रक्त समूह और आरएच कारक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें मानव रक्त का वर्गीकरण रक्त में उपस्थित एंटीजन तथा Rh कारक के आधार पर समझाया जाता है। रक्त समूहों का ज्ञान सुरक्षित रक्ताधान, गर्भावस्था देखभाल तथा चिकित्सा निदान के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस विषय के अंतर्गत हम ABO रक्त समूह प्रणाली, Rh कारक, रक्त संगतता तथा उनके चिकित्सीय महत्व का अध्ययन करेंगे।
रक्त (Blood)
रक्त एक तरल जीवित ऊतक (Fluidic living tissue) है जो गाढ़ा, चिपचिपा और लाल रंग का होता है और रक्त वाहिकाओं में प्रवाहित होता है। यह मुख्य रूप से दो घटकों से बना होता है:
- प्लाज्मा (Plasma): यह रक्त का निर्जीव तरल माध्यम है।
- रक्त कणिकाएं (Blood Corpuscles): ये रक्त में पाई जाने वाली जीवित कोशिकाएं (जैसे RBC, WBC और प्लेटलेट्स) हैं।
प्लाज्मा के कार्य (Functions of Plasma):
- पोषक तत्वों का परिवहन: यह आंत (Intestine) द्वारा अवशोषित पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाने का कार्य करता है।
- अपशिष्ट पदार्थों का वहन: यह शरीर के विभिन्न अंगों से हानिकारक और अपशिष्ट पदार्थों को उत्सर्जी अंगों, जैसे वृक्क, तक ले जाता है ताकि उन्हें शरीर से बाहर निकाला जा सके।
रक्त कणिकाओं के प्रकार
रक्त में तीन अलग-अलग प्रकार की रक्त कणिकाएं/कोशिकाएं पाई जाती हैं। इन सभी का निर्माण अस्थि मज्जा (Bone marrow) में रक्तोत्पत्ति (Hematopoiesis) की प्रक्रिया द्वारा होता है, जो स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- लाल रक्त कणिकाएं (RBCs / एरिथ्रोसाइट्स):
- कार्य: फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन पहुँचाना और ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक लाना।
- मुख्य विशेषता: इनमें हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो ऑक्सीजन के साथ जुड़ता है और रक्त को लाल रंग प्रदान करता है।
- श्वेत रक्त कणिकाएं (WBCs / ल्यूकोसाइट्स):
- कार्य: ये प्रतिरक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो संक्रमण और बाहरी आक्रमणकारियों से शरीर की रक्षा करती हैं।
- प्रकार:
- न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils): बैक्टीरिया को निगलना और पचाना (भक्षकाणुक्रिया/Phagocytosis)।
- लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes): (T कोशिकाएं, B कोशिकाएं, NK कोशिकाएं) विशिष्ट प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं में शामिल।
- मोनोसाइट्स (Monocytes): ये मैक्रोफेज (बड़ी भक्षक कोशिकाओं) में परिवर्तित हो जाते हैं।
- इओसिनोफिल्स (Eosinophils): परजीवी संक्रमण से लड़ना और एलर्जी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करना।
- बेसोफिल्स (Basophils): सूजन और एलर्जी की स्थिति में हिस्टामाइन मुक्त करना।
- प्लेटलेट्स (Thrombocytes):
- कार्य: रक्त के स्कंदन (रक्त का थक्का जमना) और घाव भरने के लिए अनिवार्य, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव रुकता है।
- प्रकृति: ये छोटी कोशिका के टुकड़े होते हैं, पूर्ण कोशिकाएं नहीं।
रक्त कोशिका विकार, जैसे एनीमिया (लाल रक्त कणिकाओं या हीमोग्लोबिन की कमी), ल्यूकेमिया (रक्त बनाने वाले ऊतकों का कैंसर), और विभिन्न प्रतिरक्षा संबंधी कमियां, किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और कल्याण को प्रभावित कर सकती हैं।
प्रतिरक्षियों के प्रकार
- प्रतिरक्षियों (Antibodies) को पाँच भारी पॉलिपेप्टाइड शृंखलाओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है: α(अल्फा), γ (गामा), δ (डेल्टा), ε (एप्सिलॉन), और μ (म्यू)। इसके परिणामस्वरूप प्रतिरक्षी मुख्य रूप से पाँच प्रकार के होते हैं:
- IgG: यह रक्त और शरीर के तरल पदार्थों में पाया जाने वाला मुख्य प्रतिरक्षी है। सीरम में इसकी सांद्रता सर्वाधिक होती है, और यह एकमात्र ऐसा प्रतिरक्षी है जो अपरा (प्लेसेंटा) को पार करके भ्रूण तक पहुँच सकता है और उसे प्रतिरक्षा प्रदान कर सकता है।
- IgM: किसी प्रतिजन के शरीर में प्रवेश करने पर प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न होने वाला यह सबसे पहला प्रतिरक्षी है। इसकी संरचना पंचतयी या पेंटामेरिक होती है (यानी यह 5 इकाइयों से मिलकर बना होता है)।
- IgA: इसकी संरचना द्वितयी या डाइमेरिक होती है। यह माँ के प्रथम दुग्ध या खीस (Colostrum) में पाया जाने वाला मुख्य प्रतिरक्षी है, जो नवजात शिशु की प्रतिरक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- IgE: यह बेसोफिल (Basophils) और मास्ट कोशिकाओं (Mast cells) पर कार्य करता है और मुख्य रूप से एलर्जी प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है।
- IgD, IgE, और IgG: ये तीनों प्रतिरक्षी संरचना में एकलकी या मोनोमेरिक होते हैं (यानी ये एकल Y-आकार की इकाई से बने होते हैं)।
प्रतिरक्षियों के प्रकार और भारी पॉलिपेप्टाइड शृंखलाएँ
| क्र.सं. | प्रतिरक्षी का प्रकार | उपस्थित भारी पॉलिपेप्टाइड शृंखला |
| 1. | IgG | γ (गामा) |
| 2. | IgM | μ (म्यू) |
| 3. | IgA | α(अल्फा) |
| 4. | IgE | ε (एप्सिलॉन) |
| 5. | IgD | δ (डेल्टा) |
रक्त समूह (Blood Groups)
सर्वप्रथम, 1901 में एक ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टीनर (Karl Landsteiner) ने रक्त को विभिन्न रक्त समूहों में वर्गीकृत किया था।
रक्त समूह का निर्धारण कैसे होता है?
- किसी व्यक्ति का रक्त समूह क्या होगा, यह लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) या लाल रुधिर कणिकाओं की सतह पर प्रतिजनों (Antigens – A, B, Rh) की उपस्थिति या अनुपस्थिति द्वारा निर्धारित होता है।
- ये प्रतिजन विशेष प्रकार के प्रोटीन या शर्करा होते हैं।
- रक्त समूहों को मुख्य रूप से ABO रक्त समूह प्रणाली और Rh (आरएच) प्रणाली में वर्गीकृत किया जाता है।
- ABO रक्त समूह प्रणाली: यह A और B प्रतिजनों पर आधारित है।
- Rh (आरएच) प्रणाली: यह Rh प्रतिजन पर आधारित है, जिसे D प्रतिजन भी कहा जाता है।
- प्लाज्मा में प्रतिरक्षी (Antibodies) मौजूद होते हैं, जो उन प्रतिजनों को लक्षित करते हैं जो व्यक्ति के रक्त में अनुपस्थित होते हैं।
ABO रक्त समूह प्रणाली से संबंधित मुख्य बिंदु:
- रक्त समूह A: A प्रतिजन उपस्थित; प्लाज्मा में एंटी-B प्रतिरक्षी।
- रक्त समूह B: B प्रतिजन उपस्थित; प्लाज्मा में एंटी-A प्रतिरक्षी।
- रक्त समूह AB: A और B दोनों प्रतिजन उपस्थित; कोई प्रतिरक्षी नहीं। (सार्वभौमिक ग्राही)
- रक्त समूह O: कोई प्रतिजन नहीं। (सार्वभौमिक दाता)
- नोट: O रक्त समूह के प्लाज्मा में एंटी-A और एंटी-B दोनों प्रतिरक्षी होते हैं, इसलिए यह केवल O समूह से रक्त प्राप्त कर सकता है।
| रक्त समूह | प्रतिजन / समूहनजन (एंटीजन/एग्लूटिनोजन) | प्रतिरक्षी / समूहनिन (एंटीबॉडी/एग्लूटिनिन) |
| A | A | b (एंटी-B) |
| B | B | a (एंटी-A) |
| AB | A & B | अनुपस्थित |
| O | अनुपस्थित | a & b |
Rh कारक के मूल तथ्य
- लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर A और B प्रतिजनों के अतिरिक्त Rh कारक (Rh factor) नामक एक और प्रोटीन पाया जाता है, जो रक्त में उपस्थित (+) या अनुपस्थित (–) हो सकता है।
- खोज: Rh (रीसस) कारक की खोज रिसस मकाक बंदर (Macaca mulatta) में की गई थी।
- Rh+: यदि लाल रक्त कोशिकाओं पर Rh प्रतिजन उपस्थित है। (लगभग 85% मानव जनसंख्या)
