विश्व में मरुस्थलीकरण विश्व भूगोल (World Geography) का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे बंजर और सूखी बन जाती है। यह समस्या मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और अत्यधिक भूमि उपयोग के कारण उत्पन्न होती है। मरुस्थलीकरण से पर्यावरण संतुलन और मानव जीवन दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
मरुस्थलीकरण
परिभाषा – मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें शुष्क, अर्ध-शुष्क एवं शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों की भूमि प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों के कारण अपनी उत्पादकता, जल धारण क्षमता एवं वनस्पति आवरण खो देती है। परिणामस्वरूप भूमि बंजर हो जाती है तथा मरुस्थल जैसी परिस्थितियाँ विकसित हो जाती हैं।
मरुस्थलीकरण एक वैश्विक समस्या
- मरुस्थलीकरण एक ऐतिहासिक परिघटना है; विश्व के सबसे बड़े मरुस्थल प्राकृतिक प्रक्रियाओं की पारस्परिक क्रिया से दीर्घ अवधि में बने हैं।
- मेडागास्कर के मध्य उच्चभूमि पठार में स्थानीय जनजातियों द्वारा अपनाई गई झूम (Slash-and-Burn) कृषि के कारण देश के लगभग 10% भाग में मरुस्थलीकरण हुआ है।
- पैलियो मरुस्थल, वे पूर्व मरुस्थल या रेत समुद्र हैं जो जलवायु परिवर्तन एवं वनस्पति आवरण के विकास के कारण निष्क्रिय हो गए हैं।सहारा जैसे कुछ वर्तमान मरुस्थल अपनी वर्तमान सीमाओं से आगे विस्तारित हो रहे हैं।
- पश्चिमी एशिया में कई मरुस्थलों का निर्माण उत्तर क्रीटेशियस काल में प्रागैतिहासिक जनजातियों एवं उप-जनजातियों की अधिक जनसंख्या के कारण हुआ।
- साहेल क्षेत्र मरुस्थलीकरण का एक अन्य उदाहरण है।
- साहेल में मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारणों में झूम कृषि शामिल है, जिससे असुरक्षित ऊपरी मृदा को हवा उड़ा ले जाती है तथा मृदा अपरदन होता है।
- कजाखस्तान, किर्गिज़स्तान, मंगोलिया, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान एवं उज्बेकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देश भी मरुस्थलीकरण से प्रभावित हैं।
- कजाखस्तान में 1980 के दशक से आधे से अधिक कृषि योग्य भूमि को छोड़ दिया गया है।
मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारण
- औद्योगिक अपशिष्ट: अमू दरिया एवं सिर दरिया में कपास वस्त्र उद्योग से बड़े पैमाने पर औद्योगिक अपशिष्ट का निर्वहन; जल प्रदूषण के कारण मध्य एशिया के अरल सागर क्षेत्र में व्यापक मरुस्थलीकरण।
- पवन द्वारा मृदा अपरदन: थार मरुस्थल के बालू के टीले एवं अन्य रेतीले भू-आकृतियाँ प्रभावित; ट्रैक्टर द्वारा गहरी जुताई, रेतीली ढालों पर खेती, भूमि को लंबे समय तक परती छोड़ना तथा पारंपरिक कृषि प्रणालियाँ रेत के प्रसार को बढ़ाती हैं एवं भूमि के मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को तीव्र करती हैं।
- जनसंख्या दबाव और आर्थिक कारणों से पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
- जलभराव, लवणता एवं क्षारीयता में वृद्धि: जलोढ़ मैदानों में लवणीय भूजल से सिंचाई के कारण; कच्छ एवं सौराष्ट्र में खारे समुद्री जल का जलस्रोतों में प्रवेश; इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में जलभराव एवं लवणता–क्षारीयता की समस्या में तीव्र वृद्धि हो रही है।
- वनों की कटाई: तीव्र जनसंख्या वृद्धि से भूमि पर बढ़ते दबाव के कारण वनस्पति में कमी, वनों का संकुचन एवं मरुस्थलीकरण में वृद्धि हुई है।
- जल अपरदन: सौराष्ट्र एवं कच्छ के ऊपरी क्षेत्रों के विस्तृत भाग प्रभावित; अपरदन से भूमि सतह में परिवर्तन एवं मृदा अपरदन में वृद्धि हुई है।
नियंत्रण के उपाय
- रेतीले टीलों का स्थिरीकरण – CAZRI तकनीक, वायु अवरोधक झाड़ियाँ एवं उपयुक्त वनस्पति (इजरायली बबूल, फोग, सेवन, मोपाने, घामन, टुंबा)
- संरक्षक पट्टी वृक्षारोपण: पवन की दिशा में 3–5 पंक्तियों में वृक्षारोपण द्वारा मृदा अपरदन की रोकथाम करना।
- विमानों से बीज बुवाई – दुर्गम व शुष्क क्षेत्रों में गोबर-मिट्टी के साथ बीज गोलियाँ डालकर 70–80% अंकुरण सुनिश्चित करना।
- सिल्वी पाश्चर प्रणाली – पेड़ और घास को साथ लगाकर ईंधन व चारे दोनों की पैदावार बढ़ाना।
- पानी का सही उपयोग – स्प्रिंकलर प्रणाली द्वारा जल संरक्षण एवं घास (जैसे लेस्यूरस सिंडिकस) की उत्पादकता में वृद्धि करना।
- खनन भूमि पुनर्वास – बंद खदानों में प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा और अकेसिया टार्टिलिस जैसी प्रजातियाँ लगाकर हरियाली लौटाना।
संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय’(UN Convention to Combat Desertification- UNCCD)
- यह अभिसमय संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत तीन रियो अभिसमय (Rio Conventions) में से एक है।
- UNCCD एकमात्र अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो पर्यावरण एवं विकास के मुद्दों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी है।
