जैव विविधता व प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण: विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने तथा सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। वन, जल, भूमि और जीव-जंतुओं की सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, संरक्षण नीतियाँ और जनभागीदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और सतत विकास
जैव विविधता को सभी स्रोतों से प्राप्त जीवित जीवों के बीच पाई जाने वाली विविधता के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसमें स्थलीय, समुद्री और अन्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्र तथा उनसे जुड़े पारिस्थितिकीय तंत्र शामिल होते हैं। इसमें प्रजातियों के भीतर की विविधता, प्रजातियों के बीच की विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता शामिल होती है। — संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन (1992)
हमारे जैव मंडल में अपार विविधता पाई जाती है, जो केवल प्रजाति स्तर पर ही नहीं बल्कि जैविक संगठन के सभी स्तरों पर मौजूद है। यह विविधता कोशिकाओं के भीतर मैक्रोमोलेक्यूल्स (वृहद अणु) से लेकर बड़े पारिस्थितिकी क्षेत्रों (बायोम) तक फैली होती है।
जैव विविधता शब्द को समाज जीवविज्ञानी एडवर्ड विल्सन ने लोकप्रिय बनाया, जिसका उपयोग जैविक संगठन के सभी स्तरों पर पाई जाने वाली संयुक्त विविधता को बताने के लिए किया जाता है।
इनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैं-
आनुवंशिक विविधता: एक ही प्रजाति के भीतर जीनों में पाए जाने वाले अंतर को आनुवंशिक विविधता कहा जाता है। इस विविधता के कारण एक ही प्रजाति के जीव अलग-अलग दिख सकते हैं, अलग तरीके से विकसित हो सकते हैं या उनकी विशेषताएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं।
किसी एक प्रजाति में उसके वितरण क्षेत्र के अनुसार आनुवंशिक स्तर पर अधिक विविधता हो सकती है। उदाहरण के लिए, औषधीय पौधा राऊवोल्फिया वोमिटोरिया जो विभिन्न हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है, उसमें सक्रिय रसायन रेसरपीनकी मात्रा और प्रभावशीलता अलग-अलग हो सकती है।
भारत में चावल की 50,000 से अधिक आनुवंशिक रूप से अलग किस्में और आम की लगभग 1,000 किस्में पाई जाती हैं।
प्रजातीय विविधता: प्रजाति स्तर पर पाई जाने वाली विविधता को प्रजातीय विविधता कहा जाता है। उदाहरण के लिए, पश्चिमी घाट में उभयचर प्रजातियों की विविधता पूर्वी घाट की तुलना में अधिक है।
पारिस्थितिक विविधता: पारिस्थितिकी तंत्र के स्तर पर पाई जाने वाली विविधता को पारिस्थितिक विविधता कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, भारत में रेगिस्तान, वर्षावन, मैंग्रोव, कोरल रीफ, आर्द्रभूमि, मुहाने (estuaries) और अल्पाइन घास भूमि जैसे कई प्रकार के पारिस्थितिक तंत्र पाए जाते हैं, इसलिए यहाँ की पारिस्थितिक विविधता नॉर्वे जैसे स्कैंडिनेवियाई देश की तुलना में अधिक है।
प्रकृति में इतनी समृद्ध जैव विविधता को बनने में लाखों वर्षों का विकास लगा है, लेकिन यदि प्रजातियों के नष्ट होने की वर्तमान गति जारी रही, तो हम इस पूरी प्राकृतिक संपदा को दो शताब्दियों से भी कम समय में खो सकते हैं।
इसी कारण आज जैव विविधता और उसका संरक्षण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्दा बन गया है, क्योंकि दुनिया भर के लोग अब यह समझने लगे हैं कि इस पृथ्वी पर हमारे जीवन और कल्याण के लिए जैव विविधता अत्यंत आवश्यक है।
पृथ्वी पर कितनी प्रजातियां हैं?
वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर लगभग 8.7 मिलियन यूकैरियोटिक प्रजातियाँ हैं, लेकिन इनमें से केवल लगभग 1.2 मिलियन प्रजातियों का ही औपचारिक रूप से वर्णन किया गया है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी पर जीवन का 80% से अधिक हिस्सा अभी भी अज्ञात है।
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, पृथ्वी पर ज्ञात सभी प्रजातियों में 70% से अधिक प्रजातियां जानवरों की हैं।
पौधे (जिनमें शैवाल, कवक, ब्रायोफाइटा, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म शामिल हैं) कुल प्रजातियों का लगभग 22% बनाते हैं।
जानवरों में कीट सबसे अधिक विविध समूह हैं, जो सभी पशु प्रजातियों का 70% से अधिक हिस्सा बनाते हैं। इसका मतलब है कि पृथ्वी पर हर 10 में से लगभग 7 जानवर कीट हैं।
कवक की प्रजातियों की संख्या मछलियों, उभयचरों, सरीसृपों और स्तनधारियों की कुल संख्या से भी अधिक है।
भारत की जैव विविधता
भारत को मेगा-विविधता वाले देशों में से एक माना जाता है, जहाँ जैव विविधता और उससे जुड़ा पारंपरिक ज्ञान बहुत समृद्ध है।
भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 23.39% भाग वन और वृक्ष आवरण के अंतर्गत आता है।
विश्व औसत 11% की तुलना में भारत में 44% फसलों की विविधता पाई जाती है।
भारत में दो जीवमंडल(रियल्म), पाँच जैवक्षेत्र\जीवोम (बायोम) और दस जैव-भौगोलिक क्षेत्र पाए जाते हैं।
हालांकि भारत के पास दुनिया के कुल भू-क्षेत्र का केवल 2.4% हिस्सा है, फिर भी यहाँ वैश्विक प्रजाति विविधता का लगभग 8.1% पाया जाता है। यही कारण है कि भारत को दुनिया के 17 मेगा-विविधता वाले देशों में शामिल किया गया है।
भारत में लगभग 45,000 पौधों की प्रजातियाँ और लगभग 90,000 पशु प्रजातियां दर्ज की गई है।
जैव विविधता का मापन
जैव विविधता को मुख्य रूप से दो घटकों के आधार पर मापा जाता है:प्रजाति समृद्धि प्रजाति समानता
प्रजाति समृद्धि
किसी समुदाय या क्षेत्र में पाई जाने वाली कुल प्रजातियों की संख्या को प्रजाति समृद्धि कहा जाता है।जैव विविधता को विभिन्न स्थानिक स्तरों पर मापने के लिए आर.एच. व्हिटेकर ने वर्ष 1972 में अल्फा, बीटा और गामा विविधता की अवधारणा प्रस्तुत की।
अल्फा विविधता – यह किसी एक विशेष क्षेत्र या पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर पाई जाने वाली प्रजातियों की संख्या को दर्शाती है। सरल शब्दों में, यह उस क्षेत्र की प्रजाति समृद्धि है।
बीटा विविधता –यह दो पारिस्थितिकी तंत्रों के बीच प्रजातियों की विविधता की तुलना को दर्शाती है। अर्थात, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रजातियों में होने वाले परिवर्तन को मापती है।
गामा विविधता – यह किसी बड़े क्षेत्र या पूरे क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्रों की कुल मिलाकर विविधता को दर्शाती है।
प्रजाति समानता
यह किसी क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के अनुपात को मापता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी स्थान पर समानता कम है, तो इसका अर्थ है कि वहाँ कुछ ही प्रजातियाँ अधिक संख्या में पाई जाती हैं और वही उस क्षेत्र पर प्रभुत्व रखती हैं।
जैव विविधता के प्रतिरूप
पृथ्वी पर जैव विविधता समान रूप से वितरित नहीं है। कुछ क्षेत्रों में अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।
