स्वास्थ्य सेवा, संक्रामक, गैर-संक्रामक और आनुवंशिक रोग: विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवा मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा, रोगों की रोकथाम, निदान और उपचार से संबंधित सेवाओं एवं प्रणालियों का समग्र अध्ययन है। आधुनिक चिकित्सा तकनीकों, दवाओं और डिजिटल स्वास्थ्य साधनों के विकास ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण बनाया है।
स्वास्थ्य सेवा, संक्रामक, गैर-संक्रामक और आनुवंशिक रोग
जब शरीर के एक या अधिक अंगों या तंत्रों के कार्य में बाधा आती है और विभिन्न लक्षण दिखाई देने लगते हैं, तो यह दर्शाता है कि हम स्वस्थ नहीं हैं, अर्थात हमें कोई रोग या बीमारी हो गया है।
बैक्टीरिया, वायरस, कवक, प्रोटोजोआ, हेल्मिन्थस आदि से संबंधित अनेक प्रकार के जीव मानव में रोग उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे रोग उत्पन्न करने वाले जीवों को रोगजनक (पैथोजन्स) कहा जाता है। अधिकांश परजीवी भी रोगजनक होते हैं, क्योंकि वे होस्ट (पोषक) के शरीर के अंदर या उसकी सतह पर रहकर उसे हानि पहुंचाते हैं।
रोगों को व्यापक रूप से दो श्रेणियों में बाँटा जाता है: जन्मजात रोग और अर्जित रोग।
- जन्मजात रोग (Congenital Diseases) – ये संरचनात्मक या क्रियात्मक असामान्यताएँ होती हैं। ये रोग जन्म से ही व्यक्ति में उपस्थित होते हैं। जन्मजात रोग आनुवंशिक विकार होते हैं (जैसे सिकल सेल एनीमिया), अथवा शरीर क्रिया विज्ञान और विकास से संबंधित विकार होते हैं (जैसे हेर लिप या क्लीफ्ट लिप)।
- अर्जित रोग (Acquired Diseases) – ये रोग जन्म के बाद विभिन्न कारणों से उत्पन्न होते हैं, जैसे संक्रमण, अव्यवस्था, आहार, नशा, तनाव, उत्परिवर्तन आदि। अर्जित रोगों को दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है: संक्रामक रोग और असंक्रामक रोग।
असंक्रामक रोग
असंक्रामक रोग (Non-infectious Diseases) – रोगजनकों के अतिरिक्त अन्य कारक (जैसे जीवनशैली, पर्यावरण या वृद्धावस्था) इन रोगों का कारण बनते हैं। ये रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संपर्क द्वारा नहीं फैलते। इसलिए इन्हें असंक्रामक रोग भी कहा जाता है। इन्हीं कारणों से ये प्रत्येक व्यक्ति से जुड़े होते हैं, जैसे कैंसर, एलर्जी, अभावजन्य रोग, चोटें आदि। ये विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं –
- अभावजन्य रोग (Deficiency Diseases) – ये आहार के किसी आवश्यक घटक की कमी या असंतुलित आहार के कारण होते हैं। उदाहरण के लिए, क्वाशिओरकोर, रक्ताल्पता (कमी), और बेरीबेरी।
- अपक्षयी रोग (Degenerative Diseases) – ये रोग कमजोरी या वृद्धावस्था के कारण होते हैं, जैसे एथेरोस्क्लेरोसिस, पार्किंसन।
- एलर्जी (Allergy) – बाहरी पदार्थों की उपस्थिति से व्यक्ति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है, जैसे राइनाइटिस (नाक से संबंधित)।
- नशा (Addiction) – ये रोग नशीली दवाओं, शराब और तंबाकू के सेवन से होते हैं।
- मानसिक विकार (Mental Disorders) – ये रोग तनाव, चिंता, मानसिक अक्षमताओं, पागलपन, सिज़ोफ्रेनिया और सायकोसिस से संबंधित होते हैं।
- कैंसर (Cancer) – यह मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है, जिसमें कोशिकाएँ निरंतर विभाजित होती रहती हैं, सामान्य कोशिकाओं को दबा देती हैं, पोषण की कमी से कोशिकाओं की मृत्यु होती है और आवश्यक अंगों का कार्य समाप्त होने लगता है।
संक्रामक रोग
संक्रामक रोग – ये रोग रोगजनकों और परजीवियों के कारण होते हैं। ये संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में स्थानांतरित हो सकते हैं। इसलिए इन्हें संचारणीय रोग भी कहा जाता है। इनका संचरण प्रत्यक्ष संपर्क द्वारा या रक्त तथा सीरम जैसे कारकों के माध्यम से हो सकता है।
- संक्रामक (Contagious) रोग – ये रोग स्वस्थ व्यक्ति के साथ प्रत्यक्ष संपर्क से फैलते हैं। उदाहरण के लिए रिंगवर्म, कंजक्टिवाइटिस।
- असंक्रामक (Non-contagious) रोग – ये रोग संक्रमित कारक वाहक (जैसे डेंगू, मलेरिया), रक्त, सीरम (एड्स, टाइफस ज्वर) के माध्यम से फैलते हैं।
जीवाणुओं के कारण होने वाले रोग

| बीमारी | कारक जीवाणु | मुख्य लक्षण | संचरण का तरीका |
| कुष्ठ रोग(हैनसेन रोग) | माइकोबैक्टीरियम लेप्री | त्वचा पर चकत्ते, अल्सर, उँगलियों/पैर की उँगलियों में विकृति, तंत्रिका क्षति | रोगी से प्रत्यक्ष संपर्क, घावों से निकलने वाले स्राव द्वारा |
| तपेदिक (टी.बी.) | माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्यूलोसिस | लगातार खाँसी (कभी-कभी खून के साथ), बुखार, वजन कम होना, कमजोरी | वायु द्वारा (खाँसने, छींकने से) |
| डिप्थीरिया | कोरीनेबैक्टीरियम डिप्थीरिया | गले में मोटी परत, बुखार, साँस लेने में कठिनाई | बूंदों द्वारा, संक्रमित वस्तुओं को छूने से |
| टेटनस | क्लोस्ट्रीडियम टेटानी | मांसपेशियों में जकड़न, जबड़ा लॉक होना, शरीर में ऐंठन | घाव/कट के माध्यम से प्रवेश |
| निमोनिया | डिप्लोकोकस न्यूमोनिया | बुखार, सीने में दर्द, खाँसी, साँस लेने में कठिनाई | वायुजनित बूंदें |
| दस्त | शिगेला समूह, ई. कोलाई, साल्मोनेला | पानी जैसा मल, उल्टी, निर्जलीकरण, कमजोरी | दूषित भोजन या पानी |
| मेनिन्जाइटिस | नाइस्सेरिया मेनिंजाइटिस | सिरदर्द, तेज बुखार, उल्टी, गर्दन में अकड़न | रोगी से संपर्क या बूंदों द्वारा |
| गोनोरिया | नेइसेरिया गोनोरहोई | पीला स्राव, पेशाब में दर्द, जननांगों में सूजन | यौन संपर्क |
| हैजा | विब्रियो हैजा | दस्त, उल्टी, निर्जलीकरण, मांसपेशियों में ऐंठन | दूषित पानी/भोजन |
| टाइफाइड | साल्मोनेला टाइफी | बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द, चकत्ते, कमजोरी | दूषित भोजन/पानी या संपर्क |
| काली खांसी(पर्टुसिस) | बोर्डेटेला पर्टुसिस | सूखी खाँसी हूपिंग आवाज़ के साथ, हल्का बुखार, साँस लेने में कठिनाई | वायुजनित बूंदें |
| मेलियोइडोसिस | बर्कहोल्डेरिया स्यूडोमैली | बुखार, खाँसी, सिरदर्द, सीने में दर्द, मांसपेशियों में दर्द | जीवाणु मिट्टी और पानी में रहते हैं और दूषित वातावरण में वर्षों तक बने रह सकते हैं।व्यक्ति-से-व्यक्ति संचरण बहुत दुर्लभ है |
प्रोटोजोआ के कारण होने वाली बीमारी

| बीमारी | कारक जीव | वेक्टर / संचरण | मुख्य लक्षण |
| अमीबायसिस(अमीबिक पेचिश) | एंटअमीबा हिस्टोलिटिका | दूषित भोजन और पानी; घरेलू मक्खियों द्वारा फैलता है | म्यूकस/खून के साथ दस्त, पेट में ऐंठन, कमजोरी |
| जियार्डियासिस | जिआर्डिया लैम्ब्लिया | दूषित भोजन और पानी | दस्त, पेट दर्द, सिरदर्द, भूख न लगना |
| ट्रिपैनोसोमियासिसस्लीपिंग सिकनेस (निंद्रा रोग) | ट्रिपैनोसोमा गैम्बिएन्स | सी-सी (त्से-त्से) मक्खी (ग्लोसिना पाल्पलिस) के काटने से | ग्रंथियों में सूजन, सिरदर्द और लगातार नींद आनाकेन्या ने स्लीपिंग सिकनेस को समाप्त कर दिया है |
| मलेरिया | प्लाज्मोडियम एसपी.(पी. विवैक्स, पी. फाल्सीपेरम,पी. मलेरिया, पी. ओवले) | मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से | ठंड के साथ बुखार, सिरदर्द, उल्टी, कमजोरी |
| लीशमैनियासिस(काला-आज़ार) | लीशमैनिया डोनोवानी | सैंड फ्लाई के काटने से | प्लीहा और यकृत में सूजन, त्वचा पर फोड़े, नाक और गले को प्रभावित करता है |
| ट्राइकोमोनियासिस | ट्राइकोमोनास वेजिनेलिस | यौन संपर्क | झागदार स्राव, खुजली, जलन, वैजिनाइटिस |
| टॉक्सोप्लाज्मोसिस | टोकसोपलसमा गोंदी | संक्रमित जानवरों से संपर्क या दूषित भोजन | मस्तिष्क और तंत्रिकाओं को प्रभावित करता है, हाइड्रोसेफेलस, कोरियोरेटिनाइटिस |
वायरस से होने वाली बीमारियां

| बीमारी | कारक वायरस | संचरण का तरीका | मुख्य लक्षण |
| एड्स (एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंसी सिंड्रोम) | ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) | असुरक्षित यौन संपर्क, संक्रमित रक्त आधान, साझा सुइयाँ, माँ से बच्चे में | कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र, वजन कम होना, बुखार, थकान, बार-बार संक्रमण |
