भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन 1929 – 1939: आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत 1929 से 1939 का काल स्वतंत्रता संग्राम में निर्णायक मोड़ का समय था, जब पूर्ण स्वराज की घोषणा (1929) के बाद आंदोलन अधिक तीव्र और जनआधारित हुआ। इस अवधि में सविनय अवज्ञा आंदोलन, गांधी-इरविन समझौता, तथा संवैधानिक सुधारों पर बहसों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा और व्यापकता प्रदान की।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन 1929 – 1939
साइमन कमीशन
- भारत सरकार अधिनियम, 1919 में 10 साल के पश्चात एक कमीशन नियुक्त करने का प्रावधान किया गया था।
- ब्रिटिश सरकार ने 8 नवंबर 1927 को साइमन कमीशन का गठन किया।
- इस कमीशन की अध्यक्षता सर जॉन साइमन के द्वारा किए जाने के कारण इसे साइमन कमीशन के नाम से जाना जाता है।
- इसका गठन स्टेनली बाल्डविन के प्रधानमंत्रित्व काल में हुआ
- यह सात सदस्यों वाले इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था ।
- सदस्यों में चार कंजर्वेटिव, दो लेबर पार्टी के और एक लिबरल पार्टी का था।
- यह कमीशन असल में सर जॉन साइमन और क्लेमेंट एटली की संयुक्त अध्यक्षता में था।
- इसका उद्देश्य यह सिफारिश करना था कि क्या भारत आगे के संवैधानिक सुधारों के लिए तैयार है और किस आधार पर।
- संवैधानिक सुधार मूल रूप से केवल 1929 में होने थे लेकिन कंजर्वेटिव सरकार को हार का डर था और वह यह नहीं चाहती थी कि भारत का भविष्य लेबर पार्टी तय करे।
- भारत के लिए कंजर्वेटिव सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लॉर्ड बिरकेनहेड ने लगातार तर्क दिया कि भारतीय एक संवैधानिक योजना का मसौदा तैयार करने में असमर्थ हैं। वह साइमन कमीशन की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार थे।
महत्वपूर्ण आयोग और समितियाँ
ली आयोग (1923)
- 1923 में नियुक्त।
- आधिकारिक नाम: रॉयल कमीशन ऑन द सुपरियर सिविल सर्विसेज इन इंडिया।
- उद्देश्य: भारत में सिविल सेवा के संगठन, सेवा की शर्तें, और यूरोपीय एवं भारतीय सदस्यों की भर्ती का अध्ययन करना।
- सिफारिश: वैधानिक लोक सेवा आयोग की तत्काल स्थापना की सिफारिश की।
मुडीमैन समिति (1924)
- 1924 में स्थापित, आधिकारिक तौर पर सुधारों की जांच हेतु समिति।
- उद्देश्य: भारत सरकार अधिनियम 1919 (1921 में लागू) के कामकाज की जांच करना।
- रिपोर्ट सर्वसम्मत नहीं थी।बहुमत ने मामूली संवैधानिक बदलावों का सुझाव दिया।
- अल्पसंख्यक (गैर-सरकारी भारतीयों) ने द्वैध शासन की आलोचना की, इसे खत्म करने की मांग की, और लोकतांत्रिक संविधान लागू करने का सुझाव।
लिनलिथगो आयोग (1926)
- 1926 में नियुक्त किया गया, आधिकारिक रूप से कृषि पर रॉयल कमीशन।
- उद्देश्य: भारत की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जांच करना।1928 में रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- कृषि अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए व्यापक उपायों की सिफारिश की।
- भारतीय गायों के गुणवत्ता में सुधार की सिफारिश की।
साइमन कमीशन पर भारतीय प्रतिक्रिया
सामान्य प्रतिक्रिया
- विरोध का मुख्य कारण: कमीशन में कोई भारतीय सदस्य नहीं।
- मद्रास में कांग्रेस का अधिवेशन (दिसंबर 1927), जिसकी अध्यक्षता एम.ए. अंसारी ने की, ने कमीशन का “हर स्तर पर और हर रूप में” बहिष्कार करने का फैसला किया।
- नेहरू ने एक प्रस्ताव द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया।
- हिंदू महासभा के उदारवादियों ने भी बहिष्कार का समर्थन किया।
- जिन्ना के नेतृत्व वाले मुस्लिम लीग के अधिकांश हिस्से ने भी बहिष्कार का समर्थन किया।
- मुस्लिम लीग ने 1927 में दो सत्र आयोजित किए:
- कोलकाता (जिन्ना) → साइमन कमीशन का विरोध।
- लाहौर (मुहम्मद शफी) → सरकार का समर्थन।
- पंजाब के यूनियनिस्ट्स और दक्षिण के जस्टिस पार्टी ने कमीशन का बहिष्कार नहीं किया।
- साइमन कमीशन 3 फरवरी, 1928 को बॉम्बे पहुंचा।
- हर जगह कमीशन को काले झंडों , हड़तालें, “साइमन गो बैक” के नारों का सामना करना पड़ा ।
- माना जाता है कि “साइमन गो बैक” का नारा यूसुफ मेहरअली ने दिया था; कुछ लोग मानते हैं कि लाला लाजपत राय ने यह नारा दिया था।

अंबेडकर और साइमन कमीशन –
- डॉ. बी. आर. अंबेडकर को बंबई विधान परिषद द्वारा साइमन कमीशन के साथ काम करने के लिए नियुक्त किया गया।
- अंबेडकर ने अक्टूबर 1928 में कमीशन के सामने अपनी बात रखी।
- उन्होंने सार्वभौमिक मताधिकार (पुरुष और महिला दोनों) की वकालत की।
- साइमन कमीशन की रिपोर्ट ने दलित वर्ग हेतु आरक्षित सीट देने की बात कही, लेकिन केवल तब जब उम्मीदवारों को गवर्नर द्वारा अनुमोदित किया जाए।
- अंततः साइमन कमीशन की रिपोर्ट “मृत पत्र” बनकर रह गई।
- पुलिस दमन
- जवाहरलाल नेहरू और जी.बी. पंत को लखनऊ में पीटा गया
- लाला लाजपत राय को अक्टूबर 1928 में गंभीर रूप से पीटा गया, जिसकी वजह से उनकी मृत्यु हो गई।
- उनका कथन था की –
“आज जो प्रहार मुझ पर किए गए, वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ताबूत में ठोंके गए अंतिम कील हैं।”
- उनका कथन था की –
साइमन कमीशन रिपोर्ट (मई 1930) –
- प्रांतों में द्वैध शासन को खत्म करने का प्रस्ताव।
- प्रतिनिधि सरकार के साथ प्रांतीय स्वायत्तता का प्रस्ताव।
- आंतरिक सुरक्षा गवर्नर को विवेकाधीन शक्तियां दी जाएगी।
- विभिन्न समुदायों की रक्षा के लिए गवर्नर को प्रशासनिक शक्ति भी दी गई ।
- प्रांतीय विधान परिषद का आकार बढ़ाया जाएगा।
- केंद्र में उत्तरदायी जिम्मेदारी को खारिज किया दिया गया।
- कैबिनेट सदस्यों की नियुक्ति के लिए गवर्नर-जनरल को पूरी शक्ति होगी।
- भारत सरकार का हाई कोर्ट पर पूरा नियंत्रण होगा।
- पृथक सांप्रदायिक निर्वाचक मंडल को बनाए रखने और उसके विस्तार की सिफारिश की गई , सार्वभौमिक मताधिकार की अनुशंसा नहीं की गई।
- संघवाद को स्वीकार किया गया, लेकिन इसके संबंध में कोई भी ठोस प्रावधान नहीं किए गए ।
- ब्रिटिश प्रांतों और रियासतों को मिलाकर एक सलाहकारी निकाय की अनुशंसा की गई
- उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान के लिए विधानमंडलों की सिफारिश की गई।
- उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान को केंद्रीय विधान परिषद में प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया ।
- सिंध को बॉम्बे प्रेसीडेंसी से अलग करने की सिफारिश की गई।
- बर्मा को भारत से अलग करने की सिफारिश की गई, यह कहते हुए कि यह स्वाभाविक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप का हिस्सा नहीं था।
- भारतीय सेना के भारतीयकरण की सिफारिश की गई, लेकिन ब्रिटिश सेना को भी बनाए रखने दिया गया ।
बर्केनहेड ने भारतीयों को एक ऐसा संविधान बनाने की चुनौती दी जिसे भारतीय राजनीतिक दलों ने स्वीकार किया हो।
नेहरू रिपोर्ट (1928)-
- फरवरी 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन हुआ।
- मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति नियुक्त की।
