भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन 1939–1947: आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत 1939 से 1947 का काल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और निर्णायक चरण था, जिसमें द्वितीय विश्व युद्ध, भारत छोड़ो आंदोलन (1942) और व्यापक जनसंघर्षों ने ब्रिटिश शासन को कमजोर किया। इस अवधि में राजनीतिक वार्ताएँ, साम्प्रदायिक तनाव और विभाजन की परिस्थितियाँ भी उभरीं, जिसके परिणामस्वरूप 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन 1939–1947
द्वितीय विश्व युद्ध और राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया
- 1 सितंबर 1939: जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया; द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ।
- 3 सितंबर 1939: ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
- भारत सरकार ने भारतीयों से परामर्श किए बिना भारत को युद्धरत पक्ष घोषित कर दिया।
वायसराय को कांग्रेस का प्रारंभिक प्रस्ताव
- कांग्रेस ने सशर्त रूप से युद्ध में सहयोग देने का निर्णय लिया:
- युद्धोत्तर: एक संविधान सभा स्वतंत्र भारत की राजनीतिक संरचना निर्धारित करे।
- तात्कालिक: केंद्र में किसी न किसी रूप में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की जाए।
- वायसराय लिनलिथगो ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
ब्रिटिश वक्तव्य (जनवरी 1940)
- युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस देने का वादा किया गया — कांग्रेस के लिए अस्वीकार्य।
- रामगढ़ अधिवेशन (मार्च 1940) —
- अध्यक्ष: मौलाना आज़ाद
- सभी इस बात पर सहमत थे कि संघर्ष आवश्यक है—मतभेद केवल समय और रूप को लेकर थे।
- आंदोलन के समय निर्धारण का निर्णय गांधी पर छोड़ा गया।
- गांधी अभी भी मित्र राष्ट्रों को नैतिक, अहिंसक समर्थन देने को तैयार थे।
- सुभाष बोस ने ब्रिटेन की कमजोरी का लाभ उठाकर प्रत्यक्ष कार्रवाई की मांग की।
व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940–41)
- ब्रिटिश रवैया
- कांग्रेस और मुस्लिम नेताओं के बीच समझौता होने तक किसी भी संवैधानिक प्रगति से इंकार।
- अनेक अध्यादेश पारित किए गए, जिनसे विभिन्न प्रतिबंध लगाए गए :
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर
- प्रेस की स्वतंत्रता पर
- संघ बनाने के अधिकार पर
- कांग्रेस का पुनः गांधी की ओर रुख
- 1940 के अंत में कांग्रेस ने गांधी से नेतृत्व का अनुरोध किया।
- गांधी ने भविष्य के जन आंदोलन की तैयारी करते हुए सीमित व्यक्तिगत सत्याग्रह आरंभ किया।
- आंदोलन की प्रकृति
- सत्याग्रही द्वारा युद्ध-विरोधी घोषणा के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग गई ।
- ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन।
- नेतृत्व और प्रभाव
- विनोबा भावे: प्रथम सत्याग्रही।
- जवाहरलाल नेहरू: द्वितीय सत्याग्रही।
- मई 1941 तक: लगभग 25,000 लोग व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा के कारण गिरफ्तार।
- कार्यकारी परिषद में परिवर्तन (जुलाई 1941)
- वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार किया गया:
- 12 में से 8 सदस्य भारतीय (पहली बार भारतीय बहुमत)।
- वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार किया गया:
- प्रमुख विभाग—रक्षा, गृह, वित्त—ब्रिटिश नियंत्रण में ही रहे।
- केवल परामर्शात्मक अधिकारों के साथ राष्ट्रीय रक्षा परिषद का गठन किया गया।
पाकिस्तान प्रस्ताव (लाहौर, मार्च 1940) —
मुस्लिम लीग
- उत्तर-पश्चिम और पूर्वी भारत के मुस्लिम-बहुल सन्निहित क्षेत्रों के समूह की मांग की गई, ताकि उन्हें “स्वतंत्र राज्य” बनाया जाए
- घटक इकाइयां स्वायत्त और संप्रभु होंगी।जहां मुसलमान अल्पसंख्यक थे, वहां उनके लिए सुरक्षा उपायों की मांग की गई।
- संविधान सभा की मांग औपचारिक रूप से मान ली गई।
- डोमिनियन स्टेटस का स्पष्ट रूप से प्रस्ताव दिया गया।
भारत छोड़ो आंदोलन 1942 की शुरुआत
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक 14 जुलाई, 1942 को हुई ।
- अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी 8 अगस्त, 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक में मिली।
- प्रसिद्ध भारत छोड़ो प्रस्ताव ‘करो या मरो’ पारित किया गया ।
वर्धा कांग्रेस वर्किंग कमेटी बैठक —
- गांधीजी का दृष्टिकोण
- फासीवाद से घृणा के कारण ब्रिटेन के प्रति सहानुभूति।
- बिना शर्त समर्थन का सुझाव ।
- समाजवादियों का दृष्टिकोण (सुभाष बोस, जे.पी., नरेंद्र देव)
- किसी भी पक्ष के प्रति सहानुभूति नहीं — दोनों ही साम्राज्यवादी।
- इसे स्वतंत्रता के लिए नागरिक अवज्ञा आंदोलन आरंभ करने का उपयुक्त समय माना।
- नेहरू का दृष्टिकोण