- मरुस्थलीकरण की चुनौती से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 17 जून को ‘विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस’ मनाया जाता है।
बॉन चैलेंज
- बॉन चैलेंज एक वैश्विक पहल है, जिसका उद्देश्य वनों के पुनर्स्थापन के माध्यम से पर्यावरण और पारिस्थितिकी संतुलन में सुधार करना है। इसे वर्ष 2011 में जर्मनी के बॉन शहर में शुरू किया गया था।
- इस चुनौती का लक्ष्य है:
- 2020 तक 150 मिलियन हेक्टेयर क्षरित और वन विहीन भू-क्षेत्र को पुनःस्थापित करना तथा 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर भू-क्षेत्र को पुनःस्थापित करना है।
- पेरिस में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, 2015 में भारत ने स्वैच्छिक रूप से बॉन चैलेंज पर स्वीकृति दी
- शुरुआत में भारत ने 2015 में बॉन चैलेंज के तहत दो चरणों में वनों और परिदृश्य के पुनर्स्थापन का लक्ष्य रखा था:
- 2020 तक 13 मिलियन हेक्टेयर भूमि का पुनर्स्थापन।
- 2030 तक 8 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि का पुनर्स्थापन।
- बाद में, भारत ने इन लक्ष्यों को बढ़ाकर 2030 तक कुल 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि के पुनर्स्थापन का लक्ष्य निर्धारित किया।
भारत के प्रयास
- मरुस्थलीकरण की रोकथाम हेतु भारत सरकार द्वारा वनीकरण प्रयासों सहित अनेक कार्यक्रम एवं योजनाएँ शुरू की –
- प्रमुख पहलें:
- ग्रीन इंडिया मिशन (GIM)
- नगर वन योजना (Urban Forest Scheme)
- क्षतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA)
- महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) — भूमि पुनर्स्थापन पर केंद्रित
- वनीकरण के माध्यम से मरुस्थलीकरण एवं वन क्षरण से निपटने हेतु राष्ट्रीय कार्य योजना का शुभारंभ हुआ।
- प्रयासों के बावजूद चुनौती: 32% भूमि मृदा क्षरण से प्रभावित जबकि 25% भूमि मरुस्थलीकरण से प्रभावित है।
भारत में भूमि क्षरण व मरुस्थलीकरण
- भारत के 97.85 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र (देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 29.77%) को 2018-19 के दौरान भूमि क्षरण का सामना करना पड़ा।
- 2011-13 और 2003-05 की समयावधि में क्रमशः 96.40 मिलियन हेक्टेयर (29.32%) और 94.53 मिलियन हेक्टेयर (28.76%) भूमि पर क्षरण हुआ।
- 2011-13 से 2018-19 के बीच भूमि क्षरण क्षेत्र में कुल वृद्धि – 1.45 मिलियन हेक्टेयर (कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 0.44%)।
- भारत में भूमि क्षरण/मरुस्थलीकरण का कारण –
- जल अपरदन [11.01%]
- वनस्पति क्षय [9.15%]
- पवन अपरदन [5.46%]
- शुष्क क्षेत्रों (शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क-उप-आर्द्र) में भूमि क्षरण को मरुस्थलीकरण कहा जाता है।
- 2018-19 में मरुस्थलीकरण की चपेट में कुल 83.69 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र था।
- 2011-13 से 2018-19 के बीच मरुस्थलीकरण क्षेत्र में वृद्धि – 1.05 मिलियन हेक्टेयर।
- शुष्क क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण का मुख्य कारण पवन अपरदन है।
- अर्ध-शुष्क और शुष्क-उप-आर्द्र क्षेत्रों में जल अपरदन और वनस्पति क्षय प्रमुख कारण हैं।
- देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के संबंध में मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण से प्रभावित होने वाला लगभग 23.79% क्षेत्र राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, लद्दाख, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना का था।
- राज्यों के अपने कुल भौगोलिक क्षेत्र के संदर्भ में, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और गोवा में 50% से अधिक क्षेत्र मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण का सामना कर रहा है।
राजस्थान के सन्दर्भ में
- राजस्थान में 2018-19 में राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 62.06% (21.23 मिलियन हेक्टेयर) मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण का सामना कर रहा था।
- 2011-13 और 2003-05 की अवधि में यह क्षेत्र क्रमशः 62.90% और 63.19% था।
- 2011-13 से 2018-19 के बीच मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण में 0.84% की कमी देखी गई।
- राज्य में मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण का सबसे प्रमुख कारण
- पवन अपरदन [43.37%]
- वनस्पति क्षय [7.64%]
- जल अपरदन [6.21%]
- 2011-13 से 2018-19 के बीच, पवन अपरदन/जमाव से प्रभावित क्षेत्र में कमी और मानवीय गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्र में वृद्धि देखी गई। वहीं, 2003-05 से 2011-13 के बीच, पवन अपरदन/जमाव से प्रभावित क्षेत्र में कमी और वनस्पति क्षय से प्रभावित वन क्षेत्र में वृद्धि हुई।
विश्व में मरुस्थलीकरण
