ब्रिटिश राजनीतिक नीतियाँ: आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत ब्रिटिश शासन की राजनीतिक नीतियाँ भारत में अपने नियंत्रण को सुदृढ़ करने और विस्तार करने के उद्देश्य से निर्मित की गई थीं। ‘डिवाइड एंड रूल’, सहायक संधि (Subsidiary Alliance), विलय नीति (Doctrine of Lapse) तथा प्रशासनिक केंद्रीकरण जैसी नीतियों ने भारतीय समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला।
भारत में ब्रिटिश राजनीतिक नीतियाँ
ब्रिटिश सर्वोच्चता –
ब्रिटिश विस्तार के दो तरीके (1757–1857) –
- युद्ध/विजय द्वारा विलय
- बंगाल, मैसूर, मराठा, सिख, आदि।
- प्रशासनिक उपायों से विलय
- रिंग-फेंस नीति/सुरक्षा घेरे की नीति (वारेन हेस्टिंग्स)
- सहायक संधि (लार्ड वेलेजली)
- व्यपगत का सिद्धांत (लॉर्ड डलहौजी)
- कुल रियासतों की संख्या: 562
- रियासतों की सीमा –
- सबसे छोटी: बिलबरी (जनसंख्या 27)
- सबसे बड़ी: हैदराबाद
ब्रिटिश–भारतीय रियासत संबंधों का विकास क्रम
अधीनता से समानता के लिए कंपनी का संघर्ष (1740–1765)
- कंपनी ने भारतीय राज्यों के सामने समान स्तर स्थापित करने का प्रयास किया।
- कंपनी ने स्वयं को मात्र एक व्यापारिक इकाई से एक राजनीतिक इकाई के रूप में परिवर्तित करने का प्रयास भी किया।
- आंग्ल–फ्रांसीसी युद्ध और प्लासी के युद्ध के बाद कंपनी को इसमें सफलता मिली।
रिंग-फेंस की नीति/सुरक्षा घेरे की नीति (वारेन हेस्टिंग्स) (1765-1813)

पृष्ठभूमि
- वारेन हेस्टिंग्स ने ब्रिटिश शासन के एक अत्यंत कठिन दौर में गवर्नर-जनरल का पद ग्रहण किया।
- कंपनी को भारतीय शक्तियों के एक मजबूत गठबंधन का सामना करना पड़ा
- मराठा
- मैसूर
- हैदराबाद
- मुख्य उद्देश्य: कंपनी के क्षेत्रों की सुरक्षा।
रिंग-फेंस की नीति का अर्थ
- इस नीति का उद्देश्य ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्रों के चारों ओर बफर राज्य बनाना था।
- मुख्य सिद्धांत:
- ब्रिटिश क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु पड़ोसी राज्यों की सीमाओं की रक्षा करना।
- व्यावहारिक रूप में:
- ब्रिटिश सुरक्षा आसपास के भारतीय राज्यों की सुरक्षा पर निर्भर थी।
कंपनी के समक्ष उपस्थित चुनौतियाँ :
- प्रमुख बाहरी खतरे:
- अफगान आक्रमण
- मराठों का विस्तार
- ये खतरे कंपनी के मुख्य आधार क्षेत्र, बंगाल को सीधे तौर पर संकट में डाल सकते थे।
नीति का अनुप्रयोग
- कंपनी ने अवध की सीमाओं की रक्षा का दायित्व लिया।
- शर्त:
- अवध के नवाब को ब्रिटिश सेना का खर्च वहन करना था।
- तर्क:
- अवध की रक्षा = बंगाल की रक्षा।
रिंग-फेंस प्रणाली की विशेषताएँ
- इस प्रणाली के अंतर्गत आने वाले राज्यों को:
- बाहरी आक्रमण के विरुद्ध सैन्य सहायता का आश्वासन दिया गया।
- लेकिन:
- यह सहायता उनके अपने खर्च पर दी जाती थी।
- भारतीय शासकों को:
- सहायक सेनाएँ बनाए रखना अनिवार्य था।
- इनके रखरखाव का खर्च भारतीय शासकों द्वारा वहन किया जाता था।
- महत्व
- इस नीति ने :
- भारतीय राज्यों को सैन्य रूप से निर्भर बना दिया ।
- यह सहायक संधि प्रणाली की पूर्वगामी नीति थी।
- मराठों और मैसूर के विरुद्ध हेस्टिंग्स के युद्धों में इस नीति का प्रतिबिंब दिखता है।
सहायक संधि प्रणाली ( लॉर्ड वेलेजली)

- लॉर्ड वेलेजली द्वारा स्थापित और व्यवस्थित की गई।
- अवधि: 1798–1805
- उद्देश्य:
- भारत में प्रत्यक्ष अधिग्रहण किए बिना ब्रिटिश साम्राज्य का निर्माण करना।
- मुख्य विशेषताएँ
- भारतीय शासक को:
- अपने राज्य में ब्रिटिश सैनिकों की स्थायी तैनाती स्वीकार करना।
- उनकी रख-रखाव के लिए सब्सिडी (भुगतान) देना।
- शासक के दरबार में एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त होना।
- शासक :
- कंपनी की अनुमति के बिना यूरोपीय लोगों को नौकरी पर नहीं रख सकता था।
- गवर्नर-जनरल की सहमति के बिना शासक निम्न कार्य नहीं कर सकते थे:
- युद्ध की घोषणा
- संधियाँ करना
- विदेशी संबंध बनाए रखना
- इसके बदले में ब्रिटिश वचन देते थे:
- बाहरी शत्रुओं से सुरक्षा।
- आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना (सिद्धांततः)।
- भारतीय शासक को:
- रणनीतिक उद्देश्य
- फ्रांसीसी पुनरुत्थान और भारत में उनके विस्तार को रोकना।
- संदर्भ:
- नेपोलियन के पूर्वी अभियान की आशंका।
- मॉरीशस से फ्रांसीसी हमले की संभावना।
- इसलिए भारतीय शासकों को बाध्य किया गया:
- ब्रिटिश को छोड़कर सभी यूरोपीय लोगों को बर्खास्त करने के लिए।
- बिना अनुमति के किसी भी यूरोपीय को नौकरी पर न रखने के लिए
- प्रणाली का विकास और परिपूर्णता
- प्रारंभिक उत्पत्ति
- डुप्ले
- भारतीय शासकों को यूरोपीय सैनिक देने वाला पहला व्यक्ति।
- डुप्ले
- इनके अंतर्गत प्रणाली धीरे-धीरे विकसित हुई:
- क्लाइव
- हेस्टिंग्स (Hastings)
- कॉर्नवालिस (Cornwallis)
- वेलेजली के काल में यह प्रणाली चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई।
- प्रारंभिक उदाहरण
- अवध (1765):
- पहला राज्य जो सुरक्षा व्यवस्था में आया।
- कंपनी ने अवध की सीमाओं की रक्षा करने पर सहमति दी।
- नवाब ने रक्षा का खर्च वहन किया।
- यह व्यवस्था सहायक संधि प्रणाली की पूर्वाभास थी।
- अवध (1765):
- वेलेजली का नवाचार:
- वेलेजली ने क्षेत्र-समर्पण को एक सामान्य नियम बना दिया।
- भारतीय शासकों को पूर्ण संप्रभुता के साथ अपने प्रदेश सौंपने पड़े।
- इसका मुख्य उद्देश्य ‘सहायक सेना’ का खर्च उठाना और उसे बनाए रखना था।
- इसी के साथ सहायक संधि प्रणाली अपनी पूर्णता के चरम पर पहुँच गई।
- ब्रिटिश रेजिडेंट की भूमिका
- राज्य की राजधानी में एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त किया गया।
- प्रशासन में हस्तक्षेप किया।
- संप्रभुता के ह्रास और विलय की प्रक्रिया को तीव्र किया।
- राज्य की राजधानी में एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त किया गया।
- प्रारंभिक उत्पत्ति
- सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य
- हैदराबाद (निज़ाम) – 1798 और 1800
- मैसूर – 1799
- तंजौर – अक्टूबर 1799
- अवध – नवंबर 1801
- पेशवा (मराठा) – दिसंबर 1801
- बरार के भोंसले – दिसंबर 1803
- सिंधिया – फरवरी 1804
- राजपूत राज्य (1818):
- जोधपुर
- जयपुर
- माचेड़ी
- बूंदी
- भरतपुर
- होल्कर – सहायक संधि स्वीकार करने वाला अंतिम मराठा संघ (1818)
अधीनस्थ पृथक्करण की नीति (1813–1857) –
- साम्राज्यवादी विचारधारा का उदय
- सर्वोच्चता (Paramountcy) के सिद्धांत का विकास
- राज्य संबंधों की प्रकृति:
- रियासतों को अधीनस्थ सहयोग (subordinate cooperation) में कार्य करना था।
- ब्रिटिश सर्वोच्चता को स्वीकार करना अनिवार्य था।
- संप्रभुता:
- बाह्य संप्रभुता त्याग दी गई।
- आंतरिक प्रशासन अपने पास रखा गया।
- ब्रिटिश रेजिडेंट की भूमिका बदल गई:
- राजनयिक एजेंटों से कार्यकारी और नियंत्रण अधिकारी बन गए।
- चार्टर अधिनियम, 1833:
- कंपनी के व्यापारिक कार्य समाप्त कर दिए गए।
- राजनीतिक अधिकार बने रहे।
- उत्तराधिकार:
- पूर्व स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई।
- 1834 में निदेशक मंडल का निर्देश:
- जहां संभव हो, रियासतों का विलय किया जाए।
- डलहौजी के अधीन विलय:
- आठ रियासतों का विलय किया गया।
- प्रमुख रियासतें:
- सतारा
- नागपुर
व्यपगत का सिद्धांत (डलहौजी)-
- एक दत्तक पुत्र निजी संपत्ति का उत्तराधिकारी हो सकता था।
- लेकिन बिना ब्रिटिश स्वीकृति के वह राज्य का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता था।
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ‘सर्वोच्चता’ (Paramountcy) के अधीन आने वाली किसी भी रियासत का विलय कर लिया जाता था, यदि उसके शासक की मृत्यु बिना किसी प्राकृतिक उत्तराधिकारी के हो जाती थी।
- ब्रिटिश (सर्वोच्च शक्ति) के विकल्प:
- गोद लेने को स्वीकार करना, या
- राज्य का अधिग्रहण करना।
लॉर्ड डलहौजी की भूमिका

