जीव विज्ञान के मूल सिद्धांत

जीव विज्ञान के मूल सिद्धांत: विज्ञान व प्रौद्योगिकी के अंतर्गत जीव विज्ञान जीवन और जीवित प्राणियों की संरचना, कार्यप्रणाली, वृद्धि, विकास और परस्पर संबंधों का अध्ययन करता है। यह विषय कोशिका, ऊतक, अंगों तथा जैविक प्रक्रियाओं की मूल अवधारणाओं को समझाकर मानव जीवन, स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करता है।

पादपों में पोषण

जीवों के स्वास्थ्य, शारीरिक वृद्धि और विकास को बनाए रखने के लिए भोजन के रूप में आवश्यक पोषक तत्वों को ग्रहण करने की प्रक्रिया को पोषण कहते हैं।पादप सभी जीवों के लिए पोषक तत्वों के मुख्य स्रोत होते हैं।पादपों की सामान्य वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्व, जो मिट्टी से अवशोषित किए जाते हैं, मुख्यतः दो समूहों में विभाजित किए जाते हैं—

  • वृहद पोषक तत्व –  वे पोषक तत्व जिनकी पौधों को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है, वृहद पोषक तत्व कहलाते हैं। पौधों के ऊतकों में इनकी मात्रा लगभग 0.2% से 4% तक होती है। उदाहरण— कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर आदि।वृहद पोषक तत्व दो प्रकार के होते हैं—
  • (a) प्राथमिक वृहद पोषक तत्व: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम।
  • (b) द्वितीयक वृहद पोषक तत्व: कैल्शियम, मैग्नीशियम और सल्फर।
  • सूक्ष्म पोषक तत्व – वे पोषक तत्व जिनकी पौधों को बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है, सूक्ष्म पोषक तत्व कहलाते हैं। पौधों के ऊतकों में इनकी मात्रा 0.02% से भी कम होती है, लेकिन इनकी उपस्थिति पौधों के लिए बहुत आवश्यक होती है। उदाहरण— जिंक, कॉपर, मैंगनीज, आयरन, बोरॉन, मोलिब्डेनम, क्लोरीन, निकेल। इनमें से किसी भी पोषक तत्व की कमी होने पर पौधों में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

पोषण के आधार पर पादपों का वर्गीकरण

  • परजीवी पादप – वे पौधे जो दूसरे पौधों या पेड़ों से भोजन प्राप्त करते हैं, परजीवी पादप कहलाते हैं। जिस पौधे से वे भोजन प्राप्त करते हैं उसे पोषक पौधा कहते हैं। उदाहरण— कस्कुटा।
  • कीटभक्षी पादप – वे पौधे जो जीवित रहने के लिए कीटों को पकड़कर उनका पाचन करते हैं, कीटभक्षी पादप कहलाते हैं। उदाहरण— ड्रोसेरा, डायोनिया, यूट्रिकुलारिया, पिचर प्लांट।
  • मृतपोषी पादप – वे पौधे जो मृत और सड़ते-गलते पदार्थों से पोषक तत्व प्राप्त करते हैं, मृतपोषी पादप कहलाते हैं। उदाहरण— मोनोट्रोपा, गोबर पर उगने वाला कवक।
  • सहजीवी पादप – जब दो जीव एक साथ रहते हैं और भोजन, पानी, पोषक तत्व तथा आश्रय साझा करते हैं, तो इसे सहजीविता कहते हैं। उदाहरण— लाइकेन, जिसमें कवक और शैवाल साथ रहते हैं।
  • स्वपोषी पादप – वे पौधे जो सूर्य के प्रकाश की सहायता से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, स्वपोषी कहलाते हैं।

प्रकाश संश्लेषण

  • वह प्रक्रिया जिसमें हरे पौधे सूर्य के प्रकाश, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके कार्बोहाइड्रेट (भोजन) बनाते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं, उसे प्रकाश संश्लेषण कहते हैं।
  • भोजन संश्लेषण का स्थान – पौधों में भोजन का निर्माण पत्तियों में होता है। पत्तियों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें रंध्र कहा जाता है। प्रत्येक रंध्र के चारों ओर रक्षक कोशिकाएँ होती हैं। वायु में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड रंध्रों के माध्यम से पत्तियों के अंदर प्रवेश करती है।
  • प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक पदार्थ – भोजन बनाने के लिए पत्तियों को निम्न पदार्थों की आवश्यकता होती है— सूर्य का प्रकाश, जल, कार्बन डाइऑक्साइड, खनिज लवण (जो मिट्टी से प्राप्त होते हैं)।
  • जड़ और तने की भूमिका – जड़ें मिट्टी से पानी और खनिज लवणों को अवशोषित करती हैं। तने में नलिकाकार वाहिकाएँ (जाइलम) होती हैं, जो पानी और खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाती हैं।
  • क्लोरोफिल की भूमिका – पत्तियों में क्लोरोफिल नामक हरा वर्णक पाया जाता है। क्लोरोफिल सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को अवशोषित करता है और इसी ऊर्जा की सहायता से भोजन का निर्माण होता है।
  • अंतिम उत्पाद – 
    • कार्बोहाइड्रेट – जो पौधों के लिए भोजन का कार्य करते हैं।
    • ऑक्सीजन – जो वायु में छोड़ दी जाती है।
    • बने हुए कार्बोहाइड्रेट को स्टार्च में परिवर्तित करके पौधों में संग्रहित कर लिया जाता है।

पादपों में पाए जाने वाले हार्मोन

वृद्धि प्रेरक हार्मोन

  1. ऑक्सिन: यह पौधों की वृद्धि को नियंत्रित करता है। इसका मुख्य कार्य पत्तियों के पृथक्करण को रोकना है।
  2. जिबरेलिन्स : यह बौने पौधों को लंबा बनाता है। यह फूल बनने में सहायता करता है। यह पौधों की निष्क्रिय अवस्था को समाप्त करता है और बीजों के अंकुरण को प्रोत्साहित करता है। यह काष्ठीय पौधों में कैंबियम की क्रिया को बढ़ाता है।
  3. साइटोकाइनिन: यह कोशिका विभाजन और विकास में सहायता करता है। यह बीजों की निष्क्रिय अवस्था को समाप्त करने में मदद करता है। यह RNA और प्रोटीन के निर्माण में सहायक होता है।

वृद्धि अवरोधक हार्मोन

  1. एब्सिसिक अम्ल : यह हार्मोन वृद्धि के विरुद्ध कार्य करता है। यह बीज और कलियों को निष्क्रिय अवस्था में बनाए रखता है। यह पत्तियों के झड़ने में मुख्य भूमिका निभाता है और दीर्घ-दिवसीय पौधों में फूल आने में विलंब करता है।
  2. एथिलीन: यह फलों के पकने में सहायता करता है। यह मादा फूलों की संख्या बढ़ाता है। यह पत्तियों, फूलों और फलों के अलग होने को प्रेरित करता है। फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए उपयोग की जाने वाली गैस एथिलीन या एथेन होती है।

अन्य

  1. फ्लोरीजेन : यह पत्तियों में बनता है, लेकिन फूलों के खिलने में सहायता करता है। इसलिए इसे पुष्पन हार्मोन भी कहा जाता है।
  2. ट्रॉमेटिन : यह एक प्रकार का डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल है। यह घायल कोशिकाओं में बनता है और पौधों के घाव को ठीक करने में सहायता करता है।

पादपों में अलैंगिक जनन की विधियाँ

  1. वानस्पतिक जनन : इसमें नए पौधे जड़, तना, पत्ती या कली जैसे शाकीय भागों से बनते हैं। इसमें बनने वाले पौधे मूल पौधे के समान होते हैं। उदाहरण: आलू, अदरक, हल्दी (राइजोम), ब्रायोफिलम (पत्ती की कलियाँ), गुलाब, मनी प्लांट (तने की कटिंग), शकरकंद, डहलिया (जड़)।
  2. बीजाणु निर्माण : इस विधि में छोटे-छोटे बीजाणु बनते हैं जिनके ऊपर कठोर आवरण होता है, जिससे वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं। उदाहरण: ब्रेड मोल्ड (राइजोपस), फर्न, मॉस।
  3. खंडन : इस विधि में मूल जीव कई भागों में टूट जाता है और प्रत्येक भाग से नया जीव बन जाता है। उदाहरण: स्पाइरोजाइरा और अन्य तन्तुमय शैवाल।
  4. मुकुलन : इस विधि में मूल जीव के शरीर पर एक छोटी कली बनती है, जो बढ़कर अलग हो जाती है और नया जीव बनाती है। उदाहरण: हाइड्रा और यीस्ट।

पाचन तंत्र

पोषण की संपूर्ण प्रक्रिया पाँच चरणों में विभाजित होती है: भोजन ग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण, उत्सर्जन