पारिस्थितिक अवधारणा
व्याख्या
अक्षांशीय प्रवणता
प्रजातियों की विविधता भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर कम होती जाती है।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (23.5° उत्तर से 23.5° दक्षिण) में समशीतोष्ण या ध्रुवीय क्षेत्रों की तुलना में अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।
उदाहरण के लिए, उष्णकटिबंधीय वन (जैसे इक्वाडोर) में समान आकार के समशीतोष्ण वनों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक पौधों की प्रजातियां पाई जाती हैं।
अमेज़न वर्षावन में पृथ्वी पर सबसे अधिक जैव विविधता पाई जाती है।
प्रजाति–क्षेत्र संबंध
अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट ने यह देखा कि जब हम बड़े क्षेत्रों का अध्ययन करते हैं, तो सामान्यतः हमें अधिक प्रजातियां मिलती हैं, लेकिन यह वृद्धि एक सीमा तक ही होती है।
कई समूहों (जैसे पौधे, पक्षी, चमगादड़ और मछलियाँ) के लिए प्रजाति–क्षेत्र संबंध
आयताकार अतिपरवलय के रूप में दिखाई देता है।
जब इसे लॉग–लॉग पैमाने पर दर्शाया जाता है, तो यह सीधी रेखा बन जाता है।
सामान्य आकार के क्षेत्रों (जैसे वन, पार्क, अभयारण्य) के लिए Z का मान सामान्यतः 0.1 से 0.2 के बीच होता है।
यह स्थिति ब्रिटेन के पौधों, कैलिफोर्निया के पक्षियों और न्यूयॉर्क के मोलस्क जैसे कई समूहों में देखी गई है।बहुत बड़े क्षेत्रों (जैसे पूरे महाद्वीप) के लिए Z का मान अधिक होता है — लगभग 0.6 से 1.2 के बीच।
उदाहरण के लिए, विभिन्न महाद्वीपों के उष्णकटिबंधीय वनों में फल खाने वाले पक्षियों और स्तनधारियों के लिए Z = 1.15 पाया गया है।
Z का मान अधिक होने का अर्थ:
क्षेत्र बढ़ने पर प्रजातियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है।
बड़े क्षेत्रों में छोटे क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक जैव विविधता होती है।
बड़े क्षेत्रों के बीच प्रजातियों में अधिक बदलाव देखने को मिलता है।
जैव विविधता का ह्रास
आज के समय में प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने का मुख्य कारण मानव गतिविधियाँ हैं। जैव विविधता के नुकसान के चार प्रमुख कारण हैं, जिन्हें मिलकर “द इविल क्वार्टेट” कहा जाता है।
कारक
जीव विविधता का प्रभाव
प्राकृतिक आवास नष्ट और विखंडन
आवास का नष्ट होना कई पौधों और जानवरों के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण है।
इसका सबसे गंभीर उदाहरण उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में देखा जाता है।
पहले ये पृथ्वी के कुल भूभाग के लगभग 14% हिस्से को ढकते थे, लेकिन आज यह घटकर लगभग 6% रह गए हैं।
वर्षा वनों का तेजी से विनाश हो रहा है।अमेज़न वर्षावन, जिसे “पृथ्वी के फेफड़े” कहा जाता है, मुख्य रूप से इन कारणों से साफ किया जा रहा है: सोयाबीन की खेती और गोमांस के लिए मवेशियों के चारागाह।जब बड़े आवास छोटे-छोटे हिस्सों में टूट जाते हैं (विखंडन): बड़े क्षेत्र की आवश्यकता वाले जानवर (जैसे कई स्तनधारी और पक्षी) प्रभावित होते हैं।
प्रवासी प्रजातियां विशेष रूप से अधिक प्रभावित होती हैं।
इसके परिणामस्वरूप प्रजातियों की जनसंख्या घटने लगती है और कई बार वे विलुप्त भी हो जाती हैं।
अति-दोहन
मनुष्य हमेशा से भोजन और आश्रय के लिए प्रकृति का उपयोग करता रहा है, लेकिन जब आवश्यकता लालच में बदल जाती है, तो यह अत्यधिक दोहन का कारण बनती है।
पिछले 500 वर्षों में विलुप्त हुई कई प्रजातियां (जैसे स्टेलर की समुद्री गाय और पैसेंजर कबूतर) मुख्य रूप से मनुष्यों द्वारा अत्यधिक उपयोग के कारण समाप्त हो गईं।
आज कई समुद्री मछलियों की आबादी का अत्यधिक शिकार किया जा रहा है, जिससे कई व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे में हैं।
विदेशी प्रजातियों का आक्रमण
जब किसी क्षेत्र में बाहरी (गैर-स्थानीय) प्रजातियाँ जानबूझकर या अनजाने में लाई जाती हैं, तो उनमें से कुछ आक्रामक प्रजातियां बन जाती हैं।
ये प्रजातियाँ तेजी से बढ़ती हैं, जल्दी फैलती हैं और स्थानीय प्रजातियों को नुकसान पहुँचाती हैं, जिससे स्थानीय प्रजातियों की संख्या घट जाती है या वे विलुप्त भी हो सकती हैं।
उदाहरण: पूर्वी अफ्रीका की लेक विक्टोरिया में लाई गई नील पर्च मछली के कारण स्थानीय सिचलिड मछलियों की 200 से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो गईं।
भारत में कुछ आक्रामक खरपतवार जैसे पार्थेनियम (गाजर घास), लैंटाना और आइकोर्निया (वॉटर हायसिंथ) गंभीर पारिस्थितिक नुकसान पहुंचाते हैं।
मत्स्य पालन में अफ्रीकी कैटफिश का अवैध परिचय भारत की स्थानीय कैटफिश प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है।
ग्लोबल इनवेसिव स्पीशीज डेटाबेस
यह डेटाबेस IUCN (प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ) की प्रजाति संरक्षण आयोग के ‘आक्रामक प्रजाति विशेषज्ञ समूह’ द्वारा विकसित और संचालित किया जाता है।
इसे वर्ष 2000 में ग्लोबल इनवेसिव स्पीशीज प्रोग्राम (GISP) की वैश्विक पहल के तहत विकसित किया गया था।
सह-विलुप्ति
जब कोई एक प्रजाति विलुप्त हो जाती है, तो उस पर पूरी तरह निर्भर अन्य प्रजातियां भी विलुप्त हो जाती हैं।
इसे सह-विलुप्ति कहा जाता है।उदाहरण: यदि किसी होस्ट मछली की प्रजाति समाप्त हो जाती है, तो उस पर निर्भर उसके विशेष परजीवी भी समाप्त हो जाते हैं।
एक और उदाहरण पादप-परागण संबंध का है।
यदि पादप नष्ट हो जाता है, तो उस पर निर्भर परागण भी विलुप्त हो सकता है।
और यदि परागण समाप्त हो जाए, तो पौधा प्रजनन नहीं कर पाएगा और वह भी अंततः विलुप्त हो सकता है।
जैव विविधता के ह्रास के अन्य कारण
प्राकृतिक कारण
मानव जनित कारण
बाढ़
भूकंप
भूस्खलन
प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा
परागण की कमी
रोग
आवास नष्ट होना
अनियंत्रित व्यावसायिक दोहन
शिकार और अवैध शिकार
मानव बसावट और औद्योगिक विकास के लिए जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों का परिवर्तन
कृषि का विस्तार
प्रदूषण
आर्द्रभूमियों को भरना
तटीय क्षेत्रों का विनाश
हम जैव विविधता का संरक्षण कैसे करें
स्वस्थाने संरक्षण (इन-सीटू संरक्षण)
बाह्यस्थाने संरक्षण (एक्स-सीटू संरक्षण)
स्वस्थाने संरक्षण का अर्थ है प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में ही सुरक्षित रखना।
इसमें पौधों और जानवरों को उनके प्राकृतिक पर्यावरण में संरक्षित किया जाता है।
उदाहरण: पूरे जंगल की रक्षा करके बाघ और अन्य प्रजातियों को सुरक्षित रखना।
बाह्यस्थाने संरक्षण का अर्थ है प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर सुरक्षित रखना।
इसमें जैव विविधता को उन स्थानों पर संरक्षित किया जाता है जहाँ वे स्वाभाविक रूप से नहीं पाई जाती हैं।
किसी पौधे या जानवर को उस स्थान पर फिर से बसाना, जहां से वह विलुप्त हो चुका है, बाह्यस्थाने संरक्षण का एक रूप है।
यह तब उपयोग किया जाता है जब कोई प्रजाति विलुप्त होने के गंभीर खतरे में होती है।
उदाहरण
संरक्षण
