विश्व में प्रदूषण: वायु, जल, ध्वनि और भूमि विश्व भूगोल का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो पर्यावरण और मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। वायु, जल, ध्वनि, भूमि तथा रेडियोधर्मी प्रदूषण के विभिन्न स्रोत, प्रकार और उनके दुष्प्रभावों का अध्ययन इसमें शामिल है। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण के उपायों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को समझाया जाता है।
प्रदूषण
प्रदूषण का अर्थ एवं परिभाषा
- प्रदूषण शब्द लैटिन भाषा के शब्द Pollutus से लिया गया है, जिसका अर्थ है दूषित करना।
- E.P. ओडम के अनुसार: वायु, जल और मृदा के भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक गुणों में होने वाला अवांछनीय परिवर्तन, जो मानव तथा सम्पूर्ण पर्यावरण के प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तत्वों को हानि पहुँचाता है, प्रदूषण कहलाता है।
- पर्यावरण के घटकों की मात्रा या गुणवत्ता में होने वाले हानिकारक एवं अवांछनीय परिवर्तन को प्रदूषण कहा जाता है।
- प्रदूषक : वे अवांछनीय पदार्थ जो पर्यावरण के किसी भी मूल तत्व को परिवर्तित या प्रदूषित करते हैं, प्रदूषक कहलाते हैं।


प्रदूषकों की प्रकृति के आधार पर प्रदूषण के प्रकार
- (i) वायु प्रदूषण
- (ii) जल प्रदूषण
- (iii) ध्वनि प्रदूषण
- (iv) मृदा प्रदूषण (भूमि प्रदूषण)
- (v) वाहन प्रदूषण
- (vi) रेडियोधर्मी प्रदूषण
- (vii) तापीय प्रदूषण
- (viii) औद्योगिक प्रदूषण
- (ix) कचरे से होने वाला प्रदूषण
- (x) समुद्री प्रदूषण
- (xi) घरेलू अपशिष्ट से होने वाला प्रदूषण
- (xii) अन्य कारणों से होने वाला प्रदूषण
वायु प्रदूषण
वायुमंडल में उपस्थित सभी गैसें एक निश्चित अनुपात में पाई जाती हैं, जैसे नाइट्रोजन 78.08 प्रतिशत, ऑक्सीजन 20.94 प्रतिशत, आर्गन 0.93 प्रतिशत, कार्बन डाइऑक्साइड 0.04 प्रतिशत तथा अन्य गैसें 0.02 प्रतिशत। इस अनुपात में थोड़ा सा भी परिवर्तन पूरे वायुमंडलीय तंत्र को प्रभावित करता है।


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प्रदूषक गैस |
विशेषता एवं प्रभाव |
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कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) |
यह मुख्यतः वाहनों के धुएँ में पाई जाती है।CO और CO₂ सिगरेट के धुएँ में भी प्रमुख प्रदूषक गैसें हैं।हाइड्रोकार्बनों के अपूर्ण दहन से CO गैस बनती है, जबकि पूर्ण दहन से CO₂ बनती है।कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) को ‘मूक आत्मघाती गैस’ (Silent Suicide Gas) कहा जाता है, क्योंकि यह रंगहीन, गंधहीन एवं स्वादहीन होती है और नींद की अवस्था में भी बिना किसी चेतावनी के मृत्यु का कारण बन सकती है।CO, हीमोग्लोबिन (Hb) के साथ मिलकर कार्बोक्सी हीमोग्लोबिन बनाती है, जो O₂ के परिवहन में बाधा उत्पन्न करती है और मृत्यु का कारण बन सकती है।बंद कमरे में जलती हुई अंगीठी के साथ सोने पर इसका खतरा बढ़ जाता है। |
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कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) |
यह गैस श्वसन प्रक्रिया का उत्पाद है।प्रकाश संश्लेषण में एक आवश्यक अभिकारक के रूप में कार्य करती है।ठोस CO₂ – शुष्क बर्फ [अग्निशामकों द्वारा उपयोग किया जाता है]।CO₂ आग बुझाने वाली गैस के रूप में उपयोगी है।रात में बड़े पेड़ों के नीचे सोने से CO₂ के कारण दम घुट सकता है।Hb + CO₂ : कार्बेमिनो हीमोग्लोबिन बनाता है। |
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मीथेन (CH₄) |