  1. भोजन ग्रहण : भोजन को मुख में लेना।
  2. पाचन : अवशोषित न हो सकने वाले भोजन को अवशोषित होने योग्य रूप में बदलने की प्रक्रिया पाचन कहलाती है। भोजन का पाचन मुख (मुँह) से प्रारम्भ होता है।
    • मुँह में लार ग्रंथियों से लार स्रावित होती है, जिसमें एमाइलेज या टायलिन नामक एंजाइम होता है। यह स्टार्च को सरल शर्करा में बदलकर पाचन योग्य बनाता है। लार का pH लगभग 6.8 होता है।
    • मुँह से भोजन भोजन नली (ग्रासनली) के माध्यम से आमाशय तक पहुँचता है। भोजन नली में कोई पाचन नहीं होता।
    • आहार नाल की दीवारों का नियमित संकुचन और प्रसार, जिससे भोजन आगे की ओर बढ़ता है, क्रमाकुंचन गति कहलाता है।

अवशोषण (आमाशय में पाचन)

  • जब भोजन आमाशय में पहुँचता है, तो जठर ग्रंथियाँ जठर रस का स्राव करती हैं। जठर रस का pH लगभग 1.5 से 3.5 होता है।
  • आमाशय की ऑक्सिंटिक कोशिकाओं से स्रावित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) भोजन के साथ आने वाले सभी बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है और एंजाइमों की क्रियाओं को तेज करता है।
  • हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के कारण भोजन अम्लीय हो जाता है।
  • आमाशय के गैस्ट्रिक रस में मुख्य एंजाइम— पेप्सिन और रेनिन होते हैं।
  • रेनिन दूध में पाए जाने वाले केसीनोजन को केसीन में परिवर्तित करता है।

स्वांगीकरण (आंत में पाचन)

  • आंत दो मुख्य भागों में विभाजित होती है— 
    • (a) छोटी आंत 
    • (b) बड़ी आंत।
  • छोटी आंत तीन भागों में विभाजित होती है – 
    • ग्रहणी (डुओडेनम)
    • मध्यांत्र (जेजुनम) 
    • शेषान्त्र (इलियम)
ग्रहणी (डुओडेनम)
  • जैसे ही भोजन ग्रहणी में पहुँचता है, यकृत से आने वाला पित्त रस उससे मिल जाता है। पित्त रस क्षारीय होता है और यह भोजन के अम्लीय माध्यम को क्षारीय बना देता है।
  • यहाँ अग्न्याशय से निकलने वाला अग्न्याशयी रस भी भोजन से मिल जाता है। इसमें तीन प्रकार के एंजाइम होते हैं—
  • (a) ट्रिप्सिन : यह प्रोटीन और पेप्टोन को पॉलीपेप्टाइड और अमीनो अम्ल में बदलता है।
  • (b) एमाइलेज : यह स्टार्च को घुलनशील शर्करा में बदलता है।
  • (c) लाइपेज : यह पायसीकृत वसा को ग्लिसरॉल और वसीय अम्लों में बदलता है।
  • कोलेसिस्टोकिनिन एक हार्मोन है जो ग्रहणी की अंतःस्रावी कोशिकाओं से स्रावित होता है। यह अग्न्याशय से पाचक एंजाइमों के स्राव और पित्ताशय से पित्त के निकलने को प्रेरित करता है। इसे भूख को दबाने वाला हार्मोन भी कहा जाता है।

मध्यांत्र (जेजुनम)

  • यहाँ पाचन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और पचे हुए भोजन का अवशोषण शुरू होता है।
  • छोटी आंत की दीवारों से आंत्र रस स्रावित होता है, जिसमें निम्न एंजाइम होते हैं—
  • (a) इरेप्सिन : यह शेष प्रोटीन और पेप्टोन को अमीनो अम्लों में बदलता है।
  • (b) माल्टेज : यह माल्टोज को ग्लूकोज में बदलता है।
  • (c) सुक्रेज : यह सुक्रोज को ग्लूकोज और फ्रक्टोज में बदलता है।
  • (d) लैक्टेज : यह लैक्टोज को ग्लूकोज और गैलेक्टोज में बदलता है।
  • (e) लाइपेज : यह पायसीकृत वसा को ग्लिसरॉल और वसीय अम्लों में बदलता है।
    • आंत्र रस क्षारीय प्रकृति का होता है।

शेषान्त्र (इलियम) 

  • अवशोषण : वह प्रक्रिया जिसमें पचा हुआ भोजन रक्त में मिल जाता है, अवशोषण कहलाती है। पचे हुए भोजन का अवशोषण छोटी आंत की दीवारों में पाए जाने वाले रसांकुर के माध्यम से होता है।
  • स्वांगीकरण : शरीर में अवशोषित भोजन का उपयोग स्वांगीकरण कहलाता है।
  • उत्सर्जन (बड़ी आंत में पाचन)
    • अवशोषित न हुआ भोजन बड़ी आंत में पहुँचता है, जहाँ बैक्टीरिया उसे मल में बदल देते हैं।
    • इसके बाद यह मलद्वार के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
पाचन का संक्षिप्त विवरण
ग्रंथि / रसएंजाइमखाद्य पदार्थअभिक्रिया के बाद उत्पाद
लारएमाइलेजस्टार्चमाल्टोज
जठर रसपेप्सिनप्रोटीनपेप्टोन
रेनिनकेसीनकैल्शियम पैराकेसीन
अग्नाशयी रसट्रिप्सिनप्रोटीनपॉलीपेप्टाइड
एमाइलेजस्टार्चशर्करा
लाइपेजवसावसीय अम्ल और ग्लिसरॉल
आंत्र रसइरेप्सिनप्रोटीनएमीनो अम्ल
माल्टेजमाल्टोजग्लूकोज
लैक्टेजलैक्टोजग्लूकोज और फ्रक्टोज
सुक्रेजसुक्रोजग्लूकोज और गैलेक्टोज
लाइपेजवसावसीय अम्ल और ग्लिसरॉल
  • भोजन का अधिकतम पाचन ग्रहणी (डुओडेनम) में होता है, जबकि भोजन का पूर्ण पाचन मध्यांत्र (जेजुनम) में होता है।
  • भोजन का अधिकतम अवशोषण मध्यांत्र (जेजुनम) में होता है, जबकि पूर्ण अवशोषण शेषान्त्र (इलियम) में होता है।

पाचन में भाग लेने वाले मुख्य अंग

यकृत
  • यह मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। इसका वजन लगभग 1.5–2 किलोग्राम होता है।
  • यह पित्त रस का स्राव करता है, जो आंत में वसा का पायसीकरण करता है और पाचक एंजाइमों की क्रिया को आसान बनाता है।
  • यकृत विअमोनीकरण प्रक्रिया द्वारा अतिरिक्त अमीनो अम्ल को अमोनिया में बदल देता है। अमोनिया को आगे यूरिया चक्र द्वारा यूरिया में परिवर्तित किया जाता है। यह यूरिया गुर्दों के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
  • कार्बोहाइड्रेट के उपापचय में यकृत रक्त में उपस्थित अतिरिक्त ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में बदलकर यकृत कोशिकाओं में संग्रहित कर लेता है। जब शरीर को ग्लूकोज की आवश्यकता होती है, तो यकृत ग्लाइकोजन को पुनः ग्लूकोज में बदल देता है। इस प्रकार यह रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करता है।
  • यदि भोजन में वसा की मात्रा कम हो, तो यकृत कार्बोहाइड्रेट के कुछ भाग को वसा में परिवर्तित कर देता है।
  • यकृत में फाइब्रिनोजन प्रोटीन बनता है, जो रक्त के थक्के बनने में सहायता करता है।
  • यकृत में हिपेरिन प्रोटीन भी बनता है, जो शरीर के भीतर रक्त के थक्के बनने से रोकता है।
  • पुरानी या क्षतिग्रस्त लाल रक्त कोशिकाएँ यकृत द्वारा नष्ट की जाती हैं।
  • भोजन में विष के कारण हुई मृत्यु की जाँच में यकृत महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करता है।
पित्ताशय
  • पित्ताशय नाशपाती के आकार की थैली होती है, जिसमें यकृत से आने वाला पित्त रस संग्रहित रहता है।
  • पित्त रस पित्त नली के माध्यम से पित्ताशय से ग्रहणी में पहुँचता है।
  • ग्रहणी में पित्त का स्राव प्रतिवर्ती क्रिया द्वारा होता है। पित्त रस पीला-हरा रंग का क्षारीय द्रव होता है। इसका pH लगभग 7.7 होता है। इसमें लगभग 85% पानी और लगभग 12% पित्त वर्णक होते हैं।
  • पित्त रस के मुख्य कार्य –
    • यह भोजन के माध्यम को क्षारीय बनाता है, जिससे अग्न्याशयी रस सही प्रकार से कार्य कर सके।
    • यह भोजन के साथ आने वाले हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है।
    • यह वसा का पायसीकरण करता है।
    • यह आंत की गति को तीव्र करता है, जिससे पाचक रस भोजन में अच्छी तरह मिल जाते हैं।
  • यदि पित्त नली में रुकावट हो जाए तो पित्त आंत में नहीं पहुँच पाता। परिणामस्वरूप यह रक्त में जमा हो जाता है और पूरे शरीर में फैल जाता है, जिससे पीलिया हो जाता है।
अग्न्याशय
  • यह मानव शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह अंतःस्रावी और बहिःस्रावी दोनों प्रकार की ग्रंथि के रूप में कार्य करती है।
  • इससे अग्न्याशयी रस (Pancreatic juice) स्रावित होता है, जिसमें लगभग 9.8% पानी तथा शेष भाग में लवण और एंजाइम होते हैं। यह एक क्षारीय द्रव है जिसका pH लगभग 7.5–8.3 होता है।
  • इसमें ऐसे एंजाइम होते हैं जो कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन तीनों प्रकार के भोजन का पाचन कर सकते हैं, इसलिए इसे पूर्ण पाचक रस कहा जाता है।
  • लैंगरहैंस द्वीपिकाएँ : यह अग्न्याशय का एक भाग है।
    • β कोशिकाओं से इंसुलिन 
    • α कोशिकाओं से ग्लूकागोन 
    • δ कोशिकाओं से सोमाटोस्टेटिन हार्मोन स्रावित होते हैं।
  • ग्लूकागोन : यह ग्लाइकोजन को पुनः ग्लूकोज में परिवर्तित करता है।
  • सोमाटोस्टेटिन : यह एक पॉलीपेप्टाइड हार्मोन है, जो भोजन के स्वंगीकरण की अवधि को बढ़ाता है।

