मुगल साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने भारत के राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक विकास को गहराई से प्रभावित किया। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अध्ययन में मुगलों की शासन व्यवस्था, कला, स्थापत्य और धार्मिक नीतियाँ विशेष स्थान रखती हैं।
मुगल साम्राज्य
मुगल शासक वस्तुतः चगताई तुर्क थे। मंगोल शासक चंगेज खां के एक पुत्र के नाम पर तुर्किस्तान क्षेत्र को चगताई कहा जाता था। मुगल इसी क्षेत्र के तुर्क थे, अतः इन्हें चगताई तुर्क कहा जाता था।तुर्क-मंगोल विजेता तिमोर के वंशज मध्य एशियाई शासक बाबर ने मुगल साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने शक्तिशाली मुगल साम्राज्य की नींव रखी, जिसे अकबर ने मजबूत किया और यह लगभग दो शताब्दियों तक चला। औरंगजेब के शासनकाल में मुगल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया, जिसके बाद मराठों के साथ संघर्ष के कारण इसका पतन शुरू हो गया।
बाबर [1526 – 30]
- बाबर (ज़हीरुद्दीन मुहम्मद) अपने पिता की ओर से तुर्क-मंगोल विजेता तैमूर का वंशज था और अपनी माता की ओर से चंगेज खान का वंशज था।
- बाबर 12 वर्ष की उम्र में एक छोटे से फरगाना राज्य की गद्दी पर बैठा, लेकिन तुरंत ही उसने अपने पैतृक स्थान पर नियंत्रण खो दिया।
- 1504 में, बाबर ने 24 वर्ष की आयु में काबुल पर कब्ज़ा कर लिया और फिर खैबर दर्रे के माध्यम से भारत में प्रवेश किया।
बाबर का आरंभिक जीवन –
- बाबर ने समरकन्द को दो बार जीता और उस पर कुछ-कुछ समय काबिज रहने के बाद दोनों बार उसे खो दिया।
- पहली बार समरकंद विजय:
- 1497 ई. में बाबर ने समरकंद को जीता परन्तु शीघ्र ही उसने नगर त्याग दिया।
- जब बाबर फरगना के लिए लौटता इससे पहले ही कुछ बेगों ने उसके सौतेले भाई जहांगीर मिर्जा को फरगना की गद्दी पर बैठा दिया। इस प्रकार बाबर समरकन्द के साथ अपना राज्य (फरगना) भी खो बैठा।
- समरकंद पर दूसरी विजय:
- 1501 ई. में बाबर ने समरकन्द पर एक बार विजय प्राप्त की। क्योंकि समरकंद के तैमूरी सुल्तान की मां ने उजबेक के शैबानी खान से सौदा करके समरकन्द शैबानी खान को दे दिया एवं शैबानी खान से विवाह कर लिया था।
- सर-ए-पुल का युद्ध: यह युद्ध 1502 ई. में बाबर एवं उजबेक शासक शैबानी खान के मध्य हुआ। इस युद्ध में ही उज्बेकों ने तुलुगमा पद्धति का प्रयोग कर बाबर को बुरी तरह हराया था। बाद में इसी पद्धति का उपयोग बाबर ने पानीपत के युद्ध में किया एवं इब्राहिम लोदी को हराया था।
बाबर की काबुल विजय:
- काबुल विजय से बाबर को दो प्रमुख लाभ हुए पहला, बाबर को उज्बेकों से चैन मिला। दूसरा, काबुल में बैठकर बाबर अब हिन्दुस्तान एवं खुरासान दोनों पर नजर रख सकता था।
- बाबर ने काबुल एवं गजनी (1504 ई.) पर आक्रमण कर काबुल व गजनी का शासक बन गया।
बाबर का भारत अभियान

- बाबर का पहला भारत अभियान –
- सन् 1519 ई. में बाबर ने अपना आक्रमण बाजौर पर किया और बाजौर एवं भीरा को जीत लिया। भेरा के किले को जीता। यह भारत विजय के लिए किया गया पहला आक्रमण था।
- इसी युद्ध में बाबर ने सर्वप्रथम बारूद एवं तोपखाने का प्रयोग किया।
- दूसरा अभियान भी 1519 में हुआ जब इसने पेशावर को जीता।
- तृतीय अभियान 1520 में हुआ, इस बार इसने स्यालकोट एवं सैयदपुर को जीता।
- चौथा अभियान 1524 में हुआ जब इसने लाहौर और दीपालपुर को जीतकर पंजाब में प्रवेश किया।
| क्रमांक | बाबर युद्ध सूची | वर्ष |
| 1 | पानीपत की पहली लड़ाई | 1526 |
| 2 | खानवा की लड़ाई | 1527 |
| 3 | चंदेरी का युद्ध | 1528 |
| 4 | घाघरा का युद्ध | 1529 |
पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल, 1526)
- यह बाबर का भारत के विरुद्ध पांचवा अभियान था
- तैमूर के विजित प्रदेशों पर अधिकार जताने के लिए बाबर ने इब्राहिम लोदी से क्षेत्र मांगा, पर दौलत खां लोदी और अन्य अफगान सरदारों ने बाबर को समर्थन देकर उसे भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया।
- राणा सांगा ने भी आक्रमण का वादा किया।
- 1525 ई. में बाबर ने काबुल से कूच किया। लाहौर पर कब्जा कर, पंजाब जीतते हुए वह दिल्ली पहुंचा।
- पानीपत में बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।
- लोदी और ग्वालियर के विक्रमजीत की मृत्यु के साथ बाबर ने शानदार विजय प्राप्त की। इस जीत ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।
बाबर तीन कारणों से विजयी –
- बाबर ने युद्ध क्षेत्र में तुलुगमा पद्धति का प्रयोग कर इब्राहिम लोदी की सेना को घेर लिया एवं रूमी पद्धति (तोपों को सजाने की पद्धति) के प्रयोग से तोपों को सजाया तथा तोपची उस्ताद अली एवं मुस्तफा की सहायता से भरपूर गोलाबारी की।
- घोड़ों की आपूर्ति: पश्चिम से अच्छी गुणवत्ता वाले घोड़ों की आपूर्ति खैबर दर्रे से संभव थी, जिस पर मुगलों का नियंत्रण था।
- उत्तर भारत में अफगानों और राजपूतों के अधीन विखंडित राजनीतिक विरोध बाबर के आक्रमण के लिए उपयुक्त था।
नोट –
- तुलुगमा युद्ध पद्धति – अपनी सेना को तीन मुख्य भागो में बंटाना तथा दांये बाए व सामने से आक्रमण करना एवं चौथी रिजर्व टुकड़ी के माद्यम से थकी हुई प्रतिद्वंद्वी सेना पर पीछे से आक्रमण करना | यह उज्बेगो से ली गई पद्धति है |
- उस्मानी पद्धति – अन्य नाम – रूमी पद्धति – विभिन्न गाडियों के मध्य सुरक्षित स्थान छोड़कर तोपे सजाने की कला |
पानीपत के युद्ध के परिणाम
- पानीपत का युद्ध राजनीतिक दृष्टि से इतना निर्णायक नहीं था जितना सैनिक दृष्टि से था परन्तु राजनैतिक रूप में भी इस युद्ध ने अहम भूमिका निभायी तथा उत्तर भारत में एक नयी शक्ति का उदय हुआ।
- लोदियों का सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया तथा सल्तनत की सत्ता अब मुगलों के हाथ में आ गयी।
- लोदी सुल्तानों द्वारा संचित किया गया कोष अब बाबर के पास आ गया जिससे बाबर की वित्तीय कठिनाइयां दूर हो गयी।
तथ्य
- बाबर ने तुलुगमा पद्धति को उज्बेकों से सीखा था।
- बाबर ने 1506 ई. में फैसला लिया किस उसके सभी अनुगामी बाबर को बादशाह कहें।
- बाबर को कलन्दर कहा जाता था। प्रत्येक काबुल वासी को शाहरुखी नामक एक एक चांदी का सिक्का दिया गया इसलिए उसे मस्त कलंदर कहा गया।
- पानीपत युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी गुरु नानक देव जी थे।
खानवा का युद्ध(16 मार्च 1527 ई.)
- बाबर ने मेवाड़ के शासक राणा सांगा से भिड़ने का निर्णय लिया, क्योंकि राणा सांगा राजस्थान और मालवा पर प्रभाव रखते थे। बाबर ने राणा सांगा पर समझौता भंग का आरोप लगाया, जबकि राणा सांगा ने बाबर को भारत से बाहर करने और लोदी शासन पुनः स्थापित करने की योजना बनाई।
- राणा सांगा ने अफगान मुसलमानों, इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी, और मेवात के शासक हसन खान मेवाती की शक्तिशाली सेना के साथ आक्रमण किया।
- खानवा में 16/17 मार्च 1527 को बाबर ने अपनी रणनीति और तोपों के प्रभावी उपयोग से राणा सांगा को हराया।
- इस विजय के बाद, बाबर ने ग्वालियर और धौलपुर के किलों पर कब्जा कर लिया, जिससे उसकी स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई।
नोट –
- खानवा युद्ध से पहले बाबर ने “जिहाद” का नारा दिया तथा काबुल के ज्योतिष “मोहम्म्द शरीफ” ने बाबर के हारने की भविष्य वाणी की थी।
- मुसलमानों पर लगने वाले तमगा नामक कर को समाप्त करने की घोषणा की। शराब न छूने की कसम खाई गई।
- बाबर ने खानवा का युद्ध जीतने के बाद गाजी की उपाधि धारण की।
- इस युद्ध में सांगा के घायल होने पर झाला अज्जा ने छत्र धारण किया था।
नोट –
खानवा युद्ध के परिणाम
- भारत में राजपूतों की सर्वोच्चता का अंत हो गया। राजपूतों का प्रताप अब समाप्त हो गया और उनका प्रभाव घटने लगा।
- मेवाड़ की प्रतिष्ठा और शक्ति से निर्मित राजपूत संगठन भी इस पराजय के साथ समाप्त हो गया।
- भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य स्थापित हो गया और बाबर स्थिर रूप से भारत का बादशाह बन गया।
चन्देरी का युद्ध(29 जनवरी, 1528 ई.)
- चंदेरी का युद्ध बाबर एवं मालवा शासक मेदिनी राय के बीच हुआ। इस युद्ध में बाबर विजयी रहा एवं मेदिनी राय मारा गया।
- इस युद्ध में भी बाबर ने जिहाद का नारा दिया था।
- चन्देरी एवं खानवा के युद्ध में बाबर ने राजपूतों की खोपड़ियों के बुर्ज एवं मीनार बनाने के आदेश दिए थे।
घाघरा का युद्ध(5 अप्रैल, 1529 ई.)
- इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी और उनके दामाद सुल्तान नुसरत शाह ने बाबर के खिलाफ षड्यंत्र रचा।
- घाघरा का युद्ध बाबर एवं अफगानों के बीच बिहार में गंगा नदी की सहायक नदी घाघरा नदी के तट पर लड़ा गया।
- एकमात्र युद्ध जो जल व थल पर गया।
- इस युद्ध में बाबर का भारत पर स्थायी रूप से अधिकार हो गया एवं बाबर के साम्राज्य की सीमा सिंधु से लेकर बिहार एवं हिमालय से ग्वालियर तक फैल गयी।
बाबर की मृत्यु
- बाबर की मृत्यु 26 दिसम्बर, 1530 ई. को आगरा में हुई। बाबर को आगरा के आराम बाग में दफनाया गया था किन्तु बाद में काबुल में दफनाया गया था।
बाबर के शासन का मूल्यांकन:
- कुषाण साम्राज्य के बाद पहली बार काबुल और कंधार उत्तर भारत में किसी साम्राज्य का अभिन्न अंग बन गये।
- भारत में युद्ध में बारूद और तोपखाने का प्रयोग लोकप्रिय हुआ।
- बाबर फ़ारसी और अरबी समेत कई भाषाओं का जानकार था। उसने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-बाबरी तुर्की भाषा में लिखी, जो उसकी सैन्य रणनीति पर प्रकाश डालती है।
- कंधार से बंगाल की सीमा तक बाबर का साम्राज्य सुरक्षित हो गया था। परंतु राजपूत क्षेत्र, जिसमें रणथंभौर, ग्वालियर और चंदेरी के किले शामिल थे, में कोई स्थायी प्रशासन स्थापित नहीं था क्योंकि राजपूत शासक आपस में संघर्षरत थे। इस प्रकार, बाबर अपने पुत्र हुमायूं के लिए एक कठिन कार्य छोड़ गए।
- इतिहासकार एलियट के अनुसार “बाबर एक भाग्यशाली सैनिक था, न की साम्राज्य निर्माता”
- इतिहासकार लेन पूल ने भी बाबर के भाग्यशाली सैनिक होने की पुष्टि की।
- एलियट के अनुसार प्रश्न्चित, वीर, महान, निष्पक्ष व्यक्तित्व का धनी बाबर, अगर ब्रिटेन में पैदा होता सचमुच हेनरी चतुर्थ होता है।
नोट –
- बाबर ने ‘सुल्तान’ की परंपरा को तोड़ा एवं खुद को ‘बादशाह’ घोषित किया।
- बाबर ने नापने के लिए गज-ए-बाबरी नामक माप का प्रयोग किया।
हुमायूँ [1530 – 45 & 1555 – 56]
- हुमायूं बाबर एवं महँ बेगम के ज्येष्ठ पुत्र थे।
- हुमायूँ नाम का आशय भाग्यशाली होता है लेकिन यह मुगल शासकों में सबसे अभागा शासक हुआ।
- हुमायूं का राज्याभिषेक आगरा में हुआ।
गद्दी पर बैठते ही अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा – इसकी मुख्य समस्याएं थीं (1) अफगान समस्या (2) कमजोर सैन्य व्यवस्था (3) हुमायूं के भाई
(1) अफगान समस्या
- महमूद लोदी अपने को अभी भी दिल्ली का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता था।
- अफगानों में सबसे महत्वपूर्ण शेर खां था जो हुमायूँ के लिए सबसे बड़ी समस्या बना।
(2) कमजोर सैन्य व्यवस्था
- राजकोष खाली हो जाने के कारण हुमायूँ एक बड़ी सेना नहीं रख सका।
(3) हुमायूँ के भाई
- हुमायूँ ने अपने भाइयों के साथ उदारता का व्यवहार किया और साम्राज्य का वास्तविक विभाजन कर दिया।
- कामरान को काबुल, कंधार एवं पंजाब दे दिया, अस्करी को संभल का क्षेत्र एवं हिन्दाल को मेवात का क्षेत्र दे दिया।
- यहीं साम्राज्य विभाजन उसकी असफलता का सबसे बड़ा कारण बना।
हुमायूँ के अभियान
कालिंजर अभियान (1531)
- इस समय कालिंजर का शासक प्रताप रुद्रदेव था।
- एक महीने के घेरे के बाद जब किले को नहीं जीत सका तो प्रताप रुद्रदेव ने संधि कर ली।
दोहरिया का युद्ध(1532 ई.)