- Rh-: यदि Rh प्रतिजन अनुपस्थित है। (लगभग 15% मानव जनसंख्या)
- संरचना: Rh कारक लगभग 417 अमीनो अम्लों से बना एक प्रोटीन है।
- मनुष्यों में प्रकार: मुख्य रूप से Rh D (सर्वाधिक), Rh E, Rh e, Rh C, और Rh c पाए जाते हैं।

रक्ताधान (Blood Transfusion)
- यह एक ऐसी विधि है जिसमें रक्त या रक्त उत्पादों जैसे प्लेटलेट्स (बिंबाणु), प्लाज्मा आदि को एक व्यक्ति के परिसंचरण तंत्र से दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित किया जाता है (चढ़ाया जाता है)।
- रक्त आधान के नियम
- रक्त आधान के समय, यह आवश्यक है कि दाता का रक्त ग्राही के रक्त से मेल खाता (Compatible) हो।
- यदि रक्त बेमेल (Mismatched) होता है, तो ग्राही के प्रतिरक्षी दाता की लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) पर हमला करते हैं। इस प्रक्रिया में, लाल रक्त कोशिकाएं आपस में चिपककर गुच्छे बना लेती हैं, जिसे रुधिर समूहन (Agglutination) कहा जाता है। अंततः, ये कोशिकाएं फट जाती हैं, जिसे रुधिर-लयन (Haemolysis) कहते हैं। यह स्थिति रोगी के लिए जानलेवा (fatal) हो सकती है।
- रक्ताधान के प्रकार
- समजात रक्ताधान (Allogenic Transfusion): जब किसी अन्य व्यक्ति (दाता) से प्राप्त रक्त का उपयोग किया जाता है।
- समजीवी/स्वजात रक्ताधान (Autogenic Transfusion): इसमें मरीज का ही पूर्व में एकत्रित किया गया रक्त उसे वापस चढ़ाया जाता है।
कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदु
- Rh− रक्त, Rh− और Rh+ दोनों प्रकार के रोगियों को दिया जा सकता है।
- Rh− रक्त में कोई Rh प्रोटीन नहीं होता है, इसलिए:
- यह Rh− रोगियों के लिए सुरक्षित है (क्योंकि इसमें कोई बाहरी प्रोटीन नहीं होता)।
- यह Rh+ रोगियों के लिए भी सुरक्षित है (Rh प्रोटीन की अनुपस्थिति के कारण शरीर कोई प्रतिक्रिया नहीं करता है)।
- अतः, Rh संगतता (Compatibility) के मामले में Rh− एक सार्वभौमिक दाता है।
- Rh− रक्त में कोई Rh प्रोटीन नहीं होता है, इसलिए:
- Rh+ रक्त केवल Rh+ रोगियों को ही दिया जा सकता है।
- Rh+ रक्त में Rh प्रोटीन उपस्थित होता है।
- यदि इसे Rh− रोगियों को दिया जाता है, तो उनका प्रतिरक्षा तंत्र इस Rh प्रोटीन को ‘बाह्य’ पदार्थ मानता है →और इसके खिलाफ एंटी-Rh प्रतिरक्षी बनाने लगता है।
- इसके परिणामस्वरूप हीमोलिटिक रक्ताधान प्रतिक्रिया (Hemolytic Transfusion Reaction – HTR) होती है → जो कि बहुत खतरनाक है।
- इसलिए, Rh+ रक्त कभी भी Rh− रोगियों को नहीं चढ़ाया जाना चाहिए।
Quick Table (रक्ताधान)
| दाता →ग्राही↓ | O– | O+ | A– | A+ | B– | B+ | AB– | AB+ |
| O– | ✔ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ |
| O+ | ✔ | ✔ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ |
| A– | ✔ | ✗ | ✔ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ |
| A+ | ✔ | ✔ | ✔ | ✔ | ✗ | ✗ | ✗ | ✗ |
| B– | ✔ | ✗ | ✗ | ✗ | ✔ | ✗ | ✗ | ✗ |
| B+ | ✔ | ✔ | ✗ | ✗ | ✔ | ✔ | ✗ | ✗ |
| AB– | ✔ | ✗ | ✔ | ✗ | ✔ | ✗ | ✔ | ✗ |
| AB+ | ✔ | ✔ | ✔ | ✔ | ✔ | ✔ | ✔ | ✔ |
यहाँ: ✔ = संगत (Compatible) ✗ = असंगत (Not compatible)
सार्वभौमिक दाता (Universal Donor: प्रकार O → O-)
- रक्त समूह का निर्धारण लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) पर मौजूद प्रतिजनों (Antigens) से होता है।
- O– (O-नेगेटिव) रक्त समूह में A, B या Rh कोई भी प्रतिजन नहीं होता है।
- इस विशेषता के कारण, जब किसी भी व्यक्ति को O– लाल रक्त कोशिकाएं चढ़ाई जाती हैं, तो प्राप्तकर्ता का शरीर उन्हें बाहरी नहीं मानता और कोई प्रतिक्रिया नहीं करता।
- इसलिए, O– रक्त को किसी भी रक्त समूह वाले रोगी को सुरक्षित रूप से दिया जा सकता है।