श्वसन तंत्र

  • मानव श्वसन तंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग फेफड़े हैं, जहाँ गैसों का आदान-प्रदान होता है।
  • श्वसन एक उष्माक्षेपी ऑक्सीकरण प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें ऊष्मा और ऊर्जा निकलती है, जो कोशिकीय क्रियाओं को संचालित करती है।
  • मनुष्यों में दो फेफड़े हृदय के पास वक्ष गुहा में स्थित होते हैं। दाएँ फेफड़े में तीन खंड और बाएँ फेफड़े में दो खंड होते हैं। 
  • फेफड़ों को दोहरी झिल्ली ढकती है जिसे प्ल्यूरा कहते हैं।
  • श्वसन तंत्र के अंतर्गत आने वाले अंग हैं– नासिका मार्ग, ग्रसनी, कंठ या स्वरयंत्र, श्वासनली, श्वसनी, श्वसनिकाएँ, फेफड़े आदि।
  • नासिका मार्ग – यह श्वसन और सूँघने में सहायता करता है। इसकी भीतरी परत म्यूकस बनाती है, जो धूल और कीटाणुओं को पकड़ लेती है। यह फेफड़ों में जाने वाली हवा को गर्म और नम भी बनाती है।
  • ग्रसनी – यह वायु और भोजन दोनों के लिए सामान्य मार्ग है। यह नासिका गुहा के पीछे स्थित होती है।
  • कंठ / स्वरयंत्र – इसे स्वरयंत्र भी कहते हैं। इसका मुख ग्लॉटिस कहलाता है और यह एपिग्लॉटिस से ढका होता है, जो भोजन को श्वासनली में जाने से रोकता है।
  • यहाँ उपस्थित स्वर तंतु ध्वनि उत्पन्न करने में सहायता करते हैं।
  • श्वासनली – यह कंठ से छाती तक जाने वाली नली है। इसे C-आकार की उपास्थि की वलयों से सहारा मिलता है। इसकी भीतरी परत में सिलिया और म्यूकस होते हैं, जो धूल कणों को रोकते हैं।
  • श्वसनी और श्वसनिकाएँ (ब्रोंकाई और ब्रोंकिओल्स) – श्वासनली दो भागों में विभाजित होकर दो ब्रोंकाई बनाती है। प्रत्येक ब्रोंकस एक फेफड़े में प्रवेश करता है और आगे छोटी-छोटी श्वसनिकाओं (ब्रोंकिओल्स) में विभाजित हो जाता है।
  • ब्रोंकिओल्स के अंत में वायुकोष्ठिका होती हैं, जहाँ गैसों का आदान-प्रदान होता है।
  • फेफड़े (Lungs) – वक्ष गुहा में फेफड़ों की एक जोड़ी होती है। इनका रंग गुलाबी या लाल होता है और ये स्पंज जैसे दिखाई देते हैं। दायाँ फेफड़ा बाएँ फेफड़े से बड़ा होता है। प्रत्येक फेफड़ा प्ल्यूरल झिल्ली से घिरा होता है। फेफड़ों में रक्त केशिकाओं का जाल होता है, जहाँ ऑक्सीजन रक्त में प्रवेश करती है और कार्बन डाइऑक्साइड रक्त से बाहर निकलती है।
  • श्वसन की प्रक्रिया चार भागों में विभाजित की जा सकती है—
    • बाह्य श्वसन
    • गैसों का परिवहन
    • आंतरिक श्वसन
    • कोशिकीय श्वसन

बाह्य श्वसन

  • इसे दो भागों में बाँटा गया है – 
  • (a) श्वसन क्रिया (श्वास-प्रश्वास)
  • (b) गैसों का आदान-प्रदान
(a) श्वसन क्रिया (श्वास-प्रश्वास)
  • फेफड़ों में निश्चित दर से हवा का अंदर जाना और बाहर आना श्वसन क्रिया कहलाता है। एक वयस्क व्यक्ति लगभग एक मिनट में 16 से 18 बार श्वास लेता है।
श्वसन की क्रियाविधि
  • अन्तःश्वसन – शरीर में हवा के प्रवेश को श्वास ग्रहण कहते हैं। यह एक सक्रिय प्रक्रिया है, जो डायफ्राम और अंतर्कोशिकीय मांसपेशियों के संकुचन से प्रारम्भ होती है। जब डायफ्राम संकुचित होता है, तो यह समतल हो जाता है। संकुचन के समय डायफ्राम उदर की ओर नीचे चला जाता है, जिससे वक्ष गुहा का आयतन बढ़ जाता है।
  • निःश्वसन – फेफड़ों से हवा को बाहर निकालने की प्रक्रिया श्वास त्याग कहलाती है। सामान्य श्वसन में यह निष्क्रिय प्रक्रिया होती है, जबकि तीव्र से श्वसन में यह सक्रिय हो जाती है।
  • जब बाह्य इंटरकॉस्टल मांसपेशियाँ और डायफ्राम की मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, तो पसलियाँ अपने भार से नीचे आ जाती हैं और डायफ्राम ऊपर उठकर वक्ष गुहा में आ जाता है।

श्वसन के दौरान वायु की संरचना

वायुनाइट्रोजनऑक्सीजनकार्बन डाई ऑक्साइड 
अन्तःश्वसन79%21%0.03%
निःश्वसन79%17%4%

(b) गैसों का आदान-प्रदान

  • गैसों का आदान-प्रदान फेफड़ों के भीतर होता है। यह प्रक्रिया सांद्रता प्रवणता के आधार पर सामान्य विसरण द्वारा होती है।
  • ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान उनके आंशिक दाब के अंतर के कारण होता है। विसरण की दिशा दोनों ओर होती है।
  • सामान्य निःश्वसन के समय डायफ्राम धनुषाकार हो जाता है।
  1. गैसों का परिवहन
  • फेफड़ों से ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचना और फिर वापस फेफड़ों तक आना गैसों का परिवहन कहलाता है।
  • ऑक्सीजन का परिवहन रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन द्वारा होता है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कोशिकाओं से फेफड़ों तक हीमोग्लोबिन द्वारा लगभग 10–20% तक ही होता है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड का रक्त में तीन रूपों में परिवहन होता है—
    • लगभग 7% प्लाज़्मा में घुली हुई अवस्था में।
    • लगभग 70% बाइकार्बोनेट आयन के रूप में।
    • लगभग 23% कार्बामिनोहीमोग्लोबिन के रूप में हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर।

