भारत के सांस्कृतिक आधार: सिंधु एवं वैदिक काल भारत की सांस्कृतिक संरचना को समझने के लिए सिंधु एवं वैदिक सभ्यताएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विषय के अंतर्गत इन कालों का अध्ययन भारतीय समाज, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विकास की मूल रूपरेखा प्रस्तुत करता है। साथ ही, छठी शताब्दी ई.पू. की श्रमण परम्परा तथा नये धार्मिक विचार आजीवक, बौद्ध और जैन भी भारतीय सांस्कृतिक आधार के महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं।

सिन्धु सभ्यता
सिन्धु सभ्यता परिचय
- सिंधु घाटी सभ्यता आद्य ऐतिहासिक काल की एक शहरी सभ्यता है, जो भारत में शहरीकरण के पहले चरण का प्रतिनिधित्व करती है।
- इसका उदय नवपाषाण काल के अंतिम चरण में अधिशेष उत्पादन के कारण हुआ। जहां ताम्र पाषाण काल ग्रामीण अवस्था को दर्शाता है, वहीं सिंधु घाटी सभ्यता शहरी संस्कृति का प्रतीक है।
सिन्धु का अतीत –
- 1826 ई.: चार्ल्स मैसन ने एक लेख में प्राचीनतम नगर हड़प्पा के होने की बात कही।
- 1834 ई.: बर्नेश ने नदी किनारे ध्वस्त किले का उल्लेख।
- 1851-53 ई.: अलेक्जेंडर कनिंघम ने हड़प्पा का सर्वेक्षण किया और 1856 ई. में इसका मानचित्र जारी किया।
- 1856 ई.: कराची से लाहौर रेलवे लाइन बिछाते समय जॉन और विलियम बर्टन ने हड़प्पा के टीले से ईंटें निकालीं।
- 1861 ई.: भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना हुई, जिसके पहले निदेशक कनिंघम बने।
- 1872-81 ई.: कनिंघम ने हड़प्पा से पाषाण औजार और मोहरें प्राप्त कीं।
- 1899-1905 ई.: लॉर्ड कर्जन ने भारतीय पुरातत्व और प्राचीन स्थलों के संरक्षण का आदेश दिया। 1902 ई.: जॉन मार्शल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक बने।
- 1924 ई.: जॉन मार्शल ने हड़प्पा सभ्यता की खोज की घोषणा की।
- जॉन मार्शल ने ‘मोहनजोदड़ो एण्ड इंडस सिविलाइजेशन’ नामक पुस्तक लिखी थी।
- 1940 के दशक में, मॉर्टिमर व्हीलर ने हड़प्पा स्थलों की खुदाई की।
- 1950 के दशक के बाद: कालीबंगा, लोथल, राखीगढ़ी और धोलावीरा जैसे भारतीय स्थलों की खुदाई की गई।
सभ्यता का नामकरण
- हड़पा सभ्यता [हड़प्पा पहला स्थल जो इस सभ्यता से संबंधित पाया गया]
- कांस्य युगीन सभ्यता [तांबे में टिन मिलाकर कांसे का निर्माण।]
- आद्य ऐतिहासिक सभ्यता
- सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता नाम जॉन मार्शल ने दिया था। (अन्य प्रमुख नाम – सिंधु सरस्वती सभ्यता)
सिन्धु घाटी सभ्यता का उद्भव
हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के विषय में दो प्रमुख सिद्धांत हैं:
1. विदेशी उद्भव का सिद्धांत
- समर्थक – गार्डन चाइल्ड, मार्टिन व्हीलर, डीडी कोसंबी।
- मुख्य तर्क:
- सभ्यता की उत्पत्ति पर मेसोपोटामिया का प्रभाव बताया।
- मार्टिन व्हीलर ने इसे “मेसोपोटामिया सभ्यता का उपनिवेश” कहा।
- गार्डन चाइल्ड ने इसे “मेसोपोटामिया का पूर्वी विस्तार” माना।
- डीडी कोसंबी ने हड़प्पा और मेसोपोटामिया के पूर्वजों को एक ही समुदाय से संबंधित बताया।
- अपने तर्क के समर्थन में प्रमाण – मेसोपोटामिया और हड़प्पा के अन्न के कोठारों का निर्माण लकड़ी से तथा दोनों सभ्यताओं का सामाजिक स्तर एक सम्मान।
नोट – मेसोपोटामिया सभ्यता भारत के पश्चिम में इराक में दजला फरात नदियों के बीच में स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता की समकालीन सभ्यता थी।
- हड़प्पा सभ्यता को पूर्णरूपेण मसोपोटेमिया प्रभाव से युक्त नहीं माना जा सकता क्योंकि दोनों सभ्यताओं के तुलनात्मक अध्ययन से इनमे कई अंतर दिखाई देते है –
| मेसोपोटामिया सभ्यता | हड़प्पा सभ्यता |
| मुहरें बेलनाकार | मुहरें चौकोर और आयताकार। |
| नगरीय और ग्रामीण स्वरूप | पूरी तरह नगरीय स्वरूप। |
| पुरोहित शासन का प्रमाण | पुरोहित शासन का प्रमाण नहीं। |
| लिपि: कीलाक्षर | लिपि: चित्राक्षर। |
| कच्ची ईंटों का उपयोग | पक्की ईंटों का उपयोग। |
भारतीय उत्पत्ति का सिद्धांत
- समर्थक: रोमिला थापर, राजाराम, नटवर झा।
- मुख्य तर्क:
- हड़प्पा सभ्यता के विकास में भारत के उत्तर-पश्चिम की प्राचीन ग्रामीण संस्कृतियों का योगदान।
- बलूचिस्तान (कुल्ली नाल) और राजस्थान (सौंथी) जैसे स्थलों से प्राप्त सामग्री हड़प्पा सभ्यता से मिलती-जुलती है।
सिंधु सभ्यता की उत्पत्ति के सिद्धांत
| विद्वान / इतिहासकार | सभ्यता की उत्पत्ति का सिद्धांत |
| डॉ. लक्ष्मण स्वरूप एवं रामचंद्र आर्य | आर्य मूल से सम्बन्ध |
| गार्डन चाइल्ड, क्रेमर, मार्शल | सुमेरियन (सुमेर से सम्बन्ध) |
| राखलदास बनर्जी, सुनीति चटर्जी | द्रविड़ मूल से सम्बन्ध |
| अमलानंद घोष, धर्मपाल अग्रवाल | सोंधी संस्कृति से सम्बन्ध |
| फ़ेयर सर्विस, रोमिला थापर | ग्रामीण / बलूची ग्रामीण संस्कृति से सम्बन्ध |
| मोर्टिमर व्हीलर | पश्चिम एशिया से ‘सभ्यता के विचारों’ का प्रवसन |
| ई.जे.एच. मैके | सुमेर से लोगों का पलायन |
सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार
- सभ्यता का क्षेत्रफल: 12,99,600 वर्ग किमी।
नोट – हड़प्पा सभ्यता और समकालीन संस्कृतियों का विस्तार भारत और पाकिस्तान में लगभग 15 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था।
- वर्तमान में नवीन स्थल प्रकाश में आने के कारण अब इसका आकार – विषमकोणीय चतुर्भुजाकार (वास्तविक स्वरूप त्रिभुजाकार था)
- पूर्व से पश्चिम 1600 किमी और उत्तर से दक्षिण लगभग 1400 किमी तक विस्तृत है।
- इस सभ्यता से संबधित लगभग 1500 से अधिक पुरा स्थल प्रकाश में आए जिनमें स्थल (हड़पा, मोहन जोदड़ो, चहुंदड़ो, कालीबंगा, बनावली, राखीगड़ी, धौलावीरा, लोथल, सुरकोटड़ा) नगरी कृत है।
नोट – इस सभ्यता की बस्तियों का सर्वाधिक संकेंद्रण सरस्वती नदी तथा इसकी सहायक नदी घग्घर खाकरा नदी के मध्य था। वर्तमान में हड़प्पा सभ्यता के अधिकांश स्थल सरस्वती व दृषदती नदियों के क्षेत्र से प्राप्त हो रहे हैं।


- सैंधव सभ्यता का भौगोलिक विस्तार उत्तर में मांडा (जम्मू) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक तथा पश्चिम में सुत्कागेंडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर (मेरठ) तक था।

नोट –
- अमलानन्द घोष ने ’सोथी संस्कृति‘ का हड़प्पा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान माना है।
- मोहनजोदड़ो की बहुसंख्यक जनता भूमध्यसागरीय प्रजाति की थी।
- 4 प्रकार की प्रजातियाँ / निर्माता
- प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड
- भूमध्यसागरीय
- अल्पाइन
- मंगोलायड
सिन्धु सभ्यता स्थल
| अफगानिस्तान | शोर्तुघई, मुंडीगाक |
| पाकिस्तान | |
| सिंध | मोहनजोदारो, लाखनजोदारो, लरकाना, चहुँदड़ो, अल्लाहदिनो, आमरी, कोटदीजी, अलीमुराद |
| पंजाब | हड़प्पा, गनवेरीवाला, जलीलपुर |
| बलूचिस्तान | बालाकोट, मेहरगढ़, राणाघुण्डई, नौशारो, सोत्काकोह, सुत्कागेंडोर, डाबरकोट, क्वेटा घाटी, कुल्ला [कुल्ली] |
| ख़ैबर पख़्तूनख़्वा [👉 पाक का नया प्रान्त 2018 में बना] | रहमान ढेरी, शेरी खान तरकाई, डेरा इस्माइल खान |
| भारत | |
| जम्मू कश्मीर | मांडा |
| उत्तर प्रदेश | आलमगीरपुर, बडगांव, हुलास, सनौली |
| गुजरात | धौलवीरा, लोथल, सुर कोटड़ा, रंगपुर, रोजदी, मलवान, देसलपुर, प्रभातपट्टन, भगतराव, कोटड़ा भदली (Kotada Bhadli), बाबरकोट, बेट द्वारका, गोला धोरो, लोटेश्वर, पाबुमठ, नागेश्वर |
| नोट – हाल ही में कोटड़ा भादली (गुजरात) की भी खोज हुई है, जहाँ से डेयरी उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं।सिन्धु सभ्यता के नवीनतम स्थल – थार का मरुस्थल– वैंगीकोट व गुजरात में करीमशाही खोजे गए हैं। | |
| राजस्थान | कालीबंगा, बरोर, करणपुरा |
| हरियाणा | बनावली, राखीगढ़ी, भिरड़ाणा/भिर्राणा, बालू,कुणाल, मीताथल, फरमाना, जोगनखेडा |
| पंजाब | रोपड़ (पंजाब), बाड़ा, संघोंल (जिला फतेहगढ़, पंजाब), चक 86 |
| महाराष्ट्र | दैमाबाद, सांगली |
सिन्धु सभ्यता काल निर्धारण
- सभ्यता के काल निर्धारण को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मत दिये गए हैं हालांकि सर्वाधिक मान्य मत 2500 ईसा पूर्व से लेकर 1800 ईसा पूर्व के मध्य हैं
- NCERT के अनुसार 2500 ईसा पूर्व से 1785 ईसा पूर्व।
- रेडियो कार्बन विधि के अनुसार 2350 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व
- यह विधि प्राचीन सभ्यताओं प्राचीन जीवाश्मों की अवधि और और कॉल निर्धारण को ज्ञात करने में उपयोगी है। जिसे अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के प्रो. एफ लिब्बी ने विकसित किया।
- जॉन मार्शल – 3200-2700 ईसा पूर्व।
- मार्टिन व्हीलर – 2500-1500 ईसा पूर्व
- माधोस्वरूप वत्स – 3500-2700 ईसा पूर्व
- अर्नेस्ट मैके – 2800- 2500 ईसा पूर्व
हड़पा कालीन नगरों को तीन कालो में विभाजित करके देखा जाता है
- प्राक् हड़पी स्थल / प्रारंभिक हड़प्पा काल: 3000–2600 ईसा पूर्व
- मेहरगढ़, कुल्ली, नाल, आमरी, कोट दीजि, हड़प्पा, कालीबंगां, राखीगढ़ी, धोलावीरा, सुरकोटड़ा, बनावली
- परिपक्व हड़प्पा काल (शहरी चरण): 2600–1900 ईसा पूर्व
- उत्तर हड़प्पा काल (पतन का चरण): 1900–1700 ईसा पूर्व – रोज़दी, रंगपुर
नोट –
- तीनों कालों के स्थल – सुरकोटड़ा धोलावीरा, राखीगढ़ी एवं मांडा
- परिपक्व हड़प्पा काल के दौरान शहरीकरण अपने चरम पर था और इसके बाद इसका पतन शुरू हो गया।