- यही कारण है कि लाल रक्त कोशिकाओं के रक्ताधान के लिए O– को सार्वभौमिक दाता (Universal Donor) कहा जाता है।
महत्वपूर्ण नोट: O– रक्त के प्लाज्मा में एंटी-A और एंटी-B प्रतिरक्षी (Antibodies) होते हैं। हालांकि, रक्त चढ़ाने (रक्ताधान) के दौरान, प्लाज्मा में मौजूद प्रतिरक्षियों के बजाय लाल रक्त कोशिकाओं पर मौजूद प्रतिजनों पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया जाता है।

सार्वभौमिक ग्राही (Universal Recipient: प्रकार AB → AB+)
- प्रकार AB रक्त के प्लाज्मा में कोई प्रतिरक्षी (Antibodies) नहीं होते हैं, जिसका अर्थ है कि इसमें बाहर से आने वाले रक्त पर हमला करने वाला कोई “सुरक्षा तंत्र” नहीं होता है।
- अतः, AB रक्त समूह वाला व्यक्ति किसी भी रक्त समूह से सुरक्षित रूप से रक्त प्राप्त कर सकता है।
- विशेष रूप से AB+ सार्वभौमिक ग्राही होता है, क्योंकि इसमें Rh प्रतिरक्षी भी नहीं बनता है।
रक्ताधान से संबंधित रोग या संक्रमण
- रक्ताधान के दौरान बरती गई असावधानी (लापरवाही) के कारण निम्नलिखित रोग या संक्रमण हो सकते हैं:
- HIV-1 और HIV-2 (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस/मानव प्रतिरक्षा न्यूनता वायरस)
- HTLV-1 और HTLV-2 (ह्यूमन टी-लिम्फोट्रोपिक वायरस)
- हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis-B) और हेपेटाइटिस-सी (Hepatitis-C) (यकृत शोथ)
- क्रुट्ज़फेल्ड-जैकब रोग आदि।
रुधिर समूहन (Agglutination)
- समूहन एक ऐसी अभिक्रिया है जो तब होती है जब कण, जैसे कि जीवाणु या लाल रक्त कोशिकाएं, किसी तरल में आपस में चिपक कर गुच्छे (Clump) बना लेते हैं।
- यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब एक प्रतिजन (Antigen) – जो प्रतिरक्षा अनुक्रिया को प्रेरित करने वाला अणु है – को एक उपयुक्त तापमान और pH पर उसके संगत प्रतिरक्षी (Antibody) के साथ मिलाया जाता है।
- ये प्रतिरक्षी, जिन्हें समूहनिन (Agglutinins) कहा जाता है, प्रतिजनों के साथ बंध (Bind) बनाते हैं और एक जालक के समान संरचना का निर्माण करते हैं।
- इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले प्रतिजन को समूहनजन (Agglutinogen) कहा जाता है।
| रक्त समूह | प्रतिजन / समूहनजन (एंटीजन/एग्लूटिनोजन) | प्रतिरक्षी / समूहनिन (एंटीबॉडी/एग्लूटिनिन) |
| A | A | b (एंटी-B) |
| B | B | a (एंटी-A) |
| AB | A & B | अनुपस्थित |
| O | अनुपस्थित | a & b |
रक्त समूह परीक्षण (Agglutination Test)
- रक्त समूह का निर्धारण करने के लिए रक्त कोशिकाओं को एंटी-A (anti-A), एंटी-B (anti-B) और एंटी-Rh (एंटी-D) सीरम के साथ मिलाया जाता है। इन सीरम (Sera) में क्रमशः A, B और Rh (D) प्रतिजनों के विरुद्ध प्रतिरक्षी (Antibodies) होते हैं।
- समूहन (Agglutination): इसका अर्थ है लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) का आपस में चिपक कर गुच्छे बनाना।
- यह तब होता है जब परीक्षण सीरम (Test serum) में मौजूद प्रतिरक्षी, RBC की सतह पर स्थित अपने संगत प्रतिजनों (Matching antigens) से जुड़ जाते हैं।
- समूहन होना → इसका अर्थ है कि संबंधित प्रतिजन उपस्थित है।
- एंटी-A सीरम के साथ समूहन → A प्रतिजन उपस्थित है।
- एंटी-B सीरम के साथ समूहन → B प्रतिजन उपस्थित है।
- एंटी-Rh सीरम के साथ समूहन → रक्त समूह Rh+ (धनात्मक) है।
- समूहन न होना → इसका अर्थ है कि प्रतिजन अनुपस्थित है।
1. एक रक्त नमूना प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया, जिसमें निम्नलिखित प्रतिक्रियाएँ देखी गईं:
- एंटी-A सीरम → एग्लूटिनेशन
- एंटी-B सीरम → एग्लूटिनेशन
- एंटी-Rh सीरम → कोई प्रतिक्रिया नहीं
यह कौन-सा रक्त समूह है?