| पोलियो | पोलियोवायरस | दूषित भोजन और पानी | बुखार, खांसी, उल्टी, अंगों का पक्षाघात, साँस लेने में कठिनाई |
| हेपेटाइटिस A | हेपेटाइटिस A वायरस(HAV) | दूषित भोजन और पानी | पीलिया, भूख न लगना, उल्टी, आंखों और मूत्र का पीला होना |
| हेपेटाइटिस B | हेपेटाइटिस B वायरस(HBV) | संक्रमित रक्त, सुइयाँ, यौन संपर्क, माँ से बच्चे में | बुखार, पीलिया, गहरा मूत्र, यकृत में सूजन, कम भूख |
| हेपेटाइटिस D | हेपेटाइटिस D वायरस | मनुष्यों में कैंसरजनकयकृत कैंसर का कारण | बुखार, पीलिया, गहरा मूत्र, यकृत में सूजन, कम भूखहेपेटाइटिस D के लिए अलग से कोई वैक्सीन नहीं है |
| रेबीज | रेबीज वायरस | संक्रमित पशुओं (कुत्ता, बिल्ली, बंदर आदि) के काटने से | काटने की जगह पर दर्द व सूजन, पानी से डर, दौरे, निगलने में कठिनाई |
| मम्प्स (कण्ठमाला) का रोग | मम्प्स वायरस (पैरामिक्सोवायरस) | वायुजनित बूंदें (खाँसी/छींक) | लार ग्रंथियों में सूजन, बुखार, सिरदर्द, निगलते समय दर्द |
| इन्फ्लुएंजा (फ्लू) | इन्फ्लूएंजा वायरस | खाँसी/छींक से वायुजनित बूंदें | बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, गले में खराश, थकान |
| पीलिया (वायरल प्रकार) | हेपेटाइटिस वायरस (मुख्यतः A और E) | दूषित भोजन और पानी | बुखार, त्वचा और आँखों का पीला होना, भूख न लगना, कमजोरी |
| चेचक | वैरिओला वायरस | वायुजनित बूंदें या प्रत्यक्ष संपर्क | तेज बुखार, दाने, त्वचा पर द्रव-भरे फफोले |
| साधारण सर्दी | राइनोवायरस | वायुजनित बूंदें या संक्रमित सतह के संपर्क से | नाक बहना, गले में खराश, हल्का बुखार, छींकना |
कृमियों के कारण होने वाली बीमारियां

- ड्रैकुनकुलोसिस (Dracunculiasis) – इसे नारू रोग (Naru disease) भी कहा जाता है।
- कुछ अन्य सामान्य उदाहरण –
- ट्राइकोरियासिस (Trichuriasis)
- फाइलेरियासिस (जापानी एलिफेंटिएसिस) – वुचेरिया बैन्क्रॉफ्टी द्वारा होता है।
कवक के कारण होने वाले रोग

कुछ विशिष्ट रोग
एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम)
- कारण: HIV वायरस
- यह कैसे फैलता है: संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक द्रवों (रक्त, स्तनदूध, वीर्य, योनि द्रव) से, यौन संपर्क द्वारा, संक्रमित सुई/सिरिंज के माध्यम से, रक्त आधान द्वारा, संक्रमित माँ से गर्भावस्था, प्रसव या स्तनपान के दौरान शिशु में, संक्रमित ब्लेड/नुकीली वस्तुओं से
- लक्षण: लसीका ग्रंथियों में सूजन, प्लेटलेट्स की कमी → बुखार और रक्तस्राव, रात में पसीना आना, वजन कम होना, स्मृति ह्रास, कमजोर सोचने की क्षमता, कम प्रतिरक्षा के कारण अन्य संक्रमणों का अधिक जोखिम
- रोकथाम: सुई/ब्लेड साझा न करें, रक्त आधान से पहले HIV परीक्षण, शेविंग के लिए नई ब्लेड का उपयोग, सुरक्षित यौन व्यवहार, स्वस्थ जीवनशैली
- उपचार: ART (एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी), पूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन उपचार वायरस को प्रभावी रूप से नियंत्रित करता है
नारू / बाला रोगकारण – कृमि (30–125 सेमी लंबा)।
- संचरण – साइक्लोप्स सूक्ष्म जीवों से युक्त दूषित पेयजल के सेवन से।
- रोग के कारण – अस्वच्छ / अशुद्ध पानी पीना, तालाब / बावड़ी का पानी पीना, बिना छना हुआ पानी पीना।
- लक्षण – टांगों और हाथों पर फोड़े, फोड़े के स्थान पर तीव्र दर्द, बुखार, मादा कृमि का मांसपेशियों में बढ़ना, यदि कृमि शरीर के भीतर मर जाए तो यह लसीका ग्रंथियों को विषैला बना देता है।
- रोकथाम – उबला हुआ / छना हुआ पानी पीना।
- उपचार – कृमि को निकालना, उचित चिकित्सीय देखभाल।
स्वाइन फ्लू
- कारण – H1N1 इन्फ्लूएंजा वायरस।
- संचरण – संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से।
- लक्षण – गले में खराश, खाँसी, सर्दी, बुखार, शरीर में दर्द।
- रोकथाम – बार-बार हाथ धोना, खाँसते समय रूमाल/टिश्यू का उपयोग, भीड़-भाड़ वाले स्थानों से बचना, मास्क का प्रयोग।
- उपचार – डॉक्टर की सलाह अनुसार टैमीफ्लू (Tamiflu) गोलियाँ।
विषाक्त भोजन
- कारण – सूक्ष्मजीवों (जैसे ई. कोलाई, साल्मोनेला) से दूषित या खराब भोजन का सेवन। सूक्ष्मजीव विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन) उत्पन्न करते हैं, जिससे भोजन विषैला हो जाता है।
- लक्षण – उल्टी, मितली, पेट में ऐंठन, दस्त।
- रोकथाम – बासी या दूषित भोजन से बचें, रसोई की स्वच्छता बनाए रखें।
- उपचार – समय पर डॉक्टर की सलाह लें, निर्जलीकरण से बचाव हेतु ORS का सेवन करें।
कैंसर
- कारण – कोशिकाओं का अनियंत्रित विभाजन तथा कोशिकाओं की तीव्र और असामान्य वृद्धि।
- लक्षण – ट्यूमर का निर्माण, प्रारंभिक अवस्था में बिना दर्द की गाँठें, बाद की अवस्थाओं में तीव्र दर्द; ट्यूमर जीभ, गले, फेफड़ों, रक्त, गर्भाशय आदि में हो सकते हैं।
- रोकथाम – शीघ्र निदान, तंबाकू और शराब से परहेज, स्वस्थ जीवन शैली अपनाना, विकिरण के सुरक्षित स्तर का पालन।
- उपचार – शल्य-चिकित्सा, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी (कोबाल्ट थेरेपी)।
डेंगू
- यह एक वायरल रोग है, जो डेंगू वायरस के कारण होता है और एडीज एजिप्टी (मादा) मच्छर द्वारा फैलता है।
- संचरण – संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से।
- कारण – गंदे या ठहरे हुए पानी में मच्छरों का प्रजनन, प्लेटलेट्स की संख्या में कमी।
- लक्षण (3–14 दिनों के बाद शुरू होते हैं) – कंपकंपी के साथ बुखार, सिरदर्द, आँखों में दर्द, जोड़ों/शरीर में दर्द, भूख न लगना, उल्टी, दस्त, त्वचा पर लाल चकत्ते।
- रोकथाम – पानी जमा न होने दें, बर्तनों/कंटेनरों की साप्ताहिक सफाई करें, कीटनाशकों का उपयोग करें, कूलर उपयोग में न होने पर सूखे रखें।
- उपचार –डॉक्टर की सलाह अनुसार (स्व-औषधि सेवन न करें)।
रक्ताल्पता
- कारण – हीमोग्लोबिन और रक्त की कमी।
- लक्षण – चेहरा पीला पड़ना, कमजोरी, थकान, चक्कर आना / सिर घूमना, जीभ पर सफेद फोड़े।
- रोकथाम – पौष्टिक भोजन का सेवन: अंकुरित अनाज, हरी सब्जियां, अंजीर, चुकंदर, बैंगन, तिल आदि।
- उपचार – आयरन (लौह) की गोलियां।
- महत्वपूर्ण – सरकार किशोरों को निशुल्क आयरन टैबलेट्स उपलब्ध कराती है।
रोग के संचरण का तरीका
| संचरण का तरीका | रोग |
| भोजन और जल का संदूषण | हैजा, टाइफाइड, हेपेटाइटिस (A और E), पोलियो, पीलिया, पेचिश |
| स्पर्श | चेचक, चिकनपॉक्सकुष्ठ रोग (Leprosy) – लंबे समय तक निकट संपर्क से (साधारण हाथ मिलाने से नहीं), सामान्यतः श्वसन बूंदों के माध्यम से |
| यौन संपर्क | सिफलिस, गोनोरिया, हेपेटाइटिस (B, C और D), एड्स, ल्यूकेरिया |
| धातु संदूषण | धातुएँउनके ज़हर से होने वाली बीमारीकैडमियमइटाई – इटाईआर्सेनिकब्लैक फुट बीमारीएस्बेस्टसमेसोथेलियोमा, श्वेत फेफड़े का कैंसर, एस्बेस्टोसिसपारामिनामाटा, गुलाबी बीमारी(एक्रोडायनिया)सीसाडिस्लेक्सिया, प्लंबिज्मसिलिका सैंड सिलिकोसिस (फेफड़ों की बीमारी)क्रोमियमडर्माटाइटिस (त्वचा रोग)नाइट्रेटब्लू बेबी सिंड्रोमकोयलाब्लैक लंग्स (न्यूमोकोनियोसिस) आयरनपल्मोनरी साइडरोसिसकॉपरविल्सन रोग (फेफड़ों की बीमारी) |
कमियों के कारण होने वाले रोग
प्रोटीन की कमी

मरास्मस
यह कैलोरी की कमी और प्रोटीन की अल्पता के कारण होता है। इस रोग में शरीर सूखने लगता है, रोगी कमजोर हो जाता है, चेहरा दुर्बल व निस्तेज हो जाता है, आँखें धंस जाती हैं तथा दीर्घकालिक दस्त की समस्या हो जाती है।

क्वाशियोरकोर
यह प्रोटीन कुपोषण का एक गंभीर रूप है, जिसमें शरीर में द्रव का संचय हो जाता है और विशेष रूप से पेट, टखनों और पैरों में सूजन दिखाई
देती है।
विटामिन कमी के कारण होने वाली बीमारी
| विटामिन | रासायनिक नाम | कमी के कारण होने वाली बीमारी | कमी के लक्षण |
| A | रेटिनोल | रतौंधी | कम प्रकाश में देखने में कठिनाई, जैसे रात में वाहन चलाना, तथा तेज रोशनी से अंधेरे में जाने पर आंखों का समायोजन न कर पाना। |
| जीरोफ्थैल्मिया (सूखी आँख) | आँखों में सूखापन, जलन, किरकिरापन तथा रात में देखने में कठिनाई। | ||