- संस्थापक नहीं, बल्कि:
- नीति में बदलाव:
- पहले के गवर्नर अधिग्रहण से बचते थे।
- डलहौजी ने कानूनी रूप से उचित होने पर अधिग्रहण किया।
- डलहौज़ी के अनुसार, भारत में तीन प्रकार की रियासतें थीं-
- वे रियासतें, जो कभी भी सर्वोच्च शक्ति के अधीन नहीं थी और कर नहीं देती थी।
- वे रियासतें, जो कभी मुगलों या मराठों के अधीन थी और अब ब्रिटिशों के अधीन आ गईं।
- वे रियासतें, जो ब्रिटिशों द्वारा जीवित रखी गई या बहाल की गई
- व्यपगत के सिद्धांत के तहत विलय किए गये राज्य –
- सतारा – 1848
- झांसी – 1854
- नागपुर – 1854
- अन्य राज्य:
- जैतपुर (बुंदेलखंड)
- संभलपुर (ओडिशा)
- बघाट (हिमाचल प्रदेश)
- करौली इस नीति के कार्यान्वयन में एक अपवाद था।
- अवध का विलय (1856)
- पृष्ठभूमि
- अवध 80 वर्षों से सहायक संधि के अधीन था।
- नवाबों के अधीन लगातार कुप्रशासन।
- ब्रिटिश भूमिका
- ब्रिटिशों द्वारा लगाए गए सहायक सैनिकों की उच्च लागत।
- अतिरिक्त योगदान लिया गया:
- लॉर्ड हेस्टिंग्स
- लॉर्ड एमहर्स्ट
- लॉर्ड विलियम बेंटिंक
- नवाब को राजा की उपाधि दी गई (1819)।
- रिपोर्ट
- विलियम स्लिमैन (Resident):
- अराजकता और दुराचार की रिपोर्ट।
- आउट्राम (1854):
- स्लिमैन की रिपोर्ट की पुष्टि।
- विलियम स्लिमैन (Resident):
- डलहौजी की कार्रवाई
- वह नवाब के पद को बनाए रखते हुए ब्रिटिश प्रशासन को चलाने के पक्ष में थे।
- कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने पूर्ण विलय (annexation) का आदेश दिया।
- वाजिद अली शाह ने संधि से इनकार कर दिया और उन्हें कलकत्ता निर्वासित कर दिया गया।
- यह विलय 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारणों में से एक बना।
- पृष्ठभूमि
- डलहौजी का मूल्यांकन –
- 1848–56 के बीच 8 राज्यों का अधिग्रहण।
- ब्रिटिश क्षेत्र में 2.5 लाख वर्ग मील का विस्तार।
- भारत में ब्रिटिश विस्तार लगभग पूरा हुआ।
- यह प्रक्रिया प्लासी (1757) से शुरू हुई।
ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार पर दृष्टिकोण
शशि थरूर:
- ब्रिटिश विस्तार को एक भक्षक और शोषणकारी नीति मानते हैं, जिसने भारत को व्यवस्थित रूप से गरीब बनाया, उसके उद्योगों को नष्ट किया और जनता को भारी कष्ट पहुँचाया।
सर जॉन सीले:
- ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार, विशेष रूप से भारत में, काफी हद तक अनजाने में हुआ, जो लगभग एक ‘दुर्घटना’ या ‘अनवधानता’ (भूलने की स्थिति) में घटित हुआ।
वाल्टर रीड:
- ब्रिटिश विस्तार नीति, विशेषकर भारत में, वास्तविक राजनीतिक प्रगति में बाधा डालने, आर्थिक शोषण करने और वादों को तोड़ने के रूप में दर्शायी जा सकती है।
अधीनस्थ संघ की नीति (1857–1935)
1857 के बाद परिवर्तन
- क्राउन (ब्रिटिश राज) ने प्रत्यक्ष शासन संभाला
- नीति में बदलाव का कारण 1857 के विद्रोह के दौरान राजाओं की वफादारी थी
- विलय की नीति को त्याग दिया गया
- मुगल सत्ता समाप्त हो गई।
- रियासतें अधीनस्थ बन गईं।
- रानी की उपाधि:
- कैसर-ए-हिंद (भारत की साम्राज्ञी)।
प्रशासनिक एवं तकनीकी कारक –
- ब्रिटिश हस्तक्षेप को बढ़ावा मिला:
- रेलवे
- सड़कें
- टेलीग्राफ
- नहरें
- डाकघर
- प्रेस
- जनमत
- कर्जन का दृष्टिकोण –
- संधियों की व्यापक व्याख्या की।
- राजाओं को गवर्नर-जनरल का सहकर्मी माना गया।
- परिणाम:
- सभी रियासतों को एक समान अधीनता व भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के अभिन्न अंग की स्थिति में लाना।
1905 के बाद के विकास
- नीति में परिवर्तन:
- मित्रतापूर्ण सहयोग की ओर।
- उद्देश्य:
- राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी आंदोलनों का सामना करना।
- मॉन्टफोर्ड सुधार (1921):
- चैंबर ऑफ प्रिंसेस (नरेंद्र मंडल) की स्थापना
- नरेंद्र मंडल की प्रकृति:
- परामर्शदात्री और सलाहकारी संस्था।
- निम्न पर कोई अधिकार नहीं था:
- रियासतों के आंतरिक मामले
- अधिकार और स्वतंत्रता
- रियासतों का वर्गीकरण:
- प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व – 109
- प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रतिनिधित्व – 127
- जागीर/सामंती जागीरों के रूप में मान्यता।