उदाहरण
राष्ट्रीय उद्यान
वन्यजीव अभयारण्य
संरक्षण क्षेत्र\आरक्षित क्षेत्र (संरक्षण रिजर्व)
पवित्र उपवन
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
समुद्री संरक्षित क्षेत्र
रामसर स्थल
सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र
प्राणि उद्यान
वनस्पति उद्यान
वन्यजीव सफारी पार्क
क्रायोप्रिजर्वेशन – युग्मक (शुक्राणु, अंडाणु) को लंबे समय तक सुरक्षित रखना
इन-विट्रो निषेचन
पौधों के संवर्धन के लिए टिश्यू कल्चर
महत्वपूर्ण फसलों के बीजों के संरक्षण हेतु बीज बैंक
पक्षी गृह
एक्वेरियम (मत्स्यालय)
चिड़ियाघर
हिरण पार्क
स्वस्थाने संरक्षण
राष्ट्रीय उद्यान
राष्ट्रीय उद्यान वह संरक्षित क्षेत्र है, जिसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत सरकार द्वारा वन्य जीवों, वनस्पतियों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए स्थापित किया जाता है। इनका उद्देश्य जैव विविधता की रक्षा करना और संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना होता है।
राष्ट्रीय उद्यानों की घोषणा सामान्यतः राज्य सरकार द्वारा की जाती है और कुछ मामलों में केंद्र सरकार द्वारा भी की जा सकती है।
इन क्षेत्रों की सीमाओं के भीतर शिकार, अवैध शिकार और प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग जैसी मानव गतिविधियाँ पूरी तरह प्रतिबंधित होती हैं।
राष्ट्रीय उद्यान ईको-पर्यटन, पर्यावरण शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान को भी बढ़ावा देते हैं, ताकि पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखा जा सके और लोगों में जागरूकता बढ़े।
राष्ट्रीय उद्यानों को वन्यजीव अभयारण्यों की तुलना में अधिक संरक्षण प्राप्त होता है।कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, जिसकी स्थापना 1936 में हुई थी, भारत का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान है।
साउथ बटन आइलैंड राष्ट्रीय उद्यान भारत का सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 5 वर्ग किमी है।
हेमिस राष्ट्रीय उद्यान (लद्दाख) क्षेत्रफल के आधार पर भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है।हाल ही में ओडिशा सरकार ने सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व को राज्य का दूसरा राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया है, भितरकनिका के बाद।
इसके साथ ही भारत में राष्ट्रीय उद्यानों की कुल संख्या 107 हो गई है।
वन्यजीव अभयारण्य
वर्तमान में भारत में 573 वन्यजीव अभयारण्य हैं।
वन्यजीव अभयारण्यों की घोषणा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत की जाती है।
इनकी घोषणा सामान्यतः राज्य सरकार द्वारा की जाती है और कुछ मामलों में केंद्र सरकार द्वारा भी की जा सकती है।
मानव गतिविधियाँ – अभयारण्यों में कुछ गतिविधियों को नियमों के साथ अनुमति दी जा सकती है, जैसे नियंत्रित चराई आदि।
संरक्षण क्षेत्र\ आरक्षित क्षेत्र(संरक्षण रिजर्व)
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में 2003 में संशोधन करके एक नई संरक्षित क्षेत्र श्रेणी संरक्षण रिजर्व बनाई गई।इसे सरकारी स्वामित्व वाली भूमि पर स्थापित किया जाता है, जो राष्ट्रीय उद्यान या वन्यजीव अभयारण्य के आसपास स्थित होती है।
उद्देश्य – पौधों और जानवरों के आवास, परिदृश्य और समुद्री परिदृश्य की रक्षा करना।
राज्य सरकार स्थानीय समुदायों से परामर्श करने के बाद किसी क्षेत्र को संरक्षण रिजर्व घोषित कर सकती है।
जैवमंडल रिजर्व
जैवमंडल रिजर्व का नामांकन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है और ये उस राज्य के सार्वभौमिक अधिकार क्षेत्र में रहते हैं जहाँ वे स्थित होते हैं।
जैवमंडल रिजर्व में स्थलीय, समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र शामिल होते हैं।
भारत में 18 जैव मंडल रिजर्व हैं, जो लगभग 91,425 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हुए हैं, जिनमें से 13 को UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त है।
यह कार्यक्रम केंद्र प्रायोजित योजना के तहत संचालित होता है, जिसमें 60:40 का वित्तीय अनुपात है, जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 का अनुपात लागू होता है।
2025 में कोल्ड डेजर्ट जैवमंडल रिजर्व को शामिल किया जाना वैश्विक संरक्षण में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
पवित्र उपवन
पवित्र उपवन जंगल या प्राकृतिक वनस्पति के छोटे-छोटे क्षेत्र होते हैं, जिनका आकार कुछ पेड़ों से लेकर कई एकड़ तक हो सकता है।
इन्हें स्थानीय लोक देवताओं को समर्पित माना जाता है और धार्मिक मान्यताओं तथा परंपराओं के कारण इनकी रक्षा की जाती है।
स्थानीय समुदाय इनकी सुरक्षा करते हैं, क्योंकि उनका विश्वास होता है कि यदि इन उपवनों को नुकसान पहुँचाया गया तो देवता नाराज़ हो सकते हैं।
उदाहरण – मध्य भारत के गोंड समुदाय में जीवित पेड़ों को काटना प्रतिबंधित है, लेकिन गिरी हुई शाखाओं का उपयोग किया जा सकता है।
पवित्र उपवन के प्रकारपारंपरिक पवित्र उपवन –
यह गाँव के देवता का निवास स्थान माना जाता है, जिसे किसी सरल प्रतीक द्वारा दर्शाया जाता है।
मंदिर उपवन – ऐसे उपवन जो किसी मंदिर के आसपास होने के कारण संरक्षित रहते हैं।
दफन/दाह संस्कार उपवन – ऐसे वन क्षेत्र जो दफन या दाह संस्कार स्थलों के आसपास होने के कारण संरक्षित किए जाते हैं।
समुद्री संरक्षित क्षेत्र
यह कोई भी ज्वार-भाटा क्षेत्र या जलमग्न क्षेत्र होता है, जिसमें वहाँ का पानी, पौधे, जानवर और सांस्कृतिक विशेषताएँ शामिल होती हैं।
इन क्षेत्रों को पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी रूप से संरक्षित किया जाता है।
ये क्षेत्र सतत मत्स्य उत्पादन और स्वस्थ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बनाए रखने में मदद करते हैं।
श्रेणी–I – इसमें वे राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य शामिल होते हैं, जो पूरी तरह निम्न समुद्री क्षेत्रों में स्थित होते हैं: ज्वार-भाटा/जलमग्न क्षेत्र, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ, क्रीक, समुद्री घास क्षेत्र, शैवाल क्षेत्र, मुहाने, लैगून।
श्रेणी–II –ऐसे द्वीप जहाँ अधिकांश क्षेत्र समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का तथा कुछ भाग स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र का होता है।
श्रेणी–III A – ज्वार-भाटा क्षेत्र के बाहर स्थित रेतीले समुद्र तट, जो कभी-कभी समुद्री जल के संपर्क में आते हैं।
श्रेणी–III B – द्वीपों पर पाए जाने वाले सदाबहार या अर्ध-सदाबहार वन।
रामसर स्थल
रामसर स्थल वे अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियाँ हैं, जिन्हें रामसर कन्वेंशन के तहत नामित किया जाता है।
यह एक अंतर-सरकारी संधि है, जिसे 1971 में ईरान के रामसर शहर में अपनाया गया था।
यह संधि आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए एक ढांचा प्रदान करती है।
