परमार वंश

परमार एक प्रमुख राजपूत वंश था, जिसकी विभिन्न शाखाएँ राजस्थान का इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, जैसे आबू के परमार, जालौर के परमार, किराडू के परमार और वागड़ के परमार। इसके साथ ही मालवा के परमारों ने भी राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।

  • शाब्दिक अर्थ – 
    • परमार शब्द का शाब्दिक अर्थ “शत्रुओं को मारने वाला” माना जाता है।
  • उत्पत्ति
    • चंदरवरदाई  द्वारा रचित ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार परमारों की उत्पत्ति अग्निकुंड से हुई थी।
    • ऋषि वशिष्ठ से संबंधित परंपरा में भी परमारों की उत्पत्ति अग्निकुंड से मानी गई है।
    • परमारों की उत्पत्ति की जानकारी पद्मगुप्त (परिमल) कृत  “नवसाहसांकचरित” से प्राप्त होती है।
    • उदयपुर प्रशस्ति, पिंगल सूत्रवृत्ति तथा तेजपाल अभिलेख  में परमारों को ब्रह्म क्षत्रकुलीन बताया गया है।
    • अन्य अभिलेखीय एवं साहित्यिक प्रमाणों से भी परमारों की उत्पत्ति की पुष्टि होती है।

परमारों की शाखाएँ  

  1. आबू
  2. जालौर
  3. मालवा
  4. वागड़
  5. मारवाड़
  6. गुजरात
  7. (सिंध)
  8. किराडू

आबू के परमार

  • आबू परमारों के आदिपुरुष धूमराज माने जाते हैं।
  • आबू परमारों की वंशावली का वास्तविक प्रारंभ उत्पलराज से माना जाता है।
  • आबू परमारों की राजधानी चंद्रावती थी।
  • सिंधराज परमार को मरूमंडल का महाराज कहा गया है।

धरणीवराह – 

  • चालुक्य / सोलंकी राजा मूलराज प्रथम के आक्रमण के समय धरणीवराह ने राष्ट्रकूट राजा धवल राठौड़ की शरण ली।
  • इस घटना की जानकारी हस्तिकुण्डी अभिलेख (977 ई.) से प्राप्त होती है।
  • बाद में धरणीवराह ने पुनः आबू (1002 ई. के अभिलेख से ज्ञात) पर अधिकार कर लिया।
  • इस समय तक परमारों ने सोलंकियों की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

धंधुक परमार – 

  • धंधुक, महिपाल का पुत्र था।
  • उसने सोलंकियों की अधीनता से मुक्त होने का प्रयास किया।
  • भीमदेव सोलंकी और धंधुक परमार के बीच युद्ध हुआ।
  • विमलशाह ने दोनों पक्षों के बीच समझौता करवाया।
  • भीमदेव सोलंकी ने विमलशाह को आबू का दण्डपति प्रशासन नियुक्त किया।
  • विमलशाह ने 1031 ई. में देलवाड़ा, आबू में आदिनाथ जैन विमलशाही मंदिर का निर्माण करवाया।
  • धंधुक की विधवा पुत्री लाहिणी ने बसंतगढ़ में सूर्यमंदिर का निर्माण करवाया।
  • लाहिणी ने सरस्वती बावड़ी का जीर्णोद्धार भी करवाया।
  • इसी कारण उसे “लाहिणी बावड़ी” के नाम से भी जाना जाता है।

कृष्णदेव – 

  • 1060 ई. में परमारों और सोलंकियों के संबंध पुनः बिगड़ने पर नाडोल के चौहान शासक बालाप्रसाद ने उनके बीच मित्रता करवाई।

विक्रमदेव –

  • विक्रमदेव ने महामण्डलेश्वर की उपाधि धारण की।
  • उसने कुमारपाल चालुक्य तथा अर्णोराज चौहान के आपसी संघर्ष में भाग लिया।
  • विक्रमदेव से संबंधित जानकारी हेमचंद्र के “दयाश्रय महाकाव्य” से प्राप्त होती है।
  • जिनमण्डनोपाध्याय कृत “कुमार प्रबंध” में भी इसका  उल्लेख मिलता है।