- नैतिक रूप से फासीवाद के विरोधी, परंतु ब्रिटेन और फ्रांस भी साम्राज्यवादी।
- भारत की स्वतंत्रता से पूर्व किसी प्रकार का सहयोग नहीं।
- तत्काल नागरिक अवज्ञा के पक्ष में नहीं।
- प्रस्ताव
- फासीवादी आक्रमण की निंदा की गई।
- जब स्वयं भारत को लोकतंत्र से वंचित रखा गया है, तब वह “लोकतंत्र” के नाम पर युद्ध में शामिल नहीं हो सकता।
- ब्रिटिश सरकार से युद्ध के उद्देश्य और भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को स्पष्ट करने की मांग की गई।
भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement)
1942 में कांग्रेस द्वारा संघर्ष प्रारंभ करने के कारण –
- क्रिप्स मिशन की विफलता से स्पष्ट हो गया कि ब्रिटेन वास्तविक संवैधानिक प्रगति देने को तैयार नहीं था।
- बढ़ती महंगाई, चावल और नमक की कमी के कारण व्यापक जन-असंतोष बढ़ा ।
- बंगाल और उड़ीसा में नौकाओं की जब्ती से गंभीर कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई ।
- असम, बंगाल और उड़ीसा में ब्रिटिश ‘स्कॉर्च्ड अर्थ नीति’ (जलाओ और नष्ट करो की नीति ) का भय।
- दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश पराजयों से भारत पर जापानी आक्रमण की आशंका प्रबल हुई।
- जापानी विजयों के बाद ब्रिटिश प्रतिष्ठा का पतन; बैंकों से जमाओं की बड़े पैमाने पर निकासी।
- बर्मा (दक्षिण-पूर्व एशिया) से ब्रिटिशों की नस्लवादी निकासी नीति —
- ब्लैक रोड → भारतीय शरणार्थी
- व्हाइट रोड → यूरोपीय शरणार्थी
भारत छोड़ो प्रस्ताव (8 अगस्त 1942, बंबई)
- कांग्रेस कार्यसमिति ने सर्वप्रथम 14 जुलाई 1942 को वर्धा में प्रस्ताव पारित किया।
- 7 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया।
- 8 अगस्त 1942 को गोवालिया टैंक मैदान में इसे अनुमोदित किया गया — जिसे अब “अगस्त क्रांति मैदान” कहा जाता है।
- गांधीजी ने इस आंदोलन के बारे में कहा –
“भारत की धरती एक ऐसा आंदोलन पैदा करेगी जो कांग्रेस से भी बड़ा होगा।”
- प्रस्तावक: जवाहरलाल नेहरू
- अनुमोदक : सरदार वल्लभभाई पटेल
- मुख्य निर्णय:
- ब्रिटिश शासन की तत्काल वापसी की मांग।
- व्यापक जनआंदोलन के रूप में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय।
- गांधीजी को आंदोलन का नेता नियुक्त किया गया।
- गांधीजी का प्रसिद्ध आह्वान — “करो या मरो।”
- विभिन्न वर्गों के लिए गांधीजी के निर्देश:
- सरकारी कर्मचारी → त्यागपत्र न दें; कांग्रेस के प्रति निष्ठा की घोषणा करें।
- सैनिक → सेना में बने रहें; भारतीयों पर गोली न चलाएँ।
- छात्र → यदि आत्मविश्वास हो तो पढ़ाई छोड़ दें।
- किसान →
- यदि ज़मींदार सरकार-विरोधी हों → परस्पर सहमति से तय लगान दें।
- यदि ज़मींदार सरकार-समर्थक हों → लगान रोक दें।
- देशी रियासतों के शासक → जनता का समर्थन करें; उनकी संप्रभुता स्वीकार करें।
- देशी रियासतों की जनता → केवल उन्हीं शासकों का समर्थन करें जो ब्रिटिश-विरोधी हों।
- गांधीजी और सरोजिनी नायडू को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद किया गया, जबकि अन्य नेताओं को अहमदनगर किले में निरुद्ध रखा गया।
- राजेंद्र प्रसाद को गिरफ्तार कर पटना में नजरबंद रखा गया।
- आंदोलन का प्रसार –
- 9 अगस्त 1942 की भोर से पहले ही सभी शीर्ष नेताओं (गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद आदि) को गिरफ्तार कर लिया गया।
- 9 अगस्त को बंबई अधिवेशन में अरुणा आसफ़ अली ने भारतीय ध्वज फहराया।
- आंदोलन सर्वाधिक प्रभावी रहा – पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मिदनापुर, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि में
- आंदोलन का नेतृत्व समाजवादियों ने ,फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्यों ने, गांधीवादियों ने और क्रांतिकारियों ने किया
- प्रमुख भूमिगत (Underground) नेता:
- जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अरुणा आसफ़ अली,उषा मेहता,बीजू पटनायक,अच्युत पटवर्धन,सुचेता कृपलानी, आर. पी. गोयनका,छोटूभाई पुराणिक
- उषा मेहता ने प्रसिद्ध भूमिगत रेडियो (कांग्रेस रेडियो) की स्थापना की।
- सुमति मोरारजी नियमित रूप से अच्युत पटवर्धन को नई कार उपलब्ध कराती थीं, जिससे वे गिरफ्तारी से बचे रहे।
- 9 नवंबर 1942 को जयप्रकाश नारायण हज़ारीबाग जेल से फरार हुए और ‘आज़ाद दस्ता’ का गठन किया।
- वायसराय की कार्यकारी परिषद के तीन सदस्यों —
- एम. एस. एनी
- एन. आर. सरकार
- एच. पी. मोदी
— ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।

समानांतर सरकारें (प्रति सरकार)
- बलिया (यूपी) – अगस्त 1942, चित्तू पांडे के नेतृत्व में; कुछ कांग्रेसी नेताओं को मुक्त कराया।
- तामलुक (मिदनापुर, बंगाल) – 1942-44, जातीय सरकार, विद्युत वाहिनी के नाम से जाना जाता है।
- सतारा (महाराष्ट्र) – 1943-45; वाई.बी. के तहत प्रति सरकार चव्हाण और नाना पाटिल.