भारत ने इस संधि को 1982 में स्वीकार किया और तब से सतत उपयोग के लिए रामसर स्थलों का नामांकन करता रहा है।
सितंबर 2025 तक भारत में 98 रामसर स्थल हैं। इनमें तमिलनाडु (20) में सबसे अधिक रामसर स्थल हैं।
भारत का सबसे बड़ा रामसर स्थल – सुंदरबन आर्द्रभूमि
भारत का सबसे छोटा रामसर स्थल – रेणुका झील (हिमाचल प्रदेश)
भारत के सबसे पुराने रामसर स्थल – चिल्का झील (1981) और केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान (1981)
2025 में जोड़े गए नए रामसर स्थल
सक्काराकोत्तई पक्षी अभयारण्य (तमिलनाडु)
थिरुथंगल पक्षी अभयारण्य (तमिलनाडु)
खेचोपलरी आर्द्रभूमि (सिक्किम)
उधवा झील (झारखंड)
खीचन (फलोदी) (राजस्थान)
मेनार (उदयपुर) (राजस्थान)
गोकुल जलाशय (बिहार)
उदयपुर झील (बिहार)
गोगाबील झील (बिहार)सिलीसेढ़ झील (राजस्थान)
कोपरा जलाशय (छत्तीसगढ़)
2026 में जोड़े गए रामसर स्थल
पटना पक्षी अभयारण्य (उत्तर प्रदेश)छारी-ढांड (गुजरात)
मोंट्रेक्स रिकॉर्डयह उन आर्द्रभूमि स्थलों का एक रजिस्टर है, जो अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की सूची में शामिल हैं और जहाँ पारिस्थितिकी विशेषताओं में परिवर्तन हो चुका है, हो रहा है, या तकनीकी विकास, प्रदूषण या अन्य मानव हस्तक्षेप के कारण होने की संभावना है।
यह रामसर सूची के एक भाग के रूप में बनाए रखा जाता है।इसे 1990 में स्थापित किया गया था।
वर्तमान में भारत की दो आर्द्रभूमियाँ मोंट्रेक्स रिकॉर्ड में शामिल हैं:
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान) और
लोकटक झील (मणिपुर)
चिल्का झील (ओडिशा) पहले इस रिकॉर्ड में शामिल थी, लेकिन बाद में इसे इससे हटा दिया गया।
जैव विविधता हॉटस्पॉट
जैव विविधता हॉटस्पॉट की अवधारणा नॉर्मन मेयर्स ने 1988 में प्रस्तुत की थी।
किसी क्षेत्र को हॉटस्पॉट बनने के लिए दो मुख्य मानदंड पूरे करने होते हैं:
प्रजातीय स्थानिकता – उस क्षेत्र में कम से कम 1,500 स्थानिक वाहिकीय पौधों की प्रजातियाँ (जो विश्व की कुल प्रजातियों का लगभग 0.5%) होनी चाहिए।
खतरे की स्थिति – उस क्षेत्र का कम से कम 70% मूल आवास नष्ट हो चुका होना चाहिए।
वर्तमान में दुनिया में 36 जैव विविधता हॉटस्पॉट पहचाने गए हैं।
ये पृथ्वी के सबसे अधिक जैव विविधता वाले, लेकिन अत्यधिक संकटग्रस्त स्थलीय क्षेत्र हैं।
ये क्षेत्र पृथ्वी के कुल भू-भाग का केवल 2.5% हिस्सा घेरते हैं, लेकिन इनमें दुनिया की लगभग 50% स्थानिक पौधों की प्रजातियां और 43% स्थलीय कशेरुकी प्रजातियां पाई जाती हैं।
भारत में जैव विविधता हॉटस्पॉट
हिमालय – इसमें पूरा
भारतीय हिमालयी क्षेत्र शामिल है (साथ ही पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, भूटान, चीन और म्यांमार के हिस्से)। यहाँ कई स्थानिक प्रजातियां पाई जाती हैं, जैसे हिमालयन ब्लू पॉपी, हिम तेंदुआ और लाल पांडा।
इंडो–बर्मा – इसमें पूर्वोत्तर भारत का अधिकांश भाग शामिल है, असम और अंडमान द्वीप समूह को छोड़कर (साथ ही म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया और दक्षिणी चीन के क्षेत्र)। यहाँ ओरंगुटान, सुंडा पैंगोलिन, सुमात्रन टाइगर, ऑरेंज नेक्ड पार्ट्रीज, व्हाइट-ईयर्ड नाइट हेरॉन और ग्रे-क्राउनड क्रोटियस जैसी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
पश्चिमी घाट और श्रीलंका – यह भारत का सबसे बड़ा जैव विविधता हॉटस्पॉट है। इसमें पूरा पश्चिमी घाट क्षेत्र और श्रीलंका शामिल हैं। यहाँ की प्रमुख स्थानिक प्रजातियाँ हैं – मालाबार सिवेट, एशियाई हाथी, मालाबार ग्रे हॉर्नबिल, नीलगिरि तहर और लायन-टेल्ड मकाक।
सुंडालैंड – इसमें निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं (साथ ही इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई और फिलीपींस के क्षेत्र)। यहाँ प्रमुख प्रजातियों में डुगोंग, कछुए, मगरमच्छ, झींगा और व्हेल शामिल हैं।
सबसे अधिक संवेदनशील हॉटस्पॉट
कुछ विशेष हॉटस्पॉट ऐसे हैं जिन्हें “हॉटेस्ट हॉटस्पॉट” कहा जाता है। ये अन्य हॉटस्पॉट की तुलना में जैव विविधता के दृष्टिकोण से और भी अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे कुल 8 हॉटेस्ट हॉटस्पॉट हैं:
मेडागास्कर
फिलीपींस
सुंडालैंड
ब्राज़ील के अटलांटिक वन
कैरेबियन द्वीप समूह
इंडो–बर्मा क्षेत्र
पश्चिमी घाट और श्रीलंका
तंजानिया/केन्या के पूर्वी आर्क एवं तटीय वन
संरक्षण के प्रयास
प्रोजेक्ट टाइगर
इस पहल की शुरुआत 1973 में की गई थी और यह भारत की प्रमुख वन्य जीव संरक्षण योजना है, जिसने 2023 में 50 वर्ष पूरे किए।
ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन 2022 के पांचवें चक्र के अनुसार, भारत में अब दुनिया के 70% से अधिक जंगली बाघ पाए जाते हैं।
उनकी संख्या बढ़कर 3,682 हो गई है, जो वैश्विक बाघ संरक्षण में भारत की अग्रणी भूमिका को दर्शाती है।
2025 तक भारत में 58वाँ टाइगर रिजर्व हैं, जो मिलकर देश के कुल भू-क्षेत्र के लगभग 2.3% हिस्से को कवर करते हैं।
माधव टाइगर रिजर्व भारत का 58वाँ टाइगर रिजर्व है।
अंतरराष्ट्रीय बिग कैट एलायंस
इसकी शुरुआत 9 अप्रैल 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रोजेक्ट टाइगर के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर की गई थी।
फरवरी 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसकी स्थापना को मंजूरी दी और इसका मुख्यालय भारत में स्थापित किया गया।
इसे 12 मार्च 2024 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अंतर्गत राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा स्थापित किया गया।
यह गठबंधन सात बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण पर केंद्रित है: बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, चीता, जगुआर और प्यूमा।
23 जनवरी 2025 को अंतरराष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (IBCA) आधिकारिक रूप से संधि-आधारित अंतर-सरकारी संगठन बन गया, जब निकारागुआ, इस्वातिनी, भारत, सोमालिया और लाइबेरिया ने इस समझौते की पुष्टि की।
27 देशों की भागीदारी के साथ, IBCA का उद्देश्य सीमा-पार सहयोग के माध्यम से वैश्विक स्तर पर बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण को बढ़ावा देना है।
प्रोजेक्ट डॉल्फिन
15 अगस्त 2020 को शुरू किया गया प्रोजेक्ट डॉल्फिन समुद्री और नदी दोनों प्रकार की डॉल्फिन के संरक्षण के लिए शुरू किया गया है।
इसके तहत असम, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब और लक्षद्वीप में डॉल्फिन के प्रमुख आवास क्षेत्रों की पहचान की गई है।
18 दिसंबर 2024 को भारत ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की, जब असम में पहली बार गंगा नदी डॉल्फिन को सफलतापूर्वक सैटेलाइट टैग किया गया।
यह कार्य प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत किया गया।यह पहल वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के नेतृत्व में, असम वन विभाग और आरण्यक (NGO) के सहयोग से की गई तथा इसका वित्तपोषण नेशनल CAMPA (MoEFCC) द्वारा किया गया।
