मौर्योत्तर काल: प्राचीन व मध्यकालीन इतिहास के अंतर्गत मौर्य साम्राज्य के पतन (लगभग 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के बाद का काल मौर्योत्तर काल कहलाता है, जो राजनीतिक विखंडन और क्षेत्रीय शक्तियों के उदय से चिह्नित था। इस काल में शुंग, कण्व, सातवाहन, इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण जैसे प्रमुख वंशों का उदय हुआ, जिन्होंने सांस्कृतिक आदान-प्रदान, व्यापारिक विस्तार तथा कला एवं धर्म के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया
मौर्योत्तर काल
- मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या के बाद पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में मौर्य साम्राज्य का अंत किया।
- मौर्योत्तर काल (200 ई.पू. से गुप्त साम्राज्य के उद्भव तक) में कोई बड़ा साम्राज्य स्थापित नहीं हुआ, लेकिन यह काल ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।
- इस समय मध्य एशिया से सांस्कृतिक संबंध बने और विदेशी तत्त्व भारतीय समाज में घुल-मिल गए। यूनानियों ने भारतीय धर्म और संस्कृति को अपनाया और भारतीय समाज में समाहित हो गए।
- इस काल में भारत विभिन्न क्षेत्रीय और स्थानीय राजवंशों में विभाजित था।
जानकारी के स्त्रोत-
- गार्गी संहिता, पंतजलि के महाभाष्य, दिव्यावदान, कालिदास के मालविकाग्निमित्र तथा बाणभट्ट के हर्षचरित व इतिहासकार कल्हण की ऐतिहासिक पुस्तक राजतंरगिणी।
- अश्वघोष, जिसने संस्कृत में बुद्धचरित, सौदरानन्द महाकाव्य व सूर्यालंकार और सारीपुत्रप्रकरण लिखे।
- शून्यवाद, सापेक्षवाद व माध्यमिक सूत्र के प्रवर्त्तक नागार्जुन भी इसी कालखण्ड के प्रसिद्ध दार्शनिक हुए हैं जो सार्थक, जानकारी प्रदान करते है ।
- चरक संहिता के रचयिता महर्षि चरक के अलावा चीनी इतिहास ग्रन्थ व चीनी यात्री ह्वेनसांग की यात्रा विवरण, तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के साथ-साथ बौद्ध विद्वान वसुमित्र व बौद्ध साहित्य त्रिपिटक, “मिलिन्दपन्हो” भी हमें विदेशी आक्रमणकारियों की जानकारियाँ उपलब्ध करवाता है।
- कौशाम्बी, सारनाथ व मथुरा की कनिष्क कालीन मुद्राएँ भी सही संकेत देती है। यह सिक्के बहुत महत्त्वपूर्ण स्त्रोत है क्योंकि उन पर शासकों के नाम अंकित है।
- सिकन्दर के साथ आयें नियार्कस, आनेस्टिक्रिटस और एरिस्टोब्युलस जैसे लेखको के विवरण।
यूनानी आक्रमण का उद्देश्य एवं प्रभाव
- सिकन्दर की जल्दी ही मृत्यु हो जाने के कारण यूनानी भारत में स्थायी बस्ती नहीं बसा सके।
- सिकन्दर के आक्रमण की तुलना में भारतीय यूनानियों का उत्तर पश्चिम सीमान्त प्रदेशों पर अधिकार अधिक समय तक रहा था।
- बैक्ट्रियां के यूनानियों ने इस प्रदेशों पर लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया और इसलिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए यह समुचित समय था, यद्यपि भारतीय यूनानी शासन की देन उत्तर पश्चिमी क्षेत्र तक ही मानी जाती रही है तथापि उसके भारतीय प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है।
