ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियाँ : आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत क्रांतिकारी गतिविधियाँ ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र और उग्र प्रतिरोध के रूप में उभरीं, जिनका उद्देश्य औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देना था। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अन्य क्रांतिकारियों ने साहस, संगठन और बलिदान के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की।
प्रथम चरण की क्रांतिकारी गतिविधियाँ
1907–1915 के दौरान क्रांतिकारी गतिविधियाँ
उदारवाद बनाम उग्रवाद
- क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के कारण –
- ब्रिटिश शासन के वास्तविक स्वरूप की पहचान
- ब्रिटिश सरकार ने महत्वपूर्ण राष्ट्रवादी माँगों को स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
- यह धारणा मज़बूत हुई कि केवल भारतीय शासन से ही देश की प्रगति संभव है।
- 1890 के दशक के उत्तरार्ध की आर्थिक त्रासदी:
- भीषण अकाल (1896-1900 के बीच लगभग 90 लाख मौतें)।
- दक्कन में ‘ब्यूबोनिक प्लेग’ का प्रकोप।
- बड़े पैमाने पर दंगे।
- ब्रिटिश सरकार द्वारा अधिकार देने के बजाय मौजूदा अधिकारों को छीनना।
- दमनकारी कार्रवाइयाँ (कालक्रम)
- 1892 – भारतीय परिषद अधिनियम ने राष्ट्रवादियों को निराश किया।
- 1897 – नाटू बंधुओं का निर्वासन; तिलक को राजद्रोह के आरोप में कारावास।
- 1898 – राजद्रोह कानूनों को कठोर बनाया गया (आईपीसी धारा 124A + धारा 156A)।
- 1899 – कलकत्ता कॉरपोरेशन में भारतीय सदस्यों की संख्या घटाई गई।
- 1904 – आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) द्वारा प्रेस पर प्रतिबंध।
- 1904 – भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम → विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा।
- ब्रिटिश शासन के वास्तविक स्वरूप की पहचान
- आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान में वृद्धि
- तिलक, अरबिंदो और बी.सी. पाल जैसे नेताओं ने भारतीयों को अपनी शक्ति पर भरोसा करने के लिए प्रेरित किया।
- जनता का स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की क्षमता में विश्वास बढ़ा।
- शिक्षा का प्रसार
- शिक्षा के प्रसार से राजनीतिक चेतना में वृद्धि हुई।
- शिक्षित बेरोज़गारी ने औपनिवेशिक आर्थिक जड़ता को उजागर किया।
- कट्टरपंथी युवाओं में असंतोष बढ़ा।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव
- 1868 के बाद जापान की तीव्र प्रगति ने प्रदर्शित किया कि एशिया में आधुनिकीकरण संभव है।
- इथियोपिया द्वारा इटली की हार (1896), बोअर युद्ध (1899–1902), जापान द्वारा रूस की पराजय (1905) → यूरोपीय अजेयता का मिथक टूटा।
- आयरलैंड, रूस, मिस्र, तुर्की, फारस और चीन के राष्ट्रवादी संघर्षों से प्रेरणा मिली।
- यह बोध हुआ कि संगठित और बलिदानी राष्ट्र साम्राज्यों को पराजित कर सकते हैं।
- अत्यधिक पश्चिमीकरण के विरुद्ध प्रतिक्रिया
- औपनिवेशिक सांस्कृतिक प्रभुत्व के कारण भारतीय पहचान खोने का डर।
- भारतीय प्रेरणा के स्रोत:
- स्वामी विवेकानंद
- बंकिम चंद्र चटर्जी
- स्वामी दयानंद सरस्वती
- इन विचारकों ने भारत के गौरवशाली अतीत को रेखांकित किया और पश्चिमी श्रेष्ठता के भ्रम को तोड़ा।
- दयानंद का संदेश: “भारत भारतीयों के लिए है।”
- उदारवादियों से असंतोष
- युवा वर्ग उदारवादियों की सीमित उपलब्धियों (1885-1905) से असंतुष्ट था।
- उन्होंने शांतिपूर्ण संवैधानिक तरीकों (प्रार्थना, याचिका और विरोध) को “राजनीतिक भिक्षावृत्ति” (Political Mendicancy) कहकर इसकी आलोचना की।