| D | कैल्सिफेरोल | ऑस्टियोमलेशिया (अस्थिमृदुता)रिकेट्स रोग | विकास में विलंब, हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी तथा कंकाल विकृतियाँ जैसे टेढ़े पैर या उभरी हुई छाती। |
| E | टोकोफेरॉल | बांझपन, लकवा | |
| K | नेफ्थोक्विनोनफिलोक्विनोन | रक्तस्राव, रक्त का थक्का न बनना | छोटे कट से अधिक रक्तस्राव, आसानी से चोट के निशान पड़ना, नाक से खून आना, अत्यधिक मासिक स्राव। |
| C | एस्कॉर्बिक अम्ल | स्कर्वी | थकान, जोड़ों में दर्द तथा सूजे हुए व रक्तस्राव युक्त मसूड़े। |
| B 1 | थायमिन | बेरी-बेरी | सुन्नता, झुनझुनी, मांसपेशियों की कमजोरी, चलने में कठिनाई तथा मानसिक भ्रम। |
| B 2 | राइबोफ्लेविन | चिलोसिस | मुंह के कोनों पर दरारें व फटना, लालिमा, सूजन, सूखापन तथा पपड़ी बनना। |
| B 3 | निकोटिनिक अम्ल / नियासिन | पेलाग्रा | “3 D’s” – डर्मेटाइटिस (धूप में त्वचा पर दाने), डायरिया (पाचन संबंधी समस्या), डिमेंशिया (मानसिक भ्रम, स्मृति ह्रास)। |
| B 5 | पैंटोथैनिक अम्ल | बर्निंग फीट सिंड्रोम | हाथों और पैरों में जलन, थकान, चिड़चिड़ापन, सुन्नता, मांसपेशियों में ऐंठन, त्वचा संबंधी समस्याएं। |
| B 6 | पाइरिडोक्सिन | डर्मेटाइटिस, एनीमिया | खुजली, सूखी या फटी त्वचा, लालिमा और चकत्ते। |
| B 9 | फोलिक अम्ल | मेगाब्लास्टिक एनीमिया | थकान, कमजोरी, पीली त्वचा तथा साँस फूलना। |
| B 12 | सायनोकोबालामिन | घातक रक्ताल्पता | एनीमिया से संबंधित थकान, पीली त्वचा, साँस फूलना तथा तंत्रिका संबंधी समस्याएं जैसे सुन्नता, झुनझुनी, भ्रम और स्मृति समस्या। |
| B 7 (H) | बायोटिन | स्पेक्टेकल आई, बालों का झड़ना | बालों का झड़ना, त्वचा पर चकत्ते (विशेषकर आँखों, नाक और मुँह के आसपास) तथा भंगुर नाखून। |
नोट – विटामिन A, D, E और K वसा में घुलनशील होते हैं, जबकि विटामिन B-कॉम्प्लेक्स और विटामिन C जल में घुलनशील होते हैं
हार्मोन संबंधी असामान्यताओं के कारण होने वाली बीमारी
| ग्रंथि | स्रावित हार्मोन | अति/अल्प स्राव | बीमारी |
| एड्रिनल ग्रंथि | एस्ट्रोजनटेस्टोस्टेरोन | अति स्राव | कॉन रोगकुशिंग रोगहिर्सुटिज़्म या एड्रेनल विरिलिस्मगाइनेकोमास्टियाएडिमा |
| अग्न्याशय | इंसुलिन | अल्प स्राव | मधुमेहपॉल्यूरियापॉलीडिप्सियाकीटोसिस |
| अति स्राव | हाइपोग्लाइसीमिया | ||
| पैराथाइरॉइड ग्रंथि | पैराथॉर्मोन | अल्प स्राव | हाइपोकैल्सीमिक टेटनी |
| अति स्राव | ऑस्टियोपोरोसिसऑस्टियोइटिस फाइब्रोसा सिस्टिका | ||
| थाइरॉयड ग्रंथि | थाइरॉक्सिन | अल्प स्राव | क्रिटिनिज्म (बौनापन)मायक्सोएडेमा गोइटरहाशिमोतो रोग |
| अति स्राव | एक्सोफ्थैल्मिक गोइटरप्लमर रोगग्रेव्स रोग | ||
| पिट्यूटरी ग्रंथि | एडीएच (वैसोप्रेसिन) | अल्प स्राव | डायबिटीज इन्सिपिडस |
| वृद्धि हार्मोन | अल्प स्राव | बौनापनएटेलियोसिस | |
| अति स्राव | गिगैंटिस्मएक्रोमिगेलीसिममंड्स रोग | ||
| जननग्रंथि | एस्ट्रोजन | अति स्राव | अनियमित मासिक धर्म चक्र |
विकार
- क्रोमोसोम(गुणसूत्र) क्रोमोसोम धागे जैसी संरचनाएँ होती हैं, जो स्वतः विभाजन करने में सक्षम होती हैं। ये कोशिका के नाभिक में स्थित होते हैं। अभिरंजन के बाद इनका अध्ययन आसानी से किया जा सकता है। ये वंशानुगत लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाते हैं, इसलिए इन्हें वंशानुक्रम का वाहक कहा जाता है।
- 1848 में, हॉफमिस्टर ने ट्रेडस्कैंटिया के पॉलेन ग्रेन मदर कोशिका में गुणसूत्र देखे। 1888 में, वाल्डेयर ने इन संरचनाओं को गुणसूत्र कहा।
- ऑटोसोम और लैंगिक गुणसूत्र
- मनुष्य में 23 जोड़े गुणसूत्र, अर्थात कुल 46 गुणसूत्र पाए जाते हैं। इन 46 में से 44 गुणसूत्र पुरुष और महिला दोनों में समान होते हैं, जिन्हें दैहिक या अलैंगिक गुणसूत्र (ऑटोसोम) कहा जाता है।
- पुरुष में शेष दो गुणसूत्रों में से एक छोटा और दूसरा बड़ा होता है, जिन्हें क्रमशः X और Y गुणसूत्र कहा जाता है।
- महिला में दोनों लैंगिक गुणसूत्र समान होते हैं और उन्हें XX गुणसूत्र कहा जाता है।
- इस प्रकार मनुष्य में कुल 44 + XY = 46 गुणसूत्र पुरुषों में तथा 44 + XX = 46 गुणसूत्र महिलाओं में पाए जाते हैं।
- व्यापक रूप से आनुवंशिक विकारों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है
- मेंडेलियन विकार (Mendelian disorders)
- गुणसूत्रीय विकार (Chromosomal disorders)
गुणसूत्रीय विकार
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सिंड्रोम का नाम |
विशेषताएँ |
लक्षण |
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डाउन सिंड्रोम |
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क्लाइनफेल्टरसिंड्रोम |
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टर्नरसिंड्रोम |
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एडवर्डसिंड्रोम |
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पटाऊ सिंड्रोम |
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मेंडेलियन विकार
- मेंडेलियन विकार मुख्यतः किसी एक जीन में होने वाले परिवर्तन या उत्परिवर्तन के कारण निर्धारित होते हैं। ये विकार संतानों में उसी प्रकार संचारित होते हैं, जैसा कि हमने वंशागति के सिद्धांतों में अध्ययन किया है। ऐसे मेंडेलियन विकारों के वंशागति पैटर्न को वंशावली विश्लेषण के माध्यम से किसी परिवार में खोजा जा सकता है।
- सबसे सामान्य और व्यापक मेंडेलियन विकारों में हीमोफीलिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस, सिकल-सेल एनीमिया, वर्णांधता, फिनाइलकीटोनूरिया, थैलेसीमिया आदि शामिल हैं।
- यह स्पष्ट है कि यह X-संबद्ध अप्रभावी लक्षण वाहक महिला से पुरुष संतान में संचारित होता है।
मेंडेलियन विकार
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आनुवंशिक विकार |
विवरण / विशेषताएँ |
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वर्णांधता |
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हीमोफीलिया |
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सिकल-सेल एनीमिया |
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फिनाइलकीटोनूरिया |
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थैलेसीमिया |
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अन्य सिंड्रोम
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सिंड्रोम |
विवरण और उदाहरण |
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क्राई-डू-चैट सिंड्रोम |
यह गुणसूत्र संख्या 5 की छोटी भुजा के आंशिक विलोपन के कारण होता है। शिशुओं में तीखी, “बिल्ली जैसी” रोने की आवाज़ पाई जाती है। |
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एवन्स सिंड्रोम |
यह एक दुर्लभ स्व-प्रतिरक्षी रोग है, जिसमें एंटीबॉडी लाल रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स को नष्ट कर देती हैं, जिससे एनीमिया, थ्रोम्बोसाइटोपेनिया, थकान और रक्तस्राव की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। |
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ब्लू बेबी सिंड्रोम |
यह नाइट्रेट से दूषित पानी के सेवन के कारण होता है। इससे बनने वाले नाइट्राइट हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन वहन क्षमता को कम कर देते हैं, जिसके कारण शिशु नीले रंग के दिखाई देते हैं, कमजोर हो जाते हैं और साँस लेने में कठिनाई होती है। |
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ग्रे बेबी सिंड्रोम |
नवजात शिशुओं को एंटीबायोटिक क्लोरैम्फेनिकॉल दिए जाने पर उनकी अपरिपक्व यकृत (लिवर) इसे ठीक से उपापचय नहीं कर पाती, जिससे विषाक्त पदार्थों का संचय हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप त्वचा का धूसर रंग, उल्टी, निम्न रक्तचाप और शारीरिक पतन हो सकता है। |
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नेफ्रोटिक सिंड्रोम |
यह एक गुर्दा विकार है, जिसमें मूत्र के माध्यम से अत्यधिक प्रोटीन का नुकसान होता है, एल्ब्यूमिन का स्तर कम हो जाता है, सूजन (एडेमा) और उच्च कोलेस्ट्रॉल पाया जाता है। इसका उपचार स्टेरॉयड और सहायक देखभाल से किया जाता है। |