3. आंतरिक श्वसन

  • शरीर के अंदर रक्त और ऊतक द्रव के बीच गैसों का आदान-प्रदान आंतरिक श्वसन कहलाता है।
  • नोट: फेफड़ों में होने वाला गैसों का आदान-प्रदान बाह्य श्वसन कहलाता है।
4. कोशिकीय श्वसन
  • कोशिकीय श्वसन वह प्रक्रिया है जिसमें कोशिका के अंदर ग्लूकोज का ऑक्सीजन की सहायता से विघटन होता है और ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो वृद्धि, मरम्मत और दैनिक क्रियाओं के लिए आवश्यक होती है।
कोशिकीय श्वसन के प्रकार –
  1. अवायवीय श्वसन 
  • जब भोजन का ऑक्सीकरण ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है, तो इसे अवायवीय श्वसन कहते हैं।
  • इस प्रक्रिया में ग्लूकोज के एक अणु से केवल 2 ATP अणु बनते हैं।
  • पशुओं के ऊतकों (जैसे कंकालीय मांसपेशियाँ) में अवायवीय श्वसन से लैक्टिक अम्ल बनता है।
  • यीस्ट और कुछ बैक्टीरिया में एथिल अल्कोहल (एथेनॉल) बनता है।
  • अभिक्रिया:
    • C₆H₁₂O₆ → 2C₃H₆O₃ (लैक्टिक अम्ल) + ऊर्जा (पशुओं में)
    • C₆H₁₂O₆ → 2C₂H₅OH (एथिल अल्कोहल) + 2CO₂ + ऊर्जा (पौधों में) (पौधों में)
  1. वायवीय श्वसन 
  • यह प्रक्रिया ऑक्सीजन की उपस्थिति में होती है। इसमें ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है।
  • इसके परिणामस्वरूप कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), पानी (H₂O) और अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है।
  • अभिक्रिया:
    • C₆H₁₂O₆ + 6O₂ → 6CO₂ + 6H₂O + 2870 kJ ऊर्जा (38 ATP)
श्वसन पदार्थ –
  • वे पदार्थ जिनका उपयोग कोशिकाएँ ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए करती हैं, श्वसन पदार्थ कहलाते हैं।
  • कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन मुख्य श्वसन पदार्थ हैं।
  • सबसे पहले ग्लूकोज का ऑक्सीकरण होता है, उसके बाद वसा और अंत में प्रोटीन का उपयोग तब किया जाता है जब अन्य पदार्थ समाप्त हो जाते हैं।

नोट:

  • श्वसन एक अपचयी प्रक्रिया है। यह शरीर के वजन को भी कम करता है।
  • श्वसन का नियंत्रण मेडुला ऑब्लोंगाटा द्वारा किया जाता है।
  • साइनाइड विषाक्तता  में इलेक्ट्रॉन परिवहन श्रृंखला के टूटने के कारण कुछ ही सेकंड में मृत्यु हो सकती है।

अंतःस्रावी तंत्र

  • बहिःस्रावी ग्रंथियाँ : वे ग्रंथियाँ जिनमें नलिकाएँ होती हैं, बहिःस्रावी ग्रंथियाँ कहलाती हैं। ये एंजाइम या अन्य पदार्थ स्रावित करती हैं, जो इन नलिकाओं के माध्यम से बाहर निकलते हैं। उदाहरण— पाचन ग्रंथियाँ, स्वेद ग्रंथि, म्यूकस ग्रंथि, लार ग्रंथि आदि।
  • अंतःस्रावी ग्रंथियाँ :ये नलिकाविहीन ग्रंथियाँ होती हैं। इनसे हार्मोन स्रावित होते हैं। हार्मोन रक्त प्लाज़्मा के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचते हैं। उदाहरण— पिट्यूटरी ग्रंथि, थायरॉयड ग्रंथि, पैराथायरॉयड ग्रंथि आदि।

मानव शरीर की मुख्य अंतःस्रावी ग्रंथियाँ, उनके कार्य और स्रावित हार्मोन

पीयूष (पिट्यूटरी) ग्रंथि

  • यह मस्तिष्क के अग्र भाग में स्फेनॉयड अस्थि की एक गहरी जगह में स्थित होती है। इसे मास्टर ग्रंथि भी कहा जाता है। 
  • पिट्यूटरी ग्रंथि का नियंत्रण हाइपोथैलेमस द्वारा किया जाता है। हाइपोथैलेमस मस्तिष्क का वह भाग है जो शरीर की भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
  • पीयूष ग्रंथि द्वारा स्रावित हार्मोनों के कार्य निम्नलिखित हैं—
हार्मोनकार्य
वृद्धि हार्मोनशरीर की वृद्धि को नियंत्रित करता है, विशेषकर हड्डियों की वृद्धि
थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (TSH)थायरॉयड ग्रंथि को हार्मोन स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है
एड्रेनोकोर्टिकोट्रोपिक हार्मोन (ACTH) एड्रेनल कॉर्टेक्स (अधिवृक्क प्रांतस्था) के स्राव को नियंत्रित करता है
फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन (FSH)पुरुषों में शुक्राणु निर्माण को उत्तेजित करता है; स्त्रियों में ग्राफियन फॉलिकल को एस्ट्रोजन स्रावित करने के लिए प्रेरित करता है
ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH)पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन के स्राव को प्रेरित करता है; स्त्रियों में एस्ट्रोजन के स्राव को प्रेरित करता है
प्रोलैक्टिन (लैक्टोजेनिक हार्मोन)स्तनों में दूध के स्राव को उत्तेजित करता है
एंटीडाययूरेटिक हार्मोन (ADH)रक्तचाप बढ़ाता है, जल संतुलन बनाए रखता है और मूत्र की मात्रा कम करता है
ऑक्सीटोसिनप्रसव के समय गर्भाशय के संकुचन में सहायता करता है तथा स्तन ग्रंथियों से दूध निकलने में मदद करता है (हाइपोथैलेमस द्वारा स्रावित)

थायरॉयड ग्रंथि

  • यह मानव शरीर में कंठ के नीचे और श्वासनली के दोनों ओर स्थित होती है। इससे थायरॉक्सिन और ट्राइआयोडोथायरोनिन हार्मोन स्रावित होते हैं।

थायरॉक्सिन के कार्य –

  1. यह कोशिकीय श्वसन की गति बढ़ाता है।
  2. यह शरीर की सामान्य वृद्धि के लिए आवश्यक है, विशेषकर हड्डियों और बालों के विकास के लिए।
  3. प्रजनन अंगों का सामान्य कार्य थायरॉयड ग्रंथि की सक्रियता पर निर्भर करता है।
  4. यह पिट्यूटरी ग्रंथि के हार्मोनों के साथ मिलकर शरीर के जल संतुलन को नियंत्रित करता है।

थायरॉक्सिन की कमी से होने वाले रोग –

  • जड़वामनता या अवटुवामनता (क्रेटिनिज़्म) : यह रोग बच्चों में होता है, जिसमें मानसिक और शारीरिक विकास रुक जाता है।
  • मिक्सीडीमा : यह रोग सामान्यतः युवावस्था में होता है। इसमें उपापचय की क्रिया ठीक से नहीं होती, जिससे हृदय गति और रक्तचाप कम हो जाता है।
  • हाइपोथायरॉयडिज़्म: यह रोग थायरॉक्सिन हार्मोन की दीर्घकालीन कमी के कारण होता है। इससे सामान्य प्रजनन संभव नहीं होता और कभी-कभी व्यक्ति मूक और बहरा भी हो सकता है।
  • घेंघा (गोइटर) : यह रोग भोजन में आयोडीन की कमी के कारण होता है। इसमें थायरॉयड ग्रंथि असामान्य रूप से बढ़ जाती है। घेंघा की रोकथाम के लिए नमक का आयोडीकरण एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय है।

पैराथायरॉयड ग्रंथि

  • यह गले में थायरॉयड ग्रंथि के पीछे स्थित होती है। इससे दो प्रकार के हार्मोन स्रावित होते हैं—
  • पैराथायरॉयड हार्मोन: जब रक्त में कैल्शियम की कमी होती है तब यह हार्मोन स्रावित होता है।
  • कैल्सिटोनिन : जब रक्त में कैल्शियम की अधिकता होती है तब यह हार्मोन स्रावित होता है।
  • इस प्रकार पैराथायरॉयड ग्रंथि के हार्मोन रक्त में कैल्शियम की मात्रा को नियंत्रित करते हैं।
एड्रिनल (अधिवृक्क) ग्रंथि 
  • इस ग्रंथि के दो भाग होते हैं-
    • बाहरी भाग – कॉर्टेक्स 
    • भीतरी भाग – मेडुला
  • कॉर्टेक्स द्वारा स्रावित हार्मोन और उनके कार्य:
    1. ग्लूकोकोर्टिकोइड्स – यह कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के उपापचय को नियंत्रित करता है।
    2. मिनरलोकोर्टिकोइड्स – इसका मुख्य कार्य गुर्दे की नलिकाओं द्वारा आयनों का पुनः अवशोषण करना और शरीर में अन्य आयनों की मात्रा को नियंत्रित करना है।
    3. लैंगिक हार्मोन –यह यौन व्यवहार और द्वितीयक लैंगिक लक्षणों को नियंत्रित करता है।