यह उपलब्धि डॉल्फिन संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण पहल मानी जाती है।
प्रोजेक्ट टाइगर
प्रोजेक्ट टाइगर एक महत्वपूर्ण वन्यजीव संरक्षण पहल है, जिसे 17 सितंबर 2022 को शुरू किया गया।
इसका उद्देश्य भारत में चीता को फिर से बसाना है, क्योंकि 1940 के दशक के अंत और 1950 के दशक की शुरुआत में भारत में चीता विलुप्त हो गया था।
यह दुनिया की पहली अंतरमहाद्वीपीय बड़े मांसाहारी वन्य जीव स्थानांतरण परियोजना है।
यह प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत संचालित होती है और चीता एक्शन प्लान के अनुरूप चीता प्रजाति के पुनर्स्थापन और संरक्षण का लक्ष्य रखती है।
अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण –सितंबर 2022 में नामीबिया से 8 चीते को कूनो राष्ट्रीय उद्यान में लाया गया।
इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए।इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए।
प्रोजेक्ट एलीफेंट
प्रोजेक्ट एलीफेंट की शुरुआत फरवरी 1992 में की गई थी।भारत में विश्व की 60% से अधिक एशियाई हाथियों की आबादी पाई जाती है।
हाथियों की बढ़ती संख्या – भारत में जंगली हाथियों की संख्या 2018 की जनगणना में 26,786 से बढ़कर 2022 में 29,964 हो गई है, जो सफल संरक्षण प्रयासों को दर्शाती है।
भारत में 14 राज्यों में 33 एलीफेंट रिजर्व हैं, जो लगभग 80,777 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हुए हैं। इससे हाथियों को सुरक्षित आवास और प्रवास मार्ग उपलब्ध होते हैं।
वित्तीय वर्ष 2023-24 से प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट योजना को मिलाकर “प्रोजेक्ट टाइगर & एलीफेंट” कर दिया गया है।
MIKE (हाथियों के अवैध शिकार की निगरानी) – यह CITES के प्रस्ताव के तहत शुरू किया गया कार्यक्रम है, जिसे 2003 में प्रारंभ किया गया था।
भारत में इसके अंतर्गत 10 स्थल शामिल हैं।
प्रोजेक्ट लायन
इसकी घोषणा 15 अगस्त 2020 को की गई थी।सख्त संरक्षण प्रयासों के कारण एशियाई शेरों की संख्या में लगातार वृद्धि देखी गई है।
भारत में शेरों की संख्या 2020 में 674 से बढ़कर 891 हो गई है।
एक-सींग वाले गैंडे का संरक्षण
यह रणनीति 2019 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा शुरू की गई थी।
इसका उद्देश्य वैज्ञानिक और प्रशासनिक उपायों के माध्यम से मौजूदा संरक्षण प्रयासों को मजबूत करते हुए उन क्षेत्रों में गैंडे की आबादी को फिर से स्थापित करना है, जहाँ वे पहले पाए जाते थे।
प्रोजेक्ट रेड पांडा
रेड पांडा के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए 1994 में दार्जिलिंग (भारत) के पद्मजा नायडू हिमालयन प्राणी उद्यान में संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य बंदी अवस्था में रेड पांडा का व्यवस्थित प्रजनन करना है, ताकि उनके अस्तित्व को सुरक्षित रखा जा सके।
प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण – 2013)
इसकी शुरुआत 5 जून 2013 को की गई थी।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) को बाघ से भी अधिक विलुप्ति के खतरे में माना जाता है, हालांकि इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत संरक्षण दिया गया है।
डेजर्ट नेशनल पार्क को 1980 में अभयारण्य घोषित किया गया था।
संस्थागत प्रयास
जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCBD)
रियो सम्मेलन में अपनाए गए प्रमुख समझौतों में से एक जैव विविधता पर अभिसमय था।
22 मई 1992 को नैरोबी (केन्या) में UNCBD के अंतिम पाठ को अपनाया गया।यह 29 दिसंबर 1993 से लागू हुआ।
भारत ने इस अभिसमय को 1994 में अनुमोदित किया।
मुख्यालय – मॉन्ट्रियल, कनाडाUNCBD का COP (Conference of Parties) हर दो वर्ष में आयोजित किया जाता है।
हाल ही में COP-16 का आयोजन काली, कोलंबिया में हुआ।
UNCBD के तहत महत्वपूर्ण समझौते
कार्टाजेना प्रोटोकॉल
यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जो आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से उत्पन्न जीवित संशोधित जीवों के सीमा-पार स्थानांतरण को नियंत्रित करती है, क्योंकि ये जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं और मानव स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम पैदा कर सकते हैं।
इसे 2000 में UNCBD के पूरक समझौते के रूप में अपनाया गया था।यह अग्रिम सूचित समझौता प्रक्रिया स्थापित करता है, जिसके तहत किसी देश को ऐसे जीवों के आयात की अनुमति देने से पहले आवश्यक जानकारी दी जाती है, ताकि वह सही निर्णय ले सके।
इस प्रोटोकॉल में सावधानी पूर्ण दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया गया है।भारत ने इस प्रोटोकॉल को अनुमोदित किया है।
नागोया प्रोटोकॉल
यह जैव विविधता पर अभिसमय के अंतर्गत एक समझौता है।
इसे 2010 में नागोया (जापान) में अपनाया गया था।
यह आनुवंशिक संसाधनों (पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव आदि) के उपयोग से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत और समान वितरण को सुनिश्चित करता है।
उद्देश्य – यह सुनिश्चित करना कि जो देश आनुवंशिक संसाधन प्रदान करते हैं, उन्हें उनसे प्राप्त लाभों (जैसे धन, प्रौद्योगिकी, शोध परिणाम) में उचित हिस्सा मिले।
दायित्व देशों को आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच के लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे।
अनुमति देने से पहले पूर्व सूचित सहमति और पारस्परिक सहमत शर्तें सुनिश्चित करनी होंगी।अनुसंधान को बढ़ावा देना और खाद्य सुरक्षा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना।
आइची लक्ष्य
5 लक्ष्य और उनसे जुड़े 20 आइची जैव विविधता लक्ष्य COP-10 में अपनाए गए थे।
COP-15मॉन्ट्रियल, कनाडा
कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा को अपनाया गया।
इसमें 2030 तक प्राप्त किए जाने वाले 4 लक्ष्य और 23 उद्देश्य शामिल हैं।
लक्ष्य
लक्ष्य A : प्रकृति का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन
2050 तक प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों को पुनर्स्थापित करना और उनके कुल क्षेत्र को बढ़ाना। संकटग्रस्त प्रजातियों के विलुप्त होने को रोकना और 2050 तक विलुप्ति के खतरे को 10 गुना तक कम करना।स्थानीय जंगली प्रजातियों की आबादी को स्वस्थ स्तर तक बढ़ाना।
लक्ष्य B : प्रकृति के साथ समृद्धि
विकास ऐसा होना चाहिए जो वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सतत और प्रकृति-अनुकूल हो।
लक्ष्य C : लाभों का न्यायसंगत वितरण
आनुवंशिक संसाधनों और डिजिटल आनुवंशिक डेटा से प्राप्त लाभों का न्यायसंगत और समान वितरण।स्वदेशी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान की रक्षा।2050 तक लाभ-साझेदारी में महत्वपूर्ण वृद्धि।
लक्ष्य D : वित्त एवं सहयोग–
