विपक्ष को आमंत्रित नहीं किया और 13 मार्च 1967 को राज्य में प्रथम बार राष्ट्रपति शासन लगा।
- आपातकाल और जनता पार्टी का दौर (1975-1977)
- आंदोलन: गुजरात के ‘नवनिर्माण’ और जेपी के ‘सम्पूर्ण क्रांति’ आंदोलन को पूर्ण समर्थन।
- विलय: 1977 में कांग्रेस को हराने के लिए जनसंघ का जनता पार्टी में विलय।
- ऐतिहासिक जीत: 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को 150 सीटें मिलीं।
- प्रथम गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री: भैरोंसिंह शेखावत (22 जून 1977)।
जनसंघ की विधायी एवं किसान नीति
- किसानों का पक्ष: कांग्रेस की सहकारी कृषि योजना को ‘किसान विरोधी’ बताकर विरोध किया।
- खातेदारी अधिकार: भैरोंसिंह शेखावत ने इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र के किसानों को खातेदारी अधिकार देने की पुरजोर मांग की।
- लेवी विरोध: कृषकों पर लगान के अनुपात में नकद लेवी वसूलने के प्रस्ताव का विरोध किया, जिससे जाट समुदाय और अन्य कृषकों का समर्थन मिला।
जनता पार्टी का गठन और विघटन (1977-1980)
1977 का चुनाव और ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन
- गठन: आपातकाल के बाद कांग्रेस विरोधी दलों (जनसंघ, लोकदल, संगठन कांग्रेस और समाजवादी दल) के विलय से जनता पार्टी बनी।
- बहुमत: 1977 के विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी ने राजस्थान की 200 में से 152 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया।
- प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार: भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में राजस्थान में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।
जनता पार्टी में आंतरिक संघर्ष के कारण
- वैचारिक मतभेद: घटक दलों में वैचारिक समरसता की कमी थी; सदस्य अपने पुराने दलों और नेताओं (जैसे चरण सिंह, मोरारजी देसाई) के प्रति अधिक निष्ठावान थे।
- दोहरी सदस्यता विवाद: जनसंघ सदस्यों की RSS के प्रति निष्ठा को ‘दोहरी सदस्यता’ बताकर विरोध किया गया, जो अंततः पार्टी के टूटने का मुख्य कारण बना।
केंद्र में राजनीतिक अस्थिरता (1979-80)
- सरकार का पतन: मोरारजी देसाई सरकार के पतन के बाद चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई।
- समर्थन वापसी: कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने पर चरण सिंह सरकार गिर गई और 1980 में 7वीं लोकसभा के मध्यावधि चुनाव घोषित हुए।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) का उद्भव (1980)
- पुनर्गठन: जनता पार्टी से अलग होकर पूर्ववर्ती जनसंघ घटक ने 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठन किया।
- नया स्वरूप: अटल बिहारी वाजपेयी प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और ‘कमल’ को पार्टी का चुनाव चिन्ह बनाया गया।
1980 के मध्यावधि चुनाव और राजस्थान की स्थिति
- बर्खास्तगी: केंद्र में इंदिरा गांधी के सत्ता में लौटते ही राजस्थान की शेखावत सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।
- चुनावी परिणाम: मई 1980 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 133 सीटें मिलीं और वह पुनः सत्ता में आई।
- भाजपा का प्रदर्शन: भाजपा ने पहली बार अपने नाम और ‘कमल’ निशान पर चुनाव लड़कर 32 सीटें प्राप्त कीं।
- ऐतिहासिक उपलब्धि: भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान विधानसभा के प्रथम आधिकारिक मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष बने।