दलदली गैस (मार्श गैस)।गहरे कुओं, नालियों, सीवर लाइनों, गहरी खानों, धान के खेतों, गोबर तथा जुगाली करने वाले पशुओं के शरीर में पाई जाती है।मीथेन बायोगैस (गोबर गैस), CNG तथा LNG का मुख्य घटक है। |
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सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) |
ज्वालामुखी एवं लावा से निकलने वाली गैसें।सबसे विषैली वायु प्रदूषकों में से एक।कारखानों से निकलने वाली गैस – SO₂।SO₂ वर्षा जल के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल बनाता है, जिससे अम्ल वर्षा होती है। |
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क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFC) |
यह गैस ए.सी., रेफ्रिजरेटर तथा जेट इंजन के धुएं से निकलती है।CFC समताप मंडल में ओजोन परत को क्षीण करते हैं। |
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नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) |
लाफिंग गैस।यह गैस वैश्विक ऊष्मीकरण को बढ़ाने में योगदान देती है। |
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नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) |
औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली विषैली गैस।यह जल के साथ अभिक्रिया कर नाइट्रिक अम्ल (HNO₃) बनाती है, जिससे अम्ल वर्षा होती है।रासायनिक अभिक्रिया:NO₂ + H₂O → HNO₃ |
निलंबित कणिकीय पदार्थ (Suspended Particulate Matter):
- वे कण जो 1000 नैनोमीटर से बड़े होते हैं और वायु में निलंबित रहते हैं।
- PM 10: 10 माइक्रोमीटर से छोटे कण।
- PM 2.5: 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण।
- SAFAR-AIR (System for Air Quality Weather Forecasting and Research): यह 2015 में लॉन्च किया गया एक मोबाइल ऐप है, जो किसी क्षेत्र की वायु गुणवत्ता को मापता है।
IQAir World Air Quality Report 2024
- केवल 7 देश ही WHO के वार्षिक औसत PM2.5 (≤ 5 µg/m³) मानदंड पर खरे उतरे: ऑस्ट्रेलिया, बाहामास, बारबाडोस, एस्टोनिया, ग्रेनेडा, आइसलैंड और न्यूज़ीलैंड
- सबसे वायु प्रदूषित पाँच देश
- चाड,
- बांग्लादेश,
- पाकिस्तान,
- कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और
- भारत
- बर्नीहाट (मेघालय) दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है, जबकि दिल्ली सबसे प्रदूषित राजधानी बनी हुई है।
वायु प्रदूषण से उत्पन्न समस्याएँ:
- स्मोकिंग इम्फीसेमा: यह रोग अत्यधिक सिगरेट पीने से होता है, जिससे फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है।
- न्यूमोकोनियोसिस: धूल कणों के संपर्क में आने से होने वाला रोग।
- ब्राउन लंग: कपास की धूल के कारण, जिसे बायसिनोसिस भी कहते हैं।
- व्हाइट लंग : एस्बेस्टस की धूल के कारण होने वाली बीमारी।
- ब्लैक लंग : कोयला खदानों में काम करने वाले लोगों में यह बीमारी होती है।
वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव
- मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
- वनस्पति पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। यह पशु एवं कीटों के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है।
- जलवायु एवं वायुमंडलीय परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, जिससे जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षय, ग्रीनहाउस प्रभाव एवं मौसम में असंतुलन होता है।
- महानगरों एवं नगरों पर कोहरे के गुम्बद बन जाते हैं।
- महानगरों एवं शहरी क्षेत्रों के ऊपर स्मॉग गुंबद का निर्माण करता है।
वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम:
- पारित: 29 मार्च 1981
- लागू: 16 मई 1981
- प्रारंभ में यह केवल वायु प्रदूषण पर केंद्रित था, लेकिन 1987 में इसमें संशोधन कर ध्वनि प्रदूषण को शामिल किया गया, जिसे बाद में 2000 में Noise Pollution (Regulation and Control) Rules के तहत अलग कर दिया गया।
वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय
वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए बहुआयामी नीति अपनाई जानी चाहिए। इसमें पूर्व में हुए पर्यावरणीय नुकसान को नियंत्रित करना तथा नई तकनीकों के विकास एवं उपयोग के माध्यम से भविष्य के प्रदूषण को रोकना शामिल है।
(i) घरेलू प्रदूषण नियंत्रण
- रसोई एवं घरेलू कार्यों में बायोगैस और CNG का उपयोग।
- वैकल्पिक ईंधन के रूप में चारकोल को प्राथमिकता।
(ii) औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण
- विद्युत एवं उर्वरक संयंत्रों में स्वच्छ ईंधनों को अपनाना।
- प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का उपयोग:
- फ़िल्टर – गैसों से ठोस कणों को अलग करने के लिए।
- ESP (इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर) – विद्युत आवेश द्वारा धूल कणों को फंसाने के लिए।
- इनर्शियल कलेक्टर (साइक्लोन) – भारी कणिकीय पदार्थ को एकत्र करने के लिए।
- स्क्रबर – गैस प्रवाह से एरोसोल कणों को हटाने के लिए।
- प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को घनी आबादी से दूर लगाना।
- ग्रीन बेल्ट (हरित पट्टी) का विकास करना।
(iii) वाहन प्रदूषण नियंत्रण
- वाहन उत्सर्जन के लिए मानकों का निर्धारण एवं उनका अनुपालन।
- वाहनों में कैटेलिटिक कनवर्टर का उपयोग।
भारत सरकार ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
- वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने वायु गुणवत्ता से संबंधित कार्यों को संभाला।
- राष्ट्रीय वायु निगरानी कार्यक्रम (NAMP) की स्थापना।
- उद्योगों पर वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा करने के लिए नियम लागू किए गए।
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) जनवरी 2019 में शुरू किया गया – 2024 तक 24 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 131 शहरों में कणिकीय पदार्थ (PM) की सांद्रता में 20–30% की कमी का लक्ष्य। लक्ष्य को संशोधित कर 2025–26 तक PM10 स्तर में 40% कमी या राष्ट्रीय मानक (60 μg/m³) प्राप्त करना किया गया।
- राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक लॉन्च।
- स्वच्छ एवं वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग को बढ़ावा दिया गया।
- इथेनॉल मिश्रण को प्रोत्साहित किया गया।
- BS-IV से सीधे BS-VI ईंधन मानकों की ओर परिवर्तन। अप्रैल 2020 से पूरे देश में BS-VI मानक वाले वाहन लागू किए गए।
- नोट – BS मानक भारतीय प्रदूषण नियंत्रण मानक हैं, जो यूरोपीय उत्सर्जन मानकों (Euro Standards) पर आधारित हैं। उद्देश्य: चरणबद्ध तरीके से वाहनों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना।
- निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम बनाए गए।
- दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) अधिसूचित किया गया।
जल प्रदूषण
पानी के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में होने वाले अवांछनीय परिवर्तन, जो मनुष्यों और सभी जीवित प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, जल प्रदूषण कहलाते हैं।
जल प्रदूषण के स्रोत:
- घरेलू सीवेज: सीवर लाइन से निकलने वाला गंदा पानी।
- औद्योगिक अपशिष्ट: उद्योगों से निकलने वाले रसायन और ठोस अपशिष्ट।
