राजस्थान की प्रदर्शन कला विषय राजस्थानी कला व संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो राज्य की समृद्ध परंपराओं, लोकजीवन और सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त करती है। इसमें संगीत, नृत्य और नाट्य के विभिन्न रूप शामिल हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक परंपरा के माध्यम से संरक्षित रहे हैं। इस अध्याय में हम निम्नलिखित विषयों का अध्ययन करेंगे:
प्रमुख भवाई कलाकार – स्वरूप पंवार – तारा शर्मा (बाड़मेर), रूप सिंह शेखावत (जयपुर), कृष्णा व्यास छंगानी, दयाराम, श्रेष्ठा सोनी, जोशिता शर्मा (118 मटके), कजली, कुसुम, द्रोपदी, लाच्छी प्रजापति (125 मटकें, मोदी जी के सामने नृत्य किया)
अन्य प्रमुख कलाकार –
अश्मिता काला (जयपुर) 111 घड़े सिर पर रखकर नृत्य की प्रस्तुती जो की लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल
वीणा (भीलवाड़ा) – निहाल अजमेरा की पौत्री ने 63 मंगल कलश सिर पर रखकर नृत्य, ‘ज्ञानदीप’ नाम दिया गया
पुष्पा व्यास (जोधपुर) प्रथम महिला भवाई नृत्यांगना
प्रवीण प्रजापत (अलवर) – अमेरिका में प्रस्तुति
दयाराम भील व भारतीय लोक-कला मण्डल (उदयपुर) के संस्थापक देवीलाल सामर के अथक प्रयासों से इस नृत्य को विशिष्ट पहचान मिली है
चरकुला नृत्य
मूलत: उत्तर प्रदेश में प्रचलित है।
राजस्थान में सर्वाधिक भरतपुर में प्रचलित है।
राधा की स्मृति में, बैलगाड़ी के पहिए पर 108 दीपक प्रज्वलित करके उसे सिर पर रखकर या चारों बगल फिराकर नृत्य किया जाता है।
प्रसिद्ध कलाकार – मानसी सिंह
झांझी नृत्य
क्षेत्र: मारवाड़
नृतक: केवल महिलाएँ
अवसर: मांगलिक कार्य
छोटे मटके में छिद्र करके महिलाओं द्वारा सामूहिक नृत्य
बिंदोरी नृत्य
क्षेत्र: झालावाड़
नृतक: केवल पुरुष
अवसर: होली
गैर नृत्य के समान
झूमर नृत्य
क्षेत्र: हाड़ौती
नृतक: केवल महिलाएं
अवसर: मांगलिक कार्य
डांग नृत्य
क्षेत्र: नाथद्वारा, राजसमंद
नृतक: पुरुष एवं महिलाएँ दोनों
अवसर: होली
धार्मिक सम्बन्ध वल्लभ सम्प्रदाय
आराध्य: श्रीनाथजी / श्रीकृष्ण की स्तुति
सुगनी नृत्य
क्षेत्र: आदिवासी अंचल
नृतक: पुरुष एवं महिलाएँ दोनों
विषय: स्त्री–पुरुष के बीच प्रेम-भाव की अभिव्यक्ति
नृत्य के अंत में दोनों का विवाह दर्शाया जाता है
अन्य महत्वपूर्ण नृत्य
पेजण नृत्य – बांगड़ में दीपावली के अवसर पर
मछली नृत्य – क्षेत्र – बाड़मेर, बंजारों का नृत्य
मयूर नृत्य – ब्यावर, अजमेर
पांचपदा नृत्य – वागड़ क्षेत्र के जोगियों द्वारा
कबूतरी नृत्य – चूरू क्षेत्र की महिलाओं द्वारा
जिन्दाद नृत्य – शेखावाटी क्षेत्र
सेंघड़ा नृत्य – शेखावाटी क्षेत्र
ढप नृत्य – शेखावाटी क्षेत्र
लहूर-लहूर नृत्य – शेखावाटी क्षेत्र
जनजातीय नृत्य
भील जाति के नृत्य
नृत्य
विशेषता
गवरी / राई / मेरु
राजस्थान का सबसे प्राचीन नृत्य
क्षेत्र: मेवाड़ अंचल
केवल पुरुषों द्वारा प्रस्तुति
शिव–भस्मासुर की कथा पर आधारित
प्रारम्भ: खेड़ा देवी अथवा 52 भैरुजी की स्तुति से
पात्र
राई बुढ़िया
सम्माननीय, अन्य सभी पात्रों को साथ रखने वाला
राई: शिव–पार्वती का प्रतीक