- यह युद्ध हुमायूं एवं अफगान शासक महमूद लोदी के बीच हुआ। इसमें हुमायूं की जीत हुई।
चुनार का प्रथम घेरा (1532)
- चुनार का किला इस समय शेर खाँ सूर के अधीन था।
- हुमायूँ चार महीने तक इसका घेरा डाले रहा लेकिन जीत नहीं सका। शेर खाँ भी लड़ने की स्थिति में नहीं था।
- चार महीने की घेराबंदी के बाद, शेरशाह द्वारा वफादारी का वचन देने पर हुमायूँ ने घेराबंदी हटा दी। यह एक बड़ी भूल साबित हुई।
मालवा एवं गुजरात अभियान (1534-35)
- मालवा के शासक बहादुरशाह ने हुमायूँ के भय से भागकर मालवा और गुजरात को उसके अधीन कर दिया।
- हुमायूँ ने अस्करी को सूबेदार नियुक्त किया, लेकिन अस्करी कानून व्यवस्था बनाने में विफल रहा।
- बहादुर शाह ने जनता के सहयोग से गुजरात पर दोबारा कब्जा कर लिया। विद्रोहों से परेशान अस्करी आगरा लौटने लगा, जिससे हुमायूँ को शंका हुई कि वह आगरा पर अधिकार कर सकता है।
- हुमायूँ ने गुजरात-मालवा छोड़कर अस्करी का पीछा किया। राजस्थान में दोनों भाइयों में सुलह हो गई।
चुनार का द्वितीय अभियान (1537)
- शेर खाँ ने 1537 में बंगाल पर आक्रमण किया।
- इस अवसर पर बंगाल के शासक गयासुद्दीन महमूद शाह ने हुमायूँ से सहायता की मांग की परंतु हुमायूँ सहायता नहीं दे सका।
- हुमायूँ ने शेर खाँ के चुनार किले पर आक्रमण अवश्य कर दिया। छह महीने के घेरे के बाद उसने चुनार का किला जीत लिया।
बंगाल अभियान (1538)
- बंगाल का शासक गयासुद्दीन महमूद शाह युद्ध में घायल होकर हुमायूँ के पास पहुँचा और वहीं इसकी मृत्यु हो गई।
- यह देखकर हुमायूँ के हृदय में दया उत्पन्न हुई और शेरखाँ के विरुद्ध अभियान किया।
- इस समय शेरखाँ बंगाल को जीतकर वापस बिहार आ गया।
- जब हुमायूँ बंगाल से वापस आ रहा था तभी शेरखाँ की सेना ने रास्ते में उसे घेर लिया
हुमांयू व शेरशाह संबध –
चौसा का युद्ध (26 जून, 1539)
- यह युद्ध अफगान शासक शेरखां(शेरशाह सूरी) एवं हुमायूं के बीच हुआ।
- अनेक सैनिक गंगा एवं कर्मनासा नदी में डूब कर मर गए तथा हुमायूं घोड़े सहित गंगा में कूद गयाा एवं निजाम रुका नामक भिस्ती की सहायता से जान बचायी। हुमायूं ने इस उपकार के बदले भिस्ती को एक दिन का बादशाह बनाया था। इसने चमड़े के सिक्के जारी किये।
- इस तरह शेरखाँ इस युद्ध में विजयी रहा तथा इस उपलक्ष्य में शेरखाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की।
- आगरा पहुंचने के बाद हुमायूँ ने अपने भाइयों अस्करी और हिंदाल के सहयोग से सेना संगठित की और शेर खान का सामना करने के लिए तैयार हुए।
कन्नौज (विलग्राम) का युद्ध (17 मई 1540)
- यह युद्ध शेरशाह सूरी एवं हुमायूं के बीच लड़ा गया। इसमें हुमायूं बुरी तरह पराजित हुआ।
- शेरशाह सूरी ने दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया एवं सूर वंश की स्थापना की।
नोट –
- हुमायूँ एवं शेरशाह के बीच झगड़े का मुख्य कारण – बंगाल।
- कन्नौज युद्ध का आँखों देखा वर्णन मिर्जा हैदर दुग्लत ने किया है क्योंकि यह इस युद्ध में हुमायूँ की तरफ से भाग लिया था।
निर्वासन काल में हुमायूं
- बिलग्राम के युद्ध में पराजित होने के बाद प्रारंभ में हुमायूं ने अमरकोट के राणा वीरसाल के यहां शरण ली।
- राजगद्दी से निष्काषित हुमायूँ को मारवाड़ के शासक मालदेव ने अपने राज्य में आमंत्रित किया। कहते है की हुमायूँ मारवाड़ के पास जोगीतीर्थ स्थान तक पहुँच भी गया किन्तु मेवात के सूबेदार हिंदाल ने हुमायूँ को मालदेव के इरादो से अवगत करवाकर स्वयं के पास बुलाया।
- इसी समय 1541 में हिंदाल के सिया मौलवी अमीर अली की पुत्री हमीदा बानो बेगम से हुमायूँ का निकाह हुआ एवं अमरकोट में ही हमीदा बानो ने अकबर को जन्म दिया।
- 1543 में हुमायूँ ने अकबर को अस्करी के संरक्षण में छोड़कर हमीदा बानो के साथ ईरान चला गया और वहां के शासक शाह तहमास के यहां शरण ली।
हुमायूं द्वारा पुनः राज्य की प्राप्ति
- पठान शक्ति में आई फूट का लाभ उठाकर हुमायूँ एक बार फिर भारत की और बढ़ा तथा दो युद्धों के बाद पुन: बादशाहत प्राप्त की
- 1545 ई. में हुमायूं ने काबुल तथा कांधार पर हमला कर कब्जा कर लिया।
- फरवरी 1555 ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया था।
- मच्छीवाड़ा का युद्ध(15 मई, 1555) लुधियाना पंजाब
- यह सतलज नदी के किनारे पर हुमायूं एवं शासक आदिलशाह सूर के अफगान सरदार (नसीब खां एवं तातार खां) के बीच हुआ।
- इसमें हुमायूं की जीत हुई। अब मुगलों का अधिकार पंजाब पर हो गया।
- सरहिन्द का युद्ध(22 जून, 1555) –
- यह युद्ध अफगान एवं मुगल सेना के बीच हुआ। अफगानों का नेतृत्व सिकन्दर सूर एवं मुगल सेना का नेतृत्व बैरम खां ने किया। अफगान सेना पराजित हुई।
- सरहिन्द के युद्ध में विजय के बाद भारत के सिंहासन पर एक बार पुनः मुगलों का शासन स्थापित हो गया।
- सरहिन्द विजय का श्रेय हुमायूँ ने अकबर को दिया।
- 23 जुलाई, 1555 को हुमायूं पुन: दिल्ली के तख्त पर बैठा।
हुमायूं की मृत्यु
- 27 जनवरी, 1556 को दिल्ली के किले दीनपनाह के शेरमंडल नामक पुस्तकालय की सीढ़ी से गिरकर हुमायूँ की मृत्यु हो गयी। हुमायूँ को दिल्ली में ही दफनाया गया।
प्रश्न – “वह जीवन भर ठोकर खाता रहा और अंत में ठोकर खा कर ही मर गया”। कथन किसका है व्याख्या भी करे –
अथवा
“हुमायूँ का सबसे बड़ा कारण उसकी सुन्दर किन्तु विवेकरहित दयालुता है”
- यह कथन मुगल बादशाह हुमायूँ के सन्दर्भ में लेनपूल ने कहे थे जिसका तात्पर्य था कि हुमायूँ सम्पूर्ण जीवन में अपनी उदार नीतियों एवं विवेकहीन दयालुता के कारण राजगद्दी को लेकर परेशान रहा। अर्थात हुमायूँ ने सर्वप्रथम अपने सम्पूर्ण राज्य को भाइयो में विभाजित करके स्वयं ही तुर्की सामर्थ्य को कमजोर बनाया।
- तत्पश्चात हुमायूँ ने अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वी शेरशाह सूरी को चुनार के दो युद्धों में पराजित करने के पश्चात् नियंत्रित करने में असफल रहा परिणामस्वरुप चौसा व कन्नौज के दो युद्धों में पराजित होकर भारत छोड़ने पर विवश हुआ।
- यद्यपि 1555 में मच्छीवाडा व सरहिंद के युद्धों में विजय होकर एक बार हुमायूँ को भारत की बादशाहत नसीब हुई किन्तु 27 जनवरी 1556 को स्वयं के द्वारा ही निर्मित शेरमण्डल पुस्तकालय की सीढ़ियों में गिरने से मृत्यु हुई।
- इस प्रकार दोनों कथन हुमायूँ के सन्दर्भ में सही प्रमाणित होते है।
नोट –
- हुमायूँ ज्योतिषी में विश्वास करता था। हुमायूं सप्ताह के सात दिन सात रंग के कपड़े पहनता था। सोमवार को सफ़ेद, शनिवार को काले एवं ईतवार पीले वस्त्र पहनता था।
- हुमायूँ सतारी सिलसिले मोहम्मद गौस (तानसेन भी इन्ही के शिष्य) का शिष्य था।
सूरी (1540-55 ई.)
शेरशाह सूरी (1540-45 ई. )
- शेरशाह सूरी भारत में द्वितीय अफगान वंश का संस्थापक था।
- शेरशाह ने जो कार्य किये उसके आधार पर न केवल साम्राज्य निर्माता बल्कि इसे अकबर का अग्रगामी कहा जाता है।
- इसके बचपन का नाम फरीद था। इसका जन्म 1472 में बजबारा या नरनौल में हुआ तथा इसके पिता का नाम हसन था।
- 1494 में सिकन्दर लोदी ने जमाल खाँ को जौनपुर के फौजदार पद पर नियुक्त किया।
- 1494 में फरीद पिता से नाराज होकर जौनपुर आया और यहां पर इसने शिक्षा प्राप्त की।
- 1520 में हसन की मृत्यु के बाद यह अपनी पिता की गद्दी का मालिक हो गया।
- बहार खाँ (महमूदशाह) के साथ एक शिकार यात्रा में इसने एक शेर का वध कर दिया जिससे इसने शेरखां की उपाधि धारण की।
- लोहानी सरदारों के षडयंत्र के कारण इसे बिहार छोड़ना पड़ा और ये बाबर की सेना में शामिल हो गया और चन्देरी के युद्ध में इसने बाबर की तरफ से युद्ध किया।
- 1539 में इसने चौसा के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर शेरशाह की उपाधि धारण की।
- 1540 में इसने कन्नौज के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर भारत का सुल्तान बना।
- शेरशाह सुल्तान बनने से पहले 1529 ई. में बंगाल के शासक नुसरतशाह को पराजित कर ‘हजरते-आला’ की उपाधि धारण की। 1540 ई. में कन्नौज के युद्ध में हुमायूं को पराजित कर ‘सुल्तान‘ की उपाधि धारण की।
- उसका साम्राज्य बंगाल से लेकर सिंधु तक फैला हुआ था, कश्मीर को छोड़कर , और पश्चिम में उसने मालवा और लगभग पूरे राजस्थान पर विजय प्राप्त की।

शेर शाह सूरी के विजय अभियान –
बंगाल विद्रोह का दमन (1541)
- बंगाल के गवर्नर खिज्रखाँ ने 1541 में विद्रोह कर दिया।
- उसने अब बंगाल को 19 सरकारों में बांट दिया और प्रत्येक सरकार में एक शिकदार-ए-शिकदारान की नियुक्ति की जो सुल्तान के सीधे नियंत्रण में थे।
मालवा विजय (1542)
- इस समय यहां मल्लू खां (कादिरशाह) शासक था। जिसने अपनी राजधानी उज्जयिनी में शेरशाह का स्वागत किया और मालवा राज्य शेरशाह को सौंप दिया।
रायसीन विजय (1543)
- यहां का राजा पूरनमल चौहान था।
- शेरशाह ने रायसीन के दुर्ग को चालाकी एवं धोखे से विजित किया, जो इसके जीवन में कलंक था।
- इस घटना के बाद शेरशाह के बेटे कुतुब खां ने आत्महत्या कर ली थी।
मारवाड़ विजय
- यहां का शासक मालदेव था।
- यह राजपूतों के शौर्य से इतना प्रभावित हुआ कि इसने कहा- मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान का साम्राज्य खो चुका था।
कालिंजर अभियान (1544)
- यहां का शासक कीर्ति सिंह था।
- यहाँ घेरा लगभग 7 महीने तक रहा। जब किले को विजित नहीं कर सका तब शेरशाह ने मई 1545 में किले की दीवार को गोला बारूद से उड़ा देने की आज्ञा दी।
- शेरशाह उक्का नामक आग्नेयास्त्र से गोला फेंक रहा था परन्तु गोला उसके पास रखे बारूद के ढ़ेर पर गर गया जिससे शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गयी। लेकिन मरने से पहले इसे किले को जीतने का समाचार प्राप्त हो गया था।
शेरशाह सूरी द्वारा किए गए सुधार
- शेरशाह का प्रशासन केन्द्रीकृत और अनुशासित था।
- उसने साम्राज्य को 47 सरकारों और बंगाल को 19 सरकारों में विभाजित किया।
- शिकदार सैनिक, और मुंसिफ-ए-मुंसिफान न्यायिक अधिकारी थे।
- भूमि को उत्पादन के आधार पर अच्छी, मध्यम, और खराब श्रेणियों में बाँटा।
- चौधरी और मुकद्दम गांवों में कानून-व्यवस्था के जिम्मेदार थे।
- शेरशाह ने इस्लामी कानून को लिखित रूप दिया।
- शेरशाह ने सैनिकों को नकद वेतन और घोड़ों पर दाग लगाने की प्रथा पुनः लागू की।
- कानूनगो ने शेरशाह सूरी के लिए कहा है कि ‘वह बाहर से मुस्लिम अन्दर से हिन्दु था।’
- अब्बास खां शरवानी के अनुसार वह अनुभवों एवं बुद्धिमता में दूसरा हैदर था।
- शेरशाह बड़े पैमाने पर दान करते थे। उन्होंने खजाने से निर्धनों को नियमित भत्ते दिए।
- वह एक रूढ़िवादी और धर्मनिष्ठ सुन्नी थे। कहा जाता है कि उन्होंने न्याय में कभी पक्षपात नहीं किया और अत्याचारियों को, चाहे वे कुलीन हों या उनके रिश्तेदार, सजा दी। उन्होंने विद्रोही ज़मींदारों, कुलीनों, चोरों और डाकुओं को कठोर दंड देकर साम्राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए रखी।
भू-राजस्व व्यवस्था
- सर्वप्रथम शेरशाह ने भूमि की पैमाइश हेतु 32 अंक वाले गज – ए – सिकन्दरी के माध्यम से भूमि की नाप कराई।
- कृषि योग्य भूमि को तीन श्रेणियों (1) उत्तम, (2) मध्यम, (3) निम्न श्रेणी। तीनों का औसत उपज निकालकर 1/3 भाग भू-राजस्व निर्धारित किया। इस व्यवस्था को जब्ती प्रणाली / भूमि बंदोबस्त के नाम से जाना जाता है। दीवान टोडरमल ने इसे विकसित किया।
- भू-राजस्व के अतिरिक्त किसानों से दो अन्य कर वसूल कियेः-
- जरीबाना [भूमि सर्वेक्षण शुल्क] :- यह भूमि की नाप के लिए लिया जाने वाला कर था जो उपज का ढाई प्रतिशत था।
- महासीलाना [कर संग्रह शुल्क] :- यह कर वसूली के लिये लिया जाता था जो उपज का 5 प्रतिशत था।
- इसने किसानों को भूमि का स्वामी बनाया और किसानों को पट्टा दिया और किसानों से इसने कबूलियत (स्वीकृत पत्र) प्राप्त किया।
मुद्रा
- शेरशाह ने पुराने सिक्कों को बंद करके सोने-चाँदी-तांबे के नए सिक्के चलाये।
- इसने सर्वप्रथम चाँदी का रुपया [180 ग्रेन] चलाया और तांबे का दाम [380 ग्रेन] चलाया।
- रुपये और दाम में 1:64 का अनुपात था।
- उनका मानकीकृत रुपिया (चांदी का सिक्का) ब्रिटिश काल तक मुख्य मुद्रा थी।
- शेरशाह ने अपने सिक्कों पर फारसी भाषा के साथ-साथ देवनागरी में भी लेख लिखवाए।
- अशरफ – सोने का सिक्का
- इतिहासकार विंसेट आयर स्मिथ ने लिखा कि “सूरी की मुद्रा प्रणाली ही आगे चलाकर ब्रिटिश मुद्रा व्यवस्था का आधार बनी।

शेरशाह द्वारा लिया जाने वाला कर
- खिराज (भूमि कर) औसत उपज का 1/3 भाग
- जरीबाना-भूमि की नाप के लिए उपज का ढाई %
- महासीलाना – राजस्व अधिकारियों के लिए उपज का 5%
व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा:
- शेरशाह ने व्यापारियों के साथ भी समान संवेदनशीलता दिखाई। व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने कर प्रणाली को सरल बनाया, जिससे केवल प्रवेश और बिक्री के बिंदु पर कर वसूला जाता था।
- उन्होंने पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बंगाल तक पुराने ग्रैंड ट्रंक रोड का जीर्णोद्धार किया ।
- उन्होंने कई सराय बनवाईं और मुख्य सड़कों पर हर दो कोस (करीब आठ किलोमीटर) पर इन्हें बनवाया। इन सरायों में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई थी।
- उन्होंने बाट और माप के मानक भी तय करने का प्रयास किया।
- उन्होंने मुद्रा सुधार किए और एक समान मानक के सोने, चांदी और तांबे के सिक्के चलाए।
सूरी का पतन:
- शेरशाह सूरी के बाद उसका पुत्र इस्लाम शाह सूरी शासक बना (1545 – 53) इसका मूल नाम जलाल खां था।
- इस्लाम शाह के पुत्र फिरोजशाह की हत्या उसके मामा आदिलशाह सूरी ने की तथा राजगद्दी छीन ली जो 1553 से 1555 तक शासक रहा। इसका मूल नाम मुबारिज खां था।
- इसने रेवाड़ी के नामक विक्रेता हेमू को अपना सेनापति नियुक्त किया।
- शेरशाह की सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण अंततः सूरी साम्राज्य को कमजोर कर दिया और उसके अंत का कारण बन गया।
- अंततः 1555 में हुमायूं ने अफगानों को पराजित कर दिल्ली और आगरा पर पुनः अधिकार कर लिया।
नोट – दिल्ली का अन्तिम हिन्दु शासक – हेमू –
- शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारियों में मुहम्मद आदिल शाह एक अयोग्य एवं दुराचारी शासक था। इसने हेमू को अपना प्रशासन का संपूर्ण भार सौंप दिया।
- आदिल शाह ने चुनार को अपनी राजधानी बनाया तथा हेमू मुगलों को हिन्दुस्तान से बाहर निकालने के लिए नियुक्त किया।
- आदिल शाह के शासक बनते ही हेमू को प्रधानमंत्री बनाया गया। हेमू ने अपने स्वामी के लिए 24 लड़ाइयां लड़ी जिसमें उसे 22 लड़ाइयों में सफलता मिली।
- हेमू ने विक्रमादित्य की उपाधि (भारत का अंतिम व 14 वां विक्रमादित्य) धारण की।
- वह दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला अंतिम हिन्दु सम्राट था। इसका शासन बहुत अल्पकालिक था।
अकबर (1556-1605 ई.)