परिवेशीय जल गुणवत्ता के 5 मुख्य मानदंड होते हैं –
- SDG संकेतक 6.3.2 – यह राष्ट्रीय और/या उप-राष्ट्रीय जल गुणवत्ता मानकों के अनुसार अच्छी परिवेशीय जल गुणवत्ता वाले जल निकायों के अनुपात की निगरानी करता है।
- पाँच जल गुणवत्ता मानदंड हैं:
- घुलित ऑक्सीजन (सतही जल)
- विद्युत चालकता (सतही जल और भूजल)
- नाइट्रोजन/नाइट्रेट (सतही जल और भूजल)
- फास्फोरस (सतही जल)
- pH (सतही जल और भूजल)
प्रदूषित जल की पहचान:
- DO (घुलित ऑक्सीजन): प्रति लीटर जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा
- 8 mg/L से कम – प्रदूषित जल।
- 4 mg/L से कम – अत्यधिक प्रदूषित जल।
- BOD (जैविक ऑक्सीजन मांग):
जल में कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के लिए सूक्ष्म जीवों द्वारा आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा।- BOD का उच्च स्तर जल के प्रदूषित होने का संकेत।
- COD (रासायनिक ऑक्सीजन मांग):
- यह जल प्रदूषण मापने का एक प्रमुख तरीका।
- यह जल में घुलित रसायनों के पूर्ण ऑक्सीकरण के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की मात्रा को दर्शाता है।
- COD उच्च, तो जल प्रदूषित माना जाता है।
- MPN (मोस्ट प्रॉबेबल नंबर):
- इस विधि में ई-कोलाई जीवाणु की संख्या मापी जाती है।
जैव-आवर्धन :
- खाद्य श्रृंखला के क्रमिक पोषण स्तरों पर अविघटनीय विषैले पदार्थों की सांद्रता का क्रमशः बढ़ना जैव-आवर्धन कहलाता है।
अतिपोषण (यूट्रोफिकेशन) –
- वह प्रक्रिया जिसमें जल निकाय में नाइट्रेट और फॉस्फेट जैसे पोषक तत्वों की अधिकता हो जाती है, जिससे शैवाल की अत्यधिक वृद्धि होती है, घुलित ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और जल की गुणवत्ता खराब हो जाती है।
जल प्रदूषण से होने वाली समस्याएं:
- पारे (Hg) की अधिकता – मिनामाटा रोग: अंगों, होंठ, जीभ में सुन्नता, बहरापन।
- कैडमियम (Cd) की अधिकता – इटाई-इटाई रोग: यकृत और फेफड़ों को प्रभावित करता है।
- आर्सेनिक (As) की अधिकता – ब्लैक फुट रोग (पशुओं में)।
- फ्लोराइड की अधिकता – फ्लोरोसिस: पीले और कमजोर दांत।
- सीसा (Pb) की अधिकता – पल्मोनिज़्म: तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है।
- तांबे (Cu) की अधिकता – विल्सन रोग: यकृत और मस्तिष्क को प्रभावित करता है।
- लौह (Fe) की अधिकता – सिडेरोसिस: फेफड़ों में लौह धूल का जमाव।
- लौह की कमी – एनीमिया।
- नाइट्रेट की अधिकता – मेथेमोग्लोबिनेमिया (ब्लू बेबी सिंड्रोम): बच्चों में हृदय में छेद और ऑक्सीजन की कमी।
- संयुक्त राष्ट्र (UNO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षित पेयजल की कमी और डायरिया के कारण विश्वभर में प्रतिदिन 2300 लोगों की मृत्यु होती है। पिछले 30 से 40 वर्षों में समुद्री जल के प्रदूषण के कारण 40% समुद्री जीवों में कमी आई है।
- उदाहरण के लिए, भारत में कानपुर शहर में चमड़ा शोधन (टैनिंग) में प्रयुक्त जल को यमुना नदी में छोड़ दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप यमुना नदी का जल दैनिक उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं रहा है।
विश्व जल गुणवत्ता गठबंधन (WWQA):
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र (JRC) द्वारा इटली के इस्प्रा में प्रारम्भ किया गया।
जल प्रदूषण की रोकथाम के उपाय:
- अपशिष्ट जल निस्तारण हेतु सभी शहरों में सीवेज उपचार संयंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।
- रासायनिक आधारित कृषि के स्थान पर जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- औद्योगिक अपशिष्ट जल का उपचार कर उसका पुनः उपयोग किया जाना चाहिए।