- कर्ज़न की प्रतिक्रियावादी नीतियाँ
- लॉर्ड कर्जन (1899-1905) ने राष्ट्रवादियों का अपमान किया और भारत के ‘राष्ट्र’ होने के अस्तित्व को नकारा।
- दमनकारी कदम:
- आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम
- भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम
- कलकत्ता कॉरपोरेशन अधिनियम
- बंगाल विभाजन (1905) – सबसे उत्तेजक कदम।
- इससे यह विश्वास और मज़बूत हुआ कि ब्रिटिश शासन प्रतिक्रियावादी और हानिकारक है।
- एक उग्रवादी विचारधारा का अस्तित्व
- प्रमुख नेता:
- बंगाल: राज नारायण बोस, अश्विनी कुमार दत्त, अरविंद घोष, बी.सी. पाल
- महाराष्ट्र: विष्णुशास्त्री चिपलुंकर, बाल गंगाधर तिलक
- पंजाब: लाला लाजपत राय
- प्रमुख नेता:
- प्रशिक्षित नेतृत्व का उदय
- नए नेताओं ने जनता की ऊर्जा को संगठित राजनीतिक संघर्ष में बदला। यह क्षमता बंगाल के विभाजन-विरोधी आंदोलन के दौरान स्वदेशी आंदोलन के रूप में प्रकट हुई।
क्रांतिकारी गतिविधियाँ
बंगाल –
- प्रारंभिक गुप्त संगठन
- 1870 के दशक तक: कलकत्ता के छात्रों के बीच अनेक गुप्त संगठन मौजूद थे (परंतु निष्क्रिय)।
- 1902:
- मिदनापुर में ज्ञानेंद्रनाथ बसु के नेतृत्व में क्रांतिकारी समूह।
- कलकत्ता में अनुशीलन समिति का गठन (प्रमथ मित्र, जतीन्द्रनाथ बनर्जी, वारिन्द्र कुमार घोष)।
- शुरुआत में गतिविधियाँ शारीरिक/नैतिक प्रशिक्षण तक सीमित थीं।
- युगांतर
- 1906
- अनुशीलन समिति के सदस्यों (वारिन्द्र कुमार घोष, भूपेंद्रनाथ दत्त) ने युगांतर पत्र का आरंभ किया, जिसमें सशस्त्र क्रांति का समर्थन किया गया।
- भवानी मंदिर राजनीतिक पैम्फलेट
- वारिन्द्र कुमार घोष और अरविंद घोष द्वारा प्रकाशित, जिसका उद्देश्य क्रांतिकारी गतिविधियों का संगठन करना था।
- हेमचंद्र घोष और लीला नाग ने ‘बंगाल स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की तथा अनिल राय ने ‘श्री संघ’ की स्थापना की।
- क्रांतिकारी नेटवर्क का विस्तार
- रासबिहारी बोस एवं सचिन सान्याल ने पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में एक गुप्त संगठन स्थापित किया।
- हेमचंद्र कानूंगो सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए विदेश गए।
महत्वपूर्ण क्रांतिकारी घटनाएँ (1907–1908)
- गवर्नर फुलर पर हमला (1907)
- पूर्वी बंगाल और असम के प्रथम उप-राज्यपाल सर फुलर की हत्या का विफल प्रयास किया गया।
- लेफ्टिनेंट गवर्नर एंड्रयू फ्रेज़र पर हमला (दिसंबर 1907)
- एंड्रयू फ्रेज़र को मारने के उद्देश्य से उनकी ट्रेन को पटरी से उतारने (Derail) का प्रयास किया गया।
- मुजफ्फरपुर बम कांड (1908)
- प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस ने मुजफ्फरपुर के जज किंग्सफोर्ड को निशाना बनाया, जो अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात था।
- भूलवश बम गलत बग्गी (Carriage) पर गिर गया, जिससे दो ब्रिटिश महिलाओं की मृत्यु हो गई।
- गिरफ्तारी से बचने के लिए प्रफुल्ल चाकी ने स्वयं को गोली मार ली।
- खुदीराम बोस पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें फांसी दे दी गई।
- अलीपुर षड्यंत्र केस (1908–1909)
- अनुशीलन समिति के पूरे समूह की गिरफ्तारी (जिसमें अरविंद घोष और वारिन्द्र घोष शामिल)।
- उन पर सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने (राजद्रोह/Treason) का आरोप लगाया गया।
- सी.आर. दास ने अरविंद घोष का बचाव किया → साक्ष्य के अभाव में बरी।
- वारिन्द्र घोष और उल्लासकर दत्त को पहले मृत्युदंड दिया गया, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया।