बटलर समिति (1927)
- उद्देश्य:
- संप्रभुता और सर्वोच्चता का परीक्षण करना।
- ब्रिटिश क्राउन और भारतीय रियासतों के बीच जटिल संबंधों को स्पष्ट करना।
- संबंधों में सुधार का प्रयास।
- सिफारिशें:
- सर्वोच्चता (Paramountcy) सर्वोपरि बनी रहनी चाहिए।
- रियासतों को ऐसी भारतीय सरकार को स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए जो विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी हो।
- परिणाम:
- सर्वोच्चता की परिभाषा स्पष्ट नहीं की गई।
समान संघ (Equal Federation) की नीति (1935–1947) – असफल
भारत सरकार अधिनियम, 1935:
- अखिल भारतीय संघ (All-India Federation) का प्रस्ताव।
- संघीय ढांचा:
- संघीय सभा:
- 375 में से 125 सीटें राजाओं के लिए आरक्षित।
- राज्य परिषद (उच्च सदन)::
- 260 में से 104 सीटें राजाओं के लिए आरक्षित।
- संघीय सभा:
- संघ की शर्त:
- रियासतों द्वारा अनुमोदन आवश्यक था:
- कुल रियासती जनसंख्या के कम-से-कम 50% का प्रतिनिधित्व करने वाली रियासतें।
- और काउंसिल ऑफ स्टेट्स में कम-से-कम 52 सदस्य चुनने की पात्रता।
- परिणाम:
- यह योजना लागू नहीं हो सकी।
- द्वितीय विश्व युद्ध (सितंबर 1939) शुरू होने के बाद इसे छोड़ दिया गया।
- रियासतों द्वारा अनुमोदन आवश्यक था:
1773 से 1947 के बीच संवैधानिक विकास
1773 का रेगुलेटिंग एक्ट –
- भारत के प्रशासन में ब्रिटिश सरकार का पहला प्रत्यक्ष हस्तक्षेप।
- कंपनी की भूमिका को केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक माना गया।
- केन्द्रीकृत प्रशासन की शुरुआत।
- कंपनी के निवेशकों को राजस्व, नागरिक, सैन्य पत्राचार ब्रिटिश सरकार को भेजना अनिवार्य किया गया।
- बंगाल के गवर्नर-जनरल का पद बनाया गया और 4 सदस्यों की परिषद बनाई गई।
- लेफ्टिनेंट-जनरल जॉन क्लेवरिंग जॉर्ज मॉन्सनरिचर्ड बरवेल फिलिप फ्रांसिसवॉरेन हेस्टिंग्स पहले गवर्नर-जनरल नियुक्त हुए।
- कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई, जिसे मूल एवं अपीलीय अधिकार दिए गए।
- गवर्नर-जनरल को बॉम्बे और मद्रास पर सीमित पर्यवेक्षण अधिकार दिए गए।
गुरमुख निहाल सिंह –
- यह अधिनियम संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने कंपनी की राजनीतिक गतिविधियों को मान्यता दी और पहली बार ब्रिटिश संसद को भारत में अपनी पसंद की सरकार स्थापित करने का अधिकार दिया।
1781 के संशोधन
- सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को परिभाषित किया गया: कलकत्ता के भीतर प्रतिवादी पर उसके व्यक्तिगत कानून लागू होंगे।
- सरकारी कर्मचारियों को आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कार्यों के लिए न्यायालय से सुरक्षा दी गई।
- भारतीयों की सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं का सम्मान किया जाएगा।
सेटलमेंट एक्ट या एक्ट ऑफ सेटलमेंट भी कहा जाता है।
पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 –
- ब्रिटिश सरकार को अधिक नियंत्रण मिला; ईस्ट इंडिया कंपनी राज्य के अधीन हो गई।
- भारतीय क्षेत्रों को आधिकारिक रूप से “ब्रिटिश अधिग्रहण/ब्रिटिश संपत्ति (British possessions)” कहा गया।
- बोर्ड ऑफ कंट्रोल बनाया गया (चांसलर ऑफ एक्सचेकर, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, प्रिवी काउंसिल के 4 सदस्य)।
- इसने नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों को नियंत्रित किया।
- 3 सदस्यों की गवर्नर-जनरल की परिषद बनाई गई (जिसमें कमांडर-इन-चीफ शामिल था)।
- मद्रास और बॉम्बे को गवर्नर-जनरल के अधीन किया गया।
- आक्रामक युद्धों और संधियों पर रोक लगाई गई (हालांकि अक्सर उल्लंघन हुआ)।
सर कोर्टेनय इल्बर्ट, “इस अधिनियम ने एक बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना की जिसका उद्देश्य निदेशकों पर नियंत्रण रखना था। इस प्रकार, शासन की एक दोहरी प्रणाली स्थापित की गई, एक कंपनी द्वारा और दूसरी संसदीय बोर्ड द्वारा। निरीक्षण और प्रति-निरीक्षण की यह प्रणाली 1858 तक जारी रही।”
संशोधन अधिनियम, 1786 –
- इस अधिनियम ने विशेष परिस्थितियों में गवर्नर-जनरल को अपनी परिषद के निर्णयों को निरस्त करके स्वयं निर्णय लागू करने की शक्ति दी।
- गवर्नर-जनरल को प्रधान सेनापति (Chief Commander) की शक्तियाँ भी दी गई।
चार्टर अधिनियम, 1793 –
- इस अधिनियम ने पिछले शासकों के व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर ब्रिटिश भारत में कानून के शासन की नींव रखी। यह तय किया गया कि इन लिखित कानूनों और नियमों की व्याख्या न्यायपालिका द्वारा की जाएगी।
- गवर्नर जनरल और गवर्नर जनरल की परिषद के सदस्यों के लिए, योग्यता के तौर पर भारत में कम से कम बारह वर्ष रहना अनिवार्य कर दिया गया।
- कंपनी के व्यापार एकाधिकार को 20 और वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
- EIC को ब्रिटिश सरकार को सालाना £500,000 का भुगतान करना होगा।
- GG, गवर्नरों, कमांडर-इन-चीफ के लिए शाही मंजूरी जरूरी थी।
- EIC को निजी ब्रिटिश व्यापारियों को “देशीय व्यापार(country trade)” लाइसेंस देने की अनुमति दी गई। → चीन को अफीम का व्यापार।
- गृह सरकार के खर्च भारतीय राजस्व से दिए जाएंगे (1919 तक)।
चार्टर अधिनियम, 1813 –
- भारत के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार समाप्त किया गया।
- लेकिन चीन और चाय के व्यापार पर एकाधिकार बना रहा।
- शेयरधारकों को 10.5% लाभांश की गारंटी दी गई।
- कंपनी को 20 वर्षों तक क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखने दिया गया।
- भारतीयों की शिक्षा के लिए वार्षिक ₹1 लाख का प्रावधान।
- ईसाई मिशनरियों को भारत आने की अनुमति दी गई।
चार्टर अधिनियम, 1833 –
- कंपनी के चार्टर को 20 वर्षों के लिए बढ़ाया गया।
- चीन और चाय व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार समाप्त किया गया।
- यूरोपियों को बिना रोक-टोक भारत आने और संपत्ति खरीदने की अनुमति दी गई।
- केन्द्रीयकरण की शुरुआत:
- बंगाल का गवर्नर-जनरल “भारत का गवर्नर-जनरल” बना।
- बेंटिक भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने।
- गवर्नर-जनरल को नागरिक, सैन्य और राजस्व मामलों पर पूर्ण नियंत्रण दिया गया।
- अधीनस्थ प्रेसीडेंसियों की विधायी एवं वित्तीय शक्तियां समाप्त कर दी गई।
- मद्रास और बॉम्बे से विधायी अधिकार छीन लिए गए।
- भारत सरकार ने कंपनी के ऋणों की गारंटी ली।
- बंगाल का गवर्नर-जनरल “भारत का गवर्नर-जनरल” बना।
- गवर्नर-जनरल की परिषद में एक विधि सदस्य जोड़ा गया → विधायी परिषद की शुरुआत। लॉर्ड मैकॉले।
- भारतीय कानूनों के संहिताकरण का प्रयास।
- जाति, धर्म, जन्म के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी भारतीयों को सरकारी नौकरी हेतु योग्य घोषित किया गया।
दासों की स्थिति सुधारने का आग्रह → 1843 में दास प्रथा समाप्त।
चार्टर अधिनियम, 1853 –
- मुख्य रूप से, यह अधिनियम तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की रिपोर्ट और कंपनी के शासन को समाप्त करने की भारतीयों की मांगों पर आधारित था।
- ब्रिटिश संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह किसी भी समय भारत में कंपनी शासन समाप्त कर सकती है।
- कार्यकारी परिषद के विधि सदस्य को पूर्ण सदस्य का दर्जा दिया गया।बंगाल के लिए अलग गवर्नर-जनरल नियुक्त करने का प्रावधान किया गया।
- गवर्नर-जनरल को अपनी परिषद के उपाध्यक्ष नियुक्त करने का अधिकार दिया गया।
- विधायी कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से अलग करने का प्रावधान किया गया।
- निदेशक मंडल के सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 8 कर दी गई।
- कंपनी के कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु प्रतियोगी परीक्षा का प्रावधान किया गया।
- पहली बार विधान परिषदों को अपने नियम बनाने की शक्ति दी गई।
- गवर्नर-जनरल का सभी कानूनों पर वीटो अधिकार बना रहा।
1858 की उद्घोषणा
- भारतीयों को सिविल सेवा नियुक्तियों में समानता का आश्वासन दिया गया — लेकिन अधिकांशतः पूरा नहीं हुआ।
- भारतीयों को निर्णय लेने वाली संस्थाओं और उच्च प्रशासन से बाहर रखा गया।
- 1858 के अधिनियम के प्रावधान निम्नलिखित थे-
- भारत शासन सुधार अधिनियम, 1858 (1857 के विद्रोह के बाद) –
- ईस्ट इंडिया कंपनी समाप्त की गई; भारत को ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया।
- शासन व्यवस्था: भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्टेट + 15 सदस्यों की परिषद।परिषद सलाहकार थी; वास्तविक शक्ति सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के पास थी।
- गवर्नर-जनरल वायसराय बना।
- लॉर्ड कैनिंग नए ढांचे के तहत पहले वायसराय बने।
- पिट्स एक्ट के तहत बनी दोहरी शासन व्यवस्था समाप्त हुई।
- 1858 के अधिनियम से भारतीय सेना ब्रिटिश क्राउन के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आ गई; भारत का कमांडर-इन-चीफ गवर्नर-जनरल के अधीन था।
- वास्तविक शक्ति में स्थानांतरित हो गई→ वायसराय सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के अधीन हो गया।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
- 1861 का भारतीय परिषद अधिनियम संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है।
- बॉम्बे और मद्रास की विधायी शक्तियाँ पुनः बहाल की गईं (जो 1833 में छीन ली गई थी)।
- बाद में अन्य प्रांतों तक भी विस्तार हुआ।
- इसने गवर्नर जनरल को अपनी विस्तारित परिषद में भारतीय प्रतिनिधियों को नामित करने और उन्हें विधायी कार्य से जोड़ने का अधिकार दिया।
- गवर्नर-जनरल की विधायी परिषद में न्यूनतम 6 और अधिकतम 12 सदस्य किए गए, जिनमें आधे सदस्य गैर-सरकारी होने आवश्यक थे।
- गैर-सरकारी सदस्य केवल उच्च वर्ग के भारतीय थे (राजकुमार, ज़मींदार, दीवान)।विधायी उद्देश्य हेतु गवर्नर-जनरल को नए प्रांत बनाने तथा उनके लिए गवर्नर/लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त करने का अधिकार मिला।
- इससे भारतीयों की गैर-सरकारी सदस्य के रूप में भागीदारी का मार्ग खुला।
- गवर्नर-जनरल को अध्यादेश (ordinances) जारी करने की शक्ति दी गई।
- गवर्नर-जनरल को प्रेसीडेंसी/प्रांतों की सीमाएं बदलने का अधिकार भी मिला।
- इसी प्रकार 1869 के अधिनियम से गवर्नर-जनरल को विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए कानून बनाने की शक्ति मिली।
- 1873 के अधिनियम द्वारा कंपनी को कभी भी भंग करने का प्रावधान किया गया और 1 जनवरी 1874 को कंपनी समाप्त कर दी गई।
प्रशासनिक संरचना
- प्रेसीडेंसियाँ (बॉम्बे, मद्रास, कलकत्ता) → गवर्नर + 3 सदस्यीय कार्यकारी परिषद (क्राउन द्वारा नियुक्त)।
- अन्य प्रांत → लेफ्टिनेंट गवर्नर या चीफ कमिश्नर (गवर्नर-जनरल द्वारा नियुक्त)।
- वायसराय की कार्यकारी परिषद में 5 वाँ सदस्य (एक विधिवेत्ता) जोड़ा गया।
- पोर्टफोलियो प्रणाली शुरू की गई (भारत में मंत्रिमंडलीय व्यवस्था की शुरुआत)।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
पृष्ठभूमि –
- 1861 के अधिनियम के तहत, परिषद में गैर-सरकारी सदस्य या तो बड़े भूस्वामी, सेवानिवृत्त अधिकारी थे या भारत के शाही परिवारों के सदस्य थे। यह भारतीय जनता की ‘जन-प्रतिनिधित्व’ की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रहा।
- 1885 में कांग्रेस बनी और ब्रिटिश शासन के विरोध में आंदोलन का नेतृत्व किया।
- कांग्रेस ने भारतीयों के अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की।
- यूरोपीय व्यापारियों ने भी ‘इंडिया ऑफिस’ के नियंत्रण से मुक्ति की मांग की।
- इन कारणों से सर जॉर्ज चिसजानी की अध्यक्षता में समिति बनी और उसकी सिफारिशें 1892 के अधिनियम में शामिल की गयी।
- इस अधिनियम से केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में “अतिरिक्त सदस्यों” की संख्या बढ़ाई गई और उनके चुनाव का उल्लेख किया गया।
- हालाँकि चुनाव सीमित थे, लेकिन विधान परिषद में प्रमुख सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ।
- सीमित होते हुए भी चुनाव प्रणाली को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया गया।
- परिषद की शक्तियां बढ़ाई गई
- वार्षिक आय-व्यय/बजट प्रस्तुत करना अनिवार्य किया गया।
- परिषद विभिन्न विषयों पर चर्चा कर सकती थी, लेकिन मतदान का अधिकार नहीं था।
- सदस्य कार्यपालिका से प्रश्न पूछ सकते थे।
- सदस्य पूरक प्रश्न नहीं पूछ सकते थे।
- हालांकि यह अधिनियम सीमित चुनाव प्रणाली लेकर आया, लेकिन इसमें कई कमियाँ थीं।
- इसी कारण भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसकी आलोचना की और विधान परिषदों की शक्तियाँ बहुत सीमित रहीं।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (स्थापना 1885) की मांग।
- केंद्रीय व प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
- विश्वविद्यालय, जिला बोर्ड, नगरपालिकाएँ, वाणिज्य मंडल आदि को सदस्य अनुशंसित करने की अनुमति → अप्रत्यक्ष चुनाव शुरू।
- सदस्य:
- बजट पर चर्चा कर सकते थे।
- 6 दिन की सूचना पर प्रश्न पूछ सकते थे।
- फिर भी वास्तविक विधायी शक्ति नहीं मिली।
भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले–मिंटो सुधार)