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हंटर सिंड्रोम |
यह एक दुर्लभ, वंशानुगत आनुवंशिक विकार है (जिसे म्यूकोपॉलीसैकराइडोसिस टाइप II भी कहा जाता है), जो मुख्यतः पुरुषों को प्रभावित करता है और इड्यूरोनेट-2-सल्फेटेज नामक एंजाइम की कमी के कारण होता है। यह एंजाइम दो प्रकार के जटिल शर्करा अणुओं—डर्मेटन सल्फेट और हेपेरान सल्फेट—को तोड़ने के लिए आवश्यक होता है। एंजाइम की कमी के कारण ये शर्करा अणु कोशिकाओं में जमा हो जाते हैं, जिससे क्रमिक (प्रगतिशील) क्षति होती है। ![]() |
ज़ूनोटिक रोग
- ज़ूनोटिक रोग वे संक्रामक रोग हैं, जो जानवरों और मनुष्यों के बीच फैलते हैं।
- ज़ूनोटिक रोग संक्रमित शारीरिक द्रवों के संपर्क, पशु के काटने, दूषित जल के सेवन तथा संक्रमित मांस खाने से फैलते हैं। चमगादड़, पशुधन, कृंतक (चूहे आदि), पक्षी और अन्य कशेरुकी जीव इनके वाहक हो सकते हैं।
- ‘ज़ूनोसेस (Zoonoses)’ शब्द का प्रतिपादन रुडोल्फ विरचो (1959) ने किया था।
- विश्व ज़ूनोसेस दिवस 6 जुलाई को मनाया जाता है।
- 2025 की थीम – वन हेल्थ: ज़ूनोटिक खतरों के विरुद्ध एकजुट।
| प्रकार | विशेषताएँ | सामान्य उदाहरण |
| जीवाणुजन्य ज़ूनोसिस | ये रोग बैक्टीरिया के कारण होते हैं — सूक्ष्म एककोशिकीय जीव, जो विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन) छोड़ सकते हैं और बीमारी उत्पन्न करते हैं। | एन्थ्रैक्स, ब्रुसेलोसिस, कैट स्क्रैच रोग, लाइम रोग, मायकोप्लाज़्मा न्यूमोनिए, प्लेग, क्यू फीवर, साल्मोनेला, टुलरेमिया और तपेदिक (ट्यूबरकुलोसिस)। |
| परजीवी ज़ूनोसिस | ये रोग परजीवियों के कारण होते हैं, जैसे कृमि, प्रोटोजोआ (एककोशिकीय जीव) या बाह्य परजीवी जैसे जूँ और सूक्ष्म कीड़े या घुन। | टॉक्सोप्लाज्मोसिस, जिआर्डिएसिस, लिवर फ्लूक, मलेरिया, टीनिएसिस (सूअर या गोमांस से होने वाला टेपवर्म संक्रमण) और ट्राइकिनोसिस। |
| वायरल ज़ूनोसिस | वायरस अति-सूक्ष्म संक्रामक कारक होते हैं, जो स्वयं की प्रतिलिपियाँ बनाने के लिए हमारी कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं। | जापानी एन्सेफलाइटिस, चिकनगुनिया, चांदीपुरा, क्यासानूर वन रोग, बफेलो पॉक्स, निपाह वायरस, गुंजन वायरस, भंजा वायरस, लासा फीवर, कोविड-19, मंकीपॉक्स, एचआईवी/एड्स, इबोला, हंटान, एवियन इन्फ्लूएंजा (बर्ड फ्लू), मारबर्ग वायरस रोग, M-पॉक्स तथा रेबीज। |
नॉन-जूनोटिक रोग
- गांठदार त्वचा (लम्पी) रोग – वायरल, केवल मवेशियों में
- रिंडरपेस्ट – विषाणुजनित, केवल मवेशियों में (अब समाप्त)
- खुरपका और मुंहपका रोग (एफएमडी) – वायरल, मवेशी, भेड़, बकरी, सूअर (मनुष्यों में नहीं)
- न्यूकैसल रोग – वायरल, केवल मुर्गियों (पोल्ट्री) में
- मारेक रोग – वायरल, केवल मुर्गियों (पोल्ट्री) में
- क्लासिकल स्वाइन फीवर (हॉग हैजा) – वायरल, केवल सूअरों में
- अफ़्रीकी स्वाइन फीवर – वायरल, केवल सूअरों में
- भेड़ पॉक्स और बकरी पॉक्स – वायरल, केवल भेड़/बकरी में
- एवियन इन्फेक्शियस ब्रोंकाइटिस– केवल मुर्गियों (पोल्ट्री) में
- बोवाइन एफेमरल फीवर (गोजातीय अल्पकालिक बुखार) – केवल मवेशियों में
राज्यव्यापी एफएमडी (FMD) रोग नियंत्रण कार्यक्रम
- प्रारंभ – पशुपालन मंत्री जोराराम कुमावत द्वारा 24 सितंबर 2025 को पाली स्थित पिंजरापोल गौशाला में।
- राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत वर्ष 2025–26 में राज्य में खुरपका–मुंहपका रोग (Foot-and-Mouth Disease) के नियंत्रण हेतु छठे चरण का टीकाकरण अभियान चलाया गया, जो 23 नवंबर 2025 तक जारी रहा।
स्व – प्रतिरक्षी रोग
प्रतिरक्षा तंत्र – यह हमारे शरीर को वायरस, बैक्टीरिया और विषाक्त पदार्थों जैसी हानिकारक तत्वों से बचाता है। यह स्वतः कार्य करता है और इन आक्रमणकारियों को पहचानकर उनसे लड़ता है। यह श्वेत रक्त कोशिकाओं को भेजता है, जो उन्हें नष्ट कर देती हैं, इससे पहले कि वे आपको बीमार कर सकें।
स्व-प्रतिरक्षी रोग (Autoimmune Diseases) – स्व-प्रतिरक्षी रोग ऐसी स्थिति है, जब हमारा प्रतिरक्षा तंत्र शरीर की रक्षा करने के बजाय उसी पर हमला करने लगता है। कभी-कभी जब शरीर में कोई रोगाणु नहीं होते हुए भी प्रतिरक्षा तंत्र स्वस्थ कोशिकाओं पर आक्रमण कर देता है। इससे शरीर के सामान्य ऊतकों को नुकसान पहुंचता है।
स्व-प्रतिरक्षी रोगों की सूची
| क्रमांक | रोग का नाम | क्रमांक | रोग का नाम |
| 1 | सीलिएक रोग | 8 | रुमेटॉइड आर्थराइटिस (गठिया) |
| 2 | टाइप 1 मधुमेह (डायबिटीज मेलिटस) | 9 | मल्टीपल स्क्लेरोसिस |
| 3 | एडिसन रोग | 10 | सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस |
| 4 | घातक रक्ताल्पता (पर्निशियस एनीमिया) | 11 | सोरायसिस / सोरायटिक आर्थराइटिस |
| 5 | मायस्थीनिया ग्रेविस | 12 | लाइकेन प्लानस |
| 6 | हाशिमोटो थायरॉयडिटिस | 13 | विटिलिगो |
| 7 | (सूजन आंत्र रोग) इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज |
दुर्लभ रोग (Rare Disease)
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुर्लभ रोग वह दीर्घकालिक रोग या विकार है, जिसकी व्यापकता प्रति 1000 लोगों में 1 या उससे कम होती है।
- उदाहरण– SMA टाइप 2, सिस्टीनोसिस, पोम्पे रोग, गौसे रोग, हंटर सिंड्रोम।
राजस्थान सरकार की पहल
- राजस्थान सरकार ने 50 करोड़ रुपये का दुर्लभ रोग कोष घोषित किया है।
- दुर्लभ रोग दिवस फरवरी महीने के आखिरी दिन मनाया जाता है।
- दुर्लभ रोगों के निदान और उपचार हेतु जे.के. लोन अस्पताल, जयपुर में मेडिकल जेनेटिक्स के लिए उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence) की स्थापना की जाएगी।
- “राज सम्बल” पोर्टल – दुर्लभ रोगों के लिए क्राउडफंडिंग पोर्टल।
विकार
| विकार | कारण/विवरण | उदाहरण |
| जैव रासायनिक विकार | हार्मोन, एंजाइम या शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों जैसे जैव रसायन की अधिकता या कमी के कारण होते हैं। | हार्मोन असंतुलन, यूरिया, यूरिक अम्ल, क्रिएटिनिन से संबंधित समस्याएँ |
| बहिर्जात रासायनिक विकार | पर्यावरण में मौजूद प्रदूषकों, रसायनों या एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के संपर्क में आने से होता है। | अस्थमा, एलर्जी, रासायनिक विषाक्तता |
| जीवनशैली संबंधी विकार | अस्वस्थ भोजन आदतें, व्यायाम की कमी, तनाव या नशे की आदतों के कारण होते हैं।असंक्रामक रोग, जिन्हें दीर्घकालिक रोग भी कहा जाता है, सामान्यतः लंबे समय तक बने रहते हैं और आनुवंशिक, शारीरिक, पर्यावरणीय तथा व्यवहारिक कारकों के संयोजन का परिणाम होते हैं। | मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप |
| यांत्रिक विकार | शारीरिक चोट या शरीर के अंगों को क्षति पहुँचने के कारण होते हैं। | हड्डी का फ्रैक्चर, मोच, जोड़ की चोट |
| अपक्षयी विकार | वृद्धावस्था से संबंधित; ऊतक या अंग धीरे-धीरे अपना कार्य खो देते हैं। | गठिया, एथेरोस्क्लेरोसिस, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप |
| आनुवंशिक विकार | माता-पिता से संतानों में स्थानांतरित जीन दोषों के कारण होते हैं। | वर्णांधता, डाउन सिंड्रोम, हीमोफीलिया |
| मानसिक विकार | भावनात्मक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक समस्याओं के कारण होते हैं। | अवसाद, चिंता, सिज़ोफ्रेनिया |
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रोगों के प्रकार |
विवरण |
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न्यूरोडीजेनेरेटिव विकार(तंत्रिका कोशिकाओं की क्रमिक मृत्यु, जिसके परिणामस्वरूप समय के साथ स्नायुविक (मोटर), संज्ञानात्मक तथा अन्य कार्यों में गिरावट आती है) |
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भोजन विकार |
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श्वसन संबंधी विकार |
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आँखों से संबंधित रोग

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आँखों की सामान्य बीमारी |
विवरण |
प्रतिबिंब |
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मायोपिया(निकट दृष्टि दोष) |