देशों के लिए अधिक वित्तीय सहायता, प्रौद्योगिकी समर्थन और क्षमता निर्माण।जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रति वर्ष 700 अरब डॉलर की वित्तीय कमी को समाप्त करना।
प्रमुख उद्देश्य30×30 लक्ष्य : 2030 तक 30% क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्रों का पुनर्स्थापन करना। 2030 तक भूमि, जल और समुद्री क्षेत्रों के 30% भाग का संरक्षण करना।
प्रजातियों का संरक्षण : 2030 तक ज्ञात प्रजातियों के विलुप्त होने को रोकना। 2050 तक सभी प्रजातियों के विलुप्ति जोखिम में 10 गुना कमी लाना।
प्रदूषण में कमी : 2030 तक कीटनाशकों का उपयोग 50% कम करना। 2030 तक पोषक तत्वों की हानि 50% कम करना। सभी प्रकार के प्रदूषण को हानिरहित स्तर तक कम करना।
उपभोग पदचिह्न में कमी: अत्यधिक खपत और अपशिष्ट उत्पादन को कम करना। वर्ष 2030 तक खाद्य अपशिष्ट को 50% तक कम करना।
सतत उत्पादन: कृषि, मत्स्य पालन और वानिकी का सतत प्रबंधन। कृषि-पारिस्थितिकी तथा जैव विविधता-अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देना।
प्रकृति के माध्यम से जलवायु कार्रवाई: प्रकृति-आधारित समाधानों को प्रोत्साहित करना।
आक्रामक विदेशी प्रजातियों पर नियंत्रण: वर्ष 2030 तक आक्रामक विदेशी प्रजातियों के प्रवेश और प्रसार में 50% की कमी।
सुरक्षित एवं कानूनी वन्यजीव व्यापार: जंगली प्रजातियों के सुरक्षित, कानूनी और टिकाऊ व्यापार को सुनिश्चित करना।
शहरी जैवविविधता: शहरों में हरित क्षेत्रों में वृद्धि करना।
COP 16
कैली, कोलंबिया में संपन्न हुआ
मुख्य बिंदुकैली फंड क्रियान्वित
डिजिटल सीक्वेंस जानकारी से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित करने के लिए यह फंड बनाया गया।
कुल फंडिंग का 50% भाग स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों (विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं) को दिया जाएगा।
डिजिटल सीक्वेंस जानकारी – जैविक और पर्यावरणीय अनुसंधान में उपयोग होने वाला जीनोमिक अनुक्रम डेटा।
अनुच्छेद 8(j) पर नया स्थायी निकाय
स्वदेशी समुदायों के ज्ञान और पारंपरिक प्रथाओं की रक्षा के लिए स्थापित किया गया।
नया कार्यक्रम अपनाया गया, जिससे संरक्षण और लाभ-साझेदारी में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
संसाधन जुटाने की रणनीति2030 तक जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रति वर्ष 200 अरब डॉलर जुटाने की नई रणनीति।
कुनमिंग जैव विविधता फंड शुरू किया गया, जिसमें चीन ने 200 मिलियन डॉलर प्रदान किए।2030 तक हानिकारक सब्सिडी से 500 अरब डॉलर प्रति वर्ष को पुनर्निर्देशित करने का लक्ष्य।
सिंथेटिक बायोलॉजी कार्य योजना
सिंथेटिक बायोलॉजी – डीएनए अनुक्रमण और जीनोम संपादन के माध्यम से जीवों का निर्माण या संशोधन।
आक्रामक विदेशी प्रजातियांनए उपाय अपनाए गए: बेहतर डेटाबेस, मजबूत व्यापार नियंत्रण, और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ समन्वय ताकि इनके प्रसार को रोका जा सके।
पारिस्थितिक या जैविक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र (EBSAs)
महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों की पहचान और संरक्षण के लिए नई प्रक्रिया को मंजूरी दी गई।
EBSAs कार्यक्रम (2010 से) संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के लिए बनाया गया है।
COP 17
येरेवन, आर्मेनिया (2026)
अन्य प्रयास
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
यह अधिनियम जंगली जानवरों और पौधों की विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण, उनके आवास के प्रबंधन तथा जंगली जानवरों, पौधों और उनसे बने उत्पादों के व्यापार के नियमन और नियंत्रण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
इसी अधिनियम के तहत राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्यों की स्थापना की जाती है।
यह वन्यजीवों और पक्षियों के शिकार को नियंत्रित करता है तथा उनके व्यापार को भी विनियमित करता है।इस अधिनियम के अंतर्गत विभिन्न पौधों और जानवरों को चार अनुसूचियों में वर्गीकृत किया गया है:
अनुसूची 1 – इसमें वे पशु प्रजातियां शामिल हैं जिन्हें सबसे उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है और जो अत्यंत संकटग्रस्त हैं। उदाहरण: बाघ, हाथी
अनुसूची 2 – इसमें कम संकटग्रस्त प्रजातियां शामिल हैं, जिन्हें अनुसूची 1 की तुलना में कम संरक्षण मिलता है।
अनुसूची 3 – इसमें संरक्षित पौधों की प्रजातियाँ शामिल हैं।
अनुसूची 4 – इसमें CITES में सूचीबद्ध प्रजातियों को अधिसूचित किया गया है।
IUCN (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर)
इसकी स्थापना 1948 में हुई थी।
प्रारंभ में इसका नाम इंटरनेशनल यूनियन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ नेचर (1948-1956) था।
मुख्यालय – ग्लैंड, स्विट्ज़रलैंड।
IUCN रेड डेटा बुक इसकी स्थापना 1964 में हुई।
यह दुनिया में पशुओं, कवकों और पौधों की प्रजातियों के वैश्विक विलुप्ति जोखिम की स्थिति के बारे में सबसे व्यापक सूचना स्रोत बन चुकी है।
IUCN रेड लिस्ट प्रजातियों पर पड़ने वाले दबावों का आकलन करती है, जिससे संरक्षण कार्यों को दिशा मिलती है और विलुप्ति को रोकने में सहायता मिलती है।
इसी कारण इसे अक्सर “जीवन का बैरोमीटर (Barometer of Life)” कहा जाता है।
IUCN रेड लिस्ट की श्रेणियाँ और मानदंड इस तरह बनाए गए हैं कि वे दुनिया भर में आसानी से समझे जा सकें और उन प्रजातियों की पहचान की जा सके जो वैश्विक स्तर पर विलुप्ति के उच्च जोखिम में हैं।
यह प्रजातियों को नौ श्रेणियों में विभाजित करती है:
विलुप्त – अब इस प्रजाति का कोई भी ज्ञात जीवित सदस्य नहीं बचा है।
वन्य जीवन में विलुप्त– यह प्रजाति अब केवल कैद में या अपने मूल क्षेत्र के बाहर प्राकृतिक रूप से स्थापित आबादी के रूप में ही जीवित है।
IUCN स्थिति
जनसंख्या आकार में कमी
जनसंख्या का आकार
प्राकृतिक आवास में विलुप्त होने की संभावना
अत्यंत संकटग्रस्त (लुप्तप्राय)
पिछले 10 वर्षों में 90% से अधिक कमी
50 से कम परिपक्व व्यष्टि।
10 वर्षों के भीतर कम से कम 50%।
संकटग्रस्त
पिछले 10 वर्षों में 70% से अधिक कमी
250 से कम परिपक्व व्यष्टि।
20 वर्षों के भीतर कम से कम 20%
असुरक्षित
पिछले 10 वर्षों में 50% से अधिक कमी।
10,000 से कम परिपक्व व्यष्टि।
100 वर्षों के भीतर कम से कम 10%।
संकटासन्न– निकट भविष्य में संकटग्रस्त होने की संभावना।
कम चिंताजनक– सबसे कम जोखिम वाली श्रेणी। यह किसी अधिक जोखिम वाली श्रेणी में नहीं आती।
डेटा अपर्याप्त– विलुप्ति के जोखिम का आकलन करने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।
मूल्यांकन रहित– अभी तक निर्धारित मानदंडों के अनुसार मूल्यांकन नहीं किया गया है।
WWF(वर्ल्ड वाइड फ़ंड फ़ॉर नेचर)
यह एक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन (NGO) है, जो पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति पर मानव प्रभाव को कम करने के लिए कार्य करता है।