अकबर (1556-1605 ई.)
- अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को अमरकोट (सिंध) में राणा वीरसाल के घर हुआ, जहाँ हुमायूँ ने शरण ली थी।
- बचपन में उसका नाम बदरुद्दीन था। हुमायूँ के फारस जाने पर अकबर अस्करी के संरक्षण में रहा।
- बाल्यकाल में वह लाहौर और गजनी का सूबेदार था।
- 17 दिन तक हुमायूँ की मृत्यु की खबर छुपाकर मुल्ला बेगासी नामक हमशक्ल से झरोखा दर्शन करवाया गया।
- 14 फरवरी 1556 को 13-14 वर्ष की आयु में गुरदासपुर के कालानौर में उसका राज्याभिषेक बैरम खां की देखरेख में हुआ। बैरम खां को वजीर नियुक्त किया गया।
अकबर के अधीन विस्तार के चरण:
प्रारंभिक विद्रोह:
पानीपत का दूसरा युद्ध(5 नवंबर, 1556) –
- हेमचंद्र विक्रमादित्य (हेमू), आदिल शाह सूरी के वजीर, ने मुगलों के खिलाफ अफगानों को संगठित किया। उन्होंने आगरा और दिल्ली पर कब्जा कर स्वतंत्र शासक घोषित करते हुए विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।
- 5 नवंबर 1556 को पानीपत के मैदान में अकबर की सेना ने बैरम खां के नेतृत्व में हेमू को हराया, जिससे सूरी सत्ता का अंत हुआ।
- आर त्रिपाठी ने कहा है कि “हेमू की पराजय एक दुर्घटना थी तथा बैरम खां की विजय एक दैवीय संयोग था।”
यह युद्ध भारत में मुगल शक्ति को पुनः स्थापित करने का निर्णायक क्षण बना।
बैरम खान
- बैरम खान ने अकबर के रीजेंट के रूप में चार वर्षों तक साम्राज्य का कुशल प्रबंधन किया, जिसका विस्तार काबुल से जौनपुर तक था।
- 1560 में अकबर ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। विद्रोह के बाद हारने पर, गुजरात के पाटन में उनकी हत्या कर दी गई।
- तिलवाडा का युद्ध
- बैरम खां, अकबर के वयस्क होने पर भी शासन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता था, जिससे उसने विद्रोह किया।
- तिलवाडा में हुए युद्ध में अकबर ने बैरम खां को पराजित किया।
- जब बैरम खाँ मक्का जा रहा था 1561 में तब एक पठान युवक (मुबारिज खां) ने बैरम खां की हत्या कर दी क्युकी बैरम खां ने उसके पिता को मच्छीवाडा के युद्ध में मारा।
- अकबर ने बैरम की विधवा से विवाह कर लिया एवं बैरम का पुत्र अब्दुर्रहीम को खान ए खाना के पद तक पहुँचाया।
- इतिहासकार अबुल फजल के अनुसार बैरम खां के पतन का सबसे बड़ा कारण महाम अनगा थी।
पेटीकोट शासन /पर्दाशासन/ घाघरा शासन
- अकबर के शासनकाल में 1560-1564 का समय पर्दाशासन या पेटीकोट शासन कहलाता है, जब शाही परिवार की महिलाएं शासन पर प्रभावशाली थीं।
- इस सरकार के तीन सदस्य थे :- महम अनगा, जीजी अनगा, आधम खां। अकबर पर इसकी धाय मां माहमअनगा का सर्वाधिक प्रभाव था।
अकबर का राजत्व सिद्धांत
- अकबर के राजत्व सिद्धांत के अनुसार राजा के पद को दैवीय देन माना गया तथा राजा को दैवीय प्रकाश माना जिसके आगे सबका झुकना अनिवार्य था।
- अकबर का राजत्व उदार निरंकुशता पर आधारित था।
- राजनीतिक व्यवस्था पर कट्टरवाद का प्रभाव कम था।
- शासक जनहित संबंधी अपने कर्तव्य के प्रति सजग था।
- प्रजा के लिए पितृवत प्रेम, सत्य-असत्य का विवेक आदि शामिल था।
साम्राज्य विस्तार
मालवा के विरुद्ध अभियान से लेकर असीरगढ़ के पतन तक चार दशकों (40 वर्ष) के दौरान अकबर की भूमिका एक महान विजेता तथा साम्राज्य निर्माता की थी।
अकबर के अधीन गंगा के मैदानों पर विजय:
मालवा अभियान(1561 ई.)
- इस अभियान में मुगल सेना का नेतृत्व अधम खां एवं पीर मुहम्मद खां ने किया।
- मालवा का शासक बाज बहादुर पराजित हुआ एवं भाग कर बुरहानपुर में शरण ली।
- बाज बहादुर की परम सुन्दरी पत्नि रानी रूपमती ने अपने सम्मान की रक्षा के उद्देश्य से मृत्यु को अपनाया।
- बाज बहादुर को मनसबदार बना दिया गया।
गढ़ कटंगा अभियान(1564 ई.)
- गढ़ कटंगा, गोंडवाना प्रदेश था जो जबलपुर के पास का क्षेत्र था। यहां के राजा की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी रानी दुर्गावती राज कर रही थी।
- अकबर साम्राज्य में कडा (इलाहाबाद) के सुबेदार आसफ खां ने दमोह के पास रानी दुर्गावती को पराजित किया।
- पराजित होने के बाद रानी दुर्गावती ने बंदी बनाए जाने के भय से स्वयं को छुरा घोंप कर आत्महत्या कर ली। गढ़ कटंगा पर भी अकबर का राज्य स्थापित हो गया।

राजपूताना अभियान
अकबर की राजपूत नीति
- अकबर की राजपूत नीति दमन, सहयोग एवं समझौते पर आधारित थी जो अलग अलग तीन चरणों में विभाजित थी। अकबर की राजपूत नीति का उद्देश्य साम्राज्य के स्थायित्व के लिए राजपूतों की सहानुभूति प्राप्त करना था।
- प्रथम चरण, 1572 तक था इस समय दमन की नीति को अपना कर राजपूतों पर आधिपत्य स्थापित करने पर बल था।
- द्वितीय चरण 1572-78 तक था इस चरण में राजपूतों से माम्राज्य विस्तार में सहयोग प्राप्त करने की नीति प्रभावी थी। इस चरण में राजपूत शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन स्थापित करना भी उद्देश्य शामिल था।
- तृतीय चरण 1578 के बाद का काल था। इस नीति में हिन्दु एवं मुस्लिम धर्म के कारण उत्पन्न हुए विरोधों का निराकरण वैवाहिक संबंधों द्वारा किए जाने की झलक मिलती है।
- राजस्थान में साम्राज्य विस्तार के लिए अकबर द्वारा अपनाई गई नीति की विशेषता थी :-
- स्वेच्छा से अधीनता स्वीकार करने वाले अथवा विवाह संबंधों के इच्छुक राजपूत राजाओं को अपनी अधीनता में लेना और उनका राज्य उन्हें वापस कर देना तथा मुगल सेना में उन्हें उच्च पद प्रदान करना।
- शत्रुतापूर्ण व्यवहार में लिप्त राजाओं को पराजित कर उनके राज्य को मुगल साम्राज्य में मिलाना।
- राजस्थान पर अभियान के कारण
- साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करना था। गुजरात और मालवा तक पहुंचने का मार्ग राजस्थान से होकर जाता था, इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण आवश्यक था।
- राणा उदयसिंह ने बाज बहादुर और संभल से भागने वाले मिर्जा को शरण देकर अकबर को चुनौती दी।
- हुमायूं की सलाह पर राजपूतों के दमन या मित्रता द्वारा उनकी शक्ति का उपयोग करना आवश्यक समझा गया।
- इन अभियानों का मुख्य उद्देश्य शत्रुओं की शक्ति को समाप्त करना या उन्हें सहयोगी बनाना था, न कि प्रादेशिक विस्तार या धन प्राप्ति।
घटनाक्रम
- सन् 1562 ई. में आमेर (जयपुर) के शासक भारमल पहला राजपूत राजा था जिसने 1562 में स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की और अपनी पुत्री का विवाह अकबर के साथ किया।
- 1562 ई. में ही मेडता पर अधिकार।
- 1568 ई. में लगभग 4 महीने की घेराबंदी के बाद मेवाड का विनाश किया, मेवाड़ ने आधिपत्य स्वीकार नहीं किया।
- 1569 ई. में रणथम्भौर पर अधिकार।
- 1570 ई. में मारवाड़, बीकानेर एवं जैसलमेर के राजाओं द्वारा मुगल आधिपत्य स्वीकार।
- मारवाड़ के राठौड़ राजपूत:
- जोधपुर के चंद्रसेन राठौड़ ने शाही मुगल सेना को कड़ी टक्कर दी।
- 1564 में जोधपुर के पतन के बाद भी वह लड़ते रहे। अंततः 1580 के दशक तक मुगल सेना ने पूरे मारवाड़ को अपने नियंत्रण में ले लिया।
- चित्तौड़ के सिसोदिया राजपूतों के साथ संघर्ष:
- चित्तौड़ के सिसोदिया राजपूतों ने अकबर की अधीनता नहीं स्वीकारी। 1568 ई. में चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण में 4 महीने की घेराबंदी के बाद 30,000 से अधिक लोग मारे गए। राजा उदयसिंह ने किला छोड़कर पहाड़ियों में शरण ली। । अकबर ने जयमल और फत्ता के साहस की प्रशंसा में आगरा के मुख्य द्वार पर उनकी मूर्तियाँ स्थापित करवाईं।
- उदयसिंह की मृत्यु (1572) के बाद राणा प्रताप सिंह मेवाड़ के शासक बने और आजीवन अकबर से संघर्ष किया
- 1576 ई. के हल्दीघाटी युद्ध में राणा प्रताप और हकीम खां सूर की सेना ने मुगल सेना का सामना किया, परंतु युद्ध अनिर्णीत रहा। राणा ने अधीनता न स्वीकारते हुए गोरिल्ला युद्ध जारी रखा, नई राजधानी चावंड बसाई, और मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करते रहे।
अकबर का गुजरात अभियान
- सन् 1572 ई. में अंत में अकबर गुजरात पहुंचा। सबसे पहले अहमदाबाद पर कब्जा किया फिर दक्षिण गुजरात एवं सूरत पर कब्जा किया।
- अकबर ने गुजरात में खान ए आजम अजीज कोका को सुबेदार नियुक्त किया।
अकबर का बंगाल अभियान
- इस्लाम शाह की मृत्यु के बाद बंगाल स्वतंत्र हो चुका था। सत्ता की बागडोर सुलेमान कुर्रानी के हाथ में थी।
- अकबर के पूर्वी अभियान का लक्ष्य ‘बिहार को फतह करना था।’ परन्तु कार्यवाही का तात्कालिक कारण दाउद खां द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा थी।
- दाउद खां को पराजित कर अकबर ने मुनिम खां को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया एवं मुनिम खां की मृत्यु के बाद हुसैन-कुली खान-ए-जहां को बंगाल का नया सुबेदार नियुक्त किया।
दक्षिण विजय
- अकबर पहला मुगल शासक था जिसने दक्षिण अभियान किया।
गंगा मैदान से आगे विस्तार:
- 1585 ई. में काबुल के शासक मिर्जा हकीम की मृत्यु के बाद अकबर ने मानसिंह को काबुल पर अधिकार करने के लिए भेजा तथा मानसिंह को काबुल का सूबेदार बना दिया।
- सन् 1586 ई. में अकबर ने कश्मीर को जीतने का निश्चय किया वहां के शासक याकूब खां ने अकबर की अधीनता स्वीकर कर ली थी परन्तु सशरीर अकबर के सामने उपस्थित होकर समर्पण करने से मना कर दिया था। वास्तविक रूप में कश्मीर पर अधिकार 1587 ई. में कासिम खां द्वारा कश्मीर शासक याकूब खां को पराजित करने के बाद हुआ।
- कश्मीर पर अधिकार के बाद लद्दाख एवं ब्लूचिस्तान पर अधिकार कर लिया।
- सिंध पर विजय 1590 में हुई ।
- 1592 में बंगाल के मुगल गवर्नर राजा मान सिंह ने उड़ीसा पर कब्जा कर लिया था ।
दक्कन के सुल्तानों के विरुद्ध अभियान:
- इस समय दक्षिण में खान देश, अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा प्रमुख सल्तनत थे।