- सर अरुंडेल समिति की सिफारिशों पर आधारित।
पृष्ठभूमि
शिमला प्रतिनिधिमंडल (1906):
- आगा खां के नेतृत्व में, मांग की गई—मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल।
- साम्राज्य की रक्षा में उनके योगदान का हवाला देते हुए, संख्यात्मक शक्ति से अधिक प्रतिनिधित्व।
- यही अभिजात वर्ग शीघ्र ही मुस्लिम लीग पर हावी हो गया, जिसकी स्थापना दिसंबर 1906 में नवाब सलीमुल्लाह, मोहसिन-उल-मुल्क और वक़ार-उल-मुल्क ने की थी।
- इसका उद्देश्य ब्रिटिशों के प्रति निष्ठा का प्रचार करना और मुस्लिम बुद्धिजीवियों को कांग्रेस से दूर रखना था।
- गोपाल कृष्ण गोखले स्वशासन (colonial model) की मांग करने हेतु इंग्लैंड गए।
निर्वाचित सिद्धांत (Elective principle) की शुरुआत
- भारतीयों को चुनाव प्रक्रिया में सीमित भागीदारी दी गई, जो वर्ग (class) और समुदाय (community) के आधार पर थी।
- अप्रत्यक्ष चुनाव
- बहु-स्तरीय व्यवस्था: स्थानीय निकाय → निर्वाचन मंडल → प्रांतीय विधानमंडल → केंद्रीय विधानमंडल।
- इस अधिनियम द्वारा केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
- साथ ही, प्रांतीय विधान परिषदों में निजी (गैर-सरकारी) सदस्यों का बहुमत सुनिश्चित किया गया।
- केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों की सीटों को तीन वर्गों में बाँटा गया—सामान्य (General) — क्षेत्रीय/प्रांतीय आधार पर।
- विशेष निर्वाचन (Special electorate) — मुसलमान और जमींदार (landowners)।
- विशेष हित (Special interests) — चैंबर ऑफ कॉमर्स, प्लांटर्स एसोसिएशन, विश्वविद्यालय, पोर्ट ट्रस्ट आदि।
- सामान्य सीटों पर सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते थे।
- स्थानीय निकायों से निर्वाचन परिषदें बनाई जाती थीं।
- ये निर्वाचन परिषदें प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों को चुनती थी और प्रांतीय विधान परिषदें केंद्रीय विधान परिषद के सदस्यों का चयन करती थीं।
- पहली बार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल लागू किया गया; साम्प्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था लागू हुई।
मुस्लिम अभिजात वर्ग को लाभ
- मुसलमानों को जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व मिला।
- मुस्लिम मतदाताओं के लिए आय-योग्यता हिंदुओं की तुलना में कम रखी गई।
- इस अधिनियम में गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी परिषद में एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति का प्रावधान किया गया।
- गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्त होने वाले पहले भारतीय सदस्य श्री सत्येंद्र सिन्हा थे।
- विधान परिषद की कार्य-सीमा का विस्तार।
- सदस्यों को अधिकार दिए गए—बजट पर प्रस्ताव रखने का।जनहित के विषयों पर प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछने का।
- जो विषय विधान परिषद के दायरे से बाहर रखे गए—सशस्त्र बल (armed forces), विदेशी संबंध (foreign relations) और देशी रियासतें (princely states)।
- बजट की अलग-अलग मदों पर मतदान का अधिकार मिला, लेकिन पूरे बजट पर नहीं।
- इस अधिनियम से केंद्रीय विधान परिषद का नाम बदलकर इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल कर दिया गया।
- इस अधिनियम की सबसे बड़ी कमी पृथक/साम्प्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था थी।
- इसने संसदीय प्रणाली का रूप तो दिया, लेकिन संसदीय उत्तरदायित्व (parliamentary responsibility) नहीं दिया।
- इंपीरियल और प्रांतीय विधान परिषदों की सदस्य संख्या बढ़ाई गई।
- केंद्रीय विधान परिषद के सदस्य 16 से बढ़कर 60 हो गए।
- सुमित सरकार के अनुसार, इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के 69 सदस्यों में 37 अधिकारी और 32 गैर-अधिकारी थे, जिनमें 32 में से 5 नामित थे।
- गैर-अधिकारी बहुमत नहीं था।प्रांतीय कार्यकारिणी परिषद के सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई।
- वास्तविक सत्ता फिर भी सरकार के पास ही रही।
- मुख्य समस्या
- मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल लागू किया गया।मुसलमानों को अधिक प्रतिनिधित्व और कम आय-योग्यता दी गई।
- चुनाव अत्यंत अप्रत्यक्ष बने रहे।कोई वास्तविक राजनीतिक समाधान नहीं निकला।
- मॉर्ले ने उत्तरदायी सरकार को खुले रूप में अस्वीकार किया—
“अगर यह कहा जा सकता है कि इससे संसदीय सरकार बनती है, तो मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं होगा।”
- उद्देश्य था—मामूली रियायतों से नरमपंथियों को भ्रमित करना।
- अलग निर्वाचन प्रणाली के माध्यम से भारतीयों को विभाजित करना।
- बढ़ते राष्ट्रवाद के खिलाफ नरमपंथियों और मुस्लिम अभिजात वर्ग को एकजुट करना।
- पृथक निर्वाचन ने केवल छोटे मुस्लिम अभिजात वर्ग को संतुष्ट किया, पूरे समुदाय को नहीं।
- भारतीय प्रतिनिधियों के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं था।
- उत्तरदायित्व के बिना संसदीय ढाँचे से गैर-जिम्मेदार आलोचना बढ़ी और रचनात्मक प्रभाव सीमित रहा।
- केवल गोखले जैसे नेताओं ने परिषदों का सार्थक उपयोग किया (शिक्षा, दमन-विरोध, श्रमिक मुद्दे)।
मांटेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार और भारत सरकार अधिनियम, 1919