- यह संवैधानिक ढांचा तैयार करने का पहला भारतीय प्रयास था।
- रिपोर्ट को अगस्त 1928 में अंतिम रूप दिया गया ।
- समिति के सदस्यों में शामिल थे:
- तेज बहादुर सप्रू
- सुभाष चंद्र बोस
- एम.एस.अणे
- मंगल सिंह
- अली इमाम
- शोएब कुरैशी
- जी.आर.प्रधान
- नेहरू रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें –
- स्व-शासित डोमिनियन की तर्ज पर डोमिनियन स्टेटस।
- पृथक निर्वाचन मंडल खारिज किया गया ।
- जहां मुसलमान अल्पसंख्यक थे, वहां मुस्लिम आरक्षण के साथ संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों का प्रस्ताव दिया।
- मुस्लिम आबादी के अनुपात में आरक्षण।
- मुस्लिम-बहुल प्रांतों (पंजाब, बंगाल) में मुस्लिम आरक्षण नहीं दिया गया ।
- मुसलमानों के लिए अतिरिक्त सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार।
- भाषाई आधार पर प्रांत निर्माण का प्रस्ताव।
- 19 मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव दिया, जिनमें शामिल हैं:
- महिलाओं के लिए समान अधिकार
- यूनियन बनाने का अधिकार
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
- केंद्र और प्रांतों में उत्तरदायी सरकार का प्रस्ताव दिया।
- मुस्लिम सांस्कृतिक और धार्मिक हितों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की गई ।
- राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव।
- सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर नेहरू रिपोर्ट विवादास्पद हो गई।
नेहरू रिपोर्ट पर कुल समग्र दृष्टिकोण
- नेहरू रिपोर्ट से हताशा हुई –
- मुस्लिम लीग
- हिंदू महासभा
- सिख
- युवा कांग्रेस नेता, खासकर जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस भी नाराज थे। उन्हें लगा कि डोमिनियन स्टेटस एक कदम पीछे हटना है। उन्होंने मिलकर इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग की स्थापना की।
मुस्लिम लीग के दिल्ली प्रस्ताव (1927)
- दिसंबर 1927 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अनेक मुस्लिम नेताओं ने दिल्ली में बैठक की।
- उन्होंने प्रस्तावित संविधान में सम्मिलित किए जाने हेतु चार प्रस्ताव तैयार किए।
- इन प्रस्तावों को कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन (दिसंबर 1927) में स्वीकार किया गया।
- ये प्रस्ताव ‘दिल्ली प्रस्ताव’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
- दिल्ली प्रस्तावों के चार बिंदु थे:
- पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन मंडल की स्थापना , जिसमें मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित हों।
- केंद्रीय विधान सभा में मुसलमानों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व।
- पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं में मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व।
- तीन नए मुस्लिम बहुल प्रांतों का गठन:
- सिंध
- बलूचिस्तान
- उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत
- हिंदू महासभा की मांगें
- हिंदू महासभा ने नए मुस्लिम बहुल प्रांतों के गठन का कड़ा विरोध किया।
- उसने पंजाब और बंगाल जैसे मुस्लिम बहुल प्रांतों में मुसलमानों के लिए सीटों के आरक्षण का भी विरोध किया।
- कारण: इससे इन प्रांतों की विधानसभाओं पर मुसलमानों का नियंत्रण सुनिश्चित हो जाता।
- हिंदू महासभा ने सरकार के पूरी तरह से एकात्मक ढांचे की मांग की।
- समझौते के प्रयासों का विघटन
- सर्वदलीय सम्मेलन की विचार-विमर्श प्रक्रिया के दौरान मुस्लिम लीग संयुक्त चर्चाओं से अलग हो गई।
- मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए सीटों के आरक्षण पर अडिग रही, विशेषकर केंद्रीय विधानमंडल तथा मुस्लिम बहुल प्रांतों में।
- मोतीलाल नेहरू और अन्य संविधान निर्माताओं के समक्ष इससे गंभीर दुविधा उत्पन्न हुई :
- मुस्लिम मांगों को स्वीकार करने से हिंदू साम्प्रदायिक शक्तियाँ विमुख हो जातीं।
- हिंदू मांगों को स्वीकार करने से मुस्लिम नेतृत्व असंतुष्ट होकर अलग हो जाता।
नेहरू रिपोर्ट पर जिन्ना के संशोधन (कलकत्ता, दिसंबर 1928) –
- दिसंबर 1928 में कलकत्ता में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन में, मुस्लिम लीग की ओर से मोहम्मद अली जिन्ना ने 3 संशोधन प्रस्तुत किए।
- ये संशोधन निम्नलिखित थे:
- केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व।
- वयस्क मताधिकार लागू होने तक बंगाल और पंजाब में जनसंख्या के अनुपात में मुसलमानों के लिए सीटों का आरक्षण।
- अवशिष्ट शक्तियाँ (Residual Powers) प्रांतों में निहित हों।
- ये संशोधन निम्नलिखित थे:
- इन संशोधनों को स्वीकार नहीं किया गया।
जिन्ना के चौदह सूत्र (मार्च 1929) –
- जिन्ना के संशोधनों की अस्वीकृति के पश्चात् जिन्ना मुस्लिम लीग के शफी गुट में पुनः शामिल हो गए।
मार्च 1929 में उन्होंने चौदह सूत्र प्रस्तुत किए, जो आगे चलकर मुस्लिम लीग के प्रचार और राजनीतिक कार्यक्रम का आधार बने।
जिन्ना के चौदह सूत्र (14 Points)
- संवैधानिक एवं संघीय संरचना
- संघीय संविधान, जिसमें अवशिष्ट शक्तियाँ (Residual Powers) प्रांतों में निहित हों।
- प्रांतीय स्वायत्तता
- संघीय इकाइयों (प्रांतों) की सहमति के बिना केंद्रीय संविधान में कोई संशोधन नहीं।
- प्रतिनिधित्व
- सभी विधानमंडलों और निर्वाचित संस्थाओं में मुसलमानों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व, इस शर्त के साथ कि किसी मुस्लिम-बहुल प्रांत को अल्पसंख्यक या समानता की स्थिति में न लाया जाए।
- सेवाओं (Services) और स्वशासी संस्थाओं में मुसलमानों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व।
- केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व।
- किसी भी केंद्रीय या प्रांतीय मंत्रिमंडल में एक-तिहाई सदस्य मुसलमान हों।
- निर्वाचन संबंधी प्रावधान
- पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates)।
- यदि किसी अल्पसंख्यक समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य किसी विधेयक/प्रस्ताव का विरोध करें, तो वह विधानमंडल में पारित न हो।
- क्षेत्रीय सिद्धांत
- ऐसा कोई क्षेत्रीय पुनर्गठन नहीं किया जाए जिससे पंजाब, बंगाल और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में मुस्लिम बहुमत प्रभावित हो।
- सिंध को बंबई प्रेसीडेंसी से पृथक किया जाए।
- उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत और बलूचिस्तान में संवैधानिक सुधार किए जाएँ।
- सांस्कृतिक एवं धार्मिक अधिकार
- सभी समुदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता।
- धर्म, संस्कृति, शिक्षा और भाषा के क्षेत्र में मुस्लिम अधिकारों का संरक्षण।
- परिणाम
- भारत में मुसलमानों की राजनीति के लिए एक स्पष्ट दिशा और प्रस्तुत किया।
- इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ भविष्य के लिए “मार्गों के पृथक्करण” (parting of ways) की घोषणा के रूप में माना गया।
- परिणामस्वरूप, जिन्ना के चौदह सूत्र मुस्लिम लीग की मूल मांगों का आधार बने और अंततः 1947 में पाकिस्तान की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन और गोलमेज सम्मेलन
सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि – कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन (दिसंबर 1928)
- नेहरू रिपोर्ट को कांग्रेस द्वारा स्वीकृति दी गई।
- युवा नेता (जवाहरलाल नेहरू, सुभाष बोस, सत्यमूर्ति) डोमिनियन स्टेटस के विरोधी थे। उन्होंने पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) की मांग की।
- वरिष्ठ नेता (गांधी, मोतीलाल नेहरू) डोमिनियन स्टेटस को ही लक्ष्य बनाए रखना चाहते थे। उन्होंने सरकार को डोमिनियन स्टेटस स्वीकार करने के लिए दो वर्ष का समय देने का सुझाव दिया।
- युवाओं के दबाव में यह अवधि घटाकर एक वर्ष कर दी गई।
- कांग्रेस ने निर्णय लिया कि :
- यदि सरकार एक वर्ष के भीतर डोमिनियन स्टेटस पर आधारित संविधान स्वीकार नहीं करती तो कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करेगी और सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करेगी।
1929 के दौरान राजनीतिक गतिविधियां
- गांधी ने प्रत्यक्ष कार्रवाई के लिए जनता – को तैयार करने हेतु व्यापक यात्राएँ कीं।
- उन्होंने युवाओं को संघर्ष के लिए तैयार होने का आह्वान किया।
- ग्राम-स्तर पर रचनात्मक कार्यक्रमों का संगठन किया।
- कांग्रेस कार्यसमिति ने विदेशी कपड़ा बहिष्कार समिति का गठन किया।
- गांधी ने मार्च 1929 में कलकत्ता में विदेशी कपड़े के बहिष्कार का शुभारंभ किया।
- अभियान के दौरान गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया।
- राजनैतिक घटनाक्रम –
- मेरठ षड्यंत्र कांड (मार्च 1929)।
- भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम फेंका जाना (अप्रैल 1929)।
- ब्रिटेन में रैम्ज़े मैकडोनाल्ड के नेतृत्व में लेबर सरकार का गठन (मई 1929)।
- वेजवुड बेन भारत सचिव (Secretary of State for India) नियुक्त हुए।

इरविन की घोषणा (31 अक्टूबर 1929)
- इंडियन गजट में आधिकारिक विज्ञप्ति के माध्यम से जारी की गई।
- घोषणा में कहा गया:
- डोमिनियन स्टेटस, 1917 की मोंटेग्यू घोषणा का स्वाभाविक परिणाम है।
- घोषणा में वस्तुतः कोई नई बात नहीं थी।
- इरविन ने साइमन रिपोर्ट के बाद एक गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) बुलाने का आश्वासन दिया।
दिल्ली घोषणापत्र (2 नवंबर 1929)
- प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के एक सम्मेलन द्वारा जारी किया गया।
- गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी की शर्तें:
- सम्मेलन को डोमिनियन-स्टेटस आधारित संविधान के निर्माण हेतु एक संविधान सभा की तरह कार्य करना चाहिए।
- कांग्रेस को बहुमत प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया ।
- राजनीतिक बंदियों के लिए सामान्य माफी तथा सुलह (conciliation) की नीति अपनाई जाए।
दिसंबर 1929 में गांधी, मोतीलाल नेहरू एवं अन्य नेताओं ने इरविन से भेंट की।
- उन्होंने यह आश्वासन चाहा कि गोलमेज सम्मेलन डोमिनियन-स्टेटस आधारित संविधान का मसौदा तैयार करेगा।
- इरविन ने स्पष्ट किया कि यह सम्मेलन का उद्देश्य नहीं है।
- इरविन ने दिल्ली घोषणापत्र की मांगों को अस्वीकार कर दिया।
- इससे आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो गई।
लाहौर कांग्रेस अधिवेशन (दिसंबर 1929) — पूर्ण स्वराज की घोषणा
- गोलमेज सम्मेलन के बहिष्कार का निर्णय।
- पूर्ण स्वतंत्रता (पूर्ण स्वराज) को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया।
- कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) को सविनय अवज्ञा आंदोलन (CDM) आरंभ करने का अधिकार दिया गया, जिसमें कर न देने का कार्यक्रम भी शामिल था।
- कांग्रेस सदस्यों का विधानसभाओं से त्यागपत्र देने का निर्णय।
- 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता (स्वराज्य) दिवस घोषित किया गया।
- जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया।
- गांधीजी ने नेहरू के नामांकन का समर्थन किया।
31 दिसंबर 1929 — ध्वजारोहण
- मध्यरात्रि में रावी नदी के तट पर नए तिरंगे का ध्वजारोहण किया गया।
- जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया।
26 जनवरी 1930 — स्वतंत्रता प्रतिज्ञा
- देशभर में नगरों और गाँवों में सार्वजनिक सभाएँ आयोजित की गईं।
- हर स्थान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।
गांधीजी की ग्यारह माँगें (जनवरी 1930)
गांधीजी ने यंग इंडिया में अपनी 11 सूत्रीय माँगें प्रकाशित कीं।
- सामान्य जनहित से संबंधित माँगें
- सेना तथा असैनिक प्रशासन के व्यय में 50% की कटौती।
- पूर्ण शराबबंदी लागू की जाए।
- CID (गुप्तचर विभाग) में सुधार।
- आर्म्स एक्ट में संशोधन कर जनता को हथियार लाइसेंस देने की व्यवस्था।
- राजनीतिक बंदियों की रिहाई।
- पोस्टल रिज़र्वेशन बिल को स्वीकार किया जाए।
- बुर्जुआ वर्ग संबंधी (मध्यवर्गीय) आर्थिक माँगें
- रुपया–स्टर्लिंग विनिमय अनुपात घटाकर 1 शिलिंग 4 पेंस किया जाए।
- भारतीय वस्त्र उद्योग को संरक्षण दिया जाए।
- तटीय नौपरिवहन (कोस्टल शिपिंग) भारतीयों के लिए आरक्षित किया जाए।
- किसान संबंधी माँगें
- भूमि राजस्व में 50% की कमी।
- नमक कर तथा नमक पर सरकारी एकाधिकार समाप्त किया जाए।
- सरकार ने इन माँगों पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।
- कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने गांधीजी को सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का पूर्ण अधिकार दिया।
- फरवरी 1930 में गांधीजी ने नमक को आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा चुना।
नमक को क्यों चुना गया
- नमक कर गरीबों को सर्वाधिक प्रभावित करता था — यह एक प्रकार का ‘पोल टैक्स’ था।
- नमक ने स्वराज के विचार को एक सार्वभौमिक और ठोस जन-समस्या से जोड़ा।
- नमक उत्पादन गरीबों को (खादी की तरह) थोड़ी आय का साधन देता था।
- शहरी जनता भी प्रतीकात्मक रूप से ग्रामीण गरीबों से जुड़ सकी।
दांडी मार्च (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)
- गांधीजी और साबरमती आश्रम के 78 स्वयंसेवकों ने 240 मील की पदयात्रा की।
- आंदोलन हेतु गांधीजी के निर्देश
- जहाँ संभव हो, नमक कानून का सविनय उल्लंघन किया जाए।
- विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों का बहिष्कार करें।
- करों का भुगतान न किया जाए।
- वकील अपनी वकालत छोड़ें।
- जनता न्यायालयों का बहिष्कार करे।
- सरकारी कर्मचारी त्यागपत्र दे सकते हैं।
- सभी कार्य सत्य और अहिंसा पर आधारित हों।
- गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद स्थानीय नेताओं के निर्देशों का पालन किया जाए।

परिणाम (Outcome)
- दांडी मार्च 12 मार्च 1930 को प्रारंभ हुआ।
- गांधीजी ने 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ा।
- संघर्ष की पद्धति
मूलतः अहिंसक,जन-आंदोलन
नमक सत्याग्रह का प्रसार
- दांडी के बाद यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया।
- जवाहरलाल नेहरू की गिरफ्तारी (अप्रैल 1930) → व्यापक जन-प्रदर्शन।