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हाइपरमेट्रोपिया (दूर दृष्टि दोष) |
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प्रेस्बायोपिया |
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मोतियाबिंद |
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एस्टिग्मेटिज्म (दृष्टिवैषम्य) |
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कंजंक्टिवाइटिस (गुलाबी आँख) |
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वर्णांधता |
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ग्लूकोमा |
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रतौंधी |
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ट्रेकोमा |
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शरीर के प्रभावित अंग
| रोगमुख्य रूप से प्रभावित अंग , | |
| पीलिया, हेपेटाइटिस | लिवर(यकृत) |
| जापानी एन्सेफलाइटिस, मेनिनजाइटिस दिमागरतौंधी, निकट दृष्टि, हाइपरमेट्रोपिया, ग्लूकोमा, वर्णान्धता , मोतियाबिंद, प्रेसबायोपिया | आँख |
| मलेरिया | लिवर, गुर्दा |
| दस्त | बड़ी आंत |
| गोइटर | थाइरॉयड ग्रंथि |
| क्षय रोग, निमोनिया | फेफड़े |
| स्कर्वी, पायरिया | दांत, मसूड़े |
| टाइफाइड, हैजा, पेचिश | आंत |
| टेटनस, मिर्गी, रेबीज | तंत्रिका तंत्र |
| एड्स | रक्षात्मक तंत्र (WBC), लिम्फोसाइट्स |
| पोलियो | गला, रीढ़ की हड्डी तंत्रिका |
| डिप्थीरिया , काली खांसी | श्वसन नली |
| प्लेग | फेफड़े, दोनों पैरों के बीच का क्षेत्र |
| लेप्रोसी | तंत्रिका तंत्र, त्वचा |
| गोनोरिया, सिफलिस | मूत्र पथ |
रोग निदान के लिए परीक्षण
| रोग | निदान के लिए परीक्षण |
| सिफलिस | वीडीआरएल परीक्षण |
| विटामिन सी की कमी | केशिकीय भंगुरता परीक्षण |
| डिप्थीरिया | शिक |
| सिफलिस | ट्रीपोनेमल परीक्षण |
| ल्यूकेमिया | पूर्ण रक्त गणना (सीबीसी) |
| आंत्र ज्वर | विडाल परीक्षण |
| एड्स | एलिसा, वेस्टर्न ब्लॉट, सीडी 4 विभेदन समूह |
| ईएसआर (एरिथ्रोसाइट अवसादन दर) | शरीर में सूजन पैदा करने वाला कारक |
| स्वाइन फ्लू | एच1एन1 |
| (कुष्ठ रोग) हैन्सन रोग | लेप्रोमिन परीक्षण |
| वर्णांधता | इशिहारा परीक्षण |
| तपेदिक | मंटौक्स परीक्षण |
| ऑस्टियोपोरोसिस | बी.एम.डी. परीक्षण |
| प्लेटलेट्स और वॉन विलेब्रांड कारक के बीच परस्पर क्रिया को मापने के लिए | आर.आई.पी.ए (रिस्टोसेटिन-प्रेरित प्लेटलेट एकत्रीकरण) |
| ऑटोइम्यून हेमोलीटिक एनीमिया | कुम्ब्स परीक्षण |
मच्छरों और मक्खियों से फैलने वाली बीमारियां
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मच्छर |
रोग का प्रसार |
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मादा एनाफिलीज |
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एडीज |
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क्यूलेक्स |
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सैंड फ्लाई |
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सी-सी मक्खी |
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काली मक्खी |
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घरेलू मक्खी |
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रोगाणुरोधी प्रतिरोध/ एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR)
- रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) – जब बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और परजीवी समय के साथ दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं और एंटीबायोटिक्स उनके विरुद्ध अप्रभावी हो जाते हैं, जिससे संक्रमण का उपचार करना अधिक कठिन हो जाता है तथा रोग के फैलाव, बीमारी और मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने AMR को शीर्ष 10 वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में से एक के रूप में चिन्हित किया है।
- हर वर्ष लगभग 7,00,000 लोग एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस के कारण मृत्यु का शिकार होते हैं।
- कारण – एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग, अपर्याप्त खुराक और उपचार की अवधि, स्व-औषधि सेवन।
देश में बढ़ते एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) से निपटने के लिए किए गए उपाय
- AMR नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रारंभ किया गया।एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAP-AMR), जो “वन हेल्थ” दृष्टिकोण पर केंद्रित है, 19 अप्रैल 2017 को प्रारंभ की गई।
- आईसीएमआर (ICMR ) ने वर्ष 2013 में एएमआर सर्विलांस एवं अनुसंधान नेटवर्क (AMRSN) की स्थापना की।
- केरल ड्रग कंट्रोल विभाग ने राज्य में एंटीबायोटिक्स के अत्यधिक उपयोग को रोकने के लिए जनवरी 2024 के प्रथम सप्ताह में ‘ऑपरेशन अमृत’ (AMRITH – Antimicrobial Resistance Intervention For Total Health) नामक परीक्षण प्रारंभ किए।nPROUD (New Programme for Removal of Unused Drugs) पहल केरल द्वारा प्रारंभ की गई, ताकि घरों और फार्मेसियों से अनुपयोगी एवं अवशिष्ट दवाओं का व्यवस्थित, सरकारी नेतृत्व में संग्रहण एवं वैज्ञानिक निपटान किया जा सके।
प्रतिरक्षा तंत्र
- जीवन के किसी न किसी चरण में प्रत्येक व्यक्ति को बैक्टीरिया, वायरस, फंगस तथा परजीवी जैसे रोग उत्पन्न करने वाले कारकों से होने वाले संक्रमण का अनुभव होता है।
- हमारे शरीर में इन रोगजनक कारकों से बचाव करने के लिए एक प्रणाली होती है।
- इस प्रणाली को प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) कहा जाता है।
- यह प्रणाली हमें रोगजनक कारकों द्वारा उत्पन्न संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करती है।
- प्रतिरक्षा (Immunity) को व्यापक रूप से “शरीर की वह क्षमता जिससे वह अपने से भिन्न बाह्य कारकों को पहचानकर उन्हें अपने ऊतकों को क्षति पहुंचाने से रोकता है या निष्क्रिय कर समाप्त कर देता है, ताकि शरीर सुरक्षित रह सके।” के रूप में परिभाषित किया जाता है।
- एडवर्ड जेनर (1749-1823) को आधुनिक प्रतिरक्षा जीवविज्ञान का जनक माना जाता है।
प्रतिरक्षा के प्रकार
प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है – (I) प्राकृतिक या जन्मजात प्रतिरक्षा, (II) अर्जित प्रतिरक्षा
प्राकृतिक या जन्मजात प्रतिरक्षा
एक स्वस्थ व्यक्ति सामान्यतः कई प्रभावी तरीकों से हानिकारक सूक्ष्मजीवों से सुरक्षित रहता है। इन तरीकों को जन्मजात या प्राकृतिक प्रतिरक्षा कहा जाता है। जन्मजात प्रतिरक्षा में निम्नलिखित रक्षा तंत्र शामिल होते हैं-

शारीरिक अवरोध
- यह रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों को शरीर में प्रवेश करने से रोकता है। इसलिए यह शरीर की पहली रक्षा पंक्ति होती है। इसमें निम्नलिखित अंग शामिल होते हैं –
त्वचा
- त्वचा की बाहरी कठोर परत केराटिन से बनी होती है और यह रोगाणुओं के लिए लगभग अभेद्य होती है। त्वचा में स्थित वसा ग्रंथियाँ (सिबेशियस ग्रंथियाँ) लैक्टिक अम्ल का निर्माण करके अम्लीय वातावरण बनाती हैं, जो कई रोगजनकों को नष्ट कर देता है।
- वसा ग्रंथियाँ रोम कूप से जुड़ी होती हैं और एक तैलीय स्राव उत्पन्न करती हैं जिसे सीबम कहते हैं। सीबम में लैक्टिक अम्ल तथा वसीय अम्ल होते हैं। ये अम्ल त्वचा का pH 3 से 5 के बीच बनाए रखते हैं। इस कम pH पर कई सूक्ष्मजीव वृद्धि नहीं कर पाते हैं।
- संपूर्ण त्वचा रोगजनकों के प्रवेश को रोकती है तथा इसका कम pH अधिकांश बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकता है।
- त्वचा में छोटे कट या विभिन्न कीटों के काटने से रोगजनक शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और संक्रमण उत्पन्न कर सकते हैं।
श्लैष्मिक झिल्ली
- विभिन्न अंगों की उपकला परतें—श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र (आंत्र) तथा मूत्र-जनन तंत्र जैसे विभिन्न अंगों की उपकला परत एक सुरक्षात्मक श्लेष्म परत से ढकी होती है।