नोट: यदि कॉर्टेक्स में विकृति हो जाए तो उपापचय की प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है। इस रोग को एडिसन रोग कहते हैं।

एड्रिनेलिन और नॉर-एड्रिनेलिन हार्मोन

  • ये हार्मोन एड्रिनल ग्रंथि के मेडुला भाग से आपातकालीन परिस्थितियों में स्रावित होते हैं।
  • सामान्य परिस्थितियों में इनका स्राव कम होता है, लेकिन तनावपूर्ण स्थितियों में अधिक होता है, इसलिए इन्हें तनाव हार्मोन या आपातकालीन हार्मोन कहा जाता है।
  • इनके स्राव के समय हृदय गति, रक्तचाप, श्वसन दर और पसीना बढ़ जाता है।
  • कंकालीय मांसपेशियों की ओर रक्त प्रवाह बढ़ जाता है और व्यक्ति आपातकालीन स्थिति में लड़ने या भागने के लिए तैयार हो जाता है, इसलिए इन्हें 3F हार्मोन (Fear, Fight, Flight) भी कहा जाता है।
  • जब एड्रिनेलिन स्रावित होता है, तब शरीर हृदय, मस्तिष्क और मांसपेशियों जैसे महत्वपूर्ण अंगों की ओर रक्त प्रवाह को प्राथमिकता देता है। इससे पाचन तंत्र और त्वचा जैसे कम महत्वपूर्ण अंगों की ओर रक्त प्रवाह कम हो जाता है।
  • थाइमस ग्रंथि : यह एक अंतःस्रावी ग्रंथि है जो वक्ष गुहा में स्थित होती है और थाइमोसिन हार्मोन का स्राव करती है।

जनन ग्रंथियाँ

  • अंडाशय : इससे निम्न हार्मोन स्रावित होते हैं—
    • एस्ट्रोजन – यह प्रजनन अंगों के विकास को पूर्ण करता है।
    • प्रोजेस्टेरोन – यह अंडाशयी चक्र के दौरान गर्भाशय की भीतरी परत को मोटा करता है।
    • रिलैक्सिन – यह हार्मोन गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय और प्लेसेंटा में पाया जाता है। यह प्यूबिक सिम्फाइसिस को शिथिल करता है और गर्भाशय ग्रीवा को चौड़ा करता है, जिससे बच्चे का जन्म आसानी से हो सके।
  • ऑक्सीटोसिन: यह हार्मोन प्रसव के समय गर्भाशय की दीवार के संकुचन में सहायता करता है तथा स्तन ग्रंथियों से दूध के स्राव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह हाइपोथैलेमस द्वारा स्रावित होता है।
  • वृषण : वृषण से टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित होता है। यह यौन व्यवहार को प्रेरित करता है और द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के विकास में सहायता करता है। 
  • नोट : ऑक्सीटोसिन एक हार्मोन है जो पश्च पिट्यूटरी ग्रंथि से स्रावित होता है और प्रसव के समय गर्भाशय के संकुचन का कारण बनता है।

उत्सर्जन तंत्र

  • मनुष्यों में मुख्य उत्सर्जन अंग गुर्दे (किडनी) होते हैं। इनके अलावा मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्रमार्ग भी उत्सर्जन प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
  • उत्सर्जन : उपापचय के दौरान बनने वाले नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया उत्सर्जन कहलाती है। सामान्यतः उत्सर्जन का अर्थ यूरिया, अमोनिया, यूरिक अम्ल जैसे नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन है।

गुर्दे (किडनी)

  • मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों में मुख्य उत्सर्जन अंग गुर्दों की एक जोड़ी होती है।
  • इसके दो भाग होते हैं। बाहरी भाग को कॉर्टेक्स तथा भीतरी भाग को मेडुला कहते हैं। 
  • प्रत्येक गुर्दे में लगभग 13 लाख नलिकाएँ होती हैं, जिन्हें नेफ्रॉन कहा जाता है।
  • नेफ्रॉन गुर्दे की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है।
  • प्रत्येक नेफ्रॉन में एक कप के आकार की संरचना होती है जिसे बोमैन संपुट कहते हैं।
  • बोमैन संपुट के अंदर पतली रक्त केशिकाओं का गुच्छा होता है जिसे ग्लोमेरुलस कहते हैं।
  • बोमैन संपुट की गुहा में द्रव के छनने की प्रक्रिया को अतिसूक्ष्म छनन कहते हैं।
  • गुर्दों का मुख्य कार्य रक्त प्लाज़्मा को शुद्ध करना है, अर्थात अनावश्यक नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों को मूत्र के रूप में बाहर निकालना।
  • अन्य अंगों की तुलना में गुर्दों को अधिक मात्रा में रक्त की आपूर्ति होती है।
  • मूत्र :  मूत्र एक जलीय विलयन है जिसमें लगभग 95% पानी होता है। इसके अन्य घटक हैं— यूरिया, यूरिक अम्ल, क्लोराइड, सोडियम, पोटैशियम, क्रिएटिनिन तथा अन्य कार्बनिक और अकार्बनिक यौगिक।
  • मूत्र निर्माण की प्रक्रिया : 
    • अतिसूक्ष्म छनन : यह प्रक्रिया बोमैन संपुट में होती है, जिसमें रक्त से छोटे आकार के उपयोगी और अपशिष्ट पदार्थ नेफ्रॉन में प्रवेश करते हैं।
    • पुनः अवशोषण : इस प्रक्रिया में उपयोगी पदार्थ फिर से रक्त में वापस चले जाते हैं। यह प्रक्रिया पूरे नेफ्रॉन में होती है, लेकिन अधिकतम पुनः अवशोषण समीपस्थ कुंडलित नलिका में होता है।
    • स्रवण : इस प्रक्रिया में बड़े आकार के अनुपयोगी पदार्थ रक्त से मूत्र में प्रवेश कर जाते हैं।
  • अमोनिया का यूरिया में परिवर्तन यूरिया चक्र कहलाता है, जो यकृत में होता है। इसका पहला उत्पाद ऑर्निथिन होता है, इसलिए इसे ऑर्निथिन चक्र भी कहा जाता है।
  • मूत्र का रंग हल्का पीला होता है, जो उसमें उपस्थित यूरोक्रोम के कारण होता है। यूरोक्रोम हीमोग्लोबिन के विघटन से बनता है।
  • मूत्र अम्लीय होता है और इसका pH लगभग 6 होता है।
  • गुर्दों में बनने वाली पथरी मुख्यतः कैल्शियम ऑक्सलेट की बनी होती है।
  • मनुष्यों के अन्य उत्सर्जन अंग
    • त्वचा : त्वचा से पसीने के रूप में नाइट्रोजन युक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं।
    • यकृत : यकृत की कोशिकाएँ रक्त में उपस्थित अधिक अमीनो अम्ल और अमोनिया को यूरिया में बदलकर उत्सर्जन में सहायता करती हैं।
    • फेफड़े : फेफड़े दो प्रकार के गैसीय पदार्थों का उत्सर्जन करते हैं— कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प। फेफड़े कुछ पदार्थों के वाष्पीय घटकों को भी बाहर निकालते हैं, जैसे लहसुन और प्याज की गंध वाले पदार्थ।

उत्सर्जन संबंधी विकार

  • यूरेमिया : जब रक्त में यूरिया की मात्रा 10–30 mg/100 ml से अधिक हो जाती है, तो इस अवस्था को यूरेमिया कहते हैं।
  • वात रोग : यह एक वंशानुगत रोग है जिसमें रक्त में यूरिक अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है और यह जोड़ों तथा गुर्दों के ऊतकों में जमा हो जाता है। यह रोग निर्जलीकरण, उपवास और मूत्रवर्धक दवाओं के कारण बढ़ सकता है।
  • गुर्दे की पथरी : सामान्यतः यूरिक अम्ल, कैल्शियम ऑक्सलेट, फॉस्फेट लवण आदि के क्रिस्टल गुर्दे के पेल्विस में जमा होकर पथरी बना लेते हैं। इससे रोगी को दर्द होता है और मूत्र के निष्कासन में बाधा उत्पन्न होती है।
  • ब्राइट्स रोग / नेफ्राइटिस : यह रोग स्ट्रेप्टोकोकस नामक बैक्टीरिया के संक्रमण से ग्लोमेरुलस में होता है। इससे ग्लोमेरुलस में सूजन आ जाती है और उसकी झिल्ली अधिक पारगम्य हो जाती है, जिससे लाल रक्त कोशिकाएँ और प्रोटीन भी निस्यंद में आ जाते हैं।
  • डायबिटीज इन्सिपिडस : यह रोग एंटीडाययूरेटिक हार्मोन (ADH) के अल्प स्राव के कारण होता है, जिससे पानी का पुनः अवशोषण कम हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है और रोगी को बार-बार अधिक मात्रा में मूत्र त्याग करना पड़ता है।
  • पीलिया : मूत्र में पित्त वर्णकों की अधिकता को पीलिया कहते हैं। यह सामान्यतः हेपेटाइटिस या पित्त नलिका के अवरुद्ध होने पर देखा जाता है।
  • हीमोडायलिसिस: रोगी के रक्त से अधिक मात्रा में यूरिया को कृत्रिम गुर्दे की सहायता से निकालने की प्रक्रिया हीमोडायलिसिस कहलाती है।