प्रारंभिक चरण
- सिंधु क्षेत्र (मेहरगढ़) विश्व के उन क्षेत्रों में से एक है, जहाँ कृषि और पशुपालन बहुत प्रारंभिक काल में ही शुरू हो गए थे।
- यह ज्ञात नहीं है कि सिंधु क्षेत्र की नवपाषाण संस्कृतियों और बाद की शहरी सभ्यता के बीच कोई निरंतरता थी या नहीं।
- प्रारंभिक हड़प्पा काल में इस पूरे क्षेत्र में गाँव और कस्बों का विकास हुआ, जबकि परिपक्व हड़प्पा काल में शहरी केंद्र उभरे।
सिंधु सभ्यता का राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक जीवन
राजनीतिक जीवन
- हड़प्पा सभ्यता व्यापार और वाणिज्य पर आधारित थी, जिसमें व्यापारी वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- पिग्गट और व्हीलर का मत है कि सुमेर और अक्कद की भाँति मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में भी पुरोहित लोग शासन करते थे। ये शासक प्रजा के हित का पूरा ध्यान रखते थे। सम्भवतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा उनके राज्य की दो राजधानियाँ थी।
- हंटर के अनुसार, ‘मोहनजोदड़ो का शासन राजतंत्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था।’
- मैके के अनुसार यहाँ जनप्रतिनिधि का शासन था।
- विद्वान स्टुअर्ट पिग्गट ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को जुड़वां राजधानी के रूप में बताया।
सामाजिक जीवन
- सिंधु सभ्यता का समाज मुख्यतः भूमध्यसागरीय प्रजाति का था, जबकि निग्रो प्रजाति अनुपस्थित थी।
- समाज में मुख्यतः चार वर्ग थे – विद्वान, योद्धा, व्यापारी, श्रमिक।
- मातृसत्तात्मक समाज: हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से बड़ी संख्या में नारी मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुईं।
- परिवार: समाज की मुख्य इकाई।
- लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे।
- सौंदर्य प्रसाधन: चहुँदड़ो से लिपस्टिक, काजल, और इत्र के साक्ष्य। हालांकि इस सभ्यता के लोग आडंबर व सुंदरता के बजाय उपयोगिता पर ज्यादा बल देते थे।
- इस सभ्यता में सामान्यत मनोरंजन गतिविधियाँ मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु पक्षियों को लड़ाना, चौपड़ व पासा खेलना आदि था।
- एक मुद्रा पर ढोलक का चित्र सिन्धु सरस्वती सभ्यता वासियों की वाद्य कला में रुचि का प्रमाण है। आखेट व संगीत के भी प्रमाण मिले है।
- सिंधु सभ्यता के लोग शांतिप्रिय थे। युद्ध का कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है।
सिंधु घाटी सभ्यता का आर्थिक जीवन
- सिंधु सभ्यता के आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार कृषि, पशुपालन, शिल्प व व्यापार थे।
कृषि
- सभ्यता नदियों के आस पास विकसित – अतः यहाँ कृषि विकसित अवस्था में थी।
- अधिशेष उत्पादन: अन्नागारों में सुरक्षित रखा जाता था।
- मुख्य फसलें: गेहूँ, जौ, ज्वार, दाल, मटर, रागी, साम्बा। कपास, खजूर, तिल व चावल का भी उत्पादन होता था।
- जुताई के लिए लकड़ी के हल का प्रयोग होता था। [बनावली तथा मोहनजोदड़ो से मिट्टी के हल का साक्ष्य प्राप्त।] फसल कटाई ताँबे के हाँसिये और पत्थर के फलक से।
- प्राक् हड़प्पा कालीन कालीबंगा से आड़ी व तिरछी हल रेखाओं से जुता हुआ खेत मिला है जो कि दोहरी फसल का संकेत देता है।
- अफ़गानिस्तान में शोर्तुघई नामक हड़प्पा स्थल से नहरों के कुछ अवशेष मिले हैं, परंतु पंजाब और सिंध में नहीं। मोहनजोदड़ो के घरों से कुओं के साक्ष्य भी प्राप्त।
- गुजरात एवं राजस्थान से चावल के साक्ष्य प्राप्त।
- धान की भूसी का साक्ष्य लोथल एवं रंगपुर एवं कपास की कृषि का विश्व में प्राचीनतम साक्ष्य मेहरगढ़ से प्राप्त।
पशुपालन
- सिंधु घाटी सभ्यता में पशुपालन महत्त्वपूर्ण था।
- पशुओं में मुख्यतः कुबड़ वाला सांड इसके अलावा बिना कुबड़वाले बैल, भैन्स, भेड़, बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर, सुअर आदि।
- गुजरात के लोग सामान्यतः हाथी पालते थे। कालीबंगां से ऊंट की हड्डियों के साक्ष्य प्राप्त। राणागुंडई से घोड़े के दांत, सुरकोटड़ा से घोड़े की हड्डियाँ, एस.आर. राव के अनुसार रंगपुर व लोथल से घोड़े की मिट्टी की मूर्तियां प्राप्त हुई है।
नोट – सामान्यत सिंधु घाटी के लोग घोड़ा, शेर, बाघ आदि को पालतू नहीं बनाया जाता था। जहाँ घोड़े का अंकन किसी भी मुहर पर नहीं मिलता। वही गाय की आकृति किसी मृणमूर्ति, एवं मृदभांड पर नहीं मिलती।
व्यापार वाणिज्य
- सिंधु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था मुख्यतः वाणिज्य और व्यापार पर आधारित थी।
- आंतरिक और विदेशी व्यापार उन्नत अवस्था में था।
- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर स्थित थे।
- बाह्य व्यापार मुख्यतया मेसोपोटामिया, अफगानिस्तान, बहरीन, ओमान सुमेर, सीरिया आदि देशों के साथ होता था
- मेसोपोटामिया के विभिन्न नगरों से सिन्धु सरस्वती सभ्यता की लगभग 24 मोहरे मिली है। लोथल से एक बटन के समान गोलाकार मोहर मिली है। ऐसी मोहरे बहरीन द्वीप, फारस की साड़ी और मेसोपोटामिया के उप नगर से मिली है।
- ओमान में हड़प्पा सभ्यता का एक मटका/ मर्तबान प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त, मेसोपोटामिया में हड़प्पा सभ्यता की बाट, पाँसे और मनके भी मिले।
- मेसोपोटामिया और सुमेर के शासक सरगौन ने दिलमुन (बहरीन) और मेलुहा (सिंधु सभ्यता) से जहाजों के आने जाने का उल्लेख किया है। दिलमन को उगते हुए सूरज तथा हाथियों का देश कहा गया।
आयात निर्यात
- आयात की प्रमुख वस्तुओ में चांदी, शीशा, टीन, फिरोजा आदि को अफगानिस्तान और ईरान से लाया जाता था। विशेष रूप से लाजवर्त मणि का आयात अफगानिस्तान स्थित बद्ख्सा से किया जाता था। तांबा राजस्थान के झुंझुनूं जिले के खेतङी, सोना कर्नाटक के मैसूर जिले के हट्टी नामक स्थान, मणको के लिए कीमती पत्थर गुजरात व महाराष्ट्र से आयात किया जाता था।
- निर्यात प्रमुख रूप से हाथीदांत, सीप की वस्तुएं, अनाज, कपास निर्यात किया जाता था।
- मेसोपोटामिया के एक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि अक्कद साम्राज्य के समय में मेलुहा (सिन्धु घाटी सभ्यता) से आबनूस, ताँबे, सोने, लालमणि और हाथीदाँत का निर्यात होता था।




यातायात के साधन
- आंतरिक व्यापार में मुख्यत: बैल गाड़ी और ठेला गाड़ी का प्रयोग किया जाता था। बाह्य व्यापार के लिए नावों का उपयोग किया जाता था।
- लोथल का विशेष रूप से बंदरगाह के रूप में महत्त्वपूर्ण स्थान था।
माप तौल के साधन
- व्यापार के लिए वस्तुओं के विनिमय एवं माप तौल की एक निश्चित व्यवस्था थी।
- बाट के आकार घनाकार और गोलाकार थे, जो चर्ट जैसार और अगेट से बने होते थे।
- इन बाटों के निचले मानदंड द्विआधारी तथा उपरी मानदंड दशमलव प्रणाली का अनुसरण करते थे।
- बाट एक श्रृंखला में क्रमशः बढ़ते क्रम में 1,2,4,8,16,32,64 तक होते थे। छोटे भार माप की 16वीं श्रेणी का वज़न लगभग 13.63 ग्राम था।
- उन्होंने एक मापने का पैमाना भी इस्तेमाल किया, जिसमें एक इंच लगभग 1.75 सेंटीमीटर के बराबर होता था।
- धातु से बने तराजू के पलड़े भी मिले।
- जहां मोहनजोदड़ो से सीप के बने बाट प्राप्त हुए है वहीं लोथल से हाथीदांत के स्केल प्राप्त।
शिल्प और उद्योग
- वस्त्र उद्योग – इस काल में सूती वस्त्र का उत्पादन महत्वपूर्ण था। मोहन जोदड़ो से सूती वस्त्र के धागे तथा कालीबंगा में मिट्टी के बर्तन पर सूती कपड़े की छाप मिली है। कपास की खेती के प्रमाण मिले हैं। कताई – बुनाई की तकलियाँ व तकुए भी मिले हैं।
- धातु उद्योग – उत्खनन में ताँम्बे व काँसे से निर्मित कलाकृतियां मिली है। ताम्र उपकरणों में मछली पकड़ने के काँटे, आरियां, तलवारें, दर्पण, छेणी, चाकू, भालाग्र, बर्तन आदि मिले हैं। काँसे की प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति, बैल कुत्ते व पक्षियों की कलाकृतियाँ मिली हैं। हड़प्पावासी चर्ट (एक प्रकार का कठोर पत्थर) से बने ब्लेड, तांबे की वस्तुएँ, हड्डी तथा हाथी दाँत के औज़ारों का उपयोग करते थे। उनके शस्त्रों में बाणाग्र , भाले की नोक, कुल्हाड़ी और फरसे शामिल थे। हालांकि, उन्हें लोहे का ज्ञान नहीं था।
- मणके निर्माण का उद्योग – लोथल और चहुँदड़ो से मणके बनाने के कारखाने मिले हैं। ये मणके सोने, चाँदी, ताम्बे, पीली मिट्टी, शैलखड़ी, कीमती पत्थर, सीपी, शंख आदि से बनाए जाते थे।
- हड़प्पा सभ्यता की अर्थव्यवस्था में हस्तशिल्प उत्पादन का महत्वपूर्ण स्थान था। मनकों और आभूषणों का निर्माण, शंख की चूड़ियों का निर्माण, और धातु-शिल्प यहाँ की प्रमुख हस्तकलाएँ थीं। हड़प्पावासी कार्नेलियन, जैस्पर, क्रिस्टल, स्टेटाइट, तांबा, कांस्य, सोना और शंख, फैयेंस तथा टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) का उपयोग करके मनकों और आभूषणों का निर्माण करते थे।
नोट – रोहरी चर्ट – चर्ट एक बारीक दानेदार अवसादी चट्टान है, जो पाकिस्तान के रोहरी क्षेत्र में पाई जाती थी। हड़प्पावासी इस पत्थर का उपयोग पत्थर के ब्लेड और औज़ार बनाने के लिए करते थे।
सिंधु सभ्यता का धर्म
- मंदिर के साक्ष्य नहीं मिले, लेकिन जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो से एक भवन का साक्ष्य पाया, जिसमें धार्मिक चिन्ह मिले थे।
