भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (1914 – 1929): आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत 1914 से 1929 का काल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के तीव्र विस्तार और जनभागीदारी का महत्वपूर्ण चरण था। प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव, गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, स्वराज की मांग तथा क्रांतिकारी गतिविधियों ने स्वतंत्रता संग्राम को व्यापक और संगठित स्वरूप प्रदान किया।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (1914 – 1929)
- प्रथम विश्व युद्ध (1914–1919) के प्रति भारतीय राष्ट्रवादियों की प्रतिक्रिया
- ब्रिटेन ने जर्मनी, ऑस्ट्रिया–हंगरी और तुर्की (धूरी राष्ट्र) के विरुद्ध फ्रांस, रूस, अमेरिका, इटली और जापान (मित्र राष्ट्र) के साथ गठबंधन किया।
- राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया तीन धाराओं में विभाजित थी:
- उदारवादी: कर्तव्य समझकर ब्रिटिश युद्ध-प्रयास का समर्थन किया।
- उग्रवादी (जैसे तिलक): इस आशा में युद्ध का समर्थन किया कि बदले में भारत को स्वशासन मिलेगा।
- क्रांतिकारी: युद्ध की स्थिति का लाभ उठाकर ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया (गदर पार्टी, बर्लिन समिति, सिंगापुर जैसे विद्रोह)।
- क्रांतिकारियों के तर्क:
- ब्रिटिश सेना का एक बड़ा हिस्सा प्रथम विश्व युद्ध के मोर्चों पर व्यस्त था।
- ब्रिटेन के शत्रुओं (जैसे जर्मनी और तुर्की) से वित्तीय और सैन्य सहायता मिलने की संभावना थी।
- भारत में ब्रिटिश सैन्य उपस्थिति और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का कमजोर होना।
होम रूल लीग आंदोलन
- प्रथम विश्व युद्ध (WWI) के दौरान इसे एक उदारवादी लेकिन प्रभावी राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया के रूप में शुरू किया गया था।
- नेतृत्व: बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट, जी.एस. खापर्डे, एस. सुब्रमण्यम अय्यर, जोसेफ बैप्टिस्टा और मोहम्मद अली जिन्ना।
- उद्देश्य: ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के भीतर भारत के लिए स्वशासन (Home Rule) की मांग करना। यह आंदोलन आयरिश होम रूल लीग से प्रेरित था।

आंदोलन के उदय के कारण
- सरकार से रियायतें प्राप्त करने के लिए जनता के संगठित दबाव की आवश्यकता महसूस की गई।
- मार्ले-मिंटो सुधारों से मोहभंग: 1909 के सुधारों से भारतीय राष्ट्रवादी संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उनमें वास्तविक शक्ति का अभाव था।
- युद्धकालीन कष्ट: प्रथम विश्व युद्ध के कारण भारी कराधान, वस्तुओं की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि और जनता में व्यापक असंतोष व्याप्त था।
- युद्ध ने यूरोपीय शक्तियों की ‘अजेयता’ (श्वेत श्रेष्ठता) के भ्रम को समाप्त कर दिया।
- जून 1914 में जेल से रिहा होने के बाद तिलक पुनः नेतृत्व के लिए तैयार थे। उन्होंने सरकार के प्रति ‘निष्ठा’ और ‘सुधार’ की मांग का संतुलन बनाया।
- आयरिश मूल की थियोसोफिस्ट एनी बेसेंट भारत में आयरलैंड की तर्ज पर एक राष्ट्रीय होम रूल आंदोलन खड़ा करना चाहती थीं।
लीग की स्थापना
- तिलक की ‘इंडियन होम रूल लीग’ (अप्रैल 1916)
- मुख्यालय: पूना
- कार्यक्षेत्र: महाराष्ट्र (बंबई को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत और बरार।
- संगठन: इसकी कुल छह शाखाएँ थीं।
- प्रमुख मांगें: स्वराज, भाषाई आधार पर राज्यों का गठन और मातृभाषा (Vernacular) में शिक्षा।
- एनी बेसेंट की अखिल भारतीय होमरूल लीग (सितंबर 1916)
- मुख्यालय: अड्यार (मद्रास)
- कार्यक्षेत्र: शेष भारत (बंबई सहित)।
- संगठन: इसकी लगभग 200 शाखाएँ थीं, लेकिन संगठन तिलक की लीग की तुलना में शिथिल था।
- प्रमुख कार्यकर्ता: जॉर्ज अरुंडेल, बी.डब्ल्यू. वाडिया और सी.पी. रामास्वामी अय्यर।
- अपनाए गए तरीक़े
- जन-जागरण: सार्वजनिक सभाओं, सम्मेलनों का आयोजन और पुस्तकालयों व वाचनालयों की स्थापना।
- युवाओं की भागीदारी: छात्रों के लिए विशेष कक्षाओं का आयोजन, नाटकों और धार्मिक गीतों (भजनों) के माध्यम से राजनीतिक संदेश।
- प्रचार के साधन: समाचार पत्रों, पैम्फलेट्स (पर्चों) और पोस्टरों के माध्यम से लीग के उद्देश्यों का प्रसार।
- सामाजिक कार्य: सामाजिक कार्यों का आयोजन और स्थानीय शासन में सक्रिय भागीदारी।
होम रूल लीग कार्यक्रम
- उद्देश्य: स्वशासन (Home Rule) के संदेश को सामान्य जनता तक पहुँचाना।
- व्यापक अपील: इस आंदोलन ने गुजरात और सिंध जैसे उन क्षेत्रों में भी अपनी पहुँच बनाई जो पहले राजनीतिक रूप से पिछड़े माने जाते थे।
- तरीके और गतिविधियाँ:
- सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से राजनीतिक शिक्षा और विचार-विमर्श को प्रोत्साहित किया।
- राष्ट्रीय राजनीति से संबंधित पुस्तकों के साथ पुस्तकालयों और वाचनालयों की स्थापना की।
- छात्रों के लिए राजनीति विषयक सम्मेलन और कक्षाओं का आयोजन किया।
- समाचारपत्रों, पैम्पलेट्स , पोस्टरों और चित्रयुक्त पोस्टकार्डों के माध्यम से प्रचार किया।
- नाटकों और धार्मिक गीतों का प्रयोग कर संदेश फैलाया गया।
- आंदोलन की गतिविधियों के लिए धन संग्रह किया गया।
- समुदायों में सामाजिक कार्यों का संगठन किया गया।
- लोगों को जोड़ने के लिए स्थानीय स्वशासन संस्थाओं की गतिविधियों में भाग लिया गया।
- वैश्विक घटनाओं का प्रभाव: 1917 की रूसी क्रांति ने अभियान को नई ऊर्जा प्रदान की।
- आंदोलन में शामिल प्रमुख नेता
- मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, भुलाभाई देसाई, चित्तरंजन दास, के.एम. मुंशी, बी. चक्रवर्ती, सैफुद्दीन किचलू, मदन मोहन मालवीय, मोहम्मद अली जिन्ना, तेज बहादुर सप्रू, लाला लाजपत राय।
- इनमें से कुछ एनी बेसेंट की लीग की स्थानीय शाखाओं के अध्यक्ष बने।
- मोहम्मद अली जिन्ना ने बंबई प्रभाग का नेतृत्व किया।
- कांग्रेस की निष्क्रियता से निराश अनेक उदारवादी कांग्रेसी भी इस आंदोलन में शामिल हुए।
- गोखले की ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ के सदस्य भी आंदोलन में सक्रिय रहे।
- सरकारी दृष्टिकोण
- सरकार ने आंदोलन के प्रति अत्यंत दमनकारी रुख अपनाया, विशेष रूप से मद्रास (चेन्नई) में, जहाँ छात्रों के राजनीतिक सभाओं में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
- तिलक के विरुद्ध कानूनी मामला दर्ज किया गया, जिसे बाद में उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया।