पृष्ठभूमि
- विभिन्न दबावों के तहत—
- 1909 के अधिनियम की तीखी आलोचना।
- प्रथम विश्व युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियाँ।
- ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रसार।
अगस्त घोषणा
- भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मॉन्टेग्यू ने 20 अगस्त 1917 को हाउस ऑफ कॉमन्स में ऐतिहासिक वक्तव्य दिया—
- “प्रशासन में भारतीयों को सम्मिलित करना तथा स्वायत्त संस्थाओं का क्रमिक विकास करना, जिससे ब्रिटिश भारत का अभिन्न भाग रहते हुए उत्तरदायी सरकार स्थापित की जा सके।”
- इस घोषणा को लागू करने हेतु मॉन्टफोर्ड रिपोर्ट, 1918 प्रकाशित हुई, जो 1919 के अधिनियम का आधार बनी।
- संदर्भ
- ब्रिटिश ने “गाजर और छड़ी” (carrot and stick) की नीति अपनाई:
- गाजर: मॉन्टेग्यू–चेम्सफोर्ड सुधार (संवैधानिक सुधार)।
- छड़ी: रॉलेट एक्ट (दमन)।
- सुधार जुलाई 1918 में घोषित हुए और भारत सरकार अधिनियम, 1919 के रूप में लागू हुए।
- मुख्य विशेषताएँ-
- आठ प्रमुख प्रांतों (Governor’s Provinces) में द्वैध शासन (Diarchy) लागू किया गया।
- प्रांतीय विषय दो भागों में बाँटे गए—
- आरक्षित विषय (Reserved subjects) — गवर्नर के अधीन, कार्यकारी परिषद की सहायता से।
- हस्तांतरित विषय (Transferred subjects) — भारतीय मंत्रियों के अधीन, जो भारतीय सदस्यों में से नियुक्त होते थे।
- प्रांतीय विषय दो भागों में बाँटे गए—
- द्वैध शासन का अर्थ:
- दोहरी व्यवस्था— कार्यकारी सदस्य (नौकरशाही) और लोकप्रिय मंत्री (निर्वाचित)।
- गवर्नर प्रांत का कार्यकारी प्रमुख था।
- विषयों का विभाजन:
- आरक्षित विषय: कानून-व्यवस्था, वित्त, भू-राजस्व, सिंचाई → गवर्नर व नौकरशाही के अधीन।
- हस्तांतरित विषय: शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, उद्योग, कृषि, आबकारी, अकाल राहत → निर्वाचित परिषद से आए मंत्रियों के अधीन।
- इस अधिनियम से निर्वाचन का दायरा बढ़ाया गया।
- निर्वाचन योग्यता समुदाय, निवास और संपत्ति के आधार पर रखी गई।
- साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार सिक्ख, ईसाई, एंग्लो-इंडियन तक किया गया।
- प्रांतीय विधानमंडल एकसदनीय (unicameral) था।
- प्रांतीय और केंद्रीय बजट अलग किए गए।
- लंदन में भारत के लिए हाई कमिश्नर का पद बनाया गया।
- सेक्रेटरी ऑफ स्टेट का वेतन ब्रिटिश कोषागार से दिया गया।
- विधानमंडल की शक्तियाँ अत्यंत सीमित थी; गवर्नर-जनरल के पास—
- वीटो अधिकार।
- विधानमंडल को निष्प्रभावी करने की शक्ति।
- “सर्टिफिकेशन” शक्ति (जन-शांति के नाम पर कानून पास कराना)।
- मंत्री विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी थे; अविश्वास प्रस्ताव पर इस्तीफा देना पड़ता था।
- कार्यकारी सदस्य विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
- यदि संवैधानिक व्यवस्था विफल हो, तो गवर्नर हस्तांतरित विषय भी अपने हाथ में ले सकता था।
- राज्य सचिव और गवर्नर जनरल आरक्षित विषयों में हस्तक्षेप कर सकते थे; हस्तांतरित विषयों में सीमित हस्तक्षेप।
- प्रांतीय विधान परिषद में विस्तार—
- लगभग 70% सदस्य निर्वाचित।
- सांप्रदायिक और वर्ग निर्वाचक मंडलों को समेकित किया गया।
- महिलाओं को मतदान अधिकार दिया गया।
- विधेयक पेश करने का अधिकार मिला (गवर्नर की स्वीकृति आवश्यक)। गवर्नर वीटो या अध्यादेश जारी कर सकता था।
- बजट को अस्वीकार कर सकते थे , पर आवश्यक होने पर गवर्नर पुनः लागू कर सकता था।
- सदस्यों का चुनाव ‘सीमांकित निर्वाचन क्षेत्रों’ से प्रत्यक्ष रूप से किया जाता था।
केंद्र में उत्तरदायी शासन नहीं
- केंद्रीय विधान परिषद के स्थान पर द्विसदनीय व्यवस्था बनी—
- राज्य परिषद (उच्च सदन)
- कार्यकाल: राज्य परिषद = 5 वर्ष;
- विधान सभा (निम्न सदन)
- कार्यकाल विधानसभा = 3 वर्ष।
- दोनों सदनों में निर्वाचित सदस्यों का बहुमत सुनिश्चित किया गया, लेकिन नामांकन की व्यवस्था बनी रही।
- राज्य परिषद (उच्च सदन)
- कार्यपालिका:
- गवर्नर – जनरल = मुख्य कार्यकारी।
- वायसराय की परिषद: 8 सदस्य, जिसमें 3 भारतीय।
- गवर्नर-जनरल अनुदान बहाल कर सकता था, बिल प्रमाणित कर सकता था, अध्यादेश जारी कर सकता था।
- कार्यकाल: राज्य परिषद = 5 वर्ष; विधानसभा = 3 वर्ष।
- विधानमंडल की शक्तियाँ: प्रश्न पूछना, स्थगन प्रस्ताव, बजट के कुछ हिस्सों पर मतदान (फिर भी 75% बजट गैर-मतदान योग्य)।
- कुछ भारतीयों को महत्वपूर्ण समितियों में शामिल किया गया (जैसे वित्त)।
- कमियाँ
- सीमित मताधिकार: लगभग 260 मिलियन आबादी में से केवल ~1.5 मिलियन मतदाता।
- केंद्र: विधायिका का वायसराय और कार्यकारी परिषद पर कोई नियंत्रण नहीं था।
- केंद्र में विषयों का विभाजन असंतोषजनक था।
- प्रांतों की “महत्ता” के आधार पर सीटों का आवंटन (जैसे, पंजाब = सैन्य, बॉम्बे = वाणिज्यिक)।
- प्रांतीय द्वैध शासन तर्कहीन और अव्यावहारिक था: आरक्षित विषयों में सिंचाई, वित्त, पुलिस, प्रेस, न्याय शामिल थे।
- प्रांतीय मंत्री: वित्त या नौकरशाहों पर कोई नियंत्रण नहीं → लगातार टकराव; गवर्नर उन्हें निरस्त कर सकता था।
- 1919 के अधिनियम की शर्त के अनुसार दस वर्ष बाद द्वैध शासन की समीक्षा हेतु आयोग बनना था, इसी आधार पर 1927 में साइमन कमीशन बना।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
- अगस्त 1918, बॉम्बे विशेष अधिवेशन (अध्यक्ष: हसन इमाम):
- सुधार “निराशाजनक” और “असंतोषजनक” घोषित।
- प्रभावी स्वशासन की मांग।
- तिलक: “अयोग्य और निराशाजनक—सूर्यहीन भोर।”
- एनी बेसेंट: “इंग्लैंड के लिए पेश करना और भारत के लिए स्वीकार करना अयोग्य है।”
- 1919 अधिनियम की कई कमियां थीं—
- उत्तरदायी शासन की मांग पूरी नहीं हुई।
- गवर्नर-जनरल की अनुमति के बिना प्रांतीय विधानमंडल कई विषयों पर चर्चा नहीं कर सकते थे।
- सैद्धान्तिक रूप से केंद्रीय विधानमंडल सर्वोच्च रहा।
- शक्तियों के विभाजन के बावजूद संविधान मूलतः एकात्मक रहा।
- द्वैध शासन पूर्णतः असफल; गवर्नर की सर्वोच्चता बनी रही।
- वित्तीय शक्तियों के अभाव में मंत्री नीतियाँ लागू नहीं कर सके।
- मंत्री सामूहिक रूप से विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
- मुडीमैन समिति (सुधार जांच समिति)
- सर अलेक्जेंडर मुडीमैन की अध्यक्षता में 1924 ई. में 1919 ई. के अधिनियम के तहत लागू द्वैध शासन की जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया था।

- इसमें कुल 9 सदस्य थे जिनमें से 4 भारतीय सदस्य भी थे-
- सर शिव स्वामी अय्यर
- डॉ. आर.पी. परांजपे
- सर तेज बहादुर सप्रू
- मोहम्मद अली जिन्ना
- इसने 1925 ई. में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- सिफारिशें-
- द्वैध शासन की आलोचना की।
- 1919 के अधिनियम में मौलिक परिवर्तनों की सिफारिश की।
- इसके लिए एक शाही आयोग के गठन की सिफारिश की।
साइमन आयोग (1927)
- 1919 के अधिनियम की धारा 84 के अनुसार, सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था।
- आयोग ने जून 1930 में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की।
- साइमन कमीशन द्वारा डोमिनियन स्टेटस की मांग को खारिज करने के बाद, कांग्रेस ने 1929 में अपने लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का प्रस्ताव पारित किया।

- 2 साल पहले स्थापित किया गया।
- भारतीयों को शामिल न किए जाने के कारण → व्यापक बहिष्कार।
- मुख्य सिफारिशें (1930)
- द्वैध शासन समाप्त किया जाए।
- प्रांतों में उत्तरदायी शासन का विस्तार।
- ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को मिलाकर संघीय व्यवस्था।
- साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली जारी रखी जाए
गोलमेज सम्मेलन (1930–32) –
- संवैधानिक प्रस्तावों पर चर्चा हेतु तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित हुए।
- 1933 के श्वेत पत्र में संघीय व्यवस्था + प्रांतीय स्वायत्तता का प्रस्ताव दिया गया।
- लॉर्ड लिनलिथगो के तहत संयुक्त संसदीय समिति:
- संघ तभी बनेगा जब 50% रियासतें शामिल होंगी।
- परिणाम
- भारत सरकार अधिनियम 1935 का नेतृत्व किया।
भारत सरकार अधिनियम, 1935 —