- AB+
- AB–
- O–
- B–
- अनुत्तरित प्रश्न
उत्तर- ( 2 )
व्याख्या:-
- एंटी-A के साथ अभिक्रिया → समूह बनना → A प्रतिजन उपस्थित।
- एंटी-B के साथ अभिक्रिया → समूह बनना → B प्रतिजन उपस्थित।
- एंटी-Rh के साथ कोई अभिक्रिया नहीं → Rh प्रतिजन अनुपस्थित → Rh ऋणात्मक (negative)।
- अतः, रक्त समूह AB– है।
Rh असंगतता (Rh Incompatibility)
Rh असंगतता क्या है?
- आरएच (Rh) असंगतता एक ऐसी स्थिति है जो तब उत्पन्न होती है जब एक Rh-ऋणात्मक (Rh-negative) गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे शिशु (भ्रूण) का रक्त Rh-धनात्मक (Rh-positive) होता है।
- यह असंगति शिशु को Rh-धनात्मक रक्त उसके पिता से वंशागत रूप में मिलने के कारण होती है।
- इस असंगति के कारण नवजात शिशु में गंभीर बीमारी हो सकती है, जिसे गर्भ रक्ताणुकोरकता (Erythroblastosis Fetalis) या नवजात का हीमोलिटिक रोग (Hemolytic Disease of the Newborn – HDN) कहा जाता है।
यह कैसे होता है? (क्रियाविधि)
- संवेदीकरण (Sensitization): जब एक Rh-ऋणात्मक माँ का रक्त Rh-धनात्मक शिशु की लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) के संपर्क में आता है (आमतौर पर प्रसव के दौरान, या रक्तस्राव की स्थिति में), तो माँ का प्रतिरक्षा तंत्र शिशु की RBCs पर मौजूद Rh प्रोटीन को एक “बाहरी तत्व” मानकर प्रतिक्रिया करता है।
- एंटीबॉडी का निर्माण: इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप, माँ का शरीर Rh-धनात्मक कोशिकाओं के विरुद्ध विशेष प्रतिरक्षी (Antibodies) बनाना शुरू कर देता है, जिन्हें एंटी-D (anti-D) प्रतिरक्षी कहा जाता है।
- प्रथम गर्भावस्था: पहला Rh-धनात्मक शिशु आमतौर पर अप्रभावित रहता है, क्योंकि इस समय तक एंटीबॉडी का निर्माण कम मात्रा में हुआ होता है।
- द्वितीय गर्भावस्था में जटिलताएँ: यदि माँ की दूसरी गर्भावस्था में भी शिशु Rh-धनात्मक है, तो पूर्व में बने ये एंटी-D प्रतिरक्षी (विशेष रूप से IgG प्रकार के) अपरा (Placenta) को पार कर जाते हैं।
- हमला और विनाश: ये प्रतिरक्षी गर्भस्थ शिशु की लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करके उन्हें नष्ट करना शुरू कर देते हैं, जिससे शिशु को गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
- प्रक्रिया का सारांश: माँ (Rh–) + भ्रूण (Rh+) → भ्रूण की कोशिकाएं माँ में प्रवेश करती हैं → माँ में एंटी-D (anti-D) का निर्माण → अगला Rh+ भ्रूण → एंटीबॉडी प्लेसेंटा को पार करते हैं → भ्रूण की RBCs का विनाश।
- इस स्थिति को रोकने के लिए RhoGAM दिया जाता है।
रोगाम/RhoGAM (Rh इम्यूनोग्लोबुलिन)
- यह Rho(D) इम्यून ग्लोबुलिन से बनी एक दवा है, जिसमें Rh प्रतिजन के विरुद्ध IgG एंटी-D प्रतिरक्षी होते हैं। यह उन Rh-ऋणात्मक गर्भवती महिलाओं को दिया जाता है जिनमें Rh+ भ्रूण के रक्त के प्रति संवेदीकरण (Sensitization) का जोखिम होता है।
- कार्य प्रणाली
- रोगाम में मौजूद एंटी-D प्रतिरक्षी माँ के रक्तप्रवाह में प्रवेश कर चुकी Rh+ भ्रूण की RBCs से तुरंत जुड़ जाते हैं।
- ये उन्हें आच्छादित (Mask/Cover) करके माँ के प्रतिरक्षा तंत्र की पहचान से छिपा देते हैं और उन्हें शरीर से बाहर निकाल देते हैं।