धारावर्ष (1163–1219 ई.) – 

  • धारावर्ष आबू परमारों का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक माना जाता है।
  • 1178 ई. में मुहम्मद गोरी ने गुजरात के चालुक्य राजा मूलराज द्वितीय पर आक्रमण किया।
  • मूलराज द्वितीय की संरक्षिका नायिका देवी ने कायन्द्रा के युद्ध में मुहम्मद गोरी को पराजित किया।
  • इस युद्ध में गुजरात की सेना का सेनापतित्व धारावर्ष परमार ने किया।
  • गुजरात की ओर से धारावर्ष परमार (आबू), केल्हण (नागौर) तथा कीर्तिपाल सौनगरा सहयोगी थे।
  • उस समय गुजरात के समकालीन शासक कुमारपाल, अजयपाल, मूलराज और भीमदेव द्वितीय थे।
  • धारावर्ष ने सोलंकियों की अधीनता से स्वयं को पूर्णतः मुक्त कर लिया।
  • उसके नाडोल के चौहानों से अच्छे संबंध थे।
  • कहा जाता है कि वह एक ही बाण से तीन-तीन भैंसों को भेद देता था।
  • धारावर्ष से संबंधित जानकारी 1178 ई. के पाटनारायण मंदिर अभिलेख से प्राप्त होती है।
  • अचलेश्वर मंदिर के पास मन्दाकिनी कुण्ड के तट पर धनुर्धारी धारावर्ष की मूर्ति स्थित है, जिसके सामने तीन भैंसे खड़े दर्शाए गए हैं।
  • धारावर्ष की रानियाँ शृंगार देवी तथा गीगादेवी (पटराणी) थीं।
  • धारावर्ष की दोनों रानियाँ केल्हण (नाडोल के चौहान शासक) की पुत्रियाँ थीं।
  • धारावर्ष का दरबारी कवि सोमेश्वर था।
  • सोमेश्वर ने “कीर्ति कौमुदी” नामक ग्रंथ की रचना की।
  • धारावर्ष के छोटे भाई प्रहलादन ने “पालनपुर” नाम का नगर बसाया।
  • प्रहलादन ने “पार्थ पराक्रम व्यायोग” नामक नाटक की रचना की।
  • धारावर्ष ने पृथ्वीराज चौहान के आबू आक्रमण को विफल कर दिया।

सोमसिंह – 

  • सोमसिंह के मंत्री तेजपाल ने दिलवाड़ा (आबू) में भगवान नेमीनाथ जैन मंदिर का निर्माण करवाया।
  • इस मंदिर को लूणवशाही / वास्तुपाल–तेजपाल मंदिर भी कहा जाता है।
  • तेजपाल ने यह मंदिर अपने पुत्र लूणवसिंह तथा पत्नी अनुपमा देवी के श्रेयार्थ बनवाया।

प्रतापसिंह – 

  • प्रतापसिंह ने मेवाड़ के जेत्रसिंह को पराजित कर चंद्रावती पर अधिकार कर लिया।
  • इसके बाद ब्राह्मण गंगी देल्हण ने पाटनारायण मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

विक्रमसिंह – 

  • विक्रमसिंह ने रावल / महारावल की उपाधि धारण की।
  • लगभग 1311 ई. में नाडोल के चौहान शासक राव लूम्बा ने परमारों की राजधानी चंद्रावती पर अधिकार कर वहाँ  चौहान प्रभुत्व स्थापित कर दिया।

जालौर के परमार

  • जालौर के परमारों से संबंधित जानकारी जालौर से प्राप्त 1087 ई. के शिलालेख से मिलती है।
  • जालौर के परमार वंश में कुल 7 शासक हुए –
    • वाक्पतिराज
    • चंदन
    • देवराज
    • अपराजित
    • विज्जल
    • धारावर्ष
    • वीसल