- 10 अनुसूचियां –
- पहली अनुसूची – संघीय विधानमंडल की संरचना
- दूसरी अनुसूची – इस अधिनियम के वे प्रावधान जिसमें राज्य के विलय को प्रभावित किए बिना संशोधन किया जा सकता है।
- तीसरी अनुसूची – गवर्नर जनरल और प्रांत के गवर्नर के संबंध में प्रावधान
- चौथी अनुसूची – शपथ और प्रतिज्ञान के रूप
- पांचवीं अनुसूची – प्रांतीय विधानमंडल की संरचना
- छठी अनुसूची – मताधिकार के संबंध में प्रावधान
- सातवीं अनुसूची – विधायी सूचियां।
- आठवीं अनुसूची – संघीय रेलवे प्राधिकरण
- नौवीं अनुसूची – संघ की स्थापना तक अधिनियम के कुछ प्रावधान संशोधनों सहित लागू रहने की व्यवस्था
- दसवीं अनुसूची – निरस्त किए गए अधिनियम
- 14 भाग–
- भाग 1 – परिचय
- भाग 2 – भारत का संघ
- भाग 3 – गवर्नर के प्रांत
- भाग 4 – मुख्य आयुक्त के प्रांत
- भाग 5 – विधायी शक्तियाँ
- भाग 6 – संघ, प्रांत और रियासतों के बीच प्रशासनिक संबंध
- भाग 7 – वित्त, संपत्ति, अनुबंध और वाद
- भाग 8 – संघीय रेलवे
- भाग 9 – न्यायपालिका
- भाग 10 – भारत में क्राउन सेवाएँ
- भाग 11 – सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, उनके सलाहकार और विभाग
- भाग 12 – विविध
- भाग 13 – संक्रमणकालीन प्रावधान
- भाग 14 – प्रारंभ और निरसन
- कमांडर-इन-चीफ की नियुक्ति का उल्लेख धारा 4 में किया गया।
- इस अधिनियम में ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों के अखिल भारतीय संघ का प्रावधान किया गया।
- ब्रिटिश प्रांतों के लिए संघ में शामिल होना अनिवार्य था, लेकिन देशी रियासतों के लिए यह वैकल्पिक रखा गया।
- यह ब्रिटिश संसद द्वारा पारित हुआ और 1937 में लागू किया गया।
- इसमें 321 अनुच्छेद, 14 भाग और 10 अनुसूचियाँ थीं।
- यह लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता वाली संयुक्त चयन समिति की रिपोर्ट पर आधारित था।
- इसने एक अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा, जिसमें शामिल थे—
- गवर्नर के प्रांत
- मुख्य आयुक्त के प्रांत
- वे देशी रियासतें जो शामिल होना चाहें
अखिल भारतीय संघ-
- सभी ब्रिटिश भारतीय प्रांतों + रियासतों को शामिल करने के लिए।
- शर्तें:
- इन राज्यों में रियासतों की 50% आबादी शामिल होनी चाहिए।
- शर्तें पूरी नहीं हुईं → संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया।
- केंद्रीय सरकार 1946 तक 1919 अधिनियम के तहत काम करती रही।
- संघीय स्तर (केंद्र)
- कार्यपालिका
- केंद्र में द्वैध शासन लागू किया गया।
- गवर्नर जनरल = केंद्रीय सत्ता का केंद्र बिंदु।
- विषयों को विभाजित किया गया:
- आरक्षित विषय: विदेश मामले, रक्षा, आदिवासी क्षेत्र, धार्मिक मामले
- → गवर्नर जनरल द्वारा कार्यकारी पार्षदों के माध्यम से प्रशासित जो विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं थे।
- हस्तांतरित विषय: हस्तांतरित विषय मंत्रिपरिषद को सौंप दिए गए।
- गवर्नर जनरल के पास थे:
- व्यक्तिगत विवेकाधीन शक्तियाँ
- सुरक्षा एवं शांति-व्यवस्था के लिए विशेष उत्तरदायित्व।
- देशी रियासतें ‘विलय-पत्र’ पर हस्ताक्षर करके संघ में शामिल हो सकती थीं, जिसमें संघीय सरकार को सौंपी गई शक्तियों का स्पष्ट विवरण होता था।
- विधानमंडल
- द्विसदनीय:
- राज्य परिषद (उच्च सदन) – 260 सदस्य
- आंशिक रूप से निर्वाचित, 40% सदस्य राजाओं द्वारा नामित
- प्रत्यक्ष चुनाव
- स्थायी सदन, प्रत्येक 3 वर्ष में 1/3 सदस्य सेवानिवृत्त
- संघीय सभा (निम्न सदन) – 375 सदस्य
- प्रांतों से अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित
- 1/3 सदस्य राजाओं द्वारा नामित
- राज्य परिषद (उच्च सदन) – 260 सदस्य
- विचित्र व्यवस्था: उच्च सदन प्रत्यक्ष, निम्न सदन अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता था।
- तीन विधायी सूचियाँ: संघीय, प्रांतीय, समवर्ती।
- दोनों सदनों के बीच गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक का प्रावधान था।
- संघीय सभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सकती थी, राज्य परिषद नहीं।
- पृथक निर्वाचन व्यवस्था का और विस्तार किया गया।
- केंद्रीय बजट का 80% गैर-मतदान योग्य था।
- गवर्नर-जनरल की शक्तियां:
- अनुदानों में कटौती को बहाल करना
- विधेयकों को प्रमाणित करना
- अध्यादेश जारी करना
- विधायी वीटो
- अवशिष्ट शक्तियाँ
- यहां तक कि गवर्नर जनरल द्वारा स्वीकृत कानूनों को भी किंग-इन-काउंसिल द्वारा अस्वीकृत किया जा सकता था।
- प्रांतीय स्वायत्तता
- प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया।
- उत्तरदायी शासन के साथ पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित की गई।
- मंत्रिपरिषद को विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी बनाया गया और विधानमंडल द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर उसे हटाया जा सकता था।
- प्रांतों को अधिकार सीधे ब्रिटिश क्राउन से प्राप्त होते थे।
- प्रांतीय विधानमंडल को प्रांतीय सूची तथा समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार दिया गया।
- विधानमंडल प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछकर प्रशासन पर कुछ नियंत्रण कर सकता था।
- प्रांतों को दिए गए:
- स्वतंत्र वित्तीय शक्तियाँ,
- अपनी सुरक्षा पर ऋण लेने की शक्ति।
- स्वतंत्र वित्तीय शक्तियाँ,
- विधानमंडलों का विस्तार किया गया।
- 6 प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल:
- मद्रास, बॉम्बे, बंगाल, संयुक्त प्रांत, बिहार, असम।
- अन्य 5 प्रांतों में एक-सदनीय विधानमंडल बनाए रखे गए।
- केंद्रीय प्रांत का नाम बदलकर ‘केंद्रीय प्रांत और बरार’ कर दिया गया।
- 6 प्रांतों में द्विसदनीय विधानमंडल:
- कार्यपालिका
- गवर्नर = क्राउन का प्रतिनिधि।
- निम्न के संबंध में विशेष शक्तियाँ:
- अल्पसंख्यक
- सरकारी कर्मचारी
- कानून और व्यवस्था
- ब्रिटिश व्यावसायिक हित
- आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र
- रियासतें
- गवर्नर अनिश्चित काल तक प्रांतीय प्रशासन अपने हाथ में ले सकता था।
- विधानमंडल
- साम्प्रदायिक पंचाट (Communal Award) के माध्यम से पृथक निर्वाचन व्यवस्था लागू की गई।
- सभी सदस्य प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते थे।
- महिलाओं को पुरुषों के समान शर्तों पर मताधिकार मिला।
- मंत्री विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी थे।
- प्रांत प्रांतीय तथा समवर्ती सूचियों पर कानून बना सकते थे।
- प्रांतीय बजट का 40% गैर-मतदान योग्य था।
- गवर्नर को अधिकार था:
- विधेयकों पर स्वीकृति रोकना
- अध्यादेश जारी करना
- गवर्नर के अधिनियम लागू करना
भारत सरकार अधिनियम, 1935 का मूल्यांकन —
- गवर्नर-जनरल के अनेक ‘सुरक्षा उपायों’ और ‘विशेष उत्तरदायित्वों’ ने शासन के सुचारू कामकाज में बाधा उत्पन्न की।
- प्रांतीय गवर्नरों ने व्यापक ‘अधिभावी शक्तियाँ’ (Overriding Powers) अपने पास सुरक्षित रखी।
- ब्रिटिश भारत की केवल 14% जनसंख्या को मताधिकार प्राप्त था।
- साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार किया गया, जिससे अलगाववाद बढ़ा → और भारत विभाजन में योगदान हुआ।
- यह एक कठोर संविधान था; भारत में आंतरिक संशोधन की अनुमति नहीं थी; संशोधन का अधिकार केवल ब्रिटिश संसद के पास था।
- महत्वपूर्ण मत–
- लॉर्ड लिनलिथगो: यह अधिनियम भारत में ब्रिटिश प्रभाव बनाए रखने के लिए बनाया गया था।
- नेहरू: “यह ऐसी कार है जिसमें ब्रेक तो है, पर इंजन नहीं।”
- बी.आर. टॉमलिंसन: यह संवैधानिक प्रगति भारतीय सहयोगियों को राज से जोड़ने का प्रयास थी।
- प्रतिक्रिया –
- लगभग सभी राष्ट्रवादियों ने 1935 के अधिनियम की निंदा की और इसे अस्वीकार कर दिया।
- कांग्रेस ने इसे सर्वसम्मति से अस्वीकार किया; वयस्क मताधिकार द्वारा निर्वाचित संविधान सभा की मांग की।
- हिंदू महासभा और नेशनल लिबरल फेडरेशन ने केंद्र और प्रांतीय स्तर पर इस अधिनियम के अंतर्गत कार्य करने का समर्थन किया।
प्रांतीय चुनाव और पद-स्वीकृति –
वामपंथी दृष्टिकोण (नेहरू, सुभाष बोस, समाजवादी, कम्युनिस्ट)
- पद-स्वीकृति का विरोध किया।
- कारण:
- पद स्वीकार करने से अस्वीकृत अधिनियम को वैधता मिल जाती।
- यह बिना शक्ति के जिम्मेदारी होती।
- इससे क्रांतिकारी भावना और जनसंघर्ष कमजोर पड़ता।
दक्षिणपंथी / उदारवादी दृष्टिकोण –
- पद-स्वीकृति को अस्थायी रणनीति के रूप में समर्थन दिया।
- तर्क:
- तत्काल जन आंदोलन संभव नहीं था।
- विधानसभाएँ सरकार समर्थक ताकतों के लिए खाली नहीं छोड़ी जा सकती थी।
- प्रांतीय मंत्रालय फिर भी रचनात्मक काम कर सकते हैं।
- सहयोजन (Co-option) का खतरा विद्यमान था, किंतु इससे बचकर भागने के बजाय भीतर रहकर ही लड़ा जाना चाहिए था।
- गांधी का दृष्टिकोण
- शुरुआत में गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) में पद-स्वीकृति का विरोध किया।
- 1936 की शुरुआत तक → इसे आजमाने के पक्ष में हो गए।
- लखनऊ (1936) और फैजपुर (1937) अधिवेशन:
- कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का निर्णय किया।
- पद-स्वीकृति का फैसला चुनाव के बाद के लिए टाल दिया गया।
- प्रस्ताव: अधिनियम का विरोध “विधानसभाओं के भीतर और बाहर” किया जाएगा।
चुनाव और प्रतिनिधित्व
- सांप्रदायिक निर्वाचक मंडल और वेटेज इन लोगों को दिया गया:
- दलित वर्ग,
- महिलाएं,
- मजदूर।
- गांधी: ये प्रस्ताव “पोस्ट-डेटेड चेक” थे।
- ब्रिटिश प्रशासन में परिवर्तन
- सेक्रेटरी ऑफ स्टेट की इंडिया काउंसिल समाप्त कर दी गई।
- बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया।
- दो नए प्रांत बनाए गए: उड़ीसा और सिंध।
- अधिनियम में एक संघीय बैंक और एक संघीय न्यायालय की स्थापना का भी प्रावधान किया गया।
- संघ की विफलता –
- व्यापक विरोध के कारण अखिल भारतीय संघ अस्तित्व में नहीं आ सका।
- प्रांतीय स्वायत्तता 1 अप्रैल 1937 को लागू हुई।
- केंद्र सरकार कुछ छोटे परिवर्तनों के साथ 1919 के अधिनियम के अंतर्गत ही चलती रही।
- 1935 अधिनियम का क्रियाशील भाग 15 अगस्त 1947 तक लागू रहा।
अगस्त प्रस्ताव (1940)
- पृष्ठभूमि–
- जर्मनी की तीव्र प्रगति के कारण ब्रिटेन ने भारतीय सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।
- प्रावधान
- डोमिनियन स्टेटस अब ब्रिटिश नीति का आधिकारिक उद्देश्य बना।
- वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार → प्रमुख दलों के भारतीयों को बहुमत।
- युद्ध के बाद (स्पष्ट रूप से संविधान सभा का उल्लेख नहीं था) एक मुख्यतः भारतीय निकाय द्वारा व्यवस्था, लेकिन यह शर्तें लागू थी:
- रक्षा संबंधी दायित्व
- अल्पसंख्यकों के अधिकार
- देशी रियासतों की संधियाँ
- अखिल भारतीय सेवाएँ
- अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना कोई संविधान संशोधन नहीं (मुस्लिम लीग को वीटो का संकेत)।
- प्रतिक्रियाएँ
- कांग्रेस ने इसे अस्वीकार किया।
- नेहरू: “डोमिनियन स्टेटस पूरी तरह से खत्म हो गया है।”
- गांधी: ब्रिटेन और राष्ट्रवादियों के बीच खाई और चौड़ी हो गई।
- मुस्लिम लीग ने इसका स्वागत किया।
- वीटो आश्वासन से संतुष्ट थी।
- बंटवारे की मांग को फिर से दोहराया।
अगस्त प्रस्ताव का मूल्यांकन
- महत्व
- पहली बार ब्रिटिशों ने भारतीयों के संविधान बनाने के अंतर्निहित अधिकार को स्वीकार किया।
- संविधान सभा की मांग को औपचारिक रूप से मान्यता मिली।
- डोमिनियन स्टेटस स्पष्ट रूप से प्रस्तावित किया गया।
कार्यकारिणी परिषद में परिवर्तन (जुलाई 1941)
- वायसराय की कार्यकारिणी परिषद का विस्तार हुआ: 12 में से 8 सदस्य भारतीय (पहली बार भारतीय बहुमत)।
- महत्वपूर्ण विभाग— रक्षा, गृह, वित्त— ब्रिटिशों के पास ही रहे।
- राष्ट्रीय रक्षा परिषद बनाई गई, लेकिन इसके पास केवल सलाहकारी अधिकार थे।
क्रिप्स मिशन (मार्च 1942) –
- युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस के साथ भारतीय संघ।
- युद्ध के बाद → संविधान सभा का गठन:
- आंशिक रूप से प्रांतों द्वारा निर्वाचित (अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से)।
- आंशिक रूप से देशी रियासतों द्वारा नामित।
- ब्रिटिश संविधान स्वीकार करेंगे यदि:
- (i) प्रांत संघ से अलग होकर अलग संघ बना सकें (विभाजन का आधार)।
- (ii) सत्ता हस्तांतरण और अल्पसंख्यक सुरक्षा हेतु एक संधि की जाए।
- युद्ध के दौरान:
- रक्षा ब्रिटिशों के पास ही रहेगी।
- गवर्नर-जनरल की शक्तियां यथावत रहेंगी।