- स्वास्तिक के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- जल पूजा, मातृ देवी की पूजा और पृथ्वी पूजा के प्रमाण मिलते हैं। हड़प्पा से प्राप्त मुहर में स्त्री के गर्भ से पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है, जो पृथ्वी पूजा का संकेत है।
- पशुपति शिव की पूजा का प्रमाण भी मिलता है, साथ ही लिंग पूजा और पशु पूजा के भी साक्ष्य प्राप्त होते हैं, खासकर कुबड़ा सांड की पूजा होती थी।
- वृक्ष पूजा में पीपल, नीम और बबूल के वृक्षों की पूजा होती थी। एक मुहर में दो पीपल के वृक्ष के बीच देवता को दिखाया गया है, जिनकी पूजा सात मानव आकृतियाँ कर रही हैं।
- नाग पूजा और अग्नि पूजा का भी प्रचलन था। कालीबंगां और लोथल से अग्निकुंड के साक्ष्य मिले हैं।
- अंत्येष्टि संस्कार के प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जिनमें पूर्ण समाधिकरण, दाह संस्कार और आंशिक समाधिकरण शामिल हैं।
- हड़प्पा संस्कृति की समाधियों में मिट्टी के बर्तन, आभूषण, गहने, ताम्रदर्पण और मनके पाए गए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि उनका मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास था।
सिन्धु सभ्यता का पतन
इसके कारणों में जलवायु परिवर्तन, मेसोपोटामिया के साथ व्यापार का घटाव, और निरंतर सूखा होने के कारण नदियों और जल संसाधनों का सूख जाना प्रमुख रूप से बताए जाते हैं। आक्रमण, बाढ़ और नदियों के मार्ग का परिवर्तन भी सिंधु सभ्यता के विनाश के कारणों के रूप में उद्धृत किए जाते हैं। समय के साथ, लोग सिंधु क्षेत्र से दक्षिणी और पूर्वी दिशाओं में पलायन करने लगे।
| मत / पतन का कारण | इतिहासकार |
| प्रशासनिक शिथिलता | जॉन मार्शल |
| जलवायु परिवर्तन | ऑरेल स्टाइन |
| बाढ़ के कारण नष्ट हुई। | एसआर राव, अर्नेस्ट मैके एवं जॉन मार्शल |
| रावी एवं घघर नदी के मार्ग बदलने से क्रमशः हड़प्पा एवं कालीबंगा का पतन। | मधोस्वरूप वत्स, लैंब्रिक एवं डेल्स |
| भू तात्विक परिवर्तन। | एम.आर.साहनी, आर.एल.राइक्स, जॉर्ज एफ. डेल्स, एच.टी. लैम्ब्रिक |
| जल प्लावन या विवर्तनिकी विक्षोभ | एमआर साहनी एवं आर.एल.राइक्स |
| मोहनजोदाड़ो के लोगों की आग लगाकर हत्या कर दी गयी। | डी.डी. कोसाम्बी |
| विदेशी आक्रमण व आर्य आक्रमण | गार्डन चाइल्ड, मार्टीमर ह्वीलर, डी.एच.गार्डन, स्टुअर्ड पिण्ट |
| जल की कमी | अमलानंद घोष और डीपी अग्रवाल |
आकस्मिक पतन का सिद्धांत
- हड़प्पा सभ्यता के आकस्मिक पतन संबंधी सिद्धांत में मुख्यतः आर्य आक्रमण, बार बार नदी का मार्ग परिवर्तन, जल प्लावन या विवर्तनिकी विक्षोभ, सुखा आदि कारणों को उत्तरदायी माना गया है।
- आर्य आक्रमण: गार्डन चाइल्ड और व्हीलर जैसे इतिहासकारों ने आर्य आक्रमण को हड़प्पा सभ्यता के पतन का कारण बताया। व्हीलर ने यह माना कि इंद्र, जो ऋग्वेद में दुर्गों को नष्ट करने वाले देवता के रूप में वर्णित हैं, का प्रतीकात्मक अर्थ आर्य आक्रमण से जुड़ा हुआ था।
- मोहनजोदड़ो से 38 नर कंकाल मिले हैं, जिन पर धारदार अस्त्रों के घाव है।
- ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर (दुर्गों को नष्ट करने वाला) और वृत्तासुर हंता (बांधों को नष्ट कर जल को मुक्त कराने का श्रेय) कहा गया है।
- हड़प्पा स्थित कब्रिस्तान H से ऐसा नर कंकाल प्राप्त हुआ है, जो अपने आकार- प्रकार में हड़प्पा कालीन निवासियों से भिन्न है। इसे किसी आक्रमणकारी का कंकाल माना गया है।
- ऋग्वेद में हर यूपिया शब्द का उल्लेख है, जिसकी पहचान हड़प्पा के रूप में की गई है। हालांकि, इस सिद्धांत को आधुनिक शोधों से चुनौती दी गई है,
| स्थल | स्थान/नदी/सागर तट | खोज/उत्खननकर्ता |
| हड़प्पा | पंजाब [पाक] – माण्टगोमरी [वर्तमान – साहीवाल जिला] में रावी – बायें तट | 1st जानकारी 1826 – चार्ल्स मेंसन1921 – दयाराम साहनी ने सर्वेक्षण और 1923 से नियमित उत्खनन |
| मोहनजोदड़ो[सिन्धी – ‘मृतकों का टीला’] | लरकाना जिला [सिन्ध पाक] – में सिन्धु नदी तट पर | राखालदास बनर्जी -1922 ई.जे.एच. मैके तथा मार्शलउत्खनन – 1922 – 30 के मध्य जॉन मार्शल के निर्देशन में करवाया गया |
| चहुँदड़ो | मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण में सिन्धु नदी के किनारे | 1931 ई. – एम.जी. मजूमदार |
| लोथल | भोगवा नदी के तट पर गुजरात में | डा. एस. आर. राव – 1954उत्खनन एस.आर. राव ने 1957-58 ई. के मध्य करवाया। |
| कालीबंगा [शाब्दिक अर्थ है ̵ काले रंग की चूड़ियाँ] | हनुमानगढ़ – राजस्थान में घग्घर नदी के बाएँ तट पर | अमलानंद घोष – 1953 |
| धोलावीरा | गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका | उत्खननकर्ता – रविन्द्र सिंह बिष्ट – वर्ष 1991खोजकर्ता – जगपति जोशी – 1967-681st खोज – 1960 के दशक में धोलावीरा गांव के रहने वाले शंभूदान गढ़वी |
| सुरकोटदा | गुजरात | जे.पी. जोशी – 1964 |
| रोपड़ | सतलज नदी | सन् 1950 में खोज – बी.बी. लाल ने।1953-56 ई. में यज्ञदत्त शर्मा ने उत्खनन करवाया। |
| कोटदीजी | सिंधु नदी | फजल अहमद खाँ |
| रंगपुर | मादर नदी | इसकी खुदाई 1957-58 – S रंगनाथ राव ने |
| आलमगीरपुर | मेरठ [UP] हिन्डन नदी | खोज में ‘भारत सेवक समाज’संस्था का विशेष योगदान रहा तथा उत्खनन 1958 में यशदत शर्मा ने करवाया। |
| सुत्कागेंडोर | ब्लूचिस्तान प्रान्त [पाक] दाश्क नदी | ऑरेल स्टाइन 1929 |
| बनावली | हरियाणा के हिसार जिले। सरस्वती नदी के किनारे | रवीन्द्र सिंह बिस्ट – 1973 – 74 |
| अमरी | सिंधु नदी के तट पर | एन.जी. मजूमदार – 1935 |
| बड़गांव | सहारनपुर [up] | |
| राखीगढ़ी | हरियाणा हिसार में सरस्वती / दृषद्वती नदियों के शुष्क क्षेत्र | खोज रफीक मुगल और सुरजभान ने की थी।उत्खनन व्यापक पैमाने पर 1997-1999 ई.- अमरेन्द्र नाथ द्वारापहली बार खुदाई – 1963 ई. में |
| भिरड़ाणा | फतेहाबाद जिला [हरियाणा] | 2003 – 04 में किए गए उत्खनन में इस नगर की खोज हुई थी।भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के दिसम्बर 2014 के शोध से पता चला है कि यह सिंधु घाटी सभ्यता का अबतक खोजा गया सबसे प्राचीन नगर है जिसकी स्थापना 7570 ईसापूर्व में हुई थी। |
| हड़प्पा | यह नगर लगभग 5 किमी. की परिधि में फैला हुआ थाहड़प्पा से स्त्री के गर्भ से निकलते हुए एक पौधे की मृण्मूर्ति प्राप्त हुई है, जिसे हड़प्पा वासियों ने उर्वरा देवी या पृथ्वी देवी माना है। बिना धड़ की एक पाषाण मूर्ति प्राप्त हुई।हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक कब्रिस्तान स्थित है जिसे “समाधि आर – 37” नाम दिया गया है। अन्य कब्र – H भी प्राप्त हुई है। विदेशी की कब्र [ताबूत में दफनाया गया]हड़प्पा का दुर्ग जिस टीले पर स्थित था उसे व्हीलर ने माउण्ड – ए-बी की संज्ञा दी।काँसे का दर्पणहड़प्पा से अन्नागारों की दो पंक्तियों के अवशेष मिले, प्रत्येक में 6-6 अन्नागर हैं।प्रसाधन मंजूषा (शृंगार पेटी)इक्कागाड़ी स्वस्तिक का चिन्ह सर्वाधिक अलंकृत मुहरें- हड़प्पा से, जबकि सर्वाधिक मुहरें- मोहनजोदड़ो से प्राप्त।श्रमिक आवास के प्रमाण मिले हैं। |
| मोहनजोदड़ो | यह नगर 8 बार उजड़कर 9 बार बसा था जिसके 7 क्रमिक स्तर मिले हैं।मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत अन्नागार थी व्हीलर ने इसे अन्नागार (Granary) की संज्ञा दी तथा सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल ’विशाल स्नानागार’ था, इस स्नानागार का धार्मिक महत्त्व था। इसके चारों ओर जल भण्डारण हेतु बड़े-बड़े टैंक मिले हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर पर तीन मुख वाले एक देवता का अंकन किया गया है। जिसके चारों तरफ भैंसा, हाथी, गेंडा, व्याघ्र व निचले भाग पर 2 हरिण व ऊपरी भाग पर मछली व 10 अक्षरों का अंकन मिलता है।जॉन मार्शल ने इसे पशुपतिनाथ की उपाधि प्रदान की, साथ ही इसे ‘आद्यतम शिव’ की उपमा दी है। इस स्थल से मानव कंकाल (शायद नरसंहार) के साक्ष्य मिले हैं।यहाँ से पुरोहित आवास के साक्ष्य भी मिले।काँसे की नर्तकी की मूर्ति प्राप्त। हाथी का कपाल खंड सूती कपड़ा मेसोपोटामिया मुहर |
| चहुँदड़ो | चन्हुदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एकमात्र पुरास्थल है, जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं।एकमात्र स्थल जहाँ से मिट्टी की पकी हुई पाइपनुमा नालियों का प्रयोग किया गया।यहाँ से :-मनके बनाने के कारखाने के साक्ष्य [एक औद्योगिक केंद्र]सौंदर्य प्रसाधन सामग्री (जैसे- लिपस्टिक) के अवशेष।हाथी का खिलौनापीतल की इक्का गाड़ीस्याही की दवात के साक्ष्य।चन्हुदड़ो से किसी भी प्रकार के दुर्ग के साक्ष्य नहीं मिलते हैं।यहाँ से बिल्ली के पीछे भागते हुए कुत्ते के पदचिह्न भी प्राप्त हुए हैं।सम्पूर्ण सिन्धु सभ्यता का एकमात्र सभ्यता स्थल जहाँ से झुकर-झांगर संस्कृति के अवशेष प्राप्त होते हैं। |
| लोथल | एक औद्योगिक नगर था।लोथल में गढ़ी और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं।लोथल से मनके बनाने का कारखाना मिलाबाट-माप-तौल के लिए पैमाना/हाथी दाँत पैमाना होता था।यह सिन्धु सभ्यता का एक प्रमुख गोदीबाड़ा (डॉक यार्ड) बंदरगाह/पत्तन था।सिकोत्तरी माता समुद्री देवी थी।सम्पूर्ण सैन्धव सभ्यता का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल- लोथल का गोदीबाड़ा था। लोथल उस समय पश्चिमी एशिया से व्यापार का प्रमुख स्थल था। तीन युगल शवाधान (एक साथ दफनाए शव) जिनका सिर उत्तर दिशा की तरफ तथा पैर दक्षिण दिशा की तरफ हैं।अग्निकुंड/अग्निवेदिकाएँ मिली हैं।शतरंज बोर्ड चावल के साक्ष्य यहाँ से मिली मोहरों में सबसे महत्त्वपूर्ण वे हैं, जो ईरान की खाड़ी में मिली मुहरों के अनुरूप हैं, जिनसे मेसोपोटामिया और फारस (ईरान) के साथ व्यापारिक संबंधों का पता चलता है।एस. आर. राव ने इसे लघु हड़प्पा या लघु मोहनजोदड़ो कहा। |