बुढ़िया: भस्मासुर की भक्ति का प्रतीक
झामट्या: लोक भाषा में कथा कहने वाला
खटकुड़िया: हास्य पात्र
कट्कुड़िया: नाटक का संचालक
मोहिनी: नकली पार्वती; जो वास्तव में विष्णु है
भोपा: पूजा करने वाला
गवरी की घई
नाटक के विभिन्न भागों को जोड़ने के लिए किया जाने वाला नृत्य
आयोजन – भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा – अश्विन शुक्ला एकादशी (रक्षाबंधन के अगले दिन से 40 दिन तक)
लघु नाटक
गोमा मीणा
कालू कीर
कान गुर्जरी
भियावड़
खेजड़लियो भूत
कालियो चोर
समापन
समाप्ति से 2 दिन पूर्व: ज्वार बोया जाता है
समाप्ति से 1 दिन पूर्व: कुम्हार के घर से मिट्टी का हाथी लाया जाता है, इसके बाद भोपा का भाव आना बंद हो जाता है
अंतिम दिन: गलावण–बलावण, गवरी का विसर्जन
गवरी: पार्वती
पुरिया: शिव
गैर नृत्य
क्षेत्र : मेवाड़ अंचल (निंबाड़ी, ओंकारेश्वर महादेव मंदिर का चौक – उदयपुर), बाड़मेर (कानाणा व सनावड़ा गाँव), जोधपुर (रावजी की गैर)
केवल पुरुषों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक लोकनृत्य, महिलाएँ नृत्य में भाग नहीं लेतीं, लेकिन फाग गीत गाती हैं
गोल घेरे में नृत्य होने के कारण पहले इसे ‘घेर’, बाद में ‘गैर’ कहा गया
गैरिया – नृत्य करने वाले कलाकार
अवसर : होली के दूसरे दिन से लगभग 15 दिनों तक
प्रस्तुति शैली:
वृत्ताकार नृत्य, वादक बीच में रहते हैं
भक्ति एवं श्रृंगार रस के गीतों के साथ नृत्य
कई जगह तलवारों के साथ ‘तलवारों की गैर’ का प्रदर्शन
वाद्य यंत्र: ढोल, थाली, बाँकिया / घुमावदार खंजर
वेशभूषा:
मेवाड़: सफेद अंगरखी, सफेद धोती, लाल या केसरिया पगड़ी
बाड़मेर: सफेद आँगी (लंबा चोगा), कमर पर वस्त्र: ओंगी
खांडा – नृत्य में प्रयुक्त लकड़ी की छड़ियाँ
गैर नृत्य के चार प्रकार हैं-
डांड़िया
आंगिया/आंगी-बांगी (लाखेटा गाँव)
चंग
तलवार
लाल- आंगी बांगी गैर – लाखेटा गाँव बालोतरा
भाटा गैर – आहोर, साचौर
तलवारों की गैर – मेनार, उदयपुर
घूमर गैर नृत्य – भीलवाड़ा (निहाल अजमेरा)
लाठी नृत्य – पुरुषों द्वारा
रमणी नृत्य – विवाह मंडप में स्त्रियों के द्वारा
बेरीहाल नृत्य – खैरवाड़ा क्षेत्र में रंगपंचमी के दिन
समुदाय:
मिनारिया ब्राह्मण, मेनार (उदयपुर) सहित विभिन्न समुदाय
अन्य :
1951 एशियाई खेल (दिल्ली) में सनावड़ा (बाड़मेर) के कलाकारों द्वारा प्रस्तुति
पद्मश्री भूरचंद जैन (बाड़मेर) का गैर नृत्य के संरक्षण व प्रचार में योगदान
भाले, बरछी, तलवार व तीर-कमान के साथ पहाड़ी क्षेत्र में
केवल पुरुषों द्वारा
वाद्य यंत्र – मादल
2003 में प्रतिबंधित
नेजा नृत्य
भील व मीणा दोनों जनजातियों से संबंधित
महिला – पुरुष दोनों द्वारा किया जाता है
लकड़ी के एक डण्डे पर नारियल बाँध दिया जाता है। महिलाएँ इसकी रक्षा करती है व पुरुषों द्वारा इसे उतारने का प्रयास किया जाता है। (खेल नृत्य)
राड़ नृत्य
क्षेत्र: वागड़ अंचल
पुरुष व महिलाएँ दोनों भाग लेते हैं
अवसर: होली
गरासिया जनजाति के नृत्य
नृत्य
विशेषता
वालर नृत्य
क्षेत्र : जालौर, आबू, पाली, सिरोही (पिंडवाड़ा, आबू रोड)
सामान्यत: यह नृत्य बिना वाद्य का नृत्य है