- श्वसन तंत्र में उपकला कोशिकाओं की बाहरी सतह पर उपस्थित सिलिया लगातार नासाग्रसनी की ओर ऊपर की दिशा में गति करते हैं, जिससे धूल कणों तथा रोगजनकों को बाहर निकालने में सहायता मिलती है।
- उपकला कोशिकाएँ लगातार नवीकृत होती रहती हैं और उनके हटने से उनकी सतह पर उपस्थित रोगजनक भी बाहर निकल जाते हैं।
शारीरिक स्राव
- शरीर के स्राव जैसे पसीना तथा आँखों के स्राव भी रोगजनकों से रक्षा करते हैं। शरीर के अन्य द्रवों में ऐसे अणु होते हैं जो जीवाणुनाशक (बैक्टीरिया को नष्ट करने वाले) होते हैं, जैसे वीर्य द्रव में स्पर्मिन और जिंक, जठर रस में HCl अम्ल, दूध में लैक्टोपेरॉक्सिडेज़, तथा आँसू, लार और नाक के स्राव में लाइसोजाइम एंजाइम।
- यदि जीवाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, तो प्रतिरक्षा की अन्य दो प्रक्रियाएँ सक्रिय हो जाती हैं।
- पहले घुलनशील रासायनिक कारक अपना जीवाणुनाशी प्रभाव दिखाते हैं, जिसे कॉम्प्लीमेंट तंत्र कहा जाता है, और दूसरे चरण में उन्हें भक्षण (फैगोसाइटोसिस) द्वारा नष्ट किया जाता है।
कॉम्प्लीमेंट तंत्र (पूरक प्रणाली)
- ‘कॉम्प्लीमेंट’ नामक प्रोटीनों का समूह बिना पूर्व भक्षण के सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने के लिए एक अन्य जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र प्रदान करता है।
- कॉम्प्लीमेंट प्रणाली 30 से अधिक प्रोटीनों का एक समूह है। कॉम्प्लीमेंट प्रणाली के कुछ घटकों को ‘C’ अक्षर तथा उसके साथ संख्या द्वारा दर्शाया जाता है। इसमें दी गई संख्या उनके खोज के क्रम को दर्शाती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण तथा सामान्य रूप से पाया जाने वाला घटक C₃ है।
- कॉम्प्लीमेंट घटक ऑप्सोन के रूप में भी कार्य कर सकते हैं (जैसे C3b)। ऑप्सोन ऐसे एंटीबॉडी होते हैं, जो वायरस या बैक्टीरिया पर उपस्थित एंटीजन से जुड़कर उन्हें भक्षक कोशिकाओं द्वारा निगलने में सहायता करते हैं। ऐसे एंटीबॉडी सूक्ष्मजीवों की झिल्ली को छिद्रयुक्त बनाकर उनका प्रत्यक्ष विनाश भी कर सकते हैं।
कोशिकीय भक्षक (फैगोसाइटिक) अवरोध
- जब सूक्ष्मजीव या निष्क्रिय कण (जैसे कोलॉइडल कार्बन) ऊतक द्रव या रक्त प्रवाह में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें भक्षक कोशिकाओं द्वारा बहुत तेजी से निगल लिया जाता है और नष्ट कर दिया जाता है। ऐसी कोशिकाएं या तो शरीर के द्रवों में प्रवाहित होती रहती हैं या कुछ ऊतकों में स्थिर रूप से उपस्थित होती हैं। इस प्रक्रिया को फैगोसाइटोसिस (अर्थात कोशिका द्वारा ‘निगलना’) कहा जाता है।
- सूक्ष्मजीवों के निगलने और नष्ट करने का कार्य मुख्यतः दो प्रकार की कोशिकाएँ करती हैं—माइक्रोफेज (कुछ श्वेत रक्त कणिकाएँ) और मैक्रोफेज (यकृत तथा प्लीहा में)।
- भक्षक (फैगोसाइटिक) कोशिकाओं की प्रमुख विशेषताएं-
- ये संपर्क में आने पर बाह्य कणों या रोगजनकों को तेजी से निगल लेती हैं।
- इनमें निगले गए पदार्थ को तोड़ने के लिए पाचक एंजाइम होते हैं।
- ये जन्मजात तथा अर्जित प्रतिरक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करती हैं।
प्रदाह अवरोध / साइटोकाइन अवरोध
- जब शरीर के विभिन्न ऊतकों में चोट के कारण घाव हो जाता है या रोगजनकों के संक्रमण से कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो उस स्थान पर लालिमा, दर्द और ऊष्मा उत्पन्न होती है। इसमें संयोजी ऊतक की अधिकांश कोशिकाएं तथा श्वेत रक्त कणिकाओं की बेसोफिल कोशिकाएं रासायनिक संकेत के रूप में हिस्टामिन और प्रोस्टाग्लैंडिन का स्राव करती हैं, जो प्रदाह उत्पन्न करते हैं। इनके फैलने से रक्त कोशिकाएं अधिक पारगम्य हो जाती हैं।
- इन जटिल तथा क्रमबद्ध प्रक्रियाओं को सामूहिक रूप से प्रदाह प्रक्रिया कहा जाता है।
- प्लाज्मा तथा फैगोसाइट्स कोशिकाओं से बाहर निकलकर कार्य करते हैं। प्लाज्मा में उपस्थित सीरम प्रोटीन भी जीवाणुनाशक गुण रखते हैं। इनका किसी स्थान पर एकत्र होना प्रदाह उत्पन्न करता है। फैगोसाइट्स शरीर में प्रवेश करने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देते हैं।
अर्जित प्रतिरक्षा
- यह प्रतिरक्षा लिम्फोसाइट्स द्वारा मध्य स्थित होती है तथा प्रतिजन-विशिष्टता और स्मृति से युक्त होती है।
- यह जीव में सूक्ष्मजीवों या उनके द्वारा उत्पन्न उपापचयी पदार्थों के पूर्व संपर्क के आधार पर विकसित होती है।
- यह जीव के जीवनकाल में रोगों के प्रति प्रतिरोधकता के रूप में विकसित होती है।
- इसका मुख्य गुण स्मृति है। जब रोग उत्पन्न करने वाले कारक पहली बार शरीर में प्रवेश करते हैं, तो प्रतिरक्षा तंत्र एंटीबॉडी बनाकर प्रतिक्रिया करता है, जिसे प्राथमिक प्रतिक्रिया कहा जाता है।
- इस प्रक्रिया के दौरान स्मृति कोशिकाएं बनती हैं।
- जब वही रोग उत्पन्न करने वाला कारक पुनः शरीर में प्रवेश करता है, तो प्रतिरक्षा तंत्र स्मृति कोशिकाओं की सहायता से अधिक मात्रा में एंटीबॉडी बनाता है और तेजी से प्रतिक्रिया करता है।
- इसे द्वितीयक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कहा जाता है।
अर्जित प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है-
सक्रिय प्रतिरक्षा
- जब रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव या एंटीजन शरीर में प्रवेश करते हैं और उनके विरुद्ध एंटीबॉडी बनती हैं, तो इस प्रकार की प्रतिरक्षा को सक्रिय प्रतिरक्षा कहा जाता है।
- यह प्रतिरक्षा धीरे-धीरे विकसित होती है और प्रभावी होने में समय लेती है, लेकिन इसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।
- प्राकृतिक सक्रिय प्रतिरक्षा तब विकसित होती है जब संक्रामक सूक्ष्मजीव प्राकृतिक संक्रमण के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं, जबकि जब रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव या एंटीजन को टीकाकरण द्वारा जानबूझकर शरीर में प्रवेश कराया जाता है, तो कृत्रिम सक्रिय प्रतिरक्षा विकसित होती है।
- कुछ संक्रमण जैसे डिप्थीरिया, काली खाँसी, चेचक तथा गलसुआ सामान्यतः आजीवन प्रतिरक्षा उत्पन्न करते हैं, अर्थात एक बार ठीक होने के बाद व्यक्ति को यह रोग दोबारा नहीं होता।
- अन्य रोग जैसे सामान्य जुकाम, इन्फ्लुएंजा, बैसिलरी पेचिश तथा न्यूमोकोकल निमोनिया के लिए अल्पकालिक प्रतिरक्षा प्रदान करती हैं, जो कभी-कभी केवल कुछ सप्ताह तक ही रहती है।
निष्क्रिय प्रतिरक्षा
- जब पूर्व निर्मित एंटीबॉडी को शरीर में प्रवेश कराया जाता है, तो निष्क्रिय प्रतिरक्षा प्राप्त होती है। यह प्रतिरक्षा जल्दी विकसित होती है, लेकिन कम समय तक प्रभावी रहती है।
- गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को प्लेसेंटा (अपरा) के माध्यम से IgG प्राप्त होता है तथा स्तनपान के दौरान माँ नवजात शिशु को कोलोस्ट्रम के माध्यम से IgA प्रदान करती है, जो निष्क्रिय प्रतिरक्षा के उदाहरण हैं।
- सर्पदंश या टेटनस, रेबीज, डिप्थीरिया जैसे गंभीर रोगों के उपचार में दिए जाने वाले एंटीवेनम/एंटीटॉक्सिन कृत्रिम निष्क्रिय प्रतिरक्षा उत्पन्न करते हैं।
- यह निम्नलिखित तरीकों से विकसित हो सकती है :प्लेसेंटा (अपरा) के माध्यम से माँ से भ्रूण में एंटीबॉडी (जैसे IgG) का स्थानांतरण।स्तनपान करने वाले शिशुओं को माँ के दूध से एंटीबॉडी प्राप्त होते हैं।
- मीजल्स (खसरा) संक्रमण तथा संक्रामक हेपेटाइटिस सहित कई मामलों में संयुक्त मानव इम्युनोग्लोबुलिन को एंटीबॉडी के स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है।
- जिन रोगियों में एंटीबॉडी ग्लोबुलिन बनाने की जन्मजात क्षमता नहीं होती है, उन्हें भी मानव इम्युनोग्लोबुलिन दिया जाता है।
स्व-प्रतिरक्षा
- अर्जित प्रतिरक्षा में शरीर की अपनी कोशिकाओं और बाह्य जीवों की कोशिकाओं के बीच अंतर करने की क्षमता होती है।
- इसका अर्थ है कि यह प्रतिरक्षा सामान्यतः केवल बाह्य जीवों के विरुद्ध ही एंटीबॉडी बनाती है।
- लेकिन कभी-कभी वंशानुगत, पर्यावरणीय या अन्य कारणों से यह प्रतिरक्षा अपनी ही कोशिकाओं के विरुद्ध एंटीबॉडी बनाकर उन पर आक्रमण करने लगती है।