- तिलक के पंजाब और दिल्ली में प्रवेश पर रोक लगा दी गई।
- जून 1917 में एनी बेसेंट, बी.पी. वाडिया और जॉर्ज अरुंडेल को गिरफ्तार कर लिया गया।
- इन गिरफ्तारियों के विरोध में पूरे देश में प्रदर्शन हुए।
- सर एस. सुब्रमण्यम अय्यर ने विरोध स्वरूप अपनी ‘नाइटहुड’ की पदवी त्याग दी।
- तिलक ने ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ (Passive Resistance) के कार्यक्रम की वकालत की।
- सरकारी दमन ने आंदोलनकारियों के संकल्प को और अधिक दृढ़ कर दिया।
- भारत सचिव मॉन्टेग्यू ने इस स्थिति पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए इसकी तुलना शिव और सती की पौराणिक कथा से की (जिसका अर्थ था कि दमन से राष्ट्रवाद के और अधिक टुकड़े होकर पूरे देश में फैल रहे हैं)।
- बढ़ते जन-दबाव के कारण, सितंबर 1917 में एनी बेसेंट को रिहा कर दिया गया।
- 1919 तक होम रूल आंदोलन के धीमा होने के कारण
- आंदोलन के भीतर प्रभावी संगठनात्मक ढांचे का अभाव था।
- 1917–18 के दौरान सांप्रदायिक दंगे हुए, जिससे राष्ट्रीय एकता बाधित हुई।
- एनी बेसेंट की गिरफ्तारी के बाद जो उदारवादी आंदोलन से जुड़े थे, वे अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा (जिसमें स्वशासन का वादा किया गया था) और बेसेंट की रिहाई के बाद शांत हो गए।
- उग्रवादियों द्वारा ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ की चर्चा ने उदारवादियों को डरा दिया, जिससे सितंबर 1918 के बाद उनकी भागीदारी कम हो गई।
- मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों (जुलाई 1918) के प्रस्तावों ने राष्ट्रवादी खेमे में और अधिक विभाजन पैदा कर दिया।
- सुधारों के बाद लीग का उपयोग कैसे किया जाए, इस पर एनी बेसेंट अनिर्णायक थीं और निष्क्रिय प्रतिरोध के मुद्दे पर उनकी राय बदलती रही।
- सितंबर 1918 में तिलक वैलेंटाइन शिरोल (लेखक: इंडियन अनरेस्ट) के खिलाफ मानहानि का मुकदमा लड़ने विदेश चले गए।
- तिलक की अनुपस्थिति और बेसेंट की अनिर्णय की स्थिति ने आंदोलन को नेतृत्वविहीन कर दिया।
- स्वतंत्रता संग्राम के प्रति महात्मा गांधी के नए और प्रभावशाली दृष्टिकोण को लोकप्रियता मिली, जिससे उभरते हुए जन आंदोलन ने होम रूल आंदोलन को हाशिए पर धकेल दिया।
- 1920 में गांधीजी ‘अखिल भारतीय होम रूल लीग’ के अध्यक्ष बने, इसका नाम बदलकर ‘स्वराज्य सभा’ कर दिया और एक वर्ष के भीतर इसका विलय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में हो गया।
- होमरूल आंदोलन की उपलब्धियाँ / सकारात्मक परिणाम
- आंदोलन ने राजनीति का ध्यान अभिजात्य वर्ग (Elites) से हटाकर जनसामान्य की ओर केंद्रित किया और लोगों को ‘जन-राजनीति’ के लिए तैयार किया।
- नगर और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच संगठनात्मक संपर्क स्थापित किए।
- इस आंदोलन ने उत्साही और समर्पित राष्ट्रवादियों की एक नई पीढ़ी तैयार की।
- जनता को गांधीवादी राजनीति और आंदोलनों के लिए मानसिक रूप से तैयार किया।
- इसने 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा और मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की रूपरेखा को काफी हद तक प्रभावित किया।
- इसी के प्रभावस्वरूप 1916 के लखनऊ अधिवेशन में उदारवादियों और उग्रवादियों का पुनः मिलन संभव हो सका।
- इसने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा, तीव्रता और आयाम प्रदान किया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन (1916)
- उग्रपंथियों का कांग्रेस में पुनः प्रवेश
- अध्यक्षता उदारवादी नेता अंबिका चरण मजुमदार ने की थी।
- तिलक के नेतृत्व में उग्रवादियों (Extremists) को अंततः कांग्रेस में वापस शामिल कर लिया गया।
- पुनः प्रवेश को संभव बनाने वाले कारण:
- पुराने विवाद और मतभेद अपनी प्रासंगिकता खो चुके थे।
- उदारवादियों और उग्रवादियों, दोनों को यह अहसास हो गया था कि 1907 के विभाजन के कारण राजनीतिक निष्क्रियता पैदा हुई है।
- तिलक और एनी बेसेंट ने दोनों धड़ों को जोड़ने के लिए सक्रिय प्रयास किए।
- तिलक ने उदारवादियों को आश्वस्त किया कि वे केवल प्रशासनिक सुधारों के समर्थक हैं, न कि सरकार को उखाड़ फेंकने के, और उन्होंने हिंसा की कड़ी निंदा की।
- उग्रवादियों के कट्टर विरोधी उदारवादी नेता फिरोजशाह मेहता के निधन से आपसी तनाव कम हुआ और मिलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
लखनऊ समझौता : कांग्रेस और मुस्लिम लीग
- लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग एक मंच पर आए ताकि ब्रिटिश सरकार के समक्ष साझा मांगें प्रस्तुत की जा सकें।
- मुस्लिम लीग के दृष्टिकोण में परिवर्तन के कारण:
- बाल्कन युद्ध और इटली-तुर्की युद्ध के दौरान ब्रिटेन द्वारा तुर्की (खलीफा) का समर्थन न करना।
- बंगाल विभाजन का रद्दीकरण (1911): इससे मुस्लिम लीग के कुछ समर्थक वर्ग ब्रिटिश सरकार से नाराज हो गए थे।
- सरकार द्वारा अलीगढ़ विश्वविद्यालय को अखिल भारतीय स्तर पर संबद्धता की शक्ति देने से इनकार करना।
- लीग के युवा सदस्यों ने अधिक मुखर राष्ट्रवादी राजनीति अपनाई, जिनका लक्ष्य स्वशासन प्राप्त करना था।
- प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा मुस्लिम नेताओं (मौलाना आजाद, अली बंधु, हसरत मोहानी) की गिरफ्तारी और उनके प्रकाशनों पर प्रतिबंध से साम्राज्यवाद विरोधी भावनाएं प्रबल हुईं।
लखनऊ समझौते की प्रकृति
- मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के साथ साझा संवैधानिक माँगों पर सहमति व्यक्त की।
- कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की ‘पृथक निर्वाचन मंडल’ (Separate Electorates) की माँग को स्वीकार कर लिया (यह व्यवस्था तब तक के लिए थी जब तक समुदाय स्वयं संयुक्त निर्वाचन का विकल्प न चुन लें)।
- मुसलमानों को केन्द्रीय और प्रांतीय स्तर पर विधायिकाओं में निर्धारित (फिक्स्ड) अनुपात में सीटें प्रदान की गईं।
- सरकार के समक्ष साझा माँगें:
- भारतीयों को जल्दी से जल्दी स्वशासन देने की घोषणा।
- प्रतिनिधि सभाओं का विस्तार हो, जिनमें निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हो और उनके पास अधिक शक्तियाँ हों।
- विधान परिषद की अवधि 5 वर्ष निर्धारित।
- भारत सचिव का वेतन भारतीय कोष के बजाय ब्रिटिश राजकोष से दिया जाए।
- वायसराय और प्रांतों की कार्यकारी परिषदों के आधे सदस्य भारतीय हों।
- समझौते पर आलोचनात्मक टिप्पणी
- कार्यपालिका का केवल आधा हिस्सा ही निर्वाचित होना था और विधायिका उन्हें हटा नहीं सकती थी, जिससे संवैधानिक गतिरोध की संभावना बनी रही।