दो प्रकार
पुरुषों का वालर नृत्य – ढोल वाद्य का प्रयोग
महिलाओं का वालर नृत्य – वाद्य विहीन होता है
विशेषता –
अर्द्धवृत्त में होता है, बाहरी अर्द्धवृत्त में पुरुष तथा आंतरिक में महिलाएँ रहती है
पुरुषों द्वारा हाथ में छाता व तलवार लेकर यह नृत्य प्रारंभ किया जाता है
गरासियों के इतिहास, स्वाभिमानी, शूरमाओं द्वारा राजाओं व अंग्रेजों से संघर्ष का विवरण वालर के गीतों में मिलता है
प्रसिद्ध कलाकार – जवाहरमल गरासिया
30 अप्रैल, 1991 के दिन 2.50 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया
मोरिया नृत्य
गरासिया पुरुषों द्वारा
विवाह के अवसर पर रात्रि में
गणेश स्थापना पश्चात
कूद नृत्य
गरासिया स्त्री-पुरुषों द्वारा तालियों से
बिना वाद्ययंत्र के किया जाता है
जवारा नृत्य
अवसर – होलिका दहन के पूर्व ढोल वाद्य के साथ
स्त्री-पुरुषों दोनों द्वारा किया जाता है
ज्वारों की बालियाँ हाथ में लेकर महिलाएँ यह नृत्य करती है
लूर नृत्य
लूर गोत्र की गरासिया महिलाओं द्वारा
अवसर – मेले व विवाह पर
इस नृत्य में महिलाएं आपस समूह बनाकर एकत्र होती हैं फिर वर/वधू पक्ष के रूप में विभाजित होकर यह नृत्य करती हैं
मांदल नृत्य
मुख्य वाद्य यंत्र – मांदल, थाली व बाँसुरी
गरासिया महिलाओं द्वारा वृत्ताकार मुद्रा में
गर्वा नृत्य
सबसे मोहक नृत्य, स्त्रियों द्वारा किया जाता है
गौर नृत्य
गणगौर के अवसर पर
स्त्री व पुरुषों द्वारा किया जाता है
रायण नृत्य
इस नृत्य में पुरुष महिला का वेश धारण करके यह नृत्य करता है।
सहरिया जनजाति के प्रमुख नृत्य
नृत्य
विशेषता
झेला नृत्य
स्त्री-पुरुषों द्वारा सामूहिक गायन के साथ शाहबाद (बारां) में सहरिया जनजाति द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
यह आषाढ़ माह में फसल के पकने पर पुरुषों द्वारा किया जाने वाला फसली नृत्य है। इसमें गाया जाने वाला गीत ‘झेला’ कहलाता है।
स्वांग नृत्य
अवसर – होली पर
सहरिया पुरुषों द्वारा
विशेषता –
अर्धनग्न अवस्था में, शरीर पर बहुरंगी आकृतियाँ, सिर पर मुकुट, मोरपंख
वाद्य – ढोलक, मंजीरा, ढपली, झांझर
बेडिनी नृत्य
फाग के अवसर पर
4-5 पुरुष बेडिनी का स्वांग रचकर नृत्य करते हैं
शिकारी नृत्य
पुरुषों द्वारा शिकार अभिनय
लहंगी नृत्य
सहरिया जनजाति की युवतियों द्वारा किया जाने वाला नृत्य
इंद्रपरी नृत्य
विवाह के अवसर पर किया जाने वाला नृत्य
पुरुषों द्वारा
बिछवा नृत्य
केवल महिलाओं द्वारा समूह में किया जाने वाला नृत्य
सांग नृत्य
स्त्री-पुरुषों द्वारा किया जाने वाला युगल नृत्य
कंजर जनजाति के नृत्य
नृत्य
विशेषता
धाकड़ नृत्य
झालापाव व बीरा के मध्य हुए युद्ध में हुई झालापाव की विजय के उपलक्ष्य में यह नृत्य किया जाता है
कंजर जनजाति के पुरुषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है
चकरी नृत्य
कंजर जनजाति की अविवाहित महिलाओं द्वारा किशनगंज (बारां), छबड़ा क्षेत्र में किया जाने वाला नृत्य है। अविवाहित बालिकाओं द्वारा तेज गति से चक्राकार घूमते हुए यह नृत्य किया जाता है
अन्य नाम – फंदी
मुख्य वाद्य यंत्र – ढोल, चंग आदि