- सरकारी गवाह नरेंद्र गोसाईं की जेल के अंदर ही सत्येंद्रनाथ बोस और कन्हाई लाल दत्त ने गोली मारकर हत्या कर दी।
- अन्य प्रमुख कार्रवाई
- 1908 ढाका अनुशीलन द्वारा फंड जुटाने के लिए बर्रा डकैती।
- दिल्ली षड्यंत्र केस (1912)
- रासबिहारी बोस और सचिन सान्याल ने दिल्ली के चांदनी चौक में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम से हमला किया।
- हार्डिंग घायल हो गया लेकिन वह जीवित बच गया।
- इस मामले में चले मुकदमे के परिणामस्वरूप बसंत कुमार विश्वास, अमीर चंद और अवध बिहारी को फांसी दे दी गई।
- रासबिहारी बोस वेश बदलकर पुलिस को चकमा देकर भागने में सफल रहे और बाद में उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- युगांतर और बाघा जतिन का उदय
- श्चिमी अनुशीलन समिति को जतिंद्रनाथ मुखर्जी (बाघा जतिन) के नेतृत्व में पुनर्गठित किया गया।
- उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में एक शक्तिशाली क्रांतिकारी नेटवर्क तैयार किया।
- क्रांतिकारी प्रकाशन
- संध्या पत्र – ब्रह्म बांधव उपाध्याय
- युगांतर – बंगाल
- काल – महाराष्ट्र
- सीमाएँ:
- हिंदू प्रतीकों पर अत्यधिक निर्भरता → मुसलमानों को अलग-थलग कर दिया।
- जनआंदोलन के बजाय व्यक्तिगत आतंकवाद को प्रोत्साहन।
- सीमित सामाजिक आधार: मुख्यतः उच्च जाति, शहरी, मध्यम वर्ग तक सीमित।
- संगठनात्मक स्थायित्व का अभाव।
- अंततः ब्रिटिश सरकार के कठोर दमन चक्र और ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ जैसे कानूनों ने इस आंदोलन को कुचल दिया।
महाराष्ट्र
- 1879: वासुदेव बलवंत फड़के ने ‘रामोसी किसान दल’ का गठन किया।
- उद्देश्य: सशस्त्र विद्रोह, ब्रिटिश संचार व्यवस्था को बाधित करना और डकैतियों के माध्यम से धन प्राप्त करना।
- इस आंदोलन को शुरुआत में ही दबा दिया गया।
- तिलक का प्रभाव (1890 का दशक)
- उन्होंने उग्र राष्ट्रवाद के प्रचार के लिए निम्नलिखित साधनों का उपयोग किया:
- उत्सव: गणपति महोत्सव और शिवाजी उत्सव।
- समाचार पत्र: ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेजी)।
- उन्होंने उग्र राष्ट्रवाद के प्रचार के लिए निम्नलिखित साधनों का उपयोग किया:
- चापेकर बंधु (1897)
- ये तिलक के अनुयायी थे।
- प्लेग आयुक्त रैंड तथा लेफ्टिनेंट आयर्स्ट की हत्या।
- कठोर प्लेग उपायों के विरोध में यह कार्यवाही की गई।
- ये तिलक के अनुयायी थे।
- सावरकर और अभिनव भारत
- 1899: सावरकर बंधुओं ने ‘मित्र मेला’ का गठन किया।
- 1904: मैजिनी के “यंग इटली” से प्रेरित होकर इसे ‘अभिनव भारत’ (एक गुप्त संस्था) में विलय कर दिया गया।
- नासिक, पूना और बंबई (मुंबई) बम बनाने के प्रमुख केंद्र बन गए।
- नासिक षड्यंत्र केस (1909)
- ‘अभिनव भारत’ के सदस्य अनंत कान्हेरे द्वारा नासिक के कलेक्टर ए.एम.टी. जैक्सन की हत्या कर दी गई।
- इस मामले में 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया। सावरकर और उनके भाइयों को मुख्य सूत्रधार माना गया।
- वीर सावरकर को दोहरे आजीवन कारावास (काला पानी) की सजा सुनाई गई।
- सावरकर बंधु
- नारायण दामोदर सावरकर
- विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर)
- गणेश दामोदर सावरकर
पंजाब
- उग्रवाद के उदय के कारण
- बार-बार अकाल।
- भूमि राजस्व एवं सिंचाई करों में वृद्धि।
- बेगार (बलात श्रम) की प्रथा।
- बंगाल के स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव।
- महत्वपूर्ण नेता और संगठन
- लाला लाजपत राय:
- ‘पंजाबी’ (Punjabee) समाचार पत्र का संपादन
- ध्येय वाक्य था- “किसी भी कीमत पर आत्मनिर्भरता”।