- खान देश दक्षिण का पहला राज्य था जिसने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
- अहमदनगर अभियान
- सर्वप्रथम 1593 में अकबर ने एक मुगल सेना अब्दुल रहीम खान-ए-खानम के नेतृत्व में अहमदनगर विजय के लिए भेजी।
- इस समय अहमदनगर की सुरक्षा का भार चांद बीबी पर था जो अहमदनगर के शासक निजामशाह की पुत्री थी।
- उन्होंने 1595 में अहमदनगर किले पर घेरा डाल दिया,जिससे चांद बीबी को बरार सौंपने पर मजबूर होना पड़ा;
- 1601 में इसने किले को जीत लिया तथा दक्षिण विजय के उपलक्ष्य में अकबर ने दक्षिण के बादशाह की उपाधि धारण की।
- राजकुमार दानियाल के अधीन अहमदनगर, बरार और खानदेश के सूबों की स्थापना की ।
- अकबर की अंतिम कार्यवाही कन्धार को मुगल साम्राज्य में शामिल करना था।
अक्टूबर 1605 ई. में अकबर ने बीमार होने के कारण 21 अक्टूबर 1605 को जहांगीर (सलीम) को उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। 25-26 अक्टूबर 1605 ई. को अकबर की मृत्यु हो गई। अकबर का मकबरा आगरा से 10 मील की दूरी पर सिकन्दरा में है। इस मकबरे का निर्माण जहांगीर के शासन काल में करवाया गया।
अकबर का प्रशासन
अकबर की राजस्व प्रणाली:
- भू-राजस्व के लिए जब्ती प्रणाली: सूरी से अपनाई गई थी , जिसमें राजस्व का भुगतान उत्पादकता के वार्षिक मूल्यांकन के अनुसार किया जाता था।
लेकिन बाद में उन्होंने इसमें संशोधन किया और दहसाला प्रणाली को अपनाया जिसमें उत्पादकता आकलन के लिए पिछले दस वर्षों की औसत उपज का उपयोग किया गया।
- हालाँकि, कुछ क्षेत्रों में राजस्व की गणना के लिए जब्ती , बटाई और नसाक/कनकुट जैसी अन्य प्रणालियों का उपयोग किया जाता था।
सैन्य प्रशासन:
- अकबर ने अपनी सेना और कुलीन वर्ग को मनसबदारी प्रणाली के तहत संगठित किया, जहां प्रत्येक अधिकारी को एक पद (मनसब) सौंपा गया था।
- उन्होंने मौजूदा स्थानीय प्रशासन और परगना और सरकार को जारी रखा
- सर्वशक्तिमान वजीर की मध्य एशियाई परंपरा समाप्त कर दी गई।
अकबर की धार्मिक नीति:
- उनकी धार्मिक नीति को ‘सुहल-ए-कुल’ (सार्वभौमिक शांति) के नाम से जाना जाता है ।
- अकबर के धार्मिक विचारों पर अब्दुल लतीफ की विचारधारा का प्रभाव था।
नोट – सुलह-ए-कुल नीति – सुलह-ए-कुल का अर्थ सभी धर्मों को महत्व देना, आदर करना एवं धार्मिक सहिष्णुता से है। सूफी संतों ने सुलह-ए-कुल नीति पर जोर दिया था। यह धार्मिक कट्टरता को कम करती है।
- धार्मिक स्वतंत्रता पुनर्जीवित हुई: 1563 में इसने तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 में जजिया कर समाप्त किया।
- जैन विद्वानों में हरि विजय सूरि जिसको इसने जगतगुरु तथा जिन चन्द्र सूरि जिसे इसने युग प्रधान की उपाधि दी।
- हिन्दू धर्म के कर्म एवं पुनर्जन्म के सिद्धान्त को ग्रहण किया।
- 1580 में पहला ईसाई मिशन फतेहपुर सीकरी पहुँचा जिसमें मॉसरेट, अक्वेविया और एनरिक्वेज इसके सदस्य थे। अकबर ने इनसे भी वार्ता की।
- सितम्बर 1579 में महजर घोषणा-पत्र नाम से एक दस्तावेज जारी किया जिसकी रचना शेख मुबारक ने की थी। इसके द्वारा अकबर को इस्लाम धर्म से सम्बंधित विवादों के निबटारे का सर्वोच्च अधिकार प्राप्त हुआ और अब यह इमाम-ए-आदिल हो गया।
- इस दस्तावेज को लाने का उद्देश्य उलेमाओं के विरोध को कम करना एवं राजत्व की गरिमा को बढ़ाना था।
- उन्होंने युद्धबंदियों को जबरन इस्लाम में धर्मांतरित करने की प्रथा पर भी रोक लगा दी।
- अकबर ने अपनी हिंदू पत्नियों को पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी और उनके माता-पिता और रिश्तेदारों को कुलीन वर्ग में सम्मानजनक स्थान दिया। उनकी राजपूत नीति गैर-मुसलमानों के प्रति उनकी सहिष्णुता की नीति के अनुरूप थी।
- अकबर के अधीन धार्मिक सुधार:
- उन्होंने जबरन सती प्रथा को रोका और विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दी।
- उन्होंने शिक्षा में सुधार का भी प्रयास किया और गणित, खगोल विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि धर्मनिरपेक्ष विषयों पर जोर दिया।
- 1575 में फतेहपुर सीकरी में इसने एक इबादतखाना का निर्माण कराया। इसका उद्देश्य धर्म की सत्यता को जानने की उत्सुकता थी।
- इबादत खाना में, वे विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक विचारों पर चर्चा करते थे। आरंभ में इबादत खाने में केवल मुसलमान भाग ले सकते थे व 1578 ई. में इबादतखाना सभी धर्मों के विद्वानों के लिए खोला गया।
- अकबर ने विभिन्न धर्मों के प्रमुख व्यक्तियों जैसे पुरूषोत्तम और देवी (हिंदू धर्म), मेहरजी राणा (पारसी धर्म), पुर्तगाली अक्वाविवा और मोंसेरेट (ईसाई धर्म), और हीर विजय सूरी (जैन धर्म) के साथ व्यक्तिगत चर्चा कीं।
- परन्तु इबादत खाने का जो उद्देश्य था ‘सत्य की खोज’ के स्थान पर अपने-अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने लगे अतः अकबर ने 1582 में इबादत खाने को बंद कर दिया।
- इन चर्चाओं के माध्यम से अकबर ने महसूस किया कि नामों की विविधता के पीछे केवल एक ही ईश्वर है। तौहीद-ए-इलाही या दीन-ए-इलाही का सिद्धांत इसी विचार को दर्शाता है। तौहीद-ए-इलाही का शाब्दिक अर्थ है “दैवी एकेश्वरवाद”।
- 1582 में अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना की। जिसमें विभिन्न धर्मों के विचार शामिल थे।
- दीन ए इलाही अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और उदार लोकेश्वरवाद का प्रतीक था। जिसमें विभिन्न धर्मों के अच्छे सिद्धांतों का समावेश किया गया।
- दीन-ए-इलाही के सिद्धांत
- सम्राट को अपना आध्यात्मिक गुरू मानना
- यह धर्म एकेश्वरवाद में विश्वास करता था
- दानशीलता
- सांसारिक इच्छा का परित्याग
- शाकाहारी भोजन, शिकारियों एवं मछुआरों के साथ भोजन न करना।
- विशुद्ध नैतिक जीवन व्यतीत करना।
- अल्पायु, बांझ व गर्भवती स्त्रियों से शारीरिक संबंध निषेध
- अबुल फजल इस सम्प्रदाय का मुख्य पुरोहित बना।
- प्रतिष्ठित हिन्दुओं में केवल बीरबल ने ही इसे स्वीकार किया।
- अकबर के दीन-ए-इलाही के बारे में स्मिथ ने लिखा है कि दीन – ए – इलाही अकबर की बुद्धिमत्ता का नहीं बल्कि इसकी मुर्खता का प्रतीक था।
अकबर के नवरत्न
- बीरबल – इनका जन्म काल्पी में हुआ था। बचपन का नाम महेशदास था। आमेर के राजा भारमल के पुत्र भगवान दास ने इन्हें अकबर तक पहुंचाया था। अकबर ने इन्हें कविराज एवं राजा की उपाधि तथा 2000 का मनसब प्रदान किया। दीन ए इलाही धर्म स्वीकार करने वाले एकमात्र हिन्दु राजा बीरबल थे। इनकी मृत्यु युसुफजई कबीले के साथ होने वाले संघर्ष में हुई।
- अबुल फजल – मजहरनामा शेख मुबारक का पुत्र व अनुवाद विभाग का अध्यक्ष फैजी के भाई, अकबर का घनिष्ठ मित्र, निजी सचिव, सलाहकार थे । इन्होंने आइन ए अकबरी,(अकबर काल का सरकारी गजट) अकबरनामा की रचना की। अबुल फजल दीन ए इलाही धर्म के मुख्य पुरोहित थे। इनकी हत्या शहजादा सलीम के कहने पर वीरसिंह बुन्देला ने करी थी।
- तानसेन – ये ग्वालियर के थे। अकबर ने इन्हें कण्ठाभरण वाणी विलास की उपाधि दी। इनके समय ध्रुपद गायन शैली का विकास हुआ। इन्होंने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था।
- अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना – ये बैरम खां का पुत्र था। इनका पालन पोषण स्वयं अकबर ने किया था। इन्होंने बाबरनामा का फारसी में अनुवाद किया था।
- मानसिंह – ये आमेर के राजा भारमल के पौत्र तथा भगवान दास के पुत्र थे। अकबर के मेवाड़ (हल्दीघाटी), काबुल, बंगाल एवं बिहार के अभियानों में मुख्य भुमिका निभायी।
- टोडरमल – इसका जन्म अवध के सीतापुर में हुआ। अकबर से पहले ये शेरशाह सूरी के यहां नौकरी करते थे। अकबर के शासन में दहशाला (भूमि सुधार) की व्यवस्था दी। इन्होंने दीन-ए-इलाही धर्म को स्वीकार नहीं किया था।
- फैजी – अकबर ने इन्हें राजकवि के पद पर आसीन किया था। इन्होंने गणित की प्रसिद्ध पुस्तक लीलावती का फारसी में अनुवाद किया।
- हकीम हुमाम – अकबर के रसोईघर का कार्य संभालते थे।
- मुल्ला-दो-प्याजा – ये अरब के रहने वाले थे। ये अपनी बुद्धिमानी व वाकपटुता के कारण नवरत्नों में शामिल थे।
नोट – अब्दुल कादिर बदायुनी को भी शामिल किया जाता है।
अकबर के समय की प्रमुख घटनाएँ
| 1562 ई. | युद्ध बन्दियों के लिए दास प्रथा की समाप्ति। |
| 1563 ई. | तीर्थ यात्रा कर की समाप्ति। |
| 1564 ई. | जजिया की समाप्ति। |
| 1569-70ई. | फतेहपुर सीकरी की स्थापना। |
| 1574-75 ई. | समाचार देने वाले गुप्तचर विभाग की स्थापना। |
| 1574 ई. | घोड़े दागने की प्रथा आरम्भ। |
| 1571 / 75 ई. | मनसबदारी व्यवस्था प्रारम्भ की गई। |
| 1575 ई. | फतेहपुर सीकरी में इबादत्त खाने का निर्माण। |
| 1577 ई. | सिक्ख गुरु रामदास को 500 बीघा जमीन दी जहां बाद में अमृतसर नगर बसा। |
| 1577-78 ई. | सिजदा एवं पायबोस की शुरुआत |
| 1578 ई. | इबादत खाने को सभी धर्मों के लिए खोल गया। |
| 1579 ई. | महजर की घोषणा। तथा दहसाला प्रणाली की घोषणा |
| 1580 ई. | संपूर्ण साम्राज्य को सूबों में बांटा गया (दक्षिण विजय के बाद सूबों की संख्या 15 हो गयी) |
| 1580 ई. | टोडरमल द्वारा दहसाला प्रणाली लागू। |
| 1580 ई. | फादर एक्वाबीवा के नेतृत्व में प्रथम पुर्तगाली जैसूट मिशन फतेहपुर सीकरी आया। |
| 1582 ई. | दास प्रथा की पूर्ण समाप्ति। |
| 1582 ई. | इबादत खाने में बहस पर रोक। |
| 1582 ई. | दीए-ए-इलाही की घोषणा। |
| 1583 ई. | इलाही संवत् या फसली संवत् नामक नया कैलेंडर जारी किया गया। |
| 1583 ई. | कुछ निश्चित दिनों पर पशुवध पर रोक। |
| 1588 ई. | गज ए इलाही या बीघा ए इलाही की शुरुआत |
जहाँगीर (1605-1627 ई.)