- लोगों की अदालतें, पुस्तकालय, निषेध अभियान चलाए, “गांधी विवाह” का आयोजन किया।
विभिन्न राज्यों में गतिविधियाँ
|
क्षेत्र |
गतिविधियाँ |
|
बिहार |
|
|
उत्तर प्रदेश (UP) |
|
|
बंगाल |
|
|
पश्चिमी भारत |
|
|
दक्षिण भारत |
|
विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी
- युवा एवं छात्र, महिलाएँ — सक्रिय भूमिका (अरुणा आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी, उषा मेहता)।
- मज़दूर और किसान — ज़मींदार-विरोधी हिंसा नहीं हुई। निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी और पुलिसकर्मी अक्सर आंदोलनकारियों को सूचनाएँ देते थे।
- कई मुसलमानों ने भूमिगत नेताओं को शरण दी; किसी प्रकार के साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए।
- कम्युनिस्टों ने आंदोलन का विरोध किया, क्योंकि सोवियत संघ के मित्र राष्ट्रों में शामिल होने के बाद उन्होंने युद्ध को “जन-युद्ध (People’s War)” कहा।
- मुस्लिम लीग ने विरोध किया — उसे भय था कि अंग्रेज़ों के चले जाने पर हिंदू प्रभुत्व स्थापित हो जाएगा।
- हिंदू महासभा ने आंदोलन का बहिष्कार किया।
- देशी रियासतों की प्रतिक्रिया सीमित और उदासीन रही।
गांधी का उपवास (फ़रवरी 1943) —
- 10 फ़रवरी 1943 को गांधीजी ने जेल में उपवास आरम्भ किया, क्योंकि सरकार उन पर हिंसक गतिविधियों की निंदा करने का दबाव बना रही थी। गांधीजी ने हिंसा के लिए ब्रिटिश सरकार को उत्तरदायी ठहराया।
- गांधीजी की रिहाई की माँग तेज़ होती गई और बीमारी के आधार पर 6 मई 1944 को उन्हें रिहा किया गया।
23 मार्च 1943 को पाकिस्तान दिवस मनाया गया।
- 1943 का अकाल — द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पड़ा; युद्ध से उत्पन्न कठिनाइयों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
- मूल कारण:
- मित्र राष्ट्रों की विशाल सेना के लिए खाद्यान्न की आपूर्ति।
- जापान द्वारा बर्मा एवं दक्षिण–पूर्व एशिया पर अधिकार के कारण चावल का आयात बंद होना।
- घोर कुप्रबंधन एवं मुनाफ़ाख़ोरी; राशनिंग देर से और केवल बड़े शहरों में शुरू की गई।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) पर ब्रिटिश प्रतिक्रिया —
- ब्रिटिश सरकार ने त्वरित दमन की नीति अपनाई और प्रमुख कांग्रेस नेताओं को गिरफ़्तार किया।
- एक लाख से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया तथा कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया।
- हिंसक टकरावों में भारी जनहानि हुई; मृतकों की संख्या 1,028 से लेकर 10,000 से अधिक तक बताई जाती है।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) का स्वरूप —
- पूर्ववर्ती गांधीवादी आंदोलनों से भिन्न
- असहयोग आंदोलन (1920–22) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34):
- शांतिपूर्ण जन-आंदोलनों के रूप में कल्पित थे।
- सामाजिक आधार क्रमशः विस्तृत हुआ।
- अहिंसा और अनुशासन पर कठोर बल दिया गया।
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942):
- आरम्भ से ही एक व्यापक जन-उभार के रूप में सामने आया।
- लक्ष्य था ब्रिटिश शासन को तत्काल भारत छोड़ने के लिए विवश करना।
- कोई चरणबद्ध या क्रमिक रणनीति नहीं अपनाई गई।
- साधनों से अधिक साध्य पर बल —
- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश रवैया और जिन्ना की साम्प्रदायिक राजनीति को समर्थन देने से गांधी अत्यंत निराश हुए।
- वार्ताओं की विफलता (क्रिप्स मिशन) ने भारतीय जनमत को और कठोर बना दिया।
- ‘हरिजन’ (मार्च 1942) में:
- गांधी ने लिखा कि प्रत्येक भारतीय को स्वयं को स्वतंत्र समझना चाहिए।
- व्यक्तियों को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए स्वेच्छा से कार्य करना चाहिए।
- अतः:
- साधनों (अहिंसक तरीकों) की तुलना में साध्य (स्वतंत्रता) पर अधिक बल दिया गया।
- स्पष्ट लक्ष्य और उद्देश्य —
- पूर्ण रूप से ब्रिटिश शासन का भारत से पलायन
- चार मुख्य विशेषताएँ:
- उपनिवेशी राज्य के खिलाफ हिंसा को स्वीकार करना
- केवल प्रशिक्षित सत्याग्रहियों नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता में विश्वास रखने वाला कोई भी भाग ले सकता है