- अजीत सिंह:
- ‘अंजुमन-इ-मुहिब्बान-ए-वतन’ नामक संस्था का गठन
- ‘भारत माता’ नामक क्रांतिकारी पत्र का प्रकाशन।
- अन्य प्रमुख नेता: आगा हैदर, सैयद हैदर रजा, भाई परमानंद और कवि लालचंद ‘फलक’।
किसान आंदोलन
- अजीत सिंह के समूह ने किसानों के बीच व्यापक अभियान चलाया।
- उन्होंने किसानों को भू-राजस्व (Lagan) और आबयाना (सिंचाई कर) न देने के लिए प्रोत्साहित किया। इसी दौरान प्रसिद्ध गीत “पगड़ी संभाल जट्टा” राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बना।
सरकारी दमन (1907)
- ब्रिटिश सरकार ने पंजाब में राजनीतिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया।
- लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को गिरफ्तार कर निर्वासित (Deport) कर दिया गया, जिससे उग्रवादी गतिविधियाँ अस्थायी रूप से शांत हो गईं।
क्रांतिकारी मार्ग की ओर परिवर्तन
- निर्वासन और दमन के बाद, अजीत सिंह, सूफी अंबाप्रसाद, लालचंद, भाई परमानंद और लाला हरदयाल पूर्णकालिक क्रांतिकारी बन गए।
- इन नेताओं ने बाद में विदेशों (जैसे अमेरिका और कनाडा) में जाकर ‘गदर आंदोलन’ जैसी क्रांतिकारी गतिविधियों की नींव रखी।
विदेशों में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
- इंडिया हाउस (लंदन – 1905)
- श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापना।
- इंडियन होमरूल सोसाइटी।
- इंडिया हाउस।
- पत्रिका – द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट।
- सदस्यों में सावरकर और लाला हरदयाल शामिल थे।
- मदनलाल ढींगरा (1909)
- इंडिया ऑफिस के अधिकारी सर कर्ज़न वायली की हत्या।
- इसके बाद क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए लंदन असुरक्षित हो गया; दमन तेज़ हुआ।
- सावरकर को प्रत्यर्पित किया गया (1910) → आजीवन कारावास के लिए भेजा गया।
- पेरिस एवं जेनेवा
- नेतृत्व: मैडम भीकाजी कामा → ‘वंदे मातरम्’ और ‘मदन की तलवार’ का प्रकाशन।
- मैडम भीकाजी कामा को भारतीय क्रांति की जननी भी कहा जाता है।
- उन्होंने पेरिस में ‘इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की।
- 1907 में स्टुटगार्ट में पहली बार तिरंगा फहराया।
- अजीत सिंह भी सक्रिय थे।
- बर्लिन
- वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने, विशेषकर 1909 के बाद, इसे अपना केंद्र बनाया।
- लाला हरदयाल द्वारा बर्लिन में इंडियन फ़्रीडम लीग की स्थापना।
- ग़दर आंदोलन
- साप्ताहिक पत्र द ग़दर के इर्द-गिर्द संगठित।
- मुख्यालय: सैन फ़्रांसिस्को।
- ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पूर्ण सशस्त्र क्रांति का लक्ष्य।
- गदर पार्टी
- ‘हिंदी एसोसिएशन’ ग़दर पार्टी के क्रांतिकारी संगठन का पूर्ववर्ती रूप था।
- उद्देश्य: भारत में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और एक स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना करना।
- प्रारंभिक कार्यकर्ताओं में रामदास पुरी, जी.डी. कुमार, तारकनाथ दास, सोहन सिंह भाखना, लाला हरदयाल शामिल थे।
- क्रांतिकारी गतिविधियों के समर्थन हेतु स्वदेश सेवक होम (वैंकूवर) और यूनाइटेड इंडिया हाउस (सिएटल) की स्थापना की गई।
- रामनाथ पुरी ने सैन फ़्रांसिस्को में ‘हिंदुस्तान एसोसिएशन’ तथा ‘सर्कुलर-ए-आज़ादी’ प्रारंभ किया।
- बाबा सोहन सिंह भाखना (1870–1968): वे ग़दर पार्टी के संस्थापक तथा अमेरिका में इसके प्रथम अध्यक्ष थे।
- लाला हरदयाल: वे ग़दर पार्टी के महासचिव थे। साप्ताहिक पत्र ग़दर के संपादक भी थे।
- पंडित काशी राम मोराली: सोहन सिंह भाखना के साथ मिलकर ‘हिंदी एसोसिएशन’ की स्थापना की। वे ग़दर पार्टी के कोषाध्यक्ष थे।