- जहाँगीर का जन्म सीकरी गाँव में हुआ, और बचपन में उसे सलीम नाम से पुकारा जाता था।
- उसका पहला विवाह मानसिंह की बहन मानबाई [शाहबेगम] से हुआ, लेकिन 1601 में मानबाई ने आत्महत्या कर ली। इसके बाद उसने जोधाबाई या जगत गुसाई से विवाह किया।
- 1599 में सलीम ने अकबर के खिलाफ विद्रोह किया और इलाहाबाद में स्वतंत्र रूप से शासन किया।
- 1605 में वह नूर-उद-दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से अकबर का उत्तराधिकारी बना। आगरा के किले में इसका राज्याभिषेक हुआ।
- गद्दी पर बैठते ही इसने 12 अध्यादेश जारी किये जिनमें महत्वपूर्ण थे छोटे-छोटे अनेक करों की समाप्ति, मद्यनिषेध, अस्पतालों एवं हकीमों की व्यवस्था, रविवार एवं बृहस्पतिवार को पशुबलि पर रोक तथा पुराने कैदियों की रिहाई।
- जहांगीर एक न्यायप्रिय शासक था, सबको न्याय मिले इसके लिए उसने सोने की जंजीर लगवाई जिसे जंजीर- ए-अदली के नाम से जाना जाता था।
- एक जैन संत मानसिंह ने इसके बारे में भविष्यवाणी की थी कि उनका शासन दो वर्ष से अधिक नहीं चलेगा।
सैन्य उपलब्धियां –
खुशरो का विद्रोह
- 1606 में खुशरो विद्रोह करके तनतारन (पंजाब) पहुँचा और सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुन से आशीर्वाद प्राप्त किया।
- लाहौर के पास भैरावल नामक स्थान पर जहांगीर और खुशरो के बीच युद्ध हुआ जिसमें खुशरो पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया।
- जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को मृत्यु दण्ड दे दिया था।
मेवाड़ अभियान
- इस समय यहां का शासक अमरसिंह था।
- 1614 में खुर्रम के नेतृत्व में मेवाड़ अभियान हुआ।
- मेवाड़ के साथ समझौता:
- मेवाड़ के राजा अमर सिंह ने मेवाड़ की खराब आर्थिक स्थिति के कारण मुगल संप्रभुता स्वीकार कर ली, जिससे चार दशक लंबा संघर्ष समाप्त हो गया।
- उन्हें 5000 की जात और 5000 सवारी के साथ मनसबदारी दी गई।
- मुगल इस बात पर सहमत हुए कि मेवाड़ के राजा को मुगल दरबार के अधीन होने की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें वैवाहिक संबंध के लिए बाध्य किया जाएगा।
- बदले में अमर सिंह को चित्तौड़ का किला वापस दे दिया गया, इस शर्त के साथ कि वह इसकी मरम्मत नहीं कर सकेगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मेवाड़ इतना मजबूत न हो जाए कि वह अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कर सके।
दक्षिण अभियान
- अकबर की मृत्यु के बाद अहमदनगर के वजीर मलिक अम्बर के नेतृत्व में अहमदनगर स्वतंत्र हो गया था।
- 1616 में खुर्रम के नेतृत्व में दक्षिण अभियान हुआ तथा उसके आतंक से घबराकर मलिक अंबर ने जहांगीर की अधीनता स्वीकार कर ली।
- दक्षिण विजय के उपलक्ष में जहांगीर ने खुर्रम को शाहजहां की उपाधि दी।
खुर्रम का विद्रोह
- 1623 में खुर्रम ने जहांगीर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया परन्तु असफल रहा।
- 1622-26 में, उनके बेटे खुर्रम ( शाहजहाँ ) ने दक्कन के अहमदनगर के मलिक अंबर के साथ मिलकर जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह किया। महाबत खान ने उसे हरा दिया।
- अंततः 1626 में जहांगीर से इसने क्षमा मांगकर विद्रोह समाप्त कर दिया।
कंधार, जिसे अकबर ने 1595 में फारसियों से जीत लिया था, 1622 में फारसी सम्राट शाह अब्बास ने पुनः जीत लिया। जहाँगीर इसे फिर से प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन शाहज़ादा खुर्रम के विद्रोह के कारण सफल नहीं हो सके।
जहाँगीर शासनकाल के दौरान, पूर्वी बंगाल में मुगल सत्ता मजबूती से स्थापित हो गयी थी।
जहाँगीर पर ब्रिटिश प्रभाव:
- विलियम हॉकिन्स के नेतृत्व में पहला ब्रिटिश दूत 1608 में जहांगीर से मिलने आया। लेकिन मुगलों को यूरोपीय लोगों के साथ व्यवहार करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
- हालाँकि, पुर्तगालियों के साथ ब्रिटिश संघर्ष ने अंग्रेजों के प्रति मुगलों के रवैये को बदल दिया। 1612 के स्वाली के युद्ध में, कैप्टन थॉमस बेस्ट के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सूरत के पास एक नौसैनिक युद्ध में पुर्तगालियों को हराया।
- इससे मुगल प्रभावित हुए क्योंकि वे सूरत, दीव, दादर और नगर हवेली, बेसिन और बम्बई में पुर्तगाली बस्तियों को लेकर चिंतित थे।
- 1615 में जब थॉमस रो भारत आये तो जहांगीर ने उन्हें सूरत में एक कारखाना बनाने की अनुमति दी और उन्हें 400 की जात के साथ मनसबदार नियुक्त किया।
- जहाँगीर ने दानियाल (भाई) के पुत्रों को ईसाई धर्म ग्रहण करने की अनुमति प्रदान की। इसकी प्रशंसा स्पेन के तत्कालीन शासक फिलिप III ने किया है।
मेहर-उन-निसा (नूरजहाँ)
- इसका प्रारम्भिक नाम मेहरुन्निसा था।
- इसके पिता ग्यासबेग (एतमादुद्दौला) थे तथा माता का नाम असमत बेगम था जिन्होंने गुलाब के फूल से इत्र का आविष्कार किया।
- 1594 में मेहरुन्निसा का विवाह अलीकुली खाँ से हुआ।
- 1611 में, जहाँगीर ने मेहर-उन-निसा से विवाह किया। मेहर-उन-निसा (नूरजहाँ) 1620 से 1627 में अपनी मृत्यु तक मुगल सम्राट जहाँगीर की पत्नी और मुख्य संगिनी थी ।
- जहांगीर की शराब और अफीम की लत के कारण नूरजहां के लिए जहांगीर पर अपना प्रभाव डालना आसान हो गया और उसके पास अपार शक्ति थी।
- जहांगीर स्वयं कहता था, कि मैंने बादशाहत नूरजहां बेगम को सौंप दिया है अब मुझे शेर भर शराब और आधा शेर कबाब चाहिए।
- उन्हें बादशाह बेगम की उपाधि दी गई और उनके नाम पर सिक्के भी जारी किये गए।
- उन्हें फरमान जारी करने का विशेषाधिकार प्राप्त था।
- नूरजहाँ ने अपने परिवार के सदस्यों का एक शक्तिशाली समूह बनाया, जिसमें वह खुद, उसके पिता मिर्ज़ा गयास बेग , उसका भाई आसफ़ खान और राजकुमार खुर्रम (शाहजहाँ) शामिल थे , ताकि वह अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सके। इस तरह के समूह को जुंटा (एक शक्तिशाली राजनीतिक समूह को संदर्भित करने वाला लैटिन शब्द) कहा जाता है।
मुगल कला पर नूरजहाँ का प्रभाव:
- नूरजहाँ के प्रभाव के कारण दरबार में फ़ारसी कला और संस्कृति का विकास हुआ।
- उनकी वास्तुकला में पित्रा दयुरा (अर्द्ध-कीमती पत्थरों का उपयोग करके कला) का उपयोग किया जाने लगा। उदाहरण: एतमादुल्ला का मकबरा।
- उन्होंने नूरमहली पोशाक , चांदी-धागे वाले ब्रोकेड ( बादला ) और चांदी-धागे वाले फीते (किनारी) जैसे विभिन्न नए वस्त्रों को पेश करके महत्वहीन योगदान दिया ।
जहांगीर की मृत्यु
- 1627 में जहांगीर कश्मीर में रुका तथा जब यह कश्मीर से वापस आ रहा था तब भिम्बर नामक स्थान पर इसकी मृत्यु हो गई।
- इसके शव को लाहौर लाया गया और यहीं पर शाहदरा में दफनाया गया।
नोट –
- जहाँगीर ने सर्वप्रथम मराठों को अपने अमीर वर्ग में शामिल किया।
- बिलियम फिन्च ने अनारकली की कथा का वर्णन अपनी पुस्तक “लॉर्ड जनरल” में किया था।
कला और संस्कृति में योगदान:
- उन्होंने अकबर की धार्मिक नीति ‘ सुहेल-ए-कुल’ को जारी रखा ।
- जहाँगीर ने वास्तुकला पर कम ध्यान दिया, लेकिन चित्रकला, विशेष रूप से चित्र शैली को संरक्षण दिया । उन्होंने चित्रों में प्रभामंडल का उपयोग शुरू किया।
- उन्होंने अपनी आत्मकथा, तुजुक-ए-जहाँगीरी, फ़ारसी में लिखी। जिसे मोतिमिद खाँ व मोहम्मद हादी ने पुरा किया।
कला संस्कृति विषय में विस्तार से मिलेगा।
शाहजहाँ (1627-1658 ई.)
- इसकी माता का नाम जोधाबाई (जगतगुसाई) था।
- 1612 में इसका विवाह आसफ खाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानो बेगम से हुआ जिसे शाहजहां ने मुमताज महल की उपाधि दी।
- शाहजहां अकबर और जहांगीर की तुलना में धार्मिक रूप से कट्टर था।
- शाहजहां ने नए मंदिरों के निर्माण पर रोक लगा दिया।
- इसने पुनः तीर्थ यात्रा कर लगाया।
- इसने ईसाई धर्म परिवर्तन पर रोक लगाई।
- राजकुमार खुर्रम, जिन्हें शाहजहाँ के नाम से भी जाना जाता है, ने 1627 में जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसके सबसे छोटे भाई शहरयार मिर्ज़ा को हराकर आगरा किले में स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया।
शाहजहाँ की सैन्य उपलब्धियाँ:
राजनीतिक घटना
बुन्देलों का विद्रोह
- इसके समय में 1628 में ओरछा के शासक जुझारसिंह ने विद्रोह किया।
- अंततः 1635 में इस विद्रोह का अंत हुआ और जुझारसिंह की हत्या कर दी गई।
पुर्तगालियों का दमन
- 1632 में शाहजहां ने बंगाल के सूबेदार कासिम खाँ को हुगली के पुर्तगालियों का दमन करने का आदेश दिया।
- कासिम खाँ ने हुगली पर आक्रमण करके अनेक पुर्तगालियों की हत्या की और हजारों बंदी बना लिये गए।
दक्षिण अभियान
- अफगान पीर लोदी, जिन्हें खानजहाँ की उपाधि दी गई थी और जो साम्राज्य के दक्षिणी प्रांतों के गवर्नर थे, शत्रुतापूर्ण हो गए। शाहजहाँ ने उन्हें दक्कन से हटाने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने अहमदनगर के सुल्तान मुरतज़ा निज़ाम शाह द्वितीय से मिलकर षड्यंत्र रचा। स्थिति गंभीर हो गई, तो शाहजहाँ ने स्वयं दक्कन की ओर कूच किया।
- 1630 में शाहजहां ने अहमदनगर अभियान किया।
- नव नियुक्त दक्कन के गवर्नर इरादत खाँ, जिन्हें आजम खाँ की उपाधि दी गई, ने शाही सेना का नेतृत्व किया और बालाघाट पर हमला किया। शाही सैनिकों द्वारा मचाई गई तबाही को देखकर मुरतज़ा ने खानजहाँ से दूरी बना ली। खानजहाँ वहाँ से भागकर मालवा चले गए, लेकिन उनका पीछा किया गया और अंततः उन्हें मार डाला गया। इसके बाद दक्कन में शांति बहाल हुई।
- शाहजहाँ ने दक्कन को चार प्रांतों में विभाजित किया — अहमदनगर (दौलताबाद सहित), खानदेश, बरार और तेलंगाना। इन चार प्रांतों का प्रभार उन्होंने अपने अठारह वर्षीय पुत्र औरंगज़ेब को सौंपा।
- इस प्रकार, शाहजहाँ के शासनकाल में दक्कन पर मुगल साम्राज्य का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ।
- अहमदनगर, जिसने मुगलों का विरोध किया, मलिक अंबर के प्रयासों के बावजूद मुगलों द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया।
- 1636 में, शाहजहाँ ने महाबत खाँ की सहायता से अहमदनगर के निज़ामशाही शासकों को शांत किया।
कन्धार विजय
- 1638 में यहां के प्रशासक अलीमर्दान खाँ को शाहजहां ने अपने पक्ष में कर लिया।
- इसने कन्धार शाहजहां को सौंप दिया।
नोट – इसके शासनकाल में कई यूरोपीय यात्री भारत आए, जिनमें फ्रांसीसी चिकित्सक और यात्री बर्नियर, फ्रांसीसी रत्न व्यापारी टैवर्नियर, जर्मन साहसी मांडेलस्लो, अंग्रेज़ व्यापारी पीटर मुंडी और इतालवी लेखक और यात्री मनूची शामिल थे। इन यात्रियों ने भारत के बारे में विस्तृत विवरण छोड़े हैं। पीटर मुंडी ने उसके शासनकाल में पड़े अकाल का वर्णन किया है।
शाहजहां के पुत्रों के मध्य उत्तराधिकार का युद्ध
- 1657 में शाहजहां बीमार पड़ा एवं दक्षिण भारत में इसके मृत्यु की अफवाह उड़ गई परिणामस्वरूप मुराद एवं शाहशुजा ने अपने को सम्राट घोषित किया।
- औरंगजेब ने धैर्य से काम लिया और मुराद को अपनी तरफ मिलाकर दारा शिकोह के विरुद्ध युद्ध किया।
- शाहजहाँ को औरंगजेब ने आगरा किले में नजरबंद कर दिया , जहाँ 1666 में उसकी मृत्यु हो गई। कैदी जीवन व्यतीत करने के दौरान शाहजहाँ की पुत्री जहाँआरा बेगम ने उसकी सेवा की।
शाहजहाँ के पुत्रों के मध्य उत्तराधिकार का युद्ध
| 1. बहादुरपुर का युद्ध1658 में | शाहशुजा एवं दारा की शाही सेना। |
| 2. धरमत का युद्ध1658 में | औरंगजेब एवं मुराद की संयुक्त सेना तथा दारा की शाही सेना। |
| 3. सामूगढ़ का युद्ध 1658 | औरंगजेब एवं मुराद की संयुक्त सेना एवं दारा के बीच। |
| 4. खजुवा का युद्ध1659 | औरंगजेब एवं शाहशुजा के बीच |
| 5. देवराई का युद्ध1659 | औरंगजेब एवं दारा के बीच |
नोट –
- शाहजहाँ ने “चहार तस्लीम” की प्रथा शुरू की
- शाहजहाँ ने कवीन्द्राचार्य के अनुरोध पर इलाहाबाद एवं बनारस में तीर्थयात्रा कर समाप्त कर दिया था।
- दाराशिकोह कादिरी सिलसिले के सूफी संत मुल्लाशाह बदख्शी का शिष्य था।
- दाराशिकोह ने भगवद् गीता, योग वशिष्ठ तथा 52 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया। उपनिषदों के अनुवाद को सिर्र-ए-अकबर नाम दिया।
- दारा ने सफीनत-उल-औलिया तथा मज्म-उल-बहरैन नामक फारसी ग्रंथ की रचना की।