| कालीबंगा | कालीबंगा से हड़प्पा सभ्यता के साथ-साथ हड़प्पा पूर्व सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं अर्थात् यह प्राक् हड़प्पाकालीन स्थल है।यहाँ किये गये उत्खननों से हड़प्पा कालीन सांस्कृतिक युग के पाँच स्तरों का पता चला है।कालीबंगा से प्राप्त साक्ष्य –ऊँट के प्रथम साक्ष्यहल की आकृति व जोते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।कालीबंगा के लोग एक साथ 2 फसलें बोते थे।कालीबंगा को ‘दीन-हीन’ बस्ती कहा जाता था।लकड़ी की नालियों के साक्ष्ययहाँ से प्राप्त एक खोपड़ी में छेद किए हुए मिले हैं जो शल्य चिकित्सा का प्रमाण माना जाता।कालीबंगा से तीन प्रकार के शवाधान के साक्ष्य मिले हैं ̵आंशिक शवाधानपूर्ण शवाधानदाह संस्कारकालीबंगा से विश्व के प्रथम भूकम्प के साक्ष्य मिले, जो कि लगभग 2100 ई.पू. के आसपास आया होगा।अलंकृत फर्श, ईँट तथा बेलनाकार मोहरे व हवनकुण्ड के साक्ष्य।नोट- डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को हड़प्पा संस्कृति की तीसरी राजधानी कहा।बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामिया में भी प्रचलित थी अत: यह कहा जा सकता है कि संभवत: कालीबंगा के व्यापारिक संबंध मेसोपोटामिया के साथ रहे होंगे। |
| धोलावीरा | कच्छ के रण में स्थित ‘कच्छ डेजर्ट वाइल्ड लाइफ सेंचुरी’ के ‘खादिरबेट आइलैंड’ में स्थित।यहाँ से पॉलिशदार सफेद पाषाण खण्ड बड़ी संख्या में मिलते हैं। इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहाँ के लोगों को स्तंभों पर पॉलिश करने की जानकारी थी।यहाँ से नेवले की पत्थर की मूर्ति भी मिली है।धोलावीरा में जल संरक्षण से संबंधित उत्कृष्ट तकनीक का पता चलता है।संपूर्ण सैंधव सभ्यता के सर्वाधिक कृत्रिम जलाशय के साक्ष्य यहीं से प्राप्त हुए हैं।यहाँ से सिंधु घाटी सभ्यता का एकमात्र स्टेडियम (खेल का मैदान) मिला है।घोड़े की कलाकृतियों के अवशेष भी मिले हैं। यहाँ से सूचना पट्ट (Notice Board) के प्रमाण मिले हैं। (दस अक्षर लिखित लकड़ी की पट्टिका)अन्य हड़प्पाई स्थल के विपरीत धोलावीरा नगर तीन खंडों में विभाजित है अर्थात् “मध्यम” के अवशेष केवल इसी स्थल से प्राप्त हुए हैं।दुर्गमध्यम नगरनिचला नगरयहाँ से संयुक्त एवं पृथक् दुर्गीकरण के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।यह स्वतंत्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा सैंधव स्थल है।नोट – वर्ष 2015-16 के सम्पूर्ण उत्खनन के बाद राखीगढ़ी को भारत में सबसे बड़ा क्षेत्र माना गया है। (410 हैक्टेयर) |
| राखीगढ़ी | भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता के विशालतम नगरों में से एक राखीगढ़ी है।यहाँ से मातृदेवी अंकित लघु मुद्रा की चार मोहरें मिली हैं। |
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| सुरकोटदा | यहाँ से घोड़े की हडि्डयों के अवशेष मिले।कलश शवाधान के साक्ष्य।ऊपर से कब्र को पत्थर से ढकने के साक्ष्य। |
| रोपड़ | यहाँ हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं।शवों को अंडाकार गड्डों में दफनाया जाता था।यहाँ से मानवीय कब्र के नीचे एक कुत्ते का शव (मानव के साथ पालतु कुत्ते को दफनाने के अवशेष) मिला है। |
| कोटदीजी | यह स्थल हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन दोनों से संबंधित है।यहाँ मकान कच्ची ईंटों से बने हैं परन्तु नींवों में पत्थर का प्रयोग हुआ है। |
| रंगपुर | यहाँ पर पूर्वकालीन व उत्तरोत्तर हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिले हैं।इस स्थल से चावल की भूसी के प्रमाण मिले हैं। |
| बनावली | यहाँ से मिट्टी के खिलौने (हल) प्राप्त।इस स्थल से जौ, तिल तथा सरसों के ढेर मिले।बनवाली में जल विकास प्रणाली का अभाव। |
| सुत्कागेंडोर | सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पश्चिमी ज्ञात नगर।यहाँ से बंदरगाह के अस्तित्व का पता चला है। |
| आलमगीरपुर | यहाँ से एक भी मातृदेवी की मूर्ति और मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है।गर्त पर कपड़े की छाप |
| कुनाल | चांदी के दो मुकुट मिले |
| दैमाबाद | धातु का रथ |
| आमरी | गैंडे के अवशेष |
वैदिक संस्कृति [1500-600 BC]
वैदिक सभ्यता के निर्माता –
- वैदिक सभ्यता भारत की अति प्राचीन विकसित ग्रामीण सभ्यता थी जिसका स्थापना भारत के उत्तरी मैदानों में की गयी।
- इस सभ्यता के लोगो ने विकास के क्षेत्र में अनेक तकनीको की शुरुआत की और विश्व के सबसे पहले लिपिबद्ध साहित्यों का लेखन किया अत: ऐसी सभ्यताओ के मूल निर्माताओ के मूल निवास को लेकर आकर्षण के विषय के साथ में विद्वानों में मतभेद भी दिखाई देता है।
आर्यों का मूल निवास स्थान
- हड़पा सभ्यता के पश्चात वैदिक संस्कृति का प्रारंभ।
- वैदिक संस्कृति के निर्माताओं को आर्य को माना जाता है।
- आर्य संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ – श्रेष्ठ।
- साथ ही यह प्रजाति का सूचक ना होकर एक विशेष प्रकार की भाषा बोलने वाले समूह का सूचक है जहां तक इनके मूल निवास के बात की जाए तो इतिहासकारों में आज भी पर्याप्त मतभेद का विषय बना हुआ है।
आर्यों के मूल निवास स्थान के विषय में प्रमुख विद्वानों के मत
| विद्वान / लेखक | आर्यों का मूल निवास स्थान (मत) |
| मैक्समूलर, रोथ्स | मध्य एशिया |
| गाइल्स | हंगरी या डेन्यूब नदी घाटी |
| पेंका, हर्ट | जर्मन स्कैन्डिनेविया |
| नेहरिंग, गार्डन चाइल्ड | दक्षिण रूस |
| बाल गंगाधर तिलक | उत्तरी ध्रुव |
| गंगानाथ झा | ब्रह्मर्षि देश |
| अविनाश चन्द्र दास, डॉ. सम्पूर्णानन्द | सप्त सैंधव प्रदेश |
| दयानंद सरस्वती एवं पार्टिजर | तिब्बत |
| एन.सी.ई.आर.टी. | आल्प्स पर्वत के पूर्व में यूरेशिया के पास |
| राजबली पाण्डेय | मध्य भारत |
| एल.डी. कल्ला | कश्मीर / हिमालय |
| डी.एस. त्रिवेदी | देविका प्रदेश (मुल्तान) |
| बेनफ़े | काला सागर (Black Sea) |
| एडवर्ड मेयर | पामीर का पठार |
| ब्रेंडस्टीन | यूराल पर्वत के दक्षिण में कॉकेशस का मैदान |
- आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर मैक्स मूलर ने ईरानी ग्रंथ जेंद अवेस्ता से इनके आगमन की तिथि 1600 ईपू. / 1400 ई.पू. निर्धारित किया। ,
- अभिलेखीय साक्ष्य को आधार को बनाया जाए तो दो महत्वपूर्ण साक्ष्य है –
- कस्सी अभिलेख (ईरान), बोगाज कोई अभिलेख (एशिया माइनर तुर्की) इसमें देवता इंद्र, मित्र और वरुण और नास्त्य का उल्लेख है।
आगमन तिथि के विद्वानों का मत
| मैक्स मूलर | 1200-1000 ईसा पूर्व |
| बाल गंगाधर तिलक | 6000 ईसा पूर्व |
| नोट – 1500 ईसा पूर्व सार्वाधिक मान्य मत। | |
- अद्यतन स्रोतों में अविनाश ओझा के सप्त सैन्धव प्रदेश के रूप में आर्यों के मूल निवास की अवधारण को अधिक बल मिलता है। अविनाश चन्द्र ने अपने समर्थन में वेदों में वर्णित ऋग्वैदिक कालीन नदियों, भौगोलिक अवस्थितियो तथा हिमालय की मूंज्वंत पर्वत चोटी का उल्लेख किया।
वैदिक काल का विभाजन
वैदिक काल को अध्ययन की सुविधा के दृष्टिकोण से विंटर निट्ज ने दो कालो में विभक्त किया जाता है –
ऋग्वैदिक काल (1500-1000 BC) – पूर्व वैदिक काल
- इस काल में काले और लाल रंग के मृदभांड मिले है। इसके अलावा गेरूए रंग के भी मृदभांड भी मिले है।
- ऋग्वेद में लोहे का उल्लेख नहीं है । लोहे का सर्वप्रथम साक्ष्य 1000 BC के आसपास उत्तर प्रदेश के एटा जिले के अतरंजी खेड़ा नामक स्थान से प्राप्त हुआ है चूंकि मिट्टी के बर्तनों की प्राचीनता लगभग 1500 ईसा पूर्व में, लोहे की खोज 1000 ईसा पूर्व के आसपास हुई है। इस प्रकार इन्ही कालो के मध्य ऋग्वैदिक काल को रख जाता है।
उत्तर वैदिक काल (1000-600 BC)
- इस काल में मानव को लोहे का ज्ञान था साथ ही इस काल में चित्रित मृदभांड बनने प्रारंभ हुए जो लोहे से संबधित थे। इसलिए उत्तर वैदिक काल की उच्च सीमा 1000 ईसा पूर्व मानी गई। इसके अलावा महाजनपदों का उल्लेख छठी शताब्दी ईसा पूर्व हुआ।
- इस काल की निम्न सीमा 600 ईसा पूर्व निर्धारित की गई।
आर्यों का भौगोलिक क्षेत्रफल
पूर्व वैदिक कालीन आर्यों का भौगोलिक क्षेत्र
- ऋग्वेद में सप्त सैंधव प्रदेश का उल्लेख है जिसकी सात नादिया सिंधु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), अस्किनी (चेनाब), परुष्णी (रावी), विपासा (व्यास), सतुद्री (सतलज)।
- इन नदियों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है की आर्य सर्वप्रथम पंजाब तथा अफगानिस्तान क्षेत्र में बसे।
- इसके अलावा ऋग्वेद में चार अन्य नदियों के नाम का भी उल्लेख है जैसे कुम्भा, गोमती व स्वास्तु, कुर्रम प्रमुख नदी है।
उत्तर वैदिक आर्यों का भौगोलिक क्षैत्र
- उत्तर वैदिक कालके आर्यों का सीमा विस्तार की बात की जाए तो पश्चिमी सीमा अफगानिस्तान, पूर्वी सीमा बिहार – सदानीरा नदी तक।
नोट – उत्तर वैदिक कालीन ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण में विदेथ माधव की कथा का वर्ण है।