- छात्रों को गिरफ्तारी के बाद नेतृत्व में प्रमुख भूमिका निभाने की उम्मीद थी
- सरकारी प्राधिकरण के पूर्ण अवज्ञा का आह्वान
- भूमिगत गतिविधियाँ —
- दमन के कारण व्यापक भूमिगत प्रतिरोध विकसित हुआ
- भूमिगत गतिविधियों का उद्देश्य:
- जनमानस का उत्साह बनाए रखना
- आदेश की एक श्रृंखला स्थापित करना
- कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन प्रदान करना
- हथियार और गोला-बारूद वितरित करना
- गतिविधियों में शामिल थे:
- गुप्त बैठकें
- संचार लाइनों में तोड़-फोड़
- अवैध पम्पलेट का वितरण
- भूमिगत रेडियो प्रसारण
- सामान्य स्वरूप —
- स्वतंत्रता संग्राम का सबसे उग्र, स्वतःस्फूर्त और जनाधारित आंदोलन
- दर्शाता है:
- गहरी जनआक्रोश
- तत्काल स्वतंत्रता के लिए दृढ़ संकल्प
- हालांकि क्रूर रूप से दबाया गया, यह:
- ब्रिटिश शासन को नैतिक और राजनीतिक रूप से असहनीय बना दिया
- स्वतंत्रता से पहले अंतिम जन-उभार को चिह्नित किया
राष्ट्रीय आंदोलन, कांग्रेस गतिविधियाँ, ब्रिटिश नीति (1945–47)
- ब्रिटिश शासन के आखिरी 2 सालों में राष्ट्रीय आंदोलन को दो मुख्य बातों ने आकार दिया।
- ब्रिटिश सरकार, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच वार्ता; बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा के साथ → स्वतंत्रता + विभाजन में समाप्त
- श्रमिकों, किसानों और रियासतों के लोगों द्वारा उग्र, स्थानीयकृत जन आंदोलन
- मुख्य उग्र क्रियाएँ / घटनाएँ:
- भारतीय स्वतंत्रता सेना (INA) रिहाई आंदोलन
- रॉयल इंडियन नेवी (RIN) विद्रोह
- तेभागा आंदोलन
- वर्ली विद्रोह
- पंजाब किसान मोर्चा
- त्रावणकोर जन संघर्ष (पुन्नाप्रा–वायलर)
- तेलंगाना किसान विद्रोह
- मुख्य उग्र क्रियाएँ / घटनाएँ:
- जुलाई 1945:
- ब्रिटेन में लेबर पार्टी सत्ता में आई। लेबर सरकार भारतीय मांगों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण।
- क्लेमेंट एटली प्रधानमंत्री बने।
- पेथिक-लॉरेंस भारत सचिव बने।
- ब्रिटेन अब प्रमुख शक्ति नहीं रहा; अमेरिका और USSR ने भारतीय स्वतंत्रता का समर्थन किया।
- ब्रिटिश अर्थव्यवस्था ध्वस्त; ब्रिटेन पर भारत का £1.2 बिलियन ऋण।
- अगस्त 1945: केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभा चुनावों की घोषणा।
- कांग्रेस चुनाव अभियान (1945–46) एवं INA परीक्षण
- चुनाव शीतकाल 1945–46 में सम्पन्न।
- INA परीक्षण
- पहला बड़ा परीक्षण (नवंबर 1945) रेड फोर्ट, दिल्ली में।
- अभियुक्तों की टीम ने हिन्दू-मुस्लिम-सिख एकता का प्रतीक प्रस्तुत किया:
- प्रेम कुमार सहगल (हिंदू)
- शाह नवाज ख़ान (मुस्लिम)
- गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख)
- परीक्षणों ने पूरे देश में भारी विरोध और ब्रिटिश विरोधी भावना उत्पन्न की।
- भुलाभाई देसाई INA के रेड फोर्ट परीक्षण में मुख्य बचाव वकील, अन्य वकीलों के साथ:
- तेज बहादुर सप्रू
- कैलाश नाथ कटजू
- जवाहरलाल नेहरू
- आसफ़ अली
- रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (18 फरवरी 1946 – बॉम्बे)
- कारण:
- नस्लीय भेदभाव (समान वेतन की मांग)
- खराब भोजन
- अधिकारियों द्वारा अपमान
- “क्विट इंडिया” लिखने पर गिरफ्तारी
- INA परीक्षण
- इंडोनेशिया में भारतीय सैनिकों का उपयोग
- रॉयल इंडियन एयर फोर्स हड़तालें: बॉम्बे, पूना, कोलकाता, जेस्सोर, अंबाला
- पटेल और जिन्ना की मध्यस्थता → 23 फरवरी को विद्रोहियों ने भरोसे के बाद आत्मसमर्पण किया कि उन्हें प्रताड़ित नहीं किया जाएगा।
- रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह का प्रभाव
- सशस्त्र बलों का विद्रोह जनता पर गहरा मानसिक प्रभाव डालने वाला।
- RIN विद्रोह को ब्रिटिश शासन के अंत का प्रतीक माना गया।
- चुनाव परिणाम (1945–46)
- कांग्रेस का प्रदर्शन
- गैर-मुस्लिम वोटों का 91% जीत।
- केंद्रीय विधानसभा में 57/102 सीटें जीतीं।
- अधिकांश प्रांतों में बहुमत, सिवाय बंगाल, सिंध और पंजाब के।
- NWFP और असम में जीत — दोनों पर मुस्लिम लीग पाकिस्तान के लिए दावा करती थी।
- मुस्लिम लीग का प्रदर्शन
- मुस्लिम वोटों का 86.6% जीत।
- केंद्रीय विधानसभा में सभी 30 आरक्षित मुस्लिम सीटें जीतीं।
- बंगाल और सिंध में बहुमत।