- इटालवी यात्री मनूची दारा के तोपची के रूप में कार्य किया।
औरंगजेब(1657-1707)
- औरंगज़ेब ने 1658 में सिंहासन पर अधिकार किया। उन्होंने उत्तराधिकार युद्ध में अपने भाइयों दारा शिकोह, शुजा और मुराद को पराजित कर सत्ता पाई।
- उनके शासन का 50-वर्षीय काल दो भागों में विभाजित है। पहले 25 वर्षों में उन्होंने दिल्ली में रहकर मुख्यतः उत्तरी भारत के मामलों पर ध्यान केंद्रित किया। 1681 में अपने पुत्र, शहजादा अकबर के विद्रोह के कारण उन्हें दक्कन जाना पड़ा। इसके बाद वे कभी दिल्ली नहीं लौटे और 1707 में अहमदनगर में निराशावस्था में उनकी मृत्यु हुई।
- उन्होंने लगभग पचास वर्षों तक शासन किया, जिसके दौरान मुगल साम्राज्य के क्षेत्र अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गये।
- अपने चरम पर यह उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में जिंजी (तमिलनाडु) तक तथा पश्चिम में हिंदुकुश से लेकर पूर्व में चटगाँव तक फैला हुआ था।
- दक्कन के उनके विनाश को एक राजनीतिक भूल माना जाता है और इतिहासकारों ने इसे दक्कन अल्सर का नाम दिया है क्योंकि इससे मराठों के साथ सीधा टकराव हुआ और इससे मुगल खजाने पर भी गंभीर असर पड़ा।
- शिवाजी और उनके उत्तराधिकारियों के अधीन मराठों ने औरंगजेब के अधीन मुगल साम्राज्य को चुनौती दी और उनकी मृत्यु के बाद वे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे।

प्रमुख सैन्य अभियान
- औरंगज़ेब ने मुग़ल साम्राज्य की सीमाओं को विस्तारित करने के लिए कई सैन्य अभियान चलाए, जिनमें उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी भारत में युद्ध शामिल थे। इन अभियानों ने खजाने पर भारी दबाव डाला।
- उनके पिता शाहजहाँ के शासनकाल में फसल के राजस्व को एक-तिहाई से बढ़ाकर आधा कर दिया गया था, और औरंगज़ेब के दीर्घकालिक सैन्य अभियानों ने किसानों पर अधिक कर लगाने की आवश्यकता उत्पन्न की।
जाटों का विद्रोह
- 1669 में गोकुल के नेतृत्व में मथुरा के आस-पास के क्षेत्रों में जाटों ने विद्रोह किया।
अहोमों के विरुद्ध अभियान
- अहोमों के विरुद्ध अभियान भेजा (सरायघाट का युद्ध 1671) लेकिन उन्हें सीमित सफलता मिली।
सतनामियों का विद्रोह
- 1672 में मेवात और नारनौल क्षेत्र में सतनामियों ने विद्रोह कर दिया। सतनामियों का विद्रोह स्थानीय हिंदू ज़मींदारों की मदद से कुचला गया।
- बुंदेलखंड में चम्पतराय और छत्रसाल बुंदेला के नेतृत्व में विद्रोह हुआ।
सिक्खों का विद्रोह
- औरंगजेब के समय सिक्खों के नए गुरु तेगबहादुर थे।
- इन्होंने औरंगजेब की धार्मिक नीतियों का विरोध किया।
- औरंगजेब ने इन्हें दिल्ली बुलाया और इस्लाम धर्म स्वीकार करने को कहा।
- गुरु तेगबहादुर ने इसका विरोध किया और जिसकी वजह से 1775 में इन्हें मृत्यु दण्ड दे दिया गया।
- सिक्खों के 10वें गुरु गुरुगोविंद सिंह हुए हुए। इन्होंने 80 हजार सैनिकों की खालसा सेना तैयार की।
अकबर का विद्रोह
- यह औरंगजेब का पुत्र था।
- 1681 में उसने विद्रोह कर दिया और भागकर मराठा शासक सम्भाजी के पास रायगढ़ में शरण ली। Manha
- 1682 में यह फारस चला गया।
औरंगजेब की दक्षिण विजय
- औरंगजेब की दक्षिण विजय का मुख्य उद्देश्य साम्राज्य का विस्तार करना था।
- इसके अतिरिक्त दक्षिण में मराठे मुगलों के लिए भावी खतरा बन रहे थे अतः इनकी शक्ति को समाप्त करना औरंगजेब का उद्देश्य था।
बीजापुर अभियान (1685-86)
- इस समय बीजापुर का सुल्तान सिकन्दर आदिल शाह था।
- औरंगजेब ने इसे पराजित कर इसके किले पर अधिकार कर लिया और इसे 1 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर बीजापुर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
गोलकुण्डा अभियान (1686-87)
- इस समय गोलकुण्डा का शासक अबुल हसन कुतुबशाह था।
- औरंगजेब ने इसे बंदी बना लिया और इसे 50 हजार रुपये वार्षिक पेंशन देकर इसके राज्य को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।
मराठों से संघर्ष
- मराठों ने औरंगजेब को अत्यधिक परेशान किया।
- मराठों में शिवाजी ने मुगलों से निरन्तर संघर्ष किया और महाराष्ट्र में मराठों के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।
- शिवाजी के बाद इनका पुत्र संभाजी मुगलों से निरन्तर संघर्ष किया।
- 1689 में औरंगजेब ने सम्भाजी को बन्दी बना लिया और इनकी हत्या कर दी तथा मराठा राज्य पर अधिकार कर लिया।
1707 में अहमदनगर के पास औरंगजेब की मृत्यु हो गई और औरंगाबाद में इसको दफनाया गया।
धार्मिक और प्रशासनिक नीतियां
- औरंगज़ेब ने जज़िया (सर्वधर्म कर) को पुनः लागू किया।
- उन्होंने नए मंदिरों के निर्माण पर रोक लगाई, लेकिन पुराने मंदिरों की मरम्मत की अनुमति दी। ये नीतियां उनके धार्मिक विश्वासों और राजनीतिक जरूरतों से प्रेरित थीं।
- हिंदू अधिकारियों की संख्या: औरंगज़ेब के शासनकाल में हिंदू अधिकारियों की संख्या उनके पिता शाहजहाँ के काल से अधिक थी।
- शरिया के अनुसार शासन: औरंगज़ेब ने शरिया कानून के अनुसार अबवाब (अतिरिक्त कर) जैसे असंगत करों को समाप्त कर दिया।
- उन्होंने मोहर्रम के साथ-साथ नौरोज के त्यौहार पर भी प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि शिया लोग इसे मनाते थे।
- दक्कन के खिलाफ उनके अभियान को भी शियाओं के प्रति उनकी नफरत से जोड़ा गया।
- उन्होंने दरबार में संगीत पर रोक लगा दी , जजिया कर पुनः लागू कर दिया , केवल हिंदुओं पर सीमा शुल्क लगाया तथा नैतिक संहिता और शरिया लागू करने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति की।
- इस्लामी मूल्यों के प्रति उनकी कठोर जीवन शैली के कारण उन्हें जिंदा पीर (जीवित संत) कहा जाता था। सादगी से भरे जीवन के लिए “शाही दरवेश” भी कहा जाता था
औरंगजेब की प्रतिक्रियावादी कार्य
- हिन्दुओं पर पुनः जजिया कर लगाना।
- राजपूतों को छोड़कर हिन्दुओं को अच्छे घोड़े एवं पालकी की सवारी पर रोक।
- मंदिरों के निर्माण एवं मरम्मत पर रोक।
- संगीत पर प्रतिबंध।
- इतिहास लेखन एवं ज्योतिष पर रोक।
- मंदिरों को तोड़ने का आदेश।
मुगलों और राजपूतों का संबंध
- राजपूतों के साथ अकबर के संबंध: राजपूतों द्वारा प्रदान की गई दृढ़ वफादारी अकबर के साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण और विस्तार में सबसे महत्वपूर्ण कारक थी। जो राजपूत अकबर के समक्ष आत्मसमर्पण करते थे, उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाता था तथा उन्हें मनसबदार नियुक्त किया जाता था।
- उन्होंने राजपूतों के साथ वैवाहिक गठबंधन किया और राजा भारमल की बेटी हरका बाई से विवाह किया ।
- चार दशक लंबे संघर्ष के बाद जहाँगीर मेवाड़ के राजा अमर सिंह को मुग़ल संप्रभुता के अधीन लाने में सफल रहा , और अंततः पूरे राजपूताना पर उसका नियंत्रण हो गया। हालाँकि मेवाड़ और मारवाड़ को काफ़ी स्वतंत्रता दी गई थी और इसलिए उन्हें वतन जागीर के नाम से जाना जाता था ।
- औरंगजेब ने उत्तराधिकार की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करके राजपूतों को अलग-थलग कर दिया । उसने एक कठोर धार्मिक नीति भी अपनाई जिसे राजपूतों ने पसंद नहीं किया।
महत्वपूर्ण तथ्य
- औरंगजेब को कुरान कंटस्थ होने के कारण ”हाफिज“ भी कहा गया था। औरंगजेब ने कुरान की हस्तलिखित दो प्रतियाँ मक्का और मदीना भेजा।
- पुत्र जन्म के समय हिन्दुओं से लिया जाने वाला कर समाप्त किया। इसके समय में प्रशासन में सर्वाधिक हिन्दू मनसबदार थे।
- इसने सती प्रथा को प्रतिबंधित किया तथा मनूची के अनुसार इसने वेश्याओं को शादी कर घर बसाने का आदेश दिया।
- 1669 ई. में बनारस स्थित विश्वनाथ मंदिर तथा मथुरा का केशवराय मंदिर तुड़वा दिया था।
शासनकाल का अंत
- औरंगज़ेब के शासनकाल के अंतिम वर्षों में साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। उनके बाद के कमजोर उत्तराधिकारियों के कारण मुग़ल साम्राज्य केवल नाममात्र का बना रहा। उनके शासनकाल में प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर हो गया और कई प्रांत स्वतंत्र हो गए।
- औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद, मुग़ल साम्राज्य भारत की राजनीतिक जीवन में प्रभावी शक्ति नहीं रह गया।
मुगल प्रशासन
- मुगलकालीन प्रशासन मुख्यत: अरबी, फारसी व भारतीय प्रशासन का मिला-जुला रूप था।
- मुगल प्रशासनिक मॉडल का जनक – अकबर था।
- मुगलकालीन राजस्व सिद्धान्त शरीयत पर आधारित था।
- कागज का प्रयोग प्रशासनिक कार्यों में अत्यधिक करने के कारण मुगल प्रशासन को “पेपर स्टेट” भी कहा गया है।
- आइने-अकबरी (अबुल फजल) के अनुसार बादशाह वही बनता है जो ईश्वर का प्रतिनिधित्व तथा पृथ्वी पर ईश्वर का दूत होता है। जिसमें एक साथ हजारों व्यक्तियों के गुण समाहित हो। इस सिद्धान्त को दैविय सिद्धान्त कहा जाता है।
- मुगल प्रशासन में बादशाह को सहायता देने हेतु एक मंत्रि परिषद् होती थी, जिसे विजारत कहा जाता था।
- मुगल प्रशासन ‘केन्द्रिकृत’ निरंकुश प्रशासन था, जो खलीफा की सत्ता में विश्वास नहीं करता था।
- बाबर ने 1507 ई. में मिर्जा की उपाधि का त्याग कर बादशाह (पादशाह) की उपाधि धारण की यह उपाधि धारण करने वाला यह प्रथम शासक था।
- मुगल काल से पूर्व दिल्ली सल्तनत काल के दौरान शासक सुल्तान की उपाधि धारण करते तथा वे खलीफा के अधीन रहकर शासन संचालित करते थे तथा खलीफा से जो आदेश प्राप्त करते थे जिसे “सनद” कहा जाता था।
- 1579 ई. में अकबर ने मजहर की घोषणा की। इस मजहर का अर्थ था अगर किसी धार्मिक विषय पर कोई वाद-विवाद की स्थिति प्रकट होती है तो इसमें बादशाह अकबर का फैसला सर्वोपरि होगा और यह फैसला सबको स्वीकार करना पड़ेगा।
राजस्व प्रशासन
- अकबर ने शेरशाह सूरी द्वारा प्रचलित ‘जाब्ती’ प्रणाली को बंद कर 1569 ई. में शिहाबुद्दीन अहमद की सिफारिश पर ‘कनकूत व मुक्ताई’ प्रणाली प्रारंभ की।
- अकबर ने राजा टोडरमल को गुजरात का दीवान नियुक्त किया।
- टोडरमल ने सम्पूर्ण गुजरात की कृषि योग्य भूमि का माप करवाया था तथा टोडरमल के सुझाव से ही प्रसन्न होकर 1570-71 ई. में सम्पूर्ण साम्राज्य की भूमि का माप करवाने का आदेश, कानूनगों को दिया गया।
- अकबर ने भूमि माप हेतु संघ की रस्सी के स्थान पर पहली बार ‘बाँस’ की जरीब का प्रयोग किया गया।
- आइने दरसाला:-
- 1580 ई. में इसे लागू किया गया।
- इसका उपनाम दहसाला प्रणाली, टोडरमल व्यवस्था के नाम से जाना जाता था।
- इस व्यवस्था में पिछले 10 वर्षों की उपज तथा उन 10 वर्षों के दौरान उपज के प्रचलित मूल्य का औसत निकाल कर उस पर 1/3 भाग राजस्व लिया जाता था।
- राजस्व नकद के रूप में लिया जाता था।
नोट : यह एक प्रकार से ‘रैयतवाड़ी’ व्यवस्था थी जिसे किसान सीधे-सीधे सरकार को अपना राजस्व जमा करवाते थे।
- इसमें किसानों को सुविधा भी दी जाती थी जैसे-
- किसानों को अग्रिम ऋण।
- फसल खराब हो जाने पर वसूली में छूट दी।
- टोडरमल व्यवस्था में 5 चरण होते थे-
- भूमि माप
- भूमि का वर्गीकरण
- भू राजस्व का निर्धारण
- भू राजस्व का अनाज से नकद में रूपांतरण
- भू राजस्व एकत्र करने की विधि।
- दहसाला, बटाई या गल्ला बख्श के अलावा कंकुट और नसाक प्रणालियाँ भी मौजूद थीं, जिनका प्रयोग कुछ विशेष परिस्थितियों में किया जाता था।
- बटाई/गल्ला बख्श – कटाई के बाद, फसल को बराबर ढेरों में बांट दिया जाता था, जिनमें से निर्दिष्ट ढेरों को अधिकारी ले लेते थे।
- कंकुट – उपज का अनुमान नमूना सर्वेक्षण के आधार पर निर्धारित किया गया था।
- नासक – देय राजस्व का अनुमान पिछले अनुभव के आधार पर लगाया गया था।
- ज़मींदार: वे छोटे ज़मीनदार थे जो अपनी पुश्तैनी ज़मीन रखते थे। उन्हें भूमि राजस्व इकट्ठा करने का वंशानुगत अधिकार था जो राजस्व का 25% तक हो सकता था। हालाँकि, मुगल काल में, ज़मींदार ज़मीन का मालिक नहीं था, और जब तक किसान भूमि राजस्व का भुगतान करते रहे, तब तक वह उन्हें ज़मीन से बेदखल नहीं कर सकता था।
अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य:-
- शाहजहाँ के काल में भू-राजस्व एकत्रित करने हेतु ठेकेदारी प्रथा प्रारंभ की गई जिसे ‘इजारा’ प्रणाली कहा जाता था।
- शाहजहाँ के काल में ही राज्य की 70 प्रतिशत भूमि जागीर के रूप में जागीरदारों को दे दी गई।
- शाहजहाँ के शासनकाल में ‘मुर्शिदकुली खाँ’ ने, दक्षिण में टोडरमल की भाँति राजस्व व्यवस्था लागू की, अत: इसे दक्कन का टोडरमल कहा जाता है।
भू-राजस्व प्रशासन के अधिकारी
| करोड़ी | राजस्व के मूल्यांकन और संग्रहण दोनों का प्रभारी। |
| कानूनगो | वह परगना का स्थानीय राजस्व अधिकारी था। |
| चौधरी | क्वानुंगो पर प्रति-जांच भी तकाबी ऋणों के पुनर्भुगतान की गारंटी के लिए थी। |
| पटवारी | वह गांव की भूमि, व्यक्तिगत कृषकों की जोत, उगाई जाने वाली फसलों की विविधता और परती भूमि के विवरण का रिकार्ड रखते थे। |
मिट्टी की उर्वरता के आधार पर भूमि का वर्गीकरण
| पोलाज | हर साल खेती की जाती है |
| परती | दो वर्ष में एक बार खाली छोड़ दें। |
| चचर | तीन या चार साल तक बंजर पड़े रहना |
| बंजर | पांच या उससे अधिक वर्षों तक खाली पड़े रहना। |
राजस्व संग्रह के लिए भूमि का वर्गीकरण
| जागीर | जागीरदारों, आमतौर पर कुलीनों और शाही परिवार को आवंटित किया जाता है। |
| खालसा | यह कर शाही खजाने में जाता था। |
| इनाम | विद्वान और धार्मिक पुरुषों के लिए |
जागीर के प्रकार
| जागीर तन्खा | वेतन के बदले में दिया गया |
| मशरुत जागीर | कुछ शर्तों पर दिया गया। |
| इनाम जागीर | बिना किसी बाध्यता के दिया गया; मनसब से स्वतंत्र |
| वतन जागीर | जमींदारों को उनके गृह प्रदेश में सौंपा गया |
मुगल कालीन किसान:-
मुगल कालीन किसान 3 प्रकार के होते थे-
- खुदकाश्त:- ऐसे किसान जिनकी स्वयं की भूमि होती थी तथा स्वयं के गाँव में रहकर कृषि करते थे।
- पाहीकाश्त:- स्वयं की भूमि नहीं होती थी, दूसरे गाँव में जाकर अस्थायी बटाईदार के रूप में कृषि करते थे।
- मुजारीयन:- खुदकाश्त से जमीन किराये पर लेकर खेती करते थे।
आय के अन्य स्रोत:-
- जजिया :- गैर मुसलमानों से वसूला जाने वाला कर।
- जकात :- मुसलमानों से वसूला जाने वाला कर (कुल आय का 2.5 प्रतिशत)
- खुम्स :- युद्ध की लूट में अर्जित किया गया धन लूट के माल को 20% राजा को तथा 80 प्रतिशत भाग लूटने वाली सैनिक टुकड़ी रखती थी।
- नजराना :- बादशाह को दी जाने वाली नकद भेंट इसे नजर भी कहा जाता था।
- पेशकस :- अधीनस्थ राजाओं व मनसबदारों द्वारा बादशाह को दी जाने वाली नकद भेंट।
प्रशासनिक इकाइयाँ
- केन्द्र को सूबा में विभाजित किया जाता था जिसका सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी सूबेदार/सिपहसालार/ नाजिम होता था।
| शासक | प्रांत (सुबों) की संख्या | विवरण |
| अकबर | 1580 ई. – 12 | अकबर के शासनकाल के अंतिम समय में दक्षिण अभियान बरार, खानदेश, अहमदनगर को जीतने के बाद – (15 सूबे) हो गए थे |
| जहाँगीर | 15 | जहाँगीर ने कांगड़ा (हिमाचल) को जीतने के बाद उसे लाहौर सूबे में मिला दिया |
| शाहजहाँ | 18 सूबे | |
| औरगंजेब | 20/21 | शाहजहाँ ने कशमीर, थट्टा व उड़ीसा नामक तीन नये सूबों को बनाया।औरंगजेब ने बीजापुर (1686) व गोलकुण्डा (1687) ई. में जीता इस प्रकार सूबों की संख्या – 20 |
- सूबा को सरकार (जिला) में विभाजित किया जाता था जिसका सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी – “फौजदार”।
- सरकार को परगना (तहसीलों) में विभाजित किया जाता था जिसका सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी – “शिकदार”।
- परगनों को गाँव (मौजा) में विभाजित किया जाता था जिसका प्रमुख मुकदम या चौधरी होता था।अकबर ने अपने साम्राज्य को पंद्रह सूबों में विभाजित किया था, जो औरंगजेब के शासन के दौरान बढ़कर बीस हो गये।
मनसबदारी प्रणाली और सैन्य संगठन
मनसबदारी प्रणाली
- आरम्भ अकबर ने 1575 ई. में किया।
- अकबर ने एक संगठित और केंद्रीकृत प्रशासन प्रणाली प्रदान की, जिसने साम्राज्य की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने मंसबदारी प्रणाली की शुरुआत की।
- अकबर द्वारा कुलीन वर्ग और सेना दोनों को संगठित करने के लिए शुरू की गई प्रणाली। हालाँकि, इसकी उत्पत्ति चंगेज खान द्वारा अपनाई गई दशमलव प्रणाली से जुड़ी हुई है ।
- इसमें कुलीन, नागरिक और सैन्य अधिकारी एक ही सेवा में सम्मिलित किए गए, जिन्हें मंसबदार की उपाधि दी जाती थी।
- मनसब, दरअसल फारसी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब पद, ओहदा या दर्जा होता है।
- मंसबदार की पदवी दो भागों में विभाजित थी: जात और सवार।
- जात मनसब :- यह मनसबदार का व्यक्तिगत रैंक था। इसमें उसकी वरिष्ठता एवं वेतन निर्धारित होता था। सवार मनसब :- इससे मनसबदार अपने अधीन कितने घोड़े एवं घुड़सवार रखेगा यह निर्धारित होता था।
- यह प्रथा दशमलव प्रणाली पर आधारित थी। इसकी सबसे छोटी इकाई 10 थी और सबसे बड़ी इकाई 10,000 थी।
- जहांगीर ने सवार पद में ‘दु-अस्पा’ एवं ‘सिंह अस्पा’ की व्यवस्था की।
- दु-अस्पा से तात्पर्य है एक सवार के पास दो घोड़े और सिंह-अस्पा से तात्पर्य है एक सवार के पास तीन घोड़े।
- मनसबों में वृद्धि या कटौती के आधार पर पदोन्नति और पदावनति की जाती थी।
- मनसबदारी प्रणाली ने अकबर की कुलीनता का जातीय आधार विस्तृत किया। आरंभ में उनके कुलीन वर्ग में केवल मध्य एशियाई और फारसी लोग सम्मिलित होते थे, लेकिन इस प्रणाली के लागू होने के बाद इसमें राजपूत और शेखजादा (भारतीय मुसलमान) भी शामिल हो गए।
- मनसबदार का वेतन नकद तय होता था, किंतु इसे जागीर (एक ऐसी संपत्ति जिससे वह अपने वेतन के बदले धन एकत्र कर सकता था) के रूप में दिया जाता था। यह जागीर नियमित रूप से स्थानांतरित होती रहती थी।
- मनसबदार की पदवी वंशानुगत नहीं थी। मंसबदार की मृत्यु के पश्चात, उसकी जागीर को राज्य द्वारा वापस ले लिया जाता था।
नोट – मश्रूत मनसब :- जब किसी मनसबदार को किसी शर्त के साथ अतिरिक्त मनसब दिया जाता था तो उसे मश्रुत मनसब कहा जाता था।
सैन्य प्रणाली
- सेना में दाग (घोड़ों पर दाग लगाना) और चेहरा (वर्णनात्मक रोल) प्रणाली शुरू की गई।
- मीर बख्शी सैन्य विभाग का प्रमुख था और उसके अधीन उसने कई जिम्मेदारियां संभालीं:
- कुलीन वर्ग का मुखिया माना जाता है।
- उन्होंने मनसबों की नियुक्ति और उनकी पदोन्नति की सिफारिश की।
- वह खुफिया विभाग का प्रमुख भी था । खुफिया अधिकारी ( बरीद ) और समाचार रिपोर्टर ( वाकिया नवीस ) उसे रिपोर्ट करते थे।
केंद्रीय प्रशासन और अधिकारी
- वज़ीर
- यह बादशाह के बाद सबसे शक्तिशाली पद था जिसे सैनिक व असैनिक दोनों अधिकार प्राप्त थे। अकबर के काल में वजीर को वकील कहा जाने जगा। इसे “वकील – ए – मुतलक” कहा जाता था। प्रशासन के पदानुक्रम में सर्वोच्च स्थान रखता था।
नोट –
- अकबर ने वकील के एकाधिकार को समाप्त करने हेतु उसके समस्त अधिकारों को निम्न चार लोगों में विभाजित किया :-
- दीवान – वित्त मामले
- मीर बख्शी – सैनिक मामले
- मीर-ए-सांमा – घरेलू मामले
- सद्र-उस-सुदुर – धार्मिक मामले
- दीवान-ए-कुल :- अकबर ने वकील (प्रधानमंत्री) की शक्तियों को कम करने हेतु 1565 ई. में इस पद का सृजन किया तथा इसके निम्न कार्य थे जैसे :-
- राजस्व व वित्त मामलों का प्रमुख होता था
- राजस्व नीति का निर्माण करना।
- सूब ई दीवान की नियुक्ति बादशाह द्वारा दीवान-ए-कुल की सलाह से की जाती थी।
- दीवान-ए-खालसा :- इस प्रमुख कार्य खालसा भूमि (सरकारी भूमि) की देखरेख करना।
- दीवान-ए-जागीर :- इसका प्रमुख कार्य जागीर भूमि व इनाम भूमि की देखरेख करना।
- दीवान-ए-वाकियात :- इसका प्रमुख कार्य रोजाने की आमदनी व खर्चों का लेखा-जोखा रखना।
- मुस्तौफी :- इसका प्रमुख कार्य लेखा परीक्षक (ऑडीटर जनरल) करना।
- मुसरिफ-ए-खजाना :- यह मुख्यत: खजांची होता था।
- मीर बख्शी:- यह सैनिक विभाग का प्रमुख होता था। मीर बख्शी सेनापति नहीं होता था क्योंकि सर्वोच्च सेनापति बादशाह स्वयं होता था।
- मीर बख्शी के निम्न कार्य थे:-
- सैनिकों की नियुक्ति & सैनिकों का हुलिया रखना।
- सैनिकों को रसद व हथियार आपूर्ति करना।
- युद्ध काल के दौरान सैनिकों को वेतन बांटने का कार्य।
- सेना को वेतन मीर बख्शी द्वारा “सरखत” नामक पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद ही मिलता था।
- शाही महल व यात्राओं के दौरान बादशाह की सुरक्षा का कार्य भी देखा जाता था।
- मीर-ए-सामा:
- इस पद का सृजन अकबर द्वारा किया गया, औरंगजेब के काल में इसे “खाने सामा” कहा जाने लगा।
- अकबर के काल में मीर-ए-सामा दीवान के अधीन कार्य करता था, परन्तु जहाँगीर ने इसे स्वतंत्र मंत्री का दर्जा दे दिया।
- यह घरेलू मामलों का प्रधान होता था, बादशाह तथा महल की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता था।
- राज्य के कारखानों का निरीक्षण, दीवान-ए-बयूयात व मुशर्रिफ पर नियंत्रण रखने का कार्य भी करता था
- शाही दावतों का आयोजन करवाना भी इसका प्रमुख कार्य था।
- सद्र-उस-सुदुर :- धार्मिक मामलों का प्रमुख होता था, जो बादशाह को सलाह भी देता था।
- प्रमुख कार्य :-
- दान-पुण्य की व्यवस्था करना,
- विद्वानों को कर मुक्त भूमि प्रदान करना, वजीफा देना
- धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करना व इस्लामी कानूनों का पालन करवाना।
- दान में दी गई भूमि (मदद-ए-माश) का निरीक्षण करना।
- नोट – प्रारंभिक समय में सद्र-उस-सुदूर ही काजी के रूप में कार्य करता था, परन्तु अकबर ने इन दोनों पदों को अलग कर “काजी-उल-कुजात” नामक पद का सृजन किया।
- अकबर के समय ही “अब्दुल नबी” नामक सद्र को भ्रष्टाचार के कारण पद से हटा दिया गया।
- मुगलकाल का प्रथम “सद्र-उस-सुदूर” शेख गदई था
- 1578 के बाद प्रांतों में भी सद्र की नियुक्ति की जाने लगी।
- काजी-उल-कुजात:-
- मुख्य काजी (न्यायाधीश), इसकी सहायता हेतु “मुफ्ती” नियुक्त होते थे।
- मुफ्ती की व्याख्या के आधार पर ही काजी अपने निर्णय देता था, वर्तमान वकील के समान।
- मुहतसिब:-
- इनकी नियुक्ति औरंगजेब के द्वारा की गई जो मुस्लिम वर्ग के लोगों की नैतिक चरित्र की जाँच करना था।
- इस्लाम के अनुसार आचरण करवाना मुख्य कार्य।
- औरंगजेब ने बनारस फरमान के द्वारा हिंदू मंदिरों को तोड़ने का कार्य मुहतसिबों को दिया था।
- मुगलकालीन अन्य अधिकारी:-
- बंदरगाहों के गवर्नर को मुतसद्दी कहा जाता था , जिसे सम्राट सीधे नियुक्त करता था।
| अधिकारी | विभाग/कार्य |
| 1. मीर-ए-आतिश (मीरआतिश) | शाही तोपखाने का प्रमुख |
| 2. मीर-ए-बर्र | वन विभाग का प्रमुख होता था |
| 3. मीर-ए-बहर | जल सेना का प्रमुख व शाही नौकाओं की देखरेख करने |
| 4. दरोगा-ए-डाकचौकी | डाकविभाग व गुप्तचर विभाग का प्रमुख |
| 5. मीर-ए-अर्ज | बादशाह के पास भेजे जाने वाले आवेदन पत्रों का प्रभारी |
| 6. मीर-ए-तोजक | धार्मिक उत्सवों का प्रबंध करने वाला अधिकारी |
| 7. वाकिया-नवीस | समाचार लेखक व गुप्तचर |
| 8 खुफिया नवीस | गुप्त सूचनाएँ केन्द्र (बादशाह) तक पहुँचाने का कार्य |
| 9 हरकारा | संदेश वाहक व गुप्तचर |
मुगल साम्राज्य का प्रांतीय प्रशासन
- निश्चित प्रादेशिक इकाइयों के साथ एक समान प्रांतीय प्रशासन था। हालाँकि, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कुछ छोटे-मोटे संशोधन भी किए गए।
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सूबा/प्रांत 152792_3de4e2-6a> |
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सरकार/जिला 152792_b3a068-e3> |
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परगना 152792_5878f5-83> |
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ग्राम/गांव 152792_e3eb3f-9b> |
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मुग़ल काल में आये विदेश यात्री
- राल्फ फिच (1583-91 ई.) यह अकबर के समय में पहुँचने वाला अंग्रेज यात्री था। इसने फतेहपुर सीकरी एवं आगरा की तुलना लंदन से की है।
- कैप्टन हाकिन्स (1608-11 ई.) यह ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रतिनिधि के रूप में जहाँगीर के दरबार में पहुँचा।
- सर टामस रो (1615-18 ई.) ब्रिटिश सम्राट जेम्स 1 के राजदूत के रूप में जहाँगीर के दरबार में आया था।
- पित्रो-डेलावले (1623-26 ई.): इटालवी यात्री 1623 ई. में सूरत पहुँचा था। इस समय जहाँगीर शासक था।