तंत्रिका तंत्र 

  • तंत्रिका तंत्र हमारे शरीर का नियंत्रण केंद्र है। यह तंत्रिकाओं, मस्तिष्क और मेरुरज्जु का एक जटिल जाल है, जो संकेतों का संचरण करके शरीर की क्रियाओं, विचारों और संवेदी सूचनाओं का समन्वय करता है। इसकी सहायता से हम चलना, महसूस करना, सीखना तथा श्वसन और पाचन जैसी अनैच्छिक क्रियाओं को नियंत्रित कर पाते हैं।
  • मानव तंत्रिका तंत्र को तीन भागों में विभाजित किया जाता है।

केंद्रीय तंत्रिका तंत्र

  • तंत्रिका तंत्र का वह भाग जो पूरे शरीर और स्वयं तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करता है, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र कहलाता है। मानव का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र दो भागों से मिलकर बना होता है – मस्तिष्क और मेरुरज्जु।
  • मस्तिष्क एक झिल्ली से ढका होता है जिसे मस्तिष्कावरण या तानिका कहते हैं। यह कपाल नामक हड्डी के बने डिब्बे में स्थित होता है, जो इसे बाहरी चोट से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • मस्तिष्क के तीन मुख्य भाग होते हैं—
    1. अग्र मस्तिष्क 
    2. मध्य मस्तिष्क
    3. पश्च मस्तिष्क
मस्तिष्क का भाग उप भागविशेषताएँ और कार्य
अग्र मस्तिष्कप्रमस्तिष्क (सेरेब्रम)यह पूर्व मस्तिष्क का सबसे अधिक विकसित एवं सबसे बड़ा भाग होता है (लगभग मस्तिष्क का 2/3 भाग)।यह दाएँ और बाएँ भागों में विभाजित होता है जिन्हें सेरेब्रल गोलार्ध कहते हैं।दोनों भाग कॉर्पस कैलोसम द्वारा जुड़े होते हैं।बाहरी सतह पर उभार और खांचे होते हैं।कार्य:  सोचने, तर्क करने, योजना बनाने, स्मरण करने, स्वैच्छिक मांसपेशियों के संकुचन को प्रारंभ करना और उन्हें नियंत्रित करना।
घ्राण तंत्रिका(ओल्फैक्टरी लोब) सेरेब्रल गोलार्ध के अग्र भाग में दो लोब होते हैं।ये गंध की अनुभूति में सहायता करते हैं।
अग्रमस्ति-ष्कपश्च (डायन्सेफेलॉन)अत्यंत संवेदनशील भाग।थैलेमससंवेदी आवेगों (दर्द, सुख आदि) को सेरिब्रम तक पहुँचाता है। यह दर्द, ठंड और गर्मी का केंद्र है।हाइपोथैलेमसअंतःस्रावी ग्रंथियों के हार्मोन स्राव को नियंत्रित करता है। पश्च पिट्यूटरी ग्रंथि से स्रावित हार्मोन इसके माध्यम से निकलते हैं। यह भूख, प्यास, तापमान नियंत्रण, प्रेम, घृणा आदि का केंद्र है। रक्तचाप, जल उपापचय, पसीना, क्रोध, आनंद आदि को नियंत्रित करता है।
मध्य-मस्तिष्क कॉर्पोरा क्वाड्रिजेमिनादो ऊपरी ऑप्टिक लोब और दो निचले लोब होते हैं। यह दृष्टि और श्रवण से संबंधित उत्तेजनाओं को ग्रहण करते हैं।
सेरेब्रल पेडंकलयह मध्य मस्तिष्क का संरचनात्मक भाग होता है।
पश्च-मस्तिष्कसेरिबेलमशरीर का संतुलन बनाए रखता है और मांसपेशीय क्रियाओं के समन्वय को नियंत्रित करता है।
पॉन्स वरोलीइसमें न्यूमोटैक्सिक केंद्र होता है जो श्वसन वेंटिलेशन को नियंत्रित करता है। यह चबाने, लार स्राव, सुनने, आँसू स्राव और नेत्रगोलकों की गति को नियंत्रित करने में मध्यस्थ की भूमिका निभाता है।
मेडुला ऑब्लांगेटामस्तिष्क का अंतिम भाग जो मेरुरज्जु से जुड़ा होता है।कार्य: श्वसन, खाँसी, निगलना, हृदय गति, रक्तचाप, आहार नाल की पेरिस्टाल्टिक गति तथा अन्य अनैच्छिक क्रियाओं का नियंत्रण।
  • नोट: मस्तिष्क के कार्यों को जानने के लिए EEG (इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी) किया जाता है।
  • मेरुरज्जु : मेडुला ऑब्लोंगाटा का पश्च भाग मेरुरज्जु बनाता है। इसके मुख्य कार्य हैं—
  • प्रतिवर्ती  क्रियाओं का समन्वय और नियंत्रण करना, अर्थात यह प्रतिवर्ती क्रियाओं का केंद्र होता है।
  • मस्तिष्क से आने वाले आवेगों का संचार करना।

नोट : प्रतिवर्ती क्रिया की खोज वैज्ञानिक मार्शल हॉल ने की थी।

प्रतिवर्ती क्रिया 

प्रतिवर्ती चाप 

  • प्रतिवर्ती क्रिया में तंत्रिका आवेग के मार्ग को प्रतिवर्ती चाप कहते हैं।
  • केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क और मेरुरज्जु शामिल होते हैं, लेकिन तत्काल प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क भाग नहीं लेता।
  • इन स्वचालित क्रियाओं को मेरुरज्जु नियंत्रित करती है, जो बिना सोचे ही उत्तेजना के प्रति प्रतिक्रिया देती है।
  • प्रतिवर्ती चाप का मार्ग –
  • ग्राही (रिसेप्टर) : यह उद्दीपन से सूचना प्राप्त करता है।
  • संवेदी तंत्रिका : यह सूचना को ग्राही से मेरुरज्जु तक पहुँचाती है।
  • मेरुरज्जु / इंटरन्यूरॉन : यह संवेदी तंत्रिका से अपवाही तंत्रिका तक सूचना पहुँचाता है।
  • प्रेरक तंत्रिका (अपवाही तंत्रिका) : यह सूचना को मेरुरज्जु से प्रभावी अंगों (मांसपेशियों) तक पहुँचाती है।
  • प्रभावक मांसपेशियाँ : ये प्रेरक तंत्रिका से सूचना प्राप्त करके प्रतिक्रिया दिखाते हैं।
  • उदाहरण :
    • किसी गरम वस्तु को छूने पर तुरंत हाथ हटाना
    • सुई चुभने पर प्रतिक्रिया
    • स्वादिष्ट भोजन को देखकर लार का स्राव होना

परिधीय तंत्रिका तंत्र

  • परिधीय तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क और मेरुरज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाओं से मिलकर बना होता है।
  • मस्तिष्क से निकलने वाली तंत्रिकाएँ कपाल तंत्रिकाएँ और मेरुरज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाएँ मेरुरज्जु तंत्रिकाएँ कहलाती हैं।
  • तंत्रिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं—
    1. संवेदी तंत्रिकाएँ
    2. मोटर तंत्रिकाएँ 
    3. मिश्रित तंत्रिकाएँ
  • मनुष्य में 12 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएँ और 31 जोड़ी मेरुरज्जु तंत्रिकाएँ होती हैं।
  • तंत्रिका ऊतक की इकाई को न्यूरॉन या तंत्रिका कोशिका कहते हैं।

स्वायत्त तंत्रिका तंत्र

  • स्वायत्त तंत्रिका तंत्र कुछ मस्तिष्क तंत्रिकाओं और कुछ मेरुरज्जु तंत्रिकाओं से मिलकर बना होता है। यह शरीर के सभी आंतरिक अंगों और रक्त वाहिकाओं को तंत्रिकाएँ प्रदान करता है।
  • स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के दो भाग होते हैं—
अनुकंपी (सिम्पेथेटिक) तंत्रिका तंत्र