वाक्पतिराज (960–985 ई.) – 

  • वाक्पतिराज जालौर का प्रथम शासक था।
  • उसके शासनकाल में जालौर पर परमारों का शासन स्थापित हुआ।
  • जालौर के परमारों को आबू के परमारों की एक छोटी शाखा माना जाता है।

वीसल (7वां शासक) – 

  • वीसल की रानी मेलर देवी ने 1087 ई. में सिंधुराजेश्वर मंदिर पर स्वर्ण कलश चढ़वाया।

किराडू के परमार

  • किराडू के परमारों से संबंधित जानकारी किराडू शिवालय लेख (1661 ई.) से प्राप्त होती है।
  • किराडू परमार वंश के प्रमुख शासक कृष्णराज, सोच्छराज, उदयराज तथा सोमेश्वर थे।
  • ये शासक गुजरात के सोलंकी (चालुक्य) शासकों के सामंत  के रूप में शासन करते थे।
  • सोमेश्वर परमार ने सोलंकी शासक सिद्धराज के सहयोग से सिंधु राज्य पर पुनः अधिकार कर लिया।
  • किराडू परमारों की राजधानी किराडू थी।
  • 1661 ई. में सोमेश्वर परमार ने तनोट (जैसलमेर) तथा नौसर (जोधपुर) के किलों पर अधिकार कर लिया।

वागड़ के परमार

  • वागड़ के परमार, मालवा के परमार शासक कृष्णराज के दूसरे पुत्र डंबर सिंह के वंशज माने जाते हैं।
  • इनका अधिकार क्षेत्र डूंगरपुर और बाँसवाड़ा (वागड़ क्षेत्र) में फैला हुआ था।
  • वागड़ के परमारों की राजधानी अर्थूणा (उत्थुनक) थी, जो वर्तमान में खंडहर के रूप में स्थित है।
  • वागड़ के परमारों के प्रमुख शासक इस प्रकार थे –
    • धनिक कंकदेव 
    • सत्यराज
    • मण्डलिक
    • चामुण्डराज
  • चामुण्डराज ने 1079 ई. में अर्थूणा में मण्डलेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
  • विजयराज वागड़ के परमारों का अंतिम शासक था।
  • 1119 ई. में गुहिल शासक सामन्तसिंह ने वागड़ पर अधिकार कर लिया, जिससे परमारों का शासन समाप्त हो गया।

 मालवा के परमार

  • मालवा के परमारों की मूल उत्पत्ति का क्षेत्र मालवा तथा आबू माना जाता है।
  • मालवा के परमारों की राजधानी धारानगरी अथवा उज्जैन थी।
  • राजस्थान में इनके अधिकार क्षेत्र में निम्न क्षेत्र सम्मिलित थे –
    • कोटा का दक्षिणी भाग
    • झालावाड़
    • वागड़
    • प्रतापगढ़ का पूर्वी भाग
  • प्रारंभिक काल में मालवा के परमार राष्ट्रकूटों के सामंत थे।
  • मालवा के परमारों के प्रारंभिक शासक इस प्रकार थे –
    • उपेंद्र (कृष्णराज) – वंश का संस्थापक
    • वेरीसिंह प्रथम
    • सियक प्रथम
    • सियक द्वितीय – दत्तक पुत्र मुंज परमार
  • मालवा के परमारों से संबंधित प्रमुख जानकारी के स्रोत –
    • प्रबंध चिंतामणि
    • पद्मगुप्त कृत “नवसाहसांकचरित”