- यह क्रिया माँ के शरीर को Rh-धनात्मक कोशिकाओं के विरुद्ध अपने स्वयं के एंटीबॉडी (एंटी-Rh प्रतिरक्षी) बनाने से रोकती है, जिसे एलोइम्यूनाइजेशन रोकथाम कहा जाता है।

रक्त समूहों की आनुवंशिकता (Heredity)
- मनुष्यों में कई अलग-अलग प्रकार के रक्त समूह पाए जाते हैं। इन्हें ABO रक्त समूह प्रणाली के रूप में संबोधित किया जाता है।
- ABO रक्त समूह प्रणाली की वंशागति:
- निर्धारण: इस प्रणाली का निर्धारण एक ही जीन के तीन युग्मविकल्पी (Alleles) द्वारा होता है: Iᴬ, Iᴮ, और i (या Iᴼ)।
- Iᴬ: लाल रुधिर कणिकाओं (RBCs) की सतह पर A प्रतिजन उत्पन्न करता है।
- Iᴮ: RBCs की सतह पर B प्रतिजन उत्पन्न करता है।
- i (या Iᴼ): यह एक अप्रभावी (Recessive) युग्मविकल्पी है और किसी भी रक्त प्रतिजन का उत्पादन नहीं करता है।
- अभिव्यक्ति और जीन प्ररूप:
- रक्त समूह की अभिव्यक्ति किन्हीं दो एलीलों की अंतःक्रिया पर निर्भर करती है।
- मनुष्यों में रक्त के कुल छह जीन प्ररूप (Genotypes) पाए जाते हैं।
- रक्त समूह ‘O’ समयुग्मजी अप्रभावी अंतःक्रिया (ii या IᴼIᴼ) का परिणाम होता है।
- आधार: यह वंशागति मेंडलीय वंशागति (Mendelian inheritance) के नियमों का पालन करती है।
रक्त समूहों के जीन प्ररूप
| क्र.सं. | रक्त समूह | जीन प्ररूप (Genotype) |
| 1. | A | Iᴬ Iᴬ, Iᴬ i |
| 2. | B | Iᴮ Iᴮ, Iᴮ i |
| 3. | AB | Iᴬ Iᴮ |
| 4. | O | i i |
रक्त समूह वंशागति के अनुप्रयोग
- पितृत्व विवादों को सुलझाने में: आनुवंशिक नियमों के आधार पर बच्चे के संभावित रक्त समूह का मिलान करके माता-पिता से संबंधित कानूनी विवादों का समाधान किया जाता है।
- रक्ताधान में: दाता और ग्राही के बीच रक्त की अनुकूलता की जाँच करने के लिए, ताकि रक्ताधान सुरक्षित रूप से संपन्न हो सके।
- चिकित्सा उपचार में:नवजात शिशु के रुधिर-लयन (Neonatal blood hemolysis) जैसे ‘गर्भ रक्ताणुकोरकता’ (Erythroblastosis fetalis) के उपचार में तथा हीमोफीलिया जैसे वंशानुगत विकारों के प्रबंधन और उपचार में।
उदाहरण
1. एक महिला जिसका रक्त समूह O+ है, गर्भवती है। बच्चे के पिता का रक्त समूह AB– है।
व्याख्या:
- पिता (AB–) और माता (O+): ऐसे माता-पिता से बच्चे का रक्त समूह O होना असंभव है क्योंकि पिता केवल A या B एलील प्रदान कर सकते हैं और माता केवल O एलील दे सकती है। इसलिए बच्चे को पिता से कम से कम एक A या B एलील अवश्य प्राप्त होगा। इस कारण बच्चा O रक्त समूह का नहीं हो सकता।
- संभावित संयोजन (पिता (AB–) और माता (O+))
| माता →पिता↓ | O | O |
| A | AO (रक्त समूह A) | AO (रक्त समूह A) |
| B | BO (रक्त समूह B) | BO (रक्त समूह B) |
2. एक दंपत्ति का रक्त समूह AB+ और A– है।
व्याख्या:
ABO रक्त समूह भाग
- अभिभावक 1 (AB): जीनोटाइप IA IB → इसलिए उनका शुक्राणु/अंडाणु या तो IA या IB देगा।
- अभिभावक 2 (A): जीनोटाइप IA IA या IA i हो सकता है (A समूह समजात या O का वाहक दोनों हो सकता है)। इसलिए वह IA या कभी-कभी i एलील देगा।
संभावित संतान
| अभिभावक 1 → अभिभावक 2↓ | IA | IB |
| IA | IA IA (रक्त समूह A) | IA IB (रक्त समूह AB) |
| i | IA i (रक्त समूह A) | IB i (रक्त समूह B) |