- यह समझौता अनिवार्य रूप से मार्ले-मिंटो सुधारों का ही एक विस्तृत रूप था।
- पृथक निर्वाचन मंडल को स्वीकार करने का अर्थ यह था कि कांग्रेस और लीग दो अलग-अलग राजनीतिक इकाइयाँ हैं। इसने भविष्य के ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-nation theory) की प्रारंभिक नींव रख दी।
- नेताओं के बीच एकता थी, लेकिन दोनों समुदायों की जनता पूरी तरह एकीकृत नहीं हुई थी।
- कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचन की स्वीकृति का उद्देश्य बहुसंख्यक वर्चस्व के प्रति अल्पसंख्यकों के डर को कम करना था।
- इस पुनर्मिलन और एकता ने जनता में भारी उत्साह पैदा किया।
- इसी बढ़ते दबाव के कारण सरकार को भविष्य में स्वशासन देने का वादा करना पड़ा (जिसे अगस्त 1917 की मॉन्टेग्यू घोषणा के रूप में जाना जाता है)।
मोंटेग्यू का वक्तव्य – अगस्त 1917 (अगस्त घोषणा)
- घोषणाकर्ता: भारत सचिव एडविन सैमुअल मॉन्टेग्यू।
- घोषणा के मुख्य बिंदु:
- प्रशासन की प्रत्येक शाखा में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने की नीति।
- स्वशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास।
- ब्रिटिश साम्राज्य के अभिन्न अंग के रूप में भारत में उत्तरदायी सरकार की क्रमिक स्थापना।
- महत्व:
- अब स्वशासन या ‘होम रूल’ की राष्ट्रवादी मांग ‘राजद्रोही’ (Seditious) नहीं रही।
- “उत्तरदायी सरकार” का अर्थ था कि शासक अब केवल लंदन के प्रति नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति भी जवाबदेह होंगे।
- ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य भारतीय बहुमत वाली विधायिकाओं को पूर्ण शक्ति देना नहीं था।
- कार्यपालिका को निर्वाचित सभाओं के प्रति कुछ हद तक उत्तरदायी बनाने के लिए द्वैध शासन (Dyarchy) की अवधारणा पेश की गई।
- मॉन्टेग्यू घोषणा पर भारतीय आपत्तियाँ
- स्वशासन को लागू करने के लिए किसी निश्चित समय सीमा का उल्लेख नहीं किया गया था।
- पूर्णतः सरकार नियंत्रित: भारत के विकास की प्रकृति और गति का निर्णय केवल ब्रिटिश सरकार को करना था, जिससे भारतीय असंतुष्ट थे।
- आक्रामक राजनीति: तिलक और एनी बेसेंट द्वारा शुरू की गई ‘होम रूल’ की राजनीति (जो आयरलैंड से प्रेरित थी) ने भारतीयों में नई चेतना भर दी थी।
- नेतृत्व की तत्परता: तिलक और बेसेंट इस आंदोलन को आगे ले जाने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए पूरी तरह तैयार थे।
मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार और भारत सरकार अधिनियम, 1919
- संदर्भ
- अंग्रेजों ने “गाजर और छड़ी” (कैरट एंड स्टिक) की नीति अपनाई:
- गाजर: मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (संवैधानिक सुधार)।
- छड़ी: रॉलेट एक्ट (कठोर दमनकारी कानून)।
- इन सुधारों की घोषणा जुलाई 1918 में की गई और इन्हें भारत शासन अधिनियम, 1919 के रूप में लागू किया गया।
- प्रमुख विशेषताएँ
- प्रांतीय सरकार – द्वैध शासन की शुरुआत
- द्वैध शासन: दो का शासन – कार्यकारी पार्षद (अधिकारी) और लोकप्रिय मंत्री (चुने हुए)।
- गवर्नर: प्रांत का कार्यकारी प्रमुख।
- विषयों का विभाजन:
- आरक्षित विषय: कानून और व्यवस्था, वित्त, भूमि राजस्व, सिंचाई → गवर्नर और अधिकारियों द्वारा नियंत्रित (ये विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थे)।
- हस्तांतरित विषय: शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय शासन, उद्योग, कृषि, उत्पाद शुल्क → निर्वाचित विधान परिषदों से चयनित मंत्रियों द्वारा नियंत्रित।
- कांग्रेस की प्रतिक्रिया
- अगस्त 1918 में विशेष अधिवेशन, बॉम्बे (अध्यक्ष: हसन इमाम):
- कांग्रेस ने इन सुधारों को “निराशाजनक” और “असंतोषजनक” घोषित किया।
- प्रभावी स्वशासन की मांग को दोहराया गया।
- बाल गंगाधर तिलक: “यह अनुपयुक्त और निराशाजनक है – एक बिना सूर्य की भोर (A sunless dawn)।”
- एनी बेसेंट: “यह इंग्लैंड के लिए देने और भारत के लिए स्वीकार करने के अयोग्य है।”
महात्मा गांधी : प्रारंभिक जीवन, दक्षिण अफ्रीका में कार्य और प्रयोग
- महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर (गुजरात) में हुआ।
- उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर रियासत के दीवान (प्रधान मंत्री/मुख्य प्रशासक) थे।
- गांधीजी ने इंग्लैंड से विधि (कानून) की शिक्षा प्राप्त की।
- वर्ष 1893 में वे एक भारतीय व्यापारी दादा अब्दुल्ला के कानूनी मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए।
- दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने भारतीयों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव और अपमानजनक व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से देखा।
- इसी अनुभव ने उन्हें वहाँ रुककर भारतीयों के नागरिक अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया।
- गांधीजी 1893 से 1914 तक दक्षिण अफ्रीका में रहे और इसके बाद भारत लौटे।
- दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति
- दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय को मुख्यतः तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है –
- गिरमिटिया/बंधुआ मजदूर: मुख्य रूप से दक्षिण भारत से, गन्ना बागानों में काम करते थे।
- व्यापारी: ज्यादातर मेमन मुसलमान जो मजदूरों के पीछे-पीछे आए थे।
- पूर्व-गिरमिटिया/पूर्व-बंधुआ प्रवासी: अनुबंध समाप्त होने के बाद परिवारों के साथ रहते थे।
- ज्यादातर अनपढ़, अंग्रेजी का बहुत कम या बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था।
- नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा, रहने पर प्रतिबंध था, वोट देने का अधिकार नहीं था।
- प्रतिबंधों में कर्फ्यू, सार्वजनिक फुटपाथों तक पहुंच का अभाव और रहने की खराब स्थितियाँ शामिल थी।
संघर्ष का उदारवादी चरण (1894–1906)
- इस चरण में गांधीजी ने संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण उपायों को अपनाया।
- उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी और ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष याचिकाएँ, प्रार्थना-पत्र (Memorials) प्रस्तुत किए।
- उनका विश्वास था कि चूँकि भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक हैं, इसलिए सरकार उनकी शिकायतों का निवारण करेगी।
- वर्ष 1894 में उन्होंने भारतीयों को संगठित करने हेतु नेटाल इंडियन कॉन्ग्रेस की स्थापना की।