- नदियों में मृत पशुओं के शवों को डालने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए; विद्युत शवदाह गृह स्थापित किए जाने चाहिए।
ध्वनि प्रदूषण
- ध्वनि प्रदूषण तब होता है जब ध्वनि की तीव्रता और आवृत्ति श्रव्य स्तर से अधिक हो जाती है, जिससे मनुष्यों को असुविधा और परेशानी होती है।
- तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण, नगरीकरण और परिवहन के साधनों के कारण यह समस्या गंभीर हो गई है।
- ध्वनि प्रदूषण को उसकी तीव्रता और आवृत्ति के आधार पर मापा जाता है, और इसकी सामान्य इकाई डेसीबल (dB) है।
- 80–120 डेसीबल से अधिक ध्वनि शोर प्रदूषण के अंतर्गत आती है।
- ध्वनि प्रदूषण के कारण – परिवहन के साधन, लाउडस्पीकर, उद्योगों से निकलने वाला शोर, हवाई जहाज और जेट विमान।
- ध्वनि प्रदूषण से हानि – इसका मानव मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे चिड़चिड़ापन, बहरापन हो सकता है तथा अत्यधिक तेज ध्वनि से स्थायी श्रवण शक्ति हानि हो सकती है, जिससे व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है।
भूमि प्रदूषण
प्राकृतिक तथा मानव गतिविधियों के कारण मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट को भूमि (मृदा) प्रदूषण कहा जाता है। मृदा प्रदूषण भूमि की उर्वरता को कम करता है तथा मिट्टी में या उस पर रहने वाले जीवों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।
भूमि प्रदूषण के प्रमुख कारण:
- रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग: पंजाब में रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग के कारण मृदा प्रदूषण एक प्रमुख समस्या बन गया है।
- औद्योगिक अपशिष्ट का निपटान।
- शहरों और महानगरों से उत्पन्न कचरे का संचय।
मृदा प्रदूषण के दुष्परिणाम:
- कृषि योग्य भूमि में कमी।
- होने वाले रोग: पेचिश, दस्त, हैजा, नेत्र संक्रमण, क्षय रोग।
- अन्य पर्यावरणीय प्रदूषकों का उत्पन्न होना।
- भूमि क्षरण की समस्या में वृद्धि।
रेड़ियोधर्मी प्रदूषण
- रेडियोधर्मी प्रदूषण विभिन्न परमाणु रिएक्टरों, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों तथा खदानों से निकलने वाले उत्सर्जनों के कारण होता है, जो हमारे DNA, गुणसूत्रों और कोशिकाओं को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) के कारण इसके प्रभाव कई पीढ़ियों तक देखे जा सकते हैं।
रेडियोधर्मी प्रदूषण के प्रभाव
- स्वास्थ्य प्रभाव – रेडियोधर्मी विकिरण से कैंसर, ल्यूकेमिया, त्वचा रोग, दृष्टि दोष तथा जन्मजात विकृतियां हो सकती हैं।
- आनुवंशिक प्रभाव – विकिरण DNA और जीन में परिवर्तन करता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों में रोग और विकृतियां उत्पन्न होती हैं।
- पारिस्थितिकी पर प्रभाव – मिट्टी, जल और वायु में रेडियोधर्मी तत्वों के जमाव से पौधों और पशु प्रजातियों पर प्रभाव पड़ता है।
- खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव – प्रदूषित मिट्टी और जल के माध्यम से रेडियोधर्मी तत्व पौधों → पशुओं → मनुष्यों में प्रवेश कर एक चक्र बनाते हैं, जिससे दीर्घकालिक हानिकारक प्रभाव होते हैं।
- पर्यावरणीय असंतुलन – रेडियोधर्मी प्रदूषण भूजल, नदियों और महासागरों को प्रदूषित कर पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन को प्रभावित करता है।
- प्रमुख घटनाएँ:
- 1979 : थ्री माइल आइलैंड दुर्घटना (अमेरिका)
- 1986 : चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र आपदा (सोवियत संघ)
- 2011 : फुकुशिमा परमाणु आपदा (जापान)