क्रिप्स प्रस्ताव पहले के प्रस्तावों से कैसे भिन्न था –
- संविधान निर्माण पूरी तरह भारतीयों के हाथ में (अगस्त प्रस्ताव की तरह “मुख्यतः” नहीं)।
- संविधान सभा की स्पष्ट योजना।
- प्रांतों को अलग होने की अनुमति (विभाजन की रूपरेखा)।
- अंतरिम प्रशासन में भारतीयों की भूमिका अधिक।
क्रिप्स मिशन असफल क्यों हुआ
- कांग्रेस की आपत्तियाँ
- डोमिनियन स्टेटस दिया गया, पूर्ण स्वतंत्रता नहीं।
- देशी रियासतों के प्रतिनिधि निर्वाचित नहीं, नामित थे।
- प्रांतों के अलग होने का अधिकार राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध था।
- तत्काल सत्ता हस्तांतरण नहीं था।
- रक्षा ब्रिटिशों के पास रही; गवर्नर-जनरल का वीटो बना रहा।
- वार्ता में कांग्रेस की ओर से नेहरू और आज़ाद शामिल थे।
- मुस्लिम लीग की आपत्तियाँ
- एकल भारतीय संघ का विरोध।
- संविधान सभा की प्रक्रिया से असंतोष।
- उन्हें लगा कि आत्मनिर्णय और पाकिस्तान की मांग का अधिकार नहीं दिया गया।
राजगोपालाचारी (सी.आर.) फॉर्मूला – 1944
- कांग्रेस–लीग सहयोग हेतु सी. राजगोपालाचारी द्वारा प्रस्ताव।

- ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता के लिए मुस्लिम लीग का समर्थन:
- मुस्लिम लीग कांग्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करेगी।
- सहयोग:
- केंद्र में अंतरिम सरकार बनाने में लीग कांग्रेस का सहयोग करेगी।
- युद्ध के बाद मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में जनमत-संग्रह:
- युद्ध के बाद उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की जनता जनमत-संग्रह द्वारा तय करेगी कि वे अलग संप्रभु राज्य बनाना चाहते हैं या नहीं।
- विभाजन की स्थिति में संयुक्त समझौते:
- यदि विभाजन स्वीकार हो, तो रक्षा, व्यापार और संचार की सुरक्षा हेतु संयुक्त समझौते होंगे।
- लागू होने की शर्त:
- ये प्रस्ताव तभी लागू होंगे जब ब्रिटिश सरकार भारत को पूर्ण सत्ता हस्तांतरित करे।
देसाई–लियाकत समझौता (अनौपचारिक) –
- भुलाभाई देसाई (कांग्रेस) और लियाकत अली खान (मुस्लिम लीग) के बीच मसौदा समझौता।
- अंतरिम सरकार का प्रस्ताव:
- कांग्रेस और लीग के समान संख्या में नामित सदस्य।
- अल्पसंख्यकों के लिए 20% आरक्षित सीटें।
- कोई औपचारिक समझौता नहीं हो सका।
- लेकिन इससे कांग्रेस और लीग के बीच समानता (Parity) की धारणा को वैधता मिली → दूरगामी प्रभाव पड़े।
वेवेल योजना (1945) –
पृष्ठभूमि
- यूरोप में युद्ध समाप्त (मई 1945) हो गया, पर जापान से युद्ध जारी था।
- ब्रिटेन में चुनाव से पहले चर्चिल सरकार समाधान चाहती थी।
- मित्र राष्ट्र भारत का सहयोग सुनिश्चित करने का दबाव बना रहे थे।
- ब्रिटिश चाहते थे कि भारतीय राजनीति को ब्रिटिश-विरोधी विद्रोह से दूर रखा जाए।
- योजना
- वायसराय लॉर्ड वेवेल ने शिमला में सम्मेलन बुलाया (जून 1945)।
- गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन। वेवेल ने 14 सदस्यों वाली परिषद का प्रस्ताव रखा, जिसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 5-5 सदस्य हों, और शेष 4 सदस्य वेवेल स्वयं नामित करेंगे।
शिमला सम्मेलन –
- इसमें मुस्लिम लीग की ओर से मोहम्मद अली जिन्ना और कांग्रेस की ओर से मौलाना अबुल कलाम आज़ाद शामिल हुए। इनके अलावा अकाली नेता मास्टर तारा सिंह, भुलाभाई देसाई, लियाकत अली खान आदि भी उपस्थित थे।

मुख्य विशेषताएँ:
- वायसराय और कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर, सभी सदस्य भारतीय होंगे।
- सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों को समान प्रतिनिधित्व।
- यह 1935 के अधिनियम के तहत अंतरिम सरकार के रूप में काम करेगा (विधानमंडल के प्रति जवाबदेह नहीं)।
- गवर्नर-जनरल के वीटो का प्रयोग मंत्रियों की सलाह पर किया जाएगा।
- पार्टियां एक संयुक्त सूची भेजेंगी; यदि नहीं, तो अलग-अलग सूचियां।
- युद्ध के बाद भविष्य के संविधान पर चर्चा की जाएगी।
- मुस्लिम लीग का रुख
- मांग की कि सभी मुस्लिम सीटें लीग के उम्मीदवारों द्वारा भरी जानी चाहिए।
- कांग्रेस का रुख
- इस योजना को कांग्रेस को एक सवर्ण हिंदू पार्टी तक सीमित करने के रूप में देखा।
- कांग्रेस चाहती थी कि उसे सभी समुदायों से सदस्य नामित करने का अधिकार हो।
- वेवेल ने वार्ता विफल घोषित की, जिससे व्यवहार में मुस्लिम लीग को वीटो मिल गया।
- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने शिमला सम्मेलन को भारतीय इतिहास का “जल-विभाजक (Watershed)” कहा।
कैबिनेट मिशन (1946) –
घोषणा
- एटली सरकार ने फरवरी 1946 में मिशन की घोषणा की।
- मिशन के सदस्य:
- पैथिक-लॉरेंस (अध्यक्ष)
- स्टैफर्ड क्रिप्स
- ए.वी. अलेक्जेंडर