- भारतीय जनमत को जागरूक करने के लिए उन्होंने समाचार-पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ का प्रकाशन प्रारंभ किया।
निष्क्रिय प्रतिरोध / सत्याग्रह का चरण (1906–1914)
- इस चरण की विशेषता निष्क्रिय प्रतिरोध और सविनय अवज्ञा थी, जिसे गांधीजी ने सत्याग्रह का नाम दिया।
- पंजीकरण प्रमाणपत्रों के विरुद्ध आंदोलन (1906)
- कानून के अनुसार भारतीयों को उँगलियों के निशान सहित पंजीकरण प्रमाणपत्र साथ रखना अनिवार्य था।
- गांधीजी ने निष्क्रिय प्रतिरोध संघ (पैसिव रेसिस्टेंस एसोसिएशन) का गठन किया।
- भारतीयों ने कानून की अवज्ञा की और जेल गए; बाद में सार्वजनिक रूप से इन प्रमाणपत्रों की होली जलाई गई।
- भारतीय प्रवासन पर प्रतिबंधों के विरुद्ध अभियान
- भारतीयों ने बिना लाइसेंस के एक प्रांत से दूसरे प्रांत में जाकर कानून की अवहेलना की।
- बड़ी संख्या में सत्याग्रहियों को जेल भेजा गया।
- ‘पोल टैक्स’ और विवाहों की अमान्यता के विरुद्ध अभियान
- पोल टैक्स (जनगणना शुल्क): पूर्व बंधुआ भारतीयों पर 3 पाउंड का कर लगाया गया।
- सुप्रीम कोर्ट ने गैर-ईसाई विवाहों को अमान्य घोषित किया, जिससे हिंदू, मुस्लिम और पारसी समुदायों में रोष फैला।
- अपमानजनक व्यवहार के कारण महिलाएँ भी आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुईं।
- ट्रांसवाल इमिग्रेशन एक्ट के विरुद्ध आंदोलन
- भारतीयों ने नेटाल से ट्रांसवाल में अवैध रूप से प्रवेश किया; अनेक लोगों को जेल हुई।
- भारत से समर्थन मिला – गोपालकृष्ण गोखले ने देशव्यापी दौरा किया; वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने दमनकारी नीतियों की कड़ी निंदा की।
- इन आंदोलनों के फलस्वरूप एक निष्पक्ष जाँच समिति का गठन हुआ और वार्ताओं का दौर शुरू हुआ, जिससे अंततः भारतीयों की कई मांगों को मान लिया गया।
टॉलस्टॉय फार्म (1910–1913)
- गांधीजी और हरमन कैलनबैक द्वारा स्थापित; लियो टॉल्स्टॉय के विचारों से प्रेरित।
- उद्देश्य: सत्याग्रही परिवारों को आश्रय, संघर्ष को बनाए रखना, तथा शिक्षा और सरल जीवन के प्रयोग करना।
- इससे पूर्व फीनिक्स फ़ार्म (1904) की स्थापना हुई थी, जो जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’ से प्रेरित था।
- गतिविधियाँ: श्रमदान, व्यावसायिक प्रशिक्षण, सह-शिक्षा, खाना बनाना, बढ़ईगीरी, संदेशवाहक का कार्य।
- सत्याग्रह की गांधीवादी तकनीक
- आधार: सत्य और अहिंसा।
- प्रभाव: भारतीय परंपरा, ईसाई शिक्षाएँ, टॉल्स्टॉय।
- मुख्य सिद्धांत:
- अन्याय के आगे कभी न झुकना; सत्यनिष्ठ, निर्भीक और अहिंसक रहना।
- असहयोग और बहिष्कार का प्रयोग।
- उपाय: करों का भुगतान न करना, सरकारी उपाधियों और पदों का त्याग करना।
- सत्य के प्रति प्रेम के कारण स्वेच्छा से कष्टों और यातनाओं को स्वीकार करना।
- बुराई करने वाले (अन्यायी) के प्रति मन में कोई घृणा या नफरत न रखना।
- बुराई के आगे कभी सिर न झुकाना; उद्देश्य साधनों को उचित नहीं ठहराते।
- केवल साहसी और दृढ़ (त्मिक रूप से मजबूत) व्यक्ति ही सत्याग्रह कर सकते हैं; कायरता, हिंसा से भी अधिक बुरी है।
भारत में गांधी (1915 के बाद)
- दक्षिण अफ्रीका से जनवरी 1915 में भारत लौटे।
- गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर ब्रिटिश भारत के विभिन्न भागों का भ्रमण किया, ताकि देश की वास्तविक परिस्थितियों को प्रत्यक्ष रूप से समझ सकें।
- भारत में उनकी प्रथम प्रमुख सार्वजनिक उपस्थिति बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में हुई।
- भारत आगमन के बाद प्रथम एक वर्ष तक उनकी राजनीतिक नीति यह रही कि वे किसी भी राजनीतिक संगठन में सक्रिय भागीदारी नहीं करेंगे और कोई पद स्वीकार नहीं करेंगे।
- गांधीजी जॉन रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’, हेनरी डेविड थोरो की ‘ऑन सिविल डिसओबिडियंस’ तथा लियो टॉल्स्टॉय की ‘द किंगडम ऑफ गॉड इज़ विदिन यू’ से गहराई से प्रभावित थे।
- गांधीजी की ‘सर्वोदय’ की अवधारणा रस्किन के विचारों से प्रेरित थी।
- जोहान्सबर्ग से डरबन की रेल यात्रा के दौरान गांधीजी के मित्र पोलक ने उन्हें रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’ दी।
- गांधीजी ने इस पुस्तक का गुजराती भाषा में अनुवाद किया और उसका नाम ‘सर्वोदय’ रखा।
- गांधीजी के अनुसार चरखा भारतीयता और जन-आकांक्षाओं का प्रतीक है।
- यह असहायों/निर्बलों को आजीविका प्रदान कर आत्मसम्मान और गौरव की भावना को सुदृढ़ करता है।
- चरखा आत्मविश्वास, आत्मसंयम और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाता है।
- चरखा एक शांत किंतु निश्चित क्रांति लाने वाला साधन है।
- यह व्यावसायिक युद्ध का नहीं, बल्कि व्यावसायिक शांति का प्रतीक है।
- रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को “भिखारी के वेश में एक महान आत्मा” कहा।
- सबसे पहले रवींद्रनाथ टैगोर ने ही गांधीजी को “महात्मा” की संज्ञा दी।
हिंद स्वराज (1909) में राजनीतिक दर्शन
- आदर्श राज्य (रामराज्य) की अवधारणा:
- राज्यविहीन, नैतिक और आत्मनियंत्रित समाज।
- सेना, पुलिस और प्रतिनिधि सरकार का अभाव।पूंजीवाद, साम्यवाद, शोषण और धार्मिक हिंसा का निषेध।
- गांधीजी ने समर्थन किया –
- स्वावलंबी और विकेंद्रीकृत ग्राम गणराज्यों का।
- राज्य की न्यूनतम भूमिका का – “सर्वश्रेष्ठ सरकार वह है जो सबसे कम शासन करे।
- ”इसी कारण उन्हें एक दार्शनिक अराजकतावादी (Philosophical Anarchist) माना जाता है।
- उनका मत था कि लोकतंत्र तभी संभव है जब समाज में उच्च नैतिकता हो।उन्होंने अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों पर अधिक बल दिया।
- शिक्षावर्धा योजना / बुनियादी शिक्षा योजना (नई तालीम), 1937
- पृष्ठभूमि
- अक्टूबर 1937 में कांग्रेस ने वर्धा में अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन आयोजित किया।
- सम्मेलन के प्रस्तावों के आधार पर डॉ. ज़ाकिर हुसैन समिति ने एक राष्ट्रीय शिक्षा योजना तैयार की।
- यह योजना नई तालीम (बुनियादी शिक्षा) के नाम से जानी गई।
- यह गांधीजी के हरिजन में प्रकाशित शैक्षिक विचारों से प्रेरित थी।
- नई तालीम के मुख्य प्रावधान
- पाठ्यक्रम में किसी एक मौलिक/मूलभूत हस्तकला को अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना।
- प्रथम सात वर्ष की शिक्षा –
- निःशुल्क एवं अनिवार्य,
- राष्ट्रीय स्तर पर लागू,
- मातृभाषा के माध्यम से प्रदान की जाए।
- शिक्षा का माध्यम
- मातृभाषा।
- जहाँ हिंदी मातृभाषा न हो, वहाँ हिंदी का शिक्षण।
- उत्पादक श्रम के माध्यम से शिक्षा, जैसे –