बूँदी के ‘कजली तीज’ मेले में सर्वाधिक किया जाता है।
वर्ष 1974 में रशीद अहमद पहाड़ी (चांचोड़ा) द्वारा इसे प्रसिद्ध किया गया।
नृत्यांगना – शांति, फिलामां, फुलवां
मछली नृत्य
बणजारा जाति स्त्रियों द्वारा चाँदनी रात में
क्षेत्र – बाड़मेर
यह नृत्य एक तरुणी, जलदेवता और मछली की कहानी पर आधारित है जो की हर्षोउल्लास से शुरू होकर करुणा पूर्ण वातावरण में समाप्त होता है
मीणा जनजाति के नृत्य
नृत्य
विशेषता
लांगुरिया नृत्य
युगल नृत्य, नृत्य गुर्जर व मीणा जाति के लोग
क्षेत्र – पूर्वी राजस्थान, मुख्य रूप से अलवर, भरतपुर एवं करौली
वाद्य यंत्र – नफीरी, नौबत
कैला माँ – हनुमान जी की माता अंजना देवी का अवतार, लांगुरिया को हनुमान जी का लोक स्वरूप
कथौड़ी जनजाति के नृत्य
नृत्य
विशेषता
मावलिया नृत्य
यह पुरुषों द्वारा नवरात्रों में नौ दिनों तक किया जाने वाला नृत्य है
वाद्य यंत्र – ढोलक व बांसूरी
होली नृत्य
होली के अवसर पर 5 दिन तक
यह महिलाओं द्वारा गोल घेरे में
इसमें महिलाएँ एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर पिरामिड़ बनाती है
इस समय फड़का साड़ी पहनती है
डामोर जनजाति के नृत्य
भरटिया नृत्य – शोक नृत्य, मृत्यु पर
परणिया नृत्य – विवाह के अवसर पर
अन्य जाति
गुर्जरों के नृत्य
नृत्य
विशेषता
चरी नृत्य
किशनगढ़ (अजमेर) क्षेत्र में गुर्जर महिलाओं द्वारा
महिलाएँ नृत्य के दौरान सिर पर पीतल की चरी में जलते हुए कपास के बीज रखती हैं
प्रसिद्ध नृत्यांगना – फलकू बाई
वाद्य – ढोल, थाली, बांकिया
झूमर नृत्य
वीर रस प्रधान नृत्य
सामान्यत: पुरुषों द्वारा
कभी-कभी एक पुरुष और एक स्त्री नृत्य करते हैं
प्रमुख वाद्ययंत्र – झूमर
सपेरों के नृत्य
नृत्य
विशेषता
कालबेलिया
सपेरा जाति का नृत्य
पोशाक – काले रंग की कशीदाकारी की हुई
महिलाएँ नृत्य करने में प्रवीण होती है।
प्रसिद्ध नृत्यांगना – गुलाबो (2016 में पद्मश्री)
वर्ष 2010 में यूनेस्कों द्वारा अमूर्त विरासत में सम्मिलित किया गया
कालबेलिया स्कूल ऑफ डांस एकेडमी – आमेर
बागड़िया नृत्य
भीख मांगते समय कालबेलिया महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य है
शंकरिया नृत्य
कालबेलिया युगल द्वारा, प्रेम कहानी पर आधारित नृत्य
मुख्य वाद्य यंत्र – मोरचंग, पूंगी, खंजरी
प्रसिद्ध कलाकार – कंचन, गुलाबों, कमला, राजकी आदि
पणिहारी नृत्य
कालबेलिया युगल नृत्य
महिलाओं सिर पर घड़े रखकर, पणिहारी गीत
इण्डोणी नृत्य
कालबेलिया युगल नृत्य
वाद्य – पुंगी, खंजरी विशेष –
बिच्छुड़ों नृत्य
चंग के साथ कालबेलिया महिलाओं द्वारा
मेवों के नृत्य
नृत्य
विशेषता
रणबाजा नृत्य
युगल नृत्य
रतवई नृत्य
मेव स्त्रियों द्वारा सिर पर इण्डोनी रखकर
वाद्य – अलगोजा, दमामी
कठपुतली व मोर नृत्य – नट जाति
नकल नृत्य – भांड जाति
चरवा नृत्य – माली जाति
व्यावसायिक नृत्य
नृत्य
विशेषता
तेरहताली नृत्य
समुदाय: कामड़िया संप्रदाय
प्रमुख स्थल
उद्गम स्थान : पदराला गाँव, पाली
रामदेव जी (रुणिचा) मेला, जैसलमेर
इस नृत्य में निम्न 13 मुद्राएँ प्रदर्शित की जाती हैं जो दैनिक जीवन के कार्यों से संबंधित हैं