सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन: आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत 19वीं शताब्दी में भारत में अनेक सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का उदय हुआ, जिनका उद्देश्य समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों को दूर करना था। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे सुधारकों ने शिक्षा, महिला अधिकारों और सामाजिक समता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन
सुधार की इच्छा उत्पन्न करने वाले कारक
- ब्रिटिश शासन का प्रभाव
- ब्रिटिश विजय पूर्ववर्ती आक्रमणों से भिन्न थी—ब्रिटिश शासक सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं वैचारिक रूप से भारतीय समाज से अलग रहे और अपनी विचारधारा के प्रसार का प्रयास किया।
- ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की कमजोरियों को उजागर किया, जिससे आत्ममंथन की प्रक्रिया आरंभ हुई।
- राष्ट्रवाद के उदय ने सुधार आंदोलनों को और अधिक प्रोत्साहन दिया।
- सुधार आंदोलन मुख्यतः अंग्रेजी-शिक्षित मध्यम वर्ग—वकील, शिक्षक, पत्रकार, चिकित्सक तथा सरकारी कर्मचारी—द्वारा संचालित किए गए। (मध्यमवर्गीय आधार)
- पश्चिमी विचारों के प्रसार के विरोध में लोगों में अपनी परंपराओं को बचाने और फिर से अपनाने की भावना विकसित हुई।
- अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से तर्कवाद, सार्वभौमिकता, मानवतावाद, धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण तथा परंपराओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि का विकास हुआ।
सुधार के लिए अनुकूल सामाजिक परिस्थितियाँ
- धार्मिक एवं सामाजिक कुरीतियाँ
- हिंदू धर्म में अंधविश्वास, पुरोहितवाद, मूर्ति-पूजा तथा बहुदेववाद का प्रभुत्व था।
- महिलाओं की दयनीय स्थिति
- स्त्री-भ्रूण हत्या, बाल विवाह, बहुविवाह, कुलीन प्रथा, पर्दा प्रथा तथा सती प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित थी; विधवाओं का जीवन अत्यंत कष्टदायक था।
- महिलाओं को शिक्षा, संपत्ति पर अधिकार तथा वैवाहिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।
- जाति व्यवस्था की समस्या
- समाज में अलगाव, ऊँच-नीच तथा अस्पृश्यता व्याप्त थी।
- अन्य धर्मों—(मुस्लिम, ईसाई एवं सिक्ख)में भी अस्पृश्यता की प्रथा पाई जाती थी।
- दो धाराएं—
- सुधारवादी आंदोलन: ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ़ आंदोलन।
- पुनरुत्थानवादी आंदोलन: आर्य समाज, देवबंद आंदोलन।
सामाजिक सुधार के उद्देश्य
- दो मुख्य लक्ष्य—
- महिलाओं की स्थिति में सुधार।
- जातिगत भेदभाव एवं अस्पृश्यता का उन्मूलन।
महिलाओं के लिए प्रमुख विधायी कदम
- सती प्रथा का उन्मूलन (1829)
- राजा राममोहन राय के प्रयासों से यह संभव हुआ।
- (गवर्नर जनरल—लॉर्ड बेंटिक)
- रेगुलेशन XVII (1829) द्वारा सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया; 1830 तक इसे सभी प्रेसीडेंसियों में लागू कर दिया गया।
- स्त्री-भ्रूण हत्या की रोकथाम
- बंगाल रेगुलेशंस (1795, 1804)।
- 1870 का अधिनियम—जन्मों का अनिवार्य पंजीकरण तथा उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निगरानी की व्यवस्था।
- विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता (1856)
- मुख्यतः ईश्वर चंद्र विद्यासागर के प्रयासों से।
- हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित हुआ।
- समर्थन:—विष्णु शास्त्री पंडित, करसोनदास मुलजी, डी.के. कर्वे, वीरेसलिंगम पंतुलु, ज्योतिबा फुले एवं सावित्रीबाई फुले।
- बाल विवाह पर नियंत्रण
- नागरिक विवाह अधिनियम (1872): धार्मिक छूट के कारण सीमित प्रभाव।
- सहमति आयु अधिनियम (1891): लड़कियों के लिए न्यूनतम आयु = 12 वर्ष। बी.एम. मालाबारी के प्रयास
- रुखमाबाई प्रकरण (1884)—एक निर्णायक मोड़→बाल विवाह की अन्यायपूर्ण प्रकृति उजागर हुई।
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 1929 (शारदा एक्ट)—विवाह की आयु निर्धारित: लड़के 18 वर्ष, लड़कियाँ 14 वर्ष।
महिला शिक्षा
- ईसाई मिशनरियों ने सबसे पहले पहल की—कलकत्ता फीमेल जुवेनाइल सोसाइटी (1819) की स्थापना की गई।
- बेथ्यून स्कूल (1849)—लड़कियों का पहला प्रमुख विद्यालय; ईश्वर चंद्र विद्यासागर से जुड़ा हुआ।
- बंगाल में—विद्यासागर 35 से अधिक बालिका विद्यालयों से संबंधित थे।
- महाराष्ट्र में—जगन्नाथ शंकरसेठ और भाऊ दाजी ने बालिका शिक्षा का समर्थन किया।
- ज्योतिबा फुले एवं सावित्रीबाई फुले
- पुणे में पहला बालिका विद्यालय खोला (1848)।
- सावित्रीबाई फुले—आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका।
- पारसी समुदाय – एलेक्जेंड्रा गर्ल्स सोसायटी (1863)।
- कॉर्नेलिया सोराबजी—बॉम्बे विश्वविद्यालय की पहली महिला स्नातक बनीं।
- सरकारी पहल:
- डलहौजी ने महिला शिक्षा का समर्थन किया।
- वुड्स डिस्पैच (1854) में महिला शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया।
- महिला चिकित्सा सेवा (1914)।
- कर्वे की इंडियन विमेंस यूनिवर्सिटी (1916)।
- लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज (1916)।
- महिलाएँ राष्ट्रीय आंदोलनों—स्वदेशी, होम रूल, असहयोग तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन—में सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं।
- सरोजिनी नायडू 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनी तथा बाद में संयुक्त प्रांत की राज्यपाल (1947–49) रही।
महिला संगठन
- भारत स्त्री महामंडल (1910)-
- सरला देवी।
- उद्देश्य—शिक्षा का प्रसार, पर्दा प्रथा का विरोध तथा महिलाओं का उत्थान।
- स्थापना—इलाहाबाद।
- यह भारत का पहला अखिल भारतीय महिला संगठन था।
- लेडीज़ सोशल कॉन्फ्रेंस (भारत महिला परिषद) (1904)-
- स्थापना—बॉम्बे।
- रमाबाई रानाडे
- आर्य महिला समाज (1882)-
- पंडिता रमाबाई।
- स्थापना—पुणे।
- उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा आयोग के समक्ष भारतीय महिलाओं के लिए शिक्षा पाठ्यक्रम में सुधार की मांग रखी, जिसे महारानी विक्टोरिया को भेजा गया।
- इसके परिणामस्वरूप महिलाओं के लिए चिकित्सा शिक्षा की शुरुआत हुई, जो लेडी डफरिन कॉलेज में आरंभ की गई।
- नेशनल काउंसिल ऑफ वीमेन इन इंडिया (1925)-
- मुख्य रूप से अभिजात वर्ग की परोपकारी संस्था; सुधारों का समर्थन किया।
- लेडी मेहरबाई टाटा से संबंधित।
- यह इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ वीमेन की भारतीय शाखा थी।
- ऑल इंडिया वुमन कॉन्फ्रेंस (1927)-
- स्थापना—पुणे, फर्ग्युसन कॉलेज।
- अध्यक्ष—महारानी चिमनाबाई साहेब (बड़ौदा के गायकवाड़)।
- प्रमुख नेता—सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, महारानी चिमनाबाई, लेडी दोराब टाटा, मार्गरेट कजिन्स।
- इस संगठन ने शारदा अधिनियम तथा हिंदू कोड विधेयकों जैसे प्रमुख कानूनों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई।
जाति-आधारित उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष
जातिगत असमानता को कम करने वाले कारक
- ब्रिटिश शासन का प्रभाव
- निजी संपत्ति की व्यवस्था तथा सामाजिक गतिशीलता ने कठोर जातिगत नियंत्रणों को कमजोर किया।
- कानून के समक्ष समानता ने जाति पदानुक्रम को कमजोर किया।
- अंग्रेजी शिक्षा ने नए अवसरों के द्वार खोले।
- शहरीकरण की प्रक्रिया ने पारंपरिक सामाजिक बाधाओं को कमजोर किया।
- सामाजिक सुधार आंदोलन
- ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी तथा रामकृष्ण मिशन ने अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष किया।
- इन आंदोलनों ने वंशानुगत जातिगत विशेषाधिकार और कर्म सिद्धांत की आलोचना की।
- आर्य समाज ने निम्न जातियों के शास्त्र अध्ययन के अधिकार का समर्थन किया।
- राष्ट्रीय आंदोलन
- समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों से प्रेरित था।
- जन-आंदोलनों में संयुक्त संघर्ष के कारण जातिगत भेदभाव कमजोर पड़ा।
- कांग्रेस मंत्रिमंडलों (1937) ने हरिजनों के लिए निःशुल्क शिक्षा जैसे उपाय किए।
- त्रावणकोर, इंदौर और देवास में मंदिर-प्रवेश आंदोलन चलाए गए।
- गांधी → हरिजन आंदोलन; अखिल भारतीय हरिजन संघ की स्थापना (1932)।
- निम्न जातियों में जागृति
- ज्योतिबा फुले—निम्न जातियों के लिए शिक्षा पर बल दिया तथा ब्राह्मण प्रभुत्व की आलोचना की।
- गोपाल बाबा वलंगकर ने ज्योतिबा फुले के आर्य आक्रमण सिद्धांत को आगे बढ़ाया और तर्क दिया कि—भारत के मूल निवासी अस्पृश्य थे, तथा
- आक्रमणकारी आर्यों ने स्वदेशी लोगों पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए जाति व्यवस्था थोप दी।
- उन्होंने अनार्य दोष-परिहार मंडली (गैर-आर्यों में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन हेतु) की स्थापना की।
- वे पहले दलित थे जिन्होंने ‘वाइटल विध्वंसक’ नामक समाचार पत्र प्रारंभ किया।
- किसन फागुजी बंसोड़—हिंदू धर्म के भीतर रहकर सुधार और उत्थान के पक्षधर थे।
अंबेडकर और दलित आंदोलन
- डॉ. भीमराव अंबेडकर (1891–1956 ई.) का जन्म महू में हुआ।
- एल्फिन्स्टन कॉलेज, मुंबई से स्नातक होने के बाद उन्होंने बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ की प्रेरणा और सहायता से अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।

- अंबेडकर ने 1920 ई. में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास फेडरेशन की स्थापना की।
- 1924 ई. में उन्होंने बॉम्बे में बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया।
- 1927 ई. में उन्होंने मराठी पाक्षिक पत्रिका ‘बहिष्कृत भारत’ का संपादन किया।
- जून 1928 में उन्होंने समाचार पत्र ‘समता’ प्रारंभ किया।
- 1930 ई. में उन्होंने ‘जनता’ (द पीपल ) नामक समाचार पत्र शुरू किया।
- 1927 ई. में समता समाज संघ की स्थापना की गई। 1930 ई. में अंबेडकर ने राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया और अस्पृश्यों के लिए पृथक मताधिकार की मांग की। अंबेडकर के अनुसार दलितों के उत्थान के लिए राजनीतिक शक्ति आवश्यक थी।
- उन्होंने लंदन में आयोजित तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930–32 ई.) में भाग लिया।
- वे इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के संस्थापक थे।
- प्रमुख कृतियाँ-
- एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट।
- रिवॉल्यूशन एंड काउंटर रिवॉल्यूशन इन अन्सिएंट इंडिया।
- द बुद्धा एंड हिज धम्म।
- समाचार पत्र: मूकनायक (1920), बहिष्कृत भारत (1927)
- उन्होंने महाड़ सत्याग्रह (1927) का नेतृत्व किया तथा मनुस्मृति का दहन किया।
- नासिक स्थित कालाराम मंदिर से डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने मंदिर-प्रवेश के लिए सत्याग्रह प्रारंभ किया।
- 1942 में उन्होंने शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की स्थापना एक अखिल भारतीय पार्टी के रूप में की।
- 1956 में उन्होंने प्रबुद्ध भारत की शुरुआत की, जो अंबेडकर का अंतिम समाचार पत्र था।
- 1956 में अंबेडकर ने अपने अनुयायियों सहित हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म ग्रहण किया।
- 1917 में पहली बार कांग्रेस ने अपने कार्यसूची में दलित सुधार को शामिल किया और अस्पृश्यता के विरोध में प्रस्ताव पारित किया।
- 1918 ई. में बम्बई में पहला अखिल भारतीय दलित वर्ग सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें पहली बार अखिल भारतीय अस्पृश्यता-विरोधी घोषणा जारी की गई।
- यह सम्मेलन डिप्रेस्ड क्लास मिशन सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित किया गया था, जिसकी स्थापना बड़ौदा के महाराजा विठ्ठल गायकवाड़ ने की थी।
- बी. आर. आंबेडकर ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
- 1900 के दशक के प्रारंभ में कोल्हापुर के महाराजा ने उभरते गैर-ब्राह्मण आंदोलन का समर्थन किया, जो दक्षिण भारत में फैल गया।
- 1920 के दशक में दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मणों ने आत्मसम्मान आंदोलन संगठित किया, जिसका नेतृत्व ई. वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) ने किया।
- इस आंदोलन का एक प्रमुख उद्देश्य निम्न जातियों के लिए मंदिर-प्रवेश अधिकार था।
- केरल में श्री नारायण गुरु ने जाति-आधारित उत्पीड़न के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया।
- उनके शिष्य सहोदरन अय्यप्पन ने इसे संशोधित कर यह कर दिया: ‘मानवता के लिए न कोई धर्म, न कोई जाति और न ही कोई ईश्वर’।
- शिक्षा –
- न्यू इंग्लिश स्कूल (1880)।
- फर्ग्युसन कॉलेज (1885)।
- डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी (1884)—तिलक, गोपाल गणेश आगरकर तथा विष्णुशास्त्री चिपळूणकर इससे जुड़े थे।
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल / रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल
- जनवरी 1784 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी सर विलियम जोन्स ने भारतीय भाषाओं और शास्त्रों के अध्ययन के लिए कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना की।
- इस संस्था ने प्राचीन भारतीय इतिहास और सभ्यता की खोज तथा उनके व्यवस्थित अध्ययन में अग्रणी भूमिका निभाई।
- विलियम जोन्स ने 1789 ई. में ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अनुवाद किया; यह एशियाटिक सोसाइटी द्वारा प्राप्त किसी यूरोपीय भाषा में अनूदित पहली पुस्तक थी।
- 1794 ई. में विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का अनुवाद ‘इंस्टीट्यूट ऑफ हिंदू लॉ’ नाम से प्रकाशित किया।
- मनुस्मृति का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद नाथनियल हलहेड ने 1776 ई. में “ए कोड ऑफ जेन्टू लाॅज” नाम से किया।
- विलियम जोन्स ने 1792 ई. में ‘गीत गोविंद’ का अनुवाद किया।
- विल्किंस ने ‘गीता’ का अनुवाद किया।
सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आंदोलन : नेता एवं संगठन
बंगाल –

राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज
- “भारतीय पुनर्जागरण के जनक” के रूप में जाने जाते हैं। वे एकेश्वरवाद, तर्कवाद, मानवीय गरिमा और सामाजिक समानता के समर्थक थे।
- उन्होंने आत्मीय सभा (1814) तथा ब्रह्म सभा/ब्रह्म समाज (1828) की स्थापना की।
- उन्होंने ‘तुहफत-उल-मुवाहिदीन’ (एकेश्वरवादियों के लिए उपहार) की रचना की तथा वेदों और उपनिषदों का अनुवाद कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि प्राचीन ग्रंथों में एकेश्वरवाद की अवधारणा मौजूद है।
- उन्होंने ‘द प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस: द गाइड टू पीस एंड हैप्पीनेस’ (1820) में ईसाई कर्मकांडों की आलोचना की और ईसा मसीह को ईश्वर का अवतार मानने से इनकार किया।
- उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ तथा फ़ारसी साप्ताहिक ‘मिरात-उल-अख़बार’ नामक समाचार पत्रों की स्थापना की।
- उन्होंने सती प्रथा, बहुविवाह और बाल विवाह का विरोध किया तथा महिलाओं के संपत्ति में अधिकार का समर्थन किया।
- उन्होंने हिंदू कॉलेज (1817) और वेदांत कॉलेज (1825) की स्थापना में योगदान दिया।
- वे भारतीय पत्रकारिता के अग्रदूत थे और प्रेस की स्वतंत्रता के समर्थक थे।
- उन्होंने ज़मींदारी उत्पीड़न की आलोचना की।
- उन्होंने सेवाओं के भारतीयकरण तथा न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्करण का समर्थन किया।
- वे उदार मानवतावादी राष्ट्रवाद के समर्थक थे।
- उनका निधन 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल में हुआ।
देबेंद्रनाथ टैगोर
- ब्रह्म समाज को पुनर्जीवित किया (1842 में शामिल हुए)।
- तत्वबोधिनी सभा का नेतृत्व किया → भारतीय धर्मग्रंथों का तर्कसंगत अध्ययन।
- हिंदू धर्म पर ईसाई मिशनरियों के आक्रमणों का विरोध किया।

केशव चंद्र सेन

- उन्होंने ब्रह्म समाज का पूरे भारत में विस्तार किया।; सर्वधर्म समभाव, अंतर-धार्मिक विचारों तथा अंतर-जातीय विवाह का समर्थन किया।
- समाचार पत्र-‘इंडियन मिरर’
- महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए इंडियन रिफार्म एसोसिएशन की स्थापना की।
- देबेंद्रनाथ के साथ मतभेद → विभाजन (1866):
- ब्रह्म समाज ऑफ इंडिया (केशव)
- आदि ब्रह्म समाज (देबेंद्रनाथ)
- केशव द्वारा अपनी नाबालिग बेटी की शादी के बाद दूसरा विभाजन (1878) → साधारण ब्रह्म समाज का गठन।
- साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना 1878 में आनंद मोहन घोष और शिवचंद्र देब ने की थी।
- नव विधान एक नया और सार्वभौमिक धर्म था, जिसकी स्थापना 1881 में ब्रह्म समाज से अलग होने के बाद केशव चंद्र सेन ने की।
धर्मसभा (1830) – राधाकांत देव।
- रूढ़िवादी हिंदू संगठन; सती प्रथा के उन्मूलन का विरोध किया।
- ब्रह्म समाज का भी विरोध किया।
- यंग बंगाल आंदोलन (1820 – 1830)
- हेनरी विवियन डेरोजियो
- स्वतंत्र चिंतन, तर्कवाद, समानता, मानवतावाद और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया।
- जन-आधार के अभाव के कारण इसका प्रभाव सीमित रहा, लेकिन बौद्धिक दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था।
- सोसाइटी फॉर द एक्विज़िशन ऑफ जनरल नॉलेज।
- बंगाल स्पेक्टेटर समाचार पत्र।
- ईश्वर चंद्र विद्यासागर
- विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का नेतृत्व किया → इसे कानूनी मान्यता मिली।
- बाल विवाह और बहुविवाह के विरुद्ध कार्य किया।
- महिला शिक्षा के अग्रदूत ; बेथ्यून स्कूल की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका; 35 बालिका विद्यालयों की स्थापना की।
- रामकृष्ण आंदोलन एवं स्वामी विवेकानंद
- रामकृष्ण परमहंस (1836–1886)
- उन्होंने सभी धर्मों की एकता पर बल दिया—“जितने मत, उतने मार्ग।”
- मानव सेवा को ईश्वर की सेवा के समान माना।
स्वामी विवेकानंद

- नव-हिंदूवाद तथा व्यावहारिक वेदांत का प्रचार किया।
- गरीबों के उत्थान, हिंदू धर्म की एकता तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समर्थक थे।
- शिकागो में विश्व धर्म संसद (1893) में प्रसिद्ध भाषण।
- शिकागो जाने से पहले उन्होंने खेतड़ी के शासक अजीत सिंह की सलाह पर अपना नाम नरेन्द्रनाथ दत्त से बदलकर स्वामी विवेकानंद रखा।
- रामकृष्ण मिशन की स्थापना (1897) → शिक्षा, राहत, सामाजिक कार्य।
- पाश्चात्य भौतिकवाद और पूर्वी आध्यात्मिकता के समन्वय के पक्षधर थे।
- उन्हें बंगाल में आधुनिक राष्ट्रवादी आंदोलन का आध्यात्मिक पिता माना जाता है (सुभाष चंद्र बोस)।
- 1898 में उन्होंने बेलूर मठ में रामकृष्ण मठ की स्थापना की, जो संन्यासी संगठन का मुख्यालय बना।
- कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग और ज्ञानयोग पर ग्रंथ लिखे।
- समाचार पत्र- प्रबुद्ध भारत और उद्बोधन।
- नवंबर 1894 में उन्होंने न्यूयॉर्क (अमेरिका) में वेदांत सभा (वेदांत सोसाइटी) की स्थापना की।
- 1899 में वे दूसरी बार अमेरिका गए और सैन फ्रांसिस्को तथा लॉस एंजिल्स में वेदांत सभाओं की स्थापना की तथा कैलिफोर्निया में शांति आश्रम की स्थापना की।
- पुस्तकें: लेक्चर्स ऑन हिंदुइज़्म(हिंदू धर्म पर व्याख्यान), वेदांत फिलॉसफी: एन एड्रेस बिफोर द ग्रेजुएट फिलोसोफिकल सोसाइटी (1896), लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा (1897)।
- ‘वर्तमान भारत’ (बंगाली) – मार्च 1899 में उद्बोधन में प्रकाशित।
- माई मास्टर (1901), बेकर एंड टेलर कंपनी, न्यूयॉर्क।
मद्रास –
- थियोसोफिकल आंदोलन (1875) / थियोसोफिकल सोसाइटी
- संस्थापक—मैडम एच. पी. ब्लावात्सकी (1831–91) और कर्नल एच. एस. अल्कॉट।
- स्थापना—1875 में न्यूयॉर्क में; 1882 में मुख्यालय मद्रास के अडयार स्थानांतरित किया गया।
- मान्यताएं और दर्शन:
- ध्यान, प्रार्थना, रहस्योद्घाटन के माध्यम से आत्मा और ईश्वर के बीच विशेष संबंध।
- पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत को स्वीकार किया; उपनिषद, सांख्य, योग और वेदांत से प्रेरणा ली।
- सार्वभौमिक भ्रातृत्व तथा नस्ल, पंथ, लिंग, जाति और रंग की समानता का समर्थन।
- अस्पष्ट प्राकृतिक नियमों और क्षमताओं के अध्ययन पर जोर।
- भारत में:
- हिंदू नवजागरण से जुड़ा।
- बाल विवाह, जातिगत भेदभाव का विरोध किया; विधवाओं की स्थिति में सुधार किया।
- एनी बेसेंट (1847–1933) ने 1907 के बाद इसे लोकप्रिय बनाया, वह इस समाज की दूसरी अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं।
- 1898 में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की, जो आगे चलकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (1916) का आधार बना।
महाराष्ट्र –
- प्रार्थना समाज (1867) – महाराष्ट्र
- 1867 में बॉम्बे में आत्माराम पांडुरंग द्वारा स्थापित।
- ब्रह्म समाज के विचारों से प्रेरित था।
- प्रमुख नेता – एम. जी. रानाडे, आर. जी. भांडारकर, एन. जी. चंदावरकर।
- भक्ति परंपरा से अधिक प्रभावित।
महादेव गोविंद रानाडे

- “महाराष्ट्र का सुकरात”
- विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में स्थानीय भाषाओं को शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- एल्फिन्स्टन कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर रहे।
- मराठा इतिहास में गहरी रुचि थी।
- 1900 में ‘राइज़ ऑफ मराठा पावर’ नामक पुस्तक लिखी।
- डेक्कन एजुकेशनल सोसाइटी के मेंटर और समर्थक।
- स्थापना—1884
- संस्थापक—तिलक, गोपाल गणेश आगरकर, विष्णुशास्त्री चिपळूणकर आदि।
- पूना फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी द्वारा की गई।
- गोपाल कृष्ण गोखले डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के सदस्य थे।
- 1871 में बॉम्बे स्मॉल कॉजेज कोर्ट के प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट बने।
- 1893 में उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
- 1861 में विधवा विवाह संघ की सह-स्थापना की।
पूना सार्वजनिक सभा-
- अप्रैल 1870 में महादेव गोविंद रानाडे ने ‘पूना सार्वजनिक सभा’ की स्थापना की।
- 1875 ई. में इस सभा ने ब्रिटिश संसद में भारत के लिए प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व की मांग करते हुए हाउस ऑफ कॉमन्स में एक याचिका प्रस्तुत की।
- पूना सार्वजनिक सभा भारत की पहली ऐसी संस्था थी, जिसका प्रतिनिधिक स्वरूप था और जो जनमत को व्यक्त करती थी।
- लोगों को मुख्तारनामों (प्राधिकरण पत्रों) पर हस्ताक्षर कराकर इसका सदस्य बनाया जाता था।
- बालशास्त्री जांभेकर
- “मराठी पत्रकारिता का जनक”
- ‘दर्पण’ (1832) तथा ‘दिग्दर्शन’ (1840) नामक पत्रों की शुरुआत की।
- परमहंस मंडली (1849)
- एक गुप्त संगठन था, जिसका उद्देश्य जातिगत नियमों और कर्मकांडों का विरोध करना था।
- प्रमुख नेता- दादोबा पांडुरंग, मेहताजी दुर्गाराम, बालशास्त्री जांभेकर।
- तर्कवाद, समानता, विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा तथा विभिन्न जातियों के बीच सहभोज को बढ़ावा दिया।
- पूर्ववर्ती सुधारवादी संगठन मानव धर्म सभा से प्रेरित था।
- ज्योतिबा फुले एवं सावित्रीबाई फुले
- सत्यशोधक समाज की स्थापना (1873) → पिछड़ी जातियों का नेतृत्व।
- सत्यशोधक विवाह की शुरुआत → सरल, ब्राह्मण पुजारियों के बिना।
- प्रमुख रचनाएँ – ‘गुलामगिरी’ और ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’।
- ‘दलित’ (अर्थात कुचले हुए) पहचान को बढ़ावा दिया।
- सावित्रीबाई फुले अग्रणी महिला शिक्षिका और प्रमुख समाज सुधारक बनीं।
- बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित किया।
- विठ्ठल रामजी शिंदे
- डिप्रेस्ड क्लासेज मिशन की स्थापना की (1906)।
- रचना—‘भारतीय अस्पृश्यतेचा प्रश्न’।
- गोपाल हरि देशमुख (लोकहितवादी)
- जाति व्यवस्था और रूढ़िवाद की आलोचना की; प्रभाकर में लेखन किया तथा ज्ञान प्रकाश की स्थापना की।
- लोकहितवादी शतपत्रे।
- गोपाल गणेश आगरकर
- वे केसरी के संपादक रहे; बाद में सुधारक पत्रिका शुरू की।
- सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी (1905)
- जी. के. गोखले
- राष्ट्रीय सेवा के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना।
- यह संगठन गैर-राजनीतिक स्वरूप का था।
- हितवाद पत्र का प्रकाशन किया।
- सोशल सर्विस लीग
- एन. एम. जोशी
- विद्यालयों, पुस्तकालयों और विधिक सहायता की व्यवस्था की।; ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस [AITUC] (1920) के संस्थापक।
- सेवा सदन (1908)
- बी. एम. मालाबारी एवं दयाराम गिदुमल द्वारा स्थापित।
- शोषित और निराश्रित महिलाओं का उत्थान; सभी जातियों के लिए खुली
- इनके प्रयासों से एज ऑफ कंसेंट एक्ट (1891) पारित हुआ।
- इंडियन स्पेक्टेटर का संपादन किया।
- इंडियन सोशल कॉन्फ्रेंस (1887)
- एम. जी. रानाडे एवं रघुनाथ राव
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों की सामाजिक सुधार शाखा।
अन्य महत्वपूर्ण संगठन –
दयानंद सरस्वती (1824–1883)

- जन्म एवं प्रारंभिक जीवन: मूल नाम मूलशंकर, जन्म गुजरात के टंकारा (मोरवी राज्य) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।\
- आर्य समाज के संस्थापक।
- पहली शाखा 1875 में बॉम्बे में स्थापित की गई।; बाद में इसका मुख्यालय लाहौर में स्थापित हुआ।
- प्रमुख कृति: ‘सत्यार्थ प्रकाश’ (सत्य का स्पष्टीकरण)
- “वेदों की ओर लौटो” का समर्थन किया – वैदिक शिक्षा का पुनरुद्धार, न कि वैदिक काल का।
- हिंदू धर्म को विकृत करने के लिए पुराणों और भ्रष्ट पुरोहितों की आलोचना की।
- रूढ़िवाद की आलोचना: जातिगत कठोरता, अस्पृश्यता, मूर्ति-पूजा, बहुदेववाद, जादू-टोना, पशु बलि, अंधविश्वास तथा कर्मकांडों का विरोध किया।
- चातुर्वर्ण व्यवस्था: जन्म नहीं, बल्कि गुण और कर्म पर आधारित माना।
- विवाह सुधार: न्यूनतम विवाह आयु – 25 (लड़के), 16 (लड़कियां)।
- पाखंड खंडिनी पताका स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1867 में हरिद्वार में फहराई थी।
- गौ रक्षिणी सभा 1882 में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य गायों की रक्षा था।
आर्य समाज के दस मार्गदर्शक सिद्धांत
- ईश्वर समस्त सत्य ज्ञान का स्रोत है।
- केवल ईश्वर ही उपासना के योग्य है।
- वेद सत्य ज्ञान के ग्रंथ हैं।
- सदैव सत्य को स्वीकार करो और असत्य को त्यागो।
- धर्म (सही आचरण) सभी कर्मों का मार्गदर्शन करें।
- भौतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना चाहिए।
- सभी के साथ प्रेम और न्याय का व्यवहार करना चाहिए।
- अज्ञान को दूर करना और ज्ञान को बढ़ाना चाहिए।
- व्यक्तिगत उन्नति दूसरों के उत्थान पर निर्भर करती है।
- सामाजिक कल्याण को व्यक्तिगत कल्याण से ऊपर रखना चाहिए।
- “स्वराज” शब्द का प्रथम प्रयोग
- दयानंद एंग्लो-वैदिक (डी.ए.वी.) कॉलेज 1886 में लाहौर में स्थापित।
- आर्य समाज 1893 में पाठ्यक्रम और शाकाहार को लेकर दो हिस्सों में बंट गया:
- कॉलेज पार्टी: आधुनिक शिक्षा, अंग्रेजी पाठ्यक्रम, खान-पान व्यक्तिगत पसंद।
- नेता – लाला लाजपत राय, लाला हंसराज
- महात्मा (गुरुकुल) पार्टी: संस्कृत और वैदिक शिक्षा, सख्त शाकाहार।
- स्वामी श्रद्धानंद (मुंशी राम)
- कॉलेज पार्टी: आधुनिक शिक्षा, अंग्रेजी पाठ्यक्रम, खान-पान व्यक्तिगत पसंद।
- गुरुकुल कांगड़ी
- 1902 में स्वामी श्रद्धानंद द्वारा स्थापित; बाद में हरिद्वार के निकट स्थानांतरित; भारतीय संस्कृति, वैदिक साहित्य, आधुनिक विज्ञान और सामाजिक सुधार पर केंद्रित।
- शुद्धि आंदोलन: ईसाई या इस्लाम में परिवर्तित लोगों का पुनः धर्मांतरण; अस्पृश्यों\अछूतों के उत्थान पर जोर।
- देव समाज (1887)
- शिव नारायण अग्निहोत्री।
- भारत धर्म महामंडल (1902)
- रूढ़िवादी हिन्दू संगठनों का एक संघ था।
- आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी और रामकृष्ण मिशन के विरुद्ध हिंदू धर्म की रक्षा की।
- समर्थक हिंदू संगठनों की अखिल भारतीय शीर्ष संस्था थी।
- इसकी स्थापना 1887 ई. में हरिद्वार में पंडित दीनदयालु शर्मा द्वारा की गई।इसका मुख्यालय वाराणसी में था।मदन मोहन मालवीय इस संगठन से जुड़े थे।
- इसका उद्देश्य सनातन धर्म की रक्षा के लिए एकजुट होकर कार्य करना था।
- यह आर्य समाज की प्रतिक्रिया में गठित किया गया; यह रूढ़िवादी शिक्षित हिंदुओं का संगठन था।
- 1902 ई. में सनातन धर्म सभा, धर्म महा परिषद और धर्म महामंडली इसमें विलय हो गईं।
- सनातन धर्म सभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय ने हरिद्वार में की थी।
- दक्षिण भारत में धर्म महा परिषद की स्थापना हुई और बंगाल में धर्म महामंडली की स्थापना की गई।
- दीनदयालु शर्मा ने 1899 ई. में दिल्ली में हिंदू कॉलेज की स्थापना की।
- राधास्वामी आंदोलन (1861)
- शिव दयाल साहेब
- एक सर्वोच्च ईश्वर, गुरु, सत्संग और सरल नैतिक जीवन में विश्वास। मंदिरों और कर्मकांडों को अस्वीकार किया।
- संन्यास की आवश्यकता नहीं मानी; सभी धर्मों को सत्य माना।
दक्षिण भारत-
- श्री नारायण धर्म परिपालन आंदोलन (1903) — श्री नारायण गुरु
- एझवाओं (केरल की दलित जाति) के उत्थान के लिए।
- 1888: अरव्विपुरम में शिवलिंग स्थापित किया — जाति एकाधिकार को चुनौती दी।
- प्रमुख नेता- नारायण गुरु, कुमारन आसन, डॉ. पलपू।
- आदर्श वाक्य: “मानव जाति के लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर।”
- वोक्कालिगा संघ (1905, मैसूर)
- वोक्कालिगा समुदाय द्वारा चलाया गया ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन।
- जस्टिस आंदोलन (मद्रास प्रेसीडेंसी)
- टी. एम. नायर, पी. त्यागराज चेट्टी, सी. एन. मुदलियार।
- नौकरियों और विधायिकाओं में गैर-ब्राह्मण प्रतिनिधित्व की मांग।
- इसके परिणामस्वरूप मद्रास प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1917) का गठन हुआ।
- आत्मसम्मान आंदोलन (1920 का दशक)
- ई. वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार)
- कट्टर ब्राह्मण-विरोधी और जाति-विरोधी आंदोलन।
- ब्राह्मणवादी कर्मकांडों की निंदा की; पुरोहितों के बिना अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा दिया।
- मंदिर प्रवेश आंदोलन
- प्रमुख नेता – टी. के. माधवन, के. केलप्पन, ए. के. गोपालन, सुब्रमण्या तिरुमंबू।
- वायकॉम सत्याग्रह (1924–25) – पहला प्रमुख मंदिर-प्रवेश संघर्ष था।
- ई. वी. रामासामी नायकर ने वायकॉम सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- अन्य नेता—के. पी. केशव मेनन, टी. के. माधवन।
- मार्च 1925 में महात्मा गांधी ने आंदोलन के समर्थन में वैकॉम का दौरा किया।
- अंबादेवी मंदिर सत्याग्रह (1927): 27 जून 1927 को डॉ. आंबेडकर और उनके अनुयायियों ने अमरावती स्थित अंबादेवी मंदिर में प्रवेश के लिए मार्च किया।
- पार्वती सत्याग्रह (1929): 1929 में डॉ. आंबेडकर ने पुणे के निकट पार्वती टेकरी पर स्थित पार्वती मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए आंदोलन शुरू किया।
- गुरुवायूर सत्याग्रह (1931–1932)
- यह सत्याग्रह 1 नवंबर 1931 को के. केलप्पन के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ।
- अन्य नेता – पी. कृष्ण पिल्लै, ए. के. गोपालन।
- के. केलप्पन ने गांधीजी की सलाह पर अपना उपवास समाप्त किया।
- त्रावणकोर मंदिर प्रवेश घोषणा (1936): 12 नवंबर 1936 को त्रावणकोर के महाराजा ने एक घोषणा जारी कर सरकार-नियंत्रित सभी मंदिरों को सभी हिंदुओं के लिए खोल दिया।
- वीरेशलिंगम पंतुलु-
- राजमुंदरी सोशल रिफॉर्म एसोसिएशन (1878)
- तेलुगु नवजागरण से संबंधित।
- विधवा पुनर्विवाह संघ
इस्लामिक सुधार आंदोलन –
- अहमदिया आंदोलन (1889)
- मिर्ज़ा गुलाम अहमद
- इस्लाम का उदार और तर्कवादी वर्ग।
- जिहाद का विरोध किया; सार्वभौमिक धर्म और शांति का समर्थन किया।
- धर्म और राज्य के पृथक्करण में विश्वास; महिलाओं के अधिकारों का समर्थन।
- अलीगढ़ आंदोलन
- सर सैयद अहमद खान (1817–1898)
- मुसलमानों के लिए आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा पर जोर।
- मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (1875) की स्थापना → आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना।
- 1888 में वफादारी के लिए नाइटहुड की उपाधि प्राप्त की।
- यूनाइटेड पेट्रियोटिक एसोसिएशन से जुड़े।
- साइंटिफिक सोसाइटी की स्थापना की।
- दर्शन:
- पाश्चात्य वैज्ञानिक शिक्षा और कुरान के बीच समन्वय का प्रयास।
- यह मानते थे कि धर्म को समय के अनुसार ढलना चाहिए; आलोचनात्मक सोच और विचार की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया।
- अपने विचारों का प्रसार ‘तहज़ीब-उल-अखलाक’ (आचरण और नैतिकता में सुधार) पत्रिका के माध्यम से किया।
सर सैयद अहमद खान –

- तहज़ीब-उल-अखलाक (सभ्यता और नैतिकता) 1870 ई. में उनके द्वारा स्थापित उर्दू पत्रिका।
- उन्होंने ‘असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिन्द’, ‘द रिवोल्ट इन बिजनौर (हिस्ट्री ऑफ रिवोल्ट इन बिजनौर)’ तथा ‘लॉयल मुहम्मडन ऑफ इंडिया’ की रचना की।
- सर सैयद अहमद खान ने दासता को इस्लाम के विरुद्ध बताया और कुरान पर टीका लिखी।
- मुगल वंश के ग़ौर से लेकर बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय तक के 17 शासकों का वर्णन ‘जाम-ए-जाम’ नामक पुस्तक में किया।
- 1886 ई. में उन्होंने अलीगढ़ में ‘मोहम्मडन एजुकेशन कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना की।
- 1864 ई. में उन्होंने उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में ‘साइंटिफिक सोसाइटी’ की स्थापना की।
- जिसका मुख्यालय बाद में अलीगढ़ स्थानांतरित कर दिया गया।
- अंग्रेज़ी पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया गया तथा 1864 ई. में गाजीपुर में अंग्रेजी शिक्षा का एक विद्यालय स्थापित किया गया।
- आधुनिक वैज्ञानिक विचारों को इस्लाम के साथ समन्वित करने का प्रयास किया।सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ स्कूल की स्थापना की।
- जनवरी 1877 में इसका नाम ‘मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज’ रखा गया, जो आगे चलकर 1920 ई. में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना।
- ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हे ‘सर’ की उपाधि और नाइटहुड प्रदान की गई।
- 1887 ई. में जब बदरुद्दीन तैयबजी को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया, तब सर सैयद अहमद खान ने इसका विरोध किया और राजा शिवप्रसाद (बनारस) के साथ मिलकर 1888 ई. में ‘यूनाइटेड इंडियन पेट्रियोटिक एसोसिएशन’ का गठन किया।
- इस संगठन का उद्देश्य कांग्रेस का विरोध करना था।
- उन्होंने कहा था कि “हिंदू और मुसलमान एक ही दुल्हन की दो आँखें हैं।”
- देवबंद आंदोलन (1866)
- नानोतवी और गंगोही
- रूढ़िवादी और पुनरुत्थानवादी; कुरान और हदीस पर जोर।
- ब्रिटिश विरोधी; धार्मिक शिक्षा का समर्थन।
- कांग्रेस और संयुक्त राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
- शिबली नोमानी: आधुनिक और इस्लामी शिक्षा के समन्वय का प्रयास किया।
- सर सैयद अहमद खान का विरोध किया।
- अहरार आंदोलन (1910) –
- हकीम अजमल ख़ान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद।
- मुसलमानों से राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन करने की अपील की।
- पारसी सुधार आंदोलन (1851)
- रहनुमाई मजदायसन सभा
- प्रमुख नेता—नौरोजी फरदुनजी, दादाभाई नौरोजी, के. आर. कामा, एस. एस. बंगाली।
- धार्मिक कर्मकांडों में सुधार किया; पारसी महिलाओं की स्थिति में सुधार किया; तर्कसंगत आचरण को बढ़ावा दिया और धार्मिक शुद्धता पर बल दिया।
- समाचार पत्र – राफ्त गोफ्तार
सिक्ख सुधार आंदोलन
- सिंह सभा आंदोलन (1873, अमृतसर)
- उद्देश्य:
- सिक्खों को आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा प्रदान करना।
- ईसाई मिशनरियों, ब्रह्म समाजियों, आर्य समाजियों और मुस्लिम मौलवियों द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण का विरोध करना।
- गतिविधियां:
- पंजाब में खालसा स्कूलों की स्थापना की।
- सिख सिद्धांतों के विरुद्ध प्रथाओं को अस्वीकार किया तथा गुरुओं की शिक्षाओं के अनुरूप संस्कारों को बढ़ावा दिया।
- उद्देश्य:
- अकाली आंदोलन / गुरुद्वारा सुधार आंदोलन
- उद्देश्य:
- सरकारी संरक्षण प्राप्त भ्रष्ट उदासी महंतों से सिख गुरुद्वारों को मुक्त कराना।
- कार्य-पद्धति: अहिंसक असहयोग—सत्याग्रह (1921)
- कर्तार सिंह झब्बर—अहिंसक आंदोलनों का संगठन किया, और बाबा खड़क सिंह—सिख समुदाय को संगठित कर धार्मिक स्थलों पर नियंत्रण पुनः प्राप्त करने में भूमिका।
- सरदार बहादुर मेहताब सिंह:
- गुरु-का-बाग मोर्चा।
- पंजाब विधान परिषद से इस्तीफा दिया।
- आंदोलन में भाग लेने के कारण कई बार गिरफ्तार हुए।
- बाबा खड़क सिंह: आंदोलन के प्रारंभिक नेताओं में से एक।
- मास्टर तारा सिंह: शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के गठन और स्वरूप निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका।
- परिणाम:
- सिक्ख गुरुद्वारा अधिनियम (1922; संशोधन 1925) के द्वारा गुरुद्वारों का नियंत्रण सिख समुदाय को सौंपा गया।
- इस अधिनियम ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के अधिकार को कानूनी मान्यता प्रदान की।
सकारात्मक योगदान
- तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया।
- सामाजिक कुरीतियों (सती, बाल विवाह, जाति प्रथा) के विरुद्ध चेतना उत्पन्न की।
- सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत किया।
- राष्ट्रवाद के विकास में सहायता की।
- महिलाओं और निम्न जातियों के लिए शिक्षा के द्वार खोले।
सीमाएँ
- सामाजिक आधार सीमित रहा—मुख्यतः शहरी, शिक्षित मध्यम वर्ग तक।
- धार्मिक ग्रंथों पर अत्यधिक जोर से पुनरुत्थानवाद और रहस्यवाद को बढ़ावा मिला।
- अनजाने में साम्प्रदायिक पहचान मजबूत हुई।
- किसानों और श्रमिक वर्ग की आर्थिक समस्याओं की उपेक्षा की गई।
मदन मोहन मालवीय –

- मदन मोहन मालवीय ने भारतेंदु हरिश्चंद्र की पत्रिका ‘हरिश्चंद्रिका’ में ‘मकरंद’ नाम से लेख लिखे।
- 1887 में राजा रामपाल सिंह ने उनके भाषण से प्रभावित होकर मालवीय को ‘हिंदोस्तान’ समाचार पत्र का संपादक बनाया।
- 1889 में मालवीय ‘इंडियन ओपिनियन’ समाचार पत्र के संपादक बने।1907 में मालवीय ने ‘अभ्युदय’ समाचार पत्र शुरू किया।
- 1908 में मालवीय ने इलाहाबाद में प्रेस एक्ट के विरोध में एक सम्मेलन आयोजित किया।
- 1909 में मालवीय ने मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर ‘लीडर’ समाचार पत्र शुरू किया, जो उदार नीतियों का समर्थक था।
- 1910 में मालवीय ने हिंदी में ‘मर्यादा’ समाचार पत्र निकाला।
- 1922 में के. एम. पणिक्कर ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ शुरू किया, जो पहले अकालियों का प्रमुख समाचार पत्र था; बाद में मालवीय ने इसे खरीद लिया।
- मालवीय ने घनश्याम दास बिड़ला और लाला लाजपत राय के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ को बंद होने से बचाया।1924 से 1946 तक मालवीय ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के अध्यक्ष रहे।
- 1933 में मालवीय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ‘सनातन धर्म’ पत्रिका की शुरुआत की।