- कताई और बुनाई,
- बढ़ईगिरी
- कृषि
- मिट्टी के बर्तन बनाना
- चमड़े का काम
- गृह विज्ञान (लड़कियों के लिए)।
- सेवा कार्यों के माध्यम से समुदाय से संपर्क विकसित करना।
- पाठ्य-विषयगणित,सामान्य विज्ञान,सामाजिक अध्ययन,चित्रकला,संगीत,शारीरिक शिक्षा।
- धार्मिक या नैतिक शिक्षा को औपचारिक पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया।अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति तथा अंग्रेज़ी माध्यम को अस्वीकार किया गया।
चंपारण सत्याग्रह (1917) – भारत में पहला सविनय अवज्ञा आंदोलन
- राजकुमार शुक्ला ने गांधीजी से बिहार के चंपारण में नील बागान मालिकों के शोषण का मुद्दा उठाने का अनुरोध किया।
- तिनकठिया प्रणाली: किसानों को 3/20 ज़मीन पर नील उगाने के लिए मजबूर किया जाता था।
- सिंथेटिक/कृत्रिम रंगों से नील की मांग कम हो गई; बागान मालिकों ने ज़्यादा किराया और अवैध शुल्क की मांग की।
- किसानों को यूरोपियों द्वारा तय कीमतों पर बेचने के लिए मजबूर किया गया।
- गांधीजी, राजेंद्र प्रसाद, मज़हर-उल-हक, महादेव देसाई, नरहरि पारेख और जे.बी. कृपलानी के साथ जांच करने पहुंचे।
- गांधीजी ने सविनय अवज्ञा का पालन किया।
- सरकार ने एक समिति बनाई जिसमें गांधीजी भी शामिल थे; तिनकठिया प्रणाली खत्म कर दी गई।
- किसानों को अवैध शुल्कों के लिए आंशिक मुआवजा (25%) दिया गया।

- परिणाम: भारत में पहला सफल सविनय अवज्ञा आंदोलन; नील बागान मालिकों ने एक दशक के भीतर इलाका छोड़ दिया।
- अन्य नेता: ब्रज किशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, रामनवमी प्रसाद, शंभू शरण वर्मा।
अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) – पहली भूख हड़ताल
- प्लेग बोनस समाप्त किए जाने और युद्धकालीन महँगाई को लेकर मिल मालिकों तथा श्रमिकों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।
- श्रमिकों ने मजदूरी में 50% वृद्धि की माँग की, जबकि मिल मालिक केवल 20% वृद्धि देने को तैयार थे।
- अनुसूया साराभाई ने इस विवाद में हस्तक्षेप हेतु गांधीजी से अनुरोध किया।
- गांधीजी ने श्रमिकों के समर्थन में अपना पहला आमरण अनशन प्रारंभ किया।
- विवाद का निपटारा एक न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) द्वारा किया गया।
- अंततः श्रमिकों को 35% वेतन वृद्धि प्राप्त हुई।
- बाद में अनुसूया साराभाई ने अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (1920) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
खेड़ा सत्याग्रह (1918) – पहला असहयोग आंदोलन
- सूखे के कारण फसल नष्ट हो गई, अतः किसानों ने राजस्व संहिता के प्रावधानों के अनुसार लगान माफी की माँग की।
- सरकार ने लगान माफी से इंकार कर दिया और किसानों की संपत्ति कुर्क करने की धमकी दी।
- गांधीजी ने किसानों को लगान न देने की सलाह दी।
- इस आंदोलन का नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल, नरहरि पारेख, मोहनलाल पंड्या और रविशंकर व्यास ने किया।
- सरकार ने किसानों की संपत्ति कुर्क की, किंतु किसान आंदोलन से विचलित नहीं हुए।
- परिणामस्वरूप सरकार ने –
- चालू तथा अगले वर्ष के लिए लगान वसूली स्थगित की,
- लगान की बढ़ी हुई दरों में कमी की,
- और कुर्क की गई संपत्ति वापस की।
- परिणाम: इस आंदोलन से किसानों में राजनीतिक चेतना का प्रसार हुआ और यह बोध उत्पन्न हुआ कि शोषण से मुक्ति केवल राष्ट्रीय स्वतंत्रता के माध्यम से ही संभव है।
रॉलेट एक्ट, सत्याग्रह, और जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919)
रॉलेट एक्ट
- रॉलेट एक्ट मार्च 1919 में प्रस्तुत किया गया, अर्थात् मोंटेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधारों से लगभग छह माह पूर्व।
- इसका आधिकारिक नाम अराजकतावादी एवं क्रांतिकारी अपराध अधिनियम था, जिसे सामान्यतः रॉलेट एक्ट कहा गया।
- यह अधिनियम सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाले रॉलेट आयोग की सिफारिशों पर आधारित था, जिसका उद्देश्य तथाकथित “राजद्रोही षड्यंत्रों” पर अंकुश लगाना था।
- इस अधिनियम के अंतर्गत सरकार को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हुए –
- राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर बिना जूरी के मुकदमा चलाया जा सकता था।
- किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमे के दो वर्ष तक कारावास में रखा जा सकता था।
- सिर्फ संदेह के आधार पर बिना वारंट गिरफ्तारी की जा सकती थी।
- गुप्त रूप से मुकदमे चलाए जा सकते थे, कानूनी सहायता का अधिकार नहीं था तथा साक्ष्य संबंधी नियमों में ढील दी गई।
- बंदी प्रत्यक्षीकरण निलंबित, भाषण और सभा की स्वतंत्रता प्रतिबंधित।
- इस कानून का उद्देश्य युद्धकालीन भारत रक्षा अधिनियम, 1915 के स्थान पर एक स्थायी दमनकारी कानून स्थापित करना था।
- प्रेस पर कड़ा नियंत्रण लगाया गया और सरकार को क्रांतिकारी गतिविधियों के दमन के व्यापक अधिकार दिए गए।
- इसके विरोध में भारतीय विधायिका के निर्वाचित सदस्यों – मुहम्मद अली जिन्ना, मदन मोहन मालवीय और मज़हर-उल-हक़ – ने अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया।
रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह
- गांधीजी ने रॉलेट एक्ट को “काला कानून” कहा और तर्क दिया कि किसी पूरे समाज को सामूहिक दंड देना अन्यायपूर्ण है।
- उन्होंने इसके विरोध में अखिल भारतीय स्तर पर जनआंदोलन संगठित किया।
- देशव्यापी हड़ताल (हर्ताल),
- उपवास और प्रार्थना,
- सविनय अवज्ञा तथा स्वेच्छा से गिरफ्तारी देना।
- इस आंदोलन में होमरूल लीगों के युवा सदस्य और पैन-इस्लामवादी भी सक्रिय रूप से सम्मिलित हुए।
- पंजाब में स्थिति सर्वाधिक विस्फोटक हो गई, क्योंकि वहाँ युद्धकालीन दमन, जबरन भर्ती और महामारी से जनता पहले से ही त्रस्त थी; परिणामस्वरूप सरकार को सेना बुलानी पड़ी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)
- सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी ने पंजाब में व्यापक असंतोष को जन्म दिया।
- ब्रिगेडियर जनरल रेगिनाल्ड डायर ने मार्शल लॉ लागू किया और 13 अप्रैल (बैसाखी के दिन) को निषेधाज्ञा जारी की।
- राष्ट्रीय प्रतिक्रिया
- रवीन्द्रनाथ टैगोर ने विरोधस्वरूप अपनी नाइटहुड की उपाधि त्याग दी।
- गांधीजी ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि लौटा दी और 18 अप्रैल 1919 को सत्याग्रह स्थगित कर दिया।
- इतिहासकार ए. पी. जे. टेलर के अनुसार यह हत्याकांड “वह निर्णायक क्षण था जिसने भारतीयों को ब्रिटिश शासन से पूर्णतः विमुख कर दिया।”