- स्पष्ट रूप से मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि बनी।
- कांग्रेस का प्रदर्शन
- सांप्रदायिक हिंसा और अंतरिम सरकार (1946–1947)
- 16 अगस्त 1946 से, भारत ने अभूतपूर्व सांप्रदायिक दंगे देखे, जिससे कई हज़ार लोगों की मौत हुई।
- सबसे ज़्यादा प्रभावित क्षेत्र: कलकत्ता, बॉम्बे, नोआखली, बिहार, गढ़मुक्तेश्वर।
- अंतरिम सरकार (2 सितंबर 1946 – 15 अगस्त 1947)
- जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, कांग्रेस का दबदबा था।
- कांग्रेस ने अनिवार्य ग्रुपिंग का विरोध किया।
- शुरुआत में, अंतरिम सरकार पुरानी वायसराय कार्यकारी परिषद जैसी थी।

- मुस्लिम लीग 26 अक्टूबर 1946 को शामिल हुई।
- कांग्रेस: नेहरू, पटेल, बलदेव सिंह, जॉन मथाई, राजगोपालाचारी, सी.एच. भाभा, राजेंद्र प्रसाद, जगजीवन राम, आसफ अली, जोगेंद्र नाथ मंडल (बाद में सहयोगी)
- मुस्लिम लीग: लियाकत अली खान, इब्राहिम इस्माइल चुंदरीगर, अब्दुर रब निश्तर, ग़ज़नफ़र अली खान, जोगेंद्र नाथ मंडल।
- लीग की बाधा डालने वाली रणनीति
- संविधान सभा में शामिल होने से इनकार कर दिया (9 दिसंबर 1946)।
- वित्त मंत्री लियाकत अली खान ने अन्य मंत्रालयों के काम में बाधा डाली।
- लीग का मुख्य लक्ष्य: पाकिस्तान हासिल करना, सहयोग नहीं।
- फरवरी 1947: कांग्रेस मंत्रियों ने लीग सदस्यों के इस्तीफे की मांग की; लीग ने संविधान सभा को भंग करने की मांग की, जिससे राजनीतिक संकट पैदा हो गया।
स्वतंत्रता और विभाजन
- पृष्ठभूमि –
- सांप्रदायिक दंगों और कांग्रेस–लीग गठबंधन की विफलता के कारण 1947 की शुरुआत तक विभाजन अपरिहार्य प्रतीत होने लगा।
- जवाहरलाल नेहरू (10 मार्च 1947):
- यदि कैबिनेट मिशन योजना को लागू किया जाता, तो वही सबसे अच्छा समाधान था।
- एकमात्र विकल्प पंजाब और बंगाल का विभाजन था।
- कांग्रेस अध्यक्ष कृपलानी (अप्रैल 1947):
- उन्होंने वायसराय को सूचित किया कि कांग्रेस पाकिस्तान को तभी स्वीकार करेगी, जब बंगाल और पंजाब का न्यायपूर्ण विभाजन किया जाए।
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947)
- स्वतंत्रता के साथ विभाजन के सूत्र को स्वीकार किया गया।
- वी. पी. मेनन द्वारा सुझाए गए बिंदु:
- सत्ता का तत्काल हस्तांतरण।
- डोमिनियन स्टेटस प्रदान करना तथा अलग होने का अधिकार देना।

- बंगाल और पंजाब की विधानसभाओं ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया।
- पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब → पाकिस्तान।पश्चिमी बंगाल और पूर्वी पंजाब → भारत।
- जनमत-संग्रह:सिलहट → पाकिस्तानNWFP(उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत) → पाकिस्तान (कांग्रेस ने बहिष्कार किया)।
- बलूचिस्तान और सिंध पाकिस्तान में शामिल हुए।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947
- 5 जुलाई 1947 को पारित किया गया।
- 18 जुलाई 1947 को शाही स्वीकृति प्राप्त हुई।
- 15 अगस्त 1947 को लागू किया गया।
मुख्य प्रावधान

- दो स्वतंत्र डोमिनियन—भारत और पाकिस्तान—का निर्माण।
- संविधान सभाएँ विधानमंडलों के रूप में कार्य करेंगी।
- नए संविधान बनने तक:
- भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत शासन चलाया जाएगा।
- पाकिस्तान 14 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ।
- एम. ए. जिन्ना → पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल।
- माउंटबेटन भारत के गवर्नर जनरल बने रहे।
- शीघ्र सत्ता हस्तांतरण की समस्याएँ-
- विभाजन से निपटने के लिए कोई संक्रमणकालीन संस्थाएँ नहीं थी।
- साझा गवर्नर जनरल बनने की माउंटबेटन की योजना असफल रही (जिन्ना ने इंकार किया)।
- रेडक्लिफ अवार्ड में देरी:
- 12 अगस्त 1947 तक तैयार।
- 15 अगस्त के बाद घोषित किया गया।
- ब्रिटिशों ने दंगों की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की।
- पंजाब में हुए नरसंहार को रोकने में विफलता।
रेडक्लिफ सीमा अवार्ड और सांप्रदायिक दंगे–
- पंजाब और बंगाल के विभाजन का निर्णय।
- पंजाब और बंगाल की विधानसभाएँ दो हिस्सों में मिलीं:
- मुस्लिम बहुल ज़िले।
- गैर-मुस्लिम ज़िले।