महत्त्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र
| नाम | वर्णन |
| ब्रह्मवर्त | सरस्वती व दृषद्वती नदियों के बीच का क्षेत्र |
| सप्तसैंधव | सिंधु व उसकी सहायक नदियों का प्रदेश |
| आर्यावर्त | हिमालय से विंध्य तक, पूर्व से पश्चिम समुद्र तक का क्षेत्र |
| मूजवंत पर्वत | हिमालय की चोटी – सोमरस के लिए प्रसिद्ध |
वैदिक कालीन नदियां
- ग्रंथों में वैदिक ग्रंथों में कुल 31 नदियों का उल्लेख किया गया है जिनमें 25 नदिया महत्वपूर्ण है।
- ऋग्वेद के दसवें मंडल नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख है इनमें से सिंधु नदी का सबसे अधिक उल्लेख मिलता है। आर्यों के आर्थिक दृष्टिकोण सबसे महत्वपूर्ण नदी मानी जाती हैं। इसे हिरणयानी दीपा गया है जबकि आर्यों की सबसे पवित्र नदी सरस्वती नदी थी जिससे नदीतमा, देवीतमा कहां जाता है क्योंकि वेदिक ऋचाओं की रचना सरस्वती नदी के किनारे हुई हैं।
नोट – ऋग्वेद में समुद्र शब्द का प्रयोग विशाल जल राशि के रूप में किया गया। ऋग्वेद में हिमालय पर्वत का उल्लेख है जिसे हिमावत कहा गया साथ ही मुंजवती चोटी का उल्लेख है।मरुस्थल के लिए धन्व शब्द का प्रयोग किया गया।
ऋग्वैदिक कालीन नदियाँ
| क्रम | प्राचीन नाम | वर्तमान नाम | स्थान / टिप्पणी |
| 1 | शतुद्रि (शुतुद्रि) | सतलज (Sutlej) | पंजाब से होकर बहने वाली नदी |
| 2 | विपासा | व्यास (Beas) | हिमाचल प्रदेश में उद्गम |
| 3 | अस्किनी | चिनाब (Chenab) | जम्मू-कश्मीर से बहती |
| 4 | पुष्णी (इरावती) | रावी (Ravi) | पंजाब क्षेत्र |
| 5 | वितस्ता | झेलम (Jhelum) | कश्मीर घाटी |
| 6 | सिन्धु | सिंध (Indus) | सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैदिक नदी |
| 7 | सुषोमा | सोहन (Sohan) | झेलम की सहायक |
| 8 | गोमती (गोमल) | गोमल नदी | अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा क्षेत्र |
| 9 | क्रुमु | कुर्रम नदी | अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र |
| 10 | सरस्वती | घग्घर–हाकड़ा नदी | सबसे पवित्र वैदिक नदी |
| 11 | दृषद्वती | चौतंग (हरियाणा) | सरस्वती की सहायक |
| 12 | सदानीरा | गंडक (Gandak) | बिहार की नदी |
| 13 | आपया | – | दृषद्वती की सहायक |
| 14 | आर्य / नदी सूक्त की पहली नदी | गंगा | पहली नदी के रूप में वर्णित |
ऋग्वैदिक काल

ऋग्वेद का काल निर्धारण (Scholars’ Views)
| विद्वान | काल निर्धारण (ई.पू.) |
| मैक्समूलर | ऋग्वेद: 1200–1000, उत्तर वैदिक संहिताएँ: 1000–800, ब्राह्मण ग्रंथ: 800–600 |
| लुडविग | 1100 |
| जेकॉबी | 3000 |
| माइकल विटजैल | 1200–1000 (पुरु जन में संहिताकरण) |
| बाल गंगाधर तिलक | 6000 |
| मौरिज विंटरनिट्ज (ऑस्ट्रिया) | 2500–2000 |
| बोगजकोई अभिलेख (सीरिया, 1380 ई.पू.) | इन्द्र, मित्र, वरुण, नासत्य – ऋग्वेदिक देवताओं का उल्लेख |
राजनीतिक जीवन
- इस युग में राजनैतिक व्यवस्था कबीलाई पद्धति पर आधारित थी। आर्यों के छोटे छोटे कबीले होते थे जहाँ सभी निर्णय मिल जुल कर लिए जाते थे। ऋग्वेद में पांच कबीलों को पञ्च जन्य कहा गया है जिनमे अनु, दुह्य, तुर्वस, यदु, क्रीवी।
- आर्यों की राजनीतिक जीवन का लोकप्रिय स्वरुप राजतंत्रात्म्क था हालांकि गणतंत्रात्म्क व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है।
- राजा का राज्याभिषेक होता था इस तरह राज्याभिषेक का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
- राजा का पद वंशानुगत होता था राजा को कोई नियमित कर प्राप्त नहीं होता था किन्तु उसे बलि नामक स्वैच्छिक कर प्राप्त होता था।
- इस काल में राजा लगभग निरंकुश नहीं होता था क्यूंकि राजा की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए कुछ कबीलाई संस्थाए थी।
- सभा
- इसमें श्रेष्ठ एवं कुलीन जन भाग लेते थे।
- इसके अध्यक्ष को सभापति तथा सदस्यों को सभ्य कहा जाता है।
- इसकी तुलना आधुनिक राज्यसभा से की जाती है।
- समिति
- इसके सदस्य सामान्य जन होते थे।
- इसके अध्यक्ष को ईशान या पति कहा जाता।
- यद्यपि राजा का पद वंशानुगत था, समिति के सदस्यों द्वारा राजा का निर्वाचन होता था।
- इसकी तुलना आधुनिक लोकसभा से की जाती थी
- विदथ
- यह सबसे प्राचीन संस्था थी जो सैनिक तथा असैनिक तथा धार्मिक मामलो के कार्यो को देखती थी।
- परिषद
- एक जनजातीय सैनिक सभा
- सभा
नोट –
- राजतंत्र के अतिरिक्त ऋग्वेद में गैर राजतंत्रात्मक राज्य का उल्लेख है जिसे गण कहा गया। गण का प्रमुख गणपति या ज्येष्ठक होता था
- ऋग्वेद में विदथ (122), गण (46), समिति (9) व सभा (8) बार चर्चा मिलती है
प्रशासनिक इकाइयाँ
| इकाई | विवरण | प्रमुख |
| कुल | सबसे छोटी इकाई | कुलप |
| ग्राम | अनेक कुलों का समूह | ग्रामणी |
| विश | अनेक ग्रामों का समूह | विशपति |
| जन | अनेक विशों का समूह (जनजाति) | जनपति / राजा |
मुख्य प्रशासनिक संस्थाएँ
| संस्था | कार्य | उल्लेख |
| विदथ (Vidhath) | प्राचीनतम संस्था, लूट-विभाजन, महिलाएँ भी शामिल | 122 बार |
| सभा (Sabha) | बुजुर्गों/अभिजातों की परिषद्, मंत्रिपरिषद समान | 8 बार |
| समिति (Samiti) | जनता की प्रतिनिधि सभा, राजा की नियुक्ति व पदमुक्ति का अधिकार | 9 बार |
प्रशासन
- प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई जन होती थी जिसके प्रधान को जनस्य गोपा या राजा कहा जाता था।
- जन का विभाजन में विश में तथा प्रमुख – विशपति।
- विश का विभाजन ग्राम में तथा प्रमुख – ग्रामणी।
- ग्राम का विभाजन कुल / कुटुंब परिवार / गृह में होता था जिसका प्रमुख कुलप या गृहपति कहलाता था।
- ऋग्वेद में नगर शब्द का उल्लेख नहीं है।
- नगर शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम उत्तर वैदिक कालीन ग्रन्थ तैतरीय आरण्यक में मिलता है।
- ऋग्वेद में जन (275), विष (107) व ग्राम (13) बार उल्लेख किया गया है।
- ऋग्वेदिक काल में प्रशासन का प्रमुख राजा होता था जिसकी सहायता के लिए पुरोहित (राजा का मुख्य परामर्श दाता), सेनापति ( सेनाप्रमुख), ब्राजपति (चारागाह प्रमुख), स्पर्श (गुप्तचर), पुरप (दुर्ग का अधिकारी), सूत (रथकार) जैसे लोग होते थे
नोट –
- इस काल में सबसे बड़ा अपराध पशु चोरी था। इसके लिए कठोर दंड का प्रावधान था। इस काल में स्थायी सेना का अभाव था। अपराधियों के लिए जीवगृभ तथा पुलिस के लिए उग्र शब्द का उल्लेख मिलता है।
- ऋग्वेद के 7 वें मंडल का दसराज्ञ युद्ध
- त्रित्सु जन के राजा सुदास ने महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन में यह युद्ध विश्वामित्र के संघ के विरुद्ध जीता। डी.डी. कौशांबी के अनुसार, यह संघर्ष पुरुष्णी नदी के दोआब पर नियंत्रण के लिए हुआ था।
- सुदास ने भरत समुदाय का नेतृत्व किया, जबकि विश्वामित्र नौ राजाओं के संघ का नेतृत्व कर रहे थे।
आर्थिक जीवन
- ऋग्वेदिक आर्यों का प्रारंभिक जीवन अस्थायी था। अत: उनके जीवन में कृषि की अपेक्षा पशुपालन का अधिक महत्त्व था।
पशुपालन
- पशुपालन में गाय का सर्वाधिक महत्त्व था।
- जीवन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रो की अभिव्यक्ति गाय के माध्यम से की जाती थी जैसे
- राजा = गोप्ता / गोपति
- युद्ध = गविष्टि / गेशु/ गव्य / गम्य
- समय – गोधूली
- दूरी – गव्यतु
- पुत्री – दुहिता
- धनी व्यक्ति – गोमत
- अतिथि – गोहन
- ऋग्वेद में गाय का उल्लेख 176 बार
नोट – बाद के समयों में गाय को पवित्र माना गया उन्हें अघन्या अर्थात न मारने योग्य समझा गया।
- गाय के अतिरिक्त भेड़, बकरी, घोडा, ऊंट, कुत्ता (पवित्र कुतिया) का भी पालन करते थे।
- हाथी व बाघ का उल्लेख नहीं है।
कृषि
- पशुपालन की तुलना में कृषि का स्थान गौण।
- ऋग्वेद में कुल 24 बार उल्लेख मिलता है।
- इसके अलावा ऋग्वेद में एक ही अनाज यव (जौ) का उल्लेख मिलता है।
- जुते हुए खेत को क्षेत्र, हल की रेखा को सीता, हल को लांगल, हलवाहे को कीवाश, उपजाऊ भूमि को उर्वरा, अनाज मापने के बर्तन को उर्दर तथा खाद हेतु करीषु शब्द का उल्लेख है।
- ऋग्वेद में सिंचाई के दो स्त्रोतों की जानकारी मिलती है – प्राकृतिक स्त्रोत – जिन्हें स्वजात कहते थे तथा कृत्रिम स्त्रोत – खनितामा कहते थे। खानितमा में तालाब तथा कुए शामिल थे तथा प्राकृतिक स्त्रोतों में वर्षा जल तथा नदियों को शामिल किया जाता है। ऋग्वेद में कही भी नहर के द्वारा सिंचाई की जानकारी नही मिलती।
नोट – ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल में कृषि का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त पहलें मंडल में भी कृषि के महत्त्व का वर्णन है। चौथे मंडल में कृषि को समर्पित 33 मंत्रो का उल्लेख किया गया है। इसी मंडल में सर्वप्रथम राजा पृथुवैन्य द्वारा धरती पर हल चलाए जाने का वर्णन है अत: इन्हें कृषि का अविष्कारक माना जाता है।
उद्योग धंधे
- धातुओ में ताम्बा या कांसा जिसे अयस कहा जाता था एवं सोना [हिरण्य] का प्रयोग मिलता है। जबकि लोहा व चांदी का उल्लेख नहीं मिलता।
- ऋग्वैदिक समाज में व्यवसाय आनुवांशिक नहीं हुए।
- पशुपालन एवं कृषि के अतिरिक्त इस काल में अनेक प्रकार के शिल्प एवं उद्योगों का प्रचलन था।
- ऋग्वेद में जिन प्रमुख व्यवसायियों का उल्लेख प्राप्त होता है उनमें प्रमुख हैं – तक्षा (बढ़ई), धातु कर्मी (धातु का कार्य करने वाले), स्वर्णकार, चर्मकार, वाय (जुलाहे), कुम्भकार (कुलाल) आदि।