कार्य

  • यह लार ग्रंथियों के स्राव को कम करता है।
  • यह हृदय गति को बढ़ाता है।
  • यह स्वेद ग्रंथियों (पसीना ग्रंथियों) के स्राव को बढ़ाता है।
  • यह श्वसन की दर को बढ़ाता है।
  • यह रक्तचाप को बढ़ाता है।
  • यह रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ाता है।

इन सभी का सामूहिक प्रभाव भय, दर्द और क्रोध जैसी स्थितियों में दिखाई देता है।

परानुकंपी (पैरासिम्पेथेटिक) तंत्रिका तंत्र

कार्य

  • इस तंत्रिका तंत्र के कार्य सामान्यतः अनुकंपी तंत्रिका तंत्र के विपरीत होते हैं।
  • उदाहरण—यह लार और अन्य पाचक रसों के स्राव को बढ़ाता है।
  • इस तंत्रिका तंत्र का सामूहिक प्रभाव आराम और आनंद की स्थिति उत्पन्न करता है।

मानव कंकाल तंत्र 

  • मानव का कंकाल तंत्र दो भागों में विभाजित होता है— 
    1. अक्षीय कंकाल
    2. उपांग कंकाल 

अक्षीय कंकाल 

  • जो कंकाल शरीर की मुख्य धुरी बनाता है, उसे अक्षीय कंकाल कहते हैं। इसमें खोपड़ी, कशेरुक स्तंभ और वक्ष की अस्थियाँ शामिल होती हैं। अक्षीय कंकाल में कुल 80 अस्थियाँ होती हैं।
  • खोपड़ी – खोपड़ी में कुल 29 अस्थियाँ होती हैं। इनमें से 8 अस्थियाँ मिलकर मानव मस्तिष्क की रक्षा करती हैं। इन अस्थियों से बनी संरचना को कपाल कहा जाता है। कपाल की सभी अस्थियाँ स्यूचर द्वारा मजबूती से जुड़ी रहती हैं। इसके अतिरिक्त 14 अस्थियाँ चेहरे का निर्माण करती हैं। दोनों कानों में 6 श्रवण अस्थियाँ तथा 1 हायॉइड अस्थि होती है।
  • कशेरुक स्तंभ – मनुष्य का कशेरुक स्तंभ 33 कशेरुकाओं से बना होता है। सभी कशेरुकाएँ इंटरवर्टेब्रल डिस्क द्वारा जुड़ी होती हैं, जिससे कशेरुक स्तंभ लचीला बनता है। पहली कशेरुका एटलस कहलाती है, जो खोपड़ी को सहारा देती है।

उपांग कंकाल

  • इसके मुख्य भाग निम्न हैं—
  • हाथों और पैरों की अस्थियां— दोनों हाथों और पैरों में कुल 118 अस्थियाँ होती हैं।
  • मनुष्य में अग्र अंग और पश्च अंग को अक्षीय कंकाल से जोड़ने के लिए दो गर्डल होते हैं—
    • पेक्टोरल गर्डल – अग्र अंग (हाथ) को जोड़ता है।
    • पेल्विक गर्डल – पश्च अंग (पैर) को जोड़ता है।
  • पेक्टोरल गर्डल से अग्र अंग की जो अस्थि जुड़ी होती है उसे ह्यूमरस कहते हैं।
  • पेल्विक गर्डल से पश्च अंग की जो अस्थि जुड़ी होती है उसे फीमर कहते हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • मानव शरीर में कुल अस्थियों की संख्या – 206
  • बाल्यावस्था में अस्थियों की संख्या – 300
  • सिर की कुल अस्थियाँ – 29 (कपाल–8, चेहरे की–14, कान की–6, हायॉइड–1)
  • कशेरुक स्तंभ की अस्थियाँ – प्रारम्भ में 33, विकास के बाद 26 (5 सैक्रल मिलकर 1 बनती हैं और 4 कॉक्सीजियल मिलकर 1 बनती हैं)
  • पसलियों की कुल अस्थियाँ – 24
  • शरीर की सबसे लंबी और सबसे मजबूत अस्थि: फीमर (जांघ की अस्थि)
  • शरीर की सबसे छोटी अस्थि: स्टेपीज़ (कान की अस्थि)
Basics of Biology
  • भुजा की अस्थियां (30)- ह्यूमरस, रेडियस, अल्ना,कलाई में 8 कार्पल,हथेली में 5 मेटाकार्पल, उँगलियों में 14 फेलेंजेस (अंगूठे में 2, प्रत्येक उंगली में 3)।
  • पैर की अस्थियाँ (30)– फीमर, टिबिया और फिबुला, 7 टार्सल, 5 मेटाटार्सल, 14 फेलेंजेस, घुटने की त्रिकोणीय चपटी सेसमॉइड अस्थि पटेला।
  • पेक्टोरल गर्डल
    • यह भुजाओं (ऊपरी अंगों) को शरीर से जोड़ता है।
    • इसके दो भाग (दायाँ और बायाँ) होते हैं।
    • प्रत्येक भाग में दो अस्थियाँ होती हैं— क्लैविकल (कॉलर बोन) एवं स्कैपुला (शोल्डर ब्लेड)।
जीव विज्ञान के मूल सिद्धांत

पेल्विक गर्डल 

  • यह पैरों (निचले अंगों) को शरीर से जोड़ता है।
  • इसके भी दो भाग होते हैं, लेकिन दोनों जघन अस्थि जोड़ (प्यूबिक सिम्फाइसिस) पर मध्य में जुड़े रहते हैं।
जीव विज्ञान के मूल सिद्धांत

जोड़ (संधियाँ)

  • संधियाँ शरीर की अस्थियों के बीच होने वाली संरचनाएँ हैं, जो शरीर के विभिन्न भागों की गतियों के लिए आवश्यक होती हैं।

जोड़ो का वर्गीकरण

  • रेशेदार जोड़– इन जोड़ो में कोई गति नहीं होती। उदाहरण: खोपड़ी की अस्थियाँ जो स्यूचर द्वारा जुड़ी होती हैं।
  • उपास्थिय जोड़ – इनमें अस्थियाँ उपास्थि द्वारा जुड़ी होती हैं। इनमें सीमित गति संभव होती है। उदाहरण: कशेरुकाओं के बीच के जोड़।
  • सिनोवियल जोड़ – इन जोड़ो में अस्थियों के बीच द्रव से भरी गुहा होती है, जिससे स्वतंत्र गति संभव होती है। 
  • उदाहरण:
    • बॉल एंड सॉकेट जोड़ – कंधा
    • हिंज जोड़ – घुटना
    • पिवट जोड़ – एटलस और एक्सिस
    • ग्लाइडिंग जोड़ – कलाई
    • सैडल जोड़ – अंगूठा

मानव शरीर में जोड़ों के प्रमुख प्रकार

जोड़ का प्रकारउदाहरणसंबंधित अस्थियाँ
बॉल और सॉकेट जोड़कंधा, कूल्हाकंधा: ह्यूमरस और पेक्टोरल करधनी (स्कैपुला)कूल्हा: फीमर और पेल्विक गर्डल
हिंज कब्जा  जोड़कोहनी, घुटना, टखना, उंगलियांकोहनी: ह्यूमरस और अल्नाघुटना: फीमर और टिबियाटखना: टिबिया और टैलस
पिवट जोड़गर्दन (एटलस और एक्सिस), रेडियो-अल्नर जोड़एटलस और एक्सिस कशेरुकाएँ \रेडियस और अल्ना
सैडल जोड़अंगूठा (कार्पोमेटाकार्पल जोड़)कार्पल (ट्रेपेजियम) और प्रथम मेटाकार्पल (अंगूठा)

दाँत

  • दांतों के प्रकार – कृंतक, रदनक, चर्वणक, अग्रचर्वणक 
  • दंत सूत्र = ऊपरी जबड़े के दाँत / निचले जबड़े के दाँत × 2
  • स्थायी दाँतों का दंत सूत्र – 2123 / 2123 × 2 = 32 दाँत
  • अक्ल दाढ़ से पहले – 2122 / 2122 × 2 = 28 दाँत
  • 13 वर्ष के बच्चे के ऊपरी जबड़े में दाँतों की संख्या: 14
  • दूध के दाँत – 2102 / 2102 × 2 (20 दाँत)
  • हाथी के दूसरे कृंतक दाँत बढ़कर लंबा दाँत बन जाते हैं।
Basics of Biology