- भाई परमानंद: वे भी ग़दर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में थे। उन्होंने ग़दर पार्टी के लिए तारीख़-ए-हिंद नामक पुस्तक लिखी।
- उद्देश्य
- ब्रिटिश अधिकारियों की हत्याएं करना।
- क्रांतिकारी एवं साम्राज्यवाद-विरोधी साहित्य का प्रकाशन।
- विदेशों में भारतीय सैनिकों के बीच कार्य करना।
- हथियारों की व्यवस्था करना।
- ब्रिटिश उपनिवेशों में एक साथ विद्रोह भड़काना।
- नेता – लाला हरदयाल, रामचंद्र, भगवान सिंह, करतार सिंह सराभा, भाई परमानंद।
- कामागाटामारू प्रकरण (1914)
- गुरदित सिंह द्वारा भेजा गया जहाज़ कामागाटामारू सिंगापुर से 376 यात्रियों (मुख्यतः सिख एवं पंजाबी मुसलमान) को लेकर वैंकूवर पहुँचा।
- कनाडाई अधिकारियों ने लगभग 2 महीने तक जहाज़ को बंदरगाह पर रोके रखा और अंततः ब्रिटिश सरकार के दबाव में यात्रियों को प्रवेश से वंचित कर वापस भेज दिया। जहाज़ कलकत्ता लौटा।
- यात्रियों ने पंजाब जाने वाली ट्रेन में बैठने से इनकार कर दिया → बज-बज (Budge Budge) में पुलिस से संघर्ष हुआ।
- बर्लिन समिति (1915)
- वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, भूपेन्द्रनाथ दत्त, लाला हरदयाल द्वारा जर्मन सहयोग से स्थापना (ज़िम्मरमैन योजना के अंतर्गत)।
- गतिविधियाँ:
- विदेशों में बसे भारतीयों को संगठित कर भारत में स्वयंसेवक व हथियार भेजना।
- ब्रिटिश सेना में भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए उकसाना।
- ब्रिटिश भारत पर सशस्त्र आक्रमण की योजना बनाना।
- बगदाद, फारस, तुर्की और काबुल में मिशन भेजकर ब्रिटिश-विरोधी भावना भड़काना।
- काबुल मिशन
- राजा महेन्द्र प्रताप सिंह, बरकतुल्ला, ओबईदुल्ला सिंधी ने क्राउन प्रिंस अमानुल्लाह के सहयोग से अस्थायी भारतीय सरकार बनाने का प्रयास किया।
- दामोदर दास राठी ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सशस्त्र क्रांति हेतु रास बिहारी बोस और राजा महेन्द्र प्रताप को आर्थिक सहायता प्रदान की।
सिंगापुर विद्रोह (1915)
- तिथि: 15 फ़रवरी 1915
- सेनाएँ: 5वीं लाइट इन्फैंट्री (पंजाबी मुसलमान) तथा 36वीं सिख बटालियन
- नेतृत्व: जमादार चिश्ती ख़ान, जमादार अब्दुल गनी, सूबेदार दाऊद ख़ान
- परिणाम: विद्रोह कुचल दिया गया; भारी जनहानि हुई।
- दंड: 37 को फाँसी, 41 को आजीवन कारावास।
- परिणाम
- नेताओं की गिरफ्तारी व निर्वासन; 45 क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई।
- रास बिहारी बोस जापान भाग गए।
- सचिन सान्याल को आजीवन कारावास दिया गया।
- ब्रिटिश सरकार ने डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट (मार्च 1915) पारित किया → व्यापक गिरफ्तारियाँ, विशेष न्यायालय और सैन्य अदालतें स्थापित की गईं।
द्वितीय चरण की क्रांतिकारी गतिविधियाँ
साम्यवादी और क्रांतिकारी गतिविधियाँ
नई शक्तियों का उदय (1920 का दशक)
- सामान्य विशेषताएँ –
- 1920 के दशक की घटनाएँ :
- राष्ट्रीय आंदोलन में आम जनमानस का प्रवेश
- विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओ का उदय
- ये विचारधाराएँ आंशिक रूप से गांधीवादी सत्याग्रह के प्रति सकारात्मक और नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से उत्पन्न हुई ।
- अंतर्राष्ट्रीय विचारधाराओं का प्रभाव भारतीय राजनीतिक चिंतकों पर पड़ना ।
- नई शक्तियों का उदय –
- समाजवादी/मार्क्सवादी विचारों का प्रसार।
- युवा सक्रियता और राजनीतिक जागरूकता।
- ट्रेड यूनियन आंदोलन का विकास।
- किसान आंदोलनों का उदय।
- जाति-आधारित आंदोलन।
- समाजवादी क्रांतिकारी गतिविधियों का आरम्भ ।