- परिणाम
- उधम सिंह (राम मोहम्मद सिंह आज़ाद) ने 1940 में माइकल ओ’डायर की हत्या की।
- घटनाओं की जाँच के लिए हंटर जाँच समिति (1919–1920) गठित की गई; उस समय भारत सचिव एडविन मोंटेग्यू थे।
- 14 अक्टूबर 1919 को गठित डिसऑर्डर्स इन्क्वायरी कमेटी को अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर के नाम पर हंटर समिति कहा गया।
- संरचना
- तीन भारतीय सदस्य –
- सर चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड
- पंडित जगत नारायण
- सरदार साहिबज़ादा सुल्तान अहमद ख़ान
- तीन भारतीय सदस्य –
- परिणाम
- डायर के विरुद्ध कोई दंडात्मक या कानूनी कार्रवाई नहीं हुई; उसके कृत्य को उच्च अधिकारियों ने अनुमोदित किया।
- सरकार ने अधिकारियों को संरक्षण देने के लिए इंडेम्निटी एक्ट पारित किया, जिसे मोतीलाल नेहरू ने “व्हाइट-वॉशिंग बिल” कहा।
- ब्रिटेन में प्रतिक्रिया
- हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने डायर का समर्थन किया।
- मॉर्निंग पोस्ट ने डायर के लिए 26,000 पाउंड का चंदा एकत्र किया; रुडयार्ड किपलिंग भी दाताओं में शामिल थे।
- कुछ सिख धार्मिक नेताओं ने, अरुर सिंह के नेतृत्व में, डायर को सम्मानित किया; इससे आगे चलकर गुरुद्वारा सुधार आंदोलन को बल मिला।
- कांग्रेस का दृष्टिकोण
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक गैर-सरकारी जाँच समिति गठित की, जिसमें मोतीलाल नेहरू, सी. आर. दास, अब्बास तैयबजी, एम. आर. जयकर और गांधीजी शामिल थे।
असहयोग आंदोलन और खिलाफ़त
- पृष्ठभूमि
- प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था – मूल्यों में तीव्र वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, करों तथा लगानों में बढ़ोतरी।
- राजनीतिक असंतोष का कारण रॉलेट एक्ट, पंजाब में मार्शल लॉ तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड थे।
- हंटर समिति को भारतीयों ने एक “व्हाइटवॉश” माना, जबकि ब्रिटिश जनमत ने डायर को आर्थिक सहायता देकर उसका समर्थन किया।
- मोंटेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधारों में द्वैध शासन की व्यवस्था भारतीय आकांक्षाओं को संतुष्ट करने में विफल रही।
- लखनऊ समझौते (1916) और रॉलेट विरोधी आंदोलन ने हिंदू–मुस्लिम एकता को प्रोत्साहित किया।
- उग्र राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं – मुहम्मद अली, अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल ख़ान, हसन इमाम – का उदय हुआ, जिन्होंने मुस्लिम लीग के रूढ़िवादी नेतृत्व का विरोध किया।
- खिलाफत मुद्दा
- प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उस्मानी सुल्तान (ख़लीफ़ा) को पदच्युत कर दिया गया और तुर्की का विघटन कर दिया गया।
- भारतीय मुसलमानों की प्रमुख माँगें थीं –
- ख़लीफ़ा का पवित्र स्थलों पर नियंत्रण बना रहे।
- ख़लीफ़ा के पास पर्याप्त क्षेत्र बना रहे।
- 1919 में अली बंधुओं, मौलाना आज़ाद, अजमल ख़ान और हसरत मोहानी के नेतृत्व में ख़िलाफ़त समिति का गठन हुआ।
- प्रारंभिक तरीक़े – सभाएँ, प्रार्थनापत्र, प्रतिनिधिमंडल।
- नवंबर 1919 तक ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव रखा गया और चेतावनी दी गई कि यदि तुर्की के साथ शांति की शर्तें प्रतिकूल रहीं तो असहयोग किया जाएगा।
- अखिल भारतीय ख़िलाफ़त समिति के अध्यक्ष के रूप में गांधीजी ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-आधारित असहयोग आंदोलन शुरू करने का अवसर माना।
- कांग्रेस का रुख
- ख़िलाफ़त आंदोलन की सफलता के लिए कांग्रेस का समर्थन आवश्यक था।
- प्रारंभ में तिलक का विरोध था – वे धार्मिक प्रश्न पर गठबंधन के विरुद्ध थे और सत्याग्रह की व्यवहार्यता को लेकर सशंकित थे।
- गांधीजी ने कांग्रेस को असहयोग के समर्थन के लिए इस आधार पर राज़ी किया कि –
- यह हिंदू–मुस्लिम एकता को सुदृढ़ करने का अवसर था।
- किसानों, मज़दूरों, महिलाओं, छात्रों और कारीगरों को राष्ट्रीय आंदोलन में व्यापक रूप से जोड़ने की संभावना थी।
- पंजाब की घटनाओं के बाद संवैधानिक तरीकों से व्यापक निराशा फैल चुकी थी।

असहयोग आंदोलन के प्रारंभिक कदम
- गांधीजी ने घोषणा की कि यदि तुर्की के साथ शांति की शर्तें प्रतिकूल रहीं तो वे असहयोग आंदोलन का नेतृत्व करेंगे।
- मई 1920 में सेब्रे की संधि (Treaty of Sevres) द्वारा तुर्की का विघटन कर दिया गया।
- जून 1920 में आयोजित सर्वदलीय इलाहाबाद सम्मेलन ने विद्यालयों, महाविद्यालयों और न्यायालयों के बहिष्कार को स्वीकृति दी तथा गांधीजी से आंदोलन का नेतृत्व करने का आग्रह किया।
- असहयोग कार्यक्रम
- 31 अगस्त 1920 को ख़िलाफ़त समिति ने औपचारिक रूप से असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया; इससे पहले 1 अगस्त 1920 को तिलक का निधन हो चुका था।
- सितंबर 1920 में कलकत्ता कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ, जिसमें असहयोग कार्यक्रम को स्वीकृति दी गई –
- सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों का बहिष्कार।
- न्यायालयों का बहिष्कार तथा पंचायतों के माध्यम से न्याय की व्यवस्था।
- विधान परिषदों का बहिष्कार।
- विदेशी कपड़ों का बहिष्कार तथा खादी और हाथ से कातने (चरखा) को प्रोत्साहन।
- सरकारी उपाधियों और सम्मानों का त्याग।
- आगे के चरणों में – व्यापक जन-आधारित सविनय अवज्ञा, सरकारी सेवाओं से त्यागपत्र, करों के भुगतान से इंकार।
- कार्यक्रम में हिंदू–मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता-निवारण तथा अहिंसा पर विशेष ज़ोर दिया गया।
- बिपिन चंद्र पाल महात्मा गांधी द्वारा आरंभ किए गए असहयोग आंदोलन के विरोधी थे।
- मुहम्मद अली जिन्ना ने 1920 के नागपुर अधिवेशन में गांधीजी के असहयोग प्रस्ताव के विरोध में कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया।
दिसंबर 1920, नागपुर कांग्रेस अधिवेशन
- असहयोग कार्यक्रम को स्वीकृति दी गई।
- इस अधिवेशन में कांग्रेस के लक्ष्य में मूलभूत परिवर्तन हुआ – अब संवैधानिक तरीकों के स्थान पर शांतिपूर्ण, संविधानेत्तर संघर्ष के माध्यम से स्वराज को उद्देश्य बनाया गया।
- संगठनात्मक सुधार किए गए –
- 15 सदस्यों की कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) का गठन किया गया।
- प्रांतीय कांग्रेस समितियों का पुनर्गठन भाषायी आधार पर किया गया।
- वार्ड समितियाँ बनाई गईं तथा कांग्रेस की सदस्यता शुल्क घटाया गया।