भारतीय जनता पार्टी (BJP)
भारतीय जनता पार्टी (BJP) का उद्भव एवं विचारधारा (1980)
- स्थापना: 6 अप्रैल 1980 को पूर्ववर्ती जनसंघ के सदस्यों द्वारा।
- नया दृष्टिकोण: इसे केवल जनसंघ का पुनर्जन्म नहीं, बल्कि जयप्रकाश नारायण की आकांक्षाओं का प्रतिनिधि एक ‘मध्यम मार्गी’ दल माना गया।
- वैचारिक स्तंभ: ‘गांधीवादी समाजवाद’ और ‘पंथनिरपेक्षता’ के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।
- नारा: अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘मूल्य आधारित राजनीति’ को पार्टी की प्राथमिकता घोषित किया।
- प्रभाव: जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई के संपर्क से हिंदू राष्ट्रवाद की अवधारणा को अधिक व्यापक और समावेशी बनाया गया।
राजस्थान में संघर्ष का दशक (1980-1990)
- विपक्ष की भूमिका: भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में भाजपा ने बिजली, पानी, सड़क, अकाल और शिक्षा जैसे जनसामान्य के मुद्दों पर आंदोलन किए।
- 1984-85 का दौर: * 1984 लोकसभा में सहानुभूति लहर के कारण राजस्थान की सभी 25 सीटें कांग्रेस को मिलीं।
- 1985 विधानसभा में भाजपा ने अपनी स्थिति सुधारी और 38 सीटें जीतीं।
- राष्ट्रीय ध्रुवीकरण: 1980 के दशक के अंत में भाजपा ने ‘भ्रष्टाचार’ (बोफोर्स कांड) और ‘राम जन्मभूमि’ को प्रमुख चुनावी एजेंडा बनाया।
भाजपा-जनता दल गठबंधन (1990-1992)
- 1990 विधानसभा चुनाव: भाजपा ने 85 सीटें जीतीं।
- सरकार का गठन: जनता दल (55 सीटें) के समर्थन से 4 मार्च 1990 को भैरोंसिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने।
- केन्द्र का प्रभाव: अयोध्या में आडवाणी की ‘रथ यात्रा’ और उनकी गिरफ्तारी के विरोध में भाजपा ने केन्द्र की वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
- सरकार का पतन: 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद, केन्द्र सरकार ने 15 दिसंबर 1992 को राजस्थान की भाजपा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया।
शेखावत की वापसी एवं गठबंधन राजनीति (1993-1998)
- 1993 विधानसभा चुनाव: भाजपा 96 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
- सरकार का गठन: निर्दलीयों और जनता दल के विभाजित गुट के समर्थन से 4 दिसंबर 1993 को शेखावत पुनः मुख्यमंत्री बने।
- राज्यपाल का विवाद: तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत द्वारा सरकार बनाने के निमंत्रण में देरी के कारण राजनीतिक अनिश्चितता रही थी।
- उपलब्धि: यह सरकार राजस्थान में भाजपा की पहली ऐसी सरकार थी जिसने अपना कार्यकाल लगभग पूरा किया।
1998 का चुनाव: सत्ता का हस्तांतरण
- हार के कारण: * महंगाई (विशेषकर प्याज के दामों में अत्यधिक वृद्धि) के कारण जन-असंतोष।
- पार्टी के भीतर आंतरिक गुटबाजी और वैचारिक मतभेद।
- चुनावी परिणाम: भाजपा मात्र 33 सीटों पर सिमट गई और कांग्रेस ने भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई।
2023: भाजपा की सत्ता में वापसी और भजनलाल शर्मा का मुख्यमंत्री बनना
2023 के विधानसभा चुनाव (पुनः सत्ता वापसी)
- भाजपा ने 200 में से 115 सीटें जीतीं।
- कांग्रेस 69 सीटों पर सिमट गई।
- भाजपा ने निर्दलीयों और अन्य दलों के समर्थन से सरकार बनाई।
- भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया (2023)
- संघ पृष्ठभूमि के नेता भजनलाल शर्मा को भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया।
- दीया कुमारी और प्रेमचंद बैरवा को उपमुख्यमंत्री बनाया गया।