- इस प्रकार की प्रतिरक्षा को स्व-प्रतिरक्षा कहा जाता है तथा इससे उत्पन्न होने वाले रोगों को स्व-प्रतिरक्षी रोग कहा जाता है, जैसे रुमेटॉइड आर्थराइटिस।
- समूह प्रतिरक्षा
- जब किसी समुदाय के अधिकांश लोग (टीकाकरण या पूर्व संक्रमण के कारण) प्रतिरक्षित हो जाते हैं, तो रोग का प्रसार बहुत कम हो जाता है।
- इससे वे लोग भी सुरक्षित रहते हैं जो प्रतिरक्षित नहीं हैं।
- उदाहरण :
- भारत में पोलियो – व्यापक टीकाकरण से समूह प्रतिरक्षा विकसित हुई, जिससे इसके प्रसार को रोकने में सहायता मिली।खसरा (मीजल्स) – यदि 90–95% बच्चों का टीकाकरण हो जाए, तो रोग आसानी से नहीं फैलता।
- COVID-19 – जिन समुदायों में टीकाकरण और पूर्व संक्रमण का स्तर अधिक था, वहाँ रोग का प्रसार कम देखा गया।
प्राथमिक बनाम द्वितीयक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया
- प्राथमिक प्रतिक्रिया (पहली बार संक्रमण / टीकाकरण)
- शरीर को रोगजनक की पहचान करने में समय लगता है।
- एंटीबॉडी धीरे-धीरे और कम मात्रा में बनती हैं।सुरक्षा कमजोर और अल्पकालिक होती है।
- द्वितीयक प्रतिक्रिया (जब वही रोगजनक दोबारा प्रवेश करता है)
- स्मृति कोशिकाएं (जो पहले संक्रमण के दौरान बनी थीं) रोगजनक को तुरंत पहचान लेती हैं।
- एंटीबॉडी बहुत तेजी से और अधिक मात्रा में बनती हैं
- प्रतिक्रिया अधिक मजबूत, तेज और लंबे समय तक रहने वाली होती है।
प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाएं
लिम्फोसाइट्स (लिम्फोइड कोशिकाएं)लिम्फोसाइट्स प्रतिरक्षा तंत्र की महत्वपूर्ण श्वेत रक्त कोशिकाएं हैं, जो रोगजनकों को पहचानकर उनसे लड़ती हैं।
- ये सभी प्रारंभ में अस्थि मज्जा की हीमोपोएटिक (रक्त कोशिका बनाने वाली) स्टेम कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं।
- स्टेम कोशिकाएं अविभेदित कोशिकाएं होती हैं, जो असीमित विभाजन कर सकती हैं और एक या अधिक विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं बना सकती हैं।
- अस्थि मज्जा की स्टेम कोशिकाएं लिम्फोसाइट्स बनाती हैं।
- अस्थि मज्जा की स्टेम कोशिकाएं एरिथ्रोसाइट्स (लाल रक्त कोशिकाएँ), थ्रोम्बोसाइट्स (रक्त प्लेटलेट्स), ग्रेन्यूलोसाइट्स तथा मोनोसाइट्स (श्वेत रक्त कोशिकाएं) भी बनाती हैं।
- लिम्फोसाइट्स को दो उप-प्रकारों में विभाजित किया जाता है :
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B-कोशिकाएं या B-लिम्फोसाइट्स |
T-कोशिकाएं या T-लिम्फोसाइट्स |
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- मैक्रोफेज – ये मोनोसाइट्स से उत्पन्न होते हैं।
एंटीजन और एंटीबॉडी
- एंटीजन (प्रतिजन) – एंटीजन कोई भी बाह्य अणु होता है, जो एक विशिष्ट प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को उत्पन्न कर सकता है। अधिकांश एंटीजन प्रोटीन या बहुत बड़े पॉलीसैकराइड होते हैं।
- एंटीबॉडी (प्रतिरक्षा) – एंटीबॉडी एक प्रोटीन अणु है, जो एंटीजन के प्रति प्रतिक्रिया में शरीर में बनता है। प्रत्येक एंटीबॉडी अणु चार परस्पर जुड़ी पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं से मिलकर बना होता है।
इम्युनोग्लोबुलिन (एंटीबॉडी) के प्रकार
एंटीबॉडी (या इम्युनोग्लोबुलिन) की पाँच प्रमुख श्रेणियाँ होती हैं, जिन्हें हेवी चेन के अमीनो अम्ल अनुक्रम के आधार पर अलग किया जाता है।इन श्रेणियों को IgG, IgD, IgA, IgE तथा IgM के रूप में दर्शाया जाता है (Ig = इम्युनोग्लोबुलिन)।
- IgE – एलर्जिक प्रतिक्रियाओं में तथा परजीवियों से सुरक्षा में भूमिका निभाता है।
- IgG – एकमात्र एंटीबॉडी जो प्लेसेंटा को पार कर सकती है। यह भ्रूण को निष्क्रिय प्रतिरक्षा प्रदान करती है।
- IgM– मानव शरीर में सबसे बड़ी एंटीबॉडी। संक्रमण के प्रति प्रतिक्रिया में मानव शरीर में सबसे पहले बनने वाली एंटीबॉडी है।
- IgA – कोलोस्ट्रम (माँ का पहला दूध, जन्म के 2–3 दिन बाद) में पाया जाता है। यह नवजात शिशु को संक्रमण से बचाता है।
- IgD – अपरिपक्व बी-लिम्फोसाइट्स की सतह पर कम मात्रा में पाया जाता है। यह बी-कोशिकाओं के सक्रियण में सहायता करता है।
- ये एंटीबॉडी अपने आणविक भार और कार्यों में भी भिन्न होती हैं।
- IgG सर्वाधिक सांद्रता में पाया जाता है (मानव शरीर में कुल इम्युनोग्लोब्युलिन का लगभग 75%)।
टीकाकरण
पूर्व में यह देखा गया था कि कुछ रोगों से ठीक हो चुके व्यक्तियों को जीवनभर पुनः उस रोग से सुरक्षा मिलती है। इससे प्रतिरक्षण की अवधारणा विकसित हुई। एडवर्ड जेनर ने वर्ष 1796 में चेचक (स्मॉल पॉक्स) से बचाव के लिए काऊ पॉक्स का उपयोग करके टीकाकरण की शुरुआत की।टीकाकरण का उद्देश्य शरीर में दुर्बल रोगजनकों (अटैंयूएटेड जर्म्स) को प्रवेश कराना होता है।
इसके बाद शरीर विशिष्ट स्मृति कोशिकाएं बनाता है। ये स्मृति कोशिकाएं उसी एंटीजन के पुनः संपर्क में आने पर तेजी से संख्या में बढ़ जाती हैं और अधिक एंटीबॉडी बनाकर संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
टीके का प्रकार
निम्न प्रकार के टीकों का उपयोग किया जाता है :
जीवित, दुर्बल एवं अटैंयूएटेड टीका
जीवित दुर्बल टीका बनाने के लिए रोगजनक वायरस को ऊतक संवर्धन द्वारा या चूजे के भ्रूण जैसे पशु भ्रूण में कई पीढ़ियों तक संवर्धित किया जाता है। इससे मनुष्य में इसकी प्रतिकृति बनाने की क्षमता समाप्त हो जाती है, लेकिन यह वायरस मानव प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा पहचाना जा सकता है। उदाहरण : रूबेला, मीजल्स, रोटावायरस तथा मौखिक पोलियो आदि।
निष्क्रिय या मृत जीवाणु टीका
- इस प्रकार के टीके रोगजनक को निष्क्रिय करके बनाए जाते हैं। इसके लिए रोगजनक कारक को सामान्यतः गर्म किया जाता है या फॉर्मेल्डिहाइड या फॉस्फोरिन जैसे रसायनों से उपचारित किया जाता है, जिससे उनकी विभाजन क्षमता नष्ट हो जाती है, लेकिन एंटीजन गुण सुरक्षित रहते हैं ताकि प्रतिरक्षा तंत्र उसे पहचान सके। उदाहरण : टाइफाइड, हैजा, पर्टुसिस (काली खांसी), रेबीज तथा पोलियोमाइलाइटिस।
टॉक्सॉइड टीका
- कुछ जीवाणु जनित रोग सीधे बैक्टीरिया के कारण नहीं होते, बल्कि उनके द्वारा उत्पन्न विषाक्त पदार्थों के कारण होते हैं। इसका एक उदाहरण टेटनस है। इसके लक्षण क्लोस्ट्रीडियम टेटनी बैक्टीरिया के कारण नहीं, बल्कि उसके द्वारा स्रावित न्यूरोटॉक्सिन टेटनोस्पास्मिन के कारण उत्पन्न होते हैं, जो टेटनस रोग का कारण बनता है। इसलिए इसकी रोकथाम के लिए टॉक्सॉइड टीके का उपयोग किया जाता है।टॉक्सॉइड टीका विषाक्त पदार्थों को भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रिया द्वारा परिशोधित करके उन्हें हानिरहित बनाया जाता है, लेकिन उनकी प्रतिजनता (इम्युनोजेनिसिटी) को बनाए रखा जाता है। उदाहरण – डिप्थीरिया, टेटनस आदि।
संयुग्म और यूनिट टीका
- संयुग्म टीके रिकॉम्बिनेंट टीकों के समान होते हैं। ये दो अलग-अलग घटकों से बनाए जाते हैं। इनमें बैक्टीरिया की शर्करा आवरण (पॉलीसैकराइड) को एक प्रोटीन वाहक से जोड़ा जाता है, जिससे विशेष रूप से शिशुओं में अधिक मजबूत प्रतिरक्षा विकसित होती है। इसके प्रमुख उदाहरण हैं – हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप b (Hib), न्यूमोकोकल संयुग्म टीका (PCV), मेनिंगोकोकल संयुग्म टीका तथा टाइफाइड संयुग्म टीका (TCV)।
- यूनिट टीकों में लक्षित रोगजनक के केवल एक भाग का उपयोग प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को उत्तेजित करने के लिए किया जाता है। इसमें किसी विशिष्ट रोगजनक से एक विशेष प्रोटीन को अलग करके एंटीजन के रूप में शरीर में प्रवेश कराया जाता है। उदाहरण : एसेल्यूलर पर्टुसिस टीका तथा इन्फ्लूएंजा टीका।
इंजीनियर्ड टीका
- टीकों का बड़े पैमाने पर उत्पादन रिकॉम्बिनेशन तकनीक की सहायता से किया जाता है, जिसमें रोगजनक के एंटीजन को यीस्ट या बैक्टीरिया में उत्पन्न किया जाता है। उदाहरण : हेपेटाइटिस टीका।
टीका
| टीका | रोग |
| Men5CV | मेनिन्जाइटिस |
| हिलकोल-(BBV-131), यूविकोल-प्लस | हैजा |
| RTS,S-01, R21/मैट्रिक्स-एम, एड फाल्सीवैक्स | मलेरिया |
| MVA-BN, जाइनिओस | मंकीपॉक्स |
| TAK-003, डेंगीऑल | डेंगू |
| कैडफ्लू-एस | इन्फ्लूएंजा |
| DPT वैक्सीन | डिप्थीरिया, पर्टुसिस (काली खांसी), टेटनस |