- वास्तव में यूनानी विशेषताएँ भारत में ही आत्मसात् होकर मुख्य धारा में विलीन हो गई।
- मुद्रा (सिक्के)-
- यूनानी प्रभाव से पूर्व भारतीय चांदी के चिह्नित सिक्के तकनीकी रूप से कम श्रेष्ठ। सिक्कों पर किसी का नाम या तिथि नहीं लिखी होती।
- भारतीय यूनानी पहले शासक थे जिन्होंने सोने के ऐसे सिक्कों की ढलाई की जिन पर राजा का नाम, उपाधि और तिथि अंकित होती थी।
- निर्माण कला की श्रेष्ठता के कारण वह बेहतर होते थे।
- चूँकि यूनानी ग्रहणशील थे – कभी-कभी भारतीय मौद्रिक तकनीकी को अपनाकर भी प्रयोग करते थे।
- कला और मूर्तिकला के क्षेत्र
- उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में हेलेनिस्टिक कला से परिचय कराया, जिसने बाद में गांधार कला शैली का रूप लिया।
- भारतीय और यूनानी मिश्रण से उत्तर पश्चिम में कला की प्रसिद्ध गांधार शैली का विकास हुआ।
- भारतीय यूनानी शासन में खगोल शास्त्र, साहित्य, भवन निर्माण और धर्म के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी।
- साथ ही नए जल और थल मार्गों के खुलने से भारत और यूनान के मध्य व्यापार और वाणिज्य का विस्तार हुआ।
- व्यापार-वाणिज्य-
- भारत रत्न, हाथी दाँत मसाले और अच्छे वस्त्रों जैसी वस्तुओं की यूनान में काफी मांग थी जबकि भारतीय बाजार में भी यूनान से आने वाली विलास सामग्री और श्रृंगार-प्रसाधनों की भरमार थी।
- राजा एंटीयोकस चतुर्थ द्वारा लगभग 166 ई.पू. पूरे यूनान में एक प्रदर्शनी का आयोजन -जिसमें भारत के मसाले और हाथी दाँत में वस्तुएँ प्रदर्शित थी।
- समकालीन सिक्कों की एक बड़ी संख्या में कम से कम 30 भारतीय यूनानी शासकों के नाम मालूम हो जाते हैं। उत्तर में काबुल तथा दिल्ली के निकट मथुरा में मिनाण्डर के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
नोट – भारतीय यूनानियों का इतिहास मुख्यतः इन्हीं सिक्कों की सहायता से लिखा गया है। इन सिक्कों पर यूनानी भाषा में अनुश्रुतियाँ अंकित है, बाद में खरोष्ठी तथा ब्राह्मी लिपि भी मिलती है। इन प्रमाणों को समझने में कहीं-कहीं कठिनाई भी होती है, क्योंकि कुछ राजाओं के नाम एक से थे। इसलिए एक शासन के समय के सिक्कों को दूसरे से अलग करना आसान नहीं है। सिक्के इस युग के बढ़ते हुए व्यापार संबंधों पर प्रकाश डालते हैं।
मौर्योत्तर कालीन कला
1. राजनीतिक स्थिति
- मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया।
- उत्तर भारत में प्रमुख राजवंश: शुंग, कण्व, कुषाण, शक
- दक्षिण–पश्चिम भारत में प्रमुख राजवंश: सातवाहन, इक्ष्वाकु, आभीर, वाकाटक
2. धार्मिक विकास
- इस काल में ब्राह्मण संप्रदायों का विस्तार:
- शैव
- वैष्णव
- शाक्त
- इन संप्रदायों ने अपने पूजा-स्थलों व मूर्तिकला की विशिष्ट परंपराएँ विकसित की।
3. कला और स्थापत्य में परिवर्तन
- मौर्यकालीन परंपरा जारी:
- चट्टानों को काटकर गुफा निर्माण,
- स्तूपों का विस्तार,
- शिल्प और मूर्तिकला का विकास।
- नए राजवंशों ने अपनी क्षेत्रीय विशेषताएँ जोड़ी, जिससे कला में विविधता आई।
4. विदेशी संपर्क का प्रभाव