- मार्क्सवादी और समाजवादी विचारों का प्रसार –
- मार्क्स और अन्य समाजवादी विचारकों के विचारों से प्रेरित होकर समाजवादी और कम्युनिस्ट समूहों का गठन हुआ।
- कांग्रेस में एक युवा वामपंथ वर्ग का उदय हुआ, जिसका नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने किया।
- ये युवा राष्ट्रवादी:
- सोवियत क्रांति से प्रेरित थे।
- गांधीवादी तरीकों से असंतुष्ट थे।
- सर्वोच्च और क्रांतिकारी समाधान की वकालत करते थे।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)
- 1920 में ताशकंद (उज़्बेकिस्तान) में स्थापित।
- संस्थापक: एम. एन. रॉय, अबानी मुखर्जी और अन्य।
- दूसरे कॉमिनटर्न कांग्रेस के बाद स्थापित।
- एम. एन. रॉय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में पहले भारतीय निर्वाचित नेता बने।
- गिरफ्तारी और मुकदमे
- 1924 कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र मामला:
- प्रमुख नेता –
- एस.ए. डांगे
- मुजफ्फर अहमद
- शौकत उस्मानी
- नलिनी गुप्ता
- 1925: कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट सम्मेलन ने औपचारिक रूप से CPI की स्थापना की।
- 1929 मेरठ षड्यंत्र मामला: 31 कम्युनिस्टों और वामपंथी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। (मुजफ्फर अहमद, एस.ए. डांगे, शौकत उस्मानी, फिलिप स्प्रैट और बेंजामिन ब्रैडली।)
- ‘कृषक और मजदूर दल’ ने मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट विचारों का प्रसार किया।
- ये समूह राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बने रहे और कांग्रेस के साथ मिलकर काम किया।
- ट्रेड यूनियन आंदोलन का विकास
- ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना 1920 में हुई ।
- प्रथम अध्यक्ष: लाला लाजपत राय
- महासचिव: दीवान चमनलाल
- तिलक भी इसके निर्माण के पीछे एक प्रमुख व्यक्तित्व थे।
- 1920 के दशक के प्रमुख हड़तालें
- खड़गपुर रेलवे कार्यशाला
- टाटा आयरन एंड स्टील वर्क्स, जमशेदपुर
- 1923 में मद्रास में भारत में पहला मई दिवस मनाया गया ।
- समाजवादी उन्मुख क्रांतिकारी गतिविधियां
- दो प्रमुख धारा:
- हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) – पंजाब, यूपी, बिहार
- युगांतर, अनुशीलन, चिट्टागाँव विद्रोह समूह (सूर्य सेन के नेतृत्व में) – बंगाल
- दो धाराएँ:
- पंजाब–संयुक्त प्रांत (UP)–बिहार
- बंगाल
असहयोग आंदोलन के पश्चात क्रांतिकारी गतिविधियां
- पृष्ठभूमि
- पहले विश्व युद्ध के दौरान क्रांतिकारियों का दमन हुआ।
- मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को सफल बनाने के उद्देश्य से 1920 की शुरुआत में क्रांतिकारियों को क्षमादान के तहत रिहा किया गया ।
- क्रांतिकारी समूहों ने जिन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था या अपनी गतिविधियां रोक दी थी ,उन्हें गांधी द्वारा अचानक आंदोलन रोके जाने से निराशा हुई।
- युवा क्रांतिकारियों द्वारा तात्कालिक रूप से प्रचलित स्वराजवादियों के वैधानिक तरीक़े और अपरिवर्तनवादियों के रचनात्मक कार्यों के प्रति असंतोष की स्थिति
- क्रांतिकारी नेता इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सशस्त्र क्रांति आवश्यक है, जिससे ये गतिविधियाँ पुनर्जीवित हुईं।
- क्रांतिकारियों पर प्रभाव –
- मजदूर वर्ग के ट्रेड यूनियन आंदोलन का विकास (प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात)
- रूसी क्रांति (1917) और सोवियत संघ की सफलता
- कम्युनिस्ट समूहों द्वारा मार्क्सवादी और समाजवादी विचारों का प्रसार
- पत्रिकाएँ: आत्मशक्ति, सारथी, बिजोली