| MMR वैक्सीन | मीजल्स, मम्प्स और रूबेला के दुर्बलित स्ट्रेन |
| पेंटावैलेंट वैक्सीन | डिप्थीरिया, पर्टुसिस, टेटनस, हेपेटाइटिस-बी और Hib |
| BCG (बेसिलस-कैल्मेट-ग्युरिन) वैक्सीन | तपेदिक (क्षय रोग) और टीबी |
| न्यूमोकोकल वैक्सीन | न्यूमोकोकल रोग (निमोनिया, मेनिन्जाइटिस, कान/साइनस संक्रमण) |
| JE वैक्सीन | जापानी एन्सेफलाइटिस |
| एंटेरोमिक्स वैक्सीन | कैंसर (रूस द्वारा निर्मित, क्लिनिकल उपयोग हेतु तैयार) |
| टाइपबार-टीसीवी | टायफाइड |
मिशन इंद्रधनुष
- यह एक स्वास्थ्य मिशन है, जिसे 25 दिसंबर 2014 को प्रारंभ किया गया था।
- इसका उद्देश्य कम से कम 90% टीकाकरण सुनिश्चित करना है।
सघन मिशन इंद्रधनुष 5.0
- इसका उद्देश्य राष्ट्रीय टीकाकरण अनुसूची (NIS) के अनुसार सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) के अंतर्गत सभी टीकों के टीकाकरण कवरेज को बढ़ाना है।
- यह देश के सभी जिलों में चलाया जा रहा है तथा इसमें 5 वर्ष तक के बच्चों को शामिल किया गया है (पूर्व अभियानों में 2 वर्ष तक के बच्चों को शामिल किया गया था)।
- इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 रोके जा सकने वाले रोगों के विरुद्ध निःशुल्क टीके प्रदान किए जाते हैं :
- डिप्थीरिया, पर्टुसिस, टेटनस, पोलियो, मीजल्स, रूबेला, बचपन के क्षय रोग का गंभीर रूप, हेपेटाइटिस B, हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप B से होने वाला मेनिन्जाइटिस एवं निमोनिया, रोटावायरस डायरिया, न्यूमोकोकल निमोनिया तथा जापानी एन्सेफलाइटिस।

दवाएँ (औषधियां) एवं उनका वर्गीकरण
दवाएँ कम आणविक द्रव्यमान (~100–500 u) वाले रासायनिक पदार्थ होते हैं। ये मैक्रोआणविक लक्ष्यों के साथ अभिक्रिया करके जैविक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। जब यह जैविक प्रतिक्रिया उपचारात्मक और उपयोगी होती है, तो इन रसायनों को दवाएँ कहा जाता है तथा इनका उपयोग रोगों के निदान, रोकथाम और उपचार में किया जाता है। यदि इन्हें अनुशंसित मात्रा से अधिक मात्रा में लिया जाए, तो औषधि के रूप में उपयोग की जाने वाली अधिकांश दवाएँ विष के समान कार्य कर सकती हैं। उपचारात्मक प्रभाव के लिए रसायनों के उपयोग को रसायन चिकित्सा (कीमोथेरेपी) कहा जाता है।
दवाओं का वर्गीकरण
| वर्गीकरण का आधार | विवरण |
| औषधीय (फार्मोकोलॉजिकल) प्रभाव के आधार पर | यह वर्गीकरण दवाओं के औषधीय प्रभाव पर आधारित होता है। यह चिकित्सकों के लिए उपयोगी है क्योंकि यह किसी विशेष प्रकार की समस्या के उपचार के लिए उपलब्ध दवाओं की पूरी श्रेणी की जानकारी देता है। उदाहरण के लिए, एनाल्जेसिक्स दर्द निवारक प्रभाव रखते हैं, जबकि एंटीसेप्टिक्स सूक्ष्मजीवों को नष्ट करते हैं या उनकी वृद्धि को रोकते हैं। |
| दवा की क्रिया के आधार पर | यह किसी विशेष जैव-रासायनिक प्रक्रिया पर औषधि की क्रिया के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए, सभी एंटीहिस्टामिन शरीर में सूजन उत्पन्न करने वाले यौगिक हिस्टामिन की क्रिया को अवरुद्ध करते हैं। |
| रासायनिक संरचना के आधार पर | यह दवाओं की रासायनिक संरचना पर आधारित होता है। इस प्रकार वर्गीकृत दवाओं में समान संरचनात्मक विशेषताएं होती हैं और प्रायः इनकी फार्माकोलॉजिकल क्रिया भी समान होती है। उदाहरण के लिए, सल्फोनामाइड में समान संरचनात्मक विशेषताएं होती हैं। |
| आणविक लक्ष्य के आधार पर | दवाएँ सामान्यतः कार्बोहाइड्रेट, लिपिड, प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल जैसे जैव-अणुओं के साथ अभिक्रिया करती हैं। इन्हें लक्ष्य अणु या औषधि लक्ष्य कहा जाता है। कुछ समान संरचनात्मक विशेषताओं वाली औषधियों की लक्ष्य अणुओं पर क्रिया की प्रक्रिया समान हो सकती है। दवाओं का यह वर्गीकरण औषधीय रसायनज्ञों के लिए सबसे अधिक उपयोगी होता है। |
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दवा |
विवरण |
उदाहरण |
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एंटासिड |
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एंटीहिस्टामिन |
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ब्रोमफेनिरामीन (डाइमेटैप / डाइमेटेन) टेरफेनाडीन (सेल्डेन) सेट्रीजीन ![]() |
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गर्भनिरोधक दवाएँ |
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तंत्रिका सक्रिय औषधियां
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औषधि का प्रकार |
विवरण और उदाहरण |
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दर्द निवारकऔषधियां |
दर्द निवारक / पीड़ाहर (एनाल्जेसिक्स)एनाल्जेसिक्स वे औषधियां हैं जो बिना चेतना में कमी, मानसिक भ्रम, असमन्वय, पक्षाघात या तंत्रिका तंत्र के अन्य विकार उत्पन्न किए बिना दर्द को कम या समाप्त कर देती हैं।
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प्रशांतक |
![]() नॉरएड्रेनालिन एक न्यूरोट्रांसमीटर है, जो मनोदशा में परिवर्तन में भूमिका निभाता है। यदि किसी कारणवश नॉरएड्रेनालिन का स्तर कम हो जाता है, तो संकेत भेजने की क्रिया धीमी हो जाती है और व्यक्ति अवसाद से ग्रसित हो जाता है। ऐसी स्थिति में अवसादरोधी दवाओं की आवश्यकता होती है। अवसादरोधी दवाएं: इप्रोनाइज़िड, फेनल्जिन ![]() |
प्रतिजैविक
मनुष्यों और पशुओं में रोग विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीवों जैसे बैक्टीरिया, वायरस, फंगस तथा अन्य रोगजनकों के कारण हो सकते हैं।
प्रतिजैविक सूक्ष्म जीवों जैसे बैक्टीरिया (एंटीबैक्टीरियल दवाएं), फंगस (एंटिफंगल एजेंट), वायरस (एंटीवायरल एजेंट) या अन्य परजीवियों (एंटीपैरासिटिक दवाएं) की रोगजनक क्रिया को चयनात्मक रूप से नष्ट करने, उनके विकास को रोकने या अवरुद्ध करने का कार्य करते हैं। एंटीबायोटिक, एंटीसेप्टिक तथा कीटाणुनाशक प्रतिजैविक दवाएं हैं।
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प्रकार |
विवरण |
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एंटीबायोटिक दवाएं |
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एंटीसेप्टिक्स |
एंटीसेप्टिक्स जीवित ऊतकों जैसे घाव, कटाव, अल्सर तथा रोग ग्रस्त त्वचा की सतह पर लगाए जाते हैं। उदाहरण-फ्यूरासिन, सोफ्रामाइसिन आदि।
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एंटीमलेरियल |
मेफ्लोक्विन, क्लोरोक्विन, टाफेनोक्विन |
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एंटीवायरल |
एसाइक्लोविर, रेमडेसिविर, ज़िडोव्यूडिन, ओसेल्टामिविर |
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एंटीप्रोटोजोअल |
हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन, फ्यूराज़ोलिडोन, निटाज़ोक्सानाइड, क्विनिन, मेट्रोनिडाज़ोल |
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एंटिफंगल (कवक-रोधी) |
एम्फोटेरिसिन |
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एंटीवर्म / हेल्मिन्थ(कृमि-रोधी) |
एल्बेंडाज़ोल, मेबेंडाज़ोल, आइवरमेक्टिन |
बजट 2026–27 में चिकित्सा और स्वास्थ्य संबंधी प्रावधान
- बायोफार्मा शक्ति (Biopharma SHAKTI – Strategy for Healthcare Advancement through Knowledge, Technology & Innovation) अगले 5 वर्षों में ₹10,000 करोड़ के प्रावधान के साथ प्रारंभ की जाएगी।
- जामनगर स्थित WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर के उन्नयन के साथ 3 नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान स्थापित किए जाएंगे।
- राज-सुरक्षा (RAJ-SURAKSHA) आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली प्रारंभ की जाएगी।राज-ममता मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर में उत्कृष्टता केंद्र के साथ शुरू किया जाएगा।
- जेके लोन अस्पताल में 500 बेड का विस्तार तथा RUHS में 200 बेड की बाल चिकित्सा सुविधा विकसित की जाएगी।
- कोटा में एक नया राजकीय आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय निर्मित किया गया है।