मांसपेशीय और कंकाल तंत्र के विकार

  • मायस्थीनिया ग्रेविस:यह एक स्व-प्रतिरक्षी रोग है जो न्यूरोमस्कुलर जंक्शन को प्रभावित करता है, जिससे मांसपेशियों में थकान, कमजोरी और लकवा हो सकता है।
  • मस्कुलर डिस्ट्रॉफी: यह एक आनुवंशिक रोग है जिसमें कंकालीय मांसपेशियों का क्रमिक क्षय होता है।
  • टेटनी: यह शरीर के द्रव में कैल्शियम की कमी के कारण मांसपेशियों में तेज ऐंठन और अनियंत्रित संकुचन उत्पन्न होने की अवस्था है।
  • आर्थराइटिस: यह जोड़ो की सूजन से संबंधित रोग है।
  • ऑस्टियोपोरोसिस: यह आयु से संबंधित रोग है जिसमें अस्थियों का घनत्व कम हो जाता है और फ्रैक्चर होने की संभावना बढ़ जाती है। इसका एक सामान्य कारण एस्ट्रोजन हार्मोन का कम स्तर है।
  • गाउट: यह रोग यूरिक अम्ल के क्रिस्टल के संचित होने से जोड़ो में सूजन उत्पन्न करता है।

रक्त परिसंचरण तंत्र

  • रक्त परिसंचरण की खोज 1628 में “विलियम हार्वे” ने की थी।
  • इसके अंतर्गत चार मुख्य भाग होते हैं – 
    • हृदय 
    • धमनियां 
    • शिराएँ 
    • रक्त

हृदय 

  • हृदय पेरीकार्डियल झिल्ली या पेरिकार्डियम में सुरक्षित रहता है। इसका वजन लगभग 300 ग्राम होता है।
  • मानव का हृदय चार कक्षों से मिलकर बना होता है।
    • आगे की ओर दायाँ आलिंद और बायाँ आलिंद होते हैं।
    • पीछे की ओर दायाँ निलय और बायाँ निलय होते हैं।
जीव विज्ञान के मूल सिद्धांत
  • दाएँ आलिंद और दाएँ निलय के बीच त्रिवलनीय कपाट (ट्राइकसपिड वाल्व) होता है।
  • बाएँ आलिंद और बाएँ निलय के बीच द्विवलनीय कपाट (बाइकसपिड वाल्व) होता है।

रक्त परिसंचरण क्रम

  • स्तनधारियों में दोहरा परिसंचरण होता है। इसका अर्थ है कि रक्त पूरे शरीर में घूमने से पहले हृदय से दो बार गुजरता है।
  • दायाँ आलिंद शरीर से अशुद्ध रक्त प्राप्त करता है, जो दाएँ निलय में जाता है।
  • दाएँ निलय से रक्त फुफ्फुसीय धमनी के माध्यम से फेफड़ों में जाता है, जहाँ इसका शुद्धिकरण होता है।
  • शुद्ध होने के बाद रक्त फुफ्फुसीय शिरा द्वारा हृदय के बाएँ आलिंद में वापस आता है।
  • बाएँ आलिंद से रक्त बाएँ निलय में जाता है।
  • अब यह शुद्ध रक्त महाधमनी के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों में पहुँचाया जाता है।
  • यह पूरी प्रक्रिया हृदय चक्र (कार्डियक चक्र) में होती है।

दोहरा परिसंचरण 

  • मनुष्यों में एक पूर्ण चक्र में रक्त दो बार हृदय से होकर गुजरता है।
  • फुफ्फुसीय परिसंचरण 
    • अशुद्ध रक्त → दायाँ निलय → फुफ्फुसीय धमनी → रक्त फेफड़ों में जाता है → रक्त ऑक्सीजन युक्त बन जाता है
    • ऑक्सीजन युक्त रक्त → फुफ्फुसीय शिराएँ → बायाँ आलिंद
  • प्रणालीगत परिसंचरण 
    • ऑक्सीजन युक्त रक्त → बायाँ निलय → महाधमनी
    • रक्त शरीर के सभी भागों में जाता है, जहाँ ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुँचाए जाते हैं।
    • इसके बाद अशुद्ध रक्त शिराओं के माध्यम से दाएँ आलिंद में वापस आ जाता है।

हृदय चक्र

  • एक हृदय धड़कन के दौरान हृदय में होने वाली सभी क्रियाओं को हृदय चक्र कहते हैं।
  • एक हृदय चक्र का समय = 0.8 सेकंड
  • एक धड़कन में एक निलय द्वारा पंप किया गया रक्त = 70 मिलीलीटर (स्ट्रोक आयतन)

हृदय की ध्वनियाँ:

  • लुब → एट्रियोवेंट्रिकुलर (AV) वाल्व के बंद होने की ध्वनि
  • डब → सेमील्यूनर वाल्व (अर्धचंद्राकार वाल्व) के बंद होने की ध्वनि

इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG)

  • ECG हृदय की विद्युत गतिविधि का ग्राफ होता है।
  • इसे इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ नामक मशीन द्वारा रिकॉर्ड किया जाता है।
  • ECG की सहायता से डॉक्टर यह जाँचते हैं कि हृदय सामान्य रूप से कार्य कर रहा है या नहीं।

शब्दावली

  • शिरा – वह रक्त वाहिका जो शरीर से रक्त को हृदय की ओर ले जाती है, शिरा कहलाती है। सामान्यतः शिराओं में अशुद्ध (कार्बन डाइऑक्साइड युक्त) रक्त होता है। इसका अपवाद फुफ्फुसीय शिरा है, जो हमेशा शुद्ध (ऑक्सीजन युक्त) रक्त ले जाती है।
  • धमनी –धमनियाँ वे रक्त वाहिकाएँ हैं जो हृदय से रक्त को शरीर के विभिन्न भागों तक ले जाती हैं। धमनियों में सामान्यतः शुद्ध (ऑक्सीजन युक्त) रक्त होता है। इसका अपवाद फुफ्फुसीय धमनी अशुद्ध (कार्बन डाइऑक्साइड युक्त) रक्त वहन करती है।
  • सिनोएट्रियल नोड (SA नोड): यह दाएँ आलिंद में स्थित हृदय की मांसपेशियों का एक विशेष क्षेत्र होता है। SA नोड को पेसमेकर भी कहा जाता है, क्योंकि यह हृदय के प्रत्येक आवेग तरंग का निर्माण करता है।
  • एट्रियोवेंट्रिकुलर नोड (AV Node): AV नोड इंटरएट्रियल सेप्टम के पास, दाएँ एट्रियोवेंट्रिकुलर छिद्र के निकट स्थित होता है।
  • कृत्रिम पेसमेकर – जब SA नोड खराब या क्षतिग्रस्त हो जाता है, तब हृदय में कार्डियक आवेग उत्पन्न नहीं हो पाते। ऐसी स्थिति में रोगी के सीने में एक विद्युत उपकरण (कृत्रिम पेसमेकर) शल्य क्रिया द्वारा लगाया जाता है। यह उपकरण नियमित अंतराल पर विद्युत संकेत देकर हृदय को उत्तेजित करता है।
  • हृदय की धड़कन : हृदय के सिस्टोल और डायस्टोल को मिलाकर हृदय की धड़कन कहा जाता है। सामान्य अवस्था में मनुष्य का हृदय प्रति मिनट लगभग 72 बार धड़कता है और एक धड़कन में लगभग 70 mL रक्त पंप करता है।
  • रक्तचाप : सामान्य मनुष्य का रक्तचाप 120/80 mm Hg होता है।
    • सिस्टोलिक दाब – 120 mm Hg
    • डायस्टोलिक दाब – 80 mm Hg
    • रक्तचाप को स्फिग्मोमैनोमीटर द्वारा मापा जाता है।
  • थायरॉक्सिन और एड्रेनालिन हार्मोन स्वतंत्र रूप से हृदय की धड़कन को नियंत्रित करते हैं।

परिसंचरण तंत्र के विकार

  • उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन)
    • सामान्य रक्तचाप – 120/80 mm Hg
    • उच्च रक्तचाप – 140/90 mm Hg या उससे अधिक
    • यह हृदय, मस्तिष्क और गुर्दों को नुकसान पहुँचा सकता है।
  • कोरोनरी धमनी रोग
    • इसमें वसा, कोलेस्ट्रॉल और कैल्शियम धमनियों में जमा हो जाते हैं, जिससे हृदय की मांसपेशियों को रक्त की आपूर्ति कम हो जाती है।
    • यह हृदयाघात (हार्ट अटैक) का कारण बन सकता है।
  • एंजाइना पेक्टोरिस
    • यह अचानक होने वाला सीने का दर्द है।
    • यह हृदय की मांसपेशियों को ऑक्सीजन की कमी के कारण होता है।
    • यह रोग अधिकतर वृद्ध लोगों में पाया जाता है।
  • दिल की धड़कन रुकना (हृदय फ़ैलियर)
    • इस स्थिति में हृदय पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप नहीं कर पाता।
    • इसके कारण फेफड़ों में द्रव भर जाता है।
    • यह हृदयाघात और कार्डियक अरेस्ट से अलग स्थिति होती है।

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