- गांधीजी ने घोषणा की कि यदि कार्यक्रम का पूर्ण पालन किया जाए तो एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त किया जा सकता है।
- बंगाल सहित विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारी समूहों ने आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की।
- जिन्ना, एनी बेसेंट और बी.सी. पाल जैसे कुछ नेता संवैधानिक संघर्ष के पक्षधर होने के कारण कांग्रेस से अलग हो गए।
आंदोलन का प्रसार
- गांधीजी ने अली बंधुओं के साथ पूरे देश का भ्रमण किया।
- छात्रों ने सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों का बहिष्कार कर राष्ट्रीय शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लिया – जामिया मिलिया इस्लामिया, काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ और बिहार विद्यापीठ।
- आचार्य नरेंद्र देव, राजेंद्र प्रसाद, ज़ाकिर हुसैन और सुभाष चंद्र बोस ने इन राष्ट्रीय संस्थानों में शिक्षण कार्य किया।

- शिक्षा के क्षेत्र में प्रमुख नेतृत्व आचार्य नरेंद्र देव, सी.आर. दास, लाला लाजपत राय, ज़ाकिर हुसैन और सुभाष चंद्र बोस ने किया।
- अनेक प्रतिष्ठित वकीलों – मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सी.आर. दास, वल्लभभाई पटेल आदि – ने अपनी वकालत छोड़ दी।
- विदेशी कपड़े और शराब का व्यापक बहिष्कार हुआ; सार्वजनिक रूप से ढेर लगाकर जलाया गया, जिससे आयात लगभग आधा रह गया।
- तिलक स्वराज कोष के लिए लगभग एक करोड़ रुपये एकत्र किए गए।
- कांग्रेस स्वयंसेवक दल कई स्थानों पर समानांतर पुलिस व्यवस्था के रूप में कार्य करने लगा।
- जुलाई 1921 में अली बंधुओं ने मुसलमानों से सेना से त्यागपत्र देने का आह्वान किया, जिसके परिणामस्वरूप सितंबर 1921 में उनकी गिरफ्तारी हुई।
- मिदनापुर और गुंटूर में स्थानीय स्तर पर सविनय अवज्ञा और नो-टैक्स आंदोलनों का आयोजन हुआ।
- असम में चाय बागानों में हड़तालें तथा रेल और स्टीमर कर्मियों के आंदोलन हुए।
- गांधीजी ने व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन के आरंभ हेतु बारदोली को चुना था, किंतु चौरी-चौरा की घटना के कारण आंदोलन को वापस ले लिया गया।
- 1921 में वेल्स के राजकुमार की भारत यात्रा के दौरान देशभर में हड़तालें और प्रदर्शन हुए।
- स्थानीय संघर्ष: अवध किसान आंदोलन, एका आंदोलन (यूपी), मोपला विद्रोह (मालाबार), पंजाब में महंतों के खिलाफ सिख आंदोलन।
चौरी-चौरा घटना
- उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने पुलिस थाने पर हमला कर उसे आग के हवाले कर दिया। गांधीजी को लगा कि यह घटना अहिंसा के सिद्धांत का उल्लंघन है, इसलिए उन्होंने फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
- सुभाष चंद्र बोस ने इस निर्णय को “राष्ट्रीय आपदा” कहा।
- गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद (मार्च 1922)
- मार्च 1922 में गांधीजी की गिरफ्तारी हुई।
- उनकी गिरफ्तारी के बाद राष्ट्रवादी खेमे में बिखराव, अव्यवस्था और मनोबल में गिरावट आई।
- यह बहस शुरू हुई कि आंदोलन के निष्क्रिय चरण में आगे क्या रणनीति अपनाई जाए।
- दो गुटों का उदय: स्वराजवादी बनाम ‘अपरिवर्तनवादी’
- स्वराजवादी
- नेतृत्व: सी.आर. दास, मोतीलाल नेहरू, अजमल खान।
- विधान परिषदों के बहिष्कार को समाप्त करने के पक्ष में थे।
- उद्देश्य: परिषदों में प्रवेश कर उनकी कमजोरियों को उजागर करना और उन्हें राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाना।
- नारा: “एंड ऑर मेंड” (समाप्त करो या सुधारो)।
- मांगें न माने जाने पर परिषदों के कामकाज में अवरोध उत्पन्न करने की नीति।
- कांग्रेस–खिलाफत स्वराज्य पार्टी (स्वराजवादी पार्टी) का गठन किया।
- सी.आर. दास अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू सचिव बने।
- परिवर्तन-विरोधी/अपरिवर्तनवादी
- नेतृत्व: सी. राजगोपालाचारी, वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, एम.ए. अंसारी।
- विधान परिषदों में प्रवेश के विरोधी थे।
- रचनात्मक कार्यक्रम, बहिष्कार और असहयोग को जारी रखने के पक्षधर।
- भविष्य के सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारी पर बल दिया।
गया कांग्रेस अधिवेशन (दिसंबर 1922)
- स्वराजवादियों का प्रस्ताव पराजित हुआ।
- सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने क्रमशः अध्यक्षता और सचिव पद से त्यागपत्र दे दिया।
- इसके बाद उन्होंने औपचारिक रूप से स्वराजवादी पार्टी का गठन किया।
- स्वराजवादियों के तर्क
- विधान परिषदों में प्रवेश से असहयोग समाप्त नहीं होगा; आंदोलन अन्य रूप में जारी रहेगा।
- राजनीतिक शून्य की स्थिति में जनता का मनोबल बनाए रखा जा सकेगा।
- सरकार को परिषदों में अवांछनीय तत्वों को नियुक्त करने से रोका जा सकेगा।
- परिषदों का उपयोग केवल राजनीतिक संघर्ष के लिए होगा, क्रमिक सुधार के लिए नहीं।
- अपरिवर्तनवादियों के तर्क
- संसदीय कार्य से रचनात्मक कार्य की उपेक्षा होगी।
- क्रांतिकारी उत्साह के क्षीण होने का खतरा।
- राजनीतिक भ्रष्टाचार की संभावना।
- अगले सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए जनता को तैयार करने हेतु रचनात्मक कार्यक्रम अनिवार्य है।
स्वराजवादी चुनाव घोषणापत्र (अक्टूबर 1923)
- स्वराजवादियों ने घोषित किया कि ब्रिटिश शासन स्वार्थी हितों से संचालित है।
- कहा गया कि संवैधानिक सुधार केवल भारत के शोषण को जारी रखने का एक दिखावा हैं।
- स्वराजवादी विधान परिषदों में स्वशासन (स्वराज) की माँग करेंगे।
- यदि यह माँग अस्वीकार की गई, तो वे परिषदों के कार्य में निरंतर अवरोध उत्पन्न करेंगे।
गांधीजी का बदलता दृष्टिकोण
- फरवरी 1924 में स्वास्थ्य कारणों से गांधीजी को जेल से रिहा किया गया।
- इसके बाद वे स्वराजवादियों के साथ समन्वय और समझौते की दिशा में बढ़े।
- इसके कारण थे –
- विधान परिषदों में प्रवेश का सार्वजनिक विरोध अब अप्रभावी प्रतीत हो रहा था।
- 1923 के चुनावों में स्वराजवादियों ने 141 में से 42 निर्वाचित सीटें जीतीं; उनके अडिग और संघर्षशील आचरण से गांधीजी को विश्वास हुआ कि वे सरकार के सहयोगी नहीं बनेंगे।
- क्रांतिकारियों और स्वराजवादियों पर सरकारी दमन से गांधीजी आक्रोशित हुए और उनका झुकाव स्वराजवादियों के समर्थन की ओर हुआ।
- 1924 में समझौता हुआ कि स्वराजवादी कांग्रेस के अभिन्न अंग के रूप में परिषदों में कार्य करेंगे।
- बेलगाँव अधिवेशन (दिसंबर 1924), जिसकी अध्यक्षता गांधीजी ने की (एकमात्र अवसर), में इस व्यवस्था को स्वीकृति दी गई।
चुनावों में स्वराजवादी
- मध्य प्रांतों में बहुमत प्राप्त किया।