- गांधीजी की गिरफ्तारी (4 मई 1930) → तीव्र जन-आंदोलन, विशेषकर शोलापुर में।
- गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद नमक सत्याग्रह का नेतृत्व पहले अब्बास तैयबजी ने किया, बाद में सरोजिनी नायडू ने धरासाना नमक कारखाने में धरने का नेतृत्व किया, जिससे आंदोलन अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजर में आया ।
- बच्चों ने वानर सेना’ तथा ‘मंजरी सेना’ के रूप में भागीदारी की
- कांग्रेस कार्य समिति (CWC) द्वारा स्वीकृत कार्यक्रम
- रैयतवाड़ी क्षेत्रों में लगान न देना (No-revenue)
- ज़मींदारी क्षेत्रों में चौकीदारी कर न देना (No-chowkidari tax)
- केंद्रीय प्रांतों में वन कानूनों का उल्लंघन
सविनय अवज्ञा आंदोलन:
क्षेत्रीय विस्तार
तमिलनाडु
- सी. राजगोपालाचारी: तिरुचिरापल्ली से वेदारण्यम तक नमक यात्रा।
- विदेशी वस्त्रों की दुकानों की घेराबंदी और सशक्त मद्यनिषेध (शराब विरोधी) अभियान।
मालाबार (केरल)
- के. केलप्पन के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह।
- पी. कृष्ण पिल्लई ने बर्बर लाठीचार्ज के बीच राष्ट्रीय ध्वज की रक्षा की।
आंध्र प्रदेश
- सिबिरम (शिविरों/सत्याग्रह मुख्यालयों) का गठन।
- व्यापारी वर्ग द्वारा वित्तपोषण; प्रभुत्वशाली खेतिहरों की सक्रिय भागीदारी।
ओडिशा
- गोपालबंधु चौधरी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह (बालासोर, कटक और पुरी क्षेत्र)।
असम
- सांप्रदायिक तनाव के कारण अपेक्षाकृत कम भागीदारी।
- कनिंघम सर्कुलर (मई 1930) के विरुद्ध छात्रों की व्यापक हड़ताल।
- चंद्रप्रभा सैकियानी ने जनजातीय समुदायों को वन कानूनों की अवहेलना के लिए प्रेरित किया।
बंगाल
- कांग्रेस में विभाजन (सुभाष बोस बनाम जे.एम. सेनगुप्ता)।
- मुस्लिम भागीदारी कम; ढाका में साम्प्रदायिक दंगे।
- सक्रिय क्षेत्र: मिदनापुर, अरामबाग।
- इसी काल में सूर्य सेन का चटगांव शस्त्रागार कांड हुआ ।
बिहार
- भू-आबद्ध (Landlocked) क्षेत्र होने के कारण नमक सत्याग्रह सांकेतिक रहा।
- चौकीदारी कर-विरोधी आंदोलन अत्यंत सशक्त रहा।
- छोटानागपुर के आदिवासियों का नेतृत्व बोंगा मांझी और सोमरा मांझी ने किया।
- संथालों ने “गांधी” के नाम पर बड़े पैमाने पर अवैध शराब निर्माण (आसव) का कार्य किया।
पेशावर (उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत)
- खान अब्दुल गफ्फार खान (“सीमांत गांधी”) द्वारा नेतृत्व।
- उनका संगठन: खुदाई खिदमतगार (लाल कुर्ती दल)।
- नेताओं की गिरफ्तारी के बाद व्यापक प्रदर्शन; पेशावर एक सप्ताह तक जनता के नियंत्रण में रहा।
- गढ़वाल राइफल्स की एक टुकड़ी ने निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इनकार कर दिया।
शोलापुर
- मार्शल लॉ (16 मई) लागू होने तक समानांतर सरकार का गठन।
धरसाना
- सरोजिनी नायडू, इमाम साहब और मणिलाल गांधी के नेतृत्व में नमक कारखाने पर धावा।
गुजरात
- खेड़ा, बारदोली और जंबूसर में सशक्त कर-अदायगी विरोधी (No-tax) आंदोलन।
- दमन से बचने के लिए ग्रामीणों का रियासतों (Princely States) की ओर पलायन।
महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रांत
- वन कानूनों का व्यापक उल्लंघन (चराई, लकड़ी और वनोपज की बिक्री पर प्रतिबंध का विरोध)।
संयुक्त प्रांत (U.P.)
- जमींदारों के लिए ‘लगान-बंदी’ (No-revenue) अभियान, जो जल्द ही किरायेदारों के लिए ‘किराया-बंदी’ (No-rent) आंदोलन में बदल गया।
मणिपुर और नागालैंड
- रानी गैडिनल्यू द्वारा नेतृत्व (अपने चचेरे भाई जादोनांग से प्रेरित)।
- ब्रिटिश सरकार को कर देने और बेगार (Labor) करने से इनकार।
- जादोनांग को फांसी (1931) दी गई। गैडिनल्यू को 1932 में गिरफ्तार कर आजीवन कारावास दिया गया; वे 1946 में रिहा हुईं।
सरकारी प्रतिक्रिया एवं समझौते के प्रयास (1930–31)
- सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) के दौरान सरकारी दृष्टिकोण
- सरकार का रुख दुविधापूर्ण, भ्रमित और असमंजसपूर्ण था।
- सरकार की दुविधा:
- यदि बल प्रयोग किया जाता → कांग्रेस इसे “दमन” (Repression) कहकर प्रचारित करती।
- यदि कोई कार्रवाई नहीं की जाती → कांग्रेस इसे अपनी “विजय” मानती।
- सरकार की इसी हिचकिचाहट (Vacillation) के कारण गांधीजी की गिरफ्तारी में देरी हुई।
- दमन चक्र की शुरुआत
- जब दमन शुरू हुआ, तो निम्नलिखित कदम उठाए गए:
- अध्यादेशों (Ordinances): नागरिक स्वतंत्रता को बाधित करने वाले कई अध्यादेश जारी किए गए।
- प्रेस पर प्रतिबंध: प्रेस की स्वतंत्रता को पूरी तरह कुचल दिया गया।
- प्रांतीय सरकारों को सविनय अवज्ञा आंदोलन (CDM) से जुड़े संगठनों को प्रतिबंधित करने की अनुमति दी गई।
- कांग्रेस कार्य समिति (CWC): इसे केवल जून 1930 में अवैध घोषित किया गया।
- साइमन कमीशन रिपोर्ट का प्रकाशन
- रिपोर्ट में ‘डोमिनियन स्टेटस’ (अधिराज्य का दर्जा) का कोई उल्लेख नहीं था।
- यह रिपोर्ट अत्यंत प्रतिगामी (Regressive) थी, जिसने उदारवादियों (Moderates) को भी आक्रोशित कर दिया।
समझौते के प्रयास (मध्य-1930)
- जुलाई 1930: वायसराय लॉर्ड इरविन ने निम्नलिखित घोषणाएं कीं:
- गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) का प्रस्ताव।
- भारत के लक्ष्य के रूप में ‘डोमिनियन स्टेटस’ (अधिराज्य का दर्जा) की पुनरावृत्ति।
- इरविन ने तेज बहादुर सप्रू एवं एम.आर. जयकर को सरकार और कांग्रेस के बीच मध्यस्थता की अनुमति दी।
- अगस्त 1930: मोतीलाल नेहरू एवं जवाहरलाल नेहरू को गांधीजी से मिलने हेतु येरवदा जेल ले जाया गया।
- 25 जनवरी 1931: गांधीजी तथा कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के सभी सदस्यों को बिना शर्त रिहा किया गया।
गांधी-इरविन समझौता (दिल्ली समझौता) – 5 मार्च 1931
यह समझौता भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जहाँ ब्रिटिश सरकार ने पहली बार कांग्रेस के साथ ‘समान स्तर’ पर बातचीत की।
इरविन (ब्रिटिश सरकार) द्वारा स्वीकार की गई शर्तें:
- हिंसा के दोषी न पाए गए सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई।
- अभी तक वसूल न किए गए जुर्मानों की माफी।
- जब्त की गई वह भूमि वापस करना जो अभी तक किसी तीसरे पक्ष (Third Party) को बेची नहीं गई थी।
- आंदोलन के दौरान इस्तीफा देने वाले सरकारी कर्मचारियों के प्रति उदार दृष्टिकोण।
- तटीय गांवों में व्यक्तिगत उपयोग के लिए नमक बनाने का अधिकार।
- शांतिपूर्ण और अहिंसक घेराबंदी (Picketing) का अधिकार।
- आपातकालीन अध्यादेशों को वापस लेना।
इरविन ने गांधीजी की दो प्रमुख मांगें खारिज कर दीं:
- पुलिस की ज्यादतियों (Police Excesses) की सार्वजनिक जांच।
- भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदलना।
- गांधीजी की प्रतिबद्धताएं (कांग्रेस की ओर से):
- सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करना।
- दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना।
- निम्नलिखित संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा करना:
- संघ (Federation) का गठन।
- भारतीय उत्तरदायित्व।