स्थापना – 1961
उत्पत्ति – IUCN और वैश्विक संरक्षण प्रयासों को धन संग्रह और जनजागरूकता अभियानों के माध्यम से समर्थन देने के लिए शुरू किया गया।
मुख्यालय – ग्लैंड, स्विट्जरलैंड
WWF का उद्देश्य –पर्यावरणीय क्षरण को रोकना और ऐसा सतत भविष्य सुनिश्चित करना, जिसमें मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य में जीवन जी सके।
यह लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट प्रकाशित करता है और लिविंग प्लैनेट इंडेक्स को बनाए रखता है।
यह अर्थ आवर और डेब्ट-फ़ॉर-नेचर स्वैप (प्रकृति के लिए ऋण अदला-बदली) जैसे अभियानों का संचालन भी करता है।
CITES(वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन)
वन्य जीवों और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय।
यह सरकारों के बीच एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जंगली जानवरों और पौधों के नमूनों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार उनकी प्रजातियों के अस्तित्व को खतरे में न डाले।
CITES का मसौदा 1963 में IUCN के सदस्यों की बैठक में पारित एक प्रस्ताव के परिणामस्वरूप तैयार किया गया।
इस अभिसमय के पाठ को 3 मार्च 1973 को हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया गया।1 जुलाई 1975 को CITES लागू हुआ।
भारत ने इस अभिसमय को 1976 में अनुमोदित किया।
CITES 36,000 से अधिक पशु और पौधों की प्रजातियों को विभिन्न स्तरों का संरक्षण प्रदान करता है, जो तीन परिशिष्टों में शामिल प्रजातियों पर अलग-अलग प्रावधान लागू करके किया जाता है।
CITES का COP20 आर्मेनिया में आयोजित किया गया।
TRAFFIC(वाणिज्य में वनस्पति और जीव-जंतुओं के व्यापार का रिकॉर्ड विश्लेषण)
वाणिज्य में वनस्पति और जीव-जंतुओं के व्यापार का रिकॉर्ड विश्लेषण।
TRAFFIC एक प्रमुख गैर-सरकारी संगठन है, जो वन्यजीव व्यापार की निगरानी करता है और यह कार्य जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास के संदर्भ में करता है।
यह विश्व वन्यजीव कोष (WWF) और अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) का संयुक्त कार्यक्रम है।
इसकी स्थापना 1976 में हुई थी।मुख्यालय – कैम्ब्रिज, यूनाइटेड किंगडम।
समाचारों में प्रजातियाँ
डुगोंग
डुगोंग एक बड़ा शाकाहारी समुद्री स्तनधारी है, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में पाया जाता है, जिसमें हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के गर्म तटीय जल शामिल हैं।
भारत में डुगोंग मन्नार की खाड़ी, पाक खाड़ी, कच्छ की खाड़ी तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं।
ये मुख्य रूप से समुद्री घास के मैदानों पर निर्भर होते हैं, जो इनके लिए आवास और भोजन दोनों का कार्य करते हैं।
ये सामान्यतः गर्म और उथली खाड़ियों या मैंग्रोव चैनलों में रहना पसंद करते हैं।
डुगोंग को IUCN रेड लिस्ट में असुरक्षित श्रेणी में रखा गया है और यह भारत के वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल है।
हंगुल
हंगुल को कश्मीर स्टैग भी कहा जाता है।
यह मध्य एशियाई रेड डियर की एक उपप्रजाति है, जो कश्मीर और उसके आसपास के क्षेत्रों की स्थानिक प्रजाति है।
पहले यह पूरे हिमालय, चेनाब घाटी और हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में पाया जाता था, लेकिन अब यह मुख्य रूप से दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान (कश्मीर) तक सीमित रह गया है।I
UCN संकटग्रस्त प्रजातियों की रेड लिस्ट में हंगुल को गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
कोआला
ऑस्ट्रेलिया ने घटते कोआला की आबादी को क्लैमाइडिया रोग से बचाने के लिए पहला टीका (वैक्सीन) स्वीकृत किया है।
कोआला एक पेड़ों पर रहने वाला मार्सुपियल स्तनधारी है, जो ऑस्ट्रेलिया का मूल निवासी है।
इसे अक्सर गलती से “कोआला भालू” कहा जाता है, लेकिन यह भालू नहीं है, बल्कि मार्सुपियल है (ऐसा स्तनधारी जो अपने शिशुओं को पेट की थैली में रखकर पालता है)।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक है।
भारत में इसका प्रमुख आवास राजस्थान का थार मरुस्थल है, विशेष रूप से डेजर्ट नेशनल पार्क, जहाँ इस प्रजाति की जंगली आबादी का 90% से अधिक पाया जाता है।
महत्व – यह अपने मूल शुष्क और अर्ध-शुष्क घास भूमि पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
IUCN स्थिति – अत्यंत संकटग्रस्त।
नवीन-खोजी गई प्रजातियाँ
स्पार्टेउस करिगिरी → जंपिंग स्पाइडर (मकड़ी)
एलोग्राफा एफ्यूसोरेडिका → लाइकेन (पश्चिमी घाट)
पोर्टुलाका भारत → पुष्पीय पौधा
शीथिया रोज़ेमलायेंसिस → शैवाल (काई)
अन्य
पूर्वोत्तर भारत में स्कारब बीटल की नई प्रजाति की खोज।
ओडिशा में मिट्टी में रहने वाला नेमाटोड प्रजाति – क्रासोलाबियम धृतिया।
पश्चिम बंगाल के सुंदरबन स्थित सागर द्वीप में नई वुल्फ स्पाइडर प्रजाति – पिराटुला एक्यूमिनाटा की खोज।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने पश्चिम बंगाल में दो नई मृदा सूक्ष्म-आर्थ्रोपोडा प्रजातियाँ खोजीं – सलीना औरंतियामाकुलाटा (नारंगी धब्बों वाली)
सलीना स्यूडोमोंटाना (एस. मोंटाना से मिलती-जुलती)इससे भारत की जैव विविधता में वृद्धि हुई।
भारतीय वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट में ब्लैक एस्परजिलस की दो नई प्रजातियां खोजीं –एस्परगिलस ढाके फाल्करी एस्परगिलस पेट्रीसिया विल्टशायरी
यह खोज पश्चिमी घाट की छिपी हुई कवकीय विविधता और पारिस्थितिक महत्व को दर्शाती है।
ISFR 2023 के प्रमुख निष्कर्ष
द्विवार्षिक “इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2023” का 18वाँ संस्करण 21 दिसंबर 2024 को जारी किया गया।
देश का कुल वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किमी है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है।
इसमें शामिल हैं:7,15,343 वर्ग किमी (21.76%) – वन आवरण1,12,014 वर्ग किमी (3.41%) – वृक्ष आवरण
2021 के आकलन की तुलना में देश के वन और वृक्ष आवरण में 1,445 वर्ग किमी की वृद्धि हुई है।
इसमें:156 वर्ग किमी की वृद्धि वन आवरण में1,289 वर्ग किमी की वृद्धि वृक्ष आवरण में हुई है।
वन और वृक्ष आवरण में सबसे अधिक वृद्धि वाले चार राज्य:
छत्तीसगढ़ – 684 वर्ग किमी
उत्तर प्रदेश – 559 वर्ग किमी
ओडिशा – 559 वर्ग किमी
राजस्थान – 394 वर्ग किमी
वन आवरण में सबसे अधिक वृद्धि वाले तीन राज्य
मिज़ोरम – 242 वर्ग किमी
गुजरात – 180 वर्ग किमी
ओडिशा – 152 वर्ग किमी
क्षेत्रफल के आधार पर सबसे अधिक वन और वृक्ष आवरण वाले तीन राज्य
मध्य प्रदेश – 85,724 वर्ग किमी
अरुणाचल प्रदेश – 67,083 वर्ग किमी
महाराष्ट्र – 65,383 वर्ग किमी
क्षेत्रफल के आधार पर सबसे अधिक वन आवरण वाले तीन राज्य
मध्य प्रदेश – 77,073 वर्ग किमी
अरुणाचल प्रदेश – 65,882 वर्ग किमी
छत्तीसगढ़ – 55,812 वर्ग किमी
कुल भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिशत के अनुसार सबसे अधिक वन आवरण वाले क्षेत्र