- साधारण बहुमत से दोनों प्रांतों ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया।
- रेडक्लिफ सीमा के दोनों ओर बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक मौजूद थे।
- सीमा आयोग के समक्ष चुनौतियाँ –
- ब्रिटिश सरकार द्वारा जल्दबाजी में नियुक्त किया गया।
- अध्यक्ष: सर सिरिल रेडक्लिफ
- संरचना:
- प्रत्येक आयोग में 2 मुस्लिम + 2 गैर-मुस्लिम न्यायाधीश।
- रेडक्लिफ:
- भारत का कोई पूर्व अनुभव नहीं था।
- पुराने नक्शों और जनगणना आंकड़ों का उपयोग किया।
- सीमाएँ निर्धारित करने के लिए केवल 6 सप्ताह दिए गए।
- सीमा निर्धारण के मानदंड
- धार्मिक जनसंख्या संरचना को मुख्य आधार बनाया गया
- अन्य कारक:
- नदियों को प्राकृतिक सीमा के रूप में।
- प्रशासनिक सुविधा।
- आर्थिक व्यवहार्यता।
- रेल और सड़क संपर्क।
- नहर और सिंचाई प्रणालियाँ।
- सिख समस्या –
- पंजाब में सिख जनसंख्या बिखरी हुई थी।
- सभी सिख धार्मिक स्थलों को पूर्वी पंजाब (भारत) में शामिल करने की मांग की।
1941 की जनगणना के आंकड़े त्रुटिपूर्ण थे।
- प्रकाशन में देरी
- सीमा आयोग की रिपोर्ट 12 अगस्त 1947 तक तैयार हो गई थी।
- लॉर्ड माउंटबेटन ने इसके प्रकाशन को 15 अगस्त के बाद तक टाल दिया।
- उद्देश्य:
- सांप्रदायिक दंगों और हिंसा की ज़िम्मेदारी से ब्रिटिश सरकार को बचाना।
- ब्रिटिश निकास रणनीति।
सांप्रदायिक दंगे और हिंसा
दंगों का प्रसार
- सांप्रदायिक हिंसा अगस्त 1946 से शुरू हुई।
- विभाजन और स्वतंत्रता की घोषणा के बाद यह और तेज़ हो गई।
- सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र:
- रेडक्लिफ सीमा के आसपास के क्षेत्र, विशेषकर पंजाब।
- हिंसा में क्षेत्रीय भिन्नता
- पंजाब
- सबसे अधिक हिंसाग्रस्त क्षेत्र।
- सीमा के दोनों ओर विनाशकारी हिंसा।
- बंगाल
- तुलनात्मक रूप से कम हिंसा।
- गांधीजी की उपस्थिति और उनके उपवासों के कारण।
- दिल्ली
- दंगे भड़के, जिनमें मुसलमानों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ।
- पंजाब की घटनाओं से जुड़ी प्रतिशोधात्मक हिंसा।
- गांधीजी के उपवासों का केवल अस्थायी असर हुआ।
- बिहार और संयुक्त प्रांत
- अक्टूबर 1946 (विभाजन से पूर्व):
- बिहार में मुसलमानों की हत्या।
- कथित रूप से जमींदारों द्वारा किसान असंतोष से ध्यान हटाने के लिए हिंसा भड़काई गई।
- अक्टूबर 1946 (विभाजन से पूर्व):
- गढ़मुक्तेश्वर (उत्तर प्रदेश):
- हिंदू तीर्थयात्रियों द्वारा हज़ारों मुसलमानों की हत्या।
- पंजाब
- इतनी ज़्यादा मौतें क्यों हुई?
- प्रशासनिक विफलता
- गवर्नर-जनरल ने दंगों की आशंका जताई और:
- 50,000 सैनिकों वाली सीमा सुरक्षा बल का गठन किया
- नेहरू ने ब्रिटिश सैन्य हस्तक्षेप से इंकार किया
- सीमा सुरक्षा बल:
- गवर्नर-जनरल ने दंगों की आशंका जताई और:
- प्रशासनिक विफलता
- स्वयं सांप्रदायिक आधार पर विभाजित हो गया।
- सत्ता का विघटन
- यूरोपीय अधिकारी भारत छोड़ने की तैयारी में थे।
संसाधनों का बंटवारा
नागरिक प्रशासन का विभाजन-
- एक विभाजन परिषद की स्थापना की गई:
- जिसकी अध्यक्षता गवर्नर-जनरल ने की।
- भारत और पाकिस्तान से दो–दो प्रतिनिधि शामिल थे।
- परिषद की सहायता के लिए एक स्टीयरिंग कमेटी बनाई गई:
- सदस्य:
- एच. एम. पटेल (भारत)
- मुहम्मद अली (पाकिस्तान)
- सदस्य:
- सभी सरकारी कर्मचारियों को चुनने का विकल्प दिया गया:
- वे भारत में सेवा करना चाहते हैं या पाकिस्तान में
- लगभग 1,60,000 सरकारी कर्मचारियों ने सीमा पार स्थानांतरण का विकल्प चुना।
- वित्त का विभाजन –
- नकद शेष और सार्वजनिक ऋण के बंटवारे से विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच गंभीर तनाव उत्पन्न हुआ।
- पाकिस्तान की माँग:
- अविभाजित भारत के कुल नकद शेष का एक-चौथाई (25%) हिस्सा मांगा।
- भारत का पक्ष:
- भारत का तर्क था कि नकद शेष का केवल एक छोटा भाग ही वास्तविक कार्यशील नकदी है।
- बड़ा भाग मुद्रास्फीति-रोधी भंडार के रूप में रखा गया था, जो नियमित खर्च के लिए नहीं था।
- रामचंद्र गुहा (India After Gandhi) के अनुसार:
- भारत ने पाकिस्तान के ‘स्टर्लिंग बैलेंस’ के हिस्से को रोके रखा।
- स्टर्लिंग बैलेंस वह राशि थी जो ब्रिटेन को भारत को देनी थी, जो दोनों डोमिनियनों की संयुक्त संपत्ति थी।