- रक्षा, विदेश मामले, अल्पसंख्यक और वित्तीय स्थिरता आदि से संबंधित सुरक्षात्मक प्रावधान (Safeguards)।
सविनय अवज्ञा आंदोलन बनाम असहयोग आंदोलन
- मुख्य उद्देश्य
- असहयोग आंदोलन (NCM): एक वर्ष के भीतर ‘स्वराज’ की अस्पष्ट अवधारणा।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन (CDM): इसका लक्ष्य पूरी तरह स्पष्ट था—पूर्ण स्वराज्य
- कार्यप्रणाली/तरीके (Methods)
- NCM: इसका मुख्य आधार सरकार के साथ सहयोग न करना (Boycott) था। इसमें सरकारी उपाधियों, स्कूलों, न्यायालयों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार शामिल था।
- CDM: इसमें केवल असहयोग ही नहीं, बल्कि शुरुआत से ही कानूनों का खुला उल्लंघन (जैसे नमक कानून तोड़ना) शामिल था।
- जनभागीदारी के बदलते स्वरूप
- बुद्धिजीवी वर्ग: असहयोग आंदोलन की तुलना में इस बार वकीलों और छात्रों जैसे प्रबुद्ध वर्ग की भागीदारी में गिरावट देखी गई।
- मुस्लिम भागीदारी: खिलाफत का मुद्दा न होने के कारण, मुस्लिम भागीदारी NCM के स्तर के मुकाबले काफी कम रही।
- श्रमिक वर्ग: इस आंदोलन के दौरान औद्योगिक मजदूरों का कोई बहुत बड़ा उभार या संगठित विद्रोह देखने को नहीं मिला।
- किसान और व्यवसायी: इस बार किसानों और व्यापारिक वर्गों (Business classes) की भागीदारी कहीं अधिक व्यापक और गहरी थी।
- सरकारी दमन और संगठनात्मक शक्ति
- गिरफ्तारियाँ: सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जेल जाने वाले लोगों की संख्या असहयोग आंदोलन की तुलना में 3 गुना अधिक थी।
- कांग्रेस का स्वरूप: इस समय तक कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा पहले से कहीं अधिक मजबूत, अनुशासित और एकजुट (Cohesive) हो चुका था।
इतिहासकार क्रॉफ्ट (Crawford) के अनुसार: “गांधी ने सदियों की नींद से एक सौम्य और निष्क्रिय राष्ट्र को जगा दिया था।”
कराची कांग्रेस अधिवेशन (मार्च 1931)
पृष्ठभूमि
- अधिवेशन 29 मार्च, 1931 को आयोजित हुआ।
- इसके मात्र छह दिन पूर्व (23 मार्च) भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी।
- गांधीजी का स्वागत नौजवान भारत सभा के सदस्यों ने काले झंडों से किया।
- कांग्रेस ने हिंसा की निंदा की, लेकिन तीनों शहीदों की “वीरता और बलिदान” की सराहना की।
- प्रमुख निर्णय
- गांधी-इरविन समझौते का अनुमोदन (Endorsement): समझौते को स्वीकार किया गया।
- पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य को पुन: दोहराया गया।
दो ऐतिहासिक प्रस्ताव (Landmark Resolutions)
1. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)
- निम्नलिखित की गारंटी दी गई:
- अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता।
- संघ बनाने और सभा करने का अधिकार।
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)।
- जाति, पंथ और लिंग के भेदभाव के बिना समान कानूनी अधिकार।
- धार्मिक मामलों में राज्य की तटस्थता।
- निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा।
- अल्पसंख्यकों की संस्कृति, लिपि और भाषा का संरक्षण।
2. राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम (National Economic Programme)
- अलाभकारी जोतों (Uneconomic holdings) को लगान से छूट।
- लगान और भू-राजस्व में भारी कटौती।
- कृषि ऋण से राहत और सूदखोरी (Usury) पर नियंत्रण।
- श्रमिकों के लिए बेहतर स्थितियाँ:
- निर्वाह मजदूरी (Living wage),
- सीमित कार्य के घंटे और
- महिला श्रमिकों का संरक्षण।
- श्रमिकों और किसानों को यूनियन बनाने का अधिकार।
- प्रमुख उद्योगों, खानों और परिवहन पर राज्य का स्वामित्व/नियंत्रण।
- कराची प्रस्ताव पहली बार स्पष्ट रूप से परिभाषित करता था कि आम जनता के लिए ‘स्वराज्य’ का अर्थ क्या है—राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक मुक्ति।
यह भविष्य की कांग्रेस विचारधारा का ब्लूप्रिंट (आधार-योजना) बन गया।
गोलमेज सम्मेलन (RTC)
प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 – जनवरी 1931)
मुख्य बातें
- यह सम्मेलन लंदन में आयोजित हुआ तथा इसका उद्घाटन सम्राट जॉर्ज पंचम ने किया।
- इसकी अध्यक्षता ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की।
- यह पहली बार था जब ब्रिटिश सरकार और भारतीय प्रतिनिधि औपचारिक रूप से समान स्तर पर एक मंच पर आए।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया, जबकि अन्य अनेक राजनीतिक एवं सामुदायिक समूहों ने इसमें भाग लिया।
- 1. इस सम्मेलन में भारतीय देशी रियासतों के प्रतिनिधियों की भी व्यापक भागीदारी रही।
- अलवर, बड़ौदा, भोपाल, बीकानेर, धौलपुर, जम्मू-कश्मीर, नवानगर, पटियाला (जो चैंबर ऑफ प्रिंसेज़ के चांसलर थे) के शासक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे।
- 2. मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि – आगा खान तृतीय (ब्रिटिश-भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता), मौलाना मोहम्मद अली जौहर , मुहम्मद शफी इत्यादि।
- 3. हिंदू महासभा / हिंदू प्रतिनिधि – बी.एस. मूंजे, एम.आर. जयकर, दीवान बहादुर राजा नरेंद्र नाथ
- 4. सिख प्रतिनिधि – सरदार उज्ज्वल सिंह, सरदार संपूरन सिंह
- 5. पारसी प्रतिनिधि – कावसजी जहांगीर, होमी मोदी
- 6. महिला प्रतिनिधि – बेगम जहानारा शाहनवाज, राधाबाई सुब्बारायन
- 7. उदारवादी – जे.एन. बसु, तेज बहादुर सप्रू, सी.वाई. चिंतामणि
- 8. दलित वर्ग (दलित) – बी.आर. अंबेडकर, रेट्टामलाई श्रीनिवासन
- 9. जस्टिस पार्टी
- 10. श्रमिक प्रतिनिधि
- 11.भारतीय ईसाई –के.टी. पॉल
- 12. एंग्लो-इंडियन – हेनरी गिडनी
- 13. भारत सरकार के प्रतिनिधि
- नरेंद्र नाथ
- भूपेंद्र नाथ मित्रा
- सी.पी. रामास्वामी अय्यर
- एम. रामचंद्र राव
- परिणाम
- कोई बड़ी उपलब्धि नहीं।
- आम सहमति: भारत रक्षा और वित्त में सुरक्षा उपायों के साथ एक संघ होगा।
- कार्यान्वयन पर कोई प्रगति नहीं।
- भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन जारी रहा।
- ब्रिटिश को एहसास हुआ कि कांग्रेस की भागीदारी आवश्यक है।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) :
- पृष्ठभूमि और भागीदारी:
- यह सम्मेलन लंदन में 7 सितंबर 1931 से 1 दिसंबर 1931 तक आयोजित हुआ।
- इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व महात्मा गांधी ने एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में किया।
- कांग्रेस की ओर से ए. रंगास्वामी अयंगार और मदन मोहन मालवीय भी जुड़े थे।
- भारतीय उदार दल के नेताओं—तेज बहादुर सप्रू, सी.वाई. चिंतामणि और वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री—ने गांधी से वायसराय से समझौता करने का आग्रह किया।
- सम्मेलन से पूर्व गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच समझौता हुआ, जिसे गांधी–इरविन समझौता (दिल्ली पैक्ट) कहा जाता है।

सम्मेलन में प्रतिनिधित्व:
- देशी रियासतों के अनेक प्रतिनिधि शामिल हुए
- मुसलमान: आगा खान तृतीय, मौलाना शौकत अली, मुहम्मद अली जिन्ना, ए.के. फजलुल हक, मुहम्मद इकबाल, मुहम्मद शफी।
- हिंदू: एम.आर. जयकर, बी.एस. मुंजे, दीवान बहादुर राजा नरेंद्र नाथ.