लक्षद्वीप – 91.33%
मिजोरम – 85.34%
अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह – 81.62%
वर्तमान आकलन के अनुसार 19 राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों में कुल भौगोलिक क्षेत्र का 33% से अधिक भाग वन आवरण के अंतर्गत है।
इनमें से आठ राज्य/केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहाँ 75% से अधिक वन आवरण है
:मिजोरम
लक्षद्वीप
अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह
अरुणाचल प्रदेश
नागालैंड
मेघालय
त्रिपुरा
मणिपुर
देश में कुल मैंग्रोव आवरण 4,992 वर्ग किमी है।
अभिलिखित वन क्षेत्र में वृक्ष प्रजातियाँ – साल का योगदान सबसे अधिक है और इसके बाद सागौन और चीड़।
वन क्षेत्र के बाहर के वृक्ष- आम सबसे प्रमुख है और इसके बाद नीम और महुआ।
वर्तमान आकलन के अनुसार देश के वनों में कुल कार्बन भंडार 7,285.5 मिलियन टन आंका गया है।
यह पिछले आकलन की तुलना में 81.5 मिलियन टन की वृद्धि दर्शाता है।राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के तहत कार्बन संचयन के लक्ष्य की स्थिति के अनुसार, भारत का कुल कार्बन भंडार 30.43 बिलियन टन CO₂ समतुल्य तक पहुँच गया है।यह दर्शाता है कि 2005 के आधार वर्ष की तुलना में भारत ने 2.29 बिलियन टन अतिरिक्त कार्बन सिंक प्राप्त कर लिया है, जबकि 2030 तक 2.5 से 3.0 बिलियन टन का लक्ष्य रखा गया है।
सतत विकास
परिभाषा – ‘ऐसा विकास जो वर्तमान की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता न करे।
”सतत विकास का उद्देश्य लोगों और पृथ्वी के लिए समावेशी, सतत और लचीले भविष्य के निर्माण के लिए संयुक्त प्रयास करना है।
इतिहास
सतत विकास पर वैश्विक पहलस्टॉकहोम सम्मेलन, 1972 –
यह पर्यावरणीय चिंताओं को वैश्विक एजेंडा पर रखने की दिशा में पहला कदम था।
UNEP की स्थापना 1972 में की गई, ताकि यह अन्य संगठनों के कार्यक्रमों में पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण विकसित करने और समन्वय करने के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सके।
विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (WCED)
स्थापना – इसे 1983 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित किया गया।
इसे ब्रंटलैंड आयोग के नाम से भी जाना जाता है।
सतत विकास की अवधारणा को इसी आयोग ने लोकप्रिय बनाया।
इसे ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987) के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, जिसका शीर्षक था – “हमारा साझा भविष्य”।
इसने पृथ्वी शिखर सम्मेलन (1992) और एजेंडा 21 की नींव रखी।
पृथ्वी शिखर सम्मेलन, 1992
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) 3 से 14 जून 1992 के बीच रियो डी जेनेरियो, ब्राजील में आयोजित किया गया।
इस सम्मेलन में 178 से अधिक देशों की सरकारों ने निम्न प्रमुख दस्तावेजों को अपनाया:
एजेंडा 21 पर्यावरण और विकास पर रियो घोषणा वनों के सतत प्रबंधन के सिद्धांतों का वक्तव्य
सहस्राब्दी (मिलेनियम) विकास लक्ष्य (MDGs) – 2015 तक
सितंबर 2000 में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित सहस्राब्दी शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से सहस्राब्दी घोषणा को अपनाया।
इस समिट के परिणामस्वरूप अत्यधिक गरीबी को कम करने के लिए 2015 तक आठ मिलेनियम विकास लक्ष्य (MDGs) निर्धारित किए गए।
UNCED, विश्व सतत विकास शिखर सम्मेलन
(रियो+10) वर्ष 2002 में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित हुआ।
वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सम्मेलन (रियो+20 / रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन 2012) भी ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित किया गया।
इस सम्मेलन ने गरीबी उन्मूलन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति वैश्विक समुदाय की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्टि की तथा एजेंडा 21 और मिलेनियम घोषणा के आधार पर आगे बढ़ते हुए बहुपक्षीय साझेदारियों पर अधिक जोर दिया।
रियो+20 (2012) या पृथ्वी शिखर सम्मेलन 2012
जून 2012 में रियो डी जेनेरियो, ब्राजील में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सम्मेलन (रियो+20) में सदस्य देशों ने “द फ्यूचर वी वांट” नामक परिणाम दस्तावेज़ को अपनाया।
इसमें यह निर्णय लिया गया कि मिलेनियम विकास लक्ष्यों (MDGs) के आधार पर आगे बढ़ते हुए सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का एक नया सेट विकसित किया जाएगा तथा संयुक्त राष्ट्र उच्च स्तरीय राजनीतिक मंच की स्थापना की जाएगी।
रियो+20 के परिणामों में सतत विकास को लागू करने के लिए अन्य उपाय भी शामिल थे, जैसे विकास वित्तपोषण, छोटे द्वीपीय विकासशील देशों आदि के लिए भविष्य के कार्यक्रमों का निर्धारण।
SDGs ने मिलेनियम विकास लक्ष्यों (MDGs) का स्थान लिया, जिन्हें वर्ष 2000 में वैश्विक स्तर पर गरीबी उन्मूलन के प्रयासों के लिए शुरू किया गया था।
संयुक्त राष्ट्र एजेंडा 2030 – सतत विकास लक्ष्य (SDGs)
SDGs 17 वैश्विक लक्ष्यों और उनके 169 उद्देश्यों का समूह है, जिन्हें 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2030 तक प्राप्त करने के लिए निर्धारित किया गया।
इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा के “एजेंडा 2030” प्रस्ताव के तहत अपनाया गया।इनका उद्देश्य सभी प्रकार की गरीबी का उन्मूलन, सभी के मानवाधिकारों की प्राप्ति और लैंगिक समानता हासिल करना है।
यह शिखर सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र महासभा के 70 वें सत्र की उच्च स्तरीय पूर्ण बैठक के रूप में आयोजित किया गया था।
SDGs के साथ ही 2015 में COP21 पेरिस जलवायु सम्मेलन में भी एक ऐतिहासिक समझौता हुआ।
इससे पहले 2 अगस्त 2015 को “ट्रांसफॉर्मिंग अवर वर्ल्ड: 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट” नामक दस्तावेज़ को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था।
लक्ष्य संकेतक
लक्ष्य 1
शून्य गरीबी
लक्ष्य 2
शून्य भुखमरी
लक्ष्य 3
उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली
लक्ष्य 4
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
लक्ष्य 5
लैंगिक समानता
लक्ष्य 6
स्वच्छ जल और स्वच्छता
लक्ष्य 7
सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा
लक्ष्य 8
उत्कृष्ट कार्य और आर्थिक वृद्धि
लक्ष्य 9
उद्योग, नवाचार और बुनियादी सुविधाएं
लक्ष्य 10
असमानताओं में कमी
लक्ष्य 11
संवहनीय शहर एवं समुदाय
लक्ष्य 12
संवहनीय उपभोग और उत्पादन
लक्ष्य 13
जलवायु कार्रवाई
लक्ष्य 14
जलीय जीवों की सुरक्षा
लक्ष्य 15
थलीय जीवों की सुरक्षा
लक्ष्य 16
शांति, न्याय और सशक्त संस्थाएं
लक्ष्य 17
लक्ष्यों हेतु साझेदारी
राजस्थान SDG पोर्टल 2.0 का शुभारंभ 29 जून 2025 को RIC (राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर), जयपुर में किया गया।