- कैबिनेट मिशन योजना – प्रमुख बिंदु
- पूर्ण पाकिस्तान प्रस्ताव को अस्वीकार किया क्योंकि:
- प्रस्तावित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम आबादी (38% उत्तर-पश्चिम, 48% उत्तर-पूर्व)।
- बंटवारे से बंगाल और पंजाब के क्षेत्रीय संबंध खराब हो जाएंगे।
- आर्थिक, प्रशासनिक और सैन्य मुद्दे पैदा होंगे।
- प्रांतों को 3 वर्गों में बांटा गया:
- खंड A: मद्रास, बॉम्बे, CP, UP, बिहार, उड़ीसा
- खंड B: पंजाब, NWFP, सिंध
- खंड C: बंगाल, असम
- त्रिस्तरीय विधायिका और कार्यपालिका: प्रांतीय, अनुभाग/खंड , संघ स्तर।
- संविधान सभा (389 सदस्य):
- प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर निर्वाचित।
- खंड A, B, C पहले अलग-अलग प्रांतीय संविधान पर चर्चा करें, फिर मिलकर संघ का संविधान बनाएं।
- संघीय ढांचा:
- केंद्र के पास— रक्षा, संचार, विदेश मामले।
- प्रांतों को पूर्ण स्वायत्तता।
- केंद्र में साम्प्रदायिक प्रश्न साधारण बहुमत से तय।
- देशी रियासतें ब्रिटिश सर्वोच्चता से मुक्त; उत्तराधिकारी सरकारों से बातचीत कर सकती थीं।
- पहले आम चुनाव के बाद प्रांत समूह छोड़ सकते थे; 10 वर्ष बाद समूह पुनर्विचार कर सकते थे।
- संविधान सभा से अंतरिम सरकार बनेगी।
- संविधान सभा से अंतरिम सरकार बनेगी।
- भिन्न व्याख्या –
- कांग्रेस: समूहीकरण वैकल्पिक है; एक संविधान सभा होगी; लीग का वीटो नहीं रहेगा।
- मुस्लिम लीग: समूहीकरण से पाकिस्तान का संकेत समझा; मिशन ने स्पष्ट किया कि यह अनिवार्य है।
- स्वीकृति और अस्वीकृति
- मुस्लिम लीग ने योजना स्वीकार की: 6 जून 1946
- कांग्रेस ने योजना स्वीकार की: 24 जून 1946
- 10 जुलाई 1946: नेहरू ने संकेत दिया कि प्रांत समूहीकरण अस्वीकार कर सकते हैं।
- 29 जुलाई 1946: मुस्लिम लीग ने स्वीकृति वापस ली → प्रत्यक्ष कार्रवाई का आह्वान (16 अगस्त 1946)
- वेवेल का ‘ब्रेकडाउन प्लान’
- ब्रिटिशों का उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व के मुस्लिम प्रांतों से हटना, शेष भारत कांग्रेस को।
- यह दर्शाता है:
- ब्रिटिशों को कांग्रेस-नेतृत्व वाले विद्रोह की आशंका थी।
- कुछ अधिकारी “नॉर्दर्न आयरलैंड”-जैसे पाकिस्तान के पक्ष में थे।
एटली का वक्तव्य (20 फरवरी 1947) –
- समय सीमा: 30 जून, 1948 तक सत्ता हस्तांतरण, भले ही संविधान पर सहमति न बनी हो।
- देशी रियासतों पर से ब्रिटिश सत्ता समाप्त (Lapse) हो जाएगी, इसे उत्तराधिकारी सरकारों को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा।
- वेवेल की जगह माउंटबेटन को वायसराय नियुक्त किया गया।
- विभाजन की ओर बढ़ती स्वीकृति
- 10 मार्च 1947: नेहरू ने कहा कि कैबिनेट मिशन योजना सर्वोत्तम है, अन्यथा पंजाब और बंगाल का विभाजन होगा।
- अप्रैल 1947: कांग्रेस अध्यक्ष कृपलानी ने संकेत दिया कि यदि पंजाब और बंगाल का न्यायपूर्ण विभाजन हो तो पाकिस्तान स्वीकार किया जा सकता है।
डिकी बर्ड योजना –
मुख्य प्रावधान
- उत्तराधिकारी राज्यों के रूप में प्रांत:
- प्रत्येक ब्रिटिश भारतीय प्रांत – जैसे बंगाल, पंजाब, बॉम्बे, मद्रास, और अन्य – ब्रिटिश वापसी के तुरंत बाद एक स्वतंत्र उत्तराधिकारी राज्य बन जाएगा।
- किसी संघ में शामिल होने का विकल्प: स्वतंत्रता के बाद प्रत्येक प्रांत तय करे कि वह संविधान सभा में जाकर किसी बड़े संघ (भारत/पाकिस्तान) का हिस्सा बनेगा या स्वतंत्र रहेगा।
- निर्णय पूरी तरह प्रांतीय सरकारों और विधानसभाओं पर होगा।
- देशी रियासतों को स्वतंत्र विकल्प:
- देशी रियासतें, जो अप्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के अधीन थी, दोनों डोमिनियन (भारत या पाकिस्तान) में से किसी के भी साथ विलय करने, या स्वतंत्र रहने के लिए मुक्त होंगी।
- आरंभ में कोई केंद्रीय सत्ता नहीं:
- बाद की योजनाओं के विपरीत, डिकी बर्ड प्रस्ताव में तुरंत केंद्रीय सरकार या डोमिनियन ढांचे के गठन की परिकल्पना नहीं की गई थी।
- प्रांत द्वारा सत्ता का हस्तांतरण:
- ब्रिटिश प्रांत दर प्रांत पीछे हटेंगे, और सत्ता सीधे स्थानीय सरकारों को सौंपी जाएगी, न कि अखिल भारतीय प्रशासन को।

माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947) –
- विभाजन सहित स्वतंत्रता का सूत्र पहले से व्यापक रूप से स्वीकार किया जा चुका था।
- मुख्य बिंदु:
- पंजाब और बंगाल विधानसभाओं में हिंदू और मुस्लिम समूह अलग-अलग विभाजन पर मतदान करेंगे।
- साधारण बहुमत होने पर प्रांत का विभाजन होगा।
- विभाजन होने पर दो डोमिनियन और दो संविधान सभाएँ बनेंगी।
- पंजाब और बंगाल विधानसभाओं में हिंदू और मुस्लिम समूह अलग-अलग विभाजन पर मतदान करेंगे।
- डिकी बर्ड योजना – मुख्य प्रावधान
- उत्तराधिकारी राज्यों के रूप में प्रांत:
- प्रत्येक ब्रिटिश भारतीय प्रांत –
- जैसे बंगाल, पंजाब, बॉम्बे, मद्रास, और अन्य – ब्रिटिश वापसी के तुरंत बाद एक स्वतंत्र उत्तराधिकारी राज्य बन जाएगा।
- किसी संघ में शामिल होने का विकल्प: स्वतंत्रता के बाद प्रत्येक प्रांत तय करे कि वह संविधान सभा में जाकर किसी बड़े संघ (भारत/पाकिस्तान) का हिस्सा बनेगा या स्वतंत्र रहेगा।निर्णय पूरी तरह प्रांतीय सरकारों और विधानसभाओं पर होगा।
- देशी रियासतों को स्वतंत्र विकल्प:
- देशी रियासतें, जो अप्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के अधीन थी, दोनों डोमिनियन (भारत या पाकिस्तान) में से किसी के भी साथ विलय करने, या स्वतंत्र रहने के लिए मुक्त होंगी।
- आरंभ में कोई केंद्रीय सत्ता नहीं:
- बाद की योजनाओं के विपरीत, डिकी बर्ड प्रस्ताव में तुरंत केंद्रीय सरकार या डोमिनियन ढांचे के गठन की परिकल्पना नहीं की गई थी।
- प्रांत द्वारा सत्ता का हस्तांतरण:
- ब्रिटिश प्रांत दर प्रांत पीछे हटेंगे, और सत्ता सीधे स्थानीय सरकारों को सौंपी जाएगी, न कि अखिल भारतीय प्रशासन को।

माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947) –
- विभाजन सहित स्वतंत्रता का सूत्र पहले से व्यापक रूप से स्वीकार किया जा चुका था।
- मुख्य बिंदु:
- पंजाब और बंगाल विधानसभाओं में हिंदू और मुस्लिम समूह अलग-अलग विभाजन पर मतदान करेंगे।
- साधारण बहुमत होने पर प्रांत का विभाजन होगा।
- विभाजन होने पर दो डोमिनियन और दो संविधान सभाएँ बनेंगी।
- सिंध अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से करेगा; NWFP और सिलहट में जनमत-संग्रह द्वारा संबद्धता तय होगी।
- देशी रियासतों के लिए स्वतंत्रता का कोई विकल्प नहीं(उन्हें भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल होना होगा)बंगाल के लिए अलग स्वतंत्रता का प्रावधान नहीं
- हैदराबाद का पाकिस्तान में विलय असंभव घोषितस्वतंत्रता की तिथि निर्धारित: 15 अगस्त 1947
- क्रियान्वयन:
- बंगाल और पंजाब विधानसभाओं ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया।
- सिलहट पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) में शामिल हुआ।
- सीमा निर्धारण हेतु सीमा आयोग बनाए गए।
- NWFP के जनमत-संग्रह में पाकिस्तान के पक्ष में निर्णय हुआ;
- बलूचिस्तान और सिंध पाकिस्तान में शामिल हुए
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (5 जुलाई 1947) –

- ब्रिटिश संसद ने 4 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम प्रस्तुत किया।
- 15 जुलाई 1947 को प्रधानमंत्री एटली ने माउंटबेटन योजना को हाउस ऑफ कॉमन्स में विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया और 16 जुलाई को हाउस ऑफ लॉर्ड्स में।
- 18 जुलाई 1947 को विधेयक पारित हुआ और शाही स्वीकृति के बाद यह अधिनियम बन गया।
- इस अधिनियम ने 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना को वैधानिक रूप प्रदान किया।
- इस अधिनियम में 20 धाराएँ और 3 अनुसूचियाँ थीं।
- 15 अगस्त 1947 को भारतीय उपमहाद्वीप दो डोमिनियनों में विभाजित हुआ— भारतीय संघ और पाकिस्तान।
- पंजाब और बंगाल की सीमाएँ सीमा आयोग, जनमत-संग्रह (लोकमत) और चुनावों द्वारा निर्धारित की गयी।
- देशी रियासतों के साथ ब्रिटिश सरकार के सभी समझौते और अनुबंध समाप्त कर दिए गए।
- ब्रिटिश क्राउन की उपाधि से ‘भारत का सम्राट’ शब्द हटा दिया गया।
- 15 अगस्त 1947 के बाद ब्रिटिश संसद का भारत और पाकिस्तान पर अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया।
- केंद्रीय विधानसभा और राज्य परिषदें भंग कर दी गई।
- प्रत्येक डोमिनियन के लिए अलग विधानमंडल होगा, जिसे ब्रिटिश संसद के हस्तक्षेप के बिना पूर्ण विधायी अधिकार प्राप्त होंगे।
- दोनों संविधान सभाओं को संसद का दर्जा दिया गया और डोमिनियन सरकारों हेतु अस्थायी व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें पूर्ण विधायी शक्तियां दी गई।
- अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु गवर्नर-जनरल को आवश्यक अध्यादेश जारी करने की शक्ति दी गई।देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में से किसी में भी शामिल हो सकती थीं।
- जब तक दोनों डोमिनियन नया संविधान नहीं बना लेते, तब तक भारत सरकार अधिनियम, 1935 लागू रहेगा।
- 20 जून 1947 को बंगाल और 23 जून को पंजाब विधानसभाओं ने विभाजन के पक्ष में मतदान किया।
- सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो सीमा आयोग बनाए गए, जिनमें कांग्रेस के 2 और मुस्लिम लीग के 2 सदस्य थे।
- रेडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 17 अगस्त 1947 को प्रकाशित हुई।
- पंजाब सीमा आयोग:
- कांग्रेस से जस्टिस मेहर चंद महाजन और
- जस्टिस तेजा सिंह;
- मुस्लिम लीग से
- दीन मुहम्मद और मोहम्मद मुनीर।
- बंगाल सीमा आयोग:
- कांग्रेस से
- जस्टिस सी.सी. बिस्वास और
- बी.के. मुखर्जी;
- मुस्लिम लीग से
- अबू सालेह मोहम्मद अकरम और
- एस.ए. रहमान।
- लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के पहले और अंतिम ब्रिटिश गवर्नर-जनरल बने।
- मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल बने।
- भारत सचिव हर्बर्ट सैमुअल ने इस अधिनियम को “युद्ध के बिना शांति समझौता” कहा।