- उदारवादी: जे.एन. बसु, सी.वाई. चिंतामणि, तेज बहादुर सप्रू, वी.एस. श्रीनिवास शास्त्री, चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड।
- जस्टिस पार्टी: बोबिली के राजा, अर्कोट रामासामी मुदलियार, सर ए.पी. पात्रो, भास्करराव विठोजीराव जाधव।
- दलित वर्ग: बी.आर. अंबेडकर, रेट्टामलाई श्रीनिवासन।
- सिख: सरदार उज्ज्वल सिंह, सरदार संपूरन सिंह।
- पारसी: कावसजी जहांगीर, होमी मोदी, फिरोज सेठना।
- भारतीय ईसाई: सुरेंद्र कुमार दत्ता, ए.टी. पन्नीरसेल्वम।
- उद्योग: घनश्याम दास बिड़ला, सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, मानेकजी दादाभाई।
- श्रम: एन.एम. जोशी, बी. शिव राव, वी.वी. गिरि।
- महिलाएं: सरोजिनी नायडू, बेगम जहानआरा शाहनवाज, राधाबाई सुब्बारायन।
- विश्वविद्यालय: सैयद सुल्तान अहमद, बिश्वेश्वर दयाल सेठ।
- अन्य प्रांत: बर्मा, सिंध, असम, मध्य प्रांत और NWFP के प्रतिनिधि।
- भारत सरकार के प्रतिनिधि: सी.पी. रामास्वामी अय्यर, नरेंद्र नाथ लॉ, एम. रामचंद्र राव।
- सीमित परिणाम का कारण:
- लॉर्ड इरविन की जगह लॉर्ड विलिंगडन वायसराय बने।
- ब्रिटेन में लेबर सरकार की जगह राष्ट्रीय सरकार बनी।
- भारत में बढ़ी क्रांतिकारी गतिविधियों से ब्रिटेन नाराज था।
- ब्रिटेन में कंजर्वेटिव (चर्चिल के नेतृत्व में) कांग्रेस के साथ बातचीत का विरोध कर रहे थे।
- गांधी ने दावा किया कि कांग्रेस सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व करती है; कई अन्य प्रतिनिधियों ने असहमति जताई।
- कई प्रतिनिधि रूढ़िवादी, वफादार या सांप्रदायिक थे, जिससे गांधी का प्रभाव कम हो गया।
- मुख्य मुद्दे:
- गांधी ने केंद्र और प्रांतों में उत्तरदायी सरकार की मांग की।
- गांधी ने अछूतों, मुसलमानों या अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचक मंडल को खारिज कर दिया ।
- अल्पसंख्यकों की मांगों पर गतिरोध उत्पन्न हुआ: मुसलमानों, दलित वर्गों, ईसाइयों और एंग्लो-इंडियन ने अलग निर्वाचक मंडल की मांग की (“अल्पसंख्यक समझौता”)।
- रियासतें संघ बनाने को लेकर हिचकिचा रही थीं।
- परिणाम:
- भारत के संवैधानिक भविष्य पर कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी।
- मैकडोनाल्ड ने घोषणा की:
- दो मुस्लिम-बहुल प्रांतों का निर्माण: NWFP और सिंध।
- एक भारतीय सलाहकार समिति का गठन।
- तीन विशेषज्ञ समितियों का गठन: वित्त, मताधिकार और राज्य।
- यदि भारतीय सहमत नहीं हो पाते हैं तो ब्रिटिश सांप्रदायिक पंचाट की संभावना।
- ब्रिटिश सरकार ने भारत की स्वतंत्रता की मूल माँग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
- महात्मा गांधी 28 दिसंबर 1931 को भारत लौट आए।
तृतीय गोलमेज सम्मेलन
- 17 नवंबर 1932 को आयोजित हुआ और इसकी अध्यक्षता रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने की।
- इस सम्मेलन में कुल 46 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और यूनाइटेड किंगडम की लेबर पार्टी ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
- इस सम्मेलन में दलित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में डॉ. बी.आर. अंबेडकर शामिल हुए।
- भारतीय देशी रियासतों का प्रतिनिधित्व उनके शासकों और दीवानों द्वारा किया गया।
- मुस्लिम नेताओं में आगा ख़ान, फ़ज़लुल हक़ और मोहम्मद अली जिन्ना प्रमुख थे।
- परिणामस्वरूप
- मार्च 1933 में ब्रिटिश सरकार ने सम्मेलन के परिणामस्वरूप एक श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) प्रकाशित किया, जिसमें भारत के नए संविधान के निर्माण की रूपरेखा और दिशा स्पष्ट की गई।
सांप्रदायिक पंचाट (16 अगस्त 1932)
- ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड द्वारा घोषित।
- भारतीय मताधिकार समिति (लोथियन कमेटी) की सिफारिशों पर आधारित।
- अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचक, मंडल और आरक्षित सीटें स्थापित कीं, जिसमें दलित वर्ग (78 आरक्षित सीटें) शामिल थे।
- इनके लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र प्रदान किए गए: मुस्लिम, यूरोपीय, सिख, भारतीय ईसाई, एंग्लो-इंडियन, दलित वर्ग, और मराठा (बंबई में कुछ सीटों के लिए)।
- कांग्रेस नेताओं ने इसे ब्रिटिश फूट डालो और राज करो की नीति के रूप में देखा।
- पृष्ठभूमि और विवाद
- डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने दलित वर्ग को हिंदुओं से अलग एक स्वतंत्र अल्पसंख्यक मानने की वकालत की।
- बंगाल डिप्रेस्ड क्लासेज़ एसोसिएशन ने जनसंख्या के अनुपात और वयस्क मताधिकार के आधार पर पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की।
- साइमन आयोग ने दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल को अस्वीकार किया, लेकिन आरक्षित सीटों की अवधारणा को स्वीकार किया।
- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर ने पुनः पृथक निर्वाचक मंडल का मुद्दा उठाया।
- आंबेडकर ने संयुक्त निर्वाचक मंडल में आरक्षित सीटों के प्रश्न पर गांधी से समझौते का प्रयास किया।
- गांधी ने यह कहते हुए इसे अस्वीकार कर दिया कि कांग्रेस ही भारत की शोषित जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
- भारतीय प्रतिनिधियों के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी।
- अंततः रैम्ज़े मैकडोनाल्ड की मध्यस्थता से सांप्रदायिक पंचाट घोषित किया गया।
- सांप्रदायिक पंचाट के मुख्य प्रावधान
- निम्न समुदाय हेतु पृथक निर्वाचक मंडल प्रदान किए गए:
- मुसलमान
- यूरोपियन
- सिख
- भारतीय ईसाई
- एंग्लो-इंडियन
- दलित वर्ग
- महिलाएं
- मराठा (बंबई में)
- दलित वर्ग के लिए 20 वर्षों के लिए व्यवस्था की गई थी ।
- प्रांतीय विधानसभाओं की सीटों का वितरण सांप्रदायिक आधार पर किया जाना था।
- प्रांतीय विधानसभाओं की मौजूदा सीटों की संख्या दोगुनी की जानी थी।
- अल्पसंख्यक प्रांतों में मुसलमानों को प्रतिनिधित्व में अतिरिक्त प्रतिनिधित्व दिया गया।
- उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत को छोड़कर सभी प्रांतों में महिलाओं के लिए 3% सीटें आरक्षित की गईं।
- दलित वर्ग को अल्पसंख्यक घोषित/मान्यता दी गई।
- दलित वर्ग को ‘द्वैध मताधिकार’ दिया गया:
- एक मत पृथक निर्वाचक मंडल में
- एक मत सामान्य निर्वाचक मंडल में
- मजदूरों, जमींदारों, व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिए सीटें निर्धारित की गईं।
- बंबई में मराठाओं के लिए 7 सीटें आरक्षित की गईं।
सांप्रदायिक पंचाट पर कांग्रेस का रुख
- कांग्रेस ने दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का विरोध किया।
- अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना सांप्रदायिक पंचाट में परिवर्तन के पक्ष में नहीं थी।
- पुरस्कार को न स्वीकार करने और न अस्वीकार करने का निर्णय लिया।
- राष्ट्रवादियों ने दलित वर्ग को अलग राजनीतिक इकाई मानने का विरोध किया।
गांधी की प्रतिक्रिया
- इसे भारतीय एकता और राष्ट्रवाद पर आघात माना।
- माना कि यह अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष को कमजोर करेगा; पृथक निर्वाचक मंडल अस्पृश्यता को स्थायी बनाएंगे।
- सार्वभौमिक मताधिकार के माध्यम से संयुक्त निर्वाचक मंडल के पक्षधर थे, साथ ही अधिक आरक्षित सीटें स्वीकार करने को तैयार थे।
- 20 सितंबर 1932 को अपनी मांगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन उपवास प्रारंभ किया।
पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932)
- एम. सी. राजा और मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से 24 सितंबर 1932 को डॉ. बी. आर. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच पूना समझौता हुआ।
- दलित वर्ग की ओर से डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने हस्ताक्षर किए।
- दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था समाप्त की गई।
- आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई:
- प्रांतीय विधानसभाओं में 71 से बढ़ाकर 148।
- केन्द्रीय विधानमंडल में कुल सीटों का 18%।

गांधी का हरिजन अभियान
- ब्रिटिश विभाजन-नीति के विभाजनकारी प्रभावों को समाप्त करना लक्ष्य था।
- 1932 में जेल से और 1933 में वर्धा से रिहाई के बाद अभियान शुरू किया।
- अखिल भारतीय विरोधी अस्पृश्यता संघ स्थापित किया (सितंबर 1932)।
- साप्ताहिक हरिजन समाचार पत्र शुरू किया (जनवरी 1933)।
- हरिजन सेवा संघ स्थापित किया ताकि हरिजनों का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक उत्थान हो।
- हरिजन यात्रा (नवंबर 1933 – जुलाई 1934, 20,000 किमी) की ।
- 8 मई और 16 अगस्त को 1934 उपवास किए ।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद भविष्य की रणनीति पर बहस (1934–37)
प्रथम चरण की बहस (1934–35): सविनय अवज्ञा आंदोलन वापसी के बाद क्या करना है?