- इस काल में विदेशी प्रभाव (Indo-Greek, Shaka, Kushan) महत्वपूर्ण रहा।
- इनके प्रभाव से:
- नए कला केंद्र विकसित हुए।
- मूर्तिकला अत्यधिक विकसित हुई और चरम पर पहुँची।
- गांधार, मथुरा जैसी शैलियों का उदय।
स्थापत्य कला
1. स्तूप निर्माण का उत्कर्ष
- मौर्योत्तर काल स्तूप निर्माण कला के चरमोत्कर्ष का समय।
- कारण:
- आर्थिक समृद्धि,
- श्रेणी संघों (guilds) के दान,
- सीमित मात्रा में राजकीय संरक्षण।
2. निर्माण सामग्री में परिवर्तन
- लकड़ी और ईंट के स्थान पर प्रस्तर (पत्थर) का प्रयोग बढ़ा।
- स्तूप अधिक विशाल, स्थायी और अलंकृत बनाए गए।
3. शुंग कालीन विकास
- तोरणों (गेटवे) का निर्माण शुंगों के समय आरंभ।
- तोरणों की विशेषताएँ:
- सुंदर उत्कीर्णन,
- जटिल आकृतियाँ व पैटर्न,
- हेलेनिस्टिक (यूनानी) प्रभाव दिखाई देता है।
- प्रमुख उदाहरण:
- भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश)
- सांची स्तूप के तोरण
4. दक्षिण भारत में स्तूप निर्माण
- कृष्णा घाटी क्षेत्र में स्तूप निर्माण का बड़ा केंद्र।
- संरक्षण देने वाले:
- इक्ष्वाकु,
- सातवाहन।
- प्रमुख स्थल:
- अमरावती,
- नागार्जुनकोंडा,
- जगय्यपेट,
- गोलिघंटशाला,
- भट्टीप्रोलूरू।
- इन स्तूपों में अत्यंत विकसित श्वेत संगमरमर मूर्तिकला और बारीक उत्कीर्णन मिलता है।
अमरावती स्तूप : वास्तुकला व विकास के चरण
- निर्माण : लगभग 200 ई.पू., सातवाहन शासकों द्वारा, अमरावती (आंध्र) में।
- स्थिति : कृष्णा नदी के दाहिने तट पर।
- माप : ऊँचाई 90 – 100 फीट।
- संरचना :
- संगमरमर आवरण, बड़ा गुम्बद, प्रदक्षिणा पथ, तोरण।
- वेदिका पर बौद्ध धर्म से संबंधित दृश्य उत्कीर्ण।
- खोज : कर्नल मैकेंजी (1797 ई.) ने विध्वंसित अवस्था में देखा।

विकास के 4 चरण
- 200 ई.पू.–100 ई. : प्रारंभिक निर्माण, वेदिका पर काल्पनिक पशु, मानव, बुद्ध के प्रतीक।
- 100–150 ई. : शिल्पकला स्वाभाविक; सजावटी मूर्तियाँ; प्रतीक अधिक वास्तविक।
- 150–200 ई. : शिल्पकला का चरम; बुद्ध जीवन, जातक कथाएँ सुंदरता से अंकित।
- 200–250 ई. : लंबी मूर्तियाँ; गहरी मानवीय अभिव्यक्ति; अलंकरण व जातक दृश्य प्रमुख।
2. साँची स्तूप संख्या-1 : भौतिक व सौंदर्य विशेषताएँ
- स्थान : साँची (भोपाल से 50 किमी); यूनेस्को विश्व धरोहर।
- प्रमुख : स्तूप 1, 2, 3; स्तूप 1 में बुद्ध अवशेष।

भौतिक विशेषताएँ
- मूल ढाँचा : अशोक द्वारा ईंटों का छोटा स्तूप, बाद में पत्थर, वेदिका, तोरण जोड़े गए।
- गुम्बद : ऊँचाई 54 फीट, व्यास 120 फीट।
- प्रदक्षिणा पथ : दो—ऊपरी और निचला।
- तोरणद्वार : 4 तोरण (1st century BCE)। तिहरी बड़ेरियाँ, शेर, हाथी, धर्मचक्र, यक्ष आदि उकेरित।
- प्रतीकात्मक बुद्ध : सिंहासन, पदचिह्न, छत्र, स्तूप रूप में।
- भार वहन संरचना : हाथी/बौने; सजावट हेतु यक्षिणियाँ।
सौंदर्य विशेषताएँ
- मूर्तियाँ उभारदार, स्वाभाविक, शरीर में कठोरता नहीं।
- हाव-भाव व मुद्राएँ स्वाभाविक।
- बुद्ध निराकार/प्रतीक रूप में दर्शाए गए।
3. चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ
- निर्माण मौर्योत्तर काल में भी जारी रहा।
- दो प्रकार:
- विहार—भिक्षुओं के रहने के कक्ष।
- चैत्य—प्रार्थना कक्ष; अर्द्ध-वृत्ताकार सिरे वाले कक्ष; बैरल-वॉल्ट वाली छत।
- विशेषताएँ :
- वर्षा से बचाव हेतु खुले प्रांगण, पत्थर-रोड़ी दीवारें।
- मानव व पशु आकृतियों से सजावट।
- उदाहरण :
- कार्ले का चैत्य हॉल
- अजंता : 29 गुफाएँ (25 विहार + 4 चैत्य)
4. उदयगिरि व खंडगिरी की गुफाएँ (ओडिशा)
- स्थान : भुवनेश्वर के निकट।
- काल : 1st–2nd century BCE, कलिंग राजा खारवेल द्वारा।
- प्रकृति : मानव निर्मित + प्राकृतिक दोनों प्रकार की।
- उद्देश्य : संभवतः जैन भिक्षुओं के निवास।
- संख्या :
- उदयगिरि – 18 गुफाएँ
- खंडगिरी – 15 गुफाएँ
- प्रमुख :
- हाथीगुम्फा अभिलेख (ब्राह्मी लिपि); खारवेल के सैन्य अभियानों व “जैन नमोकर मंत्र” का उल्लेख।
- रानीगुम्फा : दो-मंजिला, सुंदर मूर्तियाँ।
मूर्तिकला
- इस काल में मूर्तिकला के क्षेत्र में तीन स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ –
- गांधार शैली
- मथुरा शैली
- अमरावती शैली
- उत्तर भारत में कला केंद्र (1st CE onwards)
- प्रमुख केंद्र: गांधार (पाकिस्तान), मथुरा, वेन्गी/अमरावती (आंध्र)।
- मथुरा व गांधार में बुद्ध के प्रतीकात्मक रूप को मानव रूप मिला।
गांधार शैली
उत्पत्ति व विकास
- प्रमुख संरक्षण: कनिष्क, यवन, कुषाण।
- क्षेत्र: पेशावर, अफगानिस्तान के निकट पश्चिमी पंजाब; सिंधु नदी के दोनों ओर।
- प्रभाव: ग्रीक–रोमन + बैक्ट्रिया + पार्थियन + स्थानीय गांधार परंपरा।
- केंद्र: तक्षशिला, कपिशा, पुष्कलावती, शाहजी की ढेरी, बेग्राम।
- समय: 50 BCE – 500 CE, दो चरण—
- प्रारंभिक: नीले-धूसर बलुआ पत्थर
- उत्तरवर्ती: मिट्टी, प्लास्टर
- रूपांकन: बुद्ध-बोधिसत्त्व की मूर्तियाँ ग्रीक देवता अपोलो जैसी।
मुख्य विशेषताएँ
- शैली यूनानी, विषय भारतीय (मायादेवी का स्वप्न, जन्म, विवाह, धर्मचक्र प्रवर्तन, जातक)।
- “इंडो-ग्रीक आर्ट” नाम।
- बाल घुँघराले, मुख गोल, प्रभामंडल (हेलो) विदेशी परंपरा से प्रेरित।
- पगड़ी/मूँछ—अभारतीय प्रभाव।
- मूर्तियाँ सामने से उभरी हुई; शरीर मांसल और बलिष्ठ।
- बोधिसत्त्व मूर्तियाँ—राजसी, भारी आभूषण, सलवटों वाला वस्त्र।
- पद्मपाणि (कमल), मंजुश्री (पुस्तक), मैत्रेय (सुराही)।
- सामग्री: काला स्लेट, चूना पत्थर, पक्की मिट्टी।
- विशेषताएँ: सूक्ष्म अंग-सौष्ठव, शारीरिक सौंदर्य, आभूषणों का प्रयोग।
- उदाहरण: बुद्ध मुख (तक्षशिला), मथुरा के सप्त ऋषि टीले से प्राप्त एक स्त्री की प्रतिमा।

- मथुरा के सप्त ऋषि टीले से प्राप्त एक स्त्री की प्रतिमा।

मथुरा शैली
विकास व क्षेत्र
- काल: कुषाण काल (50–300 CE)।
- केंद्र: मथुरा, सारनाथ, श्रावस्ती।
- स्थानीय परंपरा पर आधारित; पूर्णतः भारतीय, विदेशी प्रभाव रहित।
- सामग्री: लाल बलुआ पत्थर।
- महत्त्व:
- बुद्ध की पहली मानव प्रतिमाएँ यहीं बनीं।
- प्रथम हिंदू मूर्तियाँ (विष्णु, शिव, दुर्गा, कार्तिकेय)।
- प्राचीन जैन मूर्तियाँ (कायोत्सर्ग, पद्मासन, ध्यानमुद्रा)।
बौद्ध प्रतिमाएँ