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP)
- स्थापना (29 अक्टूबर 2018): नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल द्वारा।
- पहली बार राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दल (2019)।
- चुनाव चिह्न: पानी की बोतल।
- प्रमुख नेता:
- अध्यक्ष: पुखराज गर्ग।
- लोकसभा सदस्य: हनुमान बेनीवाल (नागौर)।
- 2018 विधानसभा चुनाव:
- 57 सीटों पर चुनाव लड़ा, 3 सीटों पर विजय।
- विधानसभा सदस्य:
- नारायण बेनीवाल (खींवसर)।
- इंदिरा बावरी (मेड़ता)।
- पुखराज गर्ग (भोपालगढ़)।
- 2023 विधानसभा चुनाव:
- 01 सीट जीती थी, लेकिन उपचुनाव में हार गई । वर्तमान में शून्य सीट है।
भारतीय लोकदल
- स्थापना: 1974 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह द्वारा।
- पुनः स्थापना: 1984 में लोकदल को पुनः स्थापित किया गया।
- समर्थन: यह दल किसानों का प्रमुख समर्थन प्राप्त करता है।
- क्षेत्रीय समर्थन: उत्तर प्रदेश और हरियाणा में इसे विशेष समर्थन प्राप्त है।
कृषक मजदूर प्रजा पार्टी
- स्थापना: 1951 में जीवतराम कृपलानी ने कांग्रेस से अलग होकर इस पार्टी की स्थापना की।
- विलय: 1952 में इसका विलय सोशलिस्ट पार्टी में हुआ, जिसके बाद पार्टी का नाम सोशलिस्ट प्रजा पार्टी हो गया।
नेशनल यूनियनिस्ट जमीन्दार पार्टी
- स्थापना: 2013 में स्थापित हुई, जो गैर कृषकों द्वारा अपने हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए बनी।
- विरासत: यह पार्टी सर छोटूराम को अपनी विरासत मानती है।
- चुनावी प्रदर्शन: 2013 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने 2 सीटें जीती।
भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP)
- स्थापना – वर्ष 2017 में छोटूभाई वसावा और महेशभाई वसावा द्वारा गुजरात में गठित।
- चुनाव चिन्ह – भारत के चुनाव आयोग द्वारा ऑटो रिक्शा चुनाव चिन्ह आवंटित।
- विचारधारा: जनजाति कल्याण और भीलीस्तान (भीलों का राज्य) की परिकल्पना।
- प्रभाव: गुजरात और राजस्थान में विशेष प्रभाव।
- राजस्थान में प्रवेश (2018 विधानसभा चुनाव) –
- 11 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा।
- चोरासी (राजकुमार रोत) और सागवाड़ा (रामप्रसाद) सीटों पर जीत हासिल की।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सरकार में शामिल हुई।
- कांग्रेस सरकार से 2020 में समर्थन वापस ले लिया।
- सितंबर 2023 में पार्टी में विभाजन हुआ।
- राजकुमार रोत और रामप्रसाद ने भारत आदिवासी पार्टी (BAP) नामक एक नई पार्टी का गठन किया।
भारत आदिवासी पार्टी (BAP)
- गठन: 10 सितंबर 2023
- भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) में सितंबर 2023 में पार्टी में विभाजन हुआ। राजकुमार रोत और रामप्रसाद ने अलग होकर पार्टी का गठन किया।
- मुख्यालय: डूंगरपुर, राजस्थान
- चुनाव चिन्ह- हॉकी- बॉल

- वर्तमान स्थिति:
- राजस्थान में एक सांसद और 3 विधायक।
- भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी।
- सांसद:
- सांसद: राजकुमार रोत (बांसवाड़ा-डूंगरपुर)।
- विधायक:
- चौरासी – अनिल कटारा
- आसपुर – उमेश डामोर
- धरियावद – थावरचंद डामोर
- बागीदौरा – जयकृष्ण पटेल
- चुनावी प्रदर्शन:
- 2023 विधानसभा चुनाव: पहली बार लड़ा, 3 सीटों पर जीत।
- उपचुनाव: बागीदौरा और चौरासी सीट पर जीत।
- लोकसभा चुनाव में राजकुमार रोत सांसद (पहले चौरासी सीट से विधायक थे) बने।
भारत वाहिनी पार्टी
- गठनकर्ता: घनश्याम तिवाड़ी।
- चुनावी प्रदर्शन: नगण्य रहा।