- तीन दृष्टिकोण:
- रचनात्मक कार्य (गांधीवादी तरीका)
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद रचनात्मक कार्यक्रम जारी रखें।
- जनता को व्यस्त रखें और नैतिक रूप से तैयार रखें।
- संवैधानिक संघर्ष + परिषद में प्रवेश
- एम.ए. अंसारी, आसफ अली, भूलाभाई देसाई, एस. सत्यमूर्ति, बी.सी. रॉय आदि ने इसका समर्थन किया।
- वामपंथी रुझान (नेहरू का रुख)
- वामपंथी रुझान (नेहरू का रुख)
- रचनात्मक कार्य और परिषद में प्रवेश दोनों के खिलाफ।
- ये उपनिवेशवाद विरोधी जन संघर्ष से ध्यान भटकाएंगे।
- गैर-संवैधानिक, जन संघर्ष को तुरंत फिर से शुरू करने के पक्ष में।
काउंसिल प्रवेश स्वीकृत (1934)
- गांधी ने काउंसिल प्रवेश स्वीकार कर विभाजन से बचा लिया।
- शर्तें:
- जो लोग सत्याग्रह या रचनात्मक काम नहीं कर सकते उन्हें संवैधानिक व्यवस्था में अपने स्वार्थ में फंसने से बचना होगा।
- वामपंथियों को भरोसा दिलाया:
- सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेना साम्राज्यवाद के साथ कोई समझौता नहीं है।
- मई 1934 , पटना: चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस द्वारा पार्लियामेंट्री बोर्ड बनाया गया।
- (नेहरू सहित) उनके तरीकों से सहमत नहीं थे।
- कांग्रेस में बाहर से सेवा करने का निर्णय लिया
गांधी ने इस्तीफा दिया (अक्टूबर 1934)
- नवीन प्रवृत्तियों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे।
- दक्षिणपंथी संसदीय राजनीति पसंद करते थे।
- वामपंथी/समाजवादी ।
भारत सरकार अधिनियम, 1935
अखिल भारतीय संघ
- इसमें सभी ब्रिटिश भारतीय प्रांतों + रियासतों को शामिल किया जाना था।
- शर्तें:इन राज्यों में रियासतों की 50% आबादी शामिल होनी चाहिए।
- शर्तें पूरी नहीं हुईं → संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया।
- केंद्र सरकार 1946 तक 1919 के अधिनियम के तहत काम करती रही।
- प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी सरकार स्थापित की गई।
- भारत सरकार अधिनियम, 1935 का मूल्यांकन —गवर्नर-जनरल के अनेक ‘सुरक्षा प्रावधान’ और ‘विशेष दायित्व’ प्रभावी कार्यप्रणाली में बाधक बने।
- प्रांतीय गवर्नरों के पास व्यापक शक्तियाँ बनी रहीं।
- ब्रिटिश भारत की केवल लगभग 14% जनसंख्या को मताधिकार मिला।साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार किया गया, जिससे पृथकतावाद को बढ़ावा मिला → भारत विभाजन में योगदान।
- संविधान अत्यधिक कठोर था; भारत में आंतरिक संशोधन की अनुमति नहीं थी।
- संशोधन का अधिकार केवल ब्रिटिश संसद के पास था।
- महत्वपूर्ण विचार —लॉर्ड लिनलिथगो: यह अधिनियम भारत में ब्रिटिश प्रभाव बनाए रखने के लिए बनाया गया।
- नेहरू: “यह ऐसी गाड़ी है जिसमें ब्रेक तो हैं, पर इंजन नहीं।
- ”बी. आर. टॉमलिनसन: संवैधानिक प्रगति का उद्देश्य भारतीय सहयोगियों को राज की ओर आकर्षित करना था।
1937 प्रांतीय चुनाव
- 11 प्रांतों में हुए: मद्रास,मध्य प्रांत , बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रांत , बॉम्बे, असम, उत्तर पश्चिम सीमांत , बंगाल, पंजाब, सिंध।
कांग्रेस चुनाव घोषणापत्र
- 1935 के एक्ट को पूरी तरह से खारिज किया।
- वादा किया गया कि
- राजनीतिक कैदियों की रिहाई की जाएगी ।
- जाति और लिंग आधारित भेदभाव को खत्म किया जाएगा ।
- कट्टरपंथी कृषि सुधार किए जाएँगे ।
- कम किराया और भूमि राजस्व निर्धारित होगा ।
- ग्रामीण कर्ज से राहत दी जाएगी ।
- सस्ता कर्ज दिया जाएगा ।
- यूनियन बनाने और हड़ताल करने का अधिकार प्रदान दिया जाएगा ।
- गांधी ने किसी भी चुनावी सभा में प्रचार नहीं किया।
चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन
- लड़ी गई सीटें: 1,161
- जीती गई सीटें: 716
- कांग्रेस को बहुमत प्राप्त हुआ:
- बॉम्बे, मद्रास, सेंट्रल प्रोविंसेस, संयुक्त प्रांत , बिहार, उड़ीसा।
- बंगाल, असम और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी।
- परिणाम से कांग्रेस की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।
- कांग्रेस मंत्रिमंडल (1937–39) — जिन प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडल बने
- बंबई
- मद्रास
- केंद्रीय प्रांत
- उड़ीसा
- संयुक्त प्रांत
- बिहार
- बाद में: उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, असम
- बंगाल, पंजाब और सिंध को छोड़कर शेष सभी प्रांतों में कांग्रेस के मंत्रिमंडल बने, बहुमत या गठबंधन के माध्यम से।
कांग्रेस मंत्रिमंडलों के अंतर्गत कार्य (28 महीने)
मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया
- कांग्रेस मंत्रिमंडल द्वारा सत्ता साझा न किए जाने से मुस्लिम लीग असंतुष्ट हुई।
- 1938 में ‘पीरपुर समिति’ का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य “कांग्रेस के अत्याचारों” की जाँच करना था।
- कांग्रेस पर लगाए गए आरोप:
- धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप।
- उर्दू के स्थान पर हिंदी को बढ़ावा देना।
- मुसलमानों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न देना।
- आर्थिक भेदभाव।
- कांग्रेस मंत्रिमंडलों का अंत
- अक्टूबर 1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया।
- कारण: द्वितीय विश्व युद्ध का प्रारंभ तथा भारत को बिना परामर्श युद्ध में झोंके जाने का कांग्रेस द्वारा विरोध।
सुभाष चंद्र बोस — प्रारंभिक राजनीतिक जीवन
- आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण की (चौथा स्थान), परंतु 1921 में त्यागपत्र देकर कांग्रेस में शामिल हुए।
- राजनीतिक गुरु: चित्तरंजन दास।
- 1923 में महापौर चित्तरंजन दास के अधीन कलकत्ता के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहे।
- कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।
- बंगाल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे।
- मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट का विरोध किया क्योंकि उसमें डोमिनियन स्टेटस की अनुशंसा की गई थी; पूर्ण स्वतंत्रता की माँग की।
- इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की।
- लाहौर अधिवेशन, 1929 के ‘पूर्ण स्वराज’ प्रस्ताव का समर्थन किया।
- नमक सत्याग्रह (1930) में सक्रिय भूमिका निभाई; गिरफ्तार हुए।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन की वापसी तथा गांधी–इरविन समझौते (1931) का विरोध किया।
- पुस्तक: द इंडियन स्ट्रगल — 1920 से 1934 तक के स्वतंत्रता आंदोलन का विवरण।
हरिपुरा अधिवेशन (फरवरी 1938, गुजरात)