- बलिष्ठ शरीर, पद्मासन; दायाँ हाथ अभय मुद्रा।
- हथेली/तलवों पर धर्मचक्र व त्रिरत्न।
- सिंहासन के नीचे/पैरों के बीच सिंह।
- वस्त्र स्पष्ट, बायां कंधा ढका।
- चेहरा गोल, हल्की मुस्कान; प्रभामंडल साधारण।
- स्थानक व आसनगत दोनों प्रकार।
हिंदू प्रतिमाएँ
- विष्णु: शंख–चक्र–गदा–अभय; नृसिंह, वराह, शेषशायी रूप; अष्टभुज प्रतिमाएँ भी।
- शिव: लिंग (एकमुखी, पंचमुखी), अर्द्धनारीश्वर, नन्दिकेश्वर।
- विशेषता: कोमलता, अलौकिक मुखमंडल।
जैन प्रतिमाएँ
- खड़ी मूर्तियाँ—दिगंबर, कायोत्सर्ग, श्रीवत्स।
- बैठी मूर्तियाँ—ध्यान मुद्रा।
- प्रमुख: ऋषभदेव, पार्श्वनाथ, महावीर।
अन्य मूर्तियाँ
- यक्ष–यक्षिणियाँ (प्रसाधिका, स्नान करती यक्षिणी)।
- कनिष्क की बिना सिर वाली मूर्ति—लबादा, भारी जूते, ज्यामितीय सलवटें।
विकास के चरण
- 2nd–4th CE: गोलाई व मांसलता बढ़ी; ‘कटरा टीला बुद्ध’ प्रमुख।
- 5th–6th CE: पारदर्शी वस्त्र दर्शाने की कला विकसित।
- उदाहरण: पद्मासन बुद्ध की प्रतिमा

- आसनस्थ बुद्ध (सारनाथ)।

अमरावती शैली
विकास व क्षेत्र
- संरक्षक: सातवाहन, इक्ष्वाकु।
- केंद्र: अमरावती, नागार्जुनकोंडा, घण्टशाल (कृष्णा–गोदावरी घाटी)।
- मथुरा के समान विषय विविधता; संगमरमर का अधिक उपयोग।
- विषय: बुद्ध जीवन प्रसंग, मायादेवी का स्वप्न, राजदरबार, नृत्य, लोकजीवन।
मुख्य विशेषताएँ
- गतिशीलता व जटिल संयोजन; लचीली रेखाएँ, जीवंत आकृतियाँ।
- त्रिभंग मुद्रा का व्यापक प्रयोग।
नारी आकृतियाँ—स्वाभाविक, सुंदर, त्रिभंगी, ऊपरी भाग अनावृत। - पुरुष—लंबे, पतले, पगड़ी/पटका युक्त।
- उभारदार त्रिआयामी शिल्प; कोणीय शरीर व अतिव्याप्ति।
- अलंकरण, वस्त्र, आभूषणों का सूक्ष्म अंकन; भक्ति + अलंकारिता।
भरहूत की मूर्तिकला —
शुंगकालीन पृष्ठभूमि
- शुंगकाल: 188 ई.पू.–30 ई.पू.
- स्थापना: पुष्यमित्र शुंग (मौर्य के अंतिम शासक वृहद्रथ की हत्या कर सत्ता स्थापित)
- कला केन्द्र: सांची, भरहूत, बोधगया, मथुरा आदि।
- भरहूत: सतना (मध्य प्रदेश) — शुंगकालीन मूर्तिकला का प्रमुख स्थल।
मुख्य विशेषताएँ
1. संरचनात्मक विशेषताएँ
- स्तूप के कटघरे, द्वार और खंभे स्थूल, भारी और मजबूत।
- मूर्तियाँ भी भारी व मोटे रूपांकन की।
2. विषय-वस्तु
- यक्ष, यक्षिणी, नाग, बौद्ध धर्म से जुड़े दृश्य।
- कुल 40 जातक कथाओं पर आधारित मूर्तियाँ।
- 6 मूर्तियाँ बुद्ध के जीवन की ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित।
कलात्मक विशेषताएँ
3. आकृतिक शैली
- दीर्घाकार प्रतिमाएँ।
- हल्का उभार (low relief) लेकिन रैखिकता बहुत स्पष्ट।
- शरीर कड़ा, तना हुआ, हाथ-पैर शरीर से चिपके हुए।
4. आख्यात्मक (Narrative) शैली
- तीन आयामों का भ्रम उत्पन्न—एक ओर झुके परिप्रेक्ष्य का प्रयोग।
- कथानक की स्पष्टता—घटनाएँ मुख्य पात्रों तक सीमित।
- जटिल कथानकों में समय के अनुसार सहायक पात्र जोड़े गए।
- कई बार एक ही पैनल में एकाधिक घटनाओं का संयोजन।
- चित्रात्मक भाषा के माध्यम से प्रभावी वर्णन
- उदाहरण
- महारानी मायादेवी का स्वप्न (सिद्धार्थ के जन्म का पूर्वाभास)