- बढ़ई सम्भवतः शिल्पियों का मुखिया होता था। बुनाई का कार्य मुख्यत: ऊन तक ही सीमित था।
- सिन्धु एवं गान्धार प्रदेश ऊन के लिए प्रसिद्ध थे।
- ऋग्वेद में कपास या रुई का उल्लेख नहीं प्राप्त होता। तसर शब्द का प्रयोग करघे के लिए हुआ है । वस्त्रों के ऊपर कढ़ाई का काम करने वाली औरतों को पेशस्कारी कहा गया
- लोग धातुओं को गलाने, उन्हें पीटकर विविध वस्तुएँ बनाने का कार्य जानते थे।
- वैद्य (भिषक), नर्तक–नर्तकी, नाई (वातृ) इत्यादि अन्य सामाजिक वर्ग थे।
व्यापार
- ऋग्वेदिक काल में समुद्र का स्पष्ट उल्लेख न होने से विदेशी व्यापार का पता नहीं चलता है।
- व्यापार वस्तुत: वस्तु विनिमय पर आधारित था। इसके अलावा गाय प्रमुख माध्यम हुआ करती थी।
- इस काल में व्यापारियों के रूप में पणी नामक अनार्यो का उल्लेख मिलता है जो आर्यों की गायो को चुरा लेते थे।
- इस काल में नियमित सिक्को का प्रचलन नहीं हुआ था फिर भी निस्क (एक प्रकार का स्वर्ण ढेर) सामान्यत जो गले में पहना जाना वाला आभूषण था, का प्रयोग संभवतः लेन देन में होता था।
- इसके अलावा मन यह भी स्वर्ण सिक्को का ढेर था।
- पणि अत्यधिक ब्याज पर ऋण देते थे। उन्हें वेकनाट (सूदखोर) कहा गया है।
- व्यापार की मुख्य वस्तुएँ कपड़े, तोशक, चादर और चमड़े की वस्तुएँ थीं।
- स्थल यातायात के प्रमुख साधन रथ और गाड़ी थे। रथ घोड़ों से और गाड़ी बैलों से खींचे जाते थे।
- अग्नि को पथ का निर्माता (पथिकृत) कहा गया है। जंगल, जंगली जानवर और डाकुओं (तस्कर स्तेन) से भरे रहते थे।
- ऋग्वेद में एक स्थान पर भुज्यु की समुद्री यात्रा का वर्णन है जिसमें मार्ग में जलयान के नष्ट हो जाने पर आत्मरक्षा के लिए अश्विनी कुमारों से प्रार्थना की। अश्विनी कुमारों ने उसकी रक्षा के लिए सौ पतवारों वाला एक जहाज भेजा।
- विनिमय बाजार पर आधारित मुद्रा व्यवस्था का प्रचलन अभी नहीं हुआ था।
मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
| गविष्टि / गवेषा / गोषु | युद्ध |
| गवयुति / गोचर्मन | दूरी का माप |
| गोजित / गोमत | समृद्ध व्यक्ति |
| दुहितृ | बेटी |
| गोधूलि / संगव | संध्या / प्रातःकाल |
| उर्वरजीत | इन्द्र की उपाधि |
| निष्क | स्वर्ण वस्तु / हार |
| बलि | कर या उपहार |
सामाजिक जीवन
- ऋग्वेदिक समाज पितृसतात्मक था।
- परिवार – संयुक्त परिवार था।
- संबधो के लिए नप्तृ शब्द का प्रयोग मिलता है।
- वर्ण व्यवस्था में चार वर्णों का उल्लेख मिलता है जो जन्म पर आधारित न होकर कर्म पर आधारित था।
स्त्रियों की दशा
- यद्यपि ऋग्वेदिक समाज पुरुष प्रधान था। फिर भी स्त्रियों की दशा अच्छी थी। स्त्रिया सभा एवं विदथ में भाग लेती थी।
- पुनर्विवाह, नियोग प्रथा, बहुपतिविवाह का प्रचलन।
- नियोग प्रथा से उत्पन्न संतान को क्षेत्रज कहा जाता।
- इसके अलावा जो कन्याए जो जीवन भर कुँवारी रहती थी उन्हें अमाजू कहा जाता था।
- कन्याओं का उपनयन संस्कार भी होता था और वे पुरुषो की तरह शिक्षा प्राप्त करती थी।
- ऋग्वेदिक काल लोपामुद्रा, सिकता, अपाला, घोषा, विश्वारा आदि विदुषी स्त्रियों ने ऋग्वेद की रिचाओ की (8 वे मंडल) रचना की।
नोट – बाल विवाह, दहेज़ प्रथा, पर्दा प्रथा,सती प्रथा का उल्लेख नहीं है। सम्पति का अधिकार नहीं।
विवाह
- ऋग्वेदिक काल में विवाह दो प्रकार के होते थे –
- अनुलोम विवाह – इसमें पुरुष उच्च वर्ण का तथा कन्या निम्न वर्ण की होती थी।
- प्रतिलोम विवाह – इसमें पुरुष निम्न वर्ण का तथा कन्या उच्च वर्ण की होती थी।
खान पान
- आर्य मांसाहारी व शाकाहारी दोनों थे। भोजन में दूध, दही, घी आदि का महत्त्व था।
- यव (जौ) के सतु को क्रमशः दूध तथा दही में डालकर क्षीरपकोदन नामक भोजन बनाते थे।
- माँसाहारी भोजन में मुख्यतः भेड़, बकरी मांस का प्रयोग करते थे।
नोट – ऋग्वेद में चावल, नमक व मछली का उल्लेख नहीं है।
वस्त्र
- तीन प्रकार के
- नीवी – शरीर के निचले हिस्से में पहना जाता था।
- वास – शरीर के मध्य भाग
- अधिभाग – शरीर को ऊपर से ढकने वाला।
- इस काल में दास प्रथा विद्यमान था। दासो को केवल घरेलु कार्यो में लगाया जाता था। कृषि कार्यो में नहीं।
धार्मिक जीवन
- ऋग्वेदिक आर्यों का प्रारंभिक जीवन कबीलाई था अत उनके देवी देवता भी प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक थे।
- इस युग के धार्मिक जीवन का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जिसमे देवताओं की स्तुति के 10562 मंत्रो का संग्रह है।
- इस युग में धार्मिक जीवन सादा व सरल था अर्थात धार्मिक जीवन में आडम्बर और कर्म कांडो का अभाव था। धर्म के नाम यज्ञ व हवन किये जाते थे जिनमे दी जाने वाली आहुति को हवि कहा जाता था।
- ऋग्वेदिक काल में देवताओं की तुलना में देवियों का कम महत्व था।
- सात प्रकार के पुरोहित
- होतृ
- अध्वर्यु
- अग्नीध
- मैत्रावरूण
- पोत्र
- नेष्ट्री
- ब्राह्मण
- यास्क ने ऋग्वेदिक देवताओं की संख्या 33 बताई है तथा उन्हें आकाश, अन्तरिक्ष, पृथ्वी के देवता के रूप में विभाजित किया
- स्वर्ग के देवता–द्यौस, वरुण, मित्र, सूर्य, सविता, पूषन, विष्णु, अदिति, उषा तथा अश्विन्।।
- अन्तरिक्ष के देवता–इंद्र, रूद्र, मरुत्, वात्, पर्जन्य।
- पृथ्वी के या पार्थिव देवता–पृथ्वी, अग्नि, सोम, बृहस्पति, सरस्वती आदि ।
- इंद्र
- ऋग्वेद का सर्वप्रमुख देवता इन्द्र है। इसे पुरन्दर, देवराज, कहा गया है। यह बादल, वर्षा तथा युद्ध का देवता था।
- शस्त्र – वज्र (दधिची ऋषि की अस्थियों से निर्मित)
- ऋग्वेद में इन्द्र की स्तुति में 250 सूक्त हैं।
- निवास स्थान – सहस्त्र खम्भों का महल
- अग्नि
- दूसरा महत्व का देवता अग्नि है।
- यह मानव एवं देवताओं के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता था।
- उल्लेख – 200 बार,
- निवास स्थान – सहस्त्र खम्भों का महल
- वरुण
- तीसरा प्रमुख देवता वरुण था।
- यह जलनिधि का देवता माना जाता था।
- इसे ऋतस्य गोपा अर्थात् ऋत् का रक्षक कहा गया है।
- इसे प्राकृतिक घटनाओं का संयोजक माना गया है तथा यह स्वीकार किया गया है कि विश्व में सब कुछ उसी की इच्छा से होता है।
- ऋग्वेद में प्रकृति का दैवियकरण किया तथा कालांतर में देवताओं का मानवीकरण किया गया। पुरुष देवता व स्त्री देवी की कल्पना दिखाई देती है।
- इस युग की महत्त्वपूर्ण प्रवृति बहुदेववाद की संकल्पना थी।
- सोम वनस्पति का देवता था। ऋग्वेद का नौवाँ मण्डल (पूरा) इसके सम्बन्धित है।
- मारुत तूफान का प्रतिनिधित्व करते थे।
- सूर्य की स्तुति प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में सावित्री देवता के रूप में की गयी है।
- पूषन, मार्गों, चरवाहों और भूले भटके पशुओं का अभिभावक था।
- रूद्र एक सदाचार–दुराचार–निरपेक्ष देवता था।
- उषा और अदिति नामक देवियाँ उषाकाल का प्रतिनिधित्व करती थीं।
- पार्जन्य – बादलो का देवता
- अश्विनी – चिकित्सक
- प्रकृति की बहुदेवीय शक्तियों की उपासना के होते हुए भी ईश्वर की ‘परम एकता’ पर बल दिया गया है। ऋग्वेद में कहा गया है ‘एकम् सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ (सत्य ईश्वर एक ही है, ऋषियों ने उसका अलग अलग रूपों में वर्णन किया है) उपनिषदों में उसे परम ब्रह्म की संज्ञा दी है। आत्मा उसी परमब्रह्म का अंश है।
- मूर्तिपूजा और मंदिर का उल्लेख नहीं।
- देव आराधना स्तुतिपाठ और यज्ञाहुति से। देवताओं की आराधना संतति, पशु, धन, अन्न, स्वास्थ्य के लिए, न कि मोक्ष के लिए।
- यज्ञ में दूध, अन्न, घी, माँस और सोम का प्रयोग।
- यज्ञ सरल और सामूहिक।
- सन्यास का स्थान नहीं; प्रवृत्तिमार्गी जीवन जीते थे।
- दर्शन का प्रारम्भ ऋग्वेद के दसवें मण्डल से होता है।
- ऋग्वैदिक ऋषि आत्मवादी था। वह आत्मा में विश्वास करता था। पुनर्जन्म की भावना अभी तक विकसित नहीं हुई थी।
उत्तर वैदिक काल
स्त्रोत
- उत्तरवैदिक कालीन सभ्यता की जानकारी के स्रोत तीन वैदिक संहिताएँ—यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद
- ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक ग्रन्थ एवं उपनिषद ग्रन्थ हैं।
- यहाँ यह ध्यातव्य है कि वेदांग वैदिक साहित्य के अन्तर्गत परिगणित नहीं होते हैं।
उत्तरवैदिक आर्यों का भौगोलिक विस्तार
- उत्तरवैदिक काल में आर्यों की भौगोलिक सीमा का विस्तार गंगा के पूर्व में हुआ।
- शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, विदेथ माधव ने गंडक (सदानीरा) नदी तक आर्य सभ्यता का विस्तार किया।
- सप्तसैंधव प्रदेश से आगे बढ़ते हुए आर्यों ने सम्पूर्ण गंगा घाटी पर प्रभुत्व जमा लिया। इस प्रक्रिया में कुरु एवं पांचाल ने अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त की।
- प्रमुख राज्य: कुरु, पांचाल, कोशल, काशी, और विदेह।
- कुरु: राजधानी – आसन्दीवत; क्षेत्र – कुरुक्षेत्र, दिल्ली, मेरठ। कुरु जाति कई छोटी-छोटी जातियों के मिलने से बनी थी, जिनमें पुरुओं और भरतों के भी दल थे।
- पांचाल: राजधानी – कांपिल्य; क्षेत्र – बरेली, बदायूं, फर्रुखाबाद। यह जाति कृषि जाति से निकली थी जिसका सुंजयों और तुर्वशों का सम्बन्ध था।
- महत्वपूर्ण शासक:
- कुरु: परीक्षित (अथर्ववेद में वर्णित), जनमेजय।
- पांचाल: प्रवाहण जैवालि, ऋषि आरुणि, श्वेतकेतु।
- आर्य सभ्यता का विस्तार उत्तरवैदिक काल में विन्ध्य में दक्षिण में नहीं हो पाया था।
उत्तर वैदिक राजनीतिक जीवन (1000–600 ई.पू.)