- इस प्रकार, बच्चे के संभावित ABO रक्त समूह: A, B या AB।
- O संभव नहीं है, क्योंकि O के लिए बच्चे को ii चाहिए, लेकिन AB अभिभावक के पास ii एलील नहीं है।
Rh (धनात्मक/ऋणात्मक) भाग
- AB+ अभिभावक: Rh पॉजिटिव → जीनोटाइप DD या Dd हो सकता है।
- A– अभिभावक: Rh नेगेटिव → जीनोटाइप dd।
- यदि AB+ अभिभावक DD है → सभी बच्चे Rh+ होंगे।
- Rh (धनात्मक/ऋणात्मक) भाग
- AB+ अभिभावक: Rh पॉजिटिव → जीनोटाइप DD या Dd हो सकता है।
- A– अभिभावक: Rh नेगेटिव → जीनोटाइप dd।
- यदि AB+ अभिभावक DD है → सभी बच्चे Rh+ होंगे।
3. एक बच्चे का रक्त समूह AB है। बच्चे के जैविक माता-पिता का निर्धारण करें।
व्याख्या:
बच्चे का रक्त समूह: AB
- AB बच्चे का जीनोटाइप = IA IB
- इसका अर्थ है कि बच्चे को एक अभिभावक से A एलील और दूसरे से B एलील मिलना चाहिए।
- इसलिए, कम से कम एक अभिभावक के पास A (A या AB) और दूसरे के पास B (B या AB) होना आवश्यक है।
अब प्रत्येक दंपत्ति की जाँच करते हैं:
- A और B → A अभिभावक IA दे सकता है, B अभिभावक IB दे सकता है → AB संभव।
- AB और O → AB (IA IB) IA या IB दे सकता है, लेकिन O (ii) केवल i दे सकता है → संतान IA i (A) या IB i (B) होगी → कभी भी AB नहीं।
- AB और A → AB IB दे सकता है, A IA दे सकता है → AB संभव।
- B और AB → B IB दे सकता है, AB IA दे सकता है → AB संभव।
अन्य रक्त समूह प्रणालियाँ
बॉम्बे ब्लड ग्रुप (hh phenotype)
- खोज: 1952 में डॉ. वाई. एम. भेंडे द्वारा बॉम्बे (अब मुंबई) में की गई।
- मूल कारण: लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) पर H एंटीजन का पूर्ण अभाव होना।
- मुख्य विशेषताएँ:
- इस रक्त समूह में न तो A और न ही B एंटीजन पाया जाता है।
- इसके प्लाज्मा में एंटी-H एंटीबॉडीज़ उपस्थित होती हैं।
- यह अत्यंत दुर्लभ है (भारत में लगभग 10,000 लोगों में 1 और विश्व स्तर पर इससे भी कम)।
- रक्तदान/रक्ताधान संगतता (Compatibility):
- दाता के रूप में: यदि Rh कारक मेल खाता है, तो यह सभी ABO रक्त समूहों (A, B, AB, O) को सुरक्षित रूप से रक्त दे सकता है।
- ग्राही के रूप में: एंटी-H एंटीबॉडीज़ की उपस्थिति के कारण, यह किसी भी अन्य ABO रक्त समूह (यहाँ तक कि O समूह) से रक्त नहीं ले सकता।
- सुरक्षित रक्ताधान: यह केवल बॉम्बे ब्लड ग्रुप (hh) वाले दाता से ही रक्त प्राप्त कर सकता है।
क्रोमर रक्त समूह प्रणाली
क्रोमर रक्त समूह प्रणाली
- 47 अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त रक्त समूह प्रणालियों में से एक।
- यह एक रक्त समूह प्रणाली है जो लाल रक्त कोशिकाओं की झिल्लियों में पाए जाने वाले ग्लाइकोप्रोटीन से जुड़े एंटीजन पर आधारित होती है।
- इसमें सामान्य और दुर्लभ दोनों प्रकार के एंटीजन शामिल होते हैं।
- दुर्लभ एंटीजन के खिलाफ एंटीबॉडी निम्नलिखित के कारण विकसित हो सकते हैं: गर्भावस्था, ट्रांसफ्यूजन या आनुवंशिक उत्परिवर्तन।
News: 2025 में, भारत और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने कर्नाटक के बेंगलुरु के पास कोलार की 38 वर्षीय महिला में एक नया, अत्यंत दुर्लभ रक्त समूह CRIB की पहचान की।
CRIB रक्त समूह क्या है?