- सुभाष चंद्र बोस सर्वसम्मति से कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
- आर्थिक नियोजन के पक्षधर रहे; राष्ट्रीय योजना समिति (1938) की स्थापना में भूमिका निभाई।
- प्रस्ताव पारित हुआ कि कांग्रेस रियासतों में जन आंदोलनों का समर्थन करेगी।
1939 का कांग्रेस अध्यक्षीय चुनाव — बोस बनाम गांधी
- जनवरी 1939 में बोस ने गांधी की इच्छा के विरुद्ध पुनः अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा।
- गांधी समर्थित प्रत्याशी: पट्टाभि सीतारमैया।
- चुनाव परिणाम:
- सुभाष चंद्र बोस: 1580 मत
- पट्टाभि सीतारमैया: 1377 मत
- बोस को समर्थन कांग्रेस समाजवादियों एवं साम्यवादियों से मिला।
- गांधी का वक्तव्य: “पट्टाभि की हार मेरी हार है।”
त्रिपुरी अधिवेशन (मार्च 1939) —
- स्थान: त्रिपुरी (जबलपुर के निकट), केंद्रीय प्रांत।
- संकट के कारण:
- कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा कार्यसमिति का नामांकन।
- बोस की विजय से कांग्रेस में गहरी वैचारिक ध्रुवीकरण उजागर हुआ।
- गोविंद बल्लभ पंत द्वारा प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया:
- गांधीवादी नीतियों में आस्था की पुनः पुष्टि।
- बोस से कहा गया कि वे “गांधीजी की इच्छानुसार” कार्यसमिति का गठन करें।
- गांधी ने बोस पर कार्यसमिति थोपने से इनकार किया; कहा कि बोस स्वयं सदस्यों का चयन करें।
- बोस गांधी का विश्वास अर्जित करने में असफल रहे।
- अप्रैल 1939 में बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
- राजेंद्र प्रसाद नए अध्यक्ष निर्वाचित हुए।
फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन
- मई 1939 में बोस ने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की (मकूर, उन्नाव)।
- 9 जुलाई 1939 को अखिल भारतीय विरोध दिवस का आह्वान किया।
- कांग्रेस कार्यसमिति की प्रतिक्रिया:
- अगस्त 1939 में बोस को बंगाल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटाया गया।
- तीन वर्षों के लिए कांग्रेस में किसी भी निर्वाचित पद से वंचित कर दिया गया।
बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज (INA)
- भारत से पलायन (1941)
- 1940 में गिरफ्तार; नजरबंद किए गए।
- जनवरी 1941 में कलकत्ता से ‘ज़ियाउद्दीन’ के नाम से भगत राम की सहायता से फरार हुए।
- पेशावर पहुँचे; वहाँ से विदेश गए।
- सोवियत संघ से समर्थन पाने का प्रयास किया, परंतु युद्ध में सोवियत प्रवेश से वे निराश हुए।
- जर्मनी गए; ‘ऑरलैंडो माजोट्टा’ के नाम से हिटलर से भेंट की।
- जर्मनी में गतिविधियाँ
- यूरोप में भारतीय युद्धबंदियों से ‘फ्रीडम आर्मी’ (मुक्ति सेना) का गठन किया।
- बर्लिन को प्रचार केंद्र के रूप में उपयोग किया; जनवरी 1942 से नियमित रेडियो प्रसारण आरंभ किए।
- “जय हिंद” का नारा दिया।जर्मनी में ‘नेताजी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
- द्वितीय चरण:
आज़ाद हिंद फ़ौज और सुभाष चंद्र बोस
- जर्मन एवं जापानी पनडुब्बियों के माध्यम से यात्रा कर जुलाई 1943 में सिंगापुर पहुँचे।
- रास बिहारी बोस से नेतृत्व ग्रहण किया, जो भारतीय स्वतंत्रता लीग के प्रमुख थे।
- रास बिहारी बोस की भूमिका
- क्रांतिकारी; 1915 में जापान चले गए और वहीं के नागरिक बने।
- पैन-एशियाई नेटवर्क के माध्यम से कार्य किया; टोक्यो में ‘इंडियन क्लब’ की स्थापना की।
- 1942 में ‘भारतीय स्वतंत्रता लीग’ का गठन किया।
- जुलाई 1943 में नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया।
- सुभाष चंद्र बोस ने इंडियन नेशनल आर्मी (INA), जिसे आज़ाद हिंद फ़ौज भी कहा जाता है, का पुनर्गठन किया।
- INA का प्रारंभिक गठन 1942 में मोहन सिंह द्वारा जापान के समर्थन से किया गया था।
- लगभग 40,000 भारतीय युद्धबंदियों (POWs) की भर्ती की गई।
- सुभाष चंद्र बोस ने जुलाई 1943 में सिंगापुर में इंडियन नेशनल आर्मी की कमान संभाली और उसका पुनर्गठन किया।
- स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार (आज़ाद हिंद सरकार) की स्थापना — 21 अक्टूबर 1943
- सिंगापुर में सुभाष चंद्र बोस द्वारा गठन किया गया।
- प्रमुख मंत्री:
- एच.सी. चटर्जी (वित्त)
- एम.ए. अय्यर (प्रसारण)
- लक्ष्मी स्वामीनाथन (महिला विभाग)
- नारा:
- “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।
- ”ब्रिटेन और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की
- धुरी शक्तियों द्वारा मान्यता प्राप्त।रानी झाँसी रेजिमेंट (महिला रेजिमेंट) का गठन किया।
- विश्व स्तर पर धन और स्वयंसेवकों का संग्रह किया।
- INA का सैन्य अभियान
- मुख्यालय रंगून स्थानांतरित (जनवरी 1944)।
- “चलो दिल्ली!” के नारे के साथ अभियान आरंभ किया।अंडमान और निकोबार द्वीप INA को सौंपे गए (नवंबर 1943);
- नाम परिवर्तन:अंडमान → स्वराज द्वीपनिकोबार → शहीद द्वीपजुलाई 1944 में आज़ाद हिंद रेडियो से बोस ने गांधी को “राष्ट्रपिता” कहा।
- शाहनवाज़ खान के नेतृत्व में INA की एक डिवीजन ने इंफाल अभियान में जापानियों का साथ दिया।
- INA को जापानियों से नस्लीय भेदभाव झेलना पड़ा: राशन और हथियार नहीं दिए गए , जबरन श्रम करवाया गया ।
- मोइरांग (मणिपुर) पर अधिकार —
- 1944
- मोइरांग का 3 माह तक प्रशासन इन में नियंत्रण में रहा किया गया और 1944 में वहाँ तिरंगा फहराया गया।
- जापान की पराजय के साथ INA का अभियान समाप्त हुआ।जापान ने 15 अगस्त 1945 को आत्मसमर्पण किया → INA का पतन।
- जापानी सरकार ने विमान दुर्घटना से पहले सुभाष चंद्र बोस को मंचूरिया ले जाने का निर्णय किया।
- सुभाष चंद्र बोस की 18 अगस्त 1945 को ताइपे में विमान दुर्घटना में मृत्यु मानी जाती है (रहस्यमय)।
गांधी और बोस
- वैचारिक मतभेदों के बावजूद दोनों एक-दूसरे के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।
- 1942 में गांधी ने बोस को “देशभक्तों का राजकुमार” कहा।
- बोस की कथित मृत्यु के बाद गांधी ने कहा:
- बोस की देशभक्ति बेजोड़ थी।
- उनका साहस उनके प्रत्येक कार्य में परिलक्षित होता था।
- “नेताजी सदा अमर रहेंगे।”
- बोस ने गांधी को संबोधित किया:
- “हमारे राष्ट्रपिता” (रेडियो रंगून, 1944)।
- त्रिपुरी अधिवेशन में त्यागपत्र देते समय बोस ने कहा:
- गांधी के प्रति सम्मान में वह “किसी से पीछे नहीं” हैं।
- 23 जनवरी को उनकी जयंती के उपलक्ष्य में पराक्रम दिवस घोषित किया गया है।
- उनका प्रसिद्ध कथन: “इस नश्वर संसार में सब कुछ नष्ट होता है और होगा, परंतु विचार, आदर्श और स्वप्न नष्ट नहीं होते।”