जनपदों का निर्माण
- ऋग्वैदिक “जन” अब स्थायी निवास हेतु जनपदों में परिवर्तित हुए।
- लोहे के उपयोग से कृषि व स्थायित्व बढ़ा।
- अब जनों की पहचान स्थान से हुई — इन्हें जनपद कहा गया।
| जनपद | निर्माण | राजधानी | प्रमुख राजा / तथ्य |
| कुरु | पुरू + भरत | आसंदीवत → कौशांबी (निचक्षु ने बदली) | बल्हिक, परीक्षित, जन्मेजय (सर्पयज्ञ तक्षशिला में) |
| पांचाल | तुर्वश + क्रिवि | कांपिल्य | प्रवाहण जाबालि, अरुणि, श्वेतकेतु, शोण सात्रासाह |
| केकय | — | — | अश्वपति (वैश्वानर विद्या का ज्ञाता) |
विट्जेल:
- परीक्षित ने वैदिक ग्रंथों का संकलन कराया।
- कुरुओं का उदय भारत के प्रथम राज्य का प्रतिनिधित्व करता है।
- छान्दोग्य उपनिषद: कुरु प्रदेश में न अकाल पड़ता था न ओले गिरते थे।
- कुरु–पांचाल = वैदिक संस्कृति का सर्वोच्च केंद्र।
राजा की स्थिति
- ऋग्वैदिक “जन प्रमुख” अब प्रदेश का शासक राजा बना।
- राजा युद्ध का नेता, धर्म रक्षक, राष्ट्र का पालनहार।
- शासन राजतंत्रात्मक, पर निरंकुश नहीं।
- सभा व समिति नियंत्रण संस्थाएँ।
- अथर्ववेद: सभा–समिति प्रजापति की दो पुत्रियाँ; सभा = नरिष्ठा (अनुल्लंघनीय)।
- अथर्ववेद: राजा निर्वाचित भी हो सकता था (निर्वाचक = वरुण)।
- शतपथ ब्राह्मण: श्रृंजयों ने राजा दुष्टऋतु पौंसायन को हटाया।
- ऐतरेय ब्राह्मण: राजा की दैवी उत्पत्ति – देवताओं ने इंद्र को राजा बनाया।
राजाधिराज उपाधियाँ
- राजा अब “राजाधिराज, सम्राट, स्वराट, विराट, भोज” आदि उपाधियाँ धारण करने लगा।
| दिशा | राज्य | उपाधि | यज्ञ |
| पूर्व | साम्राज्य | सम्राट | वाजपेय यज्ञ |
| पश्चिम | स्वराज्य | स्वराट | अश्वमेध यज्ञ |
| उत्तर | वैराज्य | विराट | पुरुषमेध यज्ञ |
| दक्षिण | भोज्य | भोज / सर्वराट | सर्वमेध यज्ञ |
| मध्यदेश | राज्य | राजा | राजसूय यज्ञ |
- वैराज्य – जहाँ राजा नहीं, जनता का स्वशासन।
- ऐतरेय ब्राह्मण: “समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का शासक = एकराट”।
दार्शनिक राजा (शतपथ व छान्दोग्य उपनिषद अनुसार)
| राज्य | राजा | प्रसिद्धि |
| विदेह | जनक | दार्शनिक / उपनिषद ज्ञान |
| केकय | अश्वपति | वैश्वानर विद्या |
| काशी | अजातशत्रु | बृहदारण्यक उपनिषद संवाद |
| पांचाल | प्रवाहण जाबालि | आत्मज्ञान प्रचारक |
- अथर्ववेद: – परीक्षित = मृत्यु लोक का देवता/अर्धदेवता।
राज्याभिषेक परंपरा
- पहली बार राज्याभिषेक परंपरा विकसित।
- तैत्तिरीय व शतपथ ब्राह्मण: राज्याभिषेक शपथ का वर्णन।
- ऐतरेय ब्राह्मण: पूर्ण विवरण — राज्याभिषेक पर व्याघ्रचर्म पहनाया जाता था।
कर प्रणाली
- नियमित कर व्यवस्था प्रारंभ।
- राजा को कहा गया बलिहर (बलि लेने वाला)।
- अथर्ववेद: राजा की आय = प्रजा की आय का 1/16 भाग।
- शतपथ ब्राह्मण: वैश्य को बलि देना आवश्यक क्योंकि वह क्षत्रिय के अधीन।
- “विशामत्ता” = प्रजा का उपभोग करने वाला।
रत्निन (राज दरबारी अधिकारी)
- कुल 12 प्रमुख रत्निन – शतपथ ब्राह्मण व यजुर्वेद में उल्लेख।
| क्र. | पदाधिकारी | कार्य |
| 1 | राजा | राज्य प्रमुख |
| 2 | पुरोहित | धार्मिक सलाहकार |
| 3 | सेनानी | सैन्य प्रमुख |
| 4 | महिषी | रानी/पटरानी |
| 5 | सूत | सारथी / रथसेनानायक |
| 6 | ग्रामणी | गाँव प्रमुख |
| 7 | क्षता | प्रतिहारी / महल रक्षक |
| 8 | कोशाध्यक्ष | खजाना प्रमुख |
| 9 | भागदूध | वित्त मंत्री |
| 10 | अक्षवाप | लेखा / गणना अधिकारी |
| 11 | पालागल | विदूषक / दूत |
| 12 | युवराज |
- अन्य उल्लेखित – तक्षण, रथकार, स्थापति, शतपति (स्थानीय अधिकारी)।
- स्थपति = न्यायाधीश / 100 ग्रामों का अधिकारी।
- पुरोहित = सबसे प्रभावशाली पद।
सेना
- स्थायी सेना नहीं, युद्ध के समय जन सहयोग से सेना गठित।
प्रमुख राजकीय यज्ञ
| यज्ञ | उद्देश्य / विशेषता | स्रोत |
| राजसूय यज्ञ | राज्याभिषेक हेतु; रत्निनों की सहभागिता; सोमपान व दिव्य अधिकार | शतपथ, शुक्ल यजुर्वेद |
| अश्वमेध यज्ञ | क्षेत्र विस्तार का प्रतीक; घोड़ा छोड़ा जाता; सर्वाधिक प्रसिद्ध | शतपथ ब्राह्मण; एहोल अभिलेख; अंतिम – जयपुर के सवाई जयसिंह द्वितीय |
| वाजपेय यज्ञ | सम्राट की उपाधि हेतु; रथदौड़ का आयोजन; पृथ्वी माता की पूजा | ऐतरेय, शतपथ |
| अग्निष्टोम यज्ञ | एक दिन का; अग्नि को पशुबलि; याज्ञिक युगल सात्विक जीवन | यजुर्वेद |
| पुरुषमेध यज्ञ | अग्नि को मानव बलि; 25 यूपों का प्रयोग | यजुर्वेद |
| शूलगव यज्ञ | रुद्र/शिव को प्रसन्न करने हेतु; प्रथम – अश्वत्थामा द्वारा | ब्राह्मण ग्रंथ |
उत्तर वैदिक सामाजिक स्थिति (1000–600 ई.पू.)