- CRIB का अर्थ है Cromer India Bengaluru → क्रोमर (रक्त समूह प्रणाली) और भारत-बेंगलुरु (खोज का स्थान)।
- यह क्रोमर (CR) रक्त समूह प्रणाली के अंतर्गत एक नया एंटीजन है।
- वर्गीकरण: यह ABO या Rh प्रणालियों से संबंधित नहीं है; यह INRA (Indian Rare Antigen) प्रणाली के अंतर्गत आता है।
CRIB की विशिष्टता:
- एक उच्च-प्रचलित एंटीजन की अनुपस्थिति → पैनरिएक्टिविटी उत्पन्न करता है → इसमें मौजूद रक्त किसी भी ज्ञात दाता के नमूने से मेल नहीं खाता → इसके कारण ट्रांसफ्यूजन लगभग असंभव हो जाता है।
- वैश्विक स्तर पर CRIB रक्त समूह वाला केवल एक ज्ञात व्यक्ति → अब तक का सबसे दुर्लभ रक्त समूह।
दुर्लभ रक्त समूहों की तुलना: बॉम्बे बनाम CRIB बनाम Rh-null
| विशेषता | बॉम्बे रक्त समूह (hh) | CRIB रक्त समूह | Rh-null रक्त समूह |
| खोज | 1952, डॉ. वाई.एम. भेंडे, मुंबई | 2025, कोलार (कर्नाटक) – भारतीय और ब्रिटिश वैज्ञानिकों द्वारा | 1961, ऑस्ट्रेलिया |
| प्रणाली | ABO-संबंधित (H प्रतिजन की अनुपस्थिति) | क्रोमर (Cromer) तंत्र (INRA – भारतीय दुर्लभ प्रतिजन) | Rh तंत्र (सभी Rh प्रतिजनों की अनुपस्थिति) |
| प्रमुख विशेषता | इसमें H प्रतिजन का अभाव होता है (इसलिए A/B/O को सही ढंग से अभिव्यक्त नहीं कर पाता)। | एक उच्च-प्रसार वाले क्रोमर प्रतिजन (Cromer antigen) की अनुपस्थिति। | लाल रक्त कोशिका (RBC) की सतह पर सभी Rh प्रतिजनों का अभाव। |
| आवृत्ति | भारत में ~10,000 में 1; वैश्विक स्तर पर अत्यंत दुर्लभ। | विश्व स्तर पर केवल 1 ज्ञात व्यक्ति। | विश्व स्तर पर 50 से भी कम ज्ञात व्यक्ति। |
| संगतता | ABO तंत्र में किसी को भी दान कर सकता है, लेकिन केवल बॉम्बे समूह से ही रक्त ले सकता है। | अब तक कोई संगत दाता नहीं मिला (सभी ज्ञात नमूनों के साथ प्रतिक्रियाशील)। | Rh-null रोगियों के लिए सर्वदाता, लेकिन केवल Rh-null से ही रक्त प्राप्त कर सकता है। |
| चिकित्सा चुनौती | पहचान न होने पर रक्ताधान संकट; अक्सर इसे गलती से ‘O’ समूह समझ लिया जाता है। | सभी नमूनों के साथ असंगति के कारण रक्ताधान लगभग असंभव। | रक्ताधान अत्यंत कठिन; बहुत ही दुर्लभ दाता। |
| महत्व | रक्त समूहों में भारत की आनुवंशिक विविधता को दर्शाता है। | नए दुर्लभ प्रतिजन की खोज में भारत के वैश्विक योगदान को चिह्नित करता है। | इसे “गोल्डन ब्लड” कहा जाता है → अनुसंधान और रक्ताधान चिकित्सा हेतु महत्वपूर्ण। |
| भारत के लिए प्रासंगिकता | भारत में उच्च प्रसार (विशेषकर महाराष्ट्र और गुजरात में)। | भारत (कर्नाटक, 2025) से पहली वैश्विक खोज। | दुर्लभ लेकिन चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण; भारत को इसकी रजिस्ट्री बनाए रखने की आवश्यकता है। |