- यह ऋण द्वितीय विश्व युद्ध में भारत के वित्तीय योगदान के कारण बना था।
- राशि से संबंधित तथ्य:
- लगभग 550 मिलियन रुपये पाकिस्तान को देय थे।
- भारत द्वारा राशि रोके जाने का कारण:
- पाकिस्तान द्वारा बल प्रयोग से कश्मीर पर कब्जा करने के प्रयास से भारत सरकार नाराज थी।
- इसी कारण भारत तुरंत भुगतान करने को तैयार नहीं था।
- गांधीजी की प्रतिक्रिया:
- उन्होंने भारत की कार्रवाई को अनावश्यक रूप से द्वेषपूर्ण और अनैतिक माना।
- पाकिस्तान के हिस्से की राशि रोके जाने के विरोध में उपवास किया।
- गांधीजी के उपवास की शर्त:
- उपवास समाप्त करना पाकिस्तान को राशि हस्तांतरित किए जाने से जोड़ा गया।
- परिणाम:
- गांधीजी कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव डालने में सफल रहे।
- भारत ने पाकिस्तान को अधिक नकद संसाधन देने पर सहमति जताई।
- परिणामोत्तर / ऐतिहासिक व्याख्या:
- कुछ विद्वानों के अनुसार, पाकिस्तान को भुगतान पर गांधीजी के ज़ोर देना उनके एक हिंदू कट्टरपंथी द्वारा किए गए हत्या के कारणों में से एक बना।
एक संयुक्त रक्षा परिषद का गठन किया गया –
- जिसके प्रमुख लॉर्ड औचिनलेक थे
- पद: सुप्रीम कमांडर
- जिम्मेदारियाँ:
- विभाजन:
- सशस्त्र बल
- प्लांट
- मशीनरी
- उपकरण
- भंडार
- विभाजन:
- निर्णय:
- मुस्लिम बहुल इकाइयाँ → पाकिस्तान
- गैर-मुस्लिम इकाइयाँ → भारत
- गंभीर मतभेदों के कारण:
- सुप्रीम कमांडर का पद समाप्त कर दिया गया।
- ब्रिटिश सेनाएँ:
- 17 अगस्त 1947 से भारत छोड़ना शुरू किया।
- फरवरी 1948 तक पूर्ण रूप से वापसी पूरी हुई।
महात्मा गांधी की हत्या –
- दिनांक: 30 जनवरी 1948।
- स्थान: बिड़ला हाउस (नई दिल्ली)।
- घटना: संध्या प्रार्थना सभा के दौरान गांधीजी को गोली मार दी गई।
- हत्यारा: नाथूराम गोडसे
- जवाहरलाल नेहरू (आकाशवाणी संबोधन):
- “हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है…”
- सरदार पटेल:
- लोगों से प्रतिशोध न लेने की अपील की।
- अहिंसा और आत्ममंथन पर ज़ोर दिया।
- गोडसे का मुकदमा
- गोडसे:
- मुकदमा चला और मौत की सज़ा सुनाई गई
- गोडसे के दावे का उद्देश्य:
- गांधीजी की “मुस्लिम-समर्थक” नीति।
- विशेष रूप से पाकिस्तान के बकाया भुगतान के लिए किया गया उनका अंतिम उपवास।
विभाजन आवश्यक क्यों था ?
मुस्लिम लीग को क्रमिक रियायतें
- मुस्लिम लीग की अलग मुस्लिम राज्य की मांग को चरणबद्ध रूप से स्वीकार करने की अंतिम अवस्था विभाजन की स्वीकृति थी:
- क्रिप्स मिशन (1942):
- मुस्लिम बहुल प्रांतों की स्वायत्तता को स्वीकार किया
- गांधी–जिन्ना वार्ता (1944):
- गांधी ने मुस्लिम बहुल प्रांतों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार किया
- कैबिनेट मिशन योजना (1946):
- कांग्रेस ने मुस्लिम बहुल प्रांतों के लिए अलग संविधान सभा की संभावना को स्वीकार किया।
- बाद में अनिवार्य समूहकरण को भी स्वीकार किया (दिसंबर 1946)।
- मार्च 1947 कांग्रेस कार्यसमिति प्रस्ताव:
- कहा गया कि यदि भारत का विभाजन हुआ तो पंजाब (और परोक्ष रूप से बंगाल) का विभाजन आवश्यक होगा।
- 3 जून योजना (1947):
- कांग्रेस ने औपचारिक रूप से विभाजन को स्वीकार किया।
- कांग्रेस नेताओं की सोच को दर्शाने वाले कथन-
- जवाहरलाल नेहरू:
- पंजाब में रोजाना हो रही हत्याओं ने विभाजन को एकमात्र रास्ता बना दिया।
- सरदार पटेल:
- आशंका थी कि यदि विभाजन स्वीकार नहीं किया गया तो भारत कई पाकिस्तानों में टूट सकता है।
- उन्होंने माना कि विभाजन से प्रशासनिक पतन को रोका जा सका।
- मौलाना आजाद:
- विभाजन को जनता ने नहीं, बल्कि राजनीतिक संगठनों ने स्वीकार किया।
- कई लोगों ने इसे विश्वास से नहीं, बल्कि क्रोध, आक्रोश या निराशा में स्वीकार किया।
- जवाहरलाल नेहरू:
- ब्रिटिश भूमिका : व्याख्याएँ-
- वली ख़ान:
- ब्रिटेन ने अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मजबूरियों के कारण पाकिस्तान का निर्माण किया, न कि मुसलमानों के कल्याण के लिए।
- आर. जे. मूर:
- एक संकटग्रस्त समाज में सत्ता का क्रमिक हस्तांतरण स्वभावतः विभाजनकारी था।
- ब्रिटेन न तो हिंदू समर्थक था, न मुस्लिम समर्थक; साम्राज्यवादी हित ही प्रमुख थे।
- वली ख़ान:
- जिन्ना का दावा-
- एम. ए. जिन्ना: पाकिस्तान के निर्माण का पूरा श्रेय स्वयं को दिया।
- गांधी ने कांग्रेसियों से आग्रह किया –
- विभाजन को राजनीतिक रूप से स्वीकार करें,
- लेकिन दिल से स्वीकार न करें।
भारत में संस्थागत प्रतिक्रिया
- भारत सरकार ने स्थापित किए:
- दिल्ली संकट से निपटने के लिए आपातकालीन कैबिनेट समिति।
- शरणार्थी समस्याओं के प्रबंधन के लिए राहत और पुनर्वास मंत्रालय।
- ‘इवेक्यूइ प्रॉपर्टी’ की अवधारणा:
- उन लोगों की संपत्ति की रक्षा के लिए, जो पाकिस्तान चले गए थे, ताकि वे लौट सकें।
- व्यवहार में यह निरर्थक हो गई, क्योंकि शरणार्थियों ने खाली मुस्लिम मकानों पर कब्जा कर लिया।
- बाद में इससे शरणार्थियों की वापसी असंभव हो गई।
अल्पसंख्यकों पर दिल्ली समझौता (नेहरू–लियाक़त समझौता)
- पृष्ठभूमि
- हस्ताक्षर किए गए:
- शरणार्थी समस्याओं के समाधान के लिए।
- विशेषकर बंगाल में सांप्रदायिक शांति बहाल करने के लिए।
- मुख्य विशेषताएँ
- 8 अप्रैल 1950 को हस्ताक्षरित।
- हस्ताक्षरकर्ता:
- जवाहरलाल नेहरू (भारत)
- लियाक़त अली ख़ान (पाकिस्तान)
- इसे नेहरू–लियाक़त समझौता भी कहा जाता है।
- प्रावधान
- अल्पसंख्यक समुदाय के मंत्रियों की नियुक्ति:
- केंद्र और प्रांतीय स्तर पर, दोनों देशों में।
- स्थापना:
- अल्पसंख्यक आयोगों की
- जांच आयोगों का गठन:
- सांप्रदायिक दंगों के कारणों की जांच के लिए।
- रोकथाम के उपाय सुझाने के लिए।
- अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों को शामिल करना:
- पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल की मंत्रिपरिषदों में।
- तैनाती:
- दो केंद्रीय मंत्रियों की (प्रत्येक देश से एक) प्रभावित क्षेत्रों में।
- एजेंसी का गठन:
- अपहृत महिलाओं की खोज और पुनर्वास के लिए (जिसकी व्यापक आलोचना हुई)।
- अल्पसंख्यक समुदाय के मंत्रियों की नियुक्ति:
- समझौते की विफलता –
- शरणार्थियों की वापसी को प्रोत्साहित करने का प्रयास असफल रहा।
- सरकारें शरणार्थियों में विश्वास बहाल करने में विफल रहीं।
- शरणार्थियों की संपत्तियों को ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित कर दिया गया।
- भारत ने बाद में शत्रु संपत्ति अधिनियम (1968) में 2016 में संशोधन किया।
- आलोचना
- हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा आलोचना:
- श्यामा प्रसाद मुखर्जी
- के. सी. नियोगी
- मुखर्जी:
- नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया।
- यह मानते थे कि शरणार्थी समस्या का समाधान:
- जनसंख्या के स्थानांतरण
- पाकिस्तान से क्षेत्रीय अधिग्रहण से ही संभव है।
- हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा आलोचना:
कम्युनिस्ट और स्वतंत्रता
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) का रुख
- दिसंबर 1947 में CPI ने स्वतंत्रता को ‘झूठी आजादी’ कहा।
- नारा- “ये आजादी झूठी है”।
- यह नारा द्वितीय पार्टी कांग्रेस (कलकत्ता) में अपनाया गया।
- भारतीय राज्य को जनता का मुख्य शत्रु घोषित किया गया।
- लक्ष्य:
- सामान्य क्रांति के माध्यम से सरकार को उखाड़ फेंकना।
- बी. टी. रणदिवे की लाइन का अनुसरण किया गया।
- प्रस्ताव:
- पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक की स्थापना।
- मजदूरों, किसानों और उत्पीड़ित मध्यम वर्गों का शासन।
कम्युनिस्टों ने स्वतंत्रता को क्यों अस्वीकार किया
- कांग्रेस-नेतृत्व वाले पूंजीवादी राज्य के विरुद्ध वर्ग संघर्ष और सशस्त्र विद्रोह में विश्वास।
- एशिया में कम्युनिस्ट सफलताओं से प्रेरणा:
- चीन, मलाया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, बर्मा
- झ्दानोव थीसिस (1947) ने वैश्विक कम्युनिस्ट सक्रियता को प्रोत्साहित किया।
- रामचंद्र गुहा के अनुसार, CPI ने असंतोष को “रेड इंडिया की शुरुआत” समझ लिया।
- तृतीय पार्टी कांग्रेस (1951, कलकत्ता):
- सशस्त्र संघर्ष को त्याग दिया।
- तेलंगाना आंदोलन वापस लिया।
- संवैधानिक मार्ग अपनाया।
- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया:
- पार्टी पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया।
- 1951–52 के आम चुनावों में भाग लिया।