मुंज परमार – 

  • मुंज  परमार को परमार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक माना जाता है।
  • उसकी प्रमुख उपाधियाँ एवं उपनाम इस प्रकार थे –
    • वाक्पतिराज
    • उल्पलराज
    • अमोघवर्ष
    • पृथ्वीवल्लभ
    • श्रीवल्लभ
    • कवि वृष
  • मेवाड़ के शासक शक्तिसिंह के समय मुंज ने आहड़ को नष्ट किया।
  • उसी समय मुंज ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।
  • मुंज परमार ने चालुक्य शासक तैलप द्वितीय को छः बार पराजित किया।
  • सातवीं बार तैलप द्वितीय से पराजित होकर मुंज परमार युद्ध में मारा गया।
  • मुंज परमार कवियों और विद्वानों का महान आश्रयदाता था।
    • इसके प्रमुख दरबारी विद्वान इस प्रकार थे –
      • हलायुध – “अभिदान माला”
      • पद्मगुप्त – “नवसाहसांकचरित”
      • धनंजय – “दशरूपक”
      • धनिक – “यशोरूपावलोक”

सिंधुराज – 

  • सिंधुराज मुंज परमार का भाई तथा भोज परमार का पिता था।

भोज परमार (1010–1055 ई.) – 

  • भोज परमार मालवा के सबसे प्रसिद्ध तथा प्रतापी शासक माने जाते हैं।
  • वह विद्या और कला का महान प्रेमी शासक था।
  • भोज द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ इस प्रकार हैं –
    • सरस्वती कण्ठाभरण
    • राजमृगांक 
    • राजमार्तण्ड
    • विद्वज्जनमण्डल
    • चंपूरायण
    • समरांगण सूत्रधार
    • शृंगारमंजरी कथा
    • कूर्मशतक
    • तत्वप्रकाश
  • भोज ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण करवाया।
  • इस मंदिर को मोकल मंदिर अथवा शिव मंदिर भी कहा जाता है।
  • भोज ने नागदा में भोजसर का निर्माण करवाया, जिसका उल्लेख कुंभलगढ़ प्रशस्ति में मिलता है।
  • भोज ने “सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला” की स्थापना करवाई।
  • भोज ने मध्यप्रदेश में भोजनगर अथवा भोजपाल (भोपाल) नगर बसाया।
  • भोज चंदेल सम्राट विद्याधरवर्मन से पराजित होकर उसके अधीन राजा रहा।
  • भोज ने जालौर में संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया।
  • सरस्वती कण्ठाभरण पाठशाला में वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित करवाई।
  • यही प्रतिमा आगे चलकर “भारतीय सरस्वती देवी” के रूप में ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक बनी।
  • ज्ञानपीठ पुरस्कार के संबंध में तथ्य –
    • वर्तमान पुरस्कार राशि 11 लाख रुपये है।
    • इसमें प्रशस्ति पत्र तथा वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा प्रदान की जाती है।
    • इस पुरस्कार की शुरुआत 1961 ई. में हुई।
    • प्रथम पुरस्कार 1965 ई. में मलयालम लेखक जी. शंकर कुरूप को मिला।
    • 58वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार 2025 में संस्कृत के  जगदगुरु रामभद्राचार्य को प्रदान किया गया।
  • भोज के प्रमुख दरबारी विद्वान इस प्रकार थे –
    • वल्लभ
    • मेरुतुंग – “प्रबंध चिंतामणि”
    • वररुचि
    • सुबंधु
    • अमर
    • माघ
    • धनपाल
    • राजशेखर
    • मानतुंग
  • अबुल फ़ज़ल ने “आइन-ए-अकबरी” में भोज के दरबार में 500 विद्वानों के आने का उल्लेख किया है।

जयसिंह – 

  • जयसिंह भोज परमार का पुत्र तथा एक योग्य शासक था।
  • इसके अधीन सामंत के रूप में मण्डलीक (वागड़ का राजा)कार्य करता था।
  • 1135 ई. में चालुक्य शासक सिद्धराज ने मालवा पर अधिकार कर लिया।
  • इसके बाद परमारों की शक्ति का ह्रास प्रारंभ हो गया।
  • बाद में अर्जुन वर्मा के समय परमारों का अल्पकालिक पुनरुत्थान अवश्य हुआ।
  • किंतु खिलजियों के आक्रमण से मालवा का वैभव नष्ट हो गया और परमार अजमेर की ओर पलायन कर गए।
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