भारतीय राष्ट्रवाद का उदय: आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय राष्ट्रवाद का विकास औपनिवेशिक शोषण, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और आधुनिक शिक्षा के प्रसार के परिणामस्वरूप हुआ। इस प्रक्रिया ने राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी संस्थाओं के माध्यम से संगठित स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखी।
भारतीय राष्ट्रवाद का उदय
भारतीय राष्ट्रवाद के उद्भव के कारक
- अंतर्विरोधों की समझ
- इस बात का अहसास कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ही भारत के आर्थिक पिछड़ेपन का मुख्य कारण था।
- समाज के सभी वर्गों – किसानों, मजदूरों, दस्तकारों, मध्यम वर्ग और पूंजीपतियों – के हित बुनियादी रूप से औपनिवेशिक हितों के विपरीत थे।
- इन अंतर्विरोधों के प्रतिरोध स्वरूप राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ।
- राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक एकीकरण
- ब्रिटिश शासन ने भारत को उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक राजनीतिक रूप से एकीकृत किया।
- एकीकृत न्यायपालिका, नागरिक सेवा (सिविल सेवा) और संहिताबद्ध कानूनों ने राजनीतिक एकता को सुदृढ़ किया।
- रेलवे, सड़कों और टेलीग्राफ के विकास ने राष्ट्रीय एकीकरण को संभव बनाया।
- प्रभाव:
- विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक अंतर्निर्भरता बढ़ी।
- विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं और लोगों को एक-दूसरे से मिलने और विचारों के आदान-प्रदान का अवसर मिला।
- पाश्चात्य विचार एवं शिक्षा
- आधुनिक शिक्षा ने भारतीयों को लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समानता के विचारों से परिचित कराया।
- मिल, रूसो और वोल्टेयर जैसे विचारकों ने राष्ट्रवादी सोच को प्रभावित किया।
- अंग्रेजी भाषा विभिन्न क्षेत्रों के नेताओं के बीच संपर्क भाषा बनी।
- शिक्षित मध्यम वर्ग ने प्रारंभिक राष्ट्रवाद के ‘केंद्र’ (Nucleus) के रूप में कार्य किया।
- प्रेस और साहित्य की भूमिका
- 1850 के दशक के बाद अंग्रेज़ी और देशी भाषाओं के समाचार-पत्रों की संख्या में भारी वृद्धि हुई।
- प्रेस ने सरकारी नीतियों की आलोचना की और लोकतांत्रिक व राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार किया।
- इसने विभिन्न क्षेत्रों के बीच विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाया।
- भारत के गौरवशाली अतीत की पुनर्खोज
- भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक विरासत को उजागर किया।
- इससे भारतीयों के आत्मविश्वास में वृद्धि हुई और ‘भारतीय हीनता’ के औपनिवेशिक मिथकों को चुनौती देने में मदद मिली।
- सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन
- सुधारकों ने समाज को विभाजित करने वाली कुरीतियों पर प्रहार किया।
- इन आंदोलनों ने एकता और प्रगतिशील सोच को बढ़ावा दिया, जिससे राष्ट्रवाद को बल मिला।
- मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवी वर्ग का उदय
- ब्रिटिश नीतियों के कारण शहरी शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय हुआ।
- यह वर्ग राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति सजग तथा अतिसक्रिय था। इसने राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया।
- प्रारंभिक संगठनों तथा बाद में कांग्रेस का नेतृत्व इसी वर्ग ने किया।
- समकालीन विश्व आंदोलनों का प्रभाव
- क्षिण अमेरिका, ग्रीस, इटली और आयरलैंड के मुक्ति संघर्षों ने भारतीयों को प्रेरित किया।
- ब्रिटिश प्रतिक्रियावादी नीतियाँ और नस्लीय अहंकार
- नस्लीय भेदभाव ने भारतीय की भावनाओं को आहत किया।
- प्रमुख नीतियाँ/घटनाएँ:
- भारतीय नागरिक सेवा (ICS) की आयु सीमा घटाना (1876)।
- अकाल के समय दिल्ली दरबार का आयोजन (1877)।
- वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) – भाषाई प्रेस पर प्रतिबंध।
- आर्म्स एक्ट (शस्त्र अधिनियम) (1878)।
- इल्बर्ट बिल विवाद (1883)।
इन नीतियों से राजनीतिक चेतना का प्रसार हुआ और संगठित आंदोलन की तकनीकों का विकास हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से पूर्व प्रमुख राजनीतिक संगठन
बंगाल
- 1836
- बंगभाषा प्रकाशिका सभा 1836 – राजा राममोहन राय के सहयोगियों द्वारा।
- 1838
- लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838): आधुनिक भारत में राजनीतिक सुधारों के लिए स्थापित सबसे पहला संगठन।
- लैंडहोल्डर्स सोसाइटी के भारतीय सचिव: प्रसन्न कुमार ठाकुर।
- 1843
- बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी
- 1851
- ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (पूर्व की दोनों संस्थाओं का विलय करके)।
- 1852
- बॉम्बे एसोसिएशन
- 1852
- मद्रास नेटिव सोसायटी
- 1866
- ईस्ट इंडिया एसोसिएशन
- लंदन में दादाभाई नौरोजी द्वारा स्थापित।
- 1875
- इंडियन लीग
- संस्थापक: शिशिर कुमार घोष
- 1876
- इंडियन एसोसिएशन, कलकत्ता की स्थापना – सुरेंद्रनाथ बनर्जी, आनंद मोहन बोस (जिसे इंडियन नेशनल एसोसिएशन के नाम से भी जाना जाता है)।
- 1877 में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा में कटौती, शस्त्र अधिनियम, वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम और इल्बर्ट विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।
- इंडियन एसोसिएशन ने असम चाय बागान के कुलियों के साथ दुर्व्यवहार के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया, जिसमें द्वारकानाथ गांगुली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- इंडियन नेशनल कांग्रेस का पूर्वगामी
- अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन (1883)
- पहला प्रस्ताव, सिविल सेवा परीक्षा इंग्लैंड के साथ-साथ भारत में भी एक ही समय पर आयोजित की जानी चाहिए और पात्रता की आयु बढ़ाकर 22 वर्ष की जानी चाहिए।
- दूसरा प्रस्ताव, राष्ट्रीय कोष (National Fund) के संग्रह के महत्व पर बल दिया गया।
- तीसरा प्रस्ताव, भारत में प्रतिनिधि सभाओं की मांग।
- चौथे प्रस्ताव में आर्म्स एक्ट (शस्त्र अधिनियम) को निरस्त करने की मांग की गई।
- पांचवें प्रस्ताव में इल्बर्ट बिल पर समझौते की निंदा की गई।
- दूसरा भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन 1885 में कलकत्ता में आयोजित हुआ।
- 1886 में इसका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में विलय हो गया।
- ब्रिटिश संसद के सदस्य
- चार्ल्स ब्रैडलॉ (Charles Bradlaugh) और सर विलियम वेडरबर्न के प्रयासों से 1889 में ‘इंडियन पार्लियामेंट्री कमेटी’ (भारतीय संसदीय समिति) का गठन हुआ।
- इस समिति ने 1890 में ‘इंडिया’ नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, जो 1892 में मासिक और 1896 में साप्ताहिक पत्रिका बन गई।
बॉम्बे
- 1870/ 1867
- पूना सार्वजनिक सभा
- संस्थापक: एम.जी. रानाडे
- 1885
- बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (बदरुद्दीन तैयबजी, फिरोजशाह मेहता और के.टी. तेलंग)
मद्रास
- 1884
- मद्रास महाजन सभा (एम. वीरराघवाचारी, बी. सुब्रमण्यम अय्यर और पी. आनन्द चार्लू)
कांग्रेस से पूर्व के महत्वपूर्ण राजनीतिक अभियान
- कपास पर आयात शुल्क (1875)
- सिविल सेवाओं का भारतीयकरण (1878–79)
- लिटन की अफ़गान नीति के खिलाफ
- आर्म्स एक्ट (1878) के खिलाफ
- वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878) के खिलाफ
- प्लांटेशन लेबर और इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के खिलाफ
- इल्बर्ट बिल (1883) का समर्थन
- राजनीतिक आंदोलन के लिए अखिल भारतीय कोष
- भारत समर्थक उम्मीदवारों के लिए ब्रिटेन में अभियान
- ICS आयु-सीमा आंदोलन (इंडियन एसोसिएशन के नेतृत्व में अखिल भारतीय आंदोलन)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना
पृष्ठभूमि
- 1870 के दशक के उत्तरार्ध और 1880 के दशक की शुरुआत तक एक अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन के गठन के लिए परिस्थितियाँ तैयार हो चुकी थीं।
- एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश सिविल सेवक, ए.ओ. ह्यूम ने इस उद्देश्य के लिए भारतीय बुद्धिजीवियों को संगठित किया।
प्रारंभिक प्रयास
- 1883 और 1885 में इंडियन नेशनल कॉन्फ्रेंस के अधिवेशन आयोजित किए गए।
- इसके प्रमुख नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस थे।
- ये सम्मेलन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्वगामी सिद्ध हुए।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन (1885)

- गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, बॉम्बे में आयोजित हुआ।
- 72 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
- अध्यक्ष: डब्ल्यू.सी. बनर्जी।
- इसके बाद, कांग्रेस का अधिवेशन हर साल दिसंबर में भारत के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित होने लगा।
- शुरुआती प्रमुख नेता: महादेव गोविंद रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, आर.सी. दत्त, आनंद चार्लू, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, रोमेश चंद्र दत्त, आनंद मोहन बोस, शिशिर कुमार घोष, मोतीलाल घोष, मदन मोहन मालवीय, जी. सुब्रमण्यम अय्यर, सी. विजयराघवाचारी, दिनशा ई. वाचा।
महिलाओं का प्रतिनिधित्व
- कादम्बिनी गांगुली ने 1890 के अधिवेशन को संबोधित किया – यह राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का एक प्रतीकात्मक संकेत था।
- वह कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रथम महिला स्नातक थी।
क्या INC एक “सेफ्टी वाल्व” थी?
- सेफ्टी वाल्व सिद्धांत
- ए. ओ. ह्यूम ने भारतीय असंतोष को शांतिपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त/नियंत्रित करने के लिए कांग्रेस की स्थापना की।
- इस मत का समर्थन लाला लाजपत राय जैसे उग्रवादी नेताओं ने भी किया।
- षड्यंत्र सिद्धांत (मार्क्सवादी दृष्टिकोण)
- आर.पी. दत्त के अनुसार, कांग्रेस का गठन संभावित भारतीय विद्रोह को रोकने के लिए एक पूर्व-नियोजित षड्यंत्र के तहत किया गया था।
- आधुनिक दृष्टिकोण
- कांग्रेस का गठन भारतीयों की अपनी राजनीतिक आवश्यकताओं के कारण हुआ था।
- बिपिन चंद्र का विचार: उन्होंने ह्यूम को एक “तड़ित चालक” के रूप में वर्णित किया – अर्थात, भारतीयों ने ह्यूम का उपयोग इसलिए किया ताकि वे सरकारी दमन के बिना खुद को संगठित कर सकें।
प्रारंभिक कांग्रेस के लक्ष्य और उद्देश्य
- लोकतांत्रिक एवं राष्ट्रवादी आंदोलन का निर्माण।
- लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक और प्रशिक्षित करना।
- देश के विभिन्न हिस्सों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक साझा मंच तैयार करना।
- औपनिवेशिक-विरोधी विचारधारा विकसित करना।
- सरकार के समक्ष देश की साझा राजनीतिक और आर्थिक मांगों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करना।
- धर्म, जाति और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना।
- भारतीय राष्ट्र की अवधारणा को सावधानीपूर्वक विकसित करना।
उदारवादी चरण (1885–1905)
- मुख्य नेता
- दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोखले, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, डी.ई. वाचा, एस.एन. बनर्जी।
- उदारवादी दृष्टिकोण
- ब्रिटिश न्याय और सद्भावना में विश्वास।
- उनका मानना था कि सुधार निम्न माध्यमों से प्राप्त किए जा सकते हैं:
- याचिकाओं, भाषणों, प्रस्तावों के माध्यम से
- संवैधानिक तरीकों द्वारा
- भारत और ब्रिटेन में जनमत के सहारे
- टकराव से बचाव; ब्रिटेन से राजनीतिक संबंधों को लाभकारी माना।
- कार्य-प्रणाली –
- 3P:
- याचिका (Petition)
- प्रार्थना (Prayer)
- अनुनय/समझाना (Persuade)
- संचार का माध्यम: प्रेस और INC का वार्षिक अधिवेशन।
- ब्रिटिश सरकार में गहरा विश्वास।
- भारतीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करने हेतु प्रमुख भारतीयों के प्रतिनिधिमंडल ब्रिटेन भेजे गए।
- 1889 में INC की ब्रिटिश समिति की स्थापना हुई।
- प्रचार कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए समिति ने 1890 में अपनी पत्रिका ‘इंडिया’ आरंभ की।
उदारवादी राष्ट्रवादियों का योगदान
- ब्रिटिश शासन की आर्थिक आलोचना
- धन की निकासी का सिद्धांत (नौरोजी, आर.सी. दत्त)।
- औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत होने वाले आर्थिक शोषण और भारत की निर्धनता को उजागर किया।
- प्रमुख मांगें:
- भू-राजस्व में कमी।
- नमक कर की समाप्ति।
- सैन्य व्यय में कटौती।
- संरक्षण शुल्क (Tariffs) और सरकारी सहायता के माध्यम से औद्योगिक विकास।
- श्रमिकों की कार्य-स्थितियों में सुधार।
- संवैधानिक सुधार एवं विधायी कार्य
- इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल (भारतीय परिषद अधिनियम, 1861)
- इसका गठन मुख्य रूप से सरकारी निर्णयों को वैधानिकता प्रदान करने के लिए किया गया था, न कि सत्ता-साझेदारी हेतु।
- भारतीयों का प्रतिनिधित्व अत्यंत सीमित था: 1862 से 1892 के बीच केवल 45 भारतीयों को मनोनीत किया गया।
- मनोनीत किए गए अधिकांश भारतीय धनी, जमींदार और ब्रिटिश शासन के प्रति निष्ठावान थे।
- मनोनीत होने वाले कुछ स्वतंत्र विचारकों में सैयद अहमद खान, क्रिस्टो दास पाल, वी.एन. मंडलिक, के.एल. नुलकर और रासबिहारी घोष शामिल थे।
- राष्ट्रवादी मांगें (1885–1892)
- परिषदों का विस्तार (अधिक भारतीयों की भागीदारी)।
- परिषदों में सुधार (अधिक शक्तियाँ, विशेष रूप से वित्तीय मामलों पर नियंत्रण)।
- दीर्घकालिक लक्ष्य: लोकतांत्रिक स्वशासन।
- इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल (भारतीय परिषद अधिनियम, 1861)
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
- इम्पीरियल और प्रांतीय – दोनों परिषदों में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
- विश्वविद्यालयों, नगरपालिकाओं, ज़मींदारों, वाणिज्य मंडलों जैसी संस्थाओं द्वारा नामांकन के माध्यम से सीमित प्रतिनिधित्व की शुरुआत की गई।
- बजट पर चर्चा की अनुमति दी गई।प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई।
- सीमाएँ
- परिषदों में सरकारी अधिकारियों का बहुमत बना रहा, जिससे गैर-सरकारी सदस्यों का प्रभाव सीमित रहा।
- परिषद की बैठकें बहुत कम होती थीं (1909 तक औसतन वर्ष में केवल 13 दिन)।
- भारतीय सदस्य: 24 में से केवल 5।
- बजट पर मतदान या उसमें संशोधन का कोई अधिकार नहीं था।
- पूरक प्रश्नों की अनुमति नहीं थी; उत्तरों पर चर्चा नहीं की जा सकती थी।
1892 के बाद राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया
- कांग्रेस ने इन सुधारों की कड़ी आलोचना की और नई मांगें सामने रखीं:
- निर्वाचित भारतीय सदस्यों का स्पष्ट बहुमत हो।बजट पर वास्तविक नियंत्रण →
- नारा: “प्रतिनिधित्व के बिना कराधान नहीं।
- ”संवैधानिक आकांक्षाओं का विकास
- दादाभाई नौरोजी (1904),
- गोपाल कृष्ण गोखले (1905) और
- बाल गंगाधर तिलक (1906) ने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर स्वशासन की मांग की।
- गोखले और फिरोजशाह मेहता जैसे नेताओं ने सरकारी नीतियों की तीखी आलोचना की।
सामान्य प्रशासनिक सुधार
- सिविल सेवाओं का भारतीयकरण (आर्थिक, राजनीतिक एवं नैतिक तर्कों के आधार पर)।
- न्यायपालिका और कार्यपालिका का पृथक्करण।
- नौकरशाही तथा विदेश नीति की आलोचना।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई और कृषि पर अधिक व्यय की मांग।
- विदेशों में भारतीय श्रमिकों के संरक्षण की मांग।
नागरिक अधिकारों का सरंक्षण
- वाक्-स्वतंत्रता, प्रेस और संघ बनाने की स्वतंत्रता की रक्षा।
- दमनकारी कार्रवाइयों के विरुद्ध आवाज़ उठाई (जैसे – तिलक और नाटू बंधुओं की गिरफ्तारी)।
प्रारम्भिक राष्ट्रवादियों / उदारवादियों का मूल्यांकन
- सकारात्मक पक्ष –
- राष्ट्रीय चेतना और एकता का निर्माण किया।
- भारतीयों को राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित किया, आधुनिक विचारों को लोकप्रिय बनाया।
- औपनिवेशिक शासन के शोषणकारी स्वरूप को उजागर किया।
- जन-आन्दोलन के लिए वैचारिक आधार तैयार किया।
- कमज़ोरियाँ –
- जनसाधारण को आन्दोलन में शामिल करने में असफल रहे।
- अभिजात्य (एलीट) राजनीति पर अधिक निर्भर रहे।
- डॉ. पट्टाभि सीतारमैया –
- आधुनिक स्वतंत्रता की इमारत की नींव प्रारम्भिक उदारवादियों ने रखी।
- यह उन्हीं के प्रयासों के कारण संभव हुआ कि इमारत की मंजिलें एक-एक करके निर्मित हुईं।
- पहले उपनिवेशों का स्वशासन, फिर साम्राज्य के अधीन स्वशासन, फिर स्वराज और अंत में पूर्ण स्वतंत्रता की मंजिल का निर्माण संभव हो सका।
ब्रिटिश सरकार का दृष्टिकोण –
- प्रारम्भ से ही शत्रुतापूर्ण
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उदारवादी, निष्ठावान और संवैधानिक तरीकों के बावजूद, ब्रिटिश सरकार शुरू से ही इसके प्रति शत्रुतापूर्ण रही।
- 1887 के बाद बढ़ता तनाव
- 1887 में, सरकार ने कांग्रेस पर दबाव डाला कि वह अपना ध्यान केवल सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित करे और राजनीतिक आलोचना से दूर रहे।
- जब कांग्रेस ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और अधिक मुखर हो गई, तो ब्रिटिश सरकार खुलकर विरोध पर उतर आई।
- अपमानजनक टिप्पणियाँ और निंदा
- ब्रिटिश अधिकारियों ने राष्ट्रवादियों को निम्नलिखित नामों से संबोधित किया:
- “राजद्रोही ब्राह्मण”
- “अविश्वासी/अराजक बाबू”
- वायसराय डफरिन ने कांग्रेस को “राजद्रोह का कारखाना” कहा।
- ब्रिटिश अधिकारियों ने राष्ट्रवादियों को निम्नलिखित नामों से संबोधित किया:
- बाद की नीति: फूट डालो और राज करो
- सरकार ने कांग्रेस को कमजोर करने के लिए स्पष्ट रूप से फूट डालो और राज करो की रणनीति अपनाई।
- राजभक्त (ब्रिटिश निष्ठावान), कांग्रेस-विरोधी संगठनों को प्रोत्साहित किया, जैसे –
- यूनाइटेड इंडियन पैट्रियोटिक एसोसिएशन: सर सैयद अहमद खान और बनारस के राजा शिव प्रसाद सिंह द्वारा संगठित इस संस्था को कांग्रेस के विरोध में खड़ा किया गया।
- आंतरिक विभाजन पैदा करना
- भारतीयों को धार्मिक आधार पर विभाजित करने का प्रयास किया।
- कांग्रेस के भीतर उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच वैमनस्य पैदा करने के लिए ‘दमन और प्रोत्साहन’ (Carrot-and-stick – गाजर एवम् छड़ी) की रणनीति अपनाई गई।
उग्रवाद का उदय
- उग्रवाद के उदय के कारण –
- राजनीतिक कट्टरता:
- उग्रवादी ‘स्वधर्म’ और ‘स्वराज’ के विचारों में विश्वास रखते थे।
- राजनीतिक कट्टरता:
- सामाजिक सुधार आन्दोलन:
- इन आंदोलनों ने राजनीतिक कट्टरता को प्रोत्साहन दिया, जो उग्रवादियों का वैचारिक आधार बना।
- रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती और एनी बेसेंट जैसे नेताओं ने भारतीय जनमानस और शिक्षित अल्पवर्ग के बीच की दूरी को पाटने का काम किया।
- उदारवादियों की कार्यप्रणाली से असंतोष:
- अधिक त्वरित और प्रत्यक्ष कार्रवाई की वकालत की।
- भारत में अकाल:
- 1896–98 और 1899–1901 के अकाल तथा 1896 की ब्यूबोनिक प्लेग से व्यापक दुःख और पीड़ा उत्पन्न हुई।
- लॉर्ड कर्ज़न की साम्राज्यवादी नीतियाँ:
- इंडियन ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट
- कलकत्ता कॉरपोरेशन एक्ट
- भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम
- बंगाल विभाजन
- अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव:
- 1896 में एबिसिनिया (इथियोपिया) द्वारा इटली की हार।
- 1904-05 में जापान द्वारा रूस की पराजय।
- मिस्र, तुर्की और फारस (ईरान) में चल रहे राष्ट्रवादी आंदोलन।
- उग्रवादियों की कार्यप्रणाली –
- जन-आंदोलन: बड़े पैमाने पर सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन और अभियानों का आयोजन करना।
- बहिष्कार और स्वदेशी: विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और भारतीय उत्पादों का प्रचार।
- आक्रामक तरीके: केवल विनम्र याचिकाओं के बजाय असहयोग और प्रत्यक्ष कार्रवाई।
उदारवादी बनाम उग्रवादी –
उदारवादी
- सामाजिक आधार: ज़मींदार और उच्च मध्यम वर्ग।
- पाश्चात्य उदारवाद और यूरोपीय इतिहास से प्रेरित।
- ब्रिटेन के सभ्यतागत मिशन में विश्वास।
- ब्रिटेन से राजनीतिक संबंधों को लाभकारी मानते थे।
- ब्रिटिश क्राउन के प्रति वफादार।
- जन-भागीदारी नहीं चाहते थे – उनका मानना था कि जनता आंदोलन के लिए तैयार नहीं है।
- संवैधानिक सुधार और सिविल सेवाओं में भारतीयों की अधिक भागीदारी की मांग।
- केवल संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों का प्रयोग।
- अक्सर औपनिवेशिक संरचना के साथ सहयोग करने वाले एक वर्ग की तरह व्यवहार करते थे (कभी-कभी उन्हें ‘कम्प्राडोर’ (दलाल) के रूप में देखा जाता था)।
उग्रवादी
- सामाजिक आधार: शिक्षित मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग।
- भारतीय इतिहास, संस्कृति और हिंदू प्रतीकों से प्रेरित।
- ब्रिटेन के कथित सभ्यतागत मिशन को अस्वीकार किया।
- ब्रिटेन के साथ संबंधों को शोषण का साधन माना।
- क्राउन के प्रति वफादारी को नकारा।
- जनभागीदारी और बलिदान में दृढ़ विश्वास रखते थे।
- बहिष्कार और अहिंसक प्रतिरोध जैसे गैर-संवैधानिक तरीकों का इस्तेमाल किया।
- देशभक्त (बलिदान देने को तैयार) थे, न कि सहयोगी।
- बाल गंगाधर तिलक – “यदि हम वर्ष में एक बार मेंढक की तरह टर्रायेंगे, तो हमें अपने प्रयासों में कोई सफलता नहीं मिलेगी।” (यह कांग्रेस के वार्षिक तीन-दिवसीय सत्रों के संदर्भ में था)।
- लाला लाजपत राय: उन्होंने कांग्रेस की आलोचना करते हुए इसे “ब्रिटिश शिक्षित विशिष्ट वर्ग का निरर्थक वार्षिक उत्सव” कहा।
- अरबिंदो घोष: अपनी लेखों की श्रृंखला ‘न्यू लैम्प्स फॉर ओल्ड’ में उन्होंने कांग्रेस को ‘सर्वहारा’ (Proletariat) से कटा हुआ बताया और उस पर ब्रिटिश आकाओं को नाराज न करने के डर और “सामान्य कायरता” का आरोप लगाया।
सूरत विभाजन (1907)
पृष्ठभूमि –
बनारस अधिवेशन (1905) –
- उग्रवादी चाहते थे कि:
- स्वदेशी और बहिष्कार की नीति को बंगाल से बाहर सम्पूर्ण देश में फैलाया जाए।
- बहिष्कार में ब्रिटिश व्यवस्था से जुड़ी सभी चीज़ों (न्यायालय, परिषदें, सरकारी सेवा) को शामिल किया जाए।
- एक राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन शुरू किया जाए।
- उदारवादी आंदोलन के विस्तार के विरोधी थे और केवल संवैधानिक विरोध तक सीमित रहना चाहते थे।
- बंगाल में स्वदेशी और बहिष्कार पर एक नरम समझौतावादी प्रस्ताव पारित कर विभाजन को अस्थायी रूप से टाल दिया गया।
कलकत्ता अधिवेशन (1906)
- उग्रवादियों की बढ़ती लोकप्रियता और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उदारवादियों का प्रभाव कम होने लगा था।
- उग्रवादी तिलक या लाला लाजपत राय को अध्यक्ष बनाना चाहते थे।
- उदारवादियों ने दादाभाई नौरोजी का नाम प्रस्तावित किया, जिनका सभी सम्मान करते थे।
- नौरोजी अध्यक्ष चुने गए और कांग्रेस ने पहली बार आधिकारिक तौर पर ‘स्वराज’ को अपना लक्ष्य घोषित किया।
- अधिवेशन में स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा का समर्थन किया गया।
- ‘स्वराज’ की व्याख्या को लेकर उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच मतभेद बने रहे, जिसने भविष्य के संघर्ष के बीज बो दिए।
कांग्रेस का विभाजन (1907) – सूरत अधिवेशन
- विभाजन के कारण
- उग्रवादी चाहते थे कि:
- 1907 का अधिवेशन नागपुर में आयोजित हो।
- तिलक या लाला लाजपत राय को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए।
- स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्तावों की पुनः पुष्टि हो।
- उदारवादियों की रणनीति:
- अधिवेशन सूरत में आयोजित किया गया (ताकि तिलक को अध्यक्ष बनने से रोका जा सके – नियम के अनुसार, मेजबान प्रांत का नेता अध्यक्ष नहीं बन सकता था)।
- रासबिहारी घोष को अध्यक्ष प्रस्तावित किया गया।
- वे स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रस्तावों को हटाना चाहते थे।
- दोनों पक्षों ने कड़ा रुख अपनाया, जिससे समझौता असंभव हो गया।
- अंततः कांग्रेस का विभाजन हो गया और इसके बाद संगठन पर उदारवादियों का वर्चस्व स्थापित हो गया।
- उदारवादियों ने पुनः पुष्टि की:
- ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन का लक्ष्य।
- केवल संवैधानिक तरीकों का सख्ती से पालन।
सरकारी दमन (1907–1911)
- विभाजन के बाद ब्रिटिश सरकार ने उग्रवादियों के विरुद्ध व्यापक दमन चक्र चलाया और कई कठोर कानून पारित किए:
- राजद्रोही सभा अधिनियम (1907)
- भारतीय समाचार पत्र (अपराधों के लिए उकसाना) अधिनियम, 1908
- आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम (1908)
- भारतीय प्रेस अधिनियम (1910)
- क्रांतिकारी भावनाओं का समर्थन करने वाले लेखों के कारण 1909 में तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें 6 वर्ष के लिए मांडले जेल भेज दिया गया।
- तिलक का प्रसिद्ध कथन: “मैं मानता हूँ कि मैं निर्दोष हूँ… मेरे कष्ट सहने से ही यह उद्देश्य (स्वतंत्रता) अधिक फल-फूल सकता है।”
- अन्य नेताओं का हटना: अरबिंदो घोष और बिपिन चंद्र पाल ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया, जबकि लाला लाजपत राय विदेश चले गए।
- विभाजन का प्रभाव
- उग्रवादी कोई वैकल्पिक संगठन खड़ा करने में असफल रहे।
- उदारवादियों ने अपना जनाधार खो दिया क्योंकि युवा वर्ग उग्रवादी विचारधारा की ओर अधिक आकर्षित था।
- राष्ट्रीय आंदोलन कुछ समय के लिए सुस्त पड़ गया।
बाल गंगाधर तिलक
- युवाओं में आत्मविश्वास, बलिदान की भावना और आत्मरक्षा के गुण विकसित करने के लिए तिलक ने ‘लाठी क्लब’ और ‘अखाड़ों’ (कुश्ती केंद्रों) की स्थापना की।
- बाल गंगाधर तिलक ‘गांधी सेवा संघ’ के स्थापना काल (1923) में उसके सदस्य नहीं थे।(उनका निधन 1920 में हो गया था)।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, सरदार वल्लभभाई पटेल इसकी स्थापना के समय इसके सदस्य थे।
- 1908 में ‘केसरी’ में प्रकाशित एक लेख के कारण उन्हें 6 वर्ष का कारावास हुआ और मांडले जेल (बर्मा) भेजा गया।
- तिलक की गिरफ्तारी के विरोध में बंबई (मुंबई) के मिल मजदूरों और रेलवे कर्मचारियों ने 6 दिनों की हड़ताल की।
- 1908 में देशद्रोही लेख प्रकाशित करने के कारण ‘केसरी’ समाचारपत्र पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।
- तिलक कभी भी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बने, लोग उन्हें “बिना ताज का राजा” कहा करते थे।
- मांडले जेल में प्रवास के दौरान उन्होंने ‘गीता रहस्य’ नामक कालजयी ग्रंथ लिखा।
- उनकी एक अन्य प्रसिद्ध पुस्तक ‘आर्कटिक होम ऑफ द आर्यांस’ है।
- स्वदेशी वस्तु प्रचारिणी सभा की स्थापना बाल गंगाधर तिलक ने 1905 में मुंबई में की।
- लोकमान्य तिलक पहले नेता थे जिन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में ‘स्वराज’ शब्द का प्रयोग किया।
- उन्होंने उद्घोषणा की: “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।
- “समाचारपत्र –
- केसरी (मराठी)
- मराठा (अंग्रेज़ी)
स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन
- आंदोलन की शुरुआत
- स्वदेशी आंदोलन का उद्भव बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में हुए विभाजन-विरोधी आंदोलन से हुआ।
- स्वदेशी: स्वदेशी (भारतीय) वस्तुओं का उपयोग।
- बहिष्कार: विदेशी वस्तुओं (मुख्यतः ब्रिटिश) का त्याग।

- बंगाल विभाजन (1903–1905): ‘फूट डालो और राज करो’ की सोची-समझी रणनीति
- आधिकारिक कारण: 7.8 करोड़ की जनसंख्या वाला प्रांत “प्रशासनिक दृष्टि से बहुत बड़ा” था।
- वास्तविक उद्देश्य: भारतीय राष्ट्रवाद के केंद्र ‘बंगाल’ को कमजोर करना।
- बंगाली आबादी का विभाजन:
- भाषाई आधार पर: मुख्य बंगाल में बंगालियों (1.7 करोड़) को हिंदी और उड़िया भाषियों (3.7 करोड़) के सामने अल्पसंख्यक बनाना।
- धार्मिक रूप से:
- पश्चिम बंगाल → हिंदू बहुल क्षेत्र
- पूर्वी बंगाल → मुस्लिम बहुल क्षेत्र
- बंगाली आबादी का विभाजन:
- लॉर्ड कर्जन ने ढाका को राजधानी बनाकर एक मुस्लिम बहुल प्रांत बनाकर मुसलमानों को लुभाने का प्रयास किया।
स्वदेशी आंदोलन की गतिविधियाँ (1903–1905)
- प्रारंभिक नेतृत्व सुरेंद्रनाथ बनर्जी, के.के. मित्रा और पृथ्वीशचंद्र राय द्वारा किया गया।
- उदारवादियों द्वारा अपनाए गए तरीके
- सरकार को याचिकाएं देना।
- सार्वजनिक सभाएं और ज्ञापन (Memoranda)।
- पत्रिकाओं और समाचार पत्रों (हितवादी, संजीवनी, बंगाली) के माध्यम से प्रचार।
- उद्देश्य: विभाजन को रोकने के लिए भारत और इंग्लैंड में शिक्षित जनमत तैयार करना।
- उदारवादियों द्वारा अपनाए गए तरीके
- जुलाई 1905: व्यापक जनविरोध के बावजूद बंगाल विभाजन की घोषणा की गई।
- 7 अगस्त, 1905: कलकत्ता टाउन हॉल में ‘बहिष्कार प्रस्ताव’ पारित किया गया (सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में)।
- नेताओं ने मैनचेस्टर के कपड़ों और लिवरपूल के नमक के बहिष्कार का संदेश पूरे बंगाल में फैलाया।
- 16 अक्टूबर, 1905 – शोक दिवस
- इस दिन विभाजन आधिकारिक रूप से प्रभावी हुआ। जनता ने विरोध स्वरूप निम्नलिखित कार्य किए:
- उपवास रखना, गंगा स्नान और नंगे पैर जुलूस निकालना।
- “वंदे मातरम” का गान (जो आंदोलन का मुख्य गीत बन गया)।
- इस दिन विभाजन आधिकारिक रूप से प्रभावी हुआ। जनता ने विरोध स्वरूप निम्नलिखित कार्य किए:
- रवींद्रनाथ टैगोर ने “आमार सोनार बांग्ला” की रचना की।
- हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए रक्षाबंधन
- टैगोर और रामेंद्र सुंदर त्रिवेदी ने लोगों से रक्षाबंधन (6 अक्टूबर, 1905) मनाने का आग्रह किया।
- राखी बांधना → पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के बीच एकता का प्रतीक।
- सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस ने विशाल जनसभाओं को संबोधित किया।
- बंगाल के बाहर स्वदेशी आंदोलन का प्रसार
- पूना, बॉम्बे – तिलक
- पंजाब – लाला लाजपत राय, अजीत सिंह
- दिल्ली – सैयद हैदर रज़ा
- मद्रास – चिदंबरम पिल्लै
कांग्रेस की भूमिका (1905–1907)
1905 कांग्रेस अधिवेशन (गोखले)
- बंगाल के विभाजन की निंदा की।विभाजन विरोधी और स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया।
- उदारवादी बनाम उग्रवादी दृष्टिकोणउग्रवादी (तिलक, लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, अरबिंदो घोष):
- वे इस आंदोलन को पूरे भारत में फैलाना चाहते थे।वे इसे ‘स्वराज’ के लिए एक ‘जन संघर्ष’ बनाना चाहते थे।
- उदारवादी:
- वे आंदोलन का समर्थन तो करते थे, लेकिन इसे बंगाल के बाहर ले जाने और एक राजनीतिक जन आंदोलन में बदलने के विरोधी थे।
- 1906 कलकत्ता अधिवेशन (नौरोजी)कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर स्वशासन या ‘स्वराज’ को अपना मुख्य लक्ष्य घोषित किया (ब्रिटिश उपनिवेशों की तर्ज पर)।
- सूरत विभाजन (1907)आंदोलन की रणनीति और अध्यक्ष पद को लेकर उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच गतिरोध → कांग्रेस का विभाजन।परिणाम: इस विभाजन से स्वदेशी आंदोलन को गहरा धक्का लगा और वह कमजोर पड़ गया।
उग्रवादी/गरमदलीय नेतृत्व में स्वदेशी आंदोलन (1905 के बाद)
- उग्रवादियों के उदय का कारण
- उदारवादी नेतृत्व वाले आंदोलन की विफलता।
- बंगाल सरकार की विभाजनकारी नीतियां।
- ब्रिटिश दमनकारी उपाय: छात्रों पर अत्याचार, सभाओं पर प्रतिबंध, गिरफ्तारियाँ और प्रेस पर पाबंदियाँ।
- उग्रवादी कार्यक्रम: इन्होंने ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’, स्वदेशी और निम्नलिखित के बहिष्कार का आह्वान किया:
- सरकारी स्कूल/कॉलेज
- सरकारी नौकरियां, अदालतें, नगरपालिकाएं
- सरकारी उपाधियां और सम्मान।
- संघर्ष के नए स्वरूप
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
- विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली जलाई गई, विदेशी नमक और चीनी के उपयोग से इंकार किया गया।
- सामाजिक बहिष्कार को प्रभावी बनाने के लिए पुजारी, धोबी आदि भी इसमें शामिल हुए।
- जनसभाएँ और जुलूस
- जन-आंदोलन और जन-अभिव्यक्ति के प्रमुख माध्यम बने।
- स्वयंसेवी दलों (‘समितियों’) का गठन
- उदाहरण:
- स्वदेश बांधव समिति: अश्विनी कुमार दत्त (बारीसाल)।
- स्वदेशी संगम: वी.ओ. चिदंबरम पिल्लै (तमिलनाडु)।
- गतिविधियाँ: राजनीतिक चेतना का प्रसार, व्याख्यान, देशभक्ति गीत, सामाजिक सेवा, विद्यालयों की स्थापना, हस्तशिल्प को बढ़ावा, पंचायती/मध्यस्थता न्यायालय।
- उदाहरण:
- उत्सवों और मेलों का उपयोग
- तिलक द्वारा गणपति उत्सव (1893) और शिवाजी उत्सव (1895) को स्वदेशी प्रचार के लिए प्रयोग किया गया।
- बंगाल में लोक-नाट्य का प्रयोग राजनीतिक संदेशों के प्रसार हेतु किया गया।
- आत्मनिर्भरता (आत्मशक्ति) पर बल
- राष्ट्रीय गौरव, आत्मविश्वास और ग्रामीण पुनरुद्धार पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- सामाजिक सुधार: जातिगत उत्पीड़न, बाल विवाह, दहेज प्रथा और मद्यपान के विरुद्ध अभियान।
- राष्ट्रीय / स्वदेशी शिक्षा
- 15 अगस्त 1906 को ‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद्’ (National Council of Education) की स्थापना की गई।
- इसके तहत बंगाल नेशनल कॉलेज और बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट की नींव रखी गई।
- अरबिंदो घोष बंगाल नेशनल कॉलेज के प्रथम प्राचार्य और रासबिहारी घोष इसके प्रथम अध्यक्ष बने।
- यह कॉलेज टैगोर के शांतिनिकेतन (1901) से प्रेरित था।
- सतीशचंद्र मुखर्जी ने राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उन्होंने अपने समाचार पत्र ‘डॉन’ (Dawn) और ‘डॉन सोसाइटी’ (1902) के माध्यम से शिक्षा और उद्योग में स्वावलंबन का प्रचार किया।
- उन्होंने 1895 में ‘भागवत चतुष्पथी’ की स्थापना कर शिक्षा आंदोलन की नींव रखी।
- उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा परिषद के गठन में सहयोग किया और अरविंद घोष के त्यागपत्र के बाद बंगाल नेशनल कॉलेज में पहले प्राध्यापक तथा बाद में प्राचार्य बने।
- छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए जापान भेजने हेतु धन एकत्रित किया गया।
- स्वदेशी या देशी उद्यम
- सखाराम गणेश देउस्कर की पुस्तक ‘देशेर कथा’ (1904) ने कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया; इसने नौरोजी और रानाडे के विचारों को सरल भाषा में लोकप्रिय बनाया।
- इस पुस्तक ने औपनिवेशिक राज्य द्वारा किए जा रहे “मस्तिष्क के सम्मोहक विजय” (Hypnotic conquest of the mind) के प्रति चेतावनी दी।
- वी.ओ. चिदंबरम पिल्लै ने तूतूकुड़ी/तूतीकोरिन (Tuticorin) में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी की स्थापना की।
- सखाराम गणेश देउस्कर की पुस्तक ‘देशेर कथा’ (1904) ने कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया; इसने नौरोजी और रानाडे के विचारों को सरल भाषा में लोकप्रिय बनाया।
- स्वदेशी संस्थान के उदाहरण:
- बंगाल केमिकल्स – पी.सी. रॉय (1893)
- स्वदेशी भंडार (1897) – रवींद्रनाथ टैगोर
- इंडियन स्टोर्स (1901) – जोगेशचंद्र चौधरी
- लक्ष्मी भंडार (1903) – सरला देवी
सांस्कृतिक क्षेत्र पर प्रभाव
- स्वदेशी आंदोलन के दौरान रचित रवींद्रनाथ टैगोर का गीत अमर सोनार बंगला बाद में बांग्लादेश का राष्ट्रीय गीत बना।
- तमिलनाडु में, सुभ्रमण्यम भारती ने सुदेश गीतम् लिखा।

चित्रकला और कला पर प्रभाव
- अवनिंद्रनाथ टैगोर: उन्होंने ‘विक्टोरियन प्रकृतिवाद‘ (Victorian Naturalism) को चुनौती दी और अजंता, मुगल तथा राजपूत चित्रकला शैलियों से प्रेरणा ली।
- नंदलाल बोस: भारतीय कला के एक प्रमुख स्तंभ, जिन्हें 1907 में ‘इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट’ की पहली छात्रवृत्ति प्राप्त हुई।
विज्ञान पर प्रभाव
- जगदीश चंद्र बोस (J.C. Bose) और प्रफुल्ल चंद्र राय (P.C. Ray) जैसे वैज्ञानिकों ने अग्रणी अनुसंधान किए, जिनकी वैश्विक स्तर पर प्रशंसा हुई।
- मुसलमानों का रुख
- अब्दुल रसूल, लियाकत हुसैन और मौलाना आजाद जैसे कुछ मुस्लिम नेताओं ने आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
- स्वदेशी आंदोलन में हिंदू प्रतीकों के अत्यधिक उपयोग ने कई मुसलमानों को आंदोलन से अलग कर दिया।
- अधिकांश उच्च और मध्यम वर्ग के मुसलमान आंदोलन से दूर रहे।
- ढाका के नवाब सलीमुल्ला ने बंगाल विभाजन का समर्थन किया।
- श्रमिक असंतोष और ट्रेड यूनियन गतिविधियाँ
- प्रमुख घटनाएँ:
- ईस्ट इंडियन रेलवे हड़ताल (जुलाई 1906) → रेलवे कर्मचारियों के यूनियन का गठन।
- जूट मिल हड़ताल: 1906-1908 के दौरान बार-बार हड़तालें हुईं; कभी-कभी सभी 18 मिलें प्रभावित होती थीं।
- दक्षिण भारत: तूतीकोरिन और तिरुनेलवेली में सुब्रमण्यम शिव और चिदंबरम पिल्लै ने हड़तालों का नेतृत्व किया।
- रावलपिंडी: लाला लाजपत राय और अजीत सिंह के नेतृत्व में शस्त्रागार (Arsenal) और रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल की।
आंदोलन का सामाजिक आधार
- इसमें जमींदारों (कुछ वर्ग), छात्रों, महिलाओं और शहरी निम्न मध्यम वर्ग ने भाग लिया।
- श्रमिकों की आर्थिक शिकायतों को राजनीतिक आंदोलन से जोड़ने के प्रयास किए गए।
- विफलता: यह आंदोलन मुस्लिम समुदाय, विशेषकर मुस्लिम किसानों का समर्थन प्राप्त करने में विफल रहा।
बंगाल विभाजन का रद्द होना (1911)
- 1911 में ब्रिटिश सरकार ने जनदबाव में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया।
- ब्रिटिशों के क्षतिपूर्ति उपाय:
- भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किया गया (दिल्ली को मुस्लिम इतिहास से जोड़ा गया)।
- नए प्रांतों का गठन: बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग किया गया, और असम को भी एक पृथक प्रांत बनाया गया।
- आंदोलन के धीमा पड़ने (Fizzling out) के कारण (1908 तक)
- सरकार की दमनकारी नीतियों से आंदोलन कमजोर हो गया।
- संगठनात्मक ढांचा का अभाव: निष्क्रिय प्रतिरोध और असहयोग जैसी तकनीकें तो सामने आईं, लेकिन उनमें अनुशासित समन्वय की कमी थी।
- नेतृत्व का शून्य: अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए या निर्वासित कर दिए गए; अरबिंदो घोष और बिपिन चंद्र पाल ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।
- आंतरिक कलह: 1907 के सूरत विभाजन ने आंदोलन की एकता को भारी नुकसान पहुँचाया।
- सीमित सामाजिक पहुंच: यह मुख्य रूप से उच्च/मध्यम वर्ग तक सीमित रहा और किसानों को बड़े पैमाने पर नहीं जोड़ सका।
- असहयोग और निष्क्रिय प्रतिरोध ज़्यादातर सैद्धांतिक ही रहे।
- जन-आंदोलन लंबे समय तक उच्च तीव्रता बनाए नहीं रख सकते।
आंदोलन एक निर्णायक मोड़ के रूप में
- बड़ी छलांग: पहली बार नए सामाजिक समूह (छात्र, महिलाएं, श्रमिक, शहरी व ग्रामीण वर्ग) राजनीति में शामिल हुए।
- भविष्य की नींव: भविष्य की सभी प्रमुख धाराओं – उदारवाद, उग्रवाद, क्रांतिकारी गतिविधियाँ, प्रारंभिक समाजवाद और असहयोग – का उद्भव यही से माना जाता है।
- कला, साहित्य, विज्ञान और स्वदेशी उद्योग पर प्रभाव पड़ा।
- जनता ने साहसी राजनीतिक रुख अपनाना और नए राजनीतिक तरीकों को स्वीकार करना सीखा।
- इसने औपनिवेशिक विचारधारा की प्रभुसत्ता को चुनौती दी।
- इस आंदोलन से प्राप्त अनुभवों ने गांधीवादी आंदोलनों सहित भविष्य के सभी राष्ट्रीय संघर्षों को आकार दिया।