- पीटर मुंडी (1630-34 ई.): यह इटालवी यात्री शाहजहाँ के शासनकाल में भारत की यात्रा की।
- ट्रैवर्नियर : यह इटालवी यात्री 1638-63 ई. के बीच भारत की छह बार यात्रा की। हीरा के व्यापारी होने के कारण हीरा व्यापार के बारे में इसका विवरण महत्वपूर्ण है।
- मनूची (1653-1708 ई.) यह इटालवी यात्री यहाँ आकर शाहजहाँ के अन्तर्गत दाराशिकोह की सेना में तोपची की नौकरी कर ली। बाद में चिकित्सक का पेशा अपनाया।
- बर्नियर (1656-1707 ई.): शाहजहाँ के समय में भारत आया शाहजहाँ के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार के युद्धों का वर्णन किया है।
मुग़ल काल समाज एवं अन्य आयाम
- अपनी बहुमुखी सांस्कृतिक गतिविधियों के कारण मुगल काल को द्वितीय स्वर्ण युग की संज्ञा दी गयी है। गुप्तयुग को प्रथम स्वर्ण युग कहा गया है।
मुगल साम्राज्य का आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव
मुगल अर्थव्यवस्था
- मुगल काल तक भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत थी।
- 1700 तक, विश्व सकल घरेलू उत्पाद में भारत का हिस्सा 24% था, जो दुनिया में सबसे बड़ा था, किसी भी अन्य क्षेत्र से अधिक। तब, 18वीं शताब्दी तक भारत दुनिया के औद्योगिक उत्पादन का लगभग 25% उत्पादन कर रहा था।
कृषि
- मुगलों के समय में, बड़े पैमाने पर भूमि को कृषि के अंतर्गत लाया गया, यह प्रक्रिया औरंगजेब तक जारी रही। इससे अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ और साम्राज्य को राजस्व प्राप्त हुआ।
- विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती थीं
- जैसे: गेहूं, चावल, चना, जौ, दालें, बाजरा आदि खाद्यान्नों की खेती व कपास, गन्ना, तिलहन, नील और चाय (लाल रंग) जैसी नकदी फसलें भी उगाई जाती थीं।
- अमेरिकी मूल की फसलें: सत्रहवीं शताब्दी में दो नई फसलें जोड़ी गईं, मक्का और तम्बाकू।
- बंगाल में रेशम की खेती इतनी व्यापक हो गई कि चीन से आयात करने की आवश्यकता ही नहीं रही।
- भारत कुछ पड़ोसी देशों को चावल और चीनी जैसे कृषि उत्पाद भी निर्यात करता था।
- राज्य ने खेती के विस्तार और सुधार के लिए किसानों को प्रोत्साहन और कृषि ऋण (तकावी) भी प्रदान किया।
मुगलकालीन उद्योग:-
- सूती वस्त्र उद्योग मुगलकाल का सबसे प्रमुख उद्योग था।
- सर्वाधिक निर्यात सूती वस्त्र का किया जाता था।
- सूती वस्त्र को कैलिको, रेशमी वस्त्र को पटौला कहा जाता था।
- रेशमी वस्त्र के मुख्य केन्द्र- ढाका, आगरा, कश्मीर, लाहौर, दिल्ली थे।
- ढाका की मलमल विश्व प्रसिद्ध थी।
- जहाँगीर ने अमृतसर में सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना की।
- जहाँगीर के काल में 1605 ई. में पुर्तगाली लोग तम्बाकू को भारत लेकर आए तथा तम्बाकू खेती प्रारंभ की गई।
व्यापार
- बंगाल से चीनी, चावल, नाजुक मलमल और रेशम का निर्यात किया जाता था।
- कोरोमंडल तट कपड़ा उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था, और लाहौर हस्तशिल्प उत्पादन का केंद्र था।
- हुंडी एक ऋण पत्र है जिसका उपयोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक धन के आसान हस्तांतरण के लिए किया जाता है।
- नगरसेठ व्यापारी वर्ग का नेता था जो अधिकारियों से उनकी ओर से मध्यस्थता करता था। हम व्यापारियों द्वारा अपनी बात कहने के लिए हड़ताल करने के बारे में भी सुनते हैं।
- सत्रहवीं शताब्दी के दौरान विदेशी व्यापार भी फला-फूला, जिसके परिणामस्वरूप देश में चांदी और सोने के आयात में वृद्धि हुई।
साम्राज्य में राजनीतिक एकीकरण और कानून एवं व्यवस्था की स्थापना ने सत्रहवीं शताब्दी के दौरान व्यापार और वाणिज्य को विस्तारित करने में मदद की।
मुगल मुद्रा
- तीन धातुओं, तांबा, चांदी और सोने के सिक्के ढाले गए। हालाँकि, चांदी का सिक्का मुद्रा का आधार था।
- अकबर ने शेरशाह सूरी द्वारा शुरू की गई चांदी की मुद्रा रुपया को जारी रखा। यह व्यापार और राजस्व लेनदेन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला मुख्य सिक्का था।
- इस काल में अशरफी या मुहर नामक सोने का सिक्का जारी किया गया था। हालाँकि, यह मुख्य रूप से संचय और उपहार देने के उद्देश्य से जारी किया गया था।
- दाम , एक तांबे का सिक्का, साम्राज्य में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला सिक्का था।
- तटीय क्षेत्रों में समुद्री शंख या कौरियों का उपयोग छोटे-मोटे लेन-देन के लिए भी किया जाता था।
बाबर के सिक्के:-
- बाबर ने काबुल में शाहरुख नामक चाँदी का सिक्का चलाया व कन्धार में बाबरी नामक चाँदी का सिक्का चलाया।
अकबर के सिक्के:–
- मुगलकालीन अर्थव्यवस्था को सुव्यवस्थित करने का श्रेय अकबर को जाता है।
- अकबर ने 1577 ई. में दिल्ली में एक टकसाल की स्थापना करवाई तथा इसका अध्यक्ष ‘ख्वाजा अब्बदुसम्मद’ को नियुक्त किया।
सोने के सिक्के
| मुहर | मुगलकाल के समय सबसे ज्यादा प्रचलित। सोने का सिक्का था जिसका मूल्य 9 रुपये के बराबर था तथा वजन 169 ग्रेन (लगभग 13.30 ग्राम) था। | |
| इलाही | सोने का गोल सिक्का, मूल्य 10 रुपये के बराबर। | |
| शंसब | अकबर द्वारा प्रचलित सिक्कों में सबसे बड़ा सिक्का।इसका उपयोग बड़े लेन-देनों में किया जाता था।इस सिक्के का मूल्य 101 तौला के बराबर होता था। | |
| चाँदी के सिक्के – जलाली | ||
| ताँबे के सिक्के – दाम | ||
| अन्य सिक्के | ||
| दरब | 50 पैसे का सिक्का | |
| चर्न | 25 पैसे का सिक्का | |
| पनडाऊ | 20 पैसे का सिक्का | |
नोट –
- अकबर ने अपने शासन काल के 50वें वर्ष में 1605 ई. में चाँदी ‘राम-सिया’ प्रकार का सिक्का चलाया था। जिस पर भगवान श्री राम व माता सीता की मूर्ति का अंकन करवाया तथा इस पर देवनागरी लिपि में राम-सिया उत्कीर्ण करवाया।
- अकबर एकमात्र ऐसा शासक माना जाता है जिसने सूर्य व चन्द्रमा के श्लोक भी अपने सिक्कों पर उपलब्ध करवाया।
- अकबर के सिक्कों पर ‘अल्लाहो अकबर’ व ‘जिले-जलाल हूँ’ का अंकन मिलता है।
जहाँगीर के सिक्के:-
- निसार – चाँदी का सिक्का जो रुपये का चौथा भाग होता था।
- खैर-ए-काबुल – यह सोने का सिक्का होता था।
- सोने के सिक्के – नुरेअफ्शा, नूरशाही, नूर सल्तानी, नूर दौलत, नूर करम, नूर मिहिर।
शाहजहाँ –
- शाहजहाँ ने रुपया व दाम के मध्य ‘आना’ नामक एक नवीन सिक्का चलाया।
औरंगजेब:-
- औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना बंद कर दिया तथा मुगल काल में सर्वाधिक सिक्के औरंगजेब के काल में ढाले गए।
- जीतल का प्रयोग केवल हिसाब-किताब रखने में ही किया जाता था। इसे फूलूस या पैसा भी कहा जाता था।
माप-तौल इकाई :-
- अकबर ने पहले से प्रचलित ‘सिकन्दरी गज’ के स्थान पर इलाही गज प्रचलित करवाया था।
- इलाही गज :-
- यह 41 अंगुल या 33.5 इंच का होता था।
- दक्षिण भारत में ‘कोवाड़’ नामक इकाई का प्रयोग किया गया।
- गोवा में ‘फैण्डी’ नामक इकाई का प्रयोग किया गया।
नोट:- अरब व्यापारियों द्वारा समुद्री तटों पर ‘बहार’ नामक इकाई का प्रयोग किया जाता था।
मुगलकालीन गाँव व भूमि के अन्य प्रकार:-
- गैर अमली क्षेत्र:-ऐेसे क्षेत्र जो मुगल राजस्व व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आते थे, परन्तु वहाँ के राजा राजस्व एकत्रित कर बादशाह को नजराना प्रस्तुत करते थे।
- नानकर व बंथ:- कर मुक्त भूमि, जो जमींदारों का प्रदान की जाती थी। इस पर किसी भी प्रकार का राजस्व नहीं लिया जाता था।
- मालिकान:- जब राज्य जमीनदार की सहायता के बिना सीधे राजस्व वसूल लेते थे तथा कुल उपज का 10वाँ भाग जमीनदार को देते थे उस भूमि को मालिकान कहा जाता था।
गाँवों के प्रकार :-
- असली ग्राम:- सबसे प्राचीन व पूर्ण रूप से बसा हुआ गाँव।
- दाखिली ग्राम:- नव निर्मित ग्राम।
- एम्मा ग्राम:- ऐसे गाँव जिन्हें राज्य की तरफ से मुफ्त अनुदान दिए जाते थे।
- रैती ग्राम:- ऐसे गाँव जो जमींदारों के क्षेत्र से बाहर थे।
- जमींदारी ग्राम:- जमींदार द्वारा नियंत्रित ग्राम को जमींदारी ग्राम कहते थे। जमींदारों को देशमुख, पाटिल व नायक कहा जाता था। जमींदारी वंशानुगत होती थी।
- जागीरदारी ग्राम:- मनसबदारों को नकद वेतन के बदले दी जाने वाली भूमि को जागीरदारी ग्राम कहते थे। यह वंशानुगत नहीं होते थे। एक जागीरदार के पास यह जागीर के रूप में 4 वर्ष तक अधीन रहता था।
- मदद-ए-मास:- सदर-उस-सुदूर द्वारा धार्मिक अनुदान हेतु दी गई भूमि जो कि विद्वानों, धार्मिक गुरुओं, अनाथ, अपाहिज, गरीब, विधवा इत्यादि लोगों को दी जाती थी इसे मिल्क व सयूरगल भूमि भी कहा जाता था।
- अकबर ने सिख गुरु रामदास को 500 बीघा भूमि दान में दी तथा तीसरे सिख गुरु अमरदास की पुत्री को भी कई गाँवों की जागीर प्रदान की थी।
- वल्लाभचार्य के पुत्र विट्ठल नाथ को जैतपुरा व गोकुला की जागीर।
- वक्फ भूमि:- धार्मिक संस्थान हेतु अनुदानित भूमि को वक्फ भूमि कहा जाता था।
- अलतमगा भूमि:- यह जहाँगीर द्वारा प्रारम्भ की गई थी। यह भूमि विशेष कृपा प्राप्त धार्मिक व्यक्तियों को प्रदान की जाती थी।
- खालसा भूमि:- सरकारी भूमि जिसका राजस्व सीधे शाही खजाने में जमा होता था। राजस्व की कुल भूमि का 20 प्रतिशत भाग खालसा भूमि होना अनिवार्य था। अकबर के काल में खालसा भूमि सर्वाधिक थी। जहाँगीर के काल में सबसे कम थी।
मुगल कालीन कृषि:-
- मुगलकालीन कृषि का उल्लेख अबुल फजल ने आईने-अकबरी में किया है।
- मुख्य फसलें गेहूँ, बाजरा, चावल, दाल, तिलहन
- नील की खेती, कपास, गन्ना, अफीम यह नगदी फसलें थी।
- नील की खेती बयाना (भरतपुर) व गुजरात के सरखेज नामक स्थान पर होती थी।
मुगल समाज
- विदेशी यात्रियों के विवरण से पता चलता है कि गांवों में बहुत अधिक असमानता थी। भूमिहीन किसान या मजदूर प्रायः अछूत या ‘कामिन’ जाति के होते थे ।
- खुदकाश्त या ज़मीन के मालिक अक्सर एक ही प्रभावशाली जाति या वर्ग से जुड़े होते थे और ‘कमीनों’ का शोषण करते थे। बदले में, वे खुद ज़मींदारों द्वारा शोषित होते थे ।
- शहरों में, बड़ा वर्ग कारीगरों, सैनिकों, मैनुअल श्रमिकों आदि से बना था।
- मुगल कुलीन वर्ग सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग था।
- प्रारंभ में, मुगल कुलीन वर्ग का बड़ा हिस्सा मुगल मातृभूमि जैसे उज्बेकिस्तान, ईरान और पड़ोसी क्षेत्रों से आया था।
- अकबर के शासनकाल के दौरान हिंदुओं को भी नियमित रूप से शामिल किया जाने लगा।
मुगल काल के दौरान संगीत
- शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीत, जिसकी शुरुआत नाट्य शास्त्र से हुई थी, ने मुगल काल में अपना वर्तमान स्वरूप लेना शुरू किया।
- ग्वालियर के तानसेन को कई नए रागों की रचना का श्रेय दिया जाता है। अकबर ने उन्हें संरक्षण दिया था।
- संगीत एक और सांस्कृतिक शाखा है जहाँ हम हिंदू और इस्लामी तत्वों का मिश्रण देखते हैं। यह संगीत की कव्वाली और ख़याल शैलियों के साथ मिश्रित है।
- हालाँकि, औरंगजेब के लंबे शासनकाल के दौरान मुगल दरबार में गायन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन उसके शासनकाल के दौरान रानियों, राजकुमारों और रईसों द्वारा इसे संरक्षण दिया जाता रहा।
- मुहम्मद शाह रंगीला (1719-48) संगीत और संगीतकारों के महान संरक्षक थे। रंगीला के शासनकाल के दौरान, संगीत के क्षेत्र में कुछ सबसे महत्वपूर्ण विकास हुए।
- बाद के मुगल काल में तबला लोकप्रिय हो गया।
सांस्कृतिक एवं धार्मिक विकास
धर्म
- इस काल में भक्ति आन्दोलन भी फलता-फूलता रहा ।
- पंजाब में सिख आंदोलन उभर रहा था। इस दौरान पांचवें गुरु अर्जुन दास ने आदि ग्रंथ या ग्रंथ साहिब का संकलन पूरा किया।
- दाराशिकोह ने गीता का फारसी में अनुवाद करवाया। यह भी घोषणा की कि वेद पवित्र कुरान के अनुरूप हैं।
- गुजरात में जन्मे दादू ने गैर-सांप्रदायिक ( निपकजी ) मार्ग का प्रचार किया तथा अपनी पहचान न तो हिंदू से और न ही मुसलमान से रखी। तुकाराम महाराष्ट्र में भक्ति के उदार विचारों का प्रसार कर रहे थे।
- बंगाल के नवद्वीप (नादिया) के रघुनंदन ने रूढ़िवादी हिंदुओं के विचारों को प्रतिनिधित्व किया।
- मुसलमानों में तौहीद (सृष्टि का ईश्वर के साथ एकीकरण) का चलन कई सूफी संतों के समर्थन से तेजी से जारी रहा। हालांकि, नक्शबंदी स्कूल के शेख अहमद सरहिंदी जैसे पुनरुत्थानवादी आंदोलनों ने इसका विरोध किया।