वर्ण व्यवस्था
- कर्म आधारित से जन्म आधारित हो गई।
- ऐतरेय ब्राह्मण में चार वर्णों के कर्तव्य बताए गए।
- वैश्य – अन्यस्य बलिकृत (कर देने वाला), अन्यस्याद्य (दूसरों द्वारा भोज्य)।
- शूद्र – अन्यस्य प्रेष्य (सेवक), कामोत्थाप्य (उखाड़ फेंकने योग्य), यथाकामवध्य (मारने योग्य)।
- उपनयन संस्कार केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के लिए (द्विज)।
- लौह उपयोग से नया शक्तिशाली क्षत्रिय वर्ग उभरा।
- गौत्र प्रथा प्रचलित हुई (अथर्ववेद में उल्लेख)।
- अस्पृश्यता नहीं, परंतु सामाजिक भेद उभरा।
- रथकार ऊँचे शिल्पकार माने गए – उन्हें उपनयन का अधिकार।
- शूद्र = श्रम का मूर्त रूप (शतपथ ब्राह्मण)।
- विश्वामित्र के पुत्रों का श्राप – आन्ध, पुंड्र, शबर, पुलिंद आदि – सामाजिक समायोजन का प्रयास।
आश्रम व्यवस्था
- छान्दोग्य उपनिषद – 3 आश्रम: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ।
- जाबालोपनिषद – 4 आश्रम: + सन्यास।
- गृहस्थ आश्रम सर्वश्रेष्ठ, तीन ऋणों से मुक्ति (ऋषि, देव, पितृ)।
चार पुरुषार्थ
- धर्म
- अर्थ
- काम
- मोक्ष
पहले तीन को “त्रिवर्ग” कहा गया।
स्त्रियों की स्थिति
- स्थिति गिरी, पर पूर्ण पतन नहीं।
- बाल विवाह नहीं, बहुविवाह/विधवा विवाह प्रचलित।
- तलाक का उल्लेख (अथर्ववेद)।
- महिलाओं का उपनयन बंद, सभा/समिति से वर्जित।
- शतपथ ब्राह्मण – स्त्रियाँ यज्ञ व अध्ययन कर सकती थीं।
- अथर्ववेद – पुत्री जन्म पर खिन्नता।
- विदुषी स्त्रियाँ – गार्गी, मैत्रेयी, जाबाल, कात्यायनी।
- ‘पुर्नभू’ स्त्री, ‘पौनर्भव’ पुत्र – पुनर्विवाह से।
- सती प्रथा का उल्लेख, पर प्रचलन नहीं।
- वृहदारण्यक उपनिषद – गार्गी व मैत्रेयी के वाद-विवाद।
- प्रतिलोम विवाह अस्वीकार्य।
पंच महायज्ञ
- ब्रह्मयज्ञ – अध्ययन-अध्यापन
- देवयज्ञ – हवन
- पितृयज्ञ – तर्पण
- मनुष्ययज्ञ – अतिथि सत्कार
- भूतयज्ञ – जीवों के प्रति कृतज्ञता
तीन ऋण
- ऋषि ऋण – ज्ञान/साहित्य
- देव ऋण – प्राकृतिक शक्तियाँ
- पितृ ऋण – पूर्वज
सोलह संस्कार
- गर्भाधान → अन्त्येष्टि तक
मुख्य – नामकरण, अन्नप्राशन, उपनयन, विवाह, अन्त्येष्टि
- उपनयन केवल द्विजों के लिए (शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख)।
विवाह व्यवस्था
- ऐतरेय ब्राह्मण – पुरुष अनेक पत्नियाँ रख सकता है।
- मैत्रायणी संहिता – मनु की 10 पत्नियाँ।
- आश्वलायन गृहसूत्र – 8 विवाह प्रकार:
- ब्रह्म (श्रेष्ठ)
- देव
- आर्ष
- प्रजापत्य
- आसुर (शुल्क विवाह)
- गन्धर्व (प्रेम विवाह)
- राक्षस (बलपूर्वक, क्षात्र विवाह)
- पैशाच (निकृष्टतम्)
प्रथम चार धर्मानुकूल माने गए।
शिक्षा
- छात्र: उपकुर्वाण (बाद में गृहस्थ)
- नैष्ठिक/अन्तेवासी (जीवनभर ब्रह्मचारी)
- छात्राएँ: सद्योदहा (शिक्षा बाद विवाह), ब्रह्मवादिनी (जीवनभर ब्रह्मचारिणी)।
वस्त्र, भोजन, मनोरंजन
- कपास का उल्लेख नहीं।
- करघा – तसर, ताना = ‘ओतु’, बाना = ‘तन्तु’।
- जुआ, पासा, मल्लयुद्ध, घुड़दौड़ लोकप्रिय।
- शैलुष, वंशनर्तिन – नृत्य/अभिनय से जुड़े।
- अपूप – घी-मिश्रित चावल व्यंजन।
- ओदन, करम्भ, यवागु, सुरा – सामान्य आहार/पेय।
- ‘प्रकाश’ – धातु आभूषण या दर्पण।
उत्तर वैदिक आर्थिक जीवन
कृषि एवं पशुपालन
- मुख्य व्यवसाय → कृषि
- हल = लांगल / सीर (तैत्तिरीय संहिता)
- काठक संहिता – 24 बैलों वाले हल
- कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता) – 6/12 बैलों वाले भारी हल (लोहे के)
- शतपथ ब्राह्मण – लोहे को कृषि से जोड़ा; जुताई, बुआई, कटाई, मड़ाई चारों क्रियाओं का उल्लेख
- मुख्य फसलें: जौ → गेहूँ, धान
- धान (ब्रीहि/तंदुल) – प्रथम उल्लेख यजुर्वेद में; साक्ष्य हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा
- अथर्ववेद:
- पृथुवैन्य = प्रथम कृषक, जिसने मनु को हल चलाना सिखाया
- नहरों का पहला उल्लेख, गन्ने (इक्षु) का भी उल्लेख
- पशु-खाद का महत्व, कीट नियंत्रण हेतु मंत्र
- तैत्तिरीय उपनिषद: अन्न को ब्रह्म कहा गया
- भूमि की निजी संपत्ति की अवधारणा नहीं
- भूमिदान: ऐतरेय ब्राह्मण में प्रथम उल्लेख
- लोहे = श्याम अयस्; कृषि विस्तार में क्रांति
- नमक का उल्लेख: अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण
पशुधन
- पशु = चल संपत्ति का प्रमुख स्रोत
- दान में गाय, अश्व, रथ, स्वर्ण, दासी आदि
महिला कारीगर
| कार्य | वैदिक शब्द |
| बुनाई | व्यित्रि / शिरि |
| कसीदाकारी | पेशस्करी |
| बांस कार्य | विदलकरी |
| रंगाई | राजयितृ |
| अनाज पीसना | उपलप्रक्षिणी |
उद्योग एवं व्यापार
- पुरुषमेध सूक्त: अनेक शिल्पों का वर्णन
- वाजसनेयी संहिता: 18 प्रकार के कारीगर, जलपेत (नाविक)
- श्रेणी प्रमुख = श्रेष्ठि, उल्लेख – ऐतरेय ब्राह्मण, वृहदारण्यक उपनिषद
- वैश्य = अन्यस्य बलिकृत (शतपथ ब्राह्मण)
- महाजनी परंपरा – शतपथ ब्राह्मण में प्रथम उल्लेख; सूदखोर = कुसीदिन
- ऋण = कुसीद (तैत्तिरीय संहिता)
- धातुएँ: लोहा, ताँबा, सोना, चाँदी, टिन, सीसा
- मुद्राएँ/माप:
- निष्क (स्वर्ण) = 320 रत्ती
- शतमान (चाँदी)
- कृष्णल = 1 रत्ती (1.8 ग्राम)
- रत्तिका/गुंजा = तौल इकाई
- व्यापार माध्यम: वस्तु-विनिमय, गाय, निष्क
- धीवान्: मछुआरा; बाद में बढ़ई
- नगर शब्द – तैत्तिरीय आरण्यक में प्रथम
मृद्भाण्ड (Pottery)
मुख्य चार प्रकार:
- गैरिक मृद्भाण्ड (OCP) – सिन्धु सभ्यता संबंधित
- कृष्ण लोहित मृद्भाण्ड (BRW) – ताम्रपाषाणिक/ऋग्वैदिक
- अंदर से काले, बाहर से लाल (ऑक्सीजन की कमी से)
- चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW) – उत्तर वैदिक काल की पहचान
- उत्तरी काली चमकीली मृद्भाण्ड (NBPW) – मौर्य कालीन
- नील लोहित = कृष्ण एवं लाल भाण्ड
- चित्रित घूसर मृद्भाण्ड स्थल: भगवानपुरा, कुरुक्षेत्र
- सबसे बड़ा लौह पुंज: अतरंजीखेड़ा
- PGW संस्कृति = उत्तर वैदिक संस्कृति की भौतिक-सांस्कृतिक समानता
उत्तर वैदिक धार्मिक जीवन
धर्म एवं यज्ञ परंपरा
- इस काल में कर्मकांडों व यज्ञों में वृद्धि हुई; अधिक पुरोहितों की आवश्यकता पड़ी।
- इन्द्र व अग्नि का महत्व घटा, जबकि प्रजापति (ब्रह्मा) सृष्टि-निर्माता माने गए।
- रुद्र → शिव एवं विष्णु → सृष्टि के संरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
- उपनिषदों में यज्ञों की प्रतीकात्मक व्याख्या की गई — ज्ञान को अनुष्ठान से श्रेष्ठ माना गया।
उपनिषदों की विशेषताएँ
- काल: लगभग 600 ई.पू., बहुदेववाद और कर्मकांडों की प्रतिक्रिया में रचना।
- केंद्र बिंदु – ज्ञान, आत्मा और ब्रह्म की एकता (अद्वैतवाद)।
- ब्रह्म = परम सत्य, आत्मा = ब्रह्म का व्यक्तिगत रूप।
- ईश्वर सर्वव्यापक – “सर्वेश्वरवाद” का विचार।
वैदिक चिंतन का विकास:
प्रकृतिवाद → बहुदेववाद → एकाधिदेववाद → एकेश्वरवाद → अद्वैतवाद (सत्तावाद)
प्रमुख दार्शनिक सूक्त
- नासदीय सूक्त (ऋग्वेद) – सृष्टि से पूर्व न सत्, न असत्; ‘एक’ ही था → अद्वैतवाद / सर्वेश्वरवाद का आरंभ।
- पुरुष सूक्त – ईश्वर सृष्टि में अंतर्व्याप्त है → निमित्तोपादानेश्वरवाद।
मुख्य उपनिषद एवं उनके तत्त्व
1. छान्दोग्य उपनिषद
- सबसे प्राचीन उपनिषद।
- महावाक्य: “तत्त्वमसि” – “तुम वही हो।”
- एकमेव अद्वितीयं ब्रह्म, सर्वं खल्विदं ब्रह्म का उल्लेख।
- उद्दालक–श्वेतकेतु संवाद – आत्मा एवं ब्रह्म की एकता।
- धर्म के तीन स्कंध:
- यज्ञ/अध्ययन/दान
- तप
- ब्रह्मचर्य
- सत्यकाम जाबाल कथा, इतिहास-पुराण = पंचम वेद।
2. वृहदारण्यक उपनिषद
- सबसे बड़ा उपनिषद, प्रवक्ता – महर्षि याज्ञवल्क्य।
- महावाक्य: “अहं ब्रह्मास्मि” – “मैं ही ब्रह्म हूं।”
- याज्ञवल्क्य–गार्गी व याज्ञवल्क्य–मैत्रेयी संवाद प्रसिद्ध।
- पुनर्जन्म, आत्मा की अमरता, समानता का सिद्धांत।
- “असतो मा सद्गमय…” – अंधकार से प्रकाश की ओर।
- “सत्यमेव जयते” – भारत का राष्ट्रीय वाक्य यहीं से।
- यज्ञ की ज्ञानात्मक व्याख्या दी गई – विशेषकर अश्वमेध यज्ञ की।
3. मुण्डक उपनिषद
- यज्ञों की आलोचना – “यज्ञ एक टूटी हुई नौका है।”
- ज्ञान-मार्ग को श्रेष्ठ बताया गया।
4. ईश उपनिषद
- निष्काम कर्म सिद्धांत का प्रथम प्रतिपादन।
- महावाक्य: “सोऽहम्” – “मैं वही हूं।”
5. कठ उपनिषद
- यम–नचिकेता संवाद।
- महावाक्य: “एतद् वै तत्” – “यह वही है।”
- स्वामी विवेकानंद का वाक्य: “उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” – यहीं से।
6. श्वेताश्वतर उपनिषद
- “श्वेत अश्व” अर्थ; रुद्र/शिव को समर्पित।
- माया शब्द का प्रथम प्रयोग।
- योग व यौगिक क्रियाओं से ब्रह्म की प्राप्ति पर बल।
- नवधा भक्ति का उल्लेख।
7. माण्डूक्य उपनिषद
- सबसे छोटा उपनिषद।
- महावाक्य: “अयं आत्मा ब्रह्म” – आत्मा ही ब्रह्म है।
8. तैत्तिरीय उपनिषद
- महावाक्य: “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”
- “अतिथि देवो भवः”, “मातृ देवो भवः” का उल्लेख।
- “अन्नं ब्रह्म” – अन्न उत्पादन का महत्त्व।
9. मैत्रायणी उपनिषद
- त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रथम उल्लेख।
- निराशावाद के तत्व भी दिखाई देते हैं।
देवताओं का वर्गीकरण
| प्रकार | अर्थ |
| दिव्य | स्वर्गीय देवता |
| पार्थिव | पृथ्वी के देवता |
| गोजात | गौ संबंधी देवता |
| आप्य | जल के देवता |