- पुस्तकें/उपन्यास:
- बंदी जीवन (सचिन सान्याल)
- पथेर दाबी (शरतचंद्र चट्टोपाध्याय) — सरकारी प्रतिबंध से लोकप्रियता बढ़ी
- पंजाब–यूपी–बिहार में क्रांतिकारी गतिविधियाँ –
- हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA)
- स्थापना: अक्टूबर 1924, कानपुर
- संस्थापक:
- रामप्रसाद बिस्मिल,
- योगेश चंद्र चटर्जी,
- सचिन सान्याल,
- अशफ़ाकुल्ला खान,
- योगेश चंद्र चटर्जी
- उद्देश्य:
- सशस्त्र क्रांति
- औपनिवेशिक शासन का उन्मूलन
- भारत में संघीय गणराज्य स्थापित करना
- वयस्क मताधिकार को मूल सिद्धांत के रूप में लागू करना
काकोरी काण्ड/ काकोरी ट्रेन एक्शन (अगस्त 1925)
- हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में 8-डाउन ट्रेन को लूटा ।
- सरकारी ख़ज़ाने को लूटा।
- इसके बाद सरकार ने कठोर दमन की नीति अपनायी।
- निम्न को फाँसी की सजा हुई :
- रामप्रसाद बिस्मिल
- अशफाक उल्ला खान
- रोशन सिंह
- राजेंद्र लाहिड़ी
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन (काकोरी के बाद पुनर्गठन)
- सितम्बर 1928, फ़िरोज़ शाह कोटला, दिल्ली में हुई बैठक के पश्चात स्थापित
- नेतृत्व: चंद्रशेखर आज़ाद
- समाजवाद को आधिकारिक उद्देश्य के रूप में अपनाया
- प्रमुख सदस्य:
- भगत सिंह
- सुखदेव
- भगवती चरण वोहरा
- बिजॉय कुमार सिन्हा
- शिव वर्मा
- जयदेव कपूर
- सॉन्डर्स की हत्या (दिसंबर 1928)
- लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने हेतु (अक्टूबर 1928 में — साइमन कमीशन के विरोध स्वरूप हुए प्रदर्शन के दौरान लाठी प्रहार से हुई चोटों के कारण )
- भगत सिंह और राजगुरु ने जेम्स स्कॉट के बजाय जेपी सॉन्डर्स की हत्या की।
केंद्रीय विधानसभा बम काण्ड (8 अप्रैल 1929)
- हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन ने इसके माध्यम से संदेश देने का निर्णय लिया।
- भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका ।
- उद्देश्य: सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और औद्योगिक विवाद विधेयक के विरोधस्वरूप ।
- बम जानबूझकर हानिरहित रखे गए थे जिनका मकसद मात्र – “बहरों को सुनाना।”
- गिरफ्तारी का लक्ष्य: न्यायालय को प्रचार का माध्यम बनाना।
- सरकार की प्रतिक्रिया –
- पंजाब, यूपी, बिहार के क्रांतिकारियों के विरुद्ध
- लाहौर षड्यंत्र मामला –
- भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के विरुद्ध लाहौर षड्यंत्र मामले के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया।
- जेल में, क्रांतिकारियों ने राजनीतिक कैदियों के साथ सम्मानजनक और उचित व्यवहार की मांग की।
- जतिन दास ने लाहौर जेल में इस हेतु अनशन किया और 63वें दिन (सितंबर 1929) मृत्यु हो गई।
चंद्रशेखर आज़ाद की मृत्यु
- आज़ाद ने 1929 में वायसराय इरविन की ट्रेन को बम से उड़ा देने का प्रयास किया।
- 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद (अब चंद्रशेखर आज़ाद पार्क) में साथी क्रांतिकारियों से मिलते समय सहयोगी द्वारा धोखा दिया गया ।
- आज़ाद ने आत्मसमर्पण से बचने के लिए स्वयं को गोली मार ली और अपनी प्रतिज्ञा पूरी की कि वे कभी भी जीवित नहीं पकड़े जाएंगे।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी
- सॉन्डर्स की हत्या के लिए उन्हें 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई।
- 23 मार्च को अब शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।
बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
- बंगाल कांग्रेस में विभाजन
- 1925 में सी.आर.दास की मृत्यु के बाद, बंगाल कांग्रेस दो धड़ों में विभाजित हो गई:
- एक धड़ा जे एम सेनगुप्ता के निर्देशन में था जिसे अनुशीलन समूह का समर्थन प्राप्त था
- दूसरा धड़ा सुभाष बोस के नेतृत्व में था जिसे युगांतर समूह का समर्थन प्राप्त था
- 1925 में सी.आर.दास की मृत्यु के बाद, बंगाल कांग्रेस दो धड़ों में विभाजित हो गई:
- इंडियन रिपब्लिकन आर्मी का गठन
- सूर्य सेन द्वारा स्थापित क्रांतिकारी दल ।
- उद्देश्य: चटगांव को आज़ाद कराना और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ देशव्यापी विद्रोह शुरू करना।
- गोपीनाथ साहा द्वारा हत्या का प्रयास (1924) –
- गोपीनाथ साहा ने 1924 में कोलकाता पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टैगार्ट की हत्या का प्रयास किया।
- उन्हें फांसी दी गई।
चटगाँव शस्त्रागार लूट (अप्रैल 1930) –
- कार्रवाई –
- चटगाँव के दो मुख्य दो प्रमुख शस्त्रागारों पर छापा मारकर उन्हें अपने अधिकार में ले लिया था।
- टेलीफोन और तार संचार लाइनों को नष्ट किया गया
- रेलवे संपर्क बाधित करना
- इस छापे का संचालन इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की चटगाँव शाखा ने किया।
- उल्लेखनीय सदस्य: गणेश घोष, कल्पना दत्त, प्रीतिलता वाडेकर, अंबिका चक्रवर्ती और अन्य कार्यकर्ता शामिल थे।
- क्रांतिकारी आंदोलन के नए चरण की विशेषताएँ –
- युवा महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी, विशेषकर सूर्य सेन के नेतृत्व में।
- समूह आधारित कार्रवाई पर जोर, व्यक्तिगत कार्यों की बजाय।
- पुराने हिंदू धार्मिक प्रतीकों और कसम लेने जैसी रस्मों में कमी तथा मुस्लिम सहभागिता बढ़ी।
- प्रमुख महिला क्रांतिकारी
- प्रीतिलता वाडेकर – एक छापे के दौरान मारी गईं।
- कल्पना दत्त – गिरफ्तार हुईं, सूर्य सेन के साथ मुकदमा चला, आजीवन कारावास की सज़ा हुई।
- शांति घोष और सुनीति चौधरी – स्कूली छात्राएं जिन्होंने कोमिला के ज़िला मजिस्ट्रेट को गोली मारी (दिसंबर 1931)।
- बीना दास – अपने दीक्षांत समारोह के दौरान बंगाल के गवर्नर को गोली मारी (फरवरी 1932)।
- क्रांतिकारी विचारधारा –
- भगत सिंह और उनके साथियों के क्रांतिकारी विचारों में बड़ा परिवर्तन आया
- हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने क्रांतिकारी और साम्यवादी सिद्धांतों के प्रसार का निर्णय लिया।
- मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सक्षम करने वाली सभी व्यवस्थाओं का उन्मूलन।
- रेलवे, परिवहन और भारी उद्योगों (जहाज निर्माण, स्टील) का राष्ट्रीयकरण।
- श्रमिक और किसान संगठनों की स्थापना।
- संगठित, सशस्त्र क्रांति के प्रयास
- 1920 के दशक के अंत से , क्रांतिकारी व्यक्तिगत हिंसात्मक कार्यों से हटकर जन-राजनीति की ओर मुड़े ।
- हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर।
- साम्यवाद और समानता को बढ़ावा, “प्रकृति के उत्पादों पर हर मानव का समान अधिकार है।” के विचारों पर बाल
- गिरफ़्तारी से पहले, भगत सिंह ने व्यक्तिगत हिंसात्मक क्रियाओं में विश्वास त्याग दिया, मार्क्सवाद अपनाया और समझा कि क्रांति जन धारित होनी चाहिए।
- नोट – भगवती चरण वोहरा ने ‘बम दर्शन’ लिखा।
भगत सिंह
- स्थापना:
- पंजाब नौजवान भारत सभा (1926)।
- भगत सिंह और सुखदेव ने लाहौर छात्र संगठन का निर्माण किया, जो विधिक छात्र गतिविधियों के लिए था।
- भगत सिंह ने मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष को स्वीकार किया।
- उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद को पूंजीवाद और वर्गीय प्रभुत्व के उन्मूलन के रूप में परिभाषित किया।
- धर्म को उन्होंने व्यक्तिगत विश्वास/जीवन का विषय माना।