- केन्द्रीय विधान सभा, बंबई और बंगाल में सबसे बड़े एकल दल के रूप में उभरे।
- कुल मिलाकर पार्टी ने 234 सीटें जीतीं (केन्द्र में 42 और प्रांतों में 192)।
विधान परिषदों में स्वराजवादियों की गतिविधियाँ
- मोतीलाल नेहरू केन्द्रीय विधान सभा में विपक्ष के नेता बने।
- 1925 में विठ्ठलभाई पटेल केन्द्रीय विधान सभा के अध्यक्ष (स्पीकर) निर्वाचित हुए।
- 1928 में स्वराजवादियों ने पब्लिक सेफ्टी बिल को पराजित किया।
- स्थगन प्रस्तावों (Adjournment Motions) का प्रभावी उपयोग किया।
- सहयोगी दलों के साथ मिलकर कई बार सरकार को पराजित किया, जिनमें बजटीय अनुदानों पर मतदान भी शामिल था।
स्वराजवादियों का पतन
- सांप्रदायिक दंगों के कारण उनकी स्थिति कमजोर हुई।
- पार्टी के भीतर सांप्रदायिकता तथा रिस्पॉन्सिविस्ट (अनुक्रियाशील/प्रतिक्रियावादी) बनाम नॉन-रिस्पॉन्सिविस्ट (ग़ैर-अनुक्रियाशील/ग़ैर-प्रतिक्रियावादी) के आधार पर फूट पड़ गई।
- ब्रिटिश सरकार स्वराजवादियों को विभाजित करने में सफल रही (उग्र बनाम उदार, हिंदू बनाम मुस्लिम)।
- बंगाल में जमींदारों के विरुद्ध (अधिकांशतः मुस्लिम) किसानों का समर्थन न करने से मुस्लिम समर्थन में कमी आई।
- पार्टी के भीतर सांप्रदायिक हितों ने जगह बना ली।
- 1925 में सी.आर. दास का निधन पार्टी के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ और उसका प्रभाव क्षीण हो गया।
प्रतिक्रियावादी
- इनमें लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, एन.सी. केलकर शामिल थे।
- ये सरकार के साथ सहयोग करने और पद स्वीकार करने के पक्षधर थे।
- इनका उद्देश्य हिंदू हितों की रक्षा करना था।
- उनके इस नरम रुख के कारण पार्टी में दरारें आ गईं। जहाँ कुछ ने मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं पर ‘हिंदू-विरोधी’ होने का आरोप लगाया, वहीं मुस्लिम सांप्रदायिकों ने स्वराजवादियों को ‘मुस्लिम-विरोधी’ कहा।
विधान परिषदों से त्यागपत्र (मार्च 1926)
- मुख्य नेतृत्व ने पुनः ‘जन सविनय अवज्ञा’ में अपना विश्वास व्यक्त किया।
- मार्च 1926 में स्वराजवादियों ने विधान परिषदों (Legislatures) से अपना नाम वापस ले लिया।
- एक अन्य गुट ने 1926 के चुनावों में भाग लिया, परंतु उसका प्रदर्शन कमजोर रहा।
- उन्होंने केंद्र में 40 सीटें और मद्रास में कुछ सफलता पाई, लेकिन संयुक्त प्रांत (U.P.), मध्य प्रांत और पंजाब में उन्हें भारी हार का सामना करना पड़ा।
पार्टी का अंत
- 1930 में, लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन के आरंभ के बाद, स्वराजवादियों ने पूरी तरह से विधान परिषदों से हटने का निर्णय लिया।
स्वराजवादियों की सीमाएँ / कमजोरियाँ
- विधान परिषदों के भीतर संघर्ष और जन-आंदोलन के बीच समन्वय की कोई ठोस रणनीति नहीं थी।
- जनसमुदाय तक पहुँच के लिए वे मुख्यतः समाचार-पत्रों पर निर्भर रहे।
- परिषदों के भीतर उनके द्वारा अपनाई गई ‘अवरोधक नीतियों’ (Obstructionist tactics) की अपनी सीमाएँ थीं।
- अन्य समूहों के साथ गठबंधन वैचारिक मतभेदों के कारण अक्सर विफल रहा।
- पार्टी के कुछ सदस्य सरकारी पदों के लाभ और विशेषाधिकारों के प्रलोभन में आ गए।
- बंगाल में काश्तकार बनाम जमींदार मुद्दे पर किसानों का समर्थन न करना उन्हें भारी पड़ा तथा उनका जनाधार कमजोर हुआ।
अपरिवर्तनवादियों द्वारा रचनात्मक कार्य
- आश्रम स्थापित किए गए, जहाँ युवा स्त्री-पुरुषों ने विशेष रूप से खेड़ा और बारदोली (गुजरात) में आदिवासियों और निचली जातियों के बीच कार्य किया।
- चरखा और खादी को लोकप्रिय बनाया गया।
- राष्ट्रीय विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित किए गए, ताकि छात्रों को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त वैचारिक ढाँचे में शिक्षा दी जा सके।
- महत्वपूर्ण कार्य किए गए –
- हिंदू–मुस्लिम एकता के लिए,
- अस्पृश्यता-निवारण के लिए,
- विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के लिए,
- शराबबंदी/शराब बहिष्कार के लिए,
- बाढ़ राहत जैसे सामाजिक कार्यों में।
- ये रचनात्मक कार्यकर्ता आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन की रीढ़ बने और संगठनकर्ता के रूप में निर्णायक भूमिका निभाई।
रचनात्मक कार्यक्रम की आलोचना
- राष्ट्रीय शिक्षा का लाभ मुख्यतः शहरी निम्न-मध्यवर्ग और समृद्ध कृषकों तक ही सीमित रहा।
- राष्ट्रीय शिक्षा में रुचि प्रायः केवल आंदोलन के सक्रिय चरणों के दौरान दिखाई दी।
- आंदोलन के निष्क्रिय दौर में छात्र पुनः सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में लौट गए, क्योंकि डिग्री और रोजगार की आवश्यकता बनी रही।
- खादी के प्रचार में कठिनाई आई, क्योंकि खादी विदेशी आयातित वस्त्रों की तुलना में महँगी थी।
- अस्पृश्यता-निवारण अभियानों में मुख्य रूप से सामाजिक पक्ष पर ध्यान दिया गया, जबकि भूमिहीन श्रमिकों (जो प्रायः अस्पृश्य माने जाते थे) की आर्थिक समस्याओं पर पर्याप्त जोर नहीं दिया गया।
- यद्यपि स्वराजवादी और परिवर्तनविरोधी अलग-अलग रणनीतियों पर कार्य कर रहे थे, फिर भी उनके बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बने रहे और आवश्यकता पड़ने पर वे एकजुट भी हुए।
सरदार वल्लभभाई पटेल
- गुजरात के नडियाद में एक किसान परिवार में जन्म।
- शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में आपराधिक मामलों से संबंधित वकील (क्रिमिनल लॉयर) के रूप में वकालत प्रारंभ की।
- उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1915 में ‘गुजरात सभा’ से की, जिसके अध्यक्ष महात्मा गांधी थे।
- रॉलेट बिल के विरुद्ध हुए आंदोलनों और प्रदर्शनों में सक्रिय भागीदारी के लिए वे पूर्णतः उत्तरदायी रहे।
- उन्होंने ‘सत्याग्रह पत्रिका’ के प्रकाशन में भी भूमिका निभाई।
- असहयोग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया तथा गुजरात विद्यापीठ की स्थापना से भी उनका निकट संबंध रहा।
- उन्होंने 1928 में बारदोली किसान सत्याग्रह का सफल नेतृत्व किया।
- इसी सत्याग्रह के बाद उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि प्राप्त हुई।
- वे महात्मा गांधी के विश्वस्त सहयोगी थे।
- 1946 में बंबई नौसैनिक विद्रोह को शांत कराने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- सरदार पटेल आधुनिक भारत के निर्माताओं में प्रमुख स्थान रखते हैं।
- उन्होंने देशी रियासतों के एकीकरण में निर्णायक भूमिका निभाई।
- वे ‘भारत के लौह पुरुष’ (Iron Man of India) के रूप में विख्यात थे।उनका निधन 1950 में हुआ